गुरुवार, 6 अगस्त 2026

वामपंथ का विचारधारा वैचारिक दोगलापन

 पूरी दुनिया में जहां-जहां इस्लामिक शासन आया तो उन्होंने सबसे पहला काम किया वामपंथ को पैरो तले कुचलने का. आज किसी भी इस्लामिक देश में औकात नही वामपंथ सर उठा सके. सर तन से जुदा कर दिया जाता हैं वामपंथी का. वामपंथी को देश और संकृति के लिए सबसे बड़ा खतरा और गद्दार समझती हैं इस्लामिक सत्ता. यही कारण हैं की भारत के वामपंथ की विचारधारा वैचारिक दोगलापन वाली विचारधारा हैं.

भारतीय वामपंथी सनातन देवी-देवताओं पर अमर्यादित टिप्पणी करता हैं, ब्राह्मणवाद से आजादी की बात करता हैं, भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध को काल्पनिक बता कर उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता हैं. लेकिन भारतीय वामपंथियो के मन इस्लामिक कट्टरवाद और कट्टरपंथ का इतना डर बैठा हैं कि भारतीय वामपंथ राम को काल्पनिक बताता है और अल्लाह के अस्तित्व को मानता हैं. भारतीय वामपंथ हिंदु महिलाओं को पितृसत्तात्मक सोच से आजादी, कपड़ों से आजादी, मेरी देह मेरी मर्जी की बात करता हैं, हिंदु बेटियों के लीव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यभिचार में रहने की आजादी की बात करता है, वहीं मुस्लिमों के तीन तलाक का समर्थन करता हैं, हलाला का समर्थन करता हैं,मुस्लिम महिलाओं के बुर्का का समर्थन करता हैं. ये भारतीय वामपंथ के वैचारिक दोगलापन का चेहरा है.
भारतीय वामपंथी महिलाएं और लड़कियां जब हिंदू धर्म में रहेगी कपड़े की आजादी के नाम पर नाम मात्र के कपड़े पहन कर घूमती हैं, पूजा-पाठ नही करती हैं, लेकिन जैसे ही किसी मुस्लिम से शादी करती है बुर्का में आ जाती है और नमाज पढने लगती है. उदाहरण स्वरा भास्कर. जब वह हिंदु/ बौद्ध थी तब की तस्वीर जब वह इस्लाम अपना ली तबकी तस्वीर.
नोट:- इस्लामिक कट्टरवाद और कट्टरपंथ से वामपंथियो की फटती है क्योंकि इस्लामिक देशों ने वामपंथ को पैरो तले कुचल दिया जबकि हिंदू सहिष्णुता के कारण कुछ नही बोलता इसलिए ये हिंदुत्व पर टीका और टिप्पणी करते हैं. वर्तमान भारतीय वामपंथ हिंदुत्व के लिए सांप से ज्यादा खतरनाक है.
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एक विकेट गिरने से पूरी टीम ऑल आउट नहीं होती।”

 केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया. कुछ लोग ऐसे उछल रहे हैं, जैसे उन्होंने पूरी सरकार गिरा दी हो. यहाँ तक कि कुछ भाजपा समर्थक भी राजनीतिक शीघ्रपतन के शिकार हो गए हैं.

थोड़ा ठहरिए राजनीति को रील और मीम की स्पीड से मत समझिए. मोदी–शाह और संघ की राजनीति न तो फेसबुक की पोस्ट पढ़कर चलती है, ना इंस्टाग्राम के ट्रेंड देखकर और ना ही किसी क्रैश कोर्स से. ये लोग Gen-Z के बाप नहीं, Gen-Z के दादाजी हैं.
इनका लक्ष्य चुनाव जीतकर आज की हेडलाइन बनना नहीं है. इनका लक्ष्य है अगले 50 साल तक सत्ता और संगठन पर पकड़ बनाए रखना. इसलिए राजनीति में हर कदम भावनाओं से नहीं, टाइमिंग और रणनीति से उठाया जाता है. प्रधानमंत्री ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किया है. यह फैसला NEET-UG में पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों के बीच आया है.
सरकार ने जांच CBI को सौंपी, पुनः परीक्षा कराई और परीक्षा व्यवस्था में बदलावों की घोषणा भी की.
अब कोई इसे सरकार का झुकना बता रहा है.
कोई डरना बता रहा है. और कोई इसे सरकार की हार बता रहा है. लेकिन राजनीति में हर कदम को कमजोरी समझ लेना सबसे बड़ी राजनीतिक नासमझी है.
कभी-कभी 50 साल की रणनीति बनाने वालों को 50 दिन की लड़ाई में एक कदम पीछे भी हटना पड़ता है, क्योंकि लक्ष्य अगर लंबा हो,
तो हर मोर्चे पर सिर भिड़ाना रणनीति नहीं मूर्खता होती है.
पहले भी राष्ट्रवादी समर्थकों ने सवाल उठाए हैं
बंगाल में राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगाया ?
महबूबा मुफ्ती को समर्थन क्यों दिया ?
कम सीटों के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री क्यों बनाया ?
ऑपरेशन सिंदूर को रोकने का फैसला क्यों लिया ?
हर बार कुछ लोगों ने कहा “सरकार झुक गई!”
लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है, हर समझौता हार नहीं होता. हर पीछे हटना डर नहीं होता, और हर इस्तीफा सरकार गिरने का प्रमाण नहीं होता. कभी-कभी इसे स्पीड ब्रेकर पर गाड़ी धीमी करना कहते हैं, गाड़ी बंद करना नहीं.
हाँ इस पूरे मामले में सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक गलती यह जरूर रही कि जब परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे, तभी जिम्मेदार अधिकारियों और परीक्षा तंत्र पर तुरंत और कठोर कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए थी. अगर शुरुआती स्तर पर ही
• परीक्षा तंत्र की जवाबदेही तय होती,
• जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती,
• पेपर लीक नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जाता,
• दोषियों और लाभार्थियों पर तेजी से कार्रवाई होती, तो मामला इतना बड़ा राजनीतिक संकट शायद नहीं बनता. क्योंकि जनता को सबसे ज्यादा गुस्सा गलती से नहीं आता. गलती के बाद दिखाई देने वाली देरी, चुप्पी और अस्पष्टता से आता है.
अब देखना यह है कि यह इस्तीफा केवल चेहरे का बदलाव बनकर रह जाता है, या परीक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार की शुरुआत करता है. असली सवाल यह नहीं है की “धर्मेंद्र प्रधान गए या नहीं ?” असली सवाल यह है
कि क्या अगली बार किसी छात्र का भविष्य
एक पेपर लीक माफिया के हाथों बिकेगा तो नहीं ?
जहाँ तक भाजपा के कोर वोटर का सवाल है, वह हर राजनीतिक घटनाक्रम से इतनी आसानी से विचलित नहीं होता. विचलित होता है तो वह वोटर जो राजनीतिक रूप से पेंडुलम की तरह इधर से उधर झूलता है. और राजनीति के पुराने खिलाड़ी जानते हैं- पेंडुलम को कैसे रोका जाता है, कब रोका जाता है और किस मुद्दे पर रोका जाता है.
इसलिए मेरे हिसाब से ना सरकार हारी है, ना सत्ता बदल गई है, ना भाजपा खत्म हुई है.
बस एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया गया है की जनता नाराज़ हो तो सरकार उनकी सुन भी सकती है और लोकतंत्र में अगर सरकार जनता की नहीं सुनेगी तो फिर किसकी सुनेगी ?
जो लोग आज इसे सरकार की हार समझकर जश्न मना रहे हैं उन्हें राजनीति का एक पुराना नियम याद रखना चाहिए...
“एक विकेट गिरने से पूरी टीम ऑल आउट नहीं होती।”

 सनातन धर्म की रक्षा हेतु, बंगाल की जनता ने जिन्हें चुना, उन महान हिंदू वीर शुभेंदु अधिकारी को संत समाज का भरपूर आशीर्वाद

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