रविवार, 25 दिसंबर 2022

‘कल्पतरु की उत्सवलीला’

 प्रति वर्ष की भाँति इस साल भी सारा ईसाई जगत ईश-पुत्र ईसा मसीह का जन्मोत्सव मनाएगा। पता नहीं कितने ईसाइयों और हिंदुओं को यह मालूम है कि इस भारत में एक ऐसा हिंदू संत साक्षात् रह चुका है जिसने ईसा मसीह के प्रेम में आविष्ट होकर उनका साक्षात्कार किया था, ईसा की राह से भी ईश्वर प्राप्त किया था।

पढ़िए करुणामूर्ति जीसू पर परमहंस रामकृष्ण देव का आत्मकथ्य पद्मश्री डा. कृष्ण बिहारी मिश्र की विलक्षण पुस्तक ‘कल्पतरु की उत्सवलीला’ से।
“सुन मास्टर, भीतरी बात तुझसे कहूँ , पंचवटी में एक दिन प्रेममूर्ति जीसू से माँ ने मिलाया। उसने हुलसकर गले लगा लिया था। और सच कहता हूँ उसके प्रेम में विभोर हो गया था, जैसे बाल्यकाल में माँ अपने छोह से नहलाती थी, कुछ वैसा स्वाद। जीसू के प्रेम को समझाना असंभव है मास्टर। वह दिव्य आस्वाद उस सौन्दर्य-राशि के रोम-रोम से झर रहा था। निहाल कर दिया माँ के अनुग्रह ने।
यह जो बाइबिल की और तू जिसे ‘टेस्टामेंट’ कहता है, उसकी , अच्छा, यह ‘न्यू’ क्या है मास्टर? अच्छा, नया, जैसे केशव का ‘नव विधान’ , क्यों? तो यह सारी बातें शम्भू ने मुझे बहूत पहले सुना समझा दी थीं। न्यांगटा (वेदान्तगुरु तोतापुरी) कहता था कि भागवत चर्चा बराबर होनी चाहिए जैसे लोटा को रोज़ मांजना चाहिए। इसीलिए प्रेमी योगी जीसू के प्रसंग सुनाने के लिए तुझसे बीच बीच में आग्रह करता हूँ।
.........
शम्भु और यदुनाथ के घर प्रायः धर्म-चर्चा के लिए अपरान्ह में चला जाता था और देर रात में लौटता था। और शम्भु चरण से बाइबिल सुनकर प्रेम योगी जीसू के दिव्य जीवन पर मन-प्राण अनुरक्त हो गया था। वही दिव्य ज्योति हर क्षण मेरे भाव-लोक को बाँधे रहती। एक दिन माँ से कहा था, ‘माँ, सभी कहते हैं, मेरी घड़ी ठीक चल रही है। ईसाई, हिंदू, मुसलमान सभी कहते हैं, मेरा धर्म ठीक है, परंतु माँ, किसी की भी तो घड़ी ठीक नहीं चल रही है। तुझे ठीक-ठीक कौन समझ सकेगा, परन्तु व्याकुल होकर पुकारने पर, तुम्हारी कृपा होने पर सभी पथों से तेरे पास पहुँचा जा सकता है माँ! तूने मेरी आँख की मैल साफ़ कर दी है माँ, सही राह दिखा दी है तेरी करुणा ने। ...
फिर प्रदोष के दिन शिव मंदिर की सीढ़ियों पर भावाविष्ट दशा में बैठा अपनी माँ से प्रार्थना की थी, ‘माँ , ईसाई लोग गिरजाघरों में तुम्हें कैसे पुकारते हैं, एक बार दिखा देना। परंतु माँ, भीतर जाने पर लोग क्या कहेंगे? यदि कुछ गड़बड़ हो जाए तो? गिरजाघर में जाने से काली मंदिर के पुजारी यदि रुष्ट होकर मंदिर का दरवाज़ा तेरे बालक के लिए बंद कर दें तो फिर गिरिजाघर के दरवाज़े के पास से ही दिखा देना माँ। ‘ और माँ ताली बजाकर हँसने लगी थी, ‘ख़ूब! शिव के दरवाज़े बैठकर गिरजाघर देखने की साध! ख़ूब! यही असली बोध है, इसे ही उन्मीलित नेत्र कहते हैं रे वत्स! सर्च रे मास्टर, अपने गहरे उल्लास से माँ ने अपने भीतू बालक को आश्वस्त कर दिया था। और गिरजाघर दिखा दिया एक दिन। जैसे एक दिन मेरी प्रार्थना से पसीजकर करुणामूर्ति जीसू के दर्शन कराए थे।
सच कहता हूँ, पहली बार तो उस दिव्य पुरुष के प्रभाव से मैं काँप गया था। वह यदु का घर दिखाया था न तुझे, वहाँ जब-तब जाता था। यदु नहीं रहता था तब भी कभी-कभार जाकर कुछ समझ बैठता था। एक दिन जीसू के चित्र पर दृष्टि गड़ी रह गई। वही चित्र जो तुझे दिखाया था। माता मेरी की गोद में शिशु जीसू की मोहिनी छवि। एकाएक देखता क्या हूँ मास्टर कि वह चित्र जीवित और ज्योतिर्मय हो उठा है। और देव-जननी मैरी और देव-शिशु ईसा के अंगों की ज्योति रश्मियाँ मेरे हृदय को अभिभूत करने लगीं और मेरे मन की दशा में आलोड़न शुरू हो गया। नैसर्गिक संस्कारों का लोप होने लगा और एक अपरिचित संस्कार मुझे दबाने लगा। पहले तो अपने को संभालने की कोशिश की पर जब नई संस्कार-ज्योति के प्रभाव से हारने लगा तो घबराकर अपनी माँ को हाँक लगायी, ‘माँ, तू आज मुझे यह क्या कर रही है? कहाँ ले जा रही है माँ? और वह हँस रही थी मास्टर! हताश होते बड़े ज़ोर से डाटा माँ को, ‘तेरा बेटा डूब रहा है और तू पागल की तरह ताली बजाकर हँस रही है!’ मेरी भाषा माँ से सही नहीं गई। हँसी पर विराम देते मुझे छोह से झिड़कना शुरू किया, ‘यह क्या रे! ईसा के लिए पागल बना था, आर्त्त होकर उस दिन उसको पाने की भीख माँग रहा था! वह मिला तो झोली में जगह नहीं बनाना चाहता, आतंकित है। छि:। तेरी कौन सी सम्पदा बिला रही है जो इस तरह काँप रहा है? संस्कार के संहार से डर रहा है? उसके मरे बिना दिव्य ज्योति को ग्रहण कैसे करेगा? इतनी सी बात नहीं समझता और प्रभु-पुत्र के साक्षात्कार की तेरी व्याकुल भूख! दिव्य ज्योति का मालिक बनना चाहता है? छि:! कूड़ा के प्रति इतना मोहासक्त है। संस्कार की ज़मीन को ढहते-डूबते देख कर इस तरह से काँप रहा है। आँख की मैल साफ़ कर, ज्योति का साक्षात्कार करना चाहता था। और सुन, कूड़ा कचरा में दिव्य चेतना नहीं उतरती। देख, यह प्रेम मूर्ति जीसू अपने साथ करूणा का सागर लिए तेरे सामने खड़ा है। इसमें डूब कर जीवन को धन्य कर। ‘ और मेरे भीतर बल रचकर माँ एकाएक अदृश्य हो गई। जाने किस लोक में ग़ायब हो गई कि मैं उसका नाम तक भूल गया। उसके मंदिर के सामने माथा पटकता रहा, पर न माँ दिखाई पड़ती और न तो उसका नाम मेरे कण्ठ से फूटता। प्रेमी योगी जीसू के सिवा मुझे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। केवल उसी की सुधि में डूबा रहता। हां रे मास्टर, जीसू की लहर ने ऐसा आबिद्ध कर लिया था कि कमरे की सारी देव-छवियों को बाहर निकलवा दिया। देख मास्टर, मेरी माँ का कौतुक! दिखाया उसने कि पादरी लोग गिरजाघर में ईसा की मूर्ति के सामने धूप-दीप जलाकर आर्र्त स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं। और मेरा भी राग उसी से जुड़ गया है। यह जो भाव तरंग माँ ने जगायी थी वह तीन दिनों तक मुझे बाँधे रही, मास्टर। उसके बाद पंचवटी में टहल रहा था। माँ ने अपूर्व दृश्य दिखाया। देखता क्या हूँ कि एक अपूर्व सुंदर ग़ौर वर्ण देव-मानव स्थिर दृष्टि से मुझे निहार रहा है और धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ता चला आ रहा है। चकित अभिभूत दृष्टि से उसे देखने लगा। समीप पहुँचते ही मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा, ‘ईसा मसीह!’ और उसने मुझे अपने आलिंगन में भरकर मुझे अपनी दिव्यता से सींच दिया। रोम-रोम पुलकित और क्षण भर में देश-काल का बोध मर गया। मैं महाभाव में प्रवेश कर सगुण विराट ब्रह्म के साथ एकीभूत हो गया। ईसा की दिव्य विभूति से तू सुपरिचित है मास्टर। माँ ने मुझे उसके सत्य का साक्षात्कार कराया था। सच मास्टर, वह दैवी प्रकाश जीव के यातना-मोचन के लिए मेरी की कोख से पृथ्वी पर उतरा था।
और मेरी माँ का अनुग्रह देख अपने बालक को उसके आलिंगन की दिव्य ज्योति में बँधने का सुयोग रच दिया था। और इसी प्रकार गिरजा दिखाने के पहले माँ ने अल्लाह की राह दिखाकर मस्जिद में दौड़ाया था। वह प्रसंग तो तुझे बताना ही भूल गया। बताऊँगा किसी दिन।...”
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बुद्ध और यीशु

 बुद्ध ने कई प्रबुद्ध लोगों को बनाया, लेकिन वे बहुत बड़ी आत्माएं थीं। एक सारीपुत्ता पहले से ही बहुत बड़ी हुई आत्मा थी; फल पक गया था। मेरी अपनी भावना यह है कि बुद्ध अगर सारीपुत्र के जीवन में नहीं आते तो भी जल्दी-जल्दी प्रबुद्ध हो जाते; बुद्ध बहुत आवश्यक नहीं थे। उसने मदद की, उसने चीजों को गति दी, लेकिन बहुत आवश्यक नहीं था। अगर सरीपुत्ता उनसे न मिलता तो शायद एक-दो जन्म में खुद ही कोने में आ जाता; वो तो आ ही रहा था, बस कगार पर था। तो महाकाश्यप था, तो मोगगल्यायन था, और तो बुद्ध के अन्य शिष्य थे।

लेकिन यीशु ने वास्तव में चमत्कार किया। उसने साधारण पत्थरों को छुआ और उन्हें हीरे में बदल दिया। वह बहुत साधारण लोगों के बीच चला गया। एक मछुआरे अपना जाल फेंकते हुए... और यीशु आते हैं, उसके पीछे खड़े होते हैं, उसके कंधे पर हाथ रखते हैं और कहते हैं, 'मेरी आँखों में देखो। आप मछली पकड़ने के लिए कब तक जा रहे हैं? मैं तुम्हें पुरुषों का पकड़ने वाला बना सकता हूँ। मेरी आँखों में देखो। ' और गरीब, साधारण मछुआरे - अशिक्षित, अव्यवस्थित, असंस्कारी; कभी किसी के बारे में नहीं सुना है; शायद कभी आध्यात्मिक विकास में दिलचस्पी नहीं थी; मछली पकड़ने और उन्हें बेचने में संतुष्ट था, और अपने दिन-प्रतिदिन खुश था fe- यीशु की आँखों में देखता है, अपना जाल फेंकता है और पीछा करता है उसे। और वह मछुआरे एक प्रबुद्ध व्यक्ति बन जाता है। या एक किसान, या एक टैक्स-कलेक्टर, या यहां तक कि एक वेश्या, मैरी मैग्डालीन ...
यीशु साधारण धातु को सोने में बदल देता है। वह वास्तव में दार्शनिक का पत्थर है। उसका स्पर्श जादुई है: जहां भी वह छूता है, अचानक आत्मा उत्पन्न होती है।
OSHO
जीसस पर बातचीत

आप ऐसे ही खुश रहें।।

 कल सैलून वाले क़ी दुकान पर एक स्लोगन पढा़ ..

"हम दिल का बोझ तो नहीं पर सिर का बोझ जरूर हल्का कर सकते हैं "..🤣
लाइट क़ी दुकान वाले ने बोर्ड के नीचे लिखवाया ..
"आपके दिमाग की बत्ती भले ही जले या ना जले,परंतु हमारा बल्ब ज़रूर जलेगा ".. 🤣
चाय के होटल वाले ने काउंटर पर लिखवाया ..
"मैं भले ही साधारण हूँ, पर चाय स्पेशल बनाता हूँ।"🤣
एक रेस्टोरेंट ने सबसे अलग स्लोगन लिखवाया ..
"यहाँ घऱ जैसा खाना नहीं मिलता, आप निश्चिंत होकर अंदर पधारें।" 😀
इलेक्ट्रॉनिक दुकान पर स्लोगन पढ़ा तो मैं भाव विभोर हो गया ..
"अगर आपका कोई फैन नहीं है तो यहाँ से ले जाइए "..😂
गोलगप्पे के ठेले पर एक स्लोगन लिखा था ..
"गोलगप्पे खाने के लिए दिल बड़ा हो ना हो, मुँह बड़ा रखें, पूरा खोलें" ..🤣
फल भंडार वाले ने तो स्लोगन लिखने की हद ही कर दी ..
"आप तो बस कर्म करिए, फल हम दे देंगे ".. 🤣
घड़ी वाले ने एक ग़ज़ब स्लोगन लिखा ..?
"भागते हुए समय को बस में रखें, चाहे दीवार पर टांगें, चाहे हाथ पर बांधें..."..🤣
ज्योतिषी ने बोर्ड पर स्लोगन लिखवाया۔
"आइए .. मात्र 100 रुपए में अपनी ज़िंदगी के आने वाले एपिसोड देखिए ..."🤣
बालों के तेल क़ी एक कंपनी ने हर प्रोडक्ट पर एक स्लोगन लिखा ..
"भगवान ही नहीं, हम भी बाल बाल बचाते हैं।" ..😂😀🤣
आप जैसे अभी हल्का सा मुस्करा रहे हैं या हँस रहें हैं, ऐसे ही खुश रहें।।
स्वस्थ रहें मस्त रहे 🙏🏻😇

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

इतिहास के पन्नों मे मेरा नाम नहीं कोई

 मैने पत्थरों को काट काट अपने हाथों से सिरजे!

सम्राटों के आदेश पर बनाये मंदिर-मस्जिद-गिरजे!!
चीर डाला धरतीको और बनाई पनामा-स्वेज नहरें!
मिलादी हमने महासागरों की महा सागरों से लहरें!!
चाहे वो अजंता, कोणार्क, देवगिरि,मदुराई,खजुराहो!
या फिर एलोरा,आबू, देवगढ़ तंजाबूर कामाख्या हो।।
चीख-चीखकर बोल रही हैं खंडित पाषाण प्रतिमाऐं!
मेरे श्रम धैर्य चिंतन और समाज की कला की सीमाऐं !!
अब तक मेरे बलिदान का मोल न कभी कूत सका कोई!
इसीलिये दोस्तो, इतिहास के पन्नों मे मेरा नाम नहीं कोई।।
:-श्रीराम तिवारी

गरीबी ,भुखमरी ,प्रतिष्पर्धा ,जहालत और वेरोजगारी

 इंसानियत घट रही है या कुदरत अपना रंग बदल रही है?

मालवा ,बुंदेलखंड और उत्तर भारत के अधिकांस हिस्सों में लगातार दो-तीन दिनों तक रुक-रुक कर बारिस याने 'मावठा ' गिरने उपरान्त अब कड़ाके की ठण्ड ने दस्तक दे दी है। उम्मीद है की मार्च -तक यह सिलसिला जारी रहेगा। क्योंकिं एक अच्छा शासक अपने हिस्से का सौभाग्य लेकर जब सत्ता में आता है तो वह राष्ट्र का सौभाग्य भी साथ लेकर आता है !
मौसम विज्ञानी और पर्यावरणविद कितना ही आलतू-फ़ालतू लिखते रहें कि 'ग्लोबल वार्मिंग' से दुनिया खत्म हो जाने वाली है। पहले शीतयुद्ध फिर स्टार वार अब सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर या एटामिक जखीरे के नाम पर खूब धमकाया जा रहा है। इसी तरह ठंड के बारे में भी उनके अनुमान गलत निकल रहे हैं कि यह अब तो इतिहास की चीज रह गई है। लेकिन मुझे तो सब कुछ उल्टा-पुल्टा ही नजर आ रहा है।
जिस तरह परिवार नियोजन ,नसबंदी जैसे कार्यक्रमों के बावजूद आतंकियों जेहादियों शैतानों जमाखोरों,मिलाबटियों और शोषणकारी ताकतों के साथ -शैतान की साठगांठ के बावजूद- दुनिया की आबादी कम नहीं हो रही बल्कि तेजी से बढ़ती जा रही है। उसी तरह ग्लोबल वार्मिंग या पर्यावरण संकट के बावजूद ठंड भी पहले से ज़रा ज्यादा ही बढ़ रही है। न केवल ठंड , न केवल गर्मी , न केवल वर्षा बल्कि हर चीज बढ़ रही है। वह महँगाई भी मुझे न जाने क्यों बढ़ती दिख रही है जो ओरों को कम होती नजर नहीं आ रही है !
गरीबी ,भुखमरी ,प्रतिष्पर्धा ,जहालत और वेरोजगारी खूब परवान चढ़ रही है। इसके अलावा छुद्र मानवीय जिजीविषा में भी कोई कमी नजर नहीं आ रही है। वेशक केवल इंसानियत घट रही ही याने मानवता में कमी आ रही है । बाकी सब कुछ केवल बढ़ ही रहा है। भृष्टाचार,रिश्वतखोरी , स्वार्थ ,हिंसा ,लालच, मुनाफा लूट, रेप, एफडीआई ,सूचना -संचार सोशल मीडिया का नव अपराधीकरण न जाने क्या-क्या ,सभी कुछ तो बढ़ रहा है। न केवल बढ़ रहा है बल्कि आदमी से बढ़ा भी हो रहा है।
लद्दाख,गलवान,डोकलाम,तवांग-
हर जगह चीन की पॉलिसी है रांग!
भारतीय फौज सक्षम है वतन की रक्षा करने में,
इसलिये गलत है इस मुद्दे पर संसद में बहस की मांग!
धीरे धीरे ठण्ड बढ़ रही है ,लेकिन उधर तवांग अरुणाचल प्रदेश से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक कूटनीतिक गर्मी महसूस की जा रही है! सम्पन्न वर्ग को तो वैसे भी हर मौसम में आनंद ही आनद है। सभ्रांत वर्ग यदि अपने लोभ लालच इत्यादि अपनी आत्मघाती परेशानियो को स्वयं मोल न ले जिनका जिक्र मजहबी और धार्मिक पुस्तकों में शिद्द्त से किया गया है। तो उसे ' जीवित शरदः शतम ' नहीं बल्कि 'जीवेत शिशिर शतम' या जीवेत हेमंत शतम' का नैसर्गिक लाभ मिल सकता है। साथ ही यदि यह वर्ग ड्रग खोरी ,नशाखोरी तथा अपने वैभवपूर्ण जीवन पर स्वानुशासन रखे ,याने कुछ लगाम लगाए रखे तो वह इस तरह की ठंड के मौसम का सौ साल तक आनंद ले सकता है । बशर्ते इस वर्ग को अपने हमवतन असंख्य उन लोगों के बारे में भी कुछ जिम्मेदारी का एहसास हो ,जो इस कड़ाके की ठण्ड में झुग्गी -झोपड़ियों में रहते हैं।
एलीट क्लास के महानुभावों से निवेदन है कि ग्रामीण अंचलों में रहने वालों , खेतों-खलिहानों -मचानों या 'ढबुओं ' में रहने वालों की वेदनापूर्ण जीवन शैली का आंशिक एहसास करने के लिए कम से कम मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'पूस की रात ' ही पढ़ ले। गऱीबों के लिए ठण्ड क्या ,बर्षा क्या और गर्मी क्या मायने रखती है यह जानने के लिए गरीब होना जरुरी नहीं है। यदि आप खाते -पीते सम्पन्न वर्ग से हैं और यदि उनमें मानवीय संवेदनाएं जीवित हैं और यदि सर्वहारा वर्ग के संघर्षपूर्ण जीवन से परिचित हैं ,उनको सम्मान देना चाहते हैं,तो कुछ करने से पहले मेकिस्म गोर्की और निकोलाई आश्त्रोव्स्की को अवश्य पढ़ें।:-श्रीराम तिवारी
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गरीब ज्यादा गरीब अमीर ज्यादा अमीर हो गए!!

 जो कभी मठ्ठा भी न थे वे अब खीर हो गए!

भ्रष्ट नेता बाबू अफसर मुल्क की नजीर हो गए!!
सरमायेदारों की जिन -जिन पर कृपादृष्टि रही,
वे चुनाव जीतकर सत्ता के बगलगीर हो गए!
पूँजीवादी पुरोगामी नीतियों का ही नतीजा है ,
गरीब ज्यादा गरीब अमीर ज्यादा अमीर हो गए!!
शिक्षा -संचार क्रान्ति का लाभ क्रीमी लेयर ले उड़े,
अत : हम पहले से ज्यादा लकीर के फ़कीर हो गए!
शायद देवी देवता भी डरते होंगे इन रिश्वतखोरों से,
इसलिये मिलावटिये धंधेबाज नामी वजीर हो गए!!
भगवान खुदा गाड भी हैंरान होगा कि कैसे मेरे वंदे
मिलावटी फटे दूध से श्री खंड और पनीर हो गए।
सितमगरों के आगे गिड़गिड़ाना मंजूर नहीं जिनको,
वे हर दौर में शहादत के बरक्स बेनजीर हो गए !!
— श्रीराम तिवारी

याद रखें कि आपको शरण देने के लिए कोई दूसरा देश नहीं है।

 मेरी 5 फिगर इनकम। मेरा 2 बीएचके का घर। मेरी कार, मेरा व्यवसाय, मेरी 25 एकड़ जमीन। मेरा फार्म हाउस आदि। यह सब सुरक्षित है, जब तक मेरा देश सुरक्षित है। नहीं तो सब कुछ धू-धू कर जल जाएगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध में आज 20 लाख यूक्रेनियन अपना सबकुछ छोड़कर दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. वे भाग्यशाली थे कि उनके पड़ोसी देश थे जिन्होंने उन्हें आश्रय दिया। हमारा क्या होगा???.
आपको क्या लगता है हम कहाँ जा सकते हैं??? एक तरफ पाकिस्तान, एक तरफ बांग्लादेश, नीचे हिंद महासागर, ऊपर चीन, देश के अंदर अनगिनत गद्दार!!! याद रखें कि आपको शरण देने के लिए कोई दूसरा देश नहीं है।
इसलिए सस्ते पेट्रोल और मुफ्त राशन के बजाय एक मजबूत राष्ट्र को तरजीह दें,यह एक निर्विवाद सत्य है!

वीर तुम अड़े रहो,

 वीर तुम अड़े रहो,

रजाई में पड़े रहो
चाय का मजा रहे,
प्लेट पकौड़ी से सजा रहे
मुंह कभी रुके नहीं,
रजाई कभी उठे नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
मां की लताड़ हो
या बाप की दहाड़ हो
तुम निडर डटो वहीं,
रजाई से उठो नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
मुंह भले गरजते रहे,
डंडे भी बरसते रहे
बीवी जो भड़क उठे,
चप्पल भी खड़क उठे
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
प्रातः हो कि रात हो,
संग कोई न साथ हो
रजाई में घुसे रहो,
तुम वहीं डटे रहो
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
एक रजाई लिए हुए
एक प्रण किए हुए
अपने आराम के लिए,
सिर्फ आराम के लिए
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
कमरा ठंड से भरा,
बर्फ से ढकी धरा
यत्न कर निकाल लो,
ये समय तुम निकाल लो
ठंड है यह ठंड है,
यह बड़ी प्रचंड है
हवा भी चल रही,
धूप को डरा रही
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो!
देश जाए भाड़ में,
आतंक की बाढ़ में ,
चीन से खरीदकर
घर अपना भरते रहो
सेना हमारे देश की,
दुश्मनों सेेे लड़ती रहे
तुम हर विजय का,
प्रूफ मांगते रहो!
वीर तुम अड़े रहो!
रजाई में पड़े रहो!!
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