शनिवार, 30 अप्रैल 2011

क्या ममता को सत्ता में बिठाने के लिए पूर्लिया में हथियार गिरवाए थे?

    किशोरावस्था में ही कहीं किसी से सुना था कि हरएक नवाचार या क्रांति का सूरज पहले पूर्व में यानि कि बंगाल मेंही उदित होता है,बाद में सारा भारत उस नव प्रभात कि रश्मियों से आप्लावित होता जाता है.
जिज्ञासा वश तत्कालीन उपलब्ध साहित्य में सेबंगाल के अधिकांश प्रभृति विभुतिजनों के हिंदी अनुवादों को 
आद्द्योपंत पढने के बाद अपने व्यक्तित्व को अपने समकक्षों और समकालिकों  से बेहतर परिष्कृत और प्रगत पाया. संस्कृत में एक सुप्रसिद्ध सुभाषितानि है:-
        
     शैले शैले न मानिक्यम,मौक्तिकं न गजे-गजे!
    साधवा न लोकेषु ,चन्दनं न वने -वने!!
भारत के हरेक प्रान्त और हर भाषा में शानदार साहित्यिक -सांस्कृतिक सृजन की विरासत विद्द्य्मान है किन्तु 'जेहिं कर मन रम जाहीं सौं ,तेहिं तेहीं सौं काम...'बंगाल के उद्भट विद्द्वानो ने व्यक्तिशः मुझे सर्वाधिक 
प्रभावित किया है अतः इस आलेख की पृष्ठभूमि में यह आत्म स्वीकारोक्ति प्रतिपादित करता हूँ कि काव्यानुभूति में गुरुदेव कवीन्द्र -रवीन्द्र से,धर्म-अध्यात्म  में स्वामी विवेकानंद से और राजनीतिमें कामरेड ज्योति वसू
से जो वर्गीय चेतना प्राप्त की हैउसको भारतीय वांग्मय में ही नहीं बल्कि संसार की सर्वोच्च सूची में भी शीर्ष पर 
अंकित किया जा चूका है.
                                       अभी अप्रैल -२०११ में भारत के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव संपन्न हुए है.इनके परिणाम आगामी १०-१५ दिनों में घोषित किये जायेंगे.तब तक देश और दुनिया के राजनीति विश्लेषक 'बैठा वानिया क्या करे?इधर का बाँट उधर करे!'की तर्ज पर इन राज्योंकेचुनाव परिणामों 
पर अपना अभिमत जाहिर करेंगे.उन्हें केरल और बंगालको छोड़कर बाकि केराज्योंमें कोई खास दिलचस्पी   
नहीं है.इसके कई कारण हैं .मुख्य कारण यही है कि जब सारी दुनिया में ऐंसा संभव नहीं कि किसी देश की
केन्द्रीय सरकार पूंजीवादी या अमेरिका परस्त हो और राज्यों में धुर वामपंथी -कमुनिस्ट सरकार हो तो परिवर्तन की ख़बरों को गढ़ा भी जा सकता है और जन-मानस की खोपड़ी में मढ़ा भी जा सकता है.
           वैसे आम जागरूक भारतीय जन-मानस को भली-भांति ज्ञात है की केरल में तो ६० के दशक में ही आम चुनाव के मार्फ़त साम्यवादियों की सरकार बन चुकी थी.वह पूरे विश्व की पहली निर्वाचित सरकार थी 
जो प्रजातांत्रिक  प्रणाली के तहत सत्ता में आयी थी.उससे  पूर्व दुनिया के किसी भी देश मेंऐंसा नहीं हुआ था. 
 हालाकि रूस चीन ,क्यूबा,वियतनाम,हंगरी,पोलैंड,पूर्वी जर्मनी,युगोस्लाविया,रूमानिया तथा कोरिया इत्यादि में हिंसक तौर तरीकों से कम्युनिस्ट {मजदूरसरकार} स्थापित हो चुकींथी.शीत युद्ध के दरम्यान एक तिहाई  
से ज्यादा दुनिया के देशों में मेहनतकश परस्त सरकारें आ चुकी थीं. जिस ब्रिटेन ने सारी दुनिया को पूंजीवादी प्रजातंत्र का पाठ पढाया,वहां भी लेबर पार्टी की सरकार चुनाव में जीत गई.अमेरिकी सरकार
और पूंजीपतियों ने जन-विद्रोह के भय से 'कल्याणकारी राज्य' का चोला बदला.जनता को भरमाने
 के अनेक धत्मरम अमेरिकी सरमायेदारों ने किये.कभी वियतनाम,कभी भारत बनाम चीन ,कभी भारत बनाम पकिस्तान,कभी ईरान बनाम ईराक ,कभी अर्ब बनाम इजरायल और कभी क्यूबा बनाम अमेरिका का फंडा लेकर सी आई ये ने सारी दुनिया में अपना जाल तो फैलाया और सफलता भी कई जगह मिली किन्तु क्यूबा,वियतनाम और भारत {बंगाल- केरल}में अमेरिका को अब तक सफलता नहीं मिली है.
     अबकी बार अमेरिका ने भारत के मार्क्सवादियों को ठिकाने लगाने का पूरा इंतजाम कर रखा है.
   यह तो जग जाहिर है कि सोवियत संघ में साम्यवाद के पतन से दुनिया अब एक ध्रुवीय हो चुकी
है.भारत में जो भी सरकार १९८५ के बाद बनी {केंद्र में}वह अमेरिकी प्रभुत्व को स्वीकारने में अक्षम
रही.यु पी ये प्रथम के उत्तर काल में जब वन -टू-थ्री  एटमी करार पर साम्यवादी खुलकर अमिरीकी दादगिरी  के खिलाफ हो गए तो अमेरिका कि भोंहें तन गईं और तब ,जबकि भारत में अमेरिका के पिठ्ठू नोटों में बिक रहे थे ,सांसद खरीदे जा रहे थे तब अमेरिका और उसकी सी आई ये इन भारतीय साम्यवादियों के गढ़ ध्वस्त करने का काम जिन्हें सौंप चुकी थी वे देश द्रोही आज-कल भारतीय मीडिया के केंद्र में 'नायक-नायिका'वनकर सत्तासीन होने के करीब है.
      डेनमार्क में बैठे पुरलिया हथियार कांड के मुख्य अभियुक्त किम डेवी और ब्रिटिश नागरिक पीटर ब्लीच ने खुलासा किया है कि बंगाल कि वाम मोर्चा सरकार को अस्थिर करने,वदनाम करने और उखड फेंकने कि साजिस में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी  रा और ब्रिटिश एजेंसी एम् आई शामिल थी.सी बी आई ने तत्काल इस खुलासे का खंडन कैसे कर दिया जबकि यही सी बी आई विगत दो बरस में एक बच्ची -आयुषी तलवार के हत्यारों को चिन्हित कर पाने में विफल रही है.हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों को अरवो रूपये खर्च करने उपरान्त भी पता नहीं चल पता कि मुंबई में पाकिस्तानी आतंकवादी कब कहर बरपाने वाले हैं!ऐंसी महान एजेंसियों को मिनिटों में मालूम हो गया कि पुरलिया हथियार काण्ड में किसका हाथ नहीं है?अरे भाई इतने सजग हो तो ये तो बताओ कि उनका नहीं तो किनका हाथ था?
       १८ दिसंबर १९९५ को पश्चिम बंगाल के पुरलिया जिले में विदेशी विमान से बड़ी संख्या में विदेशी आधुनिक हथ्यार गिराए गए थे,हथियार गिराने वाले क्रिश्चियन नील्सन उर्फ़ किम डेवी ने  विगत २८ अप्रैल को खुलासा किया है किपश्चिम  बंगाल कि विश्व भर में प्रसिद्ध ज्योति वसूके नेत्रत्व में 
चल रही मार्क्सवादी सरकार को गिराने कि बृहद योजना के तहत भारत स्थित विदेशी एजेंटों ने सप्लाई किये थे.सवाल उठता है कि इस गंभीर मसले पर तथाकथित राष्ट्रवादी अब मौन क्यों हैं?
    किम डेवी ने टाइम्स नोंव नामक चेनल के समक्ष  यह दावा भी किया कि पकडे जाने के बाद तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्रालय ने उसे नेपाल के रास्ते बाहर भागने में मदद भी कि थी.
       हथियार गिराने में संलग्न एक अन्य अपराधी ब्रिटिश नागरिक पीटर ब्लीच ने भी स्वीकार किया कि वह तो हथियारों का लाईसेंस शुदा व्यापारी है ,ब्रिटिस ख़ुफ़िया एजेंसी ने जिसको जितने हथियारों का आदर दिया वो मेने पूरा किया.मुझे नाहक ही भारत में सजा कटनी पडी.
      यह एकमात्र वाकया नहीं है.सब जानते हैं कि केरल में चर्च कि ताकत किसके इशारों पर एल दी ऍफ़ को हराने में जुटी है.बंगाल में ममता के पास अचानक अरबो रूपये कहाँ से आ रहे हैं?माओवादी ,त्रुन्मूली और अमेरिकी आका यदि सब मिलकर बंगाल कि जनता को भ्रमित कर सकें और ३५ साल से चल रही लोकप्रिय सरकार कि जगह अमेरिकी और माओवाद परस्त सरकार  स्थापित करने में कामयाब हो भी जाएँ तो भी बंगाल कि 'जागृत'जनता उस सरकार को शीघ्र ही उखड फेंकेगी और वाम पंथ को इस दौरान अपने आपको आत्मचिंतन -आत्म विश्लेषण का भरपूर अवसर  मिलेगा ताकि पुनः न केवल केरल,बंगाल,या त्रिपुरा में अपितु केंद्र में भी सत्ता सँभालने कि हैसियत प्राप्त कर सके..
            श्रीराम तिवारी



     

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

एक-मई अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस अमर रहे...दुनिया के मेहनतकशो-एक हो!एक-हो!!..

    सभ्य समाज में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  दो ही  प्रकार के दिवस मनाये या याद किये जाते हैं.एक-वे जिनमें किसी खास मजहब - धर्म का महापुरुष अवतरित हुआ हो या उसकी नीव रखी हो! दूसरे-वे जिनमें उन तथाकथित अवतारी महापुरषों ने या तो आत्म बलिदान किया हो या अपनी बारी आने पर लोकिक शरीर त्याग किया हो! इन दोनों ही सूरतों में सम्पूर्ण मानवता का  हित संवर्धन और विश्व कल्याण की कामना के हेतु एक अलोकिक दिव्य शक्ति -इश्वर ,अल्लाह  या गोंड की परिकल्पना और उसमें मानवेतर मूल्यों की स्थापना में आश्था-विश्वाश -श्रद्धा का होना नितांत जरुरी है.मानव ने जब वैज्ञानिक द्वंदात्मक दर्शन के आधिभौतिक रूप में इस पृथ्वी और सम्पूर्ण ज्ञात ब्रह्माण्ड को परिभाषित करने की योग्यता हासिल की तब उसे यह स्वीकारने में कतई हिचक नहीं हुई कि चेतना के स्तर पर मानव के सांसारिक  सुख -दुःख में किसी अलौकिक  ईश्वरीय शक्ति का कोई हाथ नहीं है.इस पृथ्वी पर उपलब्ध तमाम संसाधन -जीवन के उपादान-प्राकृतिक नेमतें -पानी -हवा -धरती और प्राकृतिक समस्त नैसर्गिक संसाधनों पर न केवल बुद्धिबल सज्जित मानव का -अपितु चर -अचर समस्त जीवधारियों का 'सबका सब पर सामूहिक स्वामित्व है' इस दर्शन ने ही सबसे पहले दुनिया के तमाम मानवता वादियों को ये य्ह्साश कराया था की दुनिया में दो वर्ग हैं.एक वर्ग वह जो अपने श्रम श्वेद से इस धरती को सुन्दर और रहने योग्य बनाता है ,दूसरा वर्ग वह है जो अपनी बौद्धिक चालाकी से इस वसुंधरा का भोग करता है.सामंतवाद के पराभव और पूंजीवाद के उद्भव ने यह फर्क और स्पष्ट कर दिया तथा परिणाम स्वरूप द्वंदात्मक संघर्ष ने सारे विश्व सर्वहारा के बंधन मुक्त होने का -एक मई १८८६ को सूत्रपात कर 'क्रांति'शब्द को ईजाद किया था.
           दरसल मई दिवस वह दिन है ,जिस दिन दुनिया  का सचेतन मजदूर एक वर्ग के रूप में ,एक विश्वव्यापी अजेय शक्ति के रूप में अपने समकालिक संघर्षों और उपलब्धियों का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए,अतीत के अपने शानदार संघर्षों और उलब्धियों की विरासत को न केवल अक्षुण रखने बल्कि उसे अपनी मंजिल तक ले जाने का संकल्प दुहराता है.मई दिवस वह दिन है जिस दिन सम्पूर्ण  भू मंडल का श्रमशील मानव अपने हालत का विहंगावलोकन और शोषक वर्ग का सिंहावलोकन करता है.
                         आम तौर पर हर-रोज और खास तौर से एक-मई को विश्व का जागृत मजदूर-किसान-कर्मचारी-कारीगर और विवेकशील चेतन्य मानव अपने संघर्षों की धार पैनी करता है.शोषक वर्ग के साथ आये दिन की झडपों और अपने जख्मों का जायजा लेना,आगामी सत्र में किये जाने वाली जद्दोज़हद का शंखनाद करना तथा तमाम जनता को अपने साथ जोड़कर शाशक वर्ग की  प्रतिगामी -जनविरोधी नीतियों -राष्ट्रघाती ,मानव हन्ता कार्यक्रमों को बलात रोकने की   कोशिश करना
 भी मजदूर वर्ग अपना कर्तव्य घोषित करता है
       बर्बाद अतीत की भजन मंडलियों के खिलाफ बेहतर भविष्य की  उत्क्रष्ट अभिलाषा में अंतर-राष्ट्रीय मजदूर विरादरी -सर्वहारा की विराट जन-मेदिनी रण-हुंकार करती हुई नारा लगाती है-
       दुनिया के मेहनतकशों --एक हो-एक हो...!!.
     
       हर उद्द्योग-धंधे के मजूरो -एक हो ...एक हो ...!!

        आएगा भई -आएगा..नया जमाना -आएगा...!
     
         कमानेवाला खायेगा..लूटने वाला जायेगा...!
   
        क्या मांगे मजदूर किसान? रोटी -कपडा-!और मकान....!

       लाल -लाल लहराएगा...नया ज़माना  आएगा...1

जब तक  नंगा -भूंखा इंसान रहेगा...धरती पर तूफ़ान रहेगा....!

     मुनाफाखोरों  को फाँसी दो ....फाँसी दो....!

      वेरोजगारों  को काम दो.काम के पूरे दाम दो...!

      गोदामों में भरा अनाज... जनता क्यों भून्खों मरती आज....!

       बंद कारखाने चालू करो....देश को बेचना बंद करो...!

      श्रम की लूट बंद करो...काम के घंटे कम करो....!

       अमेरिका के आगे घुटने टेकना बंद करो!

     देश की रक्षा कौन करेगा? हम करेंगे!हम करेंगे!!

     शोषण-उत्पीडन से कौन लडेगा?हम लड़ेंगे!हम लड़ेंगे!!

     एक-मई  अंतर्राष्ट्रीय मजदूर  दिवस -जिन्दावाद !

शिकागो  के अमर शहीदों को- लाल सलाम!

         वास्तव में ये नारे आज भी उतने ही मौजु हैं जितने कि एक-मई १८८६ के दिन  थे.शिकागो के हे ! मार्केट स्कोयर पर १-मई से ४ मई -१८८६ के चार दिनों में घटे घटनाक्रम में इन नारों की  उत्पत्ति हुई थी.फर्क इतना भर है कि तब ये नारे सिर्फ शिकागो के हे! मार्केट चौराहे तक सीमित थे ,आज सारे संसार के मजदूर अपनी-अपनी भाषा में उन्ही नारों को केन्द्रित करते हुए अपने हकों की  हिफाजत और बेहतर इंसानी जिन्दगी का आह्वान कर रहे हैं.
       यह संसार प्रसिद्द है कि एक -मई १८८६ को अमेरिका  के शिकागो शहर के मजदूर -आठ घंटे काम-आठ घंटे आराम और आठ घंटे पारिवारिक जिमेदारियों या मनोरंजन के लिए  मांग रहे थे,मजदूरों की शांतिपूर्ण सभाएं रोज-रोज लगातार जारी थीं,ऐंसी ही  एक सभा हे!मार्केट स्क्वायर पर चल रही थी,३ मई को मालिकों और शाशकों की शह पर पुलिस ने निहत्थे -अहिंसक मजदूरों पर अंधाधुन्द गोलियां चला दीं.६ मजदूरों ने वहीं सभा स्थल पर दम  तोड़ दी,इस जघन्य हिसा के विरोध में शहर के हजारों मजदूर दूसरे दिन-४,मई को फिर उसी जगह एकजुट होकर नारे लगा रहे थे कि पूंजीपतियों ने अपने एजेंटों कि मार्फ़त उस शांतिपूर्ण-अहिंसक जन समूह पर बम फिकवा दिए.जिसमें सेकड़ों घायल हुए अनेक अपंगता को प्राप्त हुए .चार ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. एक सार्जेंट  भी मारा गया. वहां लाशों विछी हुई थी और तभी एक बालिका रोती हुई अपने दिवंगत मजदूर पिता के शव से लहू -लुहान कमीज खींचती है, लड़की ने रक्त -रंजित शर्ट को जब हवा में लहराया तो रोते -चीखते हजारों अन्य घायल मजदूरों ने पुरजोर ताकत से मुठ्ठी बाँध हवा में हाथ ऊँचा किया और नारा लगाया -रेड फ्लेग -रेड सेलूट ....रिवोल्युसन  लांग लीव ...वोर्केर्स  आफ आल लैंड वी यूनीट. दुनिया में लाल झंडे  के जन्म की यहीं गाथा है.         उक्त घटना में मारे गए मजदूरों के  हमदर्द सहयोगियों पर झूंठे मुकद्दमें लाद दिये गए.हालाँकि इन मजदूरों पर कोई जुर्म सावित नहीं हुआ किन्तु मालिकों के दवाव और लोभ -लालच में जजों ने ४  जुझारू  मजदूर नेताओं -अल्वर्ट पार्संस , आगस्त स्पाईस ,एडोल्फ फिशर और जार्ज एंगेल को  ११ नवम्बर-१८८७ को फांसी कि सजा सुनाई थी.इसके आलावा अनेकों को कारागार में ठूंस दिया था.
           हालाँकि मई दिवस एक ऐंसा दिन है जो पूंजीवादी शासक   वर्गों  द्वारा मेहनतकश वर्ग कि नृशंस हत्याओं का गवाह है किन्तु यह पहला और अंतिम दिवस नहीं है.आज देश और दुनिया में सर्वत्र कोहराम मचा हुआ है ये जन-आकांक्षाओं बनाम सरमायेदारी के द्वन्द का अविराम सिलसिला है.भारत में भी वर्तमान निष्ठुर पूंजीवादी प्रभुत्व संपन्न वर्ग ने राज्य-व्यवस्था और राष्ट्र सम्पदा दोनों पर ही कब्ज़ा कर रखा है.आम-जनता  को उसके अंतहीन कष्टों -अभावों के लिए पूर्व-जन्म के कर्मों का फल बताकर पाखंडी बाबाओं की  भभूत से संतुष्ट होने का सरंजाम किया जा रहा है.भृष्टाचार से जनता का ध्यान बटाने के लिए चोरों के बगलगीर 'चोर-चोर चिल्ला रहे हैं' जंतर-मंतर पर भृष्टाचार का विरोध करने वाले तो राजनीतिज्ञों से भी ज्यादा भृष्ट बताये जा रहे हैं.मीडिया भी विना आगा -पीछा देखे घटनाओं को बाजारू उत्पाद के रूप में देखने का आदी हो चुका है यह अस्त्याचरण की इन्तहा है.जो प्रशांति निलियम में हो रहा वो दिखाना उतना जरुरी नहीं जितना की ये बताना कि देश में सड़ रहे अनाज को सुरक्षित किये जाने और भूंख से मर रहे गरीवों को दिए जाने  की किस व्यवस्था को किस भांति अमली जमा पहनाया जाये.जो अखवार या चेनेल्स ऐंसा  नहीं कर रहे उनकी ही टी आर पी क्यों बढ़ती रहती है और जो ईमानदार हिस्सा {मीडिया का}इन जन-सरोकारों को देखना -दिखाना चाहता है उसकी टी आर पी अक्सर ढलान पर क्यों होती है?क्या आम जनता और कामगारों को इस दिशा में विचार नहीं करना चाहिए?मई दिवस तो इन तमाम चूकों,भूलों,और विसंगतियों से सीखने का निरंतर १२५ साल से आह्वान करता चला आ रहा है.
    आज देश में हजारों  -लाखों कल-कारखाने बंद पड़े हैं..जो आधे अधूरे उद्द्योग चल  रहे हैं उनमें भयावह शोषण जारी है.अधिकांश गैर-सरकारी या निजी क्षेत्र में उच्च शिक्षित युवाओं को विना किसी भविष्यगत गारंटी -पेंशन,ग्रेचुटीअर्जित- अवकाश,मात्रत्व अवकाश,के १२ से १४ घंटे कोल्हू के बैल की भांति जोता जा रहा है.असंगठित क्षेत्र में जब अच्छे -खासे शिक्षित युवाओं की ये हालत है तो अर्ध शिक्षित और सम्पूर्ण निरक्षर करोड़ों वेरोजगार युवाओं की उस मजबूरी को सहज ही समझा जा सकता है;जिसके तहत ये "मुल्क के असली मालिक" बंधुआ मजदूर  की तरह आर्थिक-मानसिक-सामाजिक -गुलामी में छटपटा रहे हैं.वर्तमान दौर के आर्थिक उदारीकरण का  प्रशश्ति गान करने वाले मीडिया को, कलयुगी भगवानो के विराट आर्थिक साम्राज्य के बरक्स देखना -दिखाना चाहिए,मुख्य  धारा के मीडिया से तो उम्मीद की ही जा सकती है कि देश कि युवा पीढी  के सरोकारों कोभीअपनेकवरेजमेंथोड़ीसीजगहदेआर्थिक उदारीकरण प्रगट ओद्द्योगिकीकरण ने चंद नए मुठ्ठी भर  शिक्षित  वर्ग को भारीपैकेजपरहायरकरके  अधिकांस अर्ध शिक्षितऔर अशिक्षित नौजवानों को ठेकेदारों की रक्त पिपासा का साध बना डाला है.  
   भारत में खाद्यान्न उत्पादन में तो उल्लेखनीय वृद्धि निरंतर जारी है फिर भी कुछ गरीब और कर्ज से लादे किसानो को आत्म हत्या करनी पड़े तो जिम्मेदारी किसकी है ? यु पी ये प्रथम के दौरान वाम पंथ के समर्थन से गाँव के गरीबों को मनरेगा के तहत १०० दिन काम मिलना तै हुआ था ,बीच में भ्रुष्टचारियों ने भांजी मार दी .मजदूरों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी [कलेक्टर रेट} मिलना तो दूर पहले का परम्परागत काम भी हाथ से गया और प्रस्तावित सरकारी योजनाओं में भी स्थाई किस्म के -काम पाने के लिए रिश्वत ली जा रही है.देश  और दुनिया  भर   के   मजदुर- किसान -विश्व सर्वहारा एक-मई अंतर-रास्ट्रीय मजदूर दिवस को सवा सौ साल से  मनाते चले आ रहे हैं , इतने बरसों बाद भी उसका सर्वजनहिताय-सन्देश कि "जीवन यापन केलिए कामका अवसर प्राप्त करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है." स्तर  तक नहीं पहुँच पाया है.आज के पढ़े लिखे नौ-जवानो में से अधिकांस को नहीं मालूम की काम के घंटों को सीमिति करने -आठ घंटे श्रम करने,आठ घंटे पारिवारिक और सामाजिक सरोकार के लिए और आठ घंटे स्वयम के आराम के  लिए क्यों मिलना चाहिए? यही वजह है की वे अनावश्यक अनुत्पादक बाजारीकरण  में अपने सामाजिक सरोकारों से दूर होकरयह मेहनत कश वर्ग  अपने हिस्से का  सुख भले ही न पा  सकें किन्तु लूटने वाले पूंजीपति वर्ग के हिस्से का बोझ अपने कन्धों पर उठाते -उठाते असमय ही काल -कवलित जरुर होता रहता  है.चालक पूंजीपति-सामंत वर्ग और ताकत वर शासकों को इस दौर में दुनिया भर में चुनौती मिलने लगी है .इस मई दिवस पर भारत कि महनत कश जनता का उद्घोष होगा कि 'हम मेहनतकश जग वालों से अब अपना हिस्सा मांगेंगे...एक खेत नहीं ...एक देश नहीं ...हम सारी दुनिया मांगेंगे'       एक-मई मजदूर दिवस पर सभी साथियों का  -क्रांतिकारी अभिवादन ....हर जोर  जुल्म से लड़ने को वक्त मांगता कुर्वानी ....बोलो तैयार हो...
       दुनिया के  मजदूरों   एक हो -एक हो...!!

   इन्कलाब जिंदाबाद.....!

         
        श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

पश्चिम बंगाल के आम चुनावों में अमेरिकी दखलंदाजी पर भारतीय मीडिया चुप क्यों?

     विकिलीक्स के जरिये 'द हिन्दू ' को हासिल हुए,अमेरिकी दूतावास से भेजे गए गोपनीय 'केवल्स' अब सिर्फ चिंतनीय मात्र नहीं रह गए.गोपनीय कूटनीतिक तार संदेशों के छप कर सार्वजनिक हो जाने का देश और दुनिया पर दूरगामी  असर अवश्य होगा.इन संदेशों ने एक ही झटके में यह उजागर कर दिया  की यूपीए सरकार के सम्पूर्ण कार्यकाल और एनडीए के कार्यकाल में भी अमेरिका और भारत के बीच जो उत्तर आधुनिक रिश्ता कायम हुआ उसकी परिणिति और प्रकृति क्या है?
       बहरहाल विकिलीक्स के खुलासों का विश्लेषण अभी किसी ठोस मुकाम तक भले ही न पहुंचा हो किन्तु यह सुनिश्चित है कि अब तक जो भी सन्देश ओपन हुए हैं उनमें भारत को चिंतनीय दुरावस्था कि स्थिति में खड़ा कर दिया है.चाहे वो अटॉमिक रिएक्टरों कि खरीद -फरोख्त हो , -१-२-३-एटमी करार हो, कार्पोरेट लाबी के मार्फ़त अमेरिकी आर्थिक मंदी के संकट का भार भारतीय आम-जनता के कन्धों पर लादने का सवाल हो,या आर्थिक सुधारों के नाम पर वैश्वीकरण कि नकारात्मक उपलब्धियों का सार हो-विकेलीक्स के खुलासों से यह साफ़ जाहिर होता जा रहा है कि भारत के प्रतेक क्षेत्र में आज अमरीका की सीधी पहुँच हो चुकी है.न केवल आर्थिक मामले बल्कि नीतिगत-रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों में 'अमेरिका की भूमिका' भयावह हो चुकी है.एक ताज़ा खुलासा विकीलीक्स ने जो किया है उस पर देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टियों ने मौन क्यों साध रखा है? अमेरिका ने पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा  सरकार को उखाड़ फेंकने  केलिए जुलाई  2008 में जो जो योजना बनाई थी  उस  सम्बन्ध  में भारत स्थित तत्कालीन  अमेरिकी दूतावास से श्वेत भवन और सेक्रेटरी आफ स्टेट को भेजे गए केवल्स में स्पष्ट सन्देश है कि- ममता बनर्जी  को पूरा सहयोग और समर्थन जुटाने के लिए भारत के वुद्ध्जीवियों और एन जी ओ   को काम पर लगाओ"   वैसे तो   भारतीय  राजनीत   का  पूंजीवादी  खेमा  आजादी के  बाद से ही अमेरिकन  साम्राज्यवाद  के प्रभाव  में आ गया था ,किन्तु सोवियत पराभव को अंतिम सत्य मानने की एतिहासिक  विडंबना  से जो  कल्याणकारी राज्य कि अवधारणा थी  वह  90 के दशक  में वैश्विक पूंजीवादी आंधी में धराशायी  हो गई थी. दुनिया में मुसलमानों के लिए जो स्थान मक्का -मदीना का है,ईसाइयों के लिए वेटिकन का है,सिखों के लिए स्वर्ण मंदिर का है और हिन्दुओं के लिए संगम{प्रयाग}का है,वही स्थान - अहिंसा के रास्ते -लोकतान्त्रिक -संसदीय प्रजातंत्र के रास्ते देश और दुनिया में समाजवाद स्थापित करने के लिए बचन बद्ध-प्रतिबद्द वामपंथियों का -केरल-बंगाल और त्रिपुरा का है.यह सच है की ३५ साल तक सत्ता में रहने से एक पूरी पीढी ही एंटी इनकम्बेंसी फेक्टर से ग्रस्त हो चुकी है.उसकी नजर में वामपंथ के बलिदान का कोई महत्व नहीं.उसकी समझ में धर्मनिरपेक्षता का कोई महत्व नहीं ,क्योंकि इन वाम शाशित तीनो राज्यों में विगत ३० साल में शायद ही कोई गोधरा जैसा या गुजरात - मुंबई पर हुए आतंकी हमलों जैसा कोई बाकया हुआ हो! खुशहाल इसान की भी  फितरत होती है कि सब कुछ ठीक है तो क्या हुआ ?कुछ नया आजमाने में क्या हर्ज है? किन्तु वामपंथ को अपने केड्रों कि प्रतिबद्दता और अतीत कि नेकी के अलावा अपनी शानदार वैज्ञानिक -एतिहासिक -द्वंदात्मक-सर्वहारा परस्त विचारधारा पर इस घोर पूंजीवादी दौर में भी पूरा विश्वाश है कि इस बार भी  जनादेश उन्हें ही मिलेगा!
       बंगाल के विधान सभा चुनावों  में वहाँ की सत्ता  के सञ्चालन हेतु अमेरिका को ममता  की फ़िक्र क्यों है? मओवादिओं और आतंकवादिओं  के गठजोड़ से    माननीय प्रधानमंत्री और कांग्रेस ने कोनसा भरोसा पाल रखा है वे ही जाने! अमेरिका की कोशिश है कि  विकिलीक्स के रहस्य-उद्घाटनों को हवा में उड़ा दिया दिया जाये .विकिलीक्सद्वारा उजागर किये गए सन्देश नितान्त  भारत विरोधी और राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला हैं. इस सन्दर्भ में  देश के स्वयम्भू राष्ट्रवादी,अध्यात्मवादी,बाबा ,गांधीवादी औरलोकतंत्र  का चौथा खम्बा कहे जाने वाला दृश्य-श्रव्य-छप्य मीडिया  मौनक्यों  है?
       जो व्यक्ति और संगठन लगातार वाम मोर्चे पर जहर उगल  रहे हैं,जो अखवार या चेनल्स वाम मोर्चा सरकार कि ३५ साल कि शानदार उपलब्धियों पर गुड गोबर कर रहे हैं,जो सूचना एवं संचार माध्यम किसी एक ऐयाश बाबा या क्रिकेट खिलाडी के नकली आंसुओं पर आठों पहर निगरानी रखता हो,विजन के रूप में घोर मिथ्या उत्पाद  बेचने कि बाजारू बीमारी से ग्रस्त हो ,यदि वो बंगाल में एक बेहतर -ईमानदार और सर्वहारा परस्त सरकार को अपदस्थ करवाने में अमेरिकी  हस्तक्षेप को नजर-अंदाज़ करे तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए!
       श्रीराम तिवारी  

रविवार, 24 अप्रैल 2011

विनायक सेन देशद्रोही नहीं -वे सच्चे राष्ट्रवादी हैं.

   विनायकसेन को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है, इस सूचना से न केवल देश और दुनिया के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का मनोवल बढेगा अपितु भारत की न्याय व्यवस्था में आदर्शोन्मुख  आस्था में इजाफा भी होगा.
विनायक से न को देशद्रोह की सजा  देने दिलवाने वालों को भारी निराशा हाथ लगी है. उन्हें इस दिशा में छत्तीसगढ़ के  अंदरूनी आदिवासी  इलाकों में जाकर इस तथ्य का पता 
करना होगा  की आजादी के बाद हम तथाकथित सभी सभ्रांत, भद्र लोगों ने राष्ट्रद्रोह- देशद्रोह -राजद्रोह के ब्रिटिशकालीन उन कानूनों को जो की 'तिलक'' भगतसिंह'सुभाष जैसे स्वाधीनता सेनानियों को कुचलने के लिए 
आयद किये थे. वे आज़ादी के ६५ साल बाद भारत के देशी प्रभुत्व-वर्ग  के हित-साधन का घातक औजार  बने हुए हैं .माननीय उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से निसंदेह न केवल लोकतंत्र मजबूत हुआहै बल्कि अभिव्यक्ति की मर्यादित स्वतंत्रता में निखार आया है की "यदि किसी व्यक्ति के पास गांधीजी का साहित्य है तो यह जरुरी नहीं की वो गांधीवादी हो गया, इसी तरह माओवादी साहित्य रखने का तात्पर्य यह नहीं की वो नक्सलवादी है'
       सत्ता के मद में  चूर होकर जिन लोगों ने भृष्ट अधिकारीयों की शह पर मानव अधिकारों के तरफदार विनायक सेनको घेरघार कर जेल भिजवायाथा  उन्हें तो इस 'राजद्रोह' कानून की पुंगी वनाकर अपने अंग विशेष  में घुसेड लेना चाहिए! जिस आदमी ने अपनी सारी जिन्दगी देशप्रेम और सर्वहारा उत्थान के लिए समर्पित कर दी,उसे पुरस्कृत करने के बजाय सम्पूर्ण राज्य सत्ता ने निरंतर अपमानित ही किया है.दवे-कुचले, बीमार , शोषित आदिवासियों का मुफ्त में इलाज करना, उन्हें अपने हितों के प्रति सचेत करना निसंदेह शोषक शासक वर्ग की ऐयाशी के लिया खतरा तो है;निरक्षर आदिवासियों में स्वाभिमान पैदा करना,अपनी वास्तविक आज़ादी के लिए संगठित संघर्ष हेतु प्रेरणा देना,निर्दोषों पर पुलसिया जुल्म रोकना उस सरकार को कैसे पसंद  आता जो कार्पोरेट लाबी के हाथों सौ-सौ बार बिक चुकी है.
         देश के अनगिनत निर्धन,  सर्वहारा की संगठित शक्ति का परिणाम है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने न केवल विनायक सेन को जमानत दे दी बल्कि कुछ वेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी कीं हैं. दरसल विनायक सेन को नक्सलवादी होने कि कोई अभिलाषा कभी नहीं रही.यदि वे हो भी जाते तो भी उन पर ये जुर्म आयद नहीं हो सकता. भारत में नक्सलवाद के प्रणेता चारू मजूमदार जेल कि यातनाएं सहते हुए जब शहीद हुए थे तो तत्कालीन संसद में श्रीमान अटलबिहारी वाजपई,वी वी गिरी,हीरेन मुखर्जी तथा सम्पूर्ण संसद ने उन्हें शोक संवेदना व्यक्त कि थी.उनके क्रन्तिकारी विचारों में हिंसा के समावेश से असहमति व्यक्त करते हुए उनके दर्शन की  सराहना कि थी. क्या चारू मजूमदार देशद्रोही थे? यदि थे तो देश के करोड़ों लोग उनकी गद्दार विचारधारा के साथ क्यों होते गए?और विनायक सेन तो चारू मजूमदार नहीं हैं,सेन का मात्र इतना ही था कि उन्होंने नक्सलवाद और आतंकवाद का अंतर समझने कि कोशिश कि थी. आतंक क्यों पनपता है? देश का मेहनतकश  मजदूर भूंखा -नंगा क्यों है?सभी समाज कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से देश का बहुल-अंश  अलग-थलग क्यों है?
           दलितों -पिछड़ों के गीत गाने वाली रमण सरकार एक सीधे साधे मानव -अधिकार -कार्यकर्त्ता को जेल भिजवाने या सूली  पर चढ़वाने को इतनी आतुर क्यों है?क्या साधनहीन  गरीवों का इलाज करना ,उनके भाई बंधुओं पर हो रहे व्यवस्था-जन्य कुकृत्यों का पर्दाफाश करना क्या  देश द्रोह में आता है? क्या किसी भटके हुए आदिवासी नौजवान के असहाय माता-पिता कि खैर-खबर उस दिग्भ्रमित बेटे तक पहुँचाना वास्तव में 'राष्ट्रद्रोह' हो सकता है? क्या अपने झोले में किसी कि दी हुई कोई ऐसीं किताब जो श्रमिकों-किसानो और वनवासियों के सरोकारों को उद्घाटित करती हो -रखना, क्या संविधान के खिलाफ है? यदि विनायक सेन देशद्रोही हैं- किसी कि नज़र में तो उसे चाहिए कि अपना गिरेवान गौर से निहारे, यदि उसकी आत्मा जिदा है उसमें सच का एक कतरा भी बाकी है तो उसे या तो इस हिमालयी भूल पर प्रायश्चित करना होगा या पूरे देश को कारागार बना देना होगा.
      श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

भारतीय मीडिया के जन-सरोकार हासिए पर क्यों हैं?

     सूचना प्रौद्दोगिकी और संचार क्रांति का जितना फायदा कार्पोरेट सेक्टर और उसके आनुषांगिक बड़े मीडिया घरानों ने उठाया उसका १०० वां भाग भी देश की आम  जनता के हिस्से नहीं आ पाया है. भारत के बुर्जुआ मीडिया को सिर्फ तब राष्ट्रीय हित याद आते हैं जब क्रिकेट मैच चल रहा हो ,वो भी भारत -पाकिस्तान के बीच..वर्ना तो भूतों, प्रेतों, उबाऊ-चलताऊ सीरियलों ,वासी -तिवासी रक्तरंजित विजुगुप्सा पूर्ण ख़बरों में और नितांत स्तरहीन विज्ञापनों में टी आर पी की खातिर वह साम्राज्यवादियों के चरणों में भी साष्टांग दंडवत हेतु प्रस्तुत हुआ करता है.कौन फ़िल्मी हीरो किस खिलाडी बाला के साथ रंगरेलियां मना रहा है या कौन क्रिकेट खिलाडी किस "वैशाली की नगर वधु"के यहाँ दारू पीकर पड़ा मिला -इस सबके लिए इस खुद ग़र्ज मीडिया के पास स्पेस है.किन्तु रोज कितने वेरोजगार नौजवान बेमौत मर रहे हैं,कितने दवाफरोश नकली दवाई अस्पतालों-बाज़ारों में खपा रहे हैं,राष्ट्र-निर्माण के लिए कौन प्रतिवद्धता से अपना खून पसीना कर रहा है,भारत को सारी दुनिया में इस वर्ष गेहूं उत्पादन में अव्वल स्थान प्राप्त होने में जिन किसानो ने पसीना बहाया उनके लिए इस दिग्भ्रमित या स्वार्थ्गामी मीडिया के पास एक भी शब्द नहीं है.उसके पास यह पता करने की फुर्सत नहीं है कि देश कि नदियों को जोड़ने की "माला नाहर योजना "का क्या हुआ? खैर ये तो बहुउद्देशीय और वृहद राष्ट्रीय सरोकार हैं इनके बारे में जब सुधिजनों को ही कुछ नहीं सूझ पड़ता तो अर्ध शिक्षित ,अपरिपक्व ,लाभ-शुभ्गामी, स्वार्थान्ध मीडिया और साम्राज्यवादियों की कृपा पर पलने वाले एन जी ओ क्योंकर इस वाबत अपने निहित स्वार्थों को नजर-अंदाज करेंगे?
         वे लोग जो अतीत के स्वर्णिम भारत पर मुग्ध हैं,वे लोग जो वैश्वीकरण -उदारीकरण और भूमंडलीकरण के अलाम्वारदार हैं और वे लोग जो आदर्शवाद  और बाबावाद के घोड़े दौड़ा  रहे हैं,उन सभी को यह दुखद समाचार है की जिस पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को हराकर आप विगत एक महीने से गदगदायमान हो रहे हो उसी पाकिस्तान ने प्रतिव्यक्ति आय में भारत से बजी मार ली है;आपको यह जानकार शर्म भले न आय किन्तु अन्नाजी ,रामदेवजी, शान्तिभूषन जी या किसी दीयमान अवतार से एक अदद अनशन इस बाबत भी तो करवा डालना चाहिए की नहीं?
             वाशिंगटन पोस्ट की खबर है कि भारत में सिर्फ 17% लोग ही खुशहाल हैं.124 देशों की सूची में भारत इस मामले में 71 वें स्थान  पर है. कोई  गेलाप  नामक  स्वतंत्र  एजेंसी  के हवाले  से यह निष्कर्ष  जग  जाहिर  किया  गया  है. मज़ेदार  बात  ये है कि पाकिस्तान 40 वां सबसे  खुशहाल  देश है. अर्थात  पाकिस्तान  में 32% आवडी  खुशहाल  है. हालाँकि  भारत से भी ज्यादा  भुखमरे  देश हैं-बांगला  देश ,चाद ,सूडान  और भूटान  किन्तु हमारे  दो  खास  दोस्त {?} चीन  और पाकिस्तान अमीर  हैं .यह इस देश के मीडिया और महान गांधीवादियों  ,एकात्म -मानवतावादियों  के विवेक  पर छोड़ता  हूँ  कि वे पता लगायें  कि जब भारत ने सारी दुनिया से ज्यादा  गेहूं और चावल  उत्पादन कर लिया  है ,जब भारत अटॉमिक  क्लब  का सदस्य  बन  चूका  है,जब भारत अन्तरिक्ष  में तेजी  से उभर  रहा है ,जब भारत में दुनिया का सबसे  बड़ा  और महान  लोकतंत्र  है तो देश कि सबसे  बड़ी  अदालत  को आये  दिन  क्यों  कहना  पड़ता है कि गरीवों  को भूँखा  मत  मरो  ,जो अन्न  गोदामों  में सड़ रहा है तो कम  से कम  उसी  में से गरीवों को कुछ बाँट  दो ?देश में सिर्फ 17% लोग सुखी  हैं और ह्म्बकी  के 83%लोग जो कि वास्तव  में सच्चे  भारतीय  हैं वे शोषण  के खिलाफ  लड़ने  के बजाय  आपस  में लड़  रहे हैं.जिसके  पास इसका  इलाज  है                                      -श्रीराम तिवारी
   
   

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

ज़न -लोकपाल मसविदा समिति सलामत रहे ...ओम शांति भूषण...ओम...

        भारत में इस समय 'जन-लोकपाल बिल' की ड्राफ्टिंग कमिटी सुर्ख़ियों में है. इसके करताधर्ताओं में से एक श्री शांतिभूषण जी तथाकथित -सी डी काण्ड वनाम कदाचार वनाम भृष्टाचार रुपी दावाग्नि की चपेट में आ चुके है.उन पर और उनके पुत्र -जयंत भूषण पर इलाहबाद तथा नॉएडा इत्यादि में विभिन्न अचल संपत्तियों को गैरवाजिब तरीकों से हासिल किये जाने के आरोप हैं.उनकी सकल संपदा सेकड़ों करोड़ रूपये बताई जा रही है.इन खुलासों से 'अन्नाजी'बेहद दुखी हैं,उनके लिए एक और अवसादपूर्ण सूचना है कि इलाहबाद उच्च न्यायलय कि लखनऊ बेंच ने केंद्र सरकार द्वारा लोकपाल बिल का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए बनाई गई कमिटी को लेकर भारत के अटर्नी जनरल को नोटिस जारी किया है.
         प्रसिद्द वकील श्री शांतिभूषण जी देश के नामी सामाजिक हस्ती हैं.उन्होंने १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री बनाम राजनारायण प्रकरण में सफलतम पैरवी करते हुए भारतीय लोकतंत्र की बड़ी सेवा की थी,उनकी निरंतर अलख जगाऊ शैली और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रशांत भूषण की लगातार भृष्टाचार पर आक्रामकता ने नागरिक मंच की और से ड्राफ्ट कमिटी में पिता-पुत्र दोनों को ही नामित करना ठीक समझा.अब उस कमिटी के एक अन्य प्रभावशाली सदस्य और भूतपूर्व न्यायधीश श्रीमान संतोष हेगड़े जी का कहना है कि अन्नाजी को यदि मालूम होता कि शांति भूषण जी पर आरोप हैं तो वे उन्हें ड्राफ्ट कमिटी में लेते ही नहीं.उधर एक अन्य हस्ती श्री अरविन्द केजरीवाल जी इस सम्पूर्ण स्खलन को ढकने का प्रयास करते हुए न केवल भूषण परिवार अपितु इस अभियान में शामिल हर शख्स को ईमानदारी और राष्ट्रनिष्ठां का प्रमाण पत्र रहे हैं.
         अन्नाजी और उनके समर्थकों को लगता है कि भृष्टाचार कि इस लड़ाई में नापाक ताकतों ने अन्ना और नागरिक मंच के कर्ता-धर्ताओं को जान बूझकर घेरना शुरू किया है.उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र भी लिख माराऔर सवाल पूंछा  कि बताओ इस सब में तुम्हारा भी हाथ है या नहीं?
 जैसा कि सबको मालूम था किन्तु अन्ना एंड कम्पनी को नहीं मालूम कि दिग्विजय सिंह ने आर एस एस को नहीं बख्सा तो ये दो चार दस वकील और एक दर्जन एन जी ओ वालों कि 'पवित्र टीम'
कि क्या विसात?आर एस एस के वरिष्ठों ने भी विगत दिनों सोनिया जी से गुहार कि थी कि हे !देवी शुभ्र्वश्त्र धारिणी रक्षा करो! सोनिया जी ने दिग्विजयसिंह के प्राणघातक सच्चे वयानो से रक्षा करें!
      दरसल राजा दिग्विजय सिंह यही चाहते हैं की उनका आतंक न केवल कांग्रेस के दुश्मनों पर बल्कि कांग्रेस के अन्दर एंटी दिग्गी नौसीखियों को यह एहसास हो जाये की यु पी ऐ द्वतीय के वर्तमान संकट मोच्कों में वे सर्वश्रेष्ठ हैं.उन्हें अब किसी पद कि भूंख नहीं.वे उन-उन लोगों से जिन-जिन ने उन्हें अतीत में रुसवा किया है,गिन-गिन कर बदले लेने की ओर अग्रसर लग रहे हैं.उन्हें अमरसिंह जैसे दोस्तों से  हासिल समर्थन और सहयोग ने , अपने साझा राजनैतिक शत्रुओं पर हमले करने की सुविधाजनक स्थिति में और मज़बूत कर दिया हैअपने चेले .कांतिलाल भूरिया को एम् पी का कांग्रेस अद्ध्यक्ष बनवाकर श्री दिग्विजयसिंह इस दौर के सर्वाधिक सफल राजनीतिग्यतो  बन गए  हैं.किन्तु वे भूल रहे हैं की यह सब नकारात्मक राजनीती है याने दूसरों की रेखा मिटाकर अपनी रेखा बढ़ाना.भृष्टाचार के खिलाफ न केवल अन्ना बल्कि देश के करोड़ों लोग चिंतित हैं ,वे इससे नजात पाने के लिए छटपटा रहे हैं.यदि अन्ना या नागरिक समूह का प्रयास लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है तो फैसला अदालत पर छोड़ा जाये किन्तु उस पवित्र उद्देश्य के लिए प्रयास रत लोगों पर व्यक्तिगत आरोप लगाकर जनता के बीच उन्हें भी भृष्ट सावित करना [भले ही वो भृष्ट ही क्यों न हों}देश हित में उचित नहीं.
        जिस दिन जंतर-मंतर पर अन्नाजी का अनशन शुरू हुआ था मेने अपने ब्लॉग पर तत्काल एक आर्टिकल लिखा था जो कि वेव मीडिया के अन्य साइट्स पर अब भी उपलब्ध है.उसमें जो-जो अनुमान लगाए गए थे वे सभी वीभत्स सच के रूप में सामने आते जा रहे हैं.सामाजिक राजनैतिक रूप से अपरिपक्व व्यक्तियों द्वारा भावावेश में खोखले आदर्शों कि स्थापना के लिए कभी गांधीवाद ,कभी नक्सलवाद और कभी एकात्म-मानवतावाद का शंखनाद किया जाता है और फिर चार -दिन कि चांदनी i फिर अँधेरी रात घिर आती है.अनशन तोड़ते वक्त अन्नाजी ने जब  भृष्टाचार के खिलाफ अपने एकाधिकारवादी  नजरिये का ऐलान किया था ,समझदार लोगों ने तभी मान लिया था कि इनका भी वही हश्र होगा जो अतीत में हजारों साल से इस बावत बलिदान देते चले आये महा मानवों का होता चला आया है,
         इसका ऐ तात्पर्य कतई नहीं कि बुराइयों से लड़ा ही न जाये, .दरसल यह महा संग्राम तो सत्य और असत्य  के बीच,सबल और निर्बल के बीच,तामस और उजास के बीच सनातन से जारी है. बीच इमं कभी-कभी सत्य परेशान होता नजर आता है किन्तु अन्ततोगत्वा जीत सत्य की ही हुआ करती है.वशर्ते यह संघर्ष वर्गीय चेतना से लेस हो और इस संघर्ष में जुटे लोगों का आचरण शुद्ध हो, संघर्ष रत व्यक्तियों और समूहों में निष्काम भाव होतो ही सत्य की विजय होती है.यदि धर्म-अर्थ -काम-मोक्ष की या इनमें से किसी एक की भी लालसा किसी में होगी तो उसे इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जायेगा. जब कोई गर्वोन्मत्त व्यक्ति ,समूह ,राष्ट्र या विचारधारा यह घोषित करे कि धरती पर हमसे पहले जो भी  आये वे सभी असफल और नाकारा थे ,तो उसे यह स्मरण रखना चाहिए कि उसके यथेष्ट कि प्राप्ति उससे कोसों दूर जा बैठी है . पवित्र और विरत उद्देश्यों के लिए ह्रदय कि विशालता और मानसिक विराटत:नितांत जरुरी है.              श्रीराम तिवारी
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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

जातिवादी चेतना का विस्तार सर्वहारा वर्ग की एकता का संहारक बन चुका है.

   विगत वीसवीं शताब्दी में चूँकि दुनिया भर में मजदूर आंदोलनों  की एतिहासिक विजयों व् उपलब्धियों ने सारे संसार के मेहनतकशों तक ये पैगाम पहुँचाया था कि "इस जद्दोजहद में हार जाने पर  सर्वहारा के पास खोने को कुछ भी नहीं,है ;किन्तु यदि जीत गए तो सारा जहां हमारा है"दरसल मजदूर वर्ग को उस दौर में जो लगातार सफलताएँ मिल रहीं थी ,उनसे घबराकर दुनिया भर के धन -लालचियों,सत्ता लोलुपों ने सर्वहारा वर्ग की व्यापक एकता को खंडित करने के लिए
धर्म,जाति ,नस्ल , भाषा,क्षेत्र और अतीत के भग्नावशेषों,के छद्म रूपकों को समाज विखंडन का माध्यम बना डाला.
                                   सोवियत संघ व् पूर्वी यूरोप के तत्कालीन समाजवादी  देशों में क्रमशः विकसित समाजवादी क्रांतियों और उर्धगामी घटना क्रम ने मानव समाज  विरोधी ताकतों को अपनी प्रभुता समेटने को बाध्य कर दिया था,किन्तु भारतीय समाज व्यवस्था पर प्रतिगामी वर्चस्व तब भी बना रहा;ऐंसा क्यों हुआ?प्राचीन दास प्रथा और अर्वाचीन सामंतशाही ने अपने निहित स्वार्थों के लिए वंशानुगत कार्य विभाजन जनित जातीय व्यवस्था को न केवल अक्षुण रखा बल्कि उसे पल्लवित-पोषितभी  किया.सामंतवाद  के प्रारंभिक दौर में मानव समाज को हासिल वैज्ञानिक तकनीकी व सांस्कृतिक प्रगति, जो देशज परम्परा में हासिल हुई थी वो विदेशी आक्रमण कारियों के झंझावातों में सिमट कर दफन हो गई.चूँकि श्रम विभाजन में चमत्कारी बदलाव तो आया किन्तु वंशानुगत असमानता की केंचुल समाज को अलगाव में दवोचे रही अतएव विरासत में सिर्फ जातीय चेतना का खतरनाक और घृणित स्मृतिकोष ही शेष बचा रहा.
     अंग्रेजों ने पूरे भारतीय समाज को एक बाज़ार बनाने,सस्ता श्रम खरीदने और समस्त भारतीय जनता -सभी जातियों को पूंजीवाद का चाकर बनाने के लिए जातीयवादी रूढ़ियों को तोड़ने का सिर्फ  भ्रम पैदा किया था.१८५७ की प्रथम जन-क्रांति और उसके वाद भारतीय जन-मानस की प्रतेक राष्ट्रीय चेतना के उभार को  दवाने के लिए उन्होंनेनिरंतर  जातीय उन्माद की  पुरजोर परवरिश की.हालाँकि मुगलों की तरह अंग्रेजों ने भी हिस्र प्रुवृति के समुदायों को अलग -अलग रेजीमेंटों में बांटकर जाटों के खिलाफ मराठों को,सिखों के खिलाफ गोरखों को,मराठों के खिलाफ राजपूतों को और राजपूतों के खिलाफ पहाड़ियों को लड़ाकर-भारत के मार्शल समुदाय को बुरी तरह विभाजित कर रखा था किन्तु अधिकांस दलित,शोषित अछूत जातियों को उच्च सवर्ण जातियों के द्वारा उत्पीडन को समाप्त करने की दिशा में उनकी कोई रूचि नहीं थी.धार्मिक कूपमंडूकता,व वर्ण व्यवस्था की अमानवीयता को जान -बूझकर ये विदेशी शाशक तथस्थ भाव से निहारते रहे.
     राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम केअधिकांस  पुरोधाओं की अपनी निजी वैचारिक सीमायें थीं.जातीय उच्छेदन के प्रश्न पर सिर्फ वामपंथ {तत्कालीन बोल्शेविक -शहीद भगत सिंह और उनके ह्म्सोच साथी} का सिद्धांत या बाबा साहिब का रुख ही प्रगतिशील था,बाकी के अधिकांस महानुभाव 'इस या उस'कारन से इस प्रश्न पर ओपचारिकता का निर्वहन करते रहे.गांधीजी,से लेकर तिलक व अन्य सभी लोकतंत्रवादी -सामंतवादी नेताओं का अभिमत इस प्राचीन जातिप्रथा को बनाये रखने के पक्ष में था.
  इसीलिये     आज़ादी के दौरान हिंदी भाषी क्षेत्रों में दुहरी गुलामी की पीड़ा भोग रही और अपनी दुर्दशा से मुक्त होने की अभिलाषा में इन शोषित -दमित समुदायों ने विदेशी साम्राज्वाद का प्रतिकार करने के संघर्षों से अपने आपको अलग रखा.प्रकारांतर से इन्हें एकजुट करने वालों ने सामंतों और पूंजीपतियों को भी अपनी दुरावस्था का कारण नहीं मानकर उनके खिलाफ कोई संगठित संघर्ष नहीं किया .इस परम्परा का आज भी निर्वाह हो रहा है.
    जातिवादी चेतना पिछले कई दशकों में भारतीय समाज के अन्दर  और ज्यादा मजबूती से घर कर चुकी है.विशेतः मेहनतकश जनता की एकता पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाले कारकों में से यह एक प्रमुख राष्ट्रघाती चिंतनधारा वन गई है.सभी वर्ग और जातियों के मजदूर-कर्मचारी-अधिकारी चाहे वे सरकारी या सार्वजनिक उपक्रम के कर्मी हों या असंगठित क्षेत्र के मजदूर-कर्मचारी हों,ट्रेड-यूनियन  जैसे वर्गीय संगठनो के स्थान पर अक्सर उसके मुकाबले जातीय  आधारित संगठन बनाने की स्थितियां भी सामने हाजिर हैं.शाशक वर्ग ने भी फिर चाहे वे अंग्रेज हों,मुग़ल हों,तुर्क हों,आर्य हों या सामंत हों सभी ने अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर रुढीवादी-जातिवादी प्रवृत्ति का पक्षपोषण ही किया है.वस्तुतः जाति एक ऐंसा  सनातन भ्रम है जो सत्य प्रतीत होता है.यह सामाजिक दंभ की अभिव्यक्ति है.यह मानव समाज की पतित मानसिकता दासता का उपमान है.यह एक मिथकीय उपमेय है.यह एक लज्जास्पद रूढ़ी है.
        अतः मात्र आर्थिक आरक्षण ही काफी नहीं बल्कि सदियों के दासत्व बोध को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए जातिवादी चेतना के मूल तत्वों पर कुठाराघात जरुरी है.वैश्वीकरण के दौर में यदि इस सामाजिक विभीषिका रुपी विसंगति को जिन्दा रखने के लिए   शाशक वर्गों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है तो दूसरी ओर इस दमनात्मक चेतना को पछाड़ने की प्रक्रिया भी क्या तेज नहीं होनी चाहेये?    श्रीराम तिवारी

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

जब तक निजी संपत्ति ओर कारोबारी लाभ का सीमांकन नहीं होता तब तक भृष्टाचार अक्षुण रहेगा.

अतीत के सामंती जुल्मों
 सितम से वर्तमान लोकतान्त्रिक पूंजीवादी शासन तंत्र बेहतर है.किन्तु वैयक्तिक संपत्ति और मुनाफाखोरी इसका सबसे बड़ा आकर्षण है.जिसकी बदौलत एक तरफ समृद्धि के पहाड़ ऊँचे होते चले जाते हैं और दूसरी ओर विपन्नता की अमानवीय खाइयों का निर्माण जारी रहता है,इन बर्बर बुराइयों के परिणाम स्वरूप भृष्टाचार रुपी दुर्दमनीय शैतान का साम्राज्य स्थापित हो जाता है. विगत दो शताब्दियों में विश्व के महानतम वैज्ञानिकों
 भौतिकवादी अर्थशास्त्रियों और दार्शनिकों ने अपनी तार्किक स्थापनाओं में ये सिद्धांत पेश किया था कि पूंजीवाद भी वर्गों कि 
द्वंदात्मकता का अखाडा मात्र है,इसीकी कोख से  एक नितांत नई -वर्गविहीन ,जातिविहीन ,शोषण विहीन ,समतामूलक और भृष्टाचार विहीन व्यवस्था का जन्म होगा. जब तक असमानता और ये मलिनताएँ मौजूद हैं विपरीत वर्गों का द्वन्द टल नहीं सकता.
          जब तक शोषण आधारित मुनाफाखोर व्यवस्था समाप्त नहीं हो जाती भृष्टाचार रुपी अँधेरा कायम रहेगा.शीलवानआदर्शवादी और वैयक्तिक क्रांतिकारी सुधीजन  मानवीय मूल्यों को स्थापित किये जाने की वकालत करने वाले भी आपस में बटे होने से इस व्यवस्था पर कोई कारगर चोट करने  में तब तक असफल होते रहेंगे जब तक वे इस व्यवस्था का मूल्छेदन नहीं करते
       चूँकि भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के नव्य उदारवादी मुखोटे ने पूंजीवाद को बेलगाम बना दिया है अतेव यह बहुत जरुरी और प्राथमिकता का प्रश्न है की इस परजीवी अमर्वेलि को अमूल-चूल नष्ट किया जाये? या इधर -उधर हाथ -पैर मारकर -कोई कानूनी प्रक्रिया जन्य संवैधानिक संसोधन के लिए जद्दोज़हद की जाये ?वर्तमान दौर की सरमायादारी ने आज के भारत में भृष्टाचार को इस देश की प्राण वायु बना कर रख दिया है,ऐसा प्रतीत होता है मानो भृष्टाचार के विना यह देश जिन्दा नहीं रहना चाहता.
                       स्वाधीनता संग्राम के महानतम मूल्यों को पहले  भी प्रतिकार स्वरूप आजमाया जा चूका है.महात्मा गाँधी बाबा साहिब आम्बेडकर,नेहरूजी ,बिनोबाजी जयप्रकाश नारायण जी ,नानाजी ,गोपालन जी,इंदिराजी और देश की किसान -मजदूर जमातों ने अपने -अपने साधनों-सिद्धांतों और बलिदानों से इस महाविकट भृष्टाचार के संक्रामक रोग का मुकाबला किया है;किन्तु मर्ज़ बढ़ता ही गया -ज्यों-ज्यों  दवा की.अब पुनः कुछ स्वनाम धन्य ,एन जी ओ पोषित परजीवियों ने अपनी ढपली पर वही घिसा-पिटा राग दुहराया है.इन्हें देश के मुठ्ठी भर अवोध उत्साहिलालों ने जन्तर-मंतर सेउठाकर  १० जनपथ ले जाने का सब्ज बाग़ क्या दिखाया इन बूढ़े राजनैतिक नौसीखीयों  में फिर से नई तमन्नाओं ने जोश भर दिया .क्या सत्ता पक्ष ,क्या विपक्ष सबके सब अन्नमय से अन्नामय हो गए.लेकिन कुछ धीर-विचारवान बच गए जिहोने शमशान वैराग्य स्वीकार नहीं किया.
            भारत की जनता का एक विशेष वर्ग ऐंसा है जो मीडिया का स्थाई उपभोक्ता है.यह वर्ग स्वयम महा भृष्ट ,चरित्रहीन ,लम्पट और गैर जिम्मेदार है.यह वर्ग वही है जो क्रिकेट के मैच को महायुद्ध और उस खेल में जीत-हार को राष्ट्रों की जीत -हार के रूप में देखता है.इस वर्ग को २३ फरवरी के रोज दिल्ली की सड़कों पर चिलचिलाती धुप में नंगे पैर संसद की ओर कूच करते १० लाख मजदूर-किसान दिखाई नहीं देते जो न केवल उन सवालों को लेकर- जो अन्ना एंड कम्पनी ने उठाये हैं- अपितु उन सवालों को भी उठा रहे थे जो देश की निर्धन आवाम के लिए बहुत जरुरी है..मीडिया के स्थाई उपभोक्ता  वर्ग को क्या देखना है यह उसके आका पूंजीपति और उनका पाद प्रक्षालन करने वाला मीडिया ही तय करता है.जिन चेनल या अखवारों ने हवाबाजी को घास नहीं डाली और अपने विवेक से इस घटना क्रम को दर्शाया उनकी विश्वशनीयता बढ़ी है.
       भृष्टाचार तो भारत की धमनियों में दौड़ रहा है,कहा-कहाँ नहीं है?क्या २-G ,कामनवेलथ गेम्स ,आदर्श सोसायटी ,हवाल कांड,तेलगी कांड,बोफोर्स,चारा कांड इत्यादि की सूची सेकड़ों में ही समाप्त हो जाएगी?ये सब होता रहाहै  और अब भी सर्वत्र हो रहा है ,जब तक निजी संपत्ति का अधिकार है,मुनाफाखोरी की -लूट की खुली छूट है,पूंजीवादी शोषण की बदनाम -दें बस्तियां जब तक मौजूद हैं-कोई भी माई का लाल ,कोई भी संविधान संशोधन बिल या कानून ,कोई भी अन्ना हजारे -रामदेव या तीश मारखां भृष्टाचार का बाल बांका नहीं कर सकता.बमुश्किल जीवन यापन करने वाला मेहनतकश -मजदूर-किसान या आम शरीफ नागरिक क्या बिना रिश्वत दिए नल कनेक्शन प् सकता है?क्या बिजली कनेक्शन,बच्चों का एडमीशन,और सरकारी नौकरी में बिना लेनके कार्य सिद्धि संभव है?यदि आप महानतम सचरित्र्वान हैं आपात स्थिति में अचानक  कहीं दूर दूसरे शहर जाना है,आपको रेलवे आरक्षण नहीं मिला ,और वेटिंग में हैं क्या १०० रूपये देकर बर्थ मिलने पर भी आप उसे ठुकराकर घंटों खड़े-खड़े या टोलेट की बदबूदार जगह पर दिल्ली से चेन्नई जाने का माद्दा रखते है?
        आप नहीं चाहते हुए भी भृष्टाचार करने को बाध्य हैं क्योकि स्वभिमान ,नैतिकता ,को वर्तमान पूंजीवादी सड़ी -गली व्यवस्था ने अपने पद प्रक्षालन के लिए गुलाम बना रखा है.इस पतनशील व्यवस्था के केंद्र में मुनाफा विराजमान है.मुनाफा प्राप्त करना है तो भृष्टाचार जरुरी है.इसीलिये यदि जीना है तो इस भृष्ट व्यवस्था में शामिल हो जाओ.और यदि भृष्टाचार मुक्त देश या जीवन की तलाश है तो इस अधोगामी नारकीय सिस्टम को बदल डालो.कुछ भटके हुए देशभक्त अपने स्वर्णिम अतीत की मरू मरीचिका के मोह में पड़कर उसकी जगह पुराना अमानवीय गया-गुजरा सामंतवाद लाना चाहते हैं जो कभी भी शोषित -दमित जनता को स्वीकार नहीं.
        जो लोग भृष्टाचार मुक्त भारत ,उन्नत भारत ,समानता-स्वतंत्रता-धर्मनिरपेक्षता-से सुसज्जि भारत  देखना चाहते हैं उन्हें खोखले आदर्शों,संविधान संशोधनों,या व्यक्तिनिष्ठ संस्थाओं की उधेड़ बुन में अपनी उर्जा व्यय नहीं करना चाहिए.एक वर्ग विहीन ,जातिविहीन,वैज्ञानिक भौतिकतावादी समतामूलक द्वंदात्मक दर्शन और समग्र -जन -क्रांति ही इस आदमखोर पूंजीवाद और उसकी नाजायज औलाद-भृष्टाचार से भारत के जन-गण को मुक्ति प्रदान karaa  सकती है.
                   श्रीराम तिवारी

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

नकारात्मक परिवर्तनो की लहरों में शहादत का असर कहाँ?

     आज से ९२ साल पहले आज की ही तारीख{१३-अप्रैल-१९१९}को ब्रिटिश आतताइयों के  क्रूर कलंकी जनरल डायर के आदेश पर ,जलियाँ वाला बागमें निहत्थे आबाल-बृद्ध-नर -नारियों को जिस अमानवीयता ,हैवानियत और न्रुशंश्ता से क़त्ल कियागया  था; उस शहादत का ,उस बलिदान का असर था कि न केवल जंगे आज़ादी की हुलस परवान चढी, बल्कि साम्राज्वादी दुहरे शोषण का प्रतिकारअवतरित हुआ.इस लोमहर्षक मर्मान्तक सहस्त्र जन-नर संहार से  न केवल पराधीन भारत की सम्पूर्ण आवाम ने असह वेदना के आंसू बहाए  बल्कि तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने ब्रिटेन की आवाम के दवाव में जनरल डायर को इस वीभत्स -निरंकुश कार्यवाही के लिए जिम्मेदार मानकर उसे दण्डित किया.भारतीय स्वधीनता संग्राम को ऐंसी ही कुर्वानियों की बदौलत ये आज़ादी हासिल हुई की भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनकर सीना ताने दुनिया के सामने शान से खड़ा है. इस दौर में नकारात्मक परिवर्तनों की लहर है.जिसे बदला जाना चाहिए उस कुरीत या परम्परा को महिमा मंडित किया जा रहा है ,जिसे अक्षुण रखा जाना चाहिए जैसे की शहीदों के बलिदान ,विचार और राष्ट्र निर्माण के हेतुक,वे भुलाये जा रहे हैं या मिटाए जा रहे हैं.संचार एवं सूचना प्रौद्द्योगिकी का इस्तेमाल समाज का इलीट क्लास ही कर पा रहा है.साधनहीन हासिये पर खड़ा इस ओउचक संसाधन को उजबक की नाईं निहारकर चमत्कृत है. उसे क्या गरज पडी कि यह जाने कि किसने ?कब?किसके?लिए क्या कुर्वानी दी?कि अब उसके क्या मौलिक और सार्वजनिक अधिकार एवं कर्तव्य है?क्योंकि कुर्वानियों का इतिहास तो १५ अगस्त,२६ जनवरी और २ अक्तूबर के लिए आरक्षित है.पूरी एक अरब आबादी इन तमाम सरोकारों से महरूम है.क्योकि उसे या तो खेत जोतने जाना है ,या सडको पर डामरीकरण -कांक्रीटीकरण करना है ,भवन बनाना है!बाकि कि आबादी का बड़ा हिस्सा प्रतिस्पर्धी माहोल का मसीनीकृत निरीह प्राणी है.अब जो बचे वे तो चोरी -चकारी-हत्या और लूटपाट या रिश्वत ,मिलावट ,जमाखोरी मुनाफाखोरी के फेर में पूँजी के गुलाम है फिर वास्तिविक राष्ट्रीय कौन?
                        अनेक कारणों ने शहीदभगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु,और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे अनेक युवाओं को भारत के स्वधीनता संग्राम  की अहिसा वादी दिशा को चुनौती देने पर मजबूर किया".हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी "  का उद्देश्य ,कार्यक्रम और नीतियां तब खुलकर दुनिया के सामने आयीं जब  asemvli bam kand केस की सुनवाई में शहीद भगतसिंह ने तत सम्बन्धी वयान जारी   कर भारतीय जन-मानस में साहस का संचार किया.चूँकि इसी दौरान सम्पन्न सोवियत अक्तूबर क्रांति ने सारी दुनिया के यवाओं को उद्देलित किया था अतः यह स्वभाविक ही था की भारत का पढ़ा लिखा संघरशील नौजवान तबका उस महानतम क्रांति से उत्प्रेरित होने को बेताब था.शहीद भगत सिंह ने तो जजों के सामने जो वक्तव्य रखा वो भारतीय इतिहास की वेमिसाल धरोहर है.उन्होंने कहा था "तुम साम्राज्य के नौकर हो जिसने भारत की जनता को गुलामी की बेड़ियों में जकड रखा है,हम ब्रिटश हुकूमत से युद्धरत हैं अतः हमे युद्ध बंदी के रूप में गोलियों से उड़ा दिया जाये!"इसी क्रम में उन्होंने फंसी के तख्ते से भारतीय जनता -जनार्दन से आह्वान किया था कि"हम वोलशेविक हैं""जब तलक दुनिया में सबल राष्ट्रों द्वारा निर्वल राष्ट्रों का शोषण होता रहेगा ,जब तलक सबल समाज द्वारा निर्वल समाजों का शोषण होता रहेगा ,जब तलक ताकतवर मनुष्य कमजोर पर जुल्म करता रहेगा ,क्रांती के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा"{देखें पुस्तक- सिहावलोकन-मन्मथनाथ गुप्त}बताया जाता है कि जलियांवाला नर संहार के समय जो थोड़े से इंसानजो  जीवित बच गए थे ,उसमें बालक भगतसिंह{उम्र-९ वर्ष} भी थे.
           आज के दौर के युवाओं को शहीद भगत सिंह या जालियां वाला बाग़ के नर संहार का अवदान स्मरण है या नहीं ये तो वे ही जाने किन्तु 'बीडी जलाई ले ...जिगर में बड़ी आग है...से लेकर रोको मत तोको मत ...हमको प्यार करने दो"या भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा किसी बाहरी टीम को पराजित किये जाने पर आधुनिक महानगरीय युवाओं के एक हाथ में सूरा और दूसरा हाथ अनेतिक खुरापात को मचलने लगता है.
       जो लोग मोहाली या वानखेड़े के बहाने फीलगुड में आकर दो दो बार दीवाली मन चुके वे तथाकथित राष्ट्रभक्त आज जलियांवाला बाग़ के १७५० अमर शाहेदों को क्यों भूल गए ?
     जंतर -मंतर पर दूकान सजाने वाले ,गांधीवाद का दम भरने वाले,देश में सतयुग लेन वाले,श्री-श्री ,योगेश्वर ,महान समाज सुधारक ,चिन्तक और इन सबको फ़ोकट में तिराने वाला मीडियातो {लाइव इंडिया को छोड़कर -जिसने पूरे १२ घंटे का समय उन महान शहीद सपूतों को दिया} अपनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा के आवेग में राष्ट्र के वास्तविक सरोकारों से कोसों दूर है.
        श्रीराम तिवारी

रविवार, 10 अप्रैल 2011

मात्र-ज़न-लोकपाल विधेयक से 'भृष्टाचार मुक्त भारत'क्या सम्भव है?

   यह स्मरणीय है कि अपने आपको गांधीवादी कहने वाले कुछ  महापुरुष  पानी  पी-पीकर राजनीतिज्ञों को कोसते हैं ,जबकि गांधीवादी होना क्या  अपने-आप में राजनैतिक नहींहोता ?याने गुड खाने वाला गुलगुलों से परहेज करने को कह रहाहो तो उसके विवेक पर प्रश्न चिन्ह 
लगना स्वाभाविक  नहीं है क्या?दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने ढाई दिनी अनशन को तोड़ते हुए समाज सुधारक और तथाकथित प्रसिद्द गांधीवादी{?}श्री अन्ना हजारे ने भीष्म प्रतिज्ञा की है कि 'निशचर हीन करों मही,भुज उठाय प्रण कीन" हे! दिग्पालो सुनो,हे! शोषित -शापित प्रजाजनों सुनो-अब मैं अवतरित हुआ हूँ {याने इससे पहले जो भी महापुरुष ,अवतार ,पीर, पैगम्बर हुए वे सब नाकारा सावित हो चुके हैं}  सो मैं अन्ना हजारे घोषणा करता हूँ कि ' यह आन्दोलन का अंत नहीं है,यह शुरुआत है.भृष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पहले लोकपाल विधेयक का मसविदा बनेगा .नवगठित समिति द्वारा तैयार किये जाते समय या केविनेट में विचारार्थ प्रस्तुत करते समय कोई गड़बड़ी हुई तो यह आन्दोलन फिर से चालू हो जायेगा.यदि संसद में पारित होने में कोई बाधा खड़ी होगी तो संसद कि ओर कूच किया जायेगा.भृष्टाचार को जड़ से मिटाने,सत्ता का विकेन्द्रीयकरण करने,निर्वाचित योग्य प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने,चुनाव में नाकाबिल उमीदवार खड़ा होनेइत्यादि कि स्थिति में 'नकारात्मक वोट'से पुनः मतदान की व्यवस्था इत्यादि के लिए पूरे देश में आन्दोलन करने पड़ सकते हैं. यह बहुत जरुरी और देश भक्तिपूर्ण कार्य है अतः सर्वप्रथम तो मैं श्री अणा हजारे जी   का शुक्रिया अदा करूँगा और उनकी सफलता की अनेकानेक शुभकामनाएं
            उनके साथ जिन स्वनाम धन्य देशभक्त-ईमानदार और महानतम चरित्रवान लोगों ने -इलिम्वालों -फिलिम्वालों ,बाबाओं ,वकीलों और महानतम देशभक्त मीडिया ने जो कदमताल की उसका भी में क्रांतिकारी अभिनन्दन करता हूँ.दरसल यह पहला प्रयास नहीं है ,इससे पहले भी और भी व्यक्तियों ,समूहों औरदलों ने इस भृष्टाचार की महा विष बेलि को ख़त्म करने का जी जान से प्रयास किया है ,कई हुतात्माओं ने इस दानव से लड़ते हुए वीर गति पाई है ,आजादी के दौरान भी अनेकों ने तत्कालीन हुकूमत और भृष्टाचार दोनों के खिलाफ जंग लड़ी है.आज़ादी के बाद भी  न केवल भृष्टाचार अपितु अन्य तमाम सामाजिक ,आर्थिक ,राजनेतिक बुराइयों के खिलाफ जहां एक ओर विनोबा,जयप्रकाश नारायण ,मामा बालेश्वर दयाल ,नानाजी देशमुख ,लक्ष्मी सहगल,अहिल्या रांगडेकर और वी टी रणदिवे जैसे अनेक गांधीवादियों/क्रांतिकारियों /समाजसेवियों ने ताजिंदगी संघर्ष किया वहीं दूसरी ओर आर एस एस /वामपंथ और संगठित ट्रेड यूनियन आन्दोलन ने लगातार इस दिशा में देशभक्तिपूर्ण संघर्ष किये हैं.यह कोई बहुत पुरानी घटना नहीं है कि दिल्ली के लोग भूल गएँ होंगे!विगत २३ फरवरी को देश भर से लगभग १० लाख किसान -मजदूर लाल झंडा हाथ में लिए संसद  के सामने प्रदर्शन करने पहुंचे थे.वे तो अन्ना हजारे से भी ज्यादा बड़ी मांगें लेकर संघर्ष कर रहे हैं ,उनकी मांग है कि- अमिरिका के आगे घुटने टेकना बंद करो!    देश के ५० करोड़ भूमिहीन गरीब किसानों -मजदूरों को जीवन यापन के संसाधान दो!बढ़ती हुई मंहगाई पर रोक लगाओ !देश कि संपदा को देशी -विदेशी सौदागरों के हाथों ओउने -पौने दामों पर बेचना बंद करो!गरीबी कि रेखा से नीचे के देशवासियों को बेहतर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गेहूं -चावल -दाल और जरुरी खद्यान्न कि आपूर्ती करो!   पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस और केरोसिन के दाम कम करो! जनता के सवालों और देश कि सुरक्षा के सवालों को लगातार उठाने के कारन ही २८ जुलाई -२००८ कि शाम को यु पी ये प्रथम के अंतिम वर्ष में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मनमोहनसिंह ने कहा था -हम वाम पंथ के बंधन से आज़ाद होकर अब आर्थिक सुधार कर सकेंगे' याने जो -जो बंटाधार  अभी तक नहीं कर सके वो अब करेंगे.इतिहास साक्षी है ,विक्किलीक्स के खुलासे बता रहे हैं कि किस कदर अमेरिकी लाबिस्टों और पूंजीवादी राजनीतिज्ञों ने किस कदर २-G ,परमाणु समझोता,कामनवेल्थ ,आदर्श सोसायटी काण्ड तो किये ही साथ में लेफ्ट द्वारा जारी रोजगार गारंटी योजना को मनरेगा नाम से विगत लोक सभा चुनाव में भुनाकर पुनः सत्ता हथिया ली.
       लगातार संघर्ष जारी है किन्तु पूंजीवाद और उसकी नाजायज औलाद 'भृष्टाचार' सब पर भारी है.प्रश्न ये है कि क्या अभी तक की सारी मशक्कत वेमानी है?क्या देश की अधिसंख्य ईमानदार जनता के अलग-अलग या एकजुट सकारात्मक संघर्ष को भारत का मीडिया हेय दृष्टी से देखता रहा है?क्या देश की सभी राजनेतिक पार्टियाँ चोर और अन्ना हजारे के दो -चार बगलगीर ही सच्चे देशभक्त हैं?क्या यह ऐसा ही पाखंडपूर्ण कृत्य नहीं कि 'एक में ही खानदानी हूँ'याने बाकि सब हरामी?
    दिल्ली के जंतर -मंतर पर हुए प्रहसन का एक पहलु और भी है'नाचे कुंदे बांदरी खीर खाए फ़कीर'
     वरसों पहले 'झूंठ बोले कौआ कटे'गाने पर ये विवाद खड़ा हुआ था कि ये गाना उसका नहीं जिसका फिलिम में बताया गया ये तो बहुत साल पहले फलां -फलां ने लिखा था.यही हाल हजारे एंड कम्पनी का है.इनके और मजदूरों के संघर्ष में फर्क इतना है कि प्रधान मंत्री जी और सोनिया जी इन पर मेहरवान हैं .क्योंकि हजारे जी वो सवाल नहीं उठाते जिससे पूंजीवादी निजाम को खतरा हो.वे अमेरिका कि थानेदारी,भारतीय पूंजीपतियों कि इजारेदारी ,बड़े जमींदारों कि लंबरदारी पर चुप है ,वे सिर्फ एक लोकपाल विधेयक कि मांग कर मीडिया के केंद्र में है और भारत कि एक अरब सत्ताईस करोड़ जनता के सुख दुःख से इन्हें कोई लेना -देना नह्यीं . दोनों कि एक सी गती एक सी मती.
         अन्ना हजारे के अनशन को मिले तात्कालिक समर्थन ने उनके दिमाग को सातवें आसमान पर बिठा दिया है.मध्य एशिया -टूनिसिया,यमन,बहरीन ,जोर्डन,मिश्र और लीबिया के जनांदोलनो की अनुगूंजको  भारतीय मीडिया ने कुछ इस तरह से पेश किया है की भारत में भी 'एक लहर उधर से आये ,एक लहर इधर से आये,शाशन -प्रशाशन सब उलट-पलट जाये.जब भारतीय मीडिया की इस स्वयम भू क्रांतिकारिता को भारत की जनता ने कोई तवज्जो नहीं दी तो मीडिया ने क्रिकेट के बहाने अपना बाजार जमाया.अब क्रिकेट अकेले से जनता उब सकती है सो जन्तर-मंतर पर  देशभक्ति का बघार लगाया.हालाँकि भृष्टाचार की सडांध से पीड़ित  अवाम को मालूम है की उसके निदान का हर रास्ता राजनीती की गहन गुफा से ही गुज़रता है.किन्तु परेशान जनता को ईमानदार राजनीतिज्ञों की तलाश है,सभी राजनेतिक दल भ्रष्ट नहीं हैं ,सभी में कुछ ईमानदार जरुर होंगे उन सभी को जनता का समर्थन मिले और नई क्रांतिकारी सोच के नौजवान आगे आयें ,देश में -सामाजिक -आर्थिक और हर किस्म की असमानता को दूर करने की समग्र क्रांति का आह्वान करें तो ही भय-भूंख -भृष्टाचार से देश को बचाया जा सकता है .यह एक अकेले के वश की बात नहीं .श्रीराम तिवारी  

 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

देश मे कार्पोरेट लाबी की सरकार-पूर्व नौसेना प्रमुख विष्णु भागवत के उदगार....

      इंदौर दिनांक ६-अप्रैल ,प्रीतमलाल दुआ सभागार में सम्पन्न अभ्यास मंडल की मासिक व्याख्यानमाला में देश के पूर्व नौसेना प्रमुख ने जो उदगार व्यक्त किये ;वे सम्पूर्ण आवाम तक पहुंचे तो निसंदेह भारत की जन-बैचेनी को समझने में मदद मिलेगी.पूर्व एडमिरल विष्णु भागवत ने इस अवसर पर जो विचार प्रस्तुत किये,उन्हें सुनकर सभागार से बाहर निकले श्रोताओं {जसमें अधिकांश  वुद्धिजीवी और वरिष्ठ नागरिक थे}की सधी हुई प्रतिक्रिया थी कि आज़ादी के बाद पहली बार किसी आला-अधिकारी ने देश की पीड़ा को समझा है.
             पूर्व नौसेना प्रमुख ने कहा-देश में भृष्टाचार का मसला सिर्फ लोकपाल बिल से हल नहीं किया जा सकता. उनका कहना था कि कार्पोरेट घरानों ने भारत कि सम्पूर्ण व्यवस्था को खरीदकर भृष्ट और पंगु बना दिया है.सरकार सिर्फ पूंजीपतियों 
 के हित-साधना  में व्यस्त  है ,केंद्र सरकार द्वारा माओवाद और आतंकवाद को दवाने के लिए सेना का उपयोग गलत है.यदि ये सिलसिला जरी रहा तो गृह युद्ध की स्थिति आ सकती है.भृष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल बिल लाने की मशक्कत निरर्थक ही सावित होगी .उन्होंने प्रतिप्रश्न किया किया कि लोकपाल कौन होगा?किसके हितों का धारक होगा?क्या वह कार्पोरेट लाबी से टक्कर ले सकेगा?वर्तमान में देश के सारे संसाधनों पर देशी धनाड्य वर्ग और विदेशी कार्पोरेट ने कब्ज़ा कर लिया है.इनके दलालों ने सारी मशीनरी को ही भृष्ट बना डाला है. 
      अपने धाराप्रवाह संबोधन में एडमिरल {भूतपूर्व}विष्णु भागवत ने खुलकर आरोप लगाये की कार्पोरेट लाबिस्ट के नाम से कुख्यात दलालों ने जनता की संपत्ति को कोडियों के दाम हासिल कर खरबों का घोटाला कर देश को जर्जर बना डाला है.अब सरकार और उसकी नीतियाँ भी देशी -विदेशी पूंजीपति बना रहे हैं.
          सेनाओं में कमीशनखोरी परवान चढ़ी हुई है.व्यवस्था ही कमीशनखोरों को सौंपी जा चुकी है.अनाप-शनाप गैर जरुरी हथियार खरीदने के बजाय देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए स्पेशल फ़ोर्स व् सपोर्ट सर्विसेज को मजबूत किया जाना चाहिए.रक्षा शोध, अनुसन्धान पर ध्यान देना चाहिए.
             पूर्व सेना प्रमुख ने अपनी बात धर्म-अध्यात्म-से प्रारंभ की थी;उन्होंने रामायण,महाभारत ,ईशोपनिषद,के उदाह्रानो से अहिंसा-समता-भाईचारा कायम रखने वाली व्यवस्था की जरुरत से लेकर ईराक,अफगानिस्तान और लीबिया पर पश्चिमी राष्ट्रों की हथियार खपाऊ हिंसक प्रवृत्ति को श्रोताओं के सामने विस्तार से उजागर किया.
         श्री भागवत ने कहा कि  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अनेक सुविधाएँ और छूट दी जा रही है.इसमें जनता कि पसीने से कमाई गई पूँजी;,जो की खरबों में है,सेंत-मेंत में नहीं लुटाई जा रही ,बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा देश के गद्दारों तक भी पहुँच रहा है.उन्होंने कहा-देश के करोड़ों लोग आज भी झुग्गी -झोपड़ियों में अमानवीय जीवन वसरकर रहे हैं.उधर दूसरी ओर हम बहु-राष्ट्रीय निगमों को अनमोल जमीने मुफ्त में बाँट रहे है.आम जनता पीने के पानी को तरस रही है और हमारी सरकारें नदियाँ बेच रहीं हैं.उन्होंने सवाल किया क्या यही राज धर्म है?आखिर हम किधर जा रहे हैं?
     इस अवसर पर पत्रकारों [खास तौर से नई दुनिया}के सवालों के जबाब में उन्होंने कहा-देश में माओवाद -नक्सलवाद-आतंकवाद और जन-संघर्षों का सबसे बड़ा कारण -भृष्टाचार ही है.अपने वक्तव्य के प्रारंभ में उन्होंने महान क्रांतीकारी स्वर्गीय का.होमी ऍफ़ दाजी को शिद्दत से याद कर उनके विचारों की प्रासंगिकता प्रतिपादित कर तमाम श्रोताओं को चमत्कृत किया.इस अवसर पर श्रीमती पेरिन दाजी भी उपस्थित थी जिन्हें मंच से उतरकर एडमिरल भागवत(पूर्व) ने सेलूट  किया और कुशल क्षेम पूँछी.
                            सेकड़ों की तादाद में उपस्थित विभिन्न विचारों के श्रोता और सुधीजनों को ऐसा महसूस हुआ कि वैचारिक स्तर पर पूर्व नौसेना प्रमुख  ही नहीं बल्कि सम्भवतः सम्पूर्ण सैन्य बल  पूरी शिद्दत के साथ भारत की सर्वहारा क्रांति के लिए ,देश की जनतांत्रिक शुद्धिकरण के लिए और भारतीय जनता के दुख-भंजन के लिए प्रतिबद्ध है.
                    श्रीराम तिवारी

क्रांति का नवगीत....

     शब्द गीत छंद में,प्रबंध अनुबंध में ,
     सृजन की साधना सरस रस धार हो!
      कामना अभीष्ट की चेतना समष्टि की,
      काव्यानुभूति में करुण पुकार हो!!
       एकता की अभिधा,संघर्षों की लक्षणा,
        आतताईयों  का प्रवल-प्रतिकार  हो!
       सुबह अलसाई सी शाम सरसाई सी,
      घर  आंगन  में   क्रांति  बहार    हो!!                                 

             श्रीराम तिवारी
       

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

सामाजिक-राजनैतिक जीवन में काम करने वालों का निजी जीवन बुद्ध देव जैसा

     दुनिया के छोटे-बड़े २०० देशों की सूची में भारत कई मामलों में सिरमौर है.यहाँ ताजमहल है,यहाँ दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत कश्मीरी वादियाँ हैं.यहाँ तीन ओर 
समुद्र और उत्तर में पर्वतराज हिमालय है.यहाँ शानदार  ऋतुचक्र है. हरे-भरे खेत  हैं,चाय बगान हैं,कपास होता है,गेंहूँ-चावल ,मछली ,मसालों में,दुग्ध क्रांति में और अकूत खनिज-सम्पदा में भारत दुनिया में अग्रिम पंक्ति का राष्ट्र है.दुनिया की १२१ करोड़ आबादी  इस देश में रहती है.,यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक राष्ट्र है.यहाँ ढेरों धरम-मज़हब हैं.दुनिया में सबसे अधिक बोलियाँ-भाषाएँ और जीवन पद्धतियाँ यहाँ पाई जाती हैं.यह क्रिकेट का दिग्विजयी सम्राट है.यहाँ सबसे ज्यादा धनिक {अमेरिका के एक-दो पूंजीपति अपवाद हैं} श्रेष्ठी पाए जाते हैं .यहाँ सर्वाधिक लुटेरे हैं.यहाँ  सर्वाधिक भिखमंगे   हैं, यहाँ  दुनिया के बड़े-बड़े ठग और बड़े-बड़े कपटी क्रूसेडर है.
                            भारत की रग-रग में मिलावट,जातीयतावाद,क्षेत्रवाद,भाषावाद,पूंजीवाद,सम्प्रदायवाद ,रिश्वत्वाद और भृष्टाचार समाया हुआ है
अब तो हिमालय पर भी गंगा प्रदूषण  की शिकार है.जो सत्ता में होता है वो बदनाम  होता है.जो सत्ता से बाहर हो जाता है,जनता उसके कुकर्मों को भुला देती है.जहां ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठां  या धर्मनिरपेक्षता है वहां भी बदबूदार हवाएं फिजां में ज़हर घोलने पहुँच रही हैं.एक सरकारी सर्वे के अनुसार   पश्चिम बंगाल के वर्तमान मुख्यमंत्री कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य जी देश के सबसे कम आय  वाले  मुख्यमंत्री बताए गए  हैं.जिस  देश में चंद दिनों  के लिए  मुख्यमंत्री  बनाने वाला मधु कोंडा चंद दिनों में ही चार हज़ार करोड़ रुपये  का मालिक बन जाता है, वहीँ वर्षों  से राज्य  की राजनीती में स्थापित बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने जीवन काल में कुल पञ्च हज़ार रुपये  ही संचित किए  है. उनके पास  दो कमरों का किराये का मकान है. चुनाव आयुक्त  को प्रस्तुत नामांकन पत्र में अपने बारे में जानकारी देते हुए  भट्टाचार्य जी ने उल्लेखित किया  की उनके परिवार में वे तथा उनकी पत्नी  एक कंपनी में काम करती हैं जिनकी कुल  बचतें छः लाख  हैं.
         महाराष्ट्र  में एक मामूली घोडा व्यापारी  गुलामहसन अली घोड़े वाला ६० हजार करोड़ आयकर देने को तैयार है. ऐ राजा, उस्मान बलवा ,टाटा-रादिया तो हांड़ी का एक चावल भर हैं ,एक सीएम् डी की बीवी  ४० सोने की ईंटों को रिश्वत में लेते हुए अपने पति को जेल भिजवा चुकी है.
    जो अभी -अभी २-४ साल पहले गली -गली फेरी लगाया करते थे वे भारती बंधू और अम्बानी बंधू आज दुनिया के बाज़ार में ताकत के प्रतीक बन चुके हैं.जहां१० साल  पहले इस देश में कुल जमा ४-५ पूँजी पति हुआ करते थे अब इनकी संख्या ६८ को पार कर चुकी है.राजनीती भी अब कार्पोरेट सेक्टर की हिमायती बन कर रह गई है ,देश में नंगे-भूखों  की तादाद ३३ करोड़ तक पहुँच चुकी है.
     सूखा-पीड़ित, पाला-तुषार पीड़ित किसान हजारों की तादाद में आत्म-हत्याएं कर रहे हैं.उच्च शिक्षित लाखों नौजवान निजी क्षेत्र में अल्प पारिश्रमिक पर १२-१४ घंटे काम करने को बाध्य हैं.अशिक्षित नौजवानों ,ग्रामीणों और अशःक्त जनों को को एक वक्त का भोजन भी हर समय उपलब्ध करा पाना मुमकिन नहीं ,भले ही गोदामों में गेहूं सड़ता रहे.
      इस विकट स्थिति में आशा की किरण तीन जगहों पर दिखाई दे रही है .
  एक-  देश की न्याय पालिका ने उत्तरदायित्व हेतु कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को बार-बार चेताया है. दो- बुद्धदेव भटाचार्य ,वी एस अच्युतानंदन,और मानिक सरकार ने अपनी साफ़ स्वच्छ छवि को कलुषित नहीं होने दिया.इसका श्रेय वामपंथ की क्रांतिकारी विचारधारा को जाता है.
 तीन-गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्त्ता -अन्ना हजारे ने भृष्टाचार के खिलाफ भूंख हड़ताल करके देश की जनता को जगाने का उपक्रम किया है/
      उक्त तीन सकारात्मक बिन्दुओं को मजबूती से थामकर भारत आगे बढेगा ,इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए.                                     श्रीराम तिवारी  
       
                     

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

सवालों के घेरे में मौसम {कविता}

     कौन कहता है कि ये मौसम खुशगवार है?
    यदि ये सच है तो क्यों हर शख्स बेदम-बेज़ार है?
    क्या सत्ता ,क्या विपक्ष,एक ही थैली के चट्टे-वट्टे?
    सत्ता की सीडियों पर सज रहा बाज़ार है!
    क्यों राजा तिहाड़ में ,सादिक वाशा मृत?
   क्यों टाटा-राडिया की पी ऐ सी को दरकार है?
    क्यों धनवालों को टैक्स में छूट  दर-छूट? 
    क्यों हो रहा देश के नवरत्नों का बँटाधार है?
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     काश न रहे कोई भूँखा ,मिले सबको रोटी,
    हर हाथ को मिले काम,अनिकेत को निकेतन!
    पर्याप्त शिक्षा-स्वाश्थ,आराम -मनोरंजन,
    सरमायेदारी में ये कहाँ? केवल करुण क्रंदन!!
     संपन्न राष्ट्र में क्यों विपन्न का ही शोषण?
     श्रम का अपमान धूर्तों का महिमा मंडन!
      हतभाग्य नहीं मेहनतकश  केवल वक्त की मार है,,
     सर्वहारा के संघर्षों का क्रांतिकारी अभिनन्दन!!
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          श्रीराम तिवारी

                     

रविवार, 3 अप्रैल 2011

क्रिकेट विश्वकप- २०११ और भारतीय अस्मिता का उदय गान.

 
                                                                                                                                                                                                                               विगत विगत २ अप्रेल २०११ को भारतीय क्रिकेट टीम ने मुंबई के बानखेड़े स्टेडियम में श्रीलंका को ६ विकेट से हराकर न केवल अपना २८ साल पुराना शानदार इतिहास दुहराया बल्कि किसी मेजवान देश ने यदि विश्व कप अपनी धरती पर 
अर्जित किया है तो वह एक मात्र  भारत ही है जो   दुनिया का     पहला दिग्विजयी क्रिकेट सम्राट है.
     १९८३     को कपिलदेव की कप्तानी    में भारतीय क्रिकेट टीम ने विदेशी धरती पर भारत की          विजय का परचम लहराया  था.     २८ साल    बाद महेंद्र  सिंग धोनी की कप्तानी में      भारतीय टीम ने अपनी ही मेजवानी में श्रीलंकाई टीम को ६ विकेट से हराकर 'विश्व कप'         हासिल कर       क्रिकेट की दुनिया में           भारत का झंडा           ऊँचा किया है.           विश्व कप     के   ३६  वर्षीय  इतिहास  में अब तक १० आयोजन हो चुके हैं .प्रत्येक चार साल       बाद होने वाले इन आयोजनों में भारत पहली दफा १९८३ में जब क्रिकेट का सिरमौर बना था तब वह  तीसरा टूर्नामेंट था ,           इस                दफा जब          भारत ने विश्व-कप             हासिल किया       तो  यह १०  वां  टूनामेंट   है. 
भारतीय टीम अब तक के  विश्व-कप  टूर्नामेंटस में६७ मैच में से ३९ बार  जीती है और २६ बार हारी है .
एक बार बराबर और एक बार अनिणीत रही है.
        वर्तमान भारतीय टीम ने अपने ३७ वर्षीय चिरयुवा और सीनियर साथी सचिन तेंदुलकर को उनकी  स्वेच्छिक सेवा निवृति पर  शानदार -यादगार विजय श्री का उपहार  देकर अंतर राष्ट्रीय क्रिकेट जगत में और भारतीय जन-मानस में  अप्रतिम अनुकरणीय सम्मान दिया है.भारत की जनता ने विगत ३० मार्च को भी  भारत-पाक क्रिकेट सेमी फ़ाइनल में भारतीय टीम की विजयी सौगात को जिस आल्हाद से जश्न में बदला वो अद्वतीय है.किन्तु पकिस्तान के कप्तान शहीद आफरीदी ने  पाकिस्तान की नाराज जनता से जो  करारा सवाल किया  वो बेमिसाल  है .अब दौर आया है की भारत पकिस्तान दोनों देश इन सवालों के हल ढूंढें .शाहिद ने अपनी हार पर  चारों ओर से मीडिया और पकिस्तान की उन्मादी जनता के आरोपों से आक्रमक सवालों से खिन्न होकर पलटवार किया कि 'भारत के खिलाफ पाकिस्तान में इतना जूनून क्यों? पकिस्तान कि क्रिकेट टीम भारत के अलावा और किसी टीम से भी तो हार सकती थी?
भारत कि टीम हमसे अच्छा खेली सो भारतीय टीम जीत गई.हमारे खिलाडियों ने भी शानदार खेल दिखाया तभी तो सेमी फ़ाइनल तक पहुंचे,और पहले हमने भी कई बार भारत को हराया है ,क्रिकेट अनिश्चितता और अनंत संभावनाओं का खेल है इसमें आप राजनीती या विदेशनीति कितनी करते हैं इससे क्रिकेट या खिलाडियों  को कोई लेना देना नहीं 'भारत के मुंबई वानखेड़े   स्टेडियम में भारत पाक मैत्री के सन्देश देखकर शहीद आफरीदी तो क्या यदि परवेज मुशर्रफ भी होता तो भारतीय जनता के अमन पैगाम पर यही प्रतिक्रिया होती.
        शाहिद आफरीदी के  अल्फाजों से मेरे जैसे अंतर राष्ट्रीयता वादियों को भी सम्बल मिलता है .मैं एक भारतीय होने के नाते हमेशा चाहता हूँ कि न केवल क्रिकेट  वरन सभी खेलों -फुटवाल,हाकी तथा अन्य सभी खेलों में हम भारतीय  ही अव्वल रहें लेकिन ये हर समय मुमकिन नहीं ,किसी के लिए भी नहीं कोई भी खेल या खिलाडी हार से निरापद नहीं. ,जीत की  सदिच्छा पूर्ती करने के लिए जरुरी नहीं कि हम दूसरों के खिलाफ नारेबाजी करें या अंध राष्ट्रवाद का बीज वपन करें. खेल को दो देशों के संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने का माध्यम बनाये जाने के लिए शाहिद आफरीदी कि सोच सकारात्मक है. तो उसका स्वागत है किन्तु खेल भावना के मूल उद्देश्य भी परिष्कृत होते रहें तो क्या हर्ज़ है?भारत के लोगों को भी चाहिए कि शाहिद आफरीदी जैसे सच्चे खिलाडियों को उचित सम्मान दें और हो सके तो 'नेहरु शांति पुरूस्कार' भी शाहिद को दिया जा सकता है!
        इस टूर्नामेंट में दुसरे नम्बर पर रही श्रीलंकाई टीम के खिलाडी बधाई के पात्र हैं उन्होंने आखिरी दम तक भारत के १२१ करोड़ लोगों को 'चमकाए' रखा. महेला जयवर्धने कि यादगार शतक और मुथैया मुरलीधरन कि विदाई इस टीम को इस अवसर पर अधिक यादगार बनाते हैं. भारत के गौरव सचिन तेंदुलकर और भारतीय टीम के कोच गेरी कर्टसन भी अपने हिस्से का इतिहास लिख चुके हैं .
   'मेन आफ  दी टूर्नामेंट' रहे युवराज सिंह ने जितना किया वह काबिल-ऐ- तारीफ है किन्तु वे इससे ज्यादा कर सकते थे. धोनी ने आखरी मोड़ पर फ़ाइनल में भारत के नैया खेवनहार गौतम गंभीर और कोहली  इत्यादि की मेहनत  को व्यर्थ नहीं जाने दिया, देश कि जनता को शानदार विजय का स्वाद चखाया, अतः उनकी तमाम भूलों को विस्मृत करते हुए आगामी विश्व-कप कि तैयारी का भार उन्ही के कन्धों पर डाला जायेगा ऐसी अपेक्षाओं के साथ ...ब्लोगिंग कि दुनिया में विचरण करने वाले तमाम क्रिकेट-प्रेमी मित्रों को भारतीय टीम कि विजय पर बधाई.
                                  श्रीराम तिवारी

THE CUP THAT COUNTS FOR EVERY INDIAN

ये वही है जिसके लिए कल पूरा हिन्दुस्तान सड़कों पर इस एहसास के साथ नाच रहा था कि हम सब एक है और दुनिया में सबसे ताकतवर भी। ये जादुई चीज़ है और इसका एहसास हर हिन्दुस्तानी को है। शुरूआत में जब शो के दौरान इसे हाथ में लेने का मौका मिला था तभी दिल से दुआ निकली थी की ये यही रह जाए और दुआ कबूल हुई आप सबको ये हसीन लम्हा और बेइंतहा खुशी मुबारक.. कल कनॉट प्लेस, आईटीओ, इंडिया गेट और तमाम जगह जबरदस्त जाम था क्योंकि कोई घर जाना ही नही चाह रहा था देश का हर कोना अपना घर और हर शख्स अपना भाई दिख रहा था। ईश्वर ऐसे लम्हे बार-बार दिखाए।

डॉ प्रवीण तिवारी, एंकर, लाइव इंडिया

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

2-G,3-G,4-G for whom?{ kavita}

      प्रकृति  पर मानव  की विजय या ,
      मुसीवतों का पिटारा है!
      साइंस तरक्की कर आगे बढ़ा या ,   
     महज दिग्भ्रमित नारा है!!
        चुनौतियां मझधार की या ,
        अवलंब का किनारा है! 
         जो था पहले अभावों का मारा ,
           अब  आविष्कारों का मारा है!! 
         ======-----=====-----====
      पहली पीढी के अनुसंधानों ने ,
     प्रगति का दुरुह्तर काम किया!
     दूजी पीढी ने मानव को ,
      संचार क्रांति का नाम दिया!!
       तीसरी पीढी ने  ,बाजारों को ,
       मोबाइल से पाट दिया!
      चौथी पीढी की टेकनालाजी,
      सारा ट्रेफिक जाम किया!!
      ======-------=====-----
      पांचवी पीढी भेद मिटाती ,
          इक      गाँव हुआ जग सारा है!
    वन -जी  टू-जी थ्री-जी सरजी
     बेकारी का मारा है!!
     आदिम युग की गहन गुफा में ,
      भटक रहा जग सारा है! 
       मानव का मानव  हो बंधू ,
      यह सन्देश हमारा है!!
                                                                               श्रीराम तिवारी