मंगलवार, 20 जून 2017

क्रिकेट का खेल और राष्ट्रवाद !

यदि अचानक कभी, आपका किसी दैवीय ईष्वरीय शक्ति से साक्षात्कार हो जाए,और वो आपसे पांच वरदान मॉंगने को कहे तो आप कौनसे वरदान मांगेंगे ?
आपकी सुविधा के लिए मैं अपनी च्वाइस बता देता हूँ !

पहला वरदान :-यदि  पुनर्जन्म होता है,तो मेरा जन्म भारत भूमि पर ही हो, किन्तु जिस घर में जन्म हो वो भगतसिंह के आदर्शों को जानता और मानता हो !

दूसरा वरदान :-जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ की खाते हैं ,यही जिनकी मातृभूमि है ,वे सभी अपने धर्म मजहब से ऊपर भारत देश को ही अव्वल माने !

तीसरा वरदान :-जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी तत्व पूँजीपतियों की चरण वंदना करते हैं,मजदूरों,किसानों और वामपंथ को गाली देते हैं ,उनका सत्यानाश हो !

चौथा वरदान :-जो लोग भारत के मुसलमानों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं ,भारत की बर्बादी के सपने देखते हैं ,उनका सत्यानाश हो !

पाँचवाँ वरदान :-जो लोग स्वयंभू देशभक्त हैं वे भारत के सभी मुसलमानों को संदेह से देखते हैं,उन्हें आतंकी समझते हैं , ईस्वर उन्हें सद्बुद्धि दे !

   १८ जून २०१७ इंग्लैंड मे आई सी सी चैम्पियनशिप के फाइनल में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम जीत गई और  भारतीय टीम हार गई। चूँकि हार जीत अधिकाँस खेलों का अहम हिस्सा है ,इसलिए जब दो टीमें आमने सामने हों तो कोई एक तो अव्वल होगी ही !और  फाइनल हारने वाली दूजे पायदान पर ही होगी। इसमें आश्चर्य और अनर्थ जैसा क्या है ? हालाँकि किसी अंतर्राष्ट्रीय मैच के फाइनल में पहुँचना भी कम गर्व की बात नहीं !और हारना भी उतना बुरा नहीं !लेकिन जब मामला भारत  विरुद्ध पाकिस्तान का हो तो खेल भावना कीऐंसी-तैंसी हो जाती है। तब दोनों मुल्कों में छद्म राष्ट्रवाद उभरकर गंदे बदबूदार परनाले की तरह खदबदाने लगता है। वेषक किसी अति सम्मानित टीम का नाक आउट या सेमीफाइनल में हारकर घर लौटना अवश्य शर्मनाक है। किन्तु इतने सारे दिग्गजों को हराने के बाद किसी खास देश की टीम से आख़िरी में हार जाना किसी को गवारा नहीं।जबकि फाइनल हारने वाला खुद उस विजेता टीम को पहले ही राउंड में बुरी तरह निपटा चुके हो !सांत्वना एवं संतुष्टि सिद्धांत के अनुसार भारतीय टीमकी हारको शर्मनाक हार कहना गलत है। बल्कि उसे काबिले तारीफ हार कहा जाना चाहिए ! लेकिन नादान क्रिकेट प्रेमियों ने क्रिकेट के खेल में अंधराष्ट्रवाद घुसेड़कर खेल को युद्ध बना डाला है। भारत केजो लोग अंधराष्ट्रवादी हैं उनका दुखी होना तो स्वाभाविक है। किन्तु जो लोग 'परराष्ट्रवादी' हैं याने प्रतिद्व्न्दी या दुश्मन देश पाकिस्तान के खैरख्वाह हैं वे मेरी नज़रों में हरामी हैं।

भारत- पाकिस्तान के फाइनल में पहुँचते ही भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट समर्थक अपनी -अपने टीमों की जीत के दावे कर रहे थे। जहाँ पाकिस्तान के भूतपूर्व दिग्गज खिलाड़ी अपनी ही टीम को कमजोर बता रहे थे,अपने कप्तान को नौसीखिया बता रहे थे, और पाकिस्तानी मीडिया भी उनकी अपनी टीम की जीत के प्रति अधिक आशान्वित नहीं था! वहीं  भारत के तमाम क्रिकेट मैनेजर्स और समर्थक बड़ी हेकड़ी से भारतीय टीम को बाबुलंद ,कप्तान कोहली को शेर पाकिस्तानी टीम को चूहा और भारतीय टीम की जीत को सौ फीसदी सुनिश्चित बता रहे थे। दुर्भाग्य से जब फाइनल में भारत के शब्दभेदी कागजी शेर ढेर हो गए तो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को गहरा धक्का लगना स्वाभाविक था !बहरहाल इस मैच से पूर्व मैंने अपनी फेस बुक टाइम लाइन पर लिखा था -;

कबीरा गर्व न कीजिये ,कबहुँ न हँसिये कोय।
अबहुँ नाव मझधार में ,का जाने का होय।।

मेरी पोस्ट को हालाँकि बहुत कम लोगों ने पसंद किया ,क्योंकि एक तो यह नकारात्मक अप्रिय भविष्यबाणी थी ,दूसरे भारतीय टीम की जीत पर किसी को भी संदेह नहीं था। लेकिन दुर्भाग्य से मेरी भविष्यबाणी अप्रत्याशित रूप से सही साबित हुई ! इस संदर्भ में मेरी प्रतिभा का कोई कमाल नहीं बल्कि यह तो भारतीय खिलाडियों की लापरवाही और प्रमाद का प्रतिफल है।

बहुत बरसों बाद पाकिस्तानी टीम भारतीय टीम से जीत सकी है, इसलिए पाकिस्तानी आवाम का ख़ुश होना जायज है ! में उन्हें मुबारकवाद देता हूँ उन्हें शाबाशी भी देता हूँ ,क्योंकि पाकिस्तानी टीम ने उस बहुश्रुत शेर का तहेदिल से जी जान से अनुशरण किया है कि : -

सुर्खुरू होता है इंसा ठोकरें खाने के बाद ! रंग लाती है हिना पत्थर पाई पीस जाने के बाद !!

किन्तु भारत के कश्मीर में ,बुरहानपुर में ,कोलकाता में और देश के अन्य अनेक हिस्सों में कई जगह एक खास तबके के लोगों ने पाकिस्तानी टीम के जीतने पर जो ख़ुशी मनाई वो मेरी समझ से परे है। सिर्फ फटाके फोड़े होते और केवल जश्न ही मनाया होता तो भी हम मान लेते कि यह तो खेल भावना है बड़ा दिल और बडड़प्पन  रखना उचित है !लेकिन कुछ हरामजादों ने भारत में अनेक जगह पाकिस्तान के झंडे लहरायें हैं ,भारत विरोधी नारे भी लगाए हैं और भारतीय टीम के समर्थकों को चिढ़ाया भी है ! कष्मीर और बुरहानपुर में रातभर आतिशबाजी और पत्थरबाजी  हुई , पाकिस्तानी झंडे भी लहराए गए तथा भारत विरोधी नारे भी लगाए गए । भले ही वे खास फिरके या तबके के बहुत कम तादाद के गद्दार तत्व हैं,किन्तु इस खतरनाक देशद्रोही प्रवृत्ति को कमतर नहीं आँका जाना चाहिये !
खेद की बात है कि इस संदर्भ में भरत के वर्तमान सत्तापक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष ने भी कोई संज्ञान नहीं लिया और अभी तक कोई आपत्ति भी नहीं ली !

जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ के हवा पानी में पले बढे,यहीं जीवन यापन कर रहे हैं ,वे इतने हरामी कैसे हो सकते हैं कि क्रिकेट की हारजीत पर भारत में पाकिस्तान का झंडा लहरायें ?और भारत की बार बर्बादी के नारे लगाएं ! जिन लोगों ने जनरल विपिनचंद रावत को गुंडा कहा ,उन्हें अमानवीयतावादी भी कहा ,वे लोग यदि खुद रंचमात्र भी देशभक्त हैं तो पाकिस्तानी पिट्ठुओं और मजहबी साम्प्रदायिक गद्दारों  के खिलाफ अपना मुँह क्यों नहीं खोलते ?

यदि इस बाबत केंद्र सरकार को राज्य सरकारों से कठोर कार्यवाही की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए ! मेहबूबा मुफ्ती कुछ नहीं करेगी। इधर मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए एमपी के दर्जनों पुलिस अफसर एक बेकसूर किसान के मासूम लड़के को गिरफ्तार करने सिर्फ इसलिए पहुँच जाते हैं कि उसने वाट्सएप पर कोई बहुत बड़ा गुनाह कर डाला था ! एमपी में नक्सलियों ,आतंकियों ,सिम्मियों और पाकिस्तानी एजेंटों की भरमार है।उसपर ध्यान देने के बजाय किसानों पर गोली दाग रहे हैं ,मासूम बेकसूर किसानों को गिरफ्तार कर रहे हैं।      

शनिवार, 3 जून 2017

भारत में  अलगाववाद बनाम उग्र राष्ट्रवाद !


यदि पर्यावरणविद और धरती के प्रति फिक्रमंद लोग ईमानदारी से सोचें तो वे पाएंगे कि पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण की वजह से हुआ है। चूँकि अमेरिका,यूरोप,चीन और जापान इत्यादि देशों ने बहुत पहले ही बहुत तेजी से, प्रतिस्पर्धात्मक और अँधाधुंध विकास कर लिया है, इसलिए उनके द्वारा धरती के पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश हुआ है। गनीमत है कि अफ्रीकी और भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षेस देश उतने ज्यादा 'एड्वान्स' नहीं हुए कि धरती को बर्बाद करने में इन तथाकथित उन्नत राष्टों की बराबरी कर सकें !

हालाँकि यह सौ फीसदी सच है कि दुनिया के हर मनुष्य ने, हर समाज ने, हर राष्ट्र ने धरती के अन्य प्राणियों की बनिस्पत बहुत अधिक कूड़ा-कचरा इस हरी भरी पृथ्वी पर पैदा किया है। कुछ पर्यावरणविद बुद्धिजीवियों ने तो यहाँ तक कहा है कि धरती पर'मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है !' हालाँकि इस पदबंध के और भी दूरगामी निहितार्थ हैं। जैसे कि मानव मस्तिष्क ने ही हिरोशिमा नागासाकी का बीभत्स नरसंहार किया था। मानव मष्तिष्क द्वारा धरती को बर्बाद करने का ही भयानक प्रमाण है यह है कि उसी की बदौलत बीसवीं शताब्दी में दुनिया के दो 'महायुद्ध' हो चुके हैं। और मानव मस्तिष्क से ही धरती के अन्य प्राणियों को एवं वन सम्पदा को खतरा है। मानव मष्तिष्क ने ही ओजोन परत में अनगिनत छेद किये हैं! धरतीपर आबादी बढ़ाने में मानव शरीर का जितना रोल रहा, उससे अधिक मानव मष्तिष्क का और मनुष्य जाति के खुरापाती मजहबी उसूलों का नकारात्मक रोल रहा है।

धरती पर मानव आबादी बढ़ाने में चीन भले ही नंबर वन है,किन्तु आबादी की सापेक्ष बृद्धि दर में तो भारत ही दुनिया में अव्वल है। भारत में जनसंख्या बृद्धि में ,वे व्यक्ति और समाज सबसे आगे हैं जो अपढ़ हैं ,पिछड़े हैं ,जाहिल हैं ,गंवार हैं !जो लोग एक से अधिक शादियां करते है ,जिनको वैज्ञानिक निरोध मंजूर नहीं!जिन्हें उनके पुरातन सड़े गले पुरुषसत्तातात्मक रीति रिवाजों से बड़ा लगाव है। जिन्हें देश की फ़िक्र नहीं ,जिन्हें अपने ही बच्चों की फ़िक्र नहीं,जिन्हे केवल अपने घटिया अंध विश्वाश और अपनी कूड़मगज मानसिकता पर नाज है,वे ही कृतघ्न व्यक्ति व समाज आबादी बढ़ाने के लिए गुनहगार हैं। आबादी के विस्तार में उनका भी खूब योगदान है जो अपने बच्चों को बेहतर मानव बनाना ही नहीं चाहते !बल्कि वे उन्हें जेहादी,फिदायीन,आतंकी-अपराधी बनाकर देश-समाज में मरने मारने को छोड़ देते हैं। जो धरती को और मानवता को खुदा भगवान् और अल्लाह के भरोसे छोड़ देते हैं।  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को पैरिस संधि से अलग करने की धमकी दी है। ट्रम्प ने विश्वपर्यावरण संरक्षण संधि से अलग होने की वजह चीन और भारत की बढ़ती जनसंख्या को कारण बताया है। वेशक ट्रम्प और अमेरिकी नीतियां साम्राज्य्वादी हैं ,किन्तु उसका आरोप नितांत कड़वा सच है !जब यह सिद्धांत माने हो गया कि ''मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है" तो भारत और चीन की ज्यादा जबाबदेही बनती है कि जनसंख्या नियंत्रण पर अधिक ध्यान दें। चूँकि चीन के पास उसकी जनसंख्या के अनुपात में ज्यादा बड़ा भूभाग है,कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव के विरोध में वहां कोई पृथक तबका या असहमत वर्ग नहीं है।  इसीलिये चीन में अपने राष्ट्र को जिन्दा रखने की अनंत सामर्थ्य है। इसलिए चीन को किसी की फ़िक्र नहीं है।

भारत में किसी भी सार्थक योजना पर और विकास के किसी भी प्रोग्राम पर महज दो राय ही नहीं बल्कि प्रतिरोध के भी अनेक स्वर हैं। दुनिया के अधिकांश मुल्कों में आमतौर पर एक सा खानपान,एक सा रहन सहन ,एक सा बोलना चालना और एक् सा राष्ट्रीय चरित्र है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत में न केवल मजहबी या सांस्कृतिक वैविद्ध्य है ,अपितु जनसंख्या बृद्धि और परिवार नियोजन जैसी चीजों पर भी साम्प्रदायिकता का सामंतयुगीन रंग चढ़ा हुआ है। एक देश में ही अनेक जातियां ,अनेक मत पंथ सम्प्रदाय,अनेक भाषा और जीवन शैलियाँ तो हो सकते हैं, किन्तु संविधान और राष्ट्रीय चरित्रगत मूल्य जुदा जुदा हों तो राष्ट्र की एकता को खतरा है। शायद इसीलिये कश्मीर से और उत्तरपूर्व के अन्य राज्यों से धारा ३७० हटाने और समान नागरिक क़ानून की मांग बार बार उठते रहती है। मुगलकाल में अयोध्या ,काशी ,मथुरा जैसे हिन्दू तीर्थ स्थलों पर अल्पसंख्यकों का प्रभुत्व स्वाभाविक था ,क्योंकि वे विजेता थे। किन्तु २१ वीं शताब्दी के लोकतान्त्रिक गणतंत्र भारत में बहुसंख्यक वर्ग को ब्लेक मेल नहीं किया जा सकता। इसीलिए २० वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण और २१ वीं शताब्दी में उसकी प्रतिक्रिया 'उग्र राष्ट्रवाद' के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। परिणामस्वरूप इन दिनों हिंदुत्व की आवाज कुछ ज्यादा ही बुलंद है। अंधराष्ट्रवादियों का सत्ता में आना भी एक ऐतिहासिक और आवश्यक प्राकृतिक घटना है। आइंदा यह सत्ता हस्तांतरण या परिवर्तन तब तक सम्भव नहीं जब तक कि अल्पसंख्यक वर्ग खुद राष्ट्रवादी नहीं हो जाता! जब तक वे खुद तीन तलॉक , चार शादी तथा परिवार नियोजन पर वैज्ञानिक दॄष्टि नहीं अपनाते तब तक भारत में बहुसंख्यक वर्ग को उदारवाद की ओर मोड़ पाना असम्भव है। जब तक अल्पसंख्यक वर्ग आतंकवाद का खुलकर विरोध नहीं करता ,जब तक वे अयोध्या ,काशी मथुरा का मोह नहीं छोड़ देते,तब तक भारत में 'संघ परिवार' ही सिरमौर रहेगा। किन्तु यदि अल्पसंख्यक वर्ग ने पुरातनपंथी कटटरता छोड़कर अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण को हरी झंडी दे दे और देश के संविधान को मजहब से ऊपर मान ले तो  भारत में धर्मनिरपेक्षता समाजवाद का झंडा बुलंद होने से कोई नहीं रोक सकता। बिना रामलला मंदिर बने,बिना कश्मीर से आतंकवाद खत्म होने और  शांति स्थापित हुए बिना भारत से कटटर हिन्दुत्ववाद को द्रवीभूत नहीं किया जा सकता। जब तक मुसलमान मुख्यधारा से खुद नहीं जुड़ते तब तक कटटरपंथियों को सत्ताच्युत कर पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं !