मंगलवार, 30 मई 2017

ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद

मेरे पिता पंडित तुलसीराम तिवारी ठेठ ग्रामिणि सीमान्त किसान हुआ करते थे। उच्च कुलीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण होंने के वावजूद वे सभी जात और समाजों का बहुत आदर किया करते थे। उनके पास आजीविका के निमित्त कमाने के लिए वैद्द्यगिरी का भरपूर ज्ञान भण्डार था। लेकिन वे बिना फीस लिए मुफ्त दवा देकर गाँवके उन तथाकथित पिछड़ों,दलितों अहीरों,लोधियों और बनियों की आजीवन मुफ्त सेवा करते रहे जो मेरे पिता से अधिक जमीन के मालिक हुआ करते थे। चूँकि हमारे पूर्वज यूपी से सागर जिले के धामोनी स्टेट आ वैसे थे। और जब धामोनी को मुगलों ने आग लगा दी तो जान बचाकर वे पिड़रुवा आ वसे। सहज  ही समझा जा सकता है कि है कि किसी बाहरी व्यक्ति के पास स्थानकों के सापेक्ष जमीन जायदाद कितनी होगी ? पिताजी ने थोड़ी सी जमीन बटाई पर लेकर,  जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचकर और गौ पालन के दमपर अपने परिवार का जैसे तैसे गुजर वसर किया। लम्बी आयु उपरान्त २८ जुलाई  १९८८  को वे इस संसार को अलविदा हो गए । वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार और विरासत में नेकनामी यह कि आसपास के सात गांव के लोग आज भी उनकी समाधि पर मत्था टेकने आते हैं। क्योंकि उन्होंने ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। पूज्य पिताश्री के लिए वे दलित हरिजन आज भी ज्यादा पूज्य मानते हैं जिन्हे शहर के कुछ जातिवादी नेताओं ने, मनुवाद और ब्राह्मणवाद जैसे काल्पनिक शब्दों के जहरीले इंजेक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव में कोई भाईचारा नहीं बचा ! हर जगह अधिकार और नफरत की बबूल उग चुकी है। जिस किसी ने ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद का नामकरण किया है वो भारतीय समाज के नीर क्षीर में नीबू निचोड़ने के लिए जिम्मेदार है।

उनके निधन के बाद जब बटवारा हो गया तब मैंने अपने  हिस्से की जमीन बड़े भाईयों को कमाने के निमित्त दे दी।  जमीन पिताजी के समय जितनी थी वह आज भी उतनी ही है।  गाँव में मेरे दो बड़े भाई जैसे तैसे उससे गुजारा करते हैं। जब तक मैं सर्विस में रहा उनकी कुछ मदद कर दिया करता था ,लेकिन अब चूँकि सेवानिवृत्त हूँ और पति-पत्नी दोनों बीमार रहते हैं ,इसलिए उनकी मदद बहुत कम कर पा रहा हूँ। बड़े भाइयों के बच्चे उचित मार्गदर्शन के अभाव में पर्याप्त तालीम हासिल नहीं कर सके। ५५ साल पहले गरीबी और अभाव में जो संघर्ष का माद्दा गाँव के युवाओं में हुआ करता था वो अब नदारद है। गाँवों में सेलफोन या इंटरनेट तो   केवल मुझमे था उसे  मुझे बचपन की धुंधली सी याद है की थोड़ी सी असिंचित जमीनके अलावा आठ - दस भेंसें,पन्द्रह - बीस गायें ,तीन जोडी बेल और दस पन्द्रह छोटे मोटे बछेरु- पडेरू हुआ करते थे ! बडा भारी सन्युक्त परिवार था!मुझसे बड़े तीनों भाई चुंकी खेती में पिताजी का हाथ बटाया करते थे ,इसलिये मुझे पढाई का सुअवसर मिल गया !लेकिन मुझे यह सदाश्यता इस शर्त पर मिली कि रात का चारा ,रातेबा और सुबह की सानी में हाथ बटाना होगा !इसके अलावा दो अलिखित शर्तें और थीं ,एक तो आधी रात... को भेंसें चराने के लिये जन्गल ले जाना और तीनों बड़े भाइयों में से कोई यदि बीमार पढा या किसी नेवते में गया तो उसका एवजी मुझे आवश्यक रूप से बनना ही होता था,इसके वावजूद मैं प्रथम श्रेणि में ही पास होता था !किंतु मेरे दो मित्र मुझे हमेशा पछाड् दिया करते थे ! जबकी मेरे मित्र खुद मानते थे कि मैं उनसे अधिक मेधावी हूँ !लेकिंन उनमें से एक के पिता जनपद सी ईओ थे और एक की माताजी खुद लेक्चरर हुआ करती थीं ! मेरे पिता एक निर्धन किसान थे ,ऊँहोने कभी स्कूल या पढ़ाई वावद दखल नही दिया अत: मैं भरसक प्रयास के वावझूद हमेशा एक दो नम्बर से तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ता था!पिताजी को मुझपर बडा नाज था और मेरे प्रथम श्रेणी उत्तरींण होने को ही वे प्रथम याने टापर मान बैठते थे

हर साल केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल सहित अन्य वार्षिक परीक्षाओँ के तथाकथित टापर्श की बड़ी पूँछ परख होने लगती है ! टीवी चेनल वाले उनके घर पहुँच जाया करते हैं !औरों से आगे रहना ,प्रसिद्धी पाना और फिर परिवार एवं स्कूल को गौरवान्वित करना वाकई गर्व की बात तो है ! भगवद गीता में योगेश्वर श्रीक्रष्ण ने हर प्रकार के यश की कामना को याने ईशना को भी एक मायिक दूर्गुण माना है !जो आदिवासी और गरीब ग्रामींणों के बच्चे मेहनत मजूरी करके अपनी पढाई पूरी करते हैं, वे यदि सेकिन्ड् या थर्ड डिविजन भी उत्तीर्ण हुये तो मेरी नजर में ज्यादा प्रशंसा के पात्र हैं ! नोयडा दिल्ली बेंगलूरू में आली शान सर्वसुविधा सम्पन एलीट्स क्लास् की औलाद य़दि स्कूल के स्टाफ की मदद से टाप करे तो वह नेकनामि नही !ऐंसे टापर तो बिहार में भी नाम कमा चुके हैं !

बुधवार, 24 मई 2017

बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग !

भारतीय समाजों में जातीयता की गांठें बहुत मजबूत हैं, ये तो सर्वविदित है !किन्तु शोषण के लिए खुद शोषित लोग ही जिम्मेदार हैं यह मुझे अभी यूपी चुनाव में बहिन मायावती की हार के बाद समझ में आया। हालांकि हार का तगड़ा झटका तो सपा और मुलायम परिवार को लगना चाहिए था,किन्तु वे  सबके सब मजे में हैं। शिवपाल यादव पर ,अखिलेश पर ,मुलायम सिंह पर ,उनके घराने पर और यादव घराने की बहु बेटियों पर योगी ठाकुर की महती अनुकम्पा है। पूरा का पूरा समाजवादी कुनवा मय बगुलाभगत आजम खां के सकुशल है। केवल कुछ चंद अवैध बूचड़खाने,कुछ लौंडे -लफंगे और सौ पचास भॄस्ट अधिकारी ही योगी जी के निशाने पर हैं। लेकिन योगी सरकार पर झूंठे आरोप लगाकर बहिन मायावती जी ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यदि वे चाहतीं तो कुछ दिन बाकायदा महारानी एलिजाबेथ की तरह  अपना जातीय कुनबा और आर्थिक साम्राज्य बरकरार रख सकतीं थीं !किन्तु 'भीमसेना' और उसके नेता एक नए नेता चंद्रशेखर की प्रसिद्धि और  बढ़त से चिढ़कर उन्होंने अलीगढ़ ,सहारनपुर सहित पूरे यूपी में  बैमनस्यतापूर्ण  हिंसक तांडव मचाने की जुगत की है! इसमें उनके नव धनाढ्य अरबपति भाई आनंदकुमार कुछ जायदा ही अनुरक्त पाए गए हैं। राजनैतिक पंडित चमत्कृत हैं कि बहिनजी किस वजह से अपने राजनैतिक पराभव का खुद इंतजाम कर रहीं हैं ?सहारनपुर में आनंदकुमार के इशारे  पर एक निर्दोष राजपूत को मार दिया गया। पहले तो लोगों को लगा कि यह नवोदित दलित नेता चंद्रशेखर की 'भीमसेना' के युवा दलित दवंगों की भीड़ का काम है !किन्तु जब बहिनजी ने एक पत्रकार वार्ता में 'भीमसेना' को भाजपा और संघ का ही छाया संघठन बता दिया और चंद्रशेखर को संघ का एजेंट बता दिया तो सब को सब समझ में आ गया कि माजरा क्या है ? याने कि अब खिसयानी  बिल्ली खम्भा नोचे !

चूँकि चंद्रशेखर और उसकी भीमसेना वाले अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते हैं और बहिनजी के नेतृत्व और आर्थिक साम्राज्य को इससे खतरा है !इसलिए अभी-अभी बहिनजी उवाच -भीमसेना तो संघ [rss]]की उपज है। बहिनजी की जय हो ! भाई आनंदकुमार की जय हो ! नोटों की मालाओं पर बलिहारी जाने वाली बहिनजी को शायद अपने कालेधन की चिंता ने ही पगला दिया है। स्वर्गीय काशीराम  देख रहे होंगे - स्वर्ग से या नर्क में जहाँ भी हों - कि कैसी सामाजिक क्रांति हो रही है। उनके सिखाये पढ़ाये लोग कैसी हिंसात्मक क्रांति के लिए लोकतंत्र को तार-तार करने पर आमादा हैं। ब्राह्मणवाद ,मनुवाद तो जुमले हैं असल चीज है जातिगत मक्कारी और व्यक्तिगत मुफ्तखोरी !सहांरनपुर की  हिंसक घटनाओ से बखूबी समझा जा सकता है कि भारत में कोई जातीय परिवर्तन सम्भव नहीं। आर्थिक या राजनैतिक क्रांति भले हो जाए किन्तु सांस्कृतिक सामाजिक क्रांति कभी सफल नहीं होगी ! यूपी की जनता ने बहिनजी और मुलायम परिवार को हराकर अच्छा ही  किया है।  मोदी जी ने भी योगी आदित्यनाथ को  मुख्यमंत्री बनाकर कुछ अनर्थ नहीं किया !

मायावती को काशीराम ने और काशीराम को पता नहीं किसने सपने में आकर कह दिया कि 'दलित शोषित समाज' के सनातन शोषण का कारण ब्राह्मण हैं। खुद नोटों की माला पहनती हैं !आदानी ,अम्बानी और टाटा बाटा से लेकर एससी /एसटी अफसरों से चंदा और चुनाव में उम्मीदवारों से धन वसूलती हैं। उन्होंने इस सिद्धांत को ब्राह्मणवाद या मनुवाद का नाम देकर देश की राजनीती में बरसों तक खूब मजे लिए हैं। बदकिस्मती से या राजनैतिक जनाधार की चिंता में कुछ प्रगतिशील और वामपंथी साथी भी इसी शब्दावली का प्रयोग करते रहते हैं। हालाँकि अंदर ही अंदर वे दिल से चाहते हैं की देश और दुनिया के तमाम गरीब शोषित वर्ग को शोषण से मुक्ति मिले !किन्तु विगत कुछ दिनों से उन्हें भी स्वर्गस्थ दलित नेताओं की सवारी आने लगी है। यूपी चुनाव के पूर्व देश का प्रगतिशील वर्ग कुछ हद तक अखिलेश और सपा के पक्ष में था। किन्तु जब जनता ने या ''श्रीराम लला'' जाने ईवीएम मशीन ने भाजपा को भरपल्ले से जिता दिया ! किन्तु सत्य कभी निरपेक्ष नहीं होता !जब देखा कि संघ परिवार और भाजपा ने योगी ठाकुर को सीएम बनाया है तो लोगों को लगा कि कमसे कम अब गरीब दलित और गरीब ब्राह्मण एक होकर अन्याय के खिलाफ लड़ सकेंगे। चूँकि एक ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया है ,इसलिए अब कोई ब्राह्मणवाद या मनुवाद  का  काल्पनिक खम्भा नहीं नोचेंगा । किन्तु जब विगत दिनों मेरठ ,अलीगढ़ ,सहारनपुर में दलित भीड़ ने एक झटके में पहले पिछड़ों को धोया। फिर  राजपूतों पर हमला किया तो बेचारे घासाहारी ब्राह्मणों का तो अब भगवान् ही मालिक है। दलित गुंडों ने एक निर्दोष राजपूत की जान लेकर योगी ठाकुर को ही चेलेंज कर डाला ,तो निरीह निहथ्ते वामन बनिया किस खेत की मूलीहैं ! अरे भाई जब भीमसेना ने सत्ता धारी दल के कार्यकर्ता को ही पीट दिया तो अब काहे के निर्बल -शोषित ? आपने तो  सावित कर दिया कि आप शोषित अथवा निर्बल नहीं हैं। ऐंसा आभासित हो रहा है कि आप लोगों को अब आइंदा आरक्षण -वारक्षण की नहीं बल्कि मुफ्त भक्षण की आवश्यकता है। अब बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग का क्या होगा ?

भारत के टॉप १०० भूतपूर्व सामंतों -पूंजीपतियों -नेताओं और व्यापारिक घरानों की लिस्ट में एक भी ब्राह्मण नहीं !लेकिन दलित वर्ग के दर्जनों लोग इस लिस्ट में होंगे। करूणानिधि,ऐ राजा ,दयानिधिमारन ,मायावती अजीत जोगी और अन्य अनेक नेता अफसर अरबपति  हैं। पिछड़ों में नवोदित अरबपतियों में स्वामी रामदेव ,सुब्रतो राय सहारा , आंध्र कर्नाटका के रेड्डी बंधू ,यूपी के मुलायमसिंह ,बिहार के लालू यादव,महाराष्ट्र के मुण्डे महाजन तो प्रतीक मात्र हैं!एमपी के सीएम शिवराजसिंहजी और राजस्थान सीएम वसुंधरा राजे की तो कोई चर्चा ही नहीं। खुद पिछड़े वर्ग के ज्योतिरादित्य सिंधिया,होल्कर परिवार और बड़ौदा के गायकवाड़ परिवारों को नहीं मालूम की कितना काला सफ़ेद धन कहाँ पर पड़ा हुआ है?लेकिन भीमसेना और बहिनजी को उससे क्या?उन्हें तो किसी महा गुरु घंटाल ने एक मंत्र रटा दिया कि जो कुछ है सो -ब्राह्मणवाद ही है !इससे आगे कुछ नहीं कहना सुनना !क्योंकि भेड़चाल का फ़क़त इतना ही अफसाना है। यदि उन्हें आर्थिक असमानता की नहीं सामाजिक असमानता की फ़िक्र थी,तो राजा मनु [ठाकुर] से लेकर योगी [ठाकुर]तक की महायात्रा में सिर्फ ब्राह्मणवाद का आविष्कार क्यों किया ? यूपी में बहिनजी को जब सत्ता अकेले दलित वर्ग के दम पर नहीं मिली तो सोशल इंजीनियरिंग के बहाने बेचारे गरीब वामनों को खूब फुसलाया। अपना उल्लू सीधा कर लिया। लेकिन वे उसका जबाब नहीं दे सकीं की तिलक तराजू और तलवार का क्या हुआ ? उन्होंने यूपी में जातीय आधार पर आर्थिक सर्वेक्षण क्यों नहीं करवाया ? इस उन्हें पता चल जाता कि  यूपी के ब्राह्मण हों या दक्षिण के ब्राह्मण हों ,अधिकांस को भगवान और गीता रामायण से ही संतोष है। बेचारे वामनों का वह हक भी योगियों [योगी आदित्यनाथ]र स्वामियों [स्वामी रामदेव]ने छीन लिया है ! ब्राह्मण यदि शोषक हैं ,अमीर हैं तो उनकी सूची जारी की जाये। जैसे अलपसंख्यक वर्ग में अजीम प्रेम जी ,दारुवाला ,घोड़ेवाला ,रेशमवाला,टाटा और नुस्ली वाडिया हैं ऐंसे ही धनिक ब्राह्मणों के नाम हों तो बताएं ! वैसे यदि देखा जाये तो अधिकांस वामपंथी वुद्धिजीवी और साहित्य्कार ब्राह्मण ही मिलेंगे। क्योंकि वे स्वयं शोषक नहीं हैं और  वे सम्पूर्ण मानव समाज को शोषण मुक्त देखना चाहते हैं। बहिनजी और भीमसेना को सोचना चाहिए कि हजारों लाखों ब्राह्मण वामपंथी ही क्यों होते हैं ?लाल झंडा हाथों में लेकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा क्यों लगाते हैं ? और हिंसा पर उतारू दलित वर्ग को पूंजीपतियों की लूट नहीं दिखती ?

यूपी विधानसभा चुनाव में वसपा- सपा की करारी हार के बाद सामाजिक क्रांति की जातीयतावादी नकारात्मक  शक्तियां वेरोजगार हो चुकी हैं ! कुख्यात तथाकथित मुल्ला 'मुलायम परिवार'ने तो पिछले दरवाजे से मोदी -योगी युतिसे गुप्त मैत्री गांठ ली है !लेकिन बहिन् जी के राजनेतिक अरमा आंसुओं में बह गये हैं ! इसीलिये पहले तो उन्होंने चुनाव में हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की कोशिश की ,किन्तु जब  नही फूट् सका तो भीमसेना के कंधे पर चढ़कर वे यूपी में कपालकुण्डला बनकर रक्तपान पर आमादा हैं। बहिनजी और उनके जातीयतावादी संरक्षण में पले बढे 'नव दवंग' तत्व विगत कुछ वर्षों से यूपी में ठाकुरों पर गुर्राने लगे थे ! अब योगी ठाकुर के गद्दीनशीन होते ही ठाकुरों कोअपनी ठकुराई दिखाने का पुनः इंतजाम किया जा रहा है। इसके मूल में बहिन जी और उनके पालित पोषित वे तत्व हैं जो दो-दो हजार के नोटों से बनी करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहनाते रहे हैं !योगी जी यदि बाकई ईमानदार हैं और यदि वे बाकई यूपी को अपराध मुक्त बनाना चाहते हैं तो गाय ,गोबर बूचड़खाने छोडकर ,लोगों को वेरोजगार बनाने के बजाय उन अधिकारियों ,नेताओं और भूतपूर्व मंत्रियों के वित्तीय साम्राज्य का विच्छेदन करें जो यूपी पर ३० साल से राज कर रहे हैं। इसमें कांग्रेस,सपा ,बसपा और भाजपा सभी के अनैतिक आर्थिक स्वार्थों का उच्छेदन किया जाना चाहिए। अकेले हाथी के बुतों को या बहिनजी के आर्थिक साम्राज्य को टारगेट नहीं किया जाना चाहिए !

बहिनजी के वित्तीय उद्गमों उदित राज और रामदास आठवले के अलावा यह सवाल अब तक किसी और दलित नेता या सवर्ण वुद्धिजीवी कभी नहीं उठाया ,क्यों ? सवाल यह भी है कि जो व्यक्ति या समूह  करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहना सकने में सक्षम है,वह यदि सरकारी अधिकारी हो ,नेता हो ,मंत्री हो तो उसके वित्तीय श्रोत की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए ?

!इसलिये उनके हताश अनुयाई अब धर्मांतरण की धमकी से अलीगढ़ ,आगरा,मुजफ़रपुर ,सहारनपुर ,मथुरा में योगिराज को और गुजरात ,महाराष्ट्र ,दिल्ली में मोदीराज को ही सांप्रदायिक च...ुनौती दे रहे हैं ! लेकिंन जो लोग धर्म परिवर्तन के लिये गंभीर हैं ,वे ज़िस किसी भी धर्म में शामिल होने की सोच रहे हैं ,उन समाजों के अन्दर अपनी आगामी पोजीशन का ठीक से पता कर लें ! क्योंकी जातीय असमानता सभी धर्म मजहब और देशों में है !पाकिस्तान में दलित की आवाज ही नही निकलती !देश विभाजन पर भारत के जो शेख सेयद मुगल पठान उधर गये थे , वे मुहाजीर होकर अभी भी मारे मारे फिर रहे हैं !

बुधवार, 17 मई 2017

विपक्ष को यदि जिन्दा रहना है तो ...........!

 यदि कभी यह सवाल उठे कि वर्तमान उद्दाम सरमाएदारी और भूमंडलीकरण के दौर में ,अतीत की पुनर्नवा सभ्यताओं के द्व्न्दात्मक दौर में, संगठित मज़दूर वर्ग के बजाय भारत में स्वतः स्फूर्त किसान आंदोलन ही ज्यादा आक्रामक क्यों हैं ? इस सवाल के जबाब की पड़ताल बहुत लाजमी है। आज जबकि यूरोप, अमेरिका, भारत जैसे देशों का मजदूर वर्ग संघर्षों के बियावान में खामोश है तब दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों में किसान आंदोलन जगने लगे हैं। भारत में किसान संघर्ष की ज्वाला हालाँकि सत्तापक्ष ने ही भड़काई है ,किन्तु किसानों का चरम असंतोष पूर्व से ही अपेक्षित था। यदि आइंदा किसानों का शोषण,दमन,उत्पीड़न [मध्यप्रदेश के मंदसौर ,रतलाम, नीमच की तरह]इसी तरह जारी रहा और विपक्ष पर राजनीति से प्रेरित  सीबीआई ,ईडी और आयकर विभाग के हमले जारी रहे, तो मौजूदा एनडीए सरकारें अच्छे दिन होने के बावजूद, जनता द्वारा सत्ता से बेदखल की जा सकती है !परन्तु इसके लिए एकजुट विपक्ष का मैदान में डटे रहना अनिवार्य है । इसके अलावा गैर भाजपाई विपक्ष की व्यापक एकता और दलीय परिमार्जन भी अनिवार्य है। बहरहाल मोदीजी को कांग्रेस की खामियों का फायदा मिलने से,यूपी उत्तराखंड में प्रचंड बहुमत ,मिलने और गोवा,मणिपुर में अल्पमत भाजपा द्वारा अनैतिक रूप में बहुमत सावित करने की हरकत से विपक्ष पहले ही पस्त हो चुका था। किन्तु अब सीबीआई ,आयकर ,ईडी के छापों से सभी विपक्षी दल हतप्रभ हैं। विपक्ष को यदि जिन्दा रहना है और देशमें लोकतंत्र जिन्दा रखना है तो सम्पूर्ण विपक्ष को अपने पूर्वाग्रह त्यागकर एकजुट होना ही होगा। विपक्ष के जो नेता आज भय या लोभ से दल बदल कर भाजपा में जा रहे हैं, वे आइंदा भले ही जयचंद मीरजाफर की लिस्ट में शुमार हों ,किन्तु अभी तो वे भारतीय राजनीति को और ज्यादा भ्रस्ट किये जा रहे हैं ! मोदी जी भले ही लाख कहें कि 'न खाऊंगा न खाने दूंगा' किन्तु दुनिया जानती है कि गैरभाजपा शासित राज्यों में गठबंधन बनाने और राज्य सभा में बहुमत हासिल करने के लिए उनके आज्ञाकरी अध्यक्ष अमित शाह और उनकी टीम ने हर भ्रस्ट विपक्षी को खरीदने की कोशिश की है ,वशर्ते कोई बिकाऊ हो !क्या यही शुचिता है ?क्या यही 'पार्टी विथ डिफरेंट' है ?क्या यही चाल ,चरित्र और चेहरा है ?वेशक कांग्रेस का शासन भ्रस्ट रहा है ,किन्तु मोदी शासन महाभ्रस्ट सावित हुआ है।

पीएम मोदी परम्परागत खुली पत्रकार वार्ता या टीवी इंटरव्यू से भले ही दूर भागते रहे हों ,किन्तु उनका 'एकालाप' याने भीड़ और मीडिया के समक्ष इकतरफा भाषण, निसंदेह लोकलुभावन हुआ करता है। उनके द्वारा रेडिओ पर संडे को 'मन की बात' निसंदेह हिंदी क्षेत्र में व्यापक करिश्माई असर रखती है। इसी तरह उनके प्रसादपर्यन्त भाजपा अध्यक्ष बने अमित शाह तो माशा अल्लाह इस कदर बोलू हैं कि सवाल करने वाला खुर्राट पत्रकार भी अपना माथा धुनने लगता है। इसी तरह भाजपा के तमाम प्रवक्ता ,मंत्री ,संतरी भी 'बड़े से बड़ा झूंठ' मुस्कारते हुए बोल जाते हैं । जबकि इसके विपरीत कांग्रेस के बड़े नेता अपनी 'सच बात' भी जनता के बीच ठीक से  नहीं रख पा रहे हैं। सोनिया जी ,मनमोहन सिंह जी तो कभी बोलना भी नहीं सीख पाए। राहुल गाँधी न तो विचारक हैं और न अमित शाह जैसे काईंयां ,वे किसी भी विषय पर अधिकार से नहीं बोल पाते। इसी तरह  मल्लिक्कार्जुन खड़गे भी बहुत उबाऊ और अटकेले हैं। कांग्रेस में जिन्हे बोलना आता है ,उनके मुँह सिल  दिए जाते हैं। आनद शर्मा ,गुलाम नबी आज़ाद ,सचिन पायलट ,माकन ,दीक्षित और ज्योतिरादित्य सिंधिया को यदि बोलने की  छूट दी जाए तो जनता को सब समझ आने लगेगा। वर्ना अभी तो सभी कांग्रेसी सोनिया ,राहुल की भृकुटी से आक्रान्त होकर अटक अटक कर बोल रहे हैं।

भारत के अनेक प्रतापी सामाजिक कार्यकर्ता [अण्णा हजारे टाइप ]और स्वामी रामदेवनुमा संत महात्मा वैदिक वाङ्ग्मय प्रणीत धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की बात करते हैं। वे अबोध जनता को एक खास राजनैतिक पार्टी के पक्ष में जुटाने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। उनके समक्ष देश के नंगे भूंखे किसानों पर दनादन गोलियां चलीं , लेकिन वे सभी जुए में हारे हुए पांडवों की तरह,हस्तिनापुर से बचनबध्द पितामह भीष्म की तरह निपट मौन रहे ! स्वयं ५६ इंची सीने के धारक स्वघोषित महाबली भी किसान हत्या पर मौन रहे !उनसे सवाल किया जाए कि गाय यदि पूज्य है ,अबध्य है, तो किसान क्या हलाल किये जाने का ही हिन्श्र पशु है ? निर्ममता और जघन्यता का इससे बड़ा -जीवंत उदाहरण और क्या हो सकता है ? आप बेधड़क आधुनिक कारपोरेट जगत के उदीयमान नक्षत्र बने रहिये। अम्बानी, अडानी, विजय माल्या ,सुब्रतो राय सहारा का 'सहारा' बने रहिये ,आप बेखौप बड़े पूंजीपतियों को अरबों की सब्सिडी और बेलआउट पैकेज दीजिये ,किन्तु अन्नदाता की ऐसी दुर्गति तो न कीजिये ! योगगुरु स्वामी रामदेव,श्री श्री और तमाम साधु संत महात्मा यदि चाहें तो किसानों की मदद कर सकते हैं !क्योंकि उनके समक्ष न केवल आवारा पूँजी [लक्ष्मी],न केवल 'नीम -हकीम खतरेजान' वाले वेरोजगार,न केवल सनातन मिलाबटिये ,न केवल आधुनिक तकनीकी में दक्ष युवा बल्कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी भी नतमस्तक हैं । सिर्फ किसान और मजदूर को ही बेमौत  मरने क्यों छोड़ दिया गया है ?

भारत में वेशक अभी हिंदुत्ववादियों का बहुमत है। हालाँकि भारत में अभी भी धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र की ही व्यवस्था है।लेकिन यदि भारत को हिन्दुत्ववाद के खूंटे से बाँध दिया गया, तो गरीबों पर बड़ी आफत आ जाएगी। क्योंकि हिन्दू धर्म-दर्शन और  विचार के अनुसार गरीबी -अमीरी,सुख- दुःख, शोषण -दमन को मनुष्यमात्र के निजी कर्मफल या 'हरिच्छा' से जोड़ दिया जाएगा ! कहने सुनने को तो हिन्दू और जैन धर्म बहुत बड़े अपरिग्रहवादी हैं। किन्तु उनका पूँजीवाद से बिचित्र नैसर्गिक और अपनत्व का नाता है। जबकि इस्लाम ,ईसाई ,यहूदी और और बुद्ध धर्म-मजहब में अपरिग्रह का नाम भी नहीं है,किन्तु इन मजहबों में मजदूर ,किसान के हितों की खूब परवाह की गई है। ईसाई धर्म में तो अनेक संत हुए जो सुतार -बढ़ई और चरवाहेभी थे। शायद यही वजह है कि इन पाश्चत्य धर्म मजहब में वैज्ञानिक आविष्कारों की गुंजायश बनी रही। जबकि हिन्दू और जैन धर्म में परम्परा से मुनि,ऋषि केवल अपरिग्रह पर बल देते रहे , कुछ तो  राजाओं और चक्रवर्ती सम्राटों के गुरु भी रहे, किन्तु जनता की लूट और शोषण को बंद कराने में कोई दिलचस्पी नहीं रही। कुछ हिन्दू जैन धर्मावलम्बी तो उच्चकोटि के विचारक होते हुए भी अधिसंख्य जनता के दुखों को उनके 'पूरब भव' के कर्म के हवाले करते रहे हैं । यही वजह है कि विदेशी हमलों के वक्त अधिकांस जनता 'अहिंसा परमोधर्म :' या 'प्रभु की इच्छा' 'संघं शरणम गच्छामि 'अथवा 'होहहिं सोइ जो राम रचि राखा' का समवेत गायनकरते हुए सदियों के लिए गुलाम होती चली गयी !मेहनतकशों की एकता ,उनका सही मार्गदर्शन और संघर्ष का माद्दा जिन्दा रहता तो भारत कभी गुलाम नहीं होता !

यह सर्वविदित है कि सिर्फ भारत में ही नहीं, एसिया में ही नहीं, बल्कि सारे संसार में एक चीज बहुत कॉमन है कि राजनैतिक विचरधाराओं के रूप में - लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद का कांसेप्ट उन्होंने यूरोप से ही लिया है । यह दुहराने की भी जरूरत नहीं कि इसकी केंद्रीय जन्मदात्रि ब्रिटिश संसद रही है। उन्होंने ११ वीं सदी के मैग्नाकार्टा से लेकर बीसवीं सदी के दो दो महायुद्धों और उपनिवेशवाद विखंडन तक के दौर से सीखते हुए लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद के विचारों को दुनिया में समृद्ध किया है। भारत ने  ब्रिटिश हुकूमत से वो सब सीखा जो ब्रिटिश ,फ्रेंच, जर्मन ,अमेरिकन और सारे संसार ने उनसे सीखा है। रेल ,बिजली, टेलीफोन,मोटरकार, स्कूटर, सायकिल,घड़ी,अखवार,टीवी, रेडिओ,कम्प्यूटर मोबाइल इत्यादि की तरह भारत के लोगों ने विभिन्न 'राजनैतिक विचारधारायें'  भी विलायत से ही उधार लीं हैं।  फिर भी मैं यही कहूंगा कि मेरा भारत महान ! भले ही मुझे दो रोटी के लिए आठ घंटे मजूरी करनी पडी हो!

वेशक भारत के पास कहने को अपना खुद का बहुतकुछ है। अजंता, एलोरा, एलिफेंटा ,कोणार्क ,नालंदा और महाबलीपुरम जैसे पुरातन खंडहर अवशेष तथा ताजमहल ,हुमायुंका मकबरा -अकबरका मकबरा जैसे ऐतिहासिक दाग भी यहाँ शिद्द्त से मौजूद हैं !हल्दीघाटी ,पानीपत ,कुरक्षेत्र, तराइन,पलाशी के रणक्षेत्र भी भारत की शर्मनाक पराजय के प्रतीक रूप में अजर अमर हैं। इसके अलावा ज्ञान ,ध्यान,कर्मयोग गीता,रामायण,वेद -पुराण,नाट्यशास्त्र,आयुर्वेद ,कामसूत्र तथा बाइबिल,कुरआन जैसी अनेक वेशकीमतीं साहित्यिक कृतियाँ भी यहाँ मौजूद  हैं। नागा साधुऒं की जमात ,धूतों -अवधूतों ,मलंगों-कापालिकों ,सूफियों ,नटों-मदारियों और चारण -भाटों की तो यह भारत भूमि हमेशा से ही उर्वरभूमि रही है ! इसके अलावा यहाँ और भी अनेक अद्भुत चीजें ऐसी हैं जो दुनिया के लिए किसी उजबक अजूबे से कम नहीं हैं । त्रिपुरा से लेकर हिंद्कुश पर्वत तक -हिमालय पर्यन्त और केरल से लेकर कष्मीर तक जो कुछभी भौगोलिक विस्तार है , वो सब भारत का सांस्कृतिक वैभव ही तो है। खजुराहो,कोणार्क, एलोरा, अजंता और दक्षिण भारत के मंदिर उनमें सर्वाधिक महत्व के हैं।     

रविवार, 14 मई 2017

सत्य की खोज का सही रास्ता !

सभ्य संसार में आदिम मानव से लेकर ऋग्वेद काल तक की यात्रा में  जितने भी अनसंधान या अन्वेषण हुए उनमें मनुष्य द्वारा 'ईश्वर की खोज' सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि  है !यदि धर्मान्ध और धर्मभीरु लोगों की बातों को न भी माने तो भी जानकारों ,इतिहासविदों ,पुरारतत्वविदों,वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की आम राय है कि सभ्यताओं के उत्थान -पतन ,भौतिक विकास और 'धर्म' का उदय इत्यादि उपादान ईश्वर अल्लाह की  परिकल्पना से पूर्व के हैं। भारतीय संस्कृत- वैदिक वांग्मय में अष्टाबक्र,जनक ,कपिल ,कणाद और अन्य मन्त्र द्रष्टा ऋषियों  के'तत्वदर्शन' में अद्भुत वैज्ञानिकता का समावेश निहित है।इसी तरह ओल्ड टेस्टामेंट और कुरान शरीफ में भी साइंटिफिक मानवीय जीवन जीने की कला का ही निर्देशन है। लेकिन कालांतर में अरब -मध्य एशियाई सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों ने अपनी युद्धपिपासा और साम्राज्य्वादी लूट की तृष्णा के कारण सारे एशिया और यूरोप को केवल चरागाह मन लिया। जबकि भारतीय उपमहा द्वीप के प्रगत मनुष्य ने आत्मा ,अविद्द्या , माया और इन सबके सर्वेश्रवा ' ईश्वर' को  अपना सर्वश्व अर्पित कर दिया। जब सारे विश्व का एक सृष्टा ,पालनहार और संहारक मान लिया तो फिर कोई पराया भी नहीं रहा। इसीलिये जब शकों,हूणों,कुषाणों ,तुर्को ,खिलजियों सैयदोंमुगलों ,अंग्रेजों ने भारत को चरागाह मानकर यहाँ मुँह मारा तो इन बर्बर कबीलाई समाजों को भारतीय सनातन परम्परा ने 'ईश्वर पुत्र 'मानकर 'बसुधैव कुटुंबकम' धर्म का पालन किया ! मिश्रित जीवन संस्कृति की यात्रा में व्यक्ति ,परिवार ,समाज को संचालित करने के लिए इस भारतीय भूभाग में सभी समाजों ने अपने धर्मग्रंथ ,और अपने अपने रीति रिवाज सहेज लिए। किन्तु आधुनिक पूँजीवाद और लोकतान्त्रिक राजनीती ने पुरातन मूल्यों, धर्म ,श्रद्धा और  पुरातन रीति रिवाजों को अप्रासंगिक बना दिया है। हिन्दुओं में जिस तरह सती प्रथा या बालविवाह अप्रासंगिक हो आगये उसे तरह इस्लामिक जगत में 'तीन तलाक'की अब कोई अर्थवत्ता नहीं रही। वेशक इस पर वोट की राजनीती और मजहबी उन्माद की खेती की जा सकती है !

इस २१वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, न केवल जाहिल बर्बर मजहबी आतंकी  बल्कि सभ्य शिक्षित और वैज्ञानिक समाज भी बुरी तरह गुत्थत्मगुत्थःहो रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर ,इस युग की दुनिया दो हिस्सों में बँटकर ,दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है। हर देश में, हर समाज में,हर मजहब में,हर कबीले में,हर परिवार में , तमाम नर नारी  विपरीत मोर्चों पर आपने सामने खड़े हैं ! हाँलाकिं वैश्विक स्तर पर कार्ल मार्क्स द्व्रारा आविष्कृत 'वर्ग संघर्ष' के सिद्धांत से पूर्व भी दुनिया इस धरती पर 'सभ्यताओं के संघर्ष' या कबीलाई संघर्ष विद्यमान रहे हैं। अशांति, द्व्न्द, विप्लव का सिलसिला  तो उतना ही पुराना है ,जितना पुराना परिवार, समाज और राष्ट्र !सभ्यताओं के संघर्ष का इतिहास भी बहुत पुराना है। लेकिन अतीतमें चूँकि 'शांति की खोज' और 'सत्य की खोज' के संसाधन बहूत सीमित थे ,और थे भी तो केवल धर्म दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित थे।  लेकिन वर्तमान लोकतान्त्रिक दुनिया में और आजाद एवं रोशन ख्याल दुनिया में अशांति क्यों बढ़ती जा रही है ?इसकी पड़ताल बहुत जरुरी है कि 'सभ्य संसार' में अशांति और  विप्लवी कोलाहल क्यों बढ़ रहा है ? 

जिस तरह असफल व्यक्ति ,असफल समाज और असफल राष्ट्र की दुनिया में कोई एक आदर्श स्थति नहीं हो सकती !उसी तरह सफल व्यक्ति ,सफल समाज और सफल राष्ट्र का भी दुनिया में कोई आदर्श मानकीकरण नहीं हो सकता ! जो व्यक्ति ,समाज या राष्ट्र सफल कहे जाते हैं वे देश, काल, परिस्थतियों के अलावा असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल  राष्ट्रों की मूर्खता का बेजा फायदा उठाते हैं। इस संसारमें हमेशा ही कुछ शक्तिशाली और नेकदिल करुणावान लोगों की मौजूदगी बनी रहती है,उनकी सदाशयता का बेजा फायदा उठाकर ही कुछ बदमाश और काइंयां लोग तथाकथित सफलता को प्राप्त होते रहते हैं। लेकिन तमाम असफल लोगो की असफलता के लिए बहुत हद तक वे खुद ही जिम्मेदार होते हैं। यह तथ्य न केवल तार्किक या बौद्धिक आधार पर , बल्कि आध्यात्म दर्शन के कार्य कारण सिद्धान्तानुसार  भी यह स्वयं सिद्ध है कि ''कोई किसी को सुख दुःख दने वाला नहीं हो सकता,सभी अपने अपने कर्म का फल भोगते हैं ''!
असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता याने अपने समय के समांनातर उनके पिछड़ने का खास कारण सिर्फ देश, काल, परिस्थतियाँ नहीं होतीं !और चतुर चालाक लोग भी पूर्णतः जिम्मेदार नहीं होते ! बल्कि असफल लोगों, असफल समाजों और असफल राष्ट्रों में जो संकल्प शक्ति और चेतना का अभाव हुआ करता है वह 'अभाव' ही उनकी तमाम असफलताओं का प्रमुख घटक माना जाना चाहिए। असफल लोगो,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता के लिए- सफल लोग,सफल समाज और सफल राष्ट्र कुछ हद तक कसूरवार अवश्य होते हैं। यह भी सम्भव है कि उनकी असफलता का कारण -देश, काल, परिस्थितियाँ भी हों! लेकिन  जिसके संकल्प में ईमानदारी ,मेहनत ,परिश्रम और सच्चाई न हो उसका रास्ता कभी सही नहीं हो सकता।  जिसका रास्ता सही नहीं हो ,उसका संकल्प भी सही नही होगा ! ऐंसा व्यक्ति,ऐसा समाज और  ऐसा राष्ट्र न तो आरक्षण से, न तर्कसे ,न कुतर्क से और न राज्य सत्ता प्राप्ति से आगे नहीं बढ़ सकता। वह  किसी बेहतर मंजिल पर कभी नहीं पहुँच सकता। मंजिल पर पहुंचने का हकदार वही है, जिसका संकल्प  सही  है !सवाल उठ सकता है कि सही रास्ता कौन सा है ? इसकी पड़ताल के लिए दुनिया का अनुभव मनुष्य के सामने पसरा पड़ा है।

यदि आपको साइंस टेक्नॉलॉजी और धर्म -दर्शन के साथ साथ आध्यत्मिक जगत के अध्यन में रूचि है, तो आपको जिंदगी के हर क्षेत्र में औरों की अपेक्षा अधिक जटिल सवालों से जूझना होगा। यदि आप 'परमानंद' प्राप्ति की ओर अग्रसर हैं ,यदि आप कैवल्यपद ,परमपद,अव्वयपद या मोक्ष की कामना पूर्ण करने में अनुरक्त हैं।  तो भले ही आपने संसार त्याग दिया हो ,सन्यास ले लिया हो, किन्तु आपको मुमुक्षु तभी कहा जा सकता है जब आप जीवित रहकर उसकी साधना कर सके। निसंदेह योगारूढ़ सन्यासी का मुमुक्षु हो जाना अर्थात अवतारी पुरुष जैसा हो जाना जैसा है ! लेकिन उसके लिए यह जरुरी है कि उसकी संकल्प साधना  के लिए वह जिन्दा कैसे रहेगा। ज़िंदा रहने के लिए उसे इस 'चैतन्य आत्मा' को इस नश्वर साधन धाम मानव शरीर में जिन्दा रहना होगा ! साधक को जिन्दा रहने के लिए आग पानी हवा ,रोटी ,फल के अलावा एक शांतिपूर्ण स्थल भी चाहिए । यदि उसके मुल्क में अमन नहीं ,फसलें नहीं और सुरक्षा या शांति नहीं तो देश फिर से गुलाम भी हो सकता है। तब साधक का कैवल्य ज्ञान ,बोधत्व और मोक्ष सब बेकार है।


शनिवार, 13 मई 2017

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का '' पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में दुर्गोत्सव के दौरान इंदौर के जेल रोड पर किसी बड़बोले साम्प्रदायिक कवि मुखारविंद से यह तथाकथित 'देशभक्तिपूर्ण' कविता  सुनी थी ! यह कविता खतरनाक संदेश के  उस अर्थ में अव्यवहारिक है कि पाकिस्तान कोई स्लेट पेन्सिल के द्वारा श्यामपट्ट पर लिखा गया कोरा  शब्द मात्र नहीं है ,कि जब चाहा लिख दिया और जब चाहा मिटा दिया। आज हम जिस धरती को  पाकिस्तान कहते हैं अतीत में वह न केवल सिंधु घाटी सभ्यता अपितु ऋग्वेद सहित अधिकाँस वैदिक वाङग्मय के सृजन की पावन धरा रही है ! आज पाकिस्तान का मूल स्वभाव हिंसा आधारति मजहबी कदाचरण भले हो गया है ,किन्तु अतीत में जब वह कुरु -पांचाल था ,प्रागज्योतिषपुर था और सैंधव सभ्यता का केंद्र था, तब सारी दुनिया इस उर्वर शस्य स्यामला भूमि को ललचाई नजरों से देखती थी। आर्यावर्त-जम्बूद्वीप और भरतखण्ड के क्रमिक विकाशवादी दौर में इस भूमि पर ''वसुधैव कुटुंबकम'' और ''ईश्वर: सर्वभूतानाम....... " का भी उद्घोष बहुत काल तक होता रहा है !अब यदि वहां कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का वर्चस्व है, तो इससे वहाँ की तमाम नदियां,पर्वत और माटी को 'पापी' कैसे माना जा सकता है ?आज के पाकिस्तान में भी कुछ अमनपसंद आवाम और मेहनतकश हैं और सभ्य शहरी लोगों को भारत से कोई दुश्मनी नहीं है। !इसलिए उन मुठ्ठी भर आतंकियों के कारण जो कश्मीर में आग मूत रहे हैं ,पत्थर फनक रहे हैं मारने के लिए यह कहना उचित नहीं कि ''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''!

वेशक पाकिस्तान में छिपे आतंकियों ,पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी सरकार की ओर से भारत के खिलाफ अनेक आपत्तिजनक खुरापातें निरंतर जारी रहती हैं ! लेकिन जब उसका माकूल जबाब हमारी सेनाऐ दे रहीं हैं, तो फिर सो शल मीडिया पर और नेताओं की भाषणबाजी में 'पाकिस्तान को माकूल जबाब देने का विधवा विलाप क्यों ? नेताओं और मंत्रियों को यह कहने की  क्या जरूरत कि 'हमारे शहीद  सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जायगी' ? वेशक शहीदों की कुर्बानी अनमोल है,किन्तु दो के बदले दस मार दने से उनकी भरपाई कैसे होगी ?क्या सारी अच्छाइयां भारत में मौजूद हैं? गांधी हत्या से लेकर निर्भया काण्ड तक की तमाम काली करतूतें क्या पाकिस्तान ने कीं हैं? क्या पाकिस्तान में शिया,सूफी और हिन्दू ईसाई नहीं हैं। भले ही वे बहुत कम बचे हैं ,लेकिन जब तह वे वहां हैं ,तब तक पाकिस्तान की बर्बादी के बारे में सोचना ही मूर्खता है !यदि कश्मीर समस्या को व्यवहारिक तरीके से सुलझाया गया होता ,यदि अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान को अपना पिट्ठू न बनाया होता ,तो पाकिस्तान की मजाल नहीं थी किवह भारत की ओर आँख उठाकर देख सके ! वैसे भी भारतीय सनातन धर्म परम्परा और वैदिक मतानुसार जिस परमात्मा ने भारत [इण्डिया] बनाया है ,उसी ने पाकिस्तान का भी निर्माण किया है ,इसलिए धरती के नक्शे पर से उसका नाम मिटाना मनुष्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं है । मार्क्सवाद ,लेनिनवाद और सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद भी किसी राष्ट्र को नष्ट करने के पक्ष में नहीं है। केवल अंध्रराष्ट्रवाद और मजहबी आतंकवाद से ही समस्त धरती को खतरा है।  श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 11 मई 2017

यदि कोई व्यक्ति चारों वेद-पुराण अष्टदश ,बाइबिल ,जेंदावस्ता और कुरआन का परम ज्ञाता -उदभट विद्वान है ,तो उसको नमन !लेकिन यदि कोई व्यक्ति निपट अंगूठा टेक है ,चरवाहा है , किसान -मजदूर है और वह शोषण -उत्पीड़न ,धर्मान्धता से संघर्ष का माद्दा रखता है तो उसे बारम्बार नमन !