सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

यहां आस्तिक- नास्तिक की भी कोई झंझट नही.

"ईशावास्यमिदं सर्वं यतकिंचित जगत्याम् जगत! तेनत्यक्त्येन भुंजीथा,मा गृध कस्वि द्धनम!!"-[ईशावास्योपनिषद १-१]
चूँकि पश्चिम के अधिकांश दर्शनशात्रियों ने भारतीय उत्कृष्ट वेदांत का अध्यन ही नहीं किया,इसलिए वे सभी एकांगी और कोरे भौतिवादी रहे हैं। जबकि वेदांत की ईश्वर संबंधी घोषणा न तो यह कहती कि ईश्वर है और न यह कहती कि ईश्वर नहीं है। बहुत सम्भव है कि महात्मा बुद्ध ने भी शायद् इसी वेदांत सूत्र को अपने चार आर्य सत्यों के साथ नत्थी किया हो। ईशावास्योपनिषद का उपरोक्त सूत्र कालजयी और विज्ञानमय है ! स्वयंसिद्ध है। इसमें न तो मनुवाद है , न कोई जातिवाद है,न ब्राह्मणवाद है !यहां आस्तिक- नास्तिक की भी कोई झंझट नही है! यह तो मनुष्यमात्र को निम्तर श्रेणी से उच्चतर श्रेणी की ओर ले जाने का शानदार दुर्लभ सोपान है।

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