बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

प्रजातंत्र की सूरत डरावनी है!

इस दौर की असली सूरत बेहद डरावनी है।
वेशभूषा भले आकर्षक और लुभावनी है।।
पूंजीवादी लुटेरों की लूट यथावत कायम हैं ,
वैश्विक बाजारीकरण की तस्वीर डरावनी है!
शासन-प्रशासन,पुलिस प्रहरी-सेनाएं बढ़ रहीं,
किंतु संसदीय प्रजातंत्र की सूरत डरावनी है!!
सूचना संचार क्रांति की असीम अनुकम्पा से,
सोशल मीडिया का दुरुपयोग भयदायनी है।
जो साम्प्रदायिकताको ओढ़े और जातिको बिछाये,
लोकतांत्रिक राज्यसत्ता उसकी अंकशायनी है!!

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