सोमवार, 30 सितंबर 2019

इस्लाम का भारत पर बर्बर हमला- इब्नबतूता

न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 और मुंबई में 26/11 को हुए भयावह आतंकी हमले की तरह अगर ईस्वी सन् 1235 में उज्जैन में आज जैसे जागरूक मीडिया की मौजूदगी होती तो उस समय दुनिया भर की सबसे चर्चित सुर्खियाँ कुछ इस तरह की होतीं-
“उज्जैन के महाकाल मंदिर पर आतंकी हमला हुआ है… मंदिर को पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया गया है… मंदिर के भीतर सदियों से जमा सोने-चांदी की मूर्तियों को लूट लिया गया है… राजा विक्रमादित्य की मूर्ति भी गिरा दी गई है…
हमले की जिम्मेदारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने ली है… उसका कहना है कि दिल्ली पर अब उसका कब्जा है और वही सुलतान है… उसके साथ बड़ी तादाद में आए हमलावरों ने सिर्फ उज्जैन ही नहीं विदिशा के भी बेमिसाल मंदिर मिट्‌टी में मिला दिए हैं… पूरे इलाके में दहशत का आलम है… हर जगह हमलावरों के मुकाबले में आए स्थानीय सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए हैं… इनकी संख्या अभी पता नहीं है।”
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के इस्लामी बहेलियों ने एक दिन विदिशा को बरबाद करने के बाद उज्जैन को घेरा था। यह 1235 की घटना है। वे अपनी तलवारें चमकाते हुए राजा विक्रमादित्य और कालिदास की स्मृतियों से जगमगाते ज्योर्तिलिंग की तरफ दौड़े।
तब गलियों-बाज़ारों में पहली बार वही भयंकर शोर सुना गया था, जो आज के दौर में दुनिया के कोने-कोने में सुनाई देता रहा है-“अल्लाहो-अकबर।“ तब उज्जैन में अपनी अंतिम शक्ति को बटोरकर परमार राजाओं के सैनिक मजहबी जुनून से भरे इन विचित्र वीर तुर्कों से सीधे भिड़े होंगे और अपने सिर कटने तक उन्हें रोका होगा। कई लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए मजहब बदला होगा, जो कि उन दिनों एक ज़रूरी और आम घटना थी।
उज्जैन को तबाह करने का फैसला करते वक्त मुमकिन है इन हमलावर आतंकियों ने विक्रमादित्य का नाम सुना होगा, कालिदास उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर थे, भर्तहरि के बारे में उनके फरिश्तों को भी ज्ञान नहीं होगा, वराहमिहिर से उनका कोई लेना-देना नहीं था। मंदिरों में लदा सोना-चांदी और रत्न-भंडार लूटना उन्हें मजहबी हक से हासिल था। बुतों से इस कदर नफरत जिसने उन्हें सिखाई थी, उसे वे इस्लाम कहते थे।
उस दिन महाकाल मंदिर में ट्विन टॉवर जैसा ही हाहाकार मचा होगा। मध्य भारत में मालवा के इस विध्वंस पर मिनहाज़ सिराज की रिपोर्ट है–
“1234-35 में इस्लामी सेना लेकर उसने मालवा पर चढ़ाई की। भिलसा के किले और शहर पर कब्जा जमा लिया। वहाँ के एक मंदिर को, जो 300 साल में बनकर तैयार हुआ था और जो 105 गज ऊँचा था, मिट्‌टी में मिला दिया।
वहाँ से वह उज्जैन की तरफ बढ़ा और महाकाल देव के मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। उज्जैन के राजा विक्रमाजीत की मूर्ति, जिसके राज्य को आज 1316 साल हो चुके हैं और जिसके राज्य से ही हिंदवी सन् शुरू होता है, तथा पीतल की अन्य मूर्तियों और महाकाल देव की पत्थर की मूर्ति को दिल्ली लेकर आया।”
अब सवाल यह है कि उज्जैन से हाथी-घोड़ों पर ढोकर दिल्ली ले जाई गई इन विशाल मूर्तियों का क्या किया गया?
उज्जैन पर हुए हमले के 77 साल बाद सन् 1312 में मोरक्को का मशहूर यात्री इब्नबतूता दिल्ली पहुंचता है। वह नौ साल दिल्ली में रहा। उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के बाहर इन मूर्तियों को पड़े हुए अपनी आंखों से देखा था। उसने इसे जामा मस्जिद कहा है और इससे सटकर बनी कुतुबमीनार का भी जिक्र किया है। इब्नबतूता कुतुबमीनार के सामने खड़ा होकर बता रहा है-
“मस्जिद के पूर्वी दरवाजे के बाहर तांबे की दो बड़ी-बड़ी मूर्तियां पत्थर में जड़ी हुई जमीन पर पड़ी हैं। मस्जिद में आने-जाने वाले उन पर पैर रखकर आते-जाते हैं। मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर बना हुआ था। दिल्ली पर कब्जे के बाद मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवाई गई। मस्जिद के उत्तरी चौक में एक मीनार खड़ है, जो इस्लामी दुनिया में बेमिसाल है।”
गौर करें, मिनहाज़ सिराज और इब्नबतूता दोनों ही इन हमलों को इस्लामी सेना और इस्लामी दुनिया से जोड़कर स्पष्ट कर रहे हैं कि यह एक राज्य का दूसरे राज्य पर अपने राज्य की सीमाओं के विस्तार की खातिर हुए हमले नहीं, बल्कि यह इस्लाम की फतह के लिए किए गए हैं और इसके लिए किसी कारण की ज़रूरत नहीं है।
ये एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच किसी मसले पर लड़े गए युद्ध या आक्रमण नहीं थे। यह साफ तौर पर आतंकी हमले थे, क्योंकि जिस पर हमला किया जा रहा है, उसे पता ही नहीं है कि उसका कुसूर क्या है? कोई चुनौती नहीं, कोई मुद्दा नहीं। सीधे हमला। लूट और मारकाट।
आप कल्पना कीजिए कि तब विदिशा या उज्जैन के आम निवासियों को क्या पता होगा कि अजीब सी शक्ल-सूरत और अजनबी जबान वाले ये हमलावर हैं कौन, क्यों उन्हें कत्ल कर रहे हैं, क्यों मंदिर को तोड़ रहे हैं, क्यों उनके देवताओंं की मूर्तियों को इस बेरहमी से तोड़ा जा रहा है, बेजान बुतों से क्या खतरा है, हमारी संपत्तियाँ लूटकर क्यों ले जा रहे हैं?


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पाकिस्तान रुपी अंधकूप में भारत विरोध की भाँग घुली है।

भारत की अपनी घरेलू ढेरों ज्वलंत समस्याएं हैं! बेरोजगारी,आर्थिक मंदी,सब्जी-प्याज, डीजल-पैट्रोल की मेंहगाई और सार्वजनिक उपक्रमों पर घाटे का संकट छा रहा है!किंतु भारत सरकार इन कामों को छोड़कर मोदी जी के विश्व विजय-दिग्विजय अभियान के गीत गा रही है! सवाल है कि भारतीय शासकों को यह स्वर्णिम अवसर किसने उपलब्ध कराया?
इसका उत्तर इस तरह दिया जा सकता है कि भारत के प्रति पाकिस्तानी हुक्मरानों का निरंतर शत्रुतापूर्ण व्यवहार और इस्लामिक आतंकियों द्वारा पाकिस्तान एवं कश्मीर में हिंदुओं का कत्लेआम तथा हिंदू लड़कियों का चीरहरण-इत्यादि कारणों से भारत के कट्टरपंथी हिंदुओं का जनाधार निरंतर बढ़ता ही चला गया!वे प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लंबे समय के लिये प्रत्ष्ठित हो चुके हैं! अब भारत में बचे खुचे विपक्ष को और खासतौर से वामपंथ को अपने वैचारिक 'कंसर्न' और 'एरिया ऑफ फोकस' पर पुनर्विचार करना ही होगा! वरना दस साल के लिये फुर्सत!
भारत के प्रति पाकिस्तानी फौज और ISI की दुर्भावना किसी से छिपी नहीं है!दुनिया के तमाम अमनपसन्द लोग पाकिस्तान की इस नापाक नीति नियत से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। लेकिन दुनिया में बहुत कम लोग हैं जो पाकिस्तानी दहशतगर्दी के खिलाफ बोलने और भारतकी न्यायप्रियता के पक्ष में खड़े होनेका माद्दा रखते हैं। मुझे लगता है कि पाकिस्तान रुपी पूरे अंधकूप में ही भारत विरोध की भाँग घुली है।
पाकिस्तान के साहित्यकार,कलाकार और बुद्धिजीवी या तो कायर हैं या सब नकली हैं। यदि वे ज़रा भी रोशनख्याल होते तो अपनी ही 'नापाक' फ़ौज द्वारा बलूच लोगों पर किये जा रहे जुल्म के खिलाफ अवश्य बोलते !
पाकिस्तानी पत्रकार,लेखक,संगीतकार,कवि -कलाकार और गायक सबके सब मुशीका लगाए बैठे हैं। पीओके व गिलगित में हो रहे फौजी अत्याचार के खिलाफ,पाकिस्तान में गिने-चुने शेष बचे हिंदुओं पर हो रहे निक्रष्ट अत्याचार के खिलाफ और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कट्टरपंथी आतंकियों की हिंसा पर पाकिस्तानी आवाम की चुप्पी खतरनाक है।
पाकपरस्त आतंकियों ने भारत को 70 साल से लहूलुहान कर रखा है,क्या पाकिस्तान और भारत के वुद्धिजीवियोँ को नहीँ मालूम कि इसका नतीजा क्या होगा ? इधर भारत का विपक्ष केवल मोदी विरोध में तल्लीन है!उधर पाकिस्तानी विपक्ष इमरान को गाली दे रहा है!जबकि झगड़े की असल जड़ है,इस्लामिक आतंकवाद! उस पर भारत और पाकिस्तान के बुद्धिजीवी मौन हैं!

रविवार, 22 सितंबर 2019

अथ 'श्री मच्छर कथायाम्'.

अथ 'श्री मच्छर कथायाम्'....
जिस किसी पढ़े लिखे व्यक्ति ने संस्कृत नीति कथा 'पुनर्मूषको- भव:' नहीं पढ़ी,उसे मेरी यह नव उत्तर-आधुनिक 'मच्छरकथा' अवश्य रुचिकर लगेगी ! लोक कल्याण के लिए और 'स्वच्छ भारत' एवं स्वश्थ भारत के निर्माण के लिए यह सद्यरचित स्वरचित मेरी मच्छरकथा फेसबुक,ट्विटर,गूगल्र,वॉट्सएप समर्पयामि....
++++ ===++++==अथ मच्छर कथा प्रारम्भ ====+======+===++++
यद्द्पि मैं कोई तीसमारखां नहीं हूँ ! फिर भी एक खास तुच्छ प्राणी को छोड़कर और किसी भी ज्ञात-अज्ञात ताकत से नहीं डरता। यद्द्पि मुझे अपनी इस मानव देह से बड़ा लगाव है,किन्तु फिर भी मैं मृत्यु से किंचित भी नहीं डरता।
मैं कोई आदमखोर जल्लाद ,हिंसक 'मॉब लिंचड़',भेड़िया,बाघ,चीता या शेर नहीं हूँ ! मैं कोई देवीय अवतार,दुर्दांत दैत्य या दानव भी नहीं हूँ। फिर भी मैं यम से भी नहीं डरता। यद्द्पि मैं ज़रा-व्याधि और नितांत मरणधर्मा और मेहनतकश इंसान रहा हूँ। मैं एक महज सीधा-सरल सा मानव मात्र हूँ। फिर भी मैं किसी भी भूत-प्रेत -पिशाच से नहीं डरता। क्योंकि उसके लिए बाजार में चमत्कारीऔर शक्तिशाली 'हनुमान ताबीज'हैं,और 'अल्लाह लाकेट'भी उपलब्ध हैं। उसकेलिए चर्च वालों के पास एक खास किस्म का 'जल' और एक क्रास भी उपलब्ध है।मैं भूकम्प,सूखा ,बाढ़ और सुनामी से नहीं डरता। क्योंकि उससे बचने के लिए मेरे भारत में तैतीस करोड़ देवता ,चार धाम तीर्थ यात्रायें हैं। लाखों - मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे और चर्च हैं!सैकड़ों बाबा,स्वामी,गुरू घंटाल,धर्म-मजहब-पंथ हैं।
मैं गरीबी ,बेरोजगारी और मुफलिसी से नहीं डरता क्योंकि उनसे निजात दिलाने के लिए 'गरीबी हटाओ' के नारे हैं ,'मन की बातें हैं ' मनरेगा है,साइंस हैं ,टेक्नॉलॉजी है ,जन संगठन हैं,हड़तालें हैं,पक्ष-विपक्ष के बेहतरीन नेता हैं। मैं चीन की विशाल सैन्य ताकत से नहीं डरता ,पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद और उसकी परमाणु बम्ब की धमकी से नहीं डरता!क्योकि उसकी काटके लिए हमारे पास अम्बानी,अडानी,टाटा,बिड़ला,बांगर हैं! और इनके अलावा मोदीजीतो हैं ही!मैं किसी आईएसआईएस,अलकायदा, तालीवान,या जमात-उड़-दावा और जेहादियों से नहीं डरता क्योंकि मैं मुसलमान नहीं हूँ। जबकि आतंकी जेहादी-इराक,सीरिया पाकिस्तान, अफगानिस्तान ,यमन और सूडान में चुन चुन कर केवल गैर सुन्नी मुसलमानों को ही मार रहे हैं। भारत -पाकिस्तान सीमा पर और कष्मीर में भी अधिकांस मुसलमान ही मारे जा रहे हैं। यद्द्पि हिन्दुओं को भी वे नहीं छोड़ते,किन्तु यह केवल अपवाद ही है।
मैं दैहिक ,दैविक ,भौतिक तापों से नहीं डरता क्योंकि उसके लिए मेरे पास बाबा हैं साध्वियां हैं ,कांवड़ यात्राएं हैं, दुर्गोत्सव हैं ,गणेशोत्सव हैं , ईदोत्सव हैं ,फागोत्सव हैं ,वसंतोत्सव हैं,होली, दीवाली,दशहरा,और प्रकाशोत्सव हैं। वृत-उपवास, कथा-कीर्तन हैं। मैं सरकारी संरक्षण में पलने वाले घातक भृष्टाचारसेभी नहीं डरता क्योंकि उसके लिए आनन्द मोहन माथुर और आनंद राय जैसे व्हिस्लब्लोबर हैं। मैं ट्रांसफर माफिया से नहीं डरता क्योंकि मैं अब सेवा निवृत हो चुका हूँ। मैं दारू माफिया,बालू रेत खनन माफिया,खाद्यन्न-मिलावट माफिया,ठेका माफिया, जिंस -जमाखोर माफिया, व्यापम माफिया, भू माफिया, बिल्डर माफिया, ड्रग माफिया से भी मैं नहीं डरता ,क्योंकि इन सबसे निपटने के लिए लोकायुक्त हैं ,न्याय पालिका है,एनडीटीवी है,रवीशकुमार हैऔर जनता है ,विपक्ष के नेता हैं,बार-बार होने वाले चुनाव हैं।
और वैसे भी ये डराने वाली काली ताकतें- महापापी अपनी मौत मरते भी तो रहते हैं। इनसे क्या डरना ? इनसे तो वही डरता है जो इनसे चंदा लेकर चुनाव लड़ता है !और नेता, विधायक ,सांसद ,मंत्री बनता है। मेरे जैसे एक आम आदमी को इनसे क्यों डरना चाहिए ?
सफ़दर हाशमी,नरेंद्र दावोल्कर ,गोविन्द पानसरे ,कलीबुरगी और गौरी लंकेश को मारने वाले हिंस्र -अंधविश्वासी हत्यारों से भी मैं नहीं डरता। क्योंकि इनके हाथों मारे गये अमर शहीदों के जैसा महान क्रांतिकारी और समाज सुधारक तो मैं कदापि नहीं हूँ।
मार्क्सवादी-भौतिकवादी दर्शन पर विश्वास रखते हुए मैं भाववादियों के सभी धर्मों की अच्छी बातों और स्थापित मानवीय मूल्यों की कद्र करता हूँ। श्रीकृष्ण के इस सिद्धांत को मानता हूँ की
"नबुद्धिभेदमजनयेदज्ञानाम ,कर्मसङ्गिनाम ,जोषयेत्सर्व कर्माणि विद्वान युक्त समाचरन '' - अर्थात
"विज्ञानवादी -प्रगतिशील भौतिकवादि विद्वानों को चाहिए कि धर्म-मजहब का ज्यादा उपहास न करें ,लोगों को धर्मविरुद्ध ज्यादा ज्ञान न बघारें। उनकी गलत सलत मान्यताओं,कुरीतियों और अंधविश्वाशों पर चोट तो करें किन्तु यह सब करने से पहले खुद को आदर्श रूप में ढालें ,फिर दूसरों का पथ प्रदर्शन करें "
चूँकि मैं सच्चे मन से धर्म -मजहब को फॉलो करने वालों की इज्जत करता हूँऔर साथ ही उनको आगाह भी करताहूँ कि वे 'फतवावाद' संकीर्णतावाद,पाखंडवाद और ढोंगी पाखंडी मठाधीशों से बचकर रहें । इसीलिये कईसच्चे आस्तिक भी मेरे मित्र हैं। मैं अतल -वितल -सुतल -तलातल -तल -पाताल और भूलोक इत्यादि सातों लोकों के थलचर जलचर और नभचर इत्यादि नाना प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भयानक आदमखोर जीव-जंतुओं से नहीं डरता। मैं कोबरा ,करैत या विशालकाय ड्रेगन से नहीं डरता। मैं चील-बाज-गिद्ध या गरुड़ से नहीं डरता। मैं कोकोडायल, ,व्हेल या सार्क से भी मैं नहीं डरता। किन्तु मैं एक अदने से उस जीव से अवश्य डरता हूँ,जो कि दुनिया भर के किसी भी हिंस्र आतंकि से भी नहीं डरता।
जो प्राणी साहित्यकारों -व्याकरणवेत्ताओं के लिए महज एक तुच्छतर 'उपमान' है। उस तुच्छ जीव का काटा हुआ व्यक्ति पानी नहीं मांगता। इस तुच्छ कीट के काटने मात्र से किसी को डेंगू, किसी को मलेरिया किसी को चिकनगुनिया और किसी को परलोक की प्राप्ति भी हुआ करती है। मैं इस अति सूक्ष्म किन्तु भयावह जीव से भलीभांति सताया जा चुका हूँ। इस के दंश को याद कर सिहिर उठता हूँ। अब तो डर के मारे उसका उल्लेख भी नहीं करता।बल्कि सभी सज्जनों से इस कथा को वांचने की याचना करता हूँ।
अथ 'श्री मच्छर कथायाम' समाप्त !
प्रस्तुत कथा को जो नर-नारी नहां -धोकर ,साफ़ सुथरी जगह पर बैठकर नित्य -नियम से सपरिवार पढ़ेंगे ,सुनेंगे और गुनेंगे मच्छरदानी का और ऑल आऊट का प्रयोग करेंगे वे असमय ही 'परमपद' को प्राप्त नहीं होंगे। बल्कि इस धरा पर शतायु होंगे।ओम् शांति: एवमस्तु !
श्रीराम तिवारी

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत


दास स्वामी आर्थिक सामाजिक प्रणाली के पतन और सामंती प्रणाली की स्थापना के बाद सामंती राज्य ने सामंतों और किसानों के बीच आने वाले सभी आर्थिक संबंधों को निश्चित कर दिया।
सामंत सम्पूर्ण जमीन का स्वामी माना गया।किसान,कारीगर को भी जमीन का सीमित स्वामित्व प्राप्त हुआ।साथ ही किसान ,कारीगर पर भी सामंत को सीमित स्वामित्व प्राप्त हुआ।
किसान सामंत के लिए प्रत्यक्ष रूप से बेगार करने के बाद अपने खेतों पर अधिक श्रम करने लगे।
सामंत को लगान देने के बाद जमीन पर अपने स्वामित्व के कारण किसान और कारीगर की अपने खेत ,हल , बैल,चरखे करघे आदि उपकरणों को सुधारने में दिलचस्पी बढ़ी।
फसलों और वस्तुओं के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।इससे सामंतों की आय में भी वृद्धि हुई।
किसानों के जीवन स्तर और सामंतों की समृद्धि में विकास होने के कारण ज्ञान,विज्ञान,साहित्य,कला,संगीत,स्थापत्य,किलों,सिंचाई के साधनों,तालाबों आदि का निर्माण और विकास हुआ।
इसके साथ ही राज्यों के बीच लड़ाइयों और युद्धों की भी वृद्धि हुई।
किन्तु इस समृद्धि और विकास का सारा भार किसान वर्ग को ही वहन करना पड़ता था।
युद्ध कल में किसानों का शोषण और दमन और अधिक बढ़ जाता था।
सामंतों की समृद्धि ने उनको अकर्मण्य ,लुटेरा और लंपट बना डाला।
किसानों और सामंतों के बीच का संबंध शोशी और शोषक का था।किसानों के निवेदन भी सामंती राज्य कि नजर में मालिक के आदेश की अवज्ञा माने जाते थे।
अतः किसानों का असंतोष सामंतों के विरुद्ध संघर्ष के अनेक रूपों में प्रकट हुआ !वर्ग संघर्ष का सिद्धांत 

संघर्षों की सही दिशा है......

माल गपागप खाएं चोट्टे,
कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ,
गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ,
सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगणमन को मूर्ख बनाते,
शासकगण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे,
पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,
मुल्क हुआ हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते मरते,
क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,
होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन खूब लड़ें आपस में,
जाति धर्म की घानी में।
नेता अविरल जुटे हुए हैं,
काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा भूले,
लिखकर भरी जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,
भगतसिंह की वाणी में।।

मोदी है तो मुमकिन है

मोदी है तो मुमकिन है' और निम्नांकित महागाथा के तमाम तथ्य भी मुमकिन हैं!
मोदीजी ने दो बार जन्म लिया - पहला 29 अगस्त 1949 को (उनकी डिग्री पर) और दूसरा 17 सितंबर 1950 को (सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध)।
1950 में पैदा हुए मोदीजी ने 6 साल की उम्र में वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेची थी, लेकिन वडनगर में केवल ट्रैक ही गुजरते थे। वास्तविक रेलवे स्टेशन 1973 में बनाया गया था, जब मोदी 23 साल के थे।
मोदीजी आपातकाल के दौरान भूमिगत थे लेकिन उन्होंने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की!
मोदीजी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक प्रमाणपत्र के बिना ही1983 में गुजरात विश्वविद्यालय से संपूर्ण राजनीति विज्ञान में परास्नातक किया।
मोदी दुनिया के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनके पास संपूर्ण राजनीति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री है। यहां तक ​​कि गुजरात विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को 2014 के बाद इस पाठ्यक्रम का पता चला।
मोदी ने संपूर्ण राजनीति विज्ञान की डिग्री में परास्नातक में प्रवेश लिया, अकेले परीक्षा दी, और अकेले डिग्री ली। अब तक, किसी भी छात्र या प्रोफेसर ने मोदी के साथ अध्ययन करने का दावा नहीं किया है।
भारत में कंप्यूटर की शुरुआत से पहले ही, मोदी की डिग्री एक कंप्यूटर द्वारा मुद्रित की गई थी।
1978 में मोदी की डिग्री से पहले और 10 साल बाद भी, डिग्री विश्वविद्यालय के कर्मचारियों द्वारा लिखी गई थी।
Microsoft द्वारा 1992 में पेटेंट किए गए फ़ॉन्ट का उपयोग 1978 में मोदी की डिग्री को प्रिंट करने के लिए किया गया था।
मोदी की डिग्री रविवार को छपी थी, जब कार्यालय बंद थे।
यदि आप लोग अभी भी विश्वास नहीं करते हैं कि मोदी जी अलौकिक हैं, तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं!

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि


मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देता है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।
आप स्वयं के लिए और अपनी आंतरिक शांति के लिए कार्य करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।।
जीवन मूल्यवान है ,अवांछित घटनाओं को नज़रअंदाज करना भी एक खूबी है!