शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

मानस के हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।

  1. यद्द्पि साहित्यिक विरादरी पूरी की पूरी विप्लवी या शहीद भगतसिंह और कार्ल मार्क्स जैसी सोच वाली नहीं है! हर जनवादी कवि लेखक साहित्यकार, माओ -लेनिन के उसूलों वाला ही हो यह भी जरूरी नहीं है। इस दौर में जो गौतम बुद्ध, बाबा सा. अमबेडकर और कार्ल मार्क्स की जुडवा वैचारिक छाँव में सृजन शील है वही असल वामपंथी साहित्यकार है! वेशक विशुधद जातीय विमर्श वादी हैं ,कुछ पूँजीवाद के आलोचक हैं ,कुछ केवल स्त्री विमर्शवादी हैं। बचे खुचे बाकी सब पूरे सौ फीसदी दक्षिणपंथी प्रतिक्रयावादी हैं...। यदि दस- बीस फीसदी साहित्यकार अपनी सही भूमिका अदा कर रहे हैं ,जो कि उनका सहज सैद्धांतिक स्वभाव और दायित्व भी है तो उन्हें गौरी लंकेश, कलिबुरगी, पानसरे या दाभोलकर की तरह नेस्तनाबूद किया जाना, केवल प्रतिक्रियावादी हिंसा नहीं है !बल्कि यह वर्ग युद्ध में शहादत भी है! वैसे भी हर मुश्किल दौर में जो कुछ बलिदान करने की क्षमता रखते हैं , हीरो भी वही हुआ करते हैं। इस विषम दौर में भारत के असली हीरो वही हैं जो सत्ता को आइना दिखा रहे हैं।और बलिदान दे रहे हैं!

रविवार, 23 जुलाई 2017

हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े

अधिकांश धर्मप्राण हिन्दू जन अपने हिन्दू संगठन या हिन्दूवादी नेताओं में अगाध अंध श्रद्धा रखते हैं। ऐंसे अंधश्रद्धालु हिन्दू जन अपने हिंसक और बैर बढ़ाऊ धार्मिक नेताओं को चुनावों के माध्यम से राजनैतिक सत्ता सौंप देते हैं। इस प्रवृत्ति को असंवैधानिक तो नहीं कहा जा सकता ,क्योंकि अरब राष्ट्रों की कटटर मजहबी सरकारें तो इनसे कई गुना साम्प्रदायिक और अलोकतांत्रिक हैं। फिर भी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान में निहित लोकतंत्र की अवधारणा अनुसार, भारत की राजनीती में यह जातीय मजहबी आचरण नितांत निंदनीय है।  हिंदूवादी नेता यथार्थवाद ,प्रगतिवाद और  साइंस के जन्मजात विरोधी होने से देश और समाज को प्रतिगामी राह पर धकेलते जाते हैं। यही वजह है कि चीन और पाकिस्तान से सीमाओं पर चल रही तकरार को सैन्यबल अथवा कूटनीति से निपटाने के बजाय,ये हिंदूवादी साम्प्रदायिक नेता आवाम को सलाह दे रहे हैं कि आध्यत्मिक मन्त्र शक्ति से चीन और पाकिस्तान को भस्म करने का आयोजन करें ! भारत की दिगभ्रमित आवाम को और अल्पसंख्यक समुदाय को समझना होगा कि संघ परिवार से सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को खतरा है।

अधिकाँस अल्पसंख्यक जन समुदाय और धर्मनिपेक्षतावादी लोग हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की एकजुटता ,उनके संगठनों और उनकी प्रतिगामी बातों का तो विरोध करते हैं ,किन्तु वे अल्पसंख्यक संगठनों और उनके मजहबी नेताओं का रंचमात्र प्रतिवाद नहीं करते। वे हिन्दू धर्म को तो आरएसएस की जागीर समझकर उनपर संदेह करते हैं,किन्तु अपने कटटरपंथी मुल्ला मौलवियों से विज्ञान आधारित बहस मुसाहिबा नहीं करते। अधिकांश हिन्दू संत ,महात्मा,महामंडलेश्वर और शंकराचार्य लोग हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई,बौद्ध ,जैन पारसी- सभी धर्मों का आदर करना सिखाते हैं। जबकि देवबंदी अथवा अन्य अल्पसंख्यक उलेमा और उनके अनुयायी केवल इस्लाम का ही अनुशीलन और आदर सिखाते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की नजरमें खुदके याने अल्पसंख्यकों के जुझारू संगठन तो ठीक हैं,और सिमी जैसे संगठनों की अवैध गतिविधियों भी ठीक हैं,लेकिन मोहन भागवत या नरेंद्र मोदी ठीक नहीं। अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ कटटरपंथी ही नहीं बल्कि अमनपसंद आमजन भी अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर तो खूब हल्ला करते हैं ,लेकिन गोधरा काण्ड,सिम्मी,अलकायदा और आईएसआईएस की हरकतों पर चुप्पी साध लेते हैं। अधिकांश अल्पसंख्यक नरनारी मजहबी तौर पर शोर शराबा और राजनीतिक आक्रामकता का भौंडा प्रदर्शन करते रहते हैं। इस तरह की मानसिकता से हिन्दू कौम भी 'हर हर मोदी' चिल्लाने लगती है। हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े यदि आपस में इसी तरह अड़े रहे, तो देश का जो होगा सो होगा किन्तु दोनों कौम की भावी पीढ़ियों का भविष्य भी अच्छा नहीं होगा।
जो लोग वर्तमान मोदी सरकार को चरम हिंदूवादी मान रहे हैं वे जरूरत से ज्यादा  वितंडा खड़ा कर रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की चालों से मौजूदा सरकार खुद बेहद आक्रान्त है। जो लोग इस सरकार या उसके समर्थकों की डींगों से आहत हैं वे यह ख़याल में लाएं कि जिनके नेतत्व का आलम यह है कि सीमा पर हर रोज आधा दर्जन जवान शहीद हो रहे हों और नेता यज्ञ,अनुष्ठान ,मन्त्र जाप से शत्रु देश को पराजित करने के लिए ज्योतिष विभाग और  को स्तर क्या है ?चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !

भारत में सत्तारूढ़ नेताओं द्वारा तथा अफसरों द्वारा धनाड्य वर्ग के रिश्तेदारों एवं उनकी ओलादों को उपकृत किये जाने की परम्परा कोई नयी या आकस्मिक घटना नहीं है।सिर्फ लालू यादव का परिवार ही भ्रस्ट नही है! हर्षद मेहता,बंगारू,जुदेव, एदुरप्पा , रेड्डी बंधु ,विजय माल्या,सुब्रतो सहारा,ललित मोदी,करूँणाकरन, डीएम् के परिवार, जय ललिता इत्यादी भी हांडी के दोचार चावल मात्र हैं !असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !
मानव सभ्यता के इतिहास में सबल मनुष्य द्वारा निर्बल मनुष्य का शोषण ,सबल समाज द्वारा निर्बल समाज का शोषण और सबल राष्ट्र द्वारा निर्वल राष्ट्र के शोषण का सिलसिला जितना पुराना है। भाई-भतीजावाद और भृष्ट तत्वों के अनेतिक संरक्षण का इतिहास भी उतना ही पुराना है। भ्रस्टाचार का यह दस्तूर आजादी और लोकतंत्र से भी पहले से इस भूभाग पर चला आ रहा है। इसका सिलसिला तो तुगलकों, खिुलजियों और सल्तनतकाल जमाने से ही चला आ रहा है ।
जब सात समंदर पार से योरोपियन व अंग्रेज पधारे तो उन्होंने भी २०० साल तक भारतीय जनता को 'क्लर्क' के लायक ही समझा। वह भी तब ,जब १८५७ की क्रांति या विद्रोह असफल हुआ और महारानी विक्टोरिया हिन्दुस्तान की मलिका बनी ! क्वीन् ने देशी हिन्दुस्तानियों को और कुछ देशी राजाओं को अपनी नौकरशाही में छोटे पदों पर 'सेवाओं' की इजाजत दी।बाद में उन्हीं में से कुछ वकीलों और बॅरिस्टरों ने देश को आजाद कराने का सपना देखा!
आजादी के बाद कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने तथा देश के चालाक सभ्रांत वर्ग ने इसी परम्परा को परवान चढ़ाया।
आज विपक्ष में आकर कांग्रेस हरिश्चंद्र बन रही है। लेकिन उसका अतीत बेदाग नही है !एमपी में व्याप्त व्यापम के खिलाफ कांग्रेस ने कोई खास आंदोलन नही किया !विगत भारत बंद में भी उसने केवल 'वाम मोर्चे' की नकल की है।
इसी कांग्रेस के ६० सालाना दौर में आजादी के बाद वर्षों तक देशी पूंजीपतियों -भूस्वामियों और कांग्रेस के नेताओं के खानदानों को ही शिद्द्त से उपकृत किया जाता रहा है। एमपी और छग में द्वारिकाप्रसाद मिश्रा से लेकर शुक्ल बंधूओं तक ,अर्जुनसिंह से लेकर ,प्रकाश चंद सेठी तक , शिव भानु सोलंकी , सुभाष यादव और जोगी से लेकर दिग्विजयसिंह तक कोई भी उस 'अग्निपरीक्षा' में सफल होने का दावा नहीं कर सकता। जिसके लिए उन्होंने बार-बार संविधान की कसमें खाईं होंगी कि -''बिना राग द्वेष,भय, पक्षपात के अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा ......." !
अब यदि मोदी युग में 'संघ परिवार' वाले और उसके अनुषंगी भाजपाई भी उसी 'भृष्टाचारी परम्परा' का शिद्द्त से निर्वाह किये जा रहे हैं ,जो परम्परा और 'कुलरीति' कांग्रेस ने बनाई है तो किसी को आश्चर्य क्यों ? सवाल किया जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है ? जो लोग कभी कांग्रेस को 'चोर' कहा करते थे वही लोग इन दिनों भाजपा को 'डाकू' कहने में जरा भी नहीं हिचकते। चोर और डाकु में जो भी फर्क है वही कांग्रेस और भाजपा का चारित्रिक अंतर है।
कुछ लोगों को इन दोनों में एक फर्क 'संघ' की हिंदुत्व वादी खंडित मानसिकता का ही दीखता है। वैसे तो कांग्रेस ने पचास साल तक पैसे वालों व जमीन्दारों को ही तवज्जो दी है। किन्तु यूपीए के दौर में वाम के प्रभाव में कुछ गरीब परस्त काम भी किये गए। यदि आज आरटीआई ,मनरेगा और मिड डे मील दुनिया में प्रशंसा पा रहे हैं तो उसका कुछ श्रेय तो अवश्य ही वामपंथ को जाता है । लेकिंन जनता को और मीडीया को कांग्रेस और भाजपा से आगे कुछ भी नजर नही आता !

रविवार, 16 जुलाई 2017

नौरत्नों की हत्या का राष्ट्रघाती संकल्प !

कुछ सत्ता शुभचिंतकों और दकियानूसी अंधभक्तों को हमेशा शिकायत रहती है कि कुछ लेखक,कवि,और पत्रकार सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिकूल अप्रिय सवाल क्यों उठाते हैं ? ये पढ़े लिखे विवेकशील लोग भी अंधभक्तों की तरह 'भेड़िया धसान' होकर सत्ता समर्थक जयकारे में शामिल क्यों नहीं हो जाते ? एतद द्व्रारा उन अभागों को सूचित किया जाता है कि मौजूदा शासकों से उनकी कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है। मोदीजी जब पहली बार संसद पहुंचे और सीढ़ियों को मत्था टेका,तब वे सभी को अच्छे लगे!जब कभी उन्होंने राष्ट्रीय विकास की बात की ,युवाओं के भविष्य की बात की ,विदेश में जाकर हिंदी का मान बढ़ाया ,और जब वे नामवरसिंह जैसे वरिष्ठ साहित्यकार को प्रणाम करते दिखे तब भी मोदीजी सभी को प्रिय लगे !लेकिन सवाल किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि या विमर्श का नहीं है। सवाल समग्र राष्ट्र के, समग्र समाज के हित का है !और इस कसौटी पर मोदी सरकार नितांत असफल होती जा रही है। इन हालात में भारत के प्रबुद्ध जन यदि मौजूदा शासन प्रशासन के कामकाज पर पैनी नजर रखते हैं,उसकी तथ्यपरक शल्य क्रिया करते हैं और वैकल्पिक राह सुझाते हैं तो उनको गंभीरता से लिया जाना चाहिए ! उनका सम्मान किया जाना चाहिए। बजाय इसके कि अंधभक्त लोग विपक्ष एवं आलोचकों से गाली गलौज करें !

देश के राजनैतिक विपक्ष को कमजोर बनाने वाले आमजन मूर्ख हैं। वैसे भी भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति किसी आपातकाल से बेहतर नहीं है। यदि राष्ट्रपति 'यस सर'की प्रवृत्ति वाला होगा तो कहीं भी कभी भी साइन कर देगा। देश में फिलवक्त शिकायत सिर्फ साम्प्रदायिक हिंसा की,अल्पसंख्यक असुरक्षा की और प्रतिगामी कुचाल की ही नहीं है। बल्कि मोदी सरकार ने नीति आयोग की अनुशंसा के तहत भारत के प्रमुख नौरत्नों की हत्या का संकल्प भी ले रखा है। जिन नवरत्नों ने अतीत में भारत को कभी भी आर्थिक मंदी में फिसलने नहीं दिया,जिन नौरत्नों की बदौलत हमारे नेता  इतराते फिरते हैं उन सार्वजनिक उपक्रमों को अब मौजूदा मोदी सरकार ठिकाने लगाने जाए रही है। मोदी सरकार खुद की कंपनियों को चूना लगा रही है और उसने रिलायंस के मैनेजरों को ठेका दिया है कि वे  देश के नौरत्नों को शीघ्र ठिकाने लगाएं ! देश के वर्तमान शासकों ने अपने ही वतन के आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की सुपारी देशी विदेशी बदमाश पूँजीपतियों को दे रखी है. इससे न केवल लाखों मजदूरों का अहित होगा,न केवल वेरोजगारी बढ़ेगी, बल्कि राष्ट्र की वित्तीय स्थति की अनिश्चितता भी बढ़ेगी और स्थिति भंवर में होगी। नवरत्न रुपी राष्ट्रीय धरोहर की स्वायत्तता खत्म होते ही वे खुद ख़त्म हो जायेंगे।

राजनीती के एरिना में जो लोग बात बात पर 'हर हर मोदी' करते रहते हैं और जो लोग बात बात में 'अल्लाहो अकबर' घुसेड़ते रहते हैं, ये निम्न कोटि के उजबक कलंकी इतिहास के खंडहरों की भटकती दुरात्माएं हैं।  मेहनतकश आवाम को 'हंस' की मानिंद खुद ही नीर क्षीर करना आना चाहिए ,कि क्रांति की लौ बुझने न पाए। इस बाबत युवा सुशिक्षित पीढ़ी को क्रांतिकारी विचारों  की थाती संभालना चाहिये और अन्याय शोषण के खिलाफ संघर्ष की गगनभेदी आवाज बुलंद करनी चाहिए। वर्तमान युवा पीढ़ी को इस बाबत  देश और दुनिया का आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक और क्रांति संबंधी  अध्यन अवश्य चाहिए।     

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

यदि मैं एमपी का सीएम होता तो ८०० करोड़ का हेलीकाप्टर खरीदने बजाय, बाइक से गाँव गाँव फेरी लगाता !मानसून बिचलन से जिन किसानों की फसल सूख गई या दुबारा - तिबारा खरीफ की बोनी में अड़चन आई है ,मैं उनकी मौके पर ही पैसे से, बीज से, खाद से, मदद करता !श्रीराम तिवारी !

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...: मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी और ट्रेड यूनियन के साथी अक्सर कहा करते थे कि ''जिस तरह प्राकृतिक रूप से गंगा मैली नहीं है बल्कि उसे कुछ...

चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो !


मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी और ट्रेड यूनियन के साथी अक्सर कहा करते थे कि ''जिस तरह प्राकृतिक रूप से गंगा मैली नहीं है बल्कि उसे कुछ गंदे लोग मैला करते रहते हैं ,उसी प्रकार यह राजनीति भी जन्मजात गन्दी नहीं है, बल्कि स्वार्थी लोग ही इसे गंदा करते रहते हैं। जिस तरह धर्मांध और संकीर्ण लोग पवित्र गंगा नदी को गटरगंगा बनाने में जुटे रहते हैं ,उसी तरह अधिकांश फितरती, धूर्त लोग इस राजनीतिक गंगा को भी गटरगंगा बनाने में जुटे रहते हैं।  दुष्ट प्रवृत्ति लोग सत्ता में आने के लिए जाति,धर्म-मजहब और 'राष्ट्रवाद' का वितंडा खड़ा करते हैं, लोक लुभावन वादे करते हैं। और जब ये सत्ता में आजाते हैं तो वे खुद  और उनके सहयोगी भस्मासुर बन जाते हैं। जब चुनावी वादे पूरे नहीं हो पाते हैं ,तो वे नए-नए बहाने खोजने लगते हैं। इनकठिन हालात में जनता की एकजुटता ही देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकती है। अकेले सैन्य बलों की, किसी नेता विशेष की, राजनैतिक दल की क्षमता  नहीं कि हर समय सीमाओं की रक्षा कर सके ! इसीलिये राष्ट्रहित में जनता को जागरुक रहना बहुत ज़रूरी है!और अतीत के समग्र इतिहास का विंहगावलोकन भी बहुत जरुरी है।

 विगत जुलाई -२०१७ को अमरनाथ य़ात्रा की ज़िस बस के सात यात्री मारे गये, वह बस अवैध रूप से गुजरात से ही चलाई गई थीं!इतना ही नही वह बस अनंतनाग वाले रूट पर शाम के बाद दबंगई पूर्वक आगे बढाई गई!केन्द्रिय मंत्रियों ने सेन्य बलों की चूक बताया है! इस प्रकरण में मिलिट्री लापरवाह सिद्ध हूई है या स्थानीय पुलिस दोनों किन्तु सरकार और उसके भक्त यह न भूलें कि कहावत वही चरितार्थ हुई है की ''बस्तु न राखे  आपनी ,चोरे गाली देय ''!किसी भी
नीतिविहीन रीढ़विहीन नेतत्व में कूबत नहीं कि के प्रमाद से देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सके। जो नेतत्व अपनी असफलता से उतपन्न जनाक्रोश से बचने के लिए घटिया तरकीबें खोजने में जुटा हो,जो नेतत्व अपने देश की सीमाओं पर दुश्मन देश के हमले रोकने में लगातार नाकाम रहा हो,जो नेतत्व अपनी खीज और -खिसियाहट निकालने के लिए सिर्फ 'बातों का धनी ' हो ,जो नेतत्व अपने देश के लोगों को अँधेरे में रखकर रातों-रात शरीफ के घर जाकर चाय पीता रहा हो, जो नेतत्व अतीत में केवल डींगे मारता रहा हो ,जो नेतत्व अपनी असफलता की शर्मिंदगी ढकने की कुचेष्टा करने में लगा हो ,ऐसे नेतत्व के 'मन की बात' पर विश्वास करना आत्मघात है।
जनता को चाहिये कि वह किसी खास तुर्रमखां के भरोसे न रहे। जो चौकीदार सोते हुए मार दिए जाएँ ,जनता उनके भरोसे कदापि न रहे। देशके सभी नर-नारी और सरकारी सेवक अपनी-अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करें। पुलिस ,डाक्टर,अफसर ,वकील ,बाबू और जज संकल्प लें कि भारत का गौरव और आत्मबल बढ़ाने के लिए न रिश्वत देंगे, न रिश्वत लेंगे। जनता स्वयमेव इसका अनुशरण करे। देशके नेता और दल भी राष्ट्रीय संकट मानकर 'देशभक्तिपूर्ण आचरण करें !
 
जिन मिलिट्री वालों ने विगत कुछ साल पहले इंदौर में उधम मचाया ,वियर बार में लड़कियों को छेड़ा ,विजयनगर थाना तोडा था और जिन्होंने ऋषिराज हॉस्टल के निर्दोष छात्रों को वेवजह कूटा ,जिन आर्मी अफसरोंने महू से लेकर इंदौर विजयनगर तक -राह चलते सिविलियन को कुत्ता समझकर मारा-पीटा ,वे मिलिटरीवाले अब अपना शौर्य -जौहर पाकिस्तान के खिलाफ क्यों नहीं दिखाते ? हमारे ये जाँबाँज फौजी क्यों नहीं पाकिस्तान के किसी आर्मी बेस पर वैसा ही हमला कर देते ,जैसा की पाकिस्तान के फौजी भारतके खिलाफ पठानकोट पर,उरी सेक्टर और उधमपुर में करते हैं ? हमारे बहादुर फौजी अफसर अपने बाहुबल का जौहर सिविलियन भाइयों पर दिखने के बजाय या पुलिसपर दिखाने के बजाय सीमाओं पर जाकर क्यों नहीं दिखाते ? सीमाओं पर अधिकांस भारतीय फौजी सोते हुए ही क्यों मारे जाते हैं ? उरी के आर्मी बेस तक पहुँचने वाले पाकिस्तानी आतंकियों को किसी जागते हुए भारतीय फौजी के दर्शन क्यों नहीं हुए ? इन सवालों से मुँह मोड़कर ,'राष्ट्रवाद' की कोरी डींगे हांकने से पाकिस्तान के मंसूबों को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान को नाथना है तो ' इंदिरा गाँधी 'से सीखो ! जनरल मानेकशा से सीखो ! बहादुर शास्त्री से सीखो !उन तमाम भारतीय फौजियों और जनरलों सीखो जिन्होंने १९७१ में पाकिस्तान फ़तेह किया था।

इंदिराजी ने सिर्फ भारतीय सेना के भरोसे पाकिस्तान से पंगा नहीं लिया था। उन्होंने बँगला देश के मुजीव जैसे नेताओं और बँगला मुक्तिवाहनी को आगे करके , सोवियत संघ की ताकत को यूएनओ में इस्तेमाल करके,भारत के पूंजीपति वर्ग को पाकिस्तान की आर्थिक नाके बंदी में झोंककर , १९७१ में पाकिस्तान को चीर डाला था। तब भारतीय सेना की भूमिका बहुत शानदार रही थी । आज के फौजी जनरल अपने प्रमोशन जन्म तिथि परिवर्तन के लिए मुकदद्मे बाजी करते हैं और फिर मंत्री बन जाते हैं। इस दौर के पूँजीपति और व्यापारी सिर्फ अपनी दौलत बढ़ाने में व्यस्त हैं । ये सिर्फ मुनाफाखोरी ,मिलावट ,कालाधन और मेंहगाई ही बढ़ाते रहते हैं। मौजूदा नेतत्व की तदर्थ और अनिश्चयवाली नीतियों के कारण भारत खतरे में है। सत्ता पक्ष को सिर्फ कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए , विपक्ष को 'संघ' मुक्त भारत चाहिए ,जातिवादियों को आरक्षण चाहिए ! धर्म-मजहब वालों को 'नरसंहार' बहाना चाहिए। जनता को यदि बाकई अमन-खुशहाली चाहिए तो आइंदा चुनावों में कोई  सच्चा देशभक्त नेतत्व ही चुने ! बड़बोले जुमलेबाजों से बचकर रहे। इसके साथ -साथ इस भृष्ट सिस्टम को भी तिलांजलि देनी होगी। तभी भारत की सीमाओं पर स्थाई शांति हो सकेगी।

किसी भी क्रांति के बाद ईजाद एक बेहतर सिस्टम तभी तक चलन में जीवित रह सकता है ,जब तक अच्छे लोग राजनीति में आते रहें। और जब तक कोई 'महान क्रांति'का आगाज न हो जाये ! इसके लिए देशभक्ति वह नहीं जो सोशल मीडिया पर दिख रही है। बल्कि सच्ची देशभक्ति वह है कि हम अपना -अपन दायित्व निर्वहन करते हुए कोई भी ऐंसा काम न करें जिससे देश का अहित हो। सरकारी माल की चोरी ,सराकरी जमीनों पर कब्जे, आयकर चोरी,निर्धन मरीजों के मानव शरीरअंगों की चोरी ,हथियारों की तस्करी ,मादक द्रव्यों की तस्करी और शिक्षा में भृष्टाचार इत्यादि हजारों उदाहरण है जहाँ देशद्रोही बैठे हैं। इनमें से अधिकांस लोग अपने पाप छिपाने के लिए सत्ताधारी पार्टी के साथ हो जाते हैं। इसलिए सत्ताधारी पार्टी का नैतिक और  चारित्रिक पतन तेजी से होने लगता है।

मुझे भली भांति ज्ञात है कि मेरे कुछ खास मित्र ,सुहरदयजन , शुभचिंतक और सपरिजन लोग मेरे आलेखों को खूब पंसद करते हैं । लेकिन जो पसंद नहीं करते हैं वे सिर्फ इसलिए प्रशंसा के पात्र नहीं हैं कि वे ढपोरशंखी नेताओं पर भरोसा करते हैं। हालांकि वे लोग आदर और सम्मान के पात्र हैं कि जिनका नजरिया वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है और जो सत्य,न्याय के साथ हैं ! मेरे आलेख और कविताएँ नहीं पसंद करने वालों को मैंने तीन श्रेणियों में बाँटा है। एक तो वे जो यह मानते हैं कि राजनीति ,आलोचना और व्यवस्था पर सवाल उठाना उन्हें पसंद उन्हीं। दूसरे वे जो घोर धर्माधता के दल-दल में धसे हुए हैं और जो साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा निर्देशित सोच से आगे कुछ भी देखना-सुनना ,पढ़ना नहीं चाहते, सांसारिक तर्क-वितरक पर कुछ भी लिखना -पढ़ना नकारात्मक कर्म समझते हैं । तीसरे वे निरीह प्राणी हैं जो कहने सुनने को तो वामपंथी राजनीति में नेतत्व कारी भूमिका अदा करते हैं ,किन्तु व्यवहार में वे दक्षिणपंथी कटटरपंथ के आभाषी प्रतिरूप मात्र हैं। राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की उनकी समझ बड़ी विचित्र है। उन्हें हर अल्पसंख्य्क दूध का धुला नजर आताहै ,किन्तु हर हिन्दू धर्मावलम्बी उन्हें पाप का घड़ा दीखता है। पता नहीं दास केपिटल के किस खण्ड में उन्होंने पढ़ लिया कि भारत के सारे सवर्ण लोग जन्मजात बदमास और बेईमान हैं। न जाने उनकी नजर में हरेक आरक्षण धारी,दूध का धुला और परम पवित्र क्यों हैं? 
भारत में संकीर्ण मानसिकता के वशीभूत होकर दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों धड़े एक-दूसरे को फूटी आँखों देखना पसन्द नहीं करते। वामपंथ के दिग्गज,नेताओं,प्रगतिशील साहित्यकारों को लगता है कि धरती की सारी पुण्याई सिर्फ उनके सिद्धांतों,नीतियों और कार्यक्रमों में ही निहित है। दक्षिणपंथी सम्प्रदायिक खेमें के विद्व्तजन गलतफहमी में हैं कि भारतीय 'राष्ट्रवाद'उनके बलबूते पर ही कायम है और देश के अच्छे-बुरे का भेद सिर्फ वे ही जानते हैं । मेरा अध्यन और अनुभव कहता है कि 'लेफ्टफ्रॉन्ट'के पास जो 'सर्वहारा अंतर्राष्टीयतावाद का सिद्धांत है , मानवता के जो सिद्धांत -सूत्र और नीतियाँ हैं, बेहतरीन मानवीय मूल्य हैं और शोषण से संघर्ष का जो जज्वा है ,भारत में या संसार में वह और किसी विचारधारा में ,किसी धर्म-मजहब में कहीं नहीं है। लेकिन वामपंथ में भी अनेक खामियाँ हैं। परन्तु विचित्र किन्तु सत्य यह है कि केवल वामपंथी ही हैं ,जो 'आत्मविश्लेषण'या आत्मालोचना को स्वीकार करते हैं।लेकिन दक्षिणपंथी ,प्रतिक्रियावादी और पूँजीवादी केवल प्रशंसा पसंद करते हैं ,और इसके लिए वे मीडिया को पालते हैं। वे शोषण की व्यवस्था की रक्षा करते हैं, ताकि यह भृष्ट निजाम उनके कदाचरण को ,उनके राजनैतिक,आर्थिक ,सामाजिक और मजहबी हितों की हिफाजत करता रहे। इस तरह वाम- दक्षिण दोनों ध्रुवों में एक दूसरे के प्रति अनादर भाव और अविश्वास होने से भारत में वास्तविक 'राष्ट्रवादी चेतना ' का विकास अवरुद्ध है।
राजनीति का एक रोचक पहलु यह भी है कि इसकी वजह से भारत गुलाम हुआ था, और इसीकी वजह से वह आजाद भी हो गया । इसके अलावा और भी कई उदाहरण हैं कि इसी राजनीति की वजह से दुनिया अधिकांश देशों से क्रूर सामंतशाही -राजशाही खत्म हो गई। और उसकी जगह अब अधिकान्स दुनिया में डेमोक्रेसी अथवा लोकतंत्र कायम है। स्कूल कालेजों में राजनीति पढ़ना,पढ़ाना अलहदा बात है,मौजूदा 'गन्दी राजनीति' को भोगना जुदा बात है। व्यवहारिक किन्तु करप्ट -राजनीति सीखने-समझने के लिए तो भारतमें बहुतेरे संगठन मौजूद हैं। किन्तु राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक राजनीति का ककहरा सीखने के लिए भारत में सरकारी तौर पर कोई शैक्षणिक पाठ्यक्रम नहीं है। आरएसएस जैसे गैर संवैधानिक संगठन जरूर दावा करते हैं कि वे नयी पीढ़ी को राष्ट्रवाद सिखाने के लिए बहुत कुछ ,करते रहते हैं। लेकिन अपनी कट्टरवादी साम्प्रदायिक सोच के कारण वे दुनिया भर में बदनाम हैं। इसके विपरीत भारत का ट्रेड यूनियन आंदोलन काफी कुछ बेहतर सिखाता है। आरएसएस वाले तो केवल हिंदुत्व और राष्ट्रवाद ही सीखते-सिखाते होंगे,लेकिन भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र [सीटू] वाले तो धर्मनिरपेक्ष -राष्ट्रवाद.अन्तर्राष्टीयतावाद,जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षताके साथ-साथ फ्री एन्ड फेयर डेमोक्रेटिक फंकशनिंग की भी शिक्षा देते हैं। वे न केवल देशभक्ति ,शोषण से मुक्ति ,अन्याय से संघर्ष बल्कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सन्निहित सभी दिशा- निर्देशों के अनुशरण की वकालत करते हैं। उनकी स्पष्ट समझ है कि आतंकवाद के जनक साम्राज्यवाद और मजहबी कट्टरता दोनों ही हैं। केवल आतंकवाद की निंदा करने से या पूँजीवाद को कोसने से ये चुनौतियाँ खत्म नहीं होंगी ! जनता का विराट एकजुट जन-आन्दोंलन , उसकी जनवादी 'अंतर्राष्टीयतावादी' चेतना ही मौजूदा मजहबी आतंक और पाकिस्तानी कारिस्तानी से निपटने में सक्षम है। मजहबी आतंकवाद को सर्वहारा अंतर्राष्टीयतावाद ही रोक सकता है। लेकिन जब तक यह आयद नहीं होता तब तक इंदिराजी वाला रास्ता ही सही है। श्रीराम तिवारी

रविवार, 9 जुलाई 2017

उदारीकरण की नीतियों ने भारत को उधारीलाल बना दिया है

निरंतर तदर्थवादी थेगड़े लगाऊ पूँजीवादी आर्थिक नीतियों के कारण ,सस्ते चुनावी हथकंडों के कारण ,जातीय आरक्षण की वैमन्सयता के कारण और पड़ोसी देश -चीन पाकिस्तान की चालों से भारत असुरक्षित हो चला है। भृष्ट राजनीति और अनैतिक व्यापार से भारत का अंदरूनी लोकाचार भी पतित को चुका है। विकास केवल भाषणों और नारों में ही है। असल में तो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक चेहरा बदरंग हो गया है ।केंद्र की उपेक्षा के चलते अधिकांस राज्य सरकारें कंगाली की कगार पर हैं ! नोटबंदी ,१००% एफडीआई और  वस्तु एवं सेवा कर में २८ %  बृद्धि से सरकार को भी कोई उम्मीद नहीं, तभी तो पीएम महोदय, दुनिया भर में आर्थिक 'उधारी' के लिए,हथियारों के लिए और  आतंकवाद के खिलाफ विश्व बिरादरी के समर्थन के लिए रत दिन भटक रहे हैं !

संत कबीर ने सात सौ साल पहले कहा था :-कस्तूरी कुंडल बसे ,मृग ढूंडे वन माहिँ ! ऐंसे  घट घट राम हैं ,दुनिया देखे नाहिं !!  कबीर की इस साखी अथवा  दोहे का मतलब शायद ही मोदीजी को मालूम हो! क्योंकि यदि उन्हें इस दोहे का मतलब मालूम होता तो वे देश की समस्याओं का हल देश में ही ढूंडते ! इस तरह खर्चीली और उबाऊ विदेशी यात्राओं को तोबा करते। यदि इसमें कुछ भी सफलता मिलती तो  सैकड़ों बार भूमंडल की निरर्थक परिक्रमा क्यों करते?उनके आर्थिक सिपहसालारों को और 'वजीर-ऐ-खजाना' जेटली जी को भी शायद यह नहीं मालूम कि संत 'कबीर' साहब क्या संदेश दे गए हैं ?काश वे जानते होते !

भृष्टाचार के खिलाफ यदि मोदी जी बाकई गंभीर हैं,तो उन्हें एक महत कार्य करना चाहिए। केवल  लालू यादव या अखिलेश -मुलायम परिवार ही नहीं बल्कि विगत ७० साल में जो लोग ,राज्यों या केंद्र की सत्ता में रहे हैं -उन सबके आर्थिक सर्वेक्षण किये जाएँ। जो जो संदेहास्पद हो उन सबके यहाँ वेशक छापे डाले जाएँ !अधिकांश पटवारी,रेवेन्यू अफसर, तहसीलदार,वकील, डाक्टर, मंत्री , अफसर ,कलैक्टर, एसपी,आईजी ,कमिश्नर, सेक्रेटरी,राजदूत, सरकारी बिभागों के आला अफसरों ,इत्यादि के निजी और पारिवारिक समपत्ति के आंकड़े देखे जाएँ! पता चल जाएगा कि हर शाख पै उल्लू बैठा है या नहीं !और आजादी का मजा कौन लूट रहा है? खास तौर से पुलिस विभाग, आरटीओ विभाग ,एक्ससाइज,पीडब्ल्यूडी,इनकम टेक्स बिभाग ,सेल टेक्स और अन्य कमाऊ विभागों के वर्तमान एवं रिटायर अफसरों की सम्पत्ति का मीजान भी किया जाये!  ८०% भॄस्ट निकलेंगे ! इन सबकी सम्पत्ति का एक खास हिस्सा राजसात किया जाए ! वैसे भी उदारीकरण की नीतियों ने भारत को उधारीलाल बना दिया है !विदेशों से भीख मांगने के बजाय देशी चोटटों के खीसे में हाथ क्यों न डाला जाए !स्विस बैंकों का पैसा ,माल्याओं का पैसा ,दाऊद का अकूत पैसा ,अम्बानी -अडानी का पैसा ,पैसा ही पैसा ,फिर काहे को गरीब किसानों को आत्महत्या पर मजबूर कर रहे हो साहिब जी ?

भारत एक ऐंसा अमीर देश है जिसमें आर्थिक असमानता प्रचंड है। पूंजीपतियों और धर्म मजहब के ठेकदारों पास बहुत रुपया है। सब कुछ जिसका उधारी के बिना काम नहीं चलता। मोदी जी के पास इतना प्रचंड बहुमत है कि वे देशहित में सम्पत्ति हस्तनांतरण का क़ानून बना सकते हैं !सभी धनाढ्यों,बड़े जमींदारों पास बैंकों पास डूबत खातों का जो अकूत पैसा सड़ रहा है। इसी तरह केरल के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में ,तिरुपति बालाजी ,शिरडी साईँ और तमाम बकफबोर्ड इत्यादि जैसे धर्मादा संसथानों में और देश भर के अनेक धर्म स्थलों,मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों,गिरजाघरों और मठों में अकूत धन भरा पड़ा है। यदि इनसे राजसात में कोई अड़चन है, तो बिना ब्याज के रकम तो उधार मांगी ही जा सकती है। उपरोक्त स्त्रोत और संसाधनों से इतना धन जुट सकता है कि भारत को अमेरिका , इजरायल,जापान,जर्मनी या किसी अन्य देश से उधार  नहीं मांगना पड़ेगा ! वामपंथ को भी इस संदर्भ में उचित मांग उठाकर जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए।
                                                          उपसंहार :-
हालांकि भारतीय वामपंथ अब हाराकिरी याने आत्महत्या की ओर अग्रसर है !तभी तो मोदी सरकार की निरर्थक विदेश यात्राओं पर चुप है। मोदी सरकार की जन विरोधी नीतियों की मुखाल्फत करने के बजाय,पूँजीवादी शोशण के खिलाफ लडने के बजाय ,भारतीय वामपंथ कभी लालू जैसे महाचोर के पक्ष में खड़े हो जाते हैं ,कभी बुरहान बानी जैसे आतंकी की मौत पर सवाल खडा करते हैं, कभी जे एन यु के फच्छर में फंसते हैं। कभी धर्मनिर्पक्षता के बहाने बहुसंख्यक हिन्दू कौम का ही उपहास करते रहते हैं !वे आतंकवाद के सवाल पर, पाकिस्तान और चीन की घटिया हरकतों के सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं ! वे कभी गौ हत्या बनाम् बीफकांड को लेकर फटे में टांग अडा देते हैं !शायद इसीलिये आधुनिक भारतीय युवा और छात्र मार्क्सवाद जैसे बेहतरींन वैज्ञानिक दर्शन को समझने के लिये बिलकुल तैयार नही हैं !सौ में से ९९ युवा आज मोदी मोदी कर् रहे हैं ! जिसे यकीन न हो वो एमपी,राजस्थान,महाराष्ट्र ,यूपी और उड़ीसा ,बंगाल में में खुद जाकर जनमत संग्रह कर ले !

 :-श्रीराम तिवारी !


शनिवार, 8 जुलाई 2017

धनलोलुप नवधनाढ्य परिवारों से देश को खतरा है। 


संविधान की मंशानुसार विधिक रूप से भारत 'संघीय गणराज्य' है, अर्थात राज्यों का संघ है। संविधान की मंशानुसार यह धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी-गणतंत्र भी है। किन्तु वर्तमान पूँजीवादी भृष्ट व्यवस्था में न तो धर्मनिरपेक्षता बची है ,न समाजवाद का कोई चिन्ह मौजूद है और न कहीं पर गणतंत्र साबुत बचा है!जो कुछ भी इस देश में चल रहा है,वह सब भेड़िया धसान शासन तंत्र है,जिसकी लाठी उसकी भैंस है। कोई भी पूंजीवादी पार्टी दूध की नहाई नहीं है !जो अपने आपको समाजवादी कहते हैं वे महाभ्रुष्ट लालू यादव परिवार ,मुलायम परिवार, राकांपा परिवार के रूप में कुख्यात हो रहे हैं। जो अति भॄस्ट क्षेत्रीय क्षत्रप हैं वे भी माया परिवार,करूणानिधि परिवार,रेड्डी परिवार,बादल परिवार,मोमता परिवार,राणे परिवार ,वीरभद्र परिवार, हुड्डा परिवार ओवेसी परिवार ,आजम खां परिवार और फारुख अब्दुला परिवार जैसे धूर्त नव धनाढ्य भृष्ट परिवारों में शुमार हो  रहे हैं। दरअसल देश को कांग्रेस से या गाँधी नेहरू परिवार से कोई खतरा नहीं।इस देश को संघ परिवार से भी उतना खतरा नहीं,जितना इन महापातकी गैरजिम्मेदार और धनलोलुप नवधनाढ्य परिवारों से देश को खतरा है। सीबीआई और ईडी को न केवल लालू यादव परिवार पर बल्कि हर उस राजनेतिक परिवार पर छापा डालना चाहिए जो कोई कामधंधा नहीं करता और केवल राजनीति की ताकत से धन बटोरता रहता है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मुर्गा नही भी होगा तब भी सुबह होगी

  1. प्रधानमंत्री मोदी जब विदेशी दौरों पर होते हैं,तब सत्ता के दलालों के द्वारा विग्यापनों के रूप में कुछ प्रमुख समाचार पत्रों ,टीवी चैनलों और मीडिया के मालिकों को दलाली भेज दी जातीहै ! मीडिया वाले भी बड़े बफादार हैं,वे देश की सारी समस्याओं को किनारे रखकर यह दिखाना शुरू कर देतेहैं कि देखिए मोदी जी का विदेशों में कितना जलवा है?वे क्या क्या आसमानी तारे तोडकर तोडकर भारत ला रहें हैं !सबको मालामाल किया जा रहा है!
    देश  का कुपढ़ वर्ग जन मानस मीडिया के इस झूठ को कभी नहीं पकड़ पाता,कि विदेशों.में जलवा मोदी का नहीं बल्कि हमारे इस महान भारत देश के प्रधानमंत्री का है! जो पहले भी था और आगे भी रहेगा। मुर्गा नही भी होगा तब भी सुबह अवश्य होगी !

  2. मोदी की जगह यदि आप मायावती ,मुलायम या किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनाकर विदेश भेजोगे तो भी इतना ही जलवा उनका भी रहेगा।।स्वाधीनता के पूर्व जब महात्मा गाँधी विदेश जाते थे तो गुलाम भारतके एक बड़े जननायक के तौर पर उनका भी खूब जलवा था। लोग
    धोती से लिपटे और लाठी लेकर चलते एक 40-45 किलो वजन के दुबले पतले आदमी को देखने लाखों लोग उमड़ पड़ते थे। देश आजाद हुआ और पंडित नेहरू पहले प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका गए, तो तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति न केवल उन्हें रिसीव करने एयरपोर्ट पहुँचे,बल्कि प्लेन के लैंड करते ही नेहरूजी के उतरने के पूर्व ही वे उनकी सीटतक पहुंच गए। उनका जो भव्य स्वागत हुआ ,वो नेहरू का नहीं बल्कि आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का था।
  3. ततकालीन पीएम श्री राजीव गाँधी को बारिश से बचाने अमरीका का राष्ट्रपति छाता पकड़े खड़ा रहा !तब तक खड़ा रहा जब तक राजीव अपनी कार में बैठकर रवाना नहीं हो गए।। वो भी तो एक प्रधानमंत्री का सम्मान था। फर्क इतना है कि उस समय के नेताओं को ब्रान्डिंग की आवश्यकता नहीं होती थी. और तब ये घटिया प्राइवेट न्यूज़ चैनल भी नहीं थे।लेकिन अब भारत के प्रधानमंत्री के विदेश दौरों उसी तरह प्रचारित किये जा रहे हैं जैसे कोई कलाकार अपनी फ़िल्म का प्रमोशन कर रहा हो।।हर दौरे के पहले दो ढ़ाई सौ लोगों की टीम का उस देश पहुँच जाना,स्थानीय उद्योगपति की मदद से वहाँ निवासरत भारतीय समुदाय को डिनर/लंच के नाम पर प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में आमंत्रित करना,लोगों से नारे लगवाना,फ़ोटो सेशन और वो सब कुछ जो शाहरुख या सलमान करते हैं,अपनी पिक्चर के लिए। सत्ता से विदेशी दौरों का परिणाम पूँछो तो पीएम भी चुप और पीएमओ भी!

  4. समर्थक तो इसी बात पे फूल के गुब्बारा हुए जा रहें हैं कि आज साहेब अमरीकी व्हाइट हाउस में डिनर करेंगें।।अरे कुबुद्धियो!! अमेरिका तो दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा व्यापारी है !और भारत उसका सबसे बड़ा ग्राहक!!अब कोई बड़ा ग्राहक दुकान पर आएगा तो उसे चाय-नाश्ता कराओगे या नहीं ? यह सब गुणगान करने के लिए मीडियाको तो सरकारी विज्ञापन के खूब पैसे मिलतेहैं। लेकिन सत्ता के अंध भक्तों को क्या मिलेगा ?क्या वही जो आड्वा्नी को मिला ! याने ठनठन गोपाल या बाबाजी का घंटा !
  5. बुन्देलखण्डी में कहावत मशहूर है "बैठा बानियां का करे ,इधर को बांट उधर करे " मतलब किसी व्यापारी की दुकान पर जब बेचने का माल ही न हो तो कोई ग्राहक क्यों आयेगा ?और जब कोई ग्राहक ही न आये तब बेचारा बणिक तराजु के बांट इधर से उधर तो करेगा ही!ठीक इसी तरह जब भारत के वर्तमान56 इंच वाले शासक, देश के युवा - वेरोजगारों को नौकरी नही दे सके ,गरीबों और बुजूर्गं लोगों को इलाज नही दे सके ,किसानों का दर्द नही समझ सके ,विदेश से कालाधन नही ला सके ,मेंहगाई नही रोक सके , काष्मीर में धारा 370 नही लगा सके ,आतंकवाद और भ्रूषटाचार नही रोक सके और चींन पाकिस्तान जैसे पडोसियों से देश की सीमाओं की रक्षा भी नहीं कर सके तो कभी नोटबन्दी ले आये कभी जी एस टी ले आये ! और उस पर तुर्रा यह कि विदेशी दौरे करते हुए केवल ताश के पत्ते फेंट रहे हैं !ये शायद भारत की जनता की गहरी नींद का असर भी है !इसीलिये अब सत्ता धारी नेता जनता को मूर्ख बनाने में सफल हो रहे हैं !

शनिवार, 24 जून 2017

मीराकुमार के राष्ट्रपति बनने से एनडीए को भी लाभ होगा।


 भारत में राष्ट्रपति का पद कहने को तो 'ब्रिटिश क्राउन' जैसा है। किन्तु व्यवहार में आम तौर पर वह रबर स्टाम्प ही है। चूँकि संविधान अनुसार सत्ता संचालन के सारे सूत्र कार्यपालिका और विधायिका में सन्निहित हैं।इसीलिये कार्यपालिका प्रमुख की हैसियत से प्रधानमंत्री ही कार्यकारी प्रमुख होता है। देश में पीएम से ताकतवर केवल संसद होती है।संसद भी कहने को सर्वोच है,लेकिन उसकी असल ताकत बहुमत के पास सुरक्षित है। बहुमत दल का नेता याने प्रधानमंत्री ही भारत राष्ट्र में सर्वशक्तिमान होता है।भारत में राष्ट्रपति की जो हैसियत संविधान में है,चुनाव भी उतने ही ढुलमुल और अनगढ़ हैं। जो लोग राज्यों की विधान सभाओं या लोकसभा अथवा राजयसभा में पहले से ही निर्वाचित हैं ,वे ही इस पद के लिए मतदान के पात्र हैं। अर्थात भारत की जनता को अपना राष्ट्र्पति चुनने का कोई अधिकाऱ नहीं है। यदि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार तीन साल में कुछ नहीं कर सकी और हर मोर्चे पर फ़ैल है तो जनता उसे ढोने को अभिसप्त है। और इस अनर्थकारी बहुमत द्वारा चुना गया व्यक्ति ,राष्ट्रपति के रूप में  राष्ट्र की जनता का असल प्रतिनिधित्व नहीं करता। चूँकि वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन पूर्ण बहुमत में है,इसीलिये स्वाभाविक है कि जीत उनके ही प्रत्याशी की होगी।

एनडीए और भाजपा की और से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी श्री रामनाथ कोविंद जी की कुल दो अहर्तायें है !एक यह कि वे संघ पृष्ठभूमि से हैं।दूसरी यह कि वे दलित जाति से हैं। इसके अलावा उनकी और कोई अहर्ता नहीं है। इन्ही दो अहर्ताओं की वजह से वे विहार के राजयपाल बने और इन्ही दो अहर्ताओं की वजह से वे एनडीए और संघ परिवार की ओर से राष्ट्र्पति पद के उम्मीदवार बनाये गए हैं।जिस व्यक्ति ने अपने भाई की सम्पति भी हड़प ली हो ,जिस  शख्स ने अपनी पत्नी की मौत के सिर्फ 6 महीने बाद ही अपनी शिष्या बनाम प्रेयसी से शादी कर ली हो,जो शख्स तीन -तीन बार चुनाव लड़ने के बावजूद लोक सभा का चुनाव ना जीत पाया हो, क्या ऐसे व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बनाया जाना उचित है ? उन्होंने लोकसभा के तीन चुनाव लड़े ,तीनो हारे। वे राज्य सभा में सिलेक्ट किये गए ,केवल संघ का अनुयाई होने और दलित वर्ग की पात्रता की वजह से। यदि वे अनायास जीत ही गए तो देश में पूँजीवाद और साम्प्रदायिकता के जलजले होंगे। और हर शहर में गाँव -गाँव में  दंगे और बलबे होंगे। क्योंकि राष्ट्र्पति का विवेक सत्ता की जेब में होगा।

महान दलित नेता बाबू जगजीवनराम की सुपुत्री -श्रीमती मीराकुमार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतीं हैं । वे बहुत समय तक सफल केंद्रीय मंत्री भी रहीं हैं । लोकसभा स्पीकर के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय संसद के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। वे एक बेदाग़ और गरिमामय व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं। वे धर्मनिपेक्षता की शानदार मिशाल हैं। वे सर्व जातीय,सर्व समाज ,सर्व धर्म समभाव की प्रतिमूर्ति हैं। वे लोकतंत्र और संविधान में बेइंतहा यकीन रखतीं हैं। निर्धारित  इलेक्ट्रोरल यदि मीराकुमार को राष्ट्रपति चुनता है,तो यह न केवल दलितों के लिए ,न केवल महिलाओं के लिए ,बल्कि लोकतंत्र के लिए तथा समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए भी शुभ है । इससे राष्ट्रका कल्याण होगा। मीराकुमार के राष्ट्रपति बनने से एनडीए को भी लाभ होगा। श्रीराम तिवारी !

मंगलवार, 20 जून 2017

क्रिकेट का खेल और राष्ट्रवाद !

यदि अचानक कभी, आपका किसी दैवी शक्ति से अर्थात ब्रह्म तत्व से साक्षात्कार हो जाए,और वो परा शक्ति आपसे मन वांछित वरदान मॉंगने को कहे तो आप  क्या वरदान मांगेंगे ?
आपकी सुविधा के लिए मैं यहाँ कुछ अपनी च्वाइस बता देता हूँ !

पहला वर :-हे प्रभु ! यदि  बाकई पुनर्जन्म होता है,तो मेरा हर जन्म भारत भूमिपर ही हो और जिस घर में जन्म हो वहाँ भगतसिंह के आदर्शों का सम्मान हो !

दूसरा वर :-जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ की खाते हैं ,यही जिनकी मातृभूमि है ,वे सभी अपने धर्म मजहब से ऊपर भारत देश को ही अव्वल माने !प्रभु !

तीसरा वर :-जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी तत्व पूँजीपतियों की चरण वंदना करते हैं,मजदूरों,किसानों और वामपंथ को गाली देते हैं,उन्हें सद्बुद्धि दो प्रभु !

चौथा वर :-जो लोग भारत के मुसलमानों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं ,भारत की बर्बादी के सपने देखते हैं ,उन दुष्टों का सत्यानाश हो प्रभु !

पाँचवाँ वर :-जो लोग स्वयंभू देशभक्त हैं ,वे भारत के सभी मुसलमानों पर संदेह न करें हैं,उन्हें आतंकी न समझें , हे ईश्वर उन्हें सही दॄष्टि प्रदान करो !

   १८ जून २०१७ इंग्लैंड मे आई सी सी चैम्पियनशिप के फाइनल में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम जीत गई और  भारतीय टीम हार गई। चूँकि हार जीत अधिकाँस खेलों का अहम हिस्सा है ,इसलिए जब दो टीमें आमने सामने हों तो कोई एक तो अव्वल होगी ही !और  फाइनल हारने वाली दूजे पायदान पर ही होगी। इसमें आश्चर्य और अनर्थ जैसा क्या है ? हालाँकि किसी अंतर्राष्ट्रीय मैच के फाइनल में पहुँचना भी कम गर्व की बात नहीं और हारना भी उतना बुरा नहीं !लेकिन जब मामला भारत  विरुद्ध पाकिस्तान का हो तो खेल भावना की ऐंसी-तैंसी हो जाती है। तब दोनों मुल्कों में छद्म राष्ट्रवाद उभरकर गंदे बदबूदार परनाले की तरह खदबदाने लगता है। वेशक किसी अति सम्मानित टीम का नाक आउट या सेमीफाइनल में हारकर घर लौटना अवश्य शर्मनाक है। किन्तु इतने सारे दिग्गजों को हराने के बाद किसी खास देश की टीम से आख़िरी में हार जाना किसी को गवारा नहीं। जबकि फाइनल हारने वाला खुद उस विजेता टीम को पहले ही राउंड में बुरी तरह निपटा चुके हो !सांत्वना एवं संतुष्टि सिद्धांत के अनुसार भारतीय टीम की हार को शर्मनाक हार कहना गलत है। बल्कि उसे काबिले तारीफ हार कहा जाना चाहिए !
भारत और पाकिस्तान के नादान क्रिकेट प्रेमियों ने 'पुरुष क्रिकेट' के खेल में अंधराष्ट्रवाद घुसेड़कर खेल को युद्ध बना डाला है। गनीमत है कि महिला क्रिकेट में उतना उद्दाम राष्ट्रवाद नहीं पनपा है ! जो लोग अंधराष्ट्रवादी हैं उनके लिए अपने देश की टीम का किसी गैर मुल्क की टीम से हार जाना नाक़ाबिले बर्दास्त होता है। हार जाने  पर ऐंसे लोगों का दुखी होना तो स्वाभाविक है। किन्तु जो लोग प्रतिद्व्न्दी या दुश्मन देश के खैरख्वाह हैं उन्हें अपने ही मुल्क की हार से आनंद मिलता है इसकी वजह क्या ? यह कौनसी खेल भावना है कि अपने खिलाड़ी  पिटे तो खुश और पड़ोसी के बाइचांस जीत गए तो मन में लड्डू फूटे?  

जब जब भारत- पाकिस्तान  फाइनल में पहुँचते हैं ,तब तब उनके क्रिकेट समर्थक अपनी -अपने टीमों की जीत के दावे करने लगते हैं । जहाँ पाकिस्तान के भूतपूर्व दिग्गज खिलाड़ी अपनी ही टीम को कमजोर बताते हैं ,अपने कप्तान को नौसीखिया बताते हैं और पाकिस्तानी मीडिया भी उनकी अपनी टीम की जीत के प्रति अधिक आशान्वित नहीं रहता ! वहीं भारत के तमाम क्रिकेट मैनेजर्स और समर्थक बड़ी हेकड़ी से भारतीय टीम को बाबुलंद,अपने खिलाडियों को शेर और पाकिस्तानी टीम को चूहा सिद्ध करने में जुटे जाते हैं। सट्टे वाले भी भारतीय टीम की जीत के पक्ष में ज्यादा दाँव लगते हैं। लेकिन भारतीय टीम तभी जीतती है जब पाकिस्तानी टीम  कमजोर और हताश हो जाती है। अन्यथा पूजा पाठ ,यज्ञ ,आहुति और 'मौका मौका ' के निर्र्र्थक नारे काम नहीं आते !

कबीरा गर्व न कीजिये ,कबहुँ न हँसिये कोय।
अबहुँ नाव मझधार में ,का जाने का होय।।



शनिवार, 3 जून 2017

भारत में  अलगाववाद बनाम उग्र राष्ट्रवाद !


यदि पर्यावरणविद और धरती के प्रति फिक्रमंद लोग ईमानदारी से सोचें तो वे पाएंगे कि पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण की वजह से हुआ है। चूँकि अमेरिका,यूरोप,चीन और जापान इत्यादि देशों ने बहुत पहले ही बहुत तेजी से, प्रतिस्पर्धात्मक और अँधाधुंध विकास कर लिया है, इसलिए उनके द्वारा धरती के पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश हुआ है। गनीमत है कि अफ्रीकी और भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षेस देश उतने ज्यादा 'एड्वान्स' नहीं हुए कि धरती को बर्बाद करने में इन तथाकथित उन्नत राष्टों की बराबरी कर सकें !

हालाँकि यह सौ फीसदी सच है कि दुनिया के हर मनुष्य ने, हर समाज ने, हर राष्ट्र ने धरती के अन्य प्राणियों की बनिस्पत बहुत अधिक कूड़ा-कचरा इस हरी भरी पृथ्वी पर पैदा किया है। कुछ पर्यावरणविद बुद्धिजीवियों ने तो यहाँ तक कहा है कि धरती पर'मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है !' हालाँकि इस पदबंध के और भी दूरगामी निहितार्थ हैं। जैसे कि मानव मस्तिष्क ने ही हिरोशिमा नागासाकी का बीभत्स नरसंहार किया था। मानव मष्तिष्क द्वारा धरती को बर्बाद करने का ही भयानक प्रमाण है यह है कि उसी की बदौलत बीसवीं शताब्दी में दुनिया के दो 'महायुद्ध' हो चुके हैं। और मानव मस्तिष्क से ही धरती के अन्य प्राणियों को एवं वन सम्पदा को खतरा है। मानव मष्तिष्क ने ही ओजोन परत में अनगिनत छेद किये हैं! धरतीपर आबादी बढ़ाने में मानव शरीर का जितना रोल रहा, उससे अधिक मानव मष्तिष्क का और मनुष्य जाति के खुरापाती मजहबी उसूलों का नकारात्मक रोल रहा है।

धरती पर मानव आबादी बढ़ाने में चीन भले ही नंबर वन है,किन्तु आबादी की सापेक्ष बृद्धि दर में तो भारत ही दुनिया में अव्वल है। भारत में जनसंख्या बृद्धि में ,वे व्यक्ति और समाज सबसे आगे हैं जो अपढ़ हैं ,पिछड़े हैं ,जाहिल हैं ,गंवार हैं !जो लोग एक से अधिक शादियां करते है ,जिनको वैज्ञानिक निरोध मंजूर नहीं!जिन्हें उनके पुरातन सड़े गले पुरुषसत्तातात्मक रीति रिवाजों से बड़ा लगाव है। जिन्हें देश की फ़िक्र नहीं ,जिन्हें अपने ही बच्चों की फ़िक्र नहीं,जिन्हे केवल अपने घटिया अंध विश्वाश और अपनी कूड़मगज मानसिकता पर नाज है,वे ही कृतघ्न व्यक्ति व समाज आबादी बढ़ाने के लिए गुनहगार हैं। आबादी के विस्तार में उनका भी खूब योगदान है जो अपने बच्चों को बेहतर मानव बनाना ही नहीं चाहते !बल्कि वे उन्हें जेहादी,फिदायीन,आतंकी-अपराधी बनाकर देश-समाज में मरने मारने को छोड़ देते हैं। जो धरती को और मानवता को खुदा भगवान् और अल्लाह के भरोसे छोड़ देते हैं।  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को पैरिस संधि से अलग करने की धमकी दी है। ट्रम्प ने विश्वपर्यावरण संरक्षण संधि से अलग होने की वजह चीन और भारत की बढ़ती जनसंख्या को कारण बताया है। वेशक ट्रम्प और अमेरिकी नीतियां साम्राज्य्वादी हैं ,किन्तु उसका आरोप नितांत कड़वा सच है !जब यह सिद्धांत माने हो गया कि ''मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है" तो भारत और चीन की ज्यादा जबाबदेही बनती है कि जनसंख्या नियंत्रण पर अधिक ध्यान दें। चूँकि चीन के पास उसकी जनसंख्या के अनुपात में ज्यादा बड़ा भूभाग है,कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव के विरोध में वहां कोई पृथक तबका या असहमत वर्ग नहीं है।  इसीलिये चीन में अपने राष्ट्र को जिन्दा रखने की अनंत सामर्थ्य है। इसलिए चीन को किसी की फ़िक्र नहीं है।

भारत में किसी भी सार्थक योजना पर और विकास के किसी भी प्रोग्राम पर महज दो राय ही नहीं बल्कि प्रतिरोध के भी अनेक स्वर हैं। दुनिया के अधिकांश मुल्कों में आमतौर पर एक सा खानपान,एक सा रहन सहन ,एक सा बोलना चालना और एक् सा राष्ट्रीय चरित्र है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत में न केवल मजहबी या सांस्कृतिक वैविद्ध्य है ,अपितु जनसंख्या बृद्धि और परिवार नियोजन जैसी चीजों पर भी साम्प्रदायिकता का सामंतयुगीन रंग चढ़ा हुआ है। एक देश में ही अनेक जातियां ,अनेक मत पंथ सम्प्रदाय,अनेक भाषा और जीवन शैलियाँ तो हो सकते हैं, किन्तु संविधान और राष्ट्रीय चरित्रगत मूल्य जुदा जुदा हों तो राष्ट्र की एकता को खतरा है। शायद इसीलिये कश्मीर से और उत्तरपूर्व के अन्य राज्यों से धारा ३७० हटाने और समान नागरिक क़ानून की मांग बार बार उठते रहती है। मुगलकाल में अयोध्या ,काशी ,मथुरा जैसे हिन्दू तीर्थ स्थलों पर अल्पसंख्यकों का प्रभुत्व स्वाभाविक था ,क्योंकि वे विजेता थे। किन्तु २१ वीं शताब्दी के लोकतान्त्रिक गणतंत्र भारत में बहुसंख्यक वर्ग को ब्लेक मेल नहीं किया जा सकता। इसीलिए २० वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण और २१ वीं शताब्दी में उसकी प्रतिक्रिया 'उग्र राष्ट्रवाद' के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। परिणामस्वरूप इन दिनों हिंदुत्व की आवाज कुछ ज्यादा ही बुलंद है। अंधराष्ट्रवादियों का सत्ता में आना भी एक ऐतिहासिक और आवश्यक प्राकृतिक घटना है। आइंदा यह सत्ता हस्तांतरण या परिवर्तन तब तक सम्भव नहीं जब तक कि अल्पसंख्यक वर्ग खुद राष्ट्रवादी नहीं हो जाता! जब तक वे खुद तीन तलॉक , चार शादी तथा परिवार नियोजन पर वैज्ञानिक दॄष्टि नहीं अपनाते तब तक भारत में बहुसंख्यक वर्ग को उदारवाद की ओर मोड़ पाना असम्भव है। जब तक अल्पसंख्यक वर्ग आतंकवाद का खुलकर विरोध नहीं करता ,जब तक वे अयोध्या ,काशी मथुरा का मोह नहीं छोड़ देते,तब तक भारत में 'संघ परिवार' ही सिरमौर रहेगा। किन्तु यदि अल्पसंख्यक वर्ग ने पुरातनपंथी कटटरता छोड़कर अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण को हरी झंडी दे दे और देश के संविधान को मजहब से ऊपर मान ले तो  भारत में धर्मनिरपेक्षता समाजवाद का झंडा बुलंद होने से कोई नहीं रोक सकता। बिना रामलला मंदिर बने,बिना कश्मीर से आतंकवाद खत्म होने और  शांति स्थापित हुए बिना भारत से कटटर हिन्दुत्ववाद को द्रवीभूत नहीं किया जा सकता। जब तक मुसलमान मुख्यधारा से खुद नहीं जुड़ते तब तक कटटरपंथियों को सत्ताच्युत कर पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं !   
   

मंगलवार, 30 मई 2017

ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद

मनुष्य जाति की तमाम अनन्य खोजों और अनुसंधान परम्पराओं में- विज्ञान,भूगोल,खगोल,मेडिकल साइंस,भाषा विज्ञान,व्याकरण,शिक्षा ,साहित्य, तकनीकी,सूचना एवं संचार,व्यापार -वाणिज्य, धर्म-मजहब ,अर्थ ,काम ,मोक्ष,मनोविज्ञान,और दर्शन शाश्त्र इत्यादि खोजों में 'दर्शनशास्त्र' सबसे अधिक ताकतवर और अदुतीय है।मनुष्य जब धार्मिक होता है तो व्यक्ति के कल्याणार्थ श्रद्धा ,भक्ति ,ज्ञान ,कर्म ,योग और ईश्वर का संधान करता है। लेकिन दर्शनशास्त्री के रूप में मनुष्य जब गौतम बुद्ध होता है तब वह ईश्वर के अस्तित्व पर मौन हो जाता है।अर्थात वह ईश्वर के होने या न होने पर कोई घोषणा नहीं करता अपितु मनुष्य के दुःख कष्ट निवारण की विधियों की आंतरिक खोज को 'बोध' या एनलाईटमेन्ट कहता है। मनुष्य जब 'नीत्से' हो जाता है तो वह घोषणा करता है कि 'मनुष्य ने ईश्वर को पैदा किया था किन्तु अब वह मर चुका है'!और यही मनुष्य जब रूसो होता है, तब वह घोषणा करता है कि ''ईश्वर यदि नहीं भी है तो क्या हुआ उसे फिर से पैदा करो क्योंकि मानवता मानवता के हित में ईश्वर का होना नितांत आवश्यक है।'' यही मनुष्य जब एक वैज्ञानिक नजरिये वाला महानतम तर्कशात्री -कार्ल मार्क्स  होता है तब वह घोषणा करता है कि ''ईश्वर सिर्फ मानवीय संवेदनाओं के भावजगत का विषय है, कुछ चालॉक धूर्त लोगों ने धर्म को शोषण का धंधा बना डाला है ,धर्म -मजहब मानों अफीम हैं''!
इस परम्परा में मेरा स्वयं का वही मत है जो वेदांत दर्शन आधारित है। ''ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित जगत्यामजगत,तेनत्यक्त्येन भुंजीथा,मा गृधकस्विद्धनम'' -[ईशावास्योपनिषद १-१] चूँकि उपरोक्त में से किसी भी दर्शनशात्री ने इस उत्कृष्ट वेदांत का अध्यन ही नहीं किया था,इसलिए वे सभी एकांगी और अधूरे रहे हैं। जबकि वेदांत की ईष्वर संबंधी घोषणा न तो यह कहती कि ईश्वर है और न यह कहती कि ईश्वर नहीं है। बहुत सम्भव है कि महात्मा बुद्ध ने भी शायद् इसी वेदांत सूत्र को अपने आर्य सत्यों के साथ नत्थी किया होगा । यह सूत्र कालजयी और सम्पूर्ण विज्ञानमय है ! स्वयंसिद्ध है। इसमें न तो मनुवाद है , जातिवाद है और न ब्राह्मणवाद है और न आश्तिक नास्तिक की झंझट है ,यह तो मनुष्यमात्र को निम्तर श्रेणी से उच्चतर श्रेणी की ओर ले जाने का शानदार दुर्लभ सोपान है।     

मेरे पिता पंडित तुलसीराम तिवारी ठेठ ग्रामिणि सीमान्त किसान हुआ करते थे। उच्च कुलीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण होंने के वावजूद वे सभी जात और समाजों का बहुत आदर किया करते थे। उनके पास आजीविका के निमित्त कमाने के लिए वैद्द्यगिरी का भरपूर ज्ञान भण्डार था। लेकिन वे बिना फीस लिए मुफ्त दवा देकर गाँवके उन तथाकथित पिछड़ों,दलितों अहीरों,लोधियों और बनियों की आजीवन मुफ्त सेवा करते रहे जो मेरे पिता से अधिक जमीन के मालिक हुआ करते थे। चूँकि हमारे पूर्वज यूपी से सागर जिले के धामोनी स्टेट आ वैसे थे। और जब धामोनी को मुगलों ने आग लगा दी तो जान बचाकर वे पिड़रुवा आ वसे। सहज  ही समझा जा सकता है कि है कि किसी बाहरी व्यक्ति के पास स्थानकों के सापेक्ष जमीन जायदाद कितनी होगी ? पिताजी ने थोड़ी सी जमीन बटाई पर लेकर,  जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचकर और गौ पालन के दमपर अपने परिवार का जैसे तैसे गुजर वसर किया। लम्बी आयु उपरान्त २८ जुलाई  १९८८  को वे इस संसार को अलविदा हो गए । वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार और विरासत में नेकनामी यह कि आसपास के सात गांव के लोग आज भी उनकी समाधि पर मत्था टेकने आते हैं। क्योंकि उन्होंने ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। पूज्य पिताश्री के लिए वे दलित हरिजन आज भी ज्यादा पूज्य मानते हैं जिन्हे शहर के कुछ जातिवादी नेताओं ने, मनुवाद और ब्राह्मणवाद जैसे काल्पनिक शब्दों के जहरीले इंजेक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव में कोई भाईचारा नहीं बचा ! हर जगह अधिकार और नफरत की बबूल उग चुकी है। जिस किसी ने ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद का नामकरण किया है वो भारतीय समाज के नीर क्षीर में नीबू निचोड़ने के लिए जिम्मेदार है।

उनके निधन के बाद जब बटवारा हो गया तब मैंने अपने  हिस्से की जमीन बड़े भाईयों को कमाने के निमित्त दे दी।  जमीन पिताजी के समय जितनी थी वह आज भी उतनी ही है।  गाँव में मेरे दो बड़े भाई जैसे तैसे उससे गुजारा करते हैं। जब तक मैं सर्विस में रहा उनकी कुछ मदद कर दिया करता था ,लेकिन अब चूँकि सेवानिवृत्त हूँ और पति-पत्नी दोनों बीमार रहते हैं ,इसलिए उनकी मदद बहुत कम कर पा रहा हूँ। बड़े भाइयों के बच्चे उचित मार्गदर्शन के अभाव में पर्याप्त तालीम हासिल नहीं कर सके। ५५ साल पहले गरीबी और अभाव में जो संघर्ष का माद्दा गाँव के युवाओं में हुआ करता था वो अब नदारद है। गाँवों में सेलफोन या इंटरनेट तो   केवल मुझमे था उसे  मुझे बचपन की धुंधली सी याद है की थोड़ी सी असिंचित जमीनके अलावा आठ - दस भेंसें,पन्द्रह - बीस गायें ,तीन जोडी बेल और दस पन्द्रह छोटे मोटे बछेरु- पडेरू हुआ करते थे ! बडा भारी सन्युक्त परिवार था!मुझसे बड़े तीनों भाई चुंकी खेती में पिताजी का हाथ बटाया करते थे ,इसलिये मुझे पढाई का सुअवसर मिल गया !लेकिन मुझे यह सदाश्यता इस शर्त पर मिली कि रात का चारा ,रातेबा और सुबह की सानी में हाथ बटाना होगा !इसके अलावा दो अलिखित शर्तें और थीं ,एक तो आधी रात... को भेंसें चराने के लिये जन्गल ले जाना और तीनों बड़े भाइयों में से कोई यदि बीमार पढा या किसी नेवते में गया तो उसका एवजी मुझे आवश्यक रूप से बनना ही होता था,इसके वावजूद मैं प्रथम श्रेणि में ही पास होता था !किंतु मेरे दो मित्र मुझे हमेशा पछाड् दिया करते थे ! जबकी मेरे मित्र खुद मानते थे कि मैं उनसे अधिक मेधावी हूँ !लेकिंन उनमें से एक के पिता जनपद सी ईओ थे और एक की माताजी खुद लेक्चरर हुआ करती थीं ! मेरे पिता एक निर्धन किसान थे ,ऊँहोने कभी स्कूल या पढ़ाई वावद दखल नही दिया अत: मैं भरसक प्रयास के वावझूद हमेशा एक दो नम्बर से तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ता था!पिताजी को मुझपर बडा नाज था और मेरे प्रथम श्रेणी उत्तरींण होने को ही वे प्रथम याने टापर मान बैठते थे

हर साल केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल सहित अन्य वार्षिक परीक्षाओँ के तथाकथित टापर्श की बड़ी पूँछ परख होने लगती है ! टीवी चेनल वाले उनके घर पहुँच जाया करते हैं !औरों से आगे रहना ,प्रसिद्धी पाना और फिर परिवार एवं स्कूल को गौरवान्वित करना वाकई गर्व की बात तो है ! भगवद गीता में योगेश्वर श्रीक्रष्ण ने हर प्रकार के यश की कामना को याने ईशना को भी एक मायिक दूर्गुण माना है !जो आदिवासी और गरीब ग्रामींणों के बच्चे मेहनत मजूरी करके अपनी पढाई पूरी करते हैं, वे यदि सेकिन्ड् या थर्ड डिविजन भी उत्तीर्ण हुये तो मेरी नजर में ज्यादा प्रशंसा के पात्र हैं ! नोयडा दिल्ली बेंगलूरू में आली शान सर्वसुविधा सम्पन एलीट्स क्लास् की औलाद य़दि स्कूल के स्टाफ की मदद से टाप करे तो वह नेकनामि नही !ऐंसे टापर तो बिहार में भी नाम कमा चुके हैं !

बुधवार, 24 मई 2017

बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग !

भारतीय समाजों में जातीयता की गांठें बहुत मजबूत हैं, ये तो सर्वविदित है !किन्तु शोषण के लिए खुद शोषित लोग ही जिम्मेदार हैं यह मुझे अभी यूपी चुनाव में बहिन मायावती की हार के बाद समझ में आया। हालांकि हार का तगड़ा झटका तो सपा और मुलायम परिवार को लगना चाहिए था,किन्तु वे  सबके सब मजे में हैं। शिवपाल यादव पर ,अखिलेश पर ,मुलायम सिंह पर ,उनके घराने पर और यादव घराने की बहु बेटियों पर योगी ठाकुर की महती अनुकम्पा है। पूरा का पूरा समाजवादी कुनवा मय बगुलाभगत आजम खां के सकुशल है। केवल कुछ चंद अवैध बूचड़खाने,कुछ लौंडे -लफंगे और सौ पचास भॄस्ट अधिकारी ही योगी जी के निशाने पर हैं। लेकिन योगी सरकार पर झूंठे आरोप लगाकर बहिन मायावती जी ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यदि वे चाहतीं तो कुछ दिन बाकायदा महारानी एलिजाबेथ की तरह  अपना जातीय कुनबा और आर्थिक साम्राज्य बरकरार रख सकतीं थीं !किन्तु 'भीमसेना' और उसके नेता एक नए नेता चंद्रशेखर की प्रसिद्धि और  बढ़त से चिढ़कर उन्होंने अलीगढ़ ,सहारनपुर सहित पूरे यूपी में  बैमनस्यतापूर्ण  हिंसक तांडव मचाने की जुगत की है! इसमें उनके नव धनाढ्य अरबपति भाई आनंदकुमार कुछ जायदा ही अनुरक्त पाए गए हैं। राजनैतिक पंडित चमत्कृत हैं कि बहिनजी किस वजह से अपने राजनैतिक पराभव का खुद इंतजाम कर रहीं हैं ?सहारनपुर में आनंदकुमार के इशारे  पर एक निर्दोष राजपूत को मार दिया गया। पहले तो लोगों को लगा कि यह नवोदित दलित नेता चंद्रशेखर की 'भीमसेना' के युवा दलित दवंगों की भीड़ का काम है !किन्तु जब बहिनजी ने एक पत्रकार वार्ता में 'भीमसेना' को भाजपा और संघ का ही छाया संघठन बता दिया और चंद्रशेखर को संघ का एजेंट बता दिया तो सब को सब समझ में आ गया कि माजरा क्या है ? याने कि अब खिसयानी  बिल्ली खम्भा नोचे !

चूँकि चंद्रशेखर और उसकी भीमसेना वाले अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते हैं और बहिनजी के नेतृत्व और आर्थिक साम्राज्य को इससे खतरा है !इसलिए अभी-अभी बहिनजी उवाच -भीमसेना तो संघ [rss]]की उपज है। बहिनजी की जय हो ! भाई आनंदकुमार की जय हो ! नोटों की मालाओं पर बलिहारी जाने वाली बहिनजी को शायद अपने कालेधन की चिंता ने ही पगला दिया है। स्वर्गीय काशीराम  देख रहे होंगे - स्वर्ग से या नर्क में जहाँ भी हों - कि कैसी सामाजिक क्रांति हो रही है। उनके सिखाये पढ़ाये लोग कैसी हिंसात्मक क्रांति के लिए लोकतंत्र को तार-तार करने पर आमादा हैं। ब्राह्मणवाद ,मनुवाद तो जुमले हैं असल चीज है जातिगत मक्कारी और व्यक्तिगत मुफ्तखोरी !सहांरनपुर की  हिंसक घटनाओ से बखूबी समझा जा सकता है कि भारत में कोई जातीय परिवर्तन सम्भव नहीं। आर्थिक या राजनैतिक क्रांति भले हो जाए किन्तु सांस्कृतिक सामाजिक क्रांति कभी सफल नहीं होगी ! यूपी की जनता ने बहिनजी और मुलायम परिवार को हराकर अच्छा ही  किया है।  मोदी जी ने भी योगी आदित्यनाथ को  मुख्यमंत्री बनाकर कुछ अनर्थ नहीं किया !

मायावती को काशीराम ने और काशीराम को पता नहीं किसने सपने में आकर कह दिया कि 'दलित शोषित समाज' के सनातन शोषण का कारण ब्राह्मण हैं। खुद नोटों की माला पहनती हैं !आदानी ,अम्बानी और टाटा बाटा से लेकर एससी /एसटी अफसरों से चंदा और चुनाव में उम्मीदवारों से धन वसूलती हैं। उन्होंने इस सिद्धांत को ब्राह्मणवाद या मनुवाद का नाम देकर देश की राजनीती में बरसों तक खूब मजे लिए हैं। बदकिस्मती से या राजनैतिक जनाधार की चिंता में कुछ प्रगतिशील और वामपंथी साथी भी इसी शब्दावली का प्रयोग करते रहते हैं। हालाँकि अंदर ही अंदर वे दिल से चाहते हैं की देश और दुनिया के तमाम गरीब शोषित वर्ग को शोषण से मुक्ति मिले !किन्तु विगत कुछ दिनों से उन्हें भी स्वर्गस्थ दलित नेताओं की सवारी आने लगी है। यूपी चुनाव के पूर्व देश का प्रगतिशील वर्ग कुछ हद तक अखिलेश और सपा के पक्ष में था। किन्तु जब जनता ने या ''श्रीराम लला'' जाने ईवीएम मशीन ने भाजपा को भरपल्ले से जिता दिया ! किन्तु सत्य कभी निरपेक्ष नहीं होता !जब देखा कि संघ परिवार और भाजपा ने योगी ठाकुर को सीएम बनाया है तो लोगों को लगा कि कमसे कम अब गरीब दलित और गरीब ब्राह्मण एक होकर अन्याय के खिलाफ लड़ सकेंगे। चूँकि एक ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया है ,इसलिए अब कोई ब्राह्मणवाद या मनुवाद  का  काल्पनिक खम्भा नहीं नोचेंगा । किन्तु जब विगत दिनों मेरठ ,अलीगढ़ ,सहारनपुर में दलित भीड़ ने एक झटके में पहले पिछड़ों को धोया। फिर  राजपूतों पर हमला किया तो बेचारे घासाहारी ब्राह्मणों का तो अब भगवान् ही मालिक है। दलित गुंडों ने एक निर्दोष राजपूत की जान लेकर योगी ठाकुर को ही चेलेंज कर डाला ,तो निरीह निहथ्ते वामन बनिया किस खेत की मूलीहैं ! अरे भाई जब भीमसेना ने सत्ता धारी दल के कार्यकर्ता को ही पीट दिया तो अब काहे के निर्बल -शोषित ? आपने तो  सावित कर दिया कि आप शोषित अथवा निर्बल नहीं हैं। ऐंसा आभासित हो रहा है कि आप लोगों को अब आइंदा आरक्षण -वारक्षण की नहीं बल्कि मुफ्त भक्षण की आवश्यकता है। अब बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग का क्या होगा ?

भारत के टॉप १०० भूतपूर्व सामंतों -पूंजीपतियों -नेताओं और व्यापारिक घरानों की लिस्ट में एक भी ब्राह्मण नहीं !लेकिन दलित वर्ग के दर्जनों लोग इस लिस्ट में होंगे। करूणानिधि,ऐ राजा ,दयानिधिमारन ,मायावती अजीत जोगी और अन्य अनेक नेता अफसर अरबपति  हैं। पिछड़ों में नवोदित अरबपतियों में स्वामी रामदेव ,सुब्रतो राय सहारा , आंध्र कर्नाटका के रेड्डी बंधू ,यूपी के मुलायमसिंह ,बिहार के लालू यादव,महाराष्ट्र के मुण्डे महाजन तो प्रतीक मात्र हैं!एमपी के सीएम शिवराजसिंहजी और राजस्थान सीएम वसुंधरा राजे की तो कोई चर्चा ही नहीं। खुद पिछड़े वर्ग के ज्योतिरादित्य सिंधिया,होल्कर परिवार और बड़ौदा के गायकवाड़ परिवारों को नहीं मालूम की कितना काला सफ़ेद धन कहाँ पर पड़ा हुआ है?लेकिन भीमसेना और बहिनजी को उससे क्या?उन्हें तो किसी महा गुरु घंटाल ने एक मंत्र रटा दिया कि जो कुछ है सो -ब्राह्मणवाद ही है !इससे आगे कुछ नहीं कहना सुनना !क्योंकि भेड़चाल का फ़क़त इतना ही अफसाना है। यदि उन्हें आर्थिक असमानता की नहीं सामाजिक असमानता की फ़िक्र थी,तो राजा मनु [ठाकुर] से लेकर योगी [ठाकुर]तक की महायात्रा में सिर्फ ब्राह्मणवाद का आविष्कार क्यों किया ? यूपी में बहिनजी को जब सत्ता अकेले दलित वर्ग के दम पर नहीं मिली तो सोशल इंजीनियरिंग के बहाने बेचारे गरीब वामनों को खूब फुसलाया। अपना उल्लू सीधा कर लिया। लेकिन वे उसका जबाब नहीं दे सकीं की तिलक तराजू और तलवार का क्या हुआ ? उन्होंने यूपी में जातीय आधार पर आर्थिक सर्वेक्षण क्यों नहीं करवाया ? इस उन्हें पता चल जाता कि  यूपी के ब्राह्मण हों या दक्षिण के ब्राह्मण हों ,अधिकांस को भगवान और गीता रामायण से ही संतोष है। बेचारे वामनों का वह हक भी योगियों [योगी आदित्यनाथ]र स्वामियों [स्वामी रामदेव]ने छीन लिया है ! ब्राह्मण यदि शोषक हैं ,अमीर हैं तो उनकी सूची जारी की जाये। जैसे अलपसंख्यक वर्ग में अजीम प्रेम जी ,दारुवाला ,घोड़ेवाला ,रेशमवाला,टाटा और नुस्ली वाडिया हैं ऐंसे ही धनिक ब्राह्मणों के नाम हों तो बताएं ! वैसे यदि देखा जाये तो अधिकांस वामपंथी वुद्धिजीवी और साहित्य्कार ब्राह्मण ही मिलेंगे। क्योंकि वे स्वयं शोषक नहीं हैं और  वे सम्पूर्ण मानव समाज को शोषण मुक्त देखना चाहते हैं। बहिनजी और भीमसेना को सोचना चाहिए कि हजारों लाखों ब्राह्मण वामपंथी ही क्यों होते हैं ?लाल झंडा हाथों में लेकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा क्यों लगाते हैं ? और हिंसा पर उतारू दलित वर्ग को पूंजीपतियों की लूट नहीं दिखती ?

यूपी विधानसभा चुनाव में वसपा- सपा की करारी हार के बाद सामाजिक क्रांति की जातीयतावादी नकारात्मक  शक्तियां वेरोजगार हो चुकी हैं ! कुख्यात तथाकथित मुल्ला 'मुलायम परिवार'ने तो पिछले दरवाजे से मोदी -योगी युतिसे गुप्त मैत्री गांठ ली है !लेकिन बहिन् जी के राजनेतिक अरमा आंसुओं में बह गये हैं ! इसीलिये पहले तो उन्होंने चुनाव में हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की कोशिश की ,किन्तु जब  नही फूट् सका तो भीमसेना के कंधे पर चढ़कर वे यूपी में कपालकुण्डला बनकर रक्तपान पर आमादा हैं। बहिनजी और उनके जातीयतावादी संरक्षण में पले बढे 'नव दवंग' तत्व विगत कुछ वर्षों से यूपी में ठाकुरों पर गुर्राने लगे थे ! अब योगी ठाकुर के गद्दीनशीन होते ही ठाकुरों कोअपनी ठकुराई दिखाने का पुनः इंतजाम किया जा रहा है। इसके मूल में बहिन जी और उनके पालित पोषित वे तत्व हैं जो दो-दो हजार के नोटों से बनी करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहनाते रहे हैं !योगी जी यदि बाकई ईमानदार हैं और यदि वे बाकई यूपी को अपराध मुक्त बनाना चाहते हैं तो गाय ,गोबर बूचड़खाने छोडकर ,लोगों को वेरोजगार बनाने के बजाय उन अधिकारियों ,नेताओं और भूतपूर्व मंत्रियों के वित्तीय साम्राज्य का विच्छेदन करें जो यूपी पर ३० साल से राज कर रहे हैं। इसमें कांग्रेस,सपा ,बसपा और भाजपा सभी के अनैतिक आर्थिक स्वार्थों का उच्छेदन किया जाना चाहिए। अकेले हाथी के बुतों को या बहिनजी के आर्थिक साम्राज्य को टारगेट नहीं किया जाना चाहिए !

बहिनजी के वित्तीय उद्गमों उदित राज और रामदास आठवले के अलावा यह सवाल अब तक किसी और दलित नेता या सवर्ण वुद्धिजीवी कभी नहीं उठाया ,क्यों ? सवाल यह भी है कि जो व्यक्ति या समूह  करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहना सकने में सक्षम है,वह यदि सरकारी अधिकारी हो ,नेता हो ,मंत्री हो तो उसके वित्तीय श्रोत की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए ?

!इसलिये उनके हताश अनुयाई अब धर्मांतरण की धमकी से अलीगढ़ ,आगरा,मुजफ़रपुर ,सहारनपुर ,मथुरा में योगिराज को और गुजरात ,महाराष्ट्र ,दिल्ली में मोदीराज को ही सांप्रदायिक च...ुनौती दे रहे हैं ! लेकिंन जो लोग धर्म परिवर्तन के लिये गंभीर हैं ,वे ज़िस किसी भी धर्म में शामिल होने की सोच रहे हैं ,उन समाजों के अन्दर अपनी आगामी पोजीशन का ठीक से पता कर लें ! क्योंकी जातीय असमानता सभी धर्म मजहब और देशों में है !पाकिस्तान में दलित की आवाज ही नही निकलती !देश विभाजन पर भारत के जो शेख सेयद मुगल पठान उधर गये थे , वे मुहाजीर होकर अभी भी मारे मारे फिर रहे हैं !

बुधवार, 17 मई 2017

विपक्ष को यदि जिन्दा रहना है तो ...........!

 यदि कभी यह सवाल उठे कि वर्तमान उद्दाम सरमाएदारी और भूमंडलीकरण के दौर में ,अतीत की पुनर्नवा सभ्यताओं के द्व्न्दात्मक दौर में, संगठित मज़दूर वर्ग के बजाय भारत में स्वतः स्फूर्त किसान आंदोलन ही ज्यादा आक्रामक क्यों हैं ? इस सवाल के जबाब की पड़ताल बहुत लाजमी है। आज जबकि यूरोप, अमेरिका, भारत जैसे देशों का मजदूर वर्ग संघर्षों के बियावान में खामोश है तब दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों में किसान आंदोलन जगने लगे हैं। भारत में किसान संघर्ष की ज्वाला हालाँकि सत्तापक्ष ने ही भड़काई है ,किन्तु किसानों का चरम असंतोष पूर्व से ही अपेक्षित था। यदि आइंदा किसानों का शोषण,दमन,उत्पीड़न [मध्यप्रदेश के मंदसौर ,रतलाम, नीमच की तरह]इसी तरह जारी रहा और विपक्ष पर राजनीति से प्रेरित  सीबीआई ,ईडी और आयकर विभाग के हमले जारी रहे, तो मौजूदा एनडीए सरकारें अच्छे दिन होने के बावजूद, जनता द्वारा सत्ता से बेदखल की जा सकती है !परन्तु इसके लिए एकजुट विपक्ष का मैदान में डटे रहना अनिवार्य है । इसके अलावा गैर भाजपाई विपक्ष की व्यापक एकता और दलीय परिमार्जन भी अनिवार्य है। बहरहाल मोदीजी को कांग्रेस की खामियों का फायदा मिलने से,यूपी उत्तराखंड में प्रचंड बहुमत ,मिलने और गोवा,मणिपुर में अल्पमत भाजपा द्वारा अनैतिक रूप में बहुमत सावित करने की हरकत से विपक्ष पहले ही पस्त हो चुका था। किन्तु अब सीबीआई ,आयकर ,ईडी के छापों से सभी विपक्षी दल हतप्रभ हैं। विपक्ष को यदि जिन्दा रहना है और देशमें लोकतंत्र जिन्दा रखना है तो सम्पूर्ण विपक्ष को अपने पूर्वाग्रह त्यागकर एकजुट होना ही होगा। विपक्ष के जो नेता आज भय या लोभ से दल बदल कर भाजपा में जा रहे हैं, वे आइंदा भले ही जयचंद मीरजाफर की लिस्ट में शुमार हों ,किन्तु अभी तो वे भारतीय राजनीति को और ज्यादा भ्रस्ट किये जा रहे हैं ! मोदी जी भले ही लाख कहें कि 'न खाऊंगा न खाने दूंगा' किन्तु दुनिया जानती है कि गैरभाजपा शासित राज्यों में गठबंधन बनाने और राज्य सभा में बहुमत हासिल करने के लिए उनके आज्ञाकरी अध्यक्ष अमित शाह और उनकी टीम ने हर भ्रस्ट विपक्षी को खरीदने की कोशिश की है ,वशर्ते कोई बिकाऊ हो !क्या यही शुचिता है ?क्या यही 'पार्टी विथ डिफरेंट' है ?क्या यही चाल ,चरित्र और चेहरा है ?वेशक कांग्रेस का शासन भ्रस्ट रहा है ,किन्तु मोदी शासन महाभ्रस्ट सावित हुआ है।

पीएम मोदी परम्परागत खुली पत्रकार वार्ता या टीवी इंटरव्यू से भले ही दूर भागते रहे हों ,किन्तु उनका 'एकालाप' याने भीड़ और मीडिया के समक्ष इकतरफा भाषण, निसंदेह लोकलुभावन हुआ करता है। उनके द्वारा रेडिओ पर संडे को 'मन की बात' निसंदेह हिंदी क्षेत्र में व्यापक करिश्माई असर रखती है। इसी तरह उनके प्रसादपर्यन्त भाजपा अध्यक्ष बने अमित शाह तो माशा अल्लाह इस कदर बोलू हैं कि सवाल करने वाला खुर्राट पत्रकार भी अपना माथा धुनने लगता है। इसी तरह भाजपा के तमाम प्रवक्ता ,मंत्री ,संतरी भी 'बड़े से बड़ा झूंठ' मुस्कारते हुए बोल जाते हैं । जबकि इसके विपरीत कांग्रेस के बड़े नेता अपनी 'सच बात' भी जनता के बीच ठीक से  नहीं रख पा रहे हैं। सोनिया जी ,मनमोहन सिंह जी तो कभी बोलना भी नहीं सीख पाए। राहुल गाँधी न तो विचारक हैं और न अमित शाह जैसे काईंयां ,वे किसी भी विषय पर अधिकार से नहीं बोल पाते। इसी तरह  मल्लिक्कार्जुन खड़गे भी बहुत उबाऊ और अटकेले हैं। कांग्रेस में जिन्हे बोलना आता है ,उनके मुँह सिल  दिए जाते हैं। आनद शर्मा ,गुलाम नबी आज़ाद ,सचिन पायलट ,माकन ,दीक्षित और ज्योतिरादित्य सिंधिया को यदि बोलने की  छूट दी जाए तो जनता को सब समझ आने लगेगा। वर्ना अभी तो सभी कांग्रेसी सोनिया ,राहुल की भृकुटी से आक्रान्त होकर अटक अटक कर बोल रहे हैं।

भारत के अनेक प्रतापी सामाजिक कार्यकर्ता [अण्णा हजारे टाइप ]और स्वामी रामदेवनुमा संत महात्मा वैदिक वाङ्ग्मय प्रणीत धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की बात करते हैं। वे अबोध जनता को एक खास राजनैतिक पार्टी के पक्ष में जुटाने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। उनके समक्ष देश के नंगे भूंखे किसानों पर दनादन गोलियां चलीं , लेकिन वे सभी जुए में हारे हुए पांडवों की तरह,हस्तिनापुर से बचनबध्द पितामह भीष्म की तरह निपट मौन रहे ! स्वयं ५६ इंची सीने के धारक स्वघोषित महाबली भी किसान हत्या पर मौन रहे !उनसे सवाल किया जाए कि गाय यदि पूज्य है ,अबध्य है, तो किसान क्या हलाल किये जाने का ही हिन्श्र पशु है ? निर्ममता और जघन्यता का इससे बड़ा -जीवंत उदाहरण और क्या हो सकता है ? आप बेधड़क आधुनिक कारपोरेट जगत के उदीयमान नक्षत्र बने रहिये। अम्बानी, अडानी, विजय माल्या ,सुब्रतो राय सहारा का 'सहारा' बने रहिये ,आप बेखौप बड़े पूंजीपतियों को अरबों की सब्सिडी और बेलआउट पैकेज दीजिये ,किन्तु अन्नदाता की ऐसी दुर्गति तो न कीजिये ! योगगुरु स्वामी रामदेव,श्री श्री और तमाम साधु संत महात्मा यदि चाहें तो किसानों की मदद कर सकते हैं !क्योंकि उनके समक्ष न केवल आवारा पूँजी [लक्ष्मी],न केवल 'नीम -हकीम खतरेजान' वाले वेरोजगार,न केवल सनातन मिलाबटिये ,न केवल आधुनिक तकनीकी में दक्ष युवा बल्कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी भी नतमस्तक हैं । सिर्फ किसान और मजदूर को ही बेमौत  मरने क्यों छोड़ दिया गया है ?

भारत में वेशक अभी हिंदुत्ववादियों का बहुमत है। हालाँकि भारत में अभी भी धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र की ही व्यवस्था है।लेकिन यदि भारत को हिन्दुत्ववाद के खूंटे से बाँध दिया गया, तो गरीबों पर बड़ी आफत आ जाएगी। क्योंकि हिन्दू धर्म-दर्शन और  विचार के अनुसार गरीबी -अमीरी,सुख- दुःख, शोषण -दमन को मनुष्यमात्र के निजी कर्मफल या 'हरिच्छा' से जोड़ दिया जाएगा ! कहने सुनने को तो हिन्दू और जैन धर्म बहुत बड़े अपरिग्रहवादी हैं। किन्तु उनका पूँजीवाद से बिचित्र नैसर्गिक और अपनत्व का नाता है। जबकि इस्लाम ,ईसाई ,यहूदी और और बुद्ध धर्म-मजहब में अपरिग्रह का नाम भी नहीं है,किन्तु इन मजहबों में मजदूर ,किसान के हितों की खूब परवाह की गई है। ईसाई धर्म में तो अनेक संत हुए जो सुतार -बढ़ई और चरवाहेभी थे। शायद यही वजह है कि इन पाश्चत्य धर्म मजहब में वैज्ञानिक आविष्कारों की गुंजायश बनी रही। जबकि हिन्दू और जैन धर्म में परम्परा से मुनि,ऋषि केवल अपरिग्रह पर बल देते रहे , कुछ तो  राजाओं और चक्रवर्ती सम्राटों के गुरु भी रहे, किन्तु जनता की लूट और शोषण को बंद कराने में कोई दिलचस्पी नहीं रही। कुछ हिन्दू जैन धर्मावलम्बी तो उच्चकोटि के विचारक होते हुए भी अधिसंख्य जनता के दुखों को उनके 'पूरब भव' के कर्म के हवाले करते रहे हैं । यही वजह है कि विदेशी हमलों के वक्त अधिकांस जनता 'अहिंसा परमोधर्म :' या 'प्रभु की इच्छा' 'संघं शरणम गच्छामि 'अथवा 'होहहिं सोइ जो राम रचि राखा' का समवेत गायनकरते हुए सदियों के लिए गुलाम होती चली गयी !मेहनतकशों की एकता ,उनका सही मार्गदर्शन और संघर्ष का माद्दा जिन्दा रहता तो भारत कभी गुलाम नहीं होता !

यह सर्वविदित है कि सिर्फ भारत में ही नहीं, एसिया में ही नहीं, बल्कि सारे संसार में एक चीज बहुत कॉमन है कि राजनैतिक विचरधाराओं के रूप में - लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद का कांसेप्ट उन्होंने यूरोप से ही लिया है । यह दुहराने की भी जरूरत नहीं कि इसकी केंद्रीय जन्मदात्रि ब्रिटिश संसद रही है। उन्होंने ११ वीं सदी के मैग्नाकार्टा से लेकर बीसवीं सदी के दो दो महायुद्धों और उपनिवेशवाद विखंडन तक के दौर से सीखते हुए लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद के विचारों को दुनिया में समृद्ध किया है। भारत ने  ब्रिटिश हुकूमत से वो सब सीखा जो ब्रिटिश ,फ्रेंच, जर्मन ,अमेरिकन और सारे संसार ने उनसे सीखा है। रेल ,बिजली, टेलीफोन,मोटरकार, स्कूटर, सायकिल,घड़ी,अखवार,टीवी, रेडिओ,कम्प्यूटर मोबाइल इत्यादि की तरह भारत के लोगों ने विभिन्न 'राजनैतिक विचारधारायें'  भी विलायत से ही उधार लीं हैं।  फिर भी मैं यही कहूंगा कि मेरा भारत महान ! भले ही मुझे दो रोटी के लिए आठ घंटे मजूरी करनी पडी हो!

वेशक भारत के पास कहने को अपना खुद का बहुतकुछ है। अजंता, एलोरा, एलिफेंटा ,कोणार्क ,नालंदा और महाबलीपुरम जैसे पुरातन खंडहर अवशेष तथा ताजमहल ,हुमायुंका मकबरा -अकबरका मकबरा जैसे ऐतिहासिक दाग भी यहाँ शिद्द्त से मौजूद हैं !हल्दीघाटी ,पानीपत ,कुरक्षेत्र, तराइन,पलाशी के रणक्षेत्र भी भारत की शर्मनाक पराजय के प्रतीक रूप में अजर अमर हैं। इसके अलावा ज्ञान ,ध्यान,कर्मयोग गीता,रामायण,वेद -पुराण,नाट्यशास्त्र,आयुर्वेद ,कामसूत्र तथा बाइबिल,कुरआन जैसी अनेक वेशकीमतीं साहित्यिक कृतियाँ भी यहाँ मौजूद  हैं। नागा साधुऒं की जमात ,धूतों -अवधूतों ,मलंगों-कापालिकों ,सूफियों ,नटों-मदारियों और चारण -भाटों की तो यह भारत भूमि हमेशा से ही उर्वरभूमि रही है ! इसके अलावा यहाँ और भी अनेक अद्भुत चीजें ऐसी हैं जो दुनिया के लिए किसी उजबक अजूबे से कम नहीं हैं । त्रिपुरा से लेकर हिंद्कुश पर्वत तक -हिमालय पर्यन्त और केरल से लेकर कष्मीर तक जो कुछभी भौगोलिक विस्तार है , वो सब भारत का सांस्कृतिक वैभव ही तो है। खजुराहो,कोणार्क, एलोरा, अजंता और दक्षिण भारत के मंदिर उनमें सर्वाधिक महत्व के हैं।     

रविवार, 14 मई 2017

सत्य की खोज का सही रास्ता !

सभ्य संसार में आदिम मानव से लेकर ऋग्वेद काल तक की यात्रा में  जितने भी अनसंधान या अन्वेषण हुए उनमें मनुष्य द्वारा 'ईश्वर की खोज' सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि  है !यदि धर्मान्ध और धर्मभीरु लोगों की बातों को न भी माने तो भी जानकारों ,इतिहासविदों ,पुरारतत्वविदों,वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की आम राय है कि सभ्यताओं के उत्थान -पतन ,भौतिक विकास और 'धर्म' का उदय इत्यादि उपादान ईश्वर अल्लाह की  परिकल्पना से पूर्व के हैं। भारतीय संस्कृत- वैदिक वांग्मय में अष्टाबक्र,जनक ,कपिल ,कणाद और अन्य मन्त्र द्रष्टा ऋषियों  के'तत्वदर्शन' में अद्भुत वैज्ञानिकता का समावेश निहित है।इसी तरह ओल्ड टेस्टामेंट और कुरान शरीफ में भी साइंटिफिक मानवीय जीवन जीने की कला का ही निर्देशन है। लेकिन कालांतर में अरब -मध्य एशियाई सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों ने अपनी युद्धपिपासा और साम्राज्य्वादी लूट की तृष्णा के कारण सारे एशिया और यूरोप को केवल चरागाह मन लिया। जबकि भारतीय उपमहा द्वीप के प्रगत मनुष्य ने आत्मा ,अविद्द्या , माया और इन सबके सर्वेश्रवा ' ईश्वर' को  अपना सर्वश्व अर्पित कर दिया। जब सारे विश्व का एक सृष्टा ,पालनहार और संहारक मान लिया तो फिर कोई पराया भी नहीं रहा। इसीलिये जब शकों,हूणों,कुषाणों ,तुर्को ,खिलजियों सैयदोंमुगलों ,अंग्रेजों ने भारत को चरागाह मानकर यहाँ मुँह मारा तो इन बर्बर कबीलाई समाजों को भारतीय सनातन परम्परा ने 'ईश्वर पुत्र 'मानकर 'बसुधैव कुटुंबकम' धर्म का पालन किया ! मिश्रित जीवन संस्कृति की यात्रा में व्यक्ति ,परिवार ,समाज को संचालित करने के लिए इस भारतीय भूभाग में सभी समाजों ने अपने धर्मग्रंथ ,और अपने अपने रीति रिवाज सहेज लिए। किन्तु आधुनिक पूँजीवाद और लोकतान्त्रिक राजनीती ने पुरातन मूल्यों, धर्म ,श्रद्धा और  पुरातन रीति रिवाजों को अप्रासंगिक बना दिया है। हिन्दुओं में जिस तरह सती प्रथा या बालविवाह अप्रासंगिक हो आगये उसे तरह इस्लामिक जगत में 'तीन तलाक'की अब कोई अर्थवत्ता नहीं रही। वेशक इस पर वोट की राजनीती और मजहबी उन्माद की खेती की जा सकती है !

इस २१वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, न केवल जाहिल बर्बर मजहबी आतंकी  बल्कि सभ्य शिक्षित और वैज्ञानिक समाज भी बुरी तरह गुत्थत्मगुत्थःहो रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर ,इस युग की दुनिया दो हिस्सों में बँटकर ,दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है। हर देश में, हर समाज में,हर मजहब में,हर कबीले में,हर परिवार में , तमाम नर नारी  विपरीत मोर्चों पर आपने सामने खड़े हैं ! हाँलाकिं वैश्विक स्तर पर कार्ल मार्क्स द्व्रारा आविष्कृत 'वर्ग संघर्ष' के सिद्धांत से पूर्व भी दुनिया इस धरती पर 'सभ्यताओं के संघर्ष' या कबीलाई संघर्ष विद्यमान रहे हैं। अशांति, द्व्न्द, विप्लव का सिलसिला  तो उतना ही पुराना है ,जितना पुराना परिवार, समाज और राष्ट्र !सभ्यताओं के संघर्ष का इतिहास भी बहुत पुराना है। लेकिन अतीतमें चूँकि 'शांति की खोज' और 'सत्य की खोज' के संसाधन बहूत सीमित थे ,और थे भी तो केवल धर्म दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित थे।  लेकिन वर्तमान लोकतान्त्रिक दुनिया में और आजाद एवं रोशन ख्याल दुनिया में अशांति क्यों बढ़ती जा रही है ?इसकी पड़ताल बहुत जरुरी है कि 'सभ्य संसार' में अशांति और  विप्लवी कोलाहल क्यों बढ़ रहा है ? 

जिस तरह असफल व्यक्ति ,असफल समाज और असफल राष्ट्र की दुनिया में कोई एक आदर्श स्थति नहीं हो सकती !उसी तरह सफल व्यक्ति ,सफल समाज और सफल राष्ट्र का भी दुनिया में कोई आदर्श मानकीकरण नहीं हो सकता ! जो व्यक्ति ,समाज या राष्ट्र सफल कहे जाते हैं वे देश, काल, परिस्थतियों के अलावा असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल  राष्ट्रों की मूर्खता का बेजा फायदा उठाते हैं। इस संसारमें हमेशा ही कुछ शक्तिशाली और नेकदिल करुणावान लोगों की मौजूदगी बनी रहती है,उनकी सदाशयता का बेजा फायदा उठाकर ही कुछ बदमाश और काइंयां लोग तथाकथित सफलता को प्राप्त होते रहते हैं। लेकिन तमाम असफल लोगो की असफलता के लिए बहुत हद तक वे खुद ही जिम्मेदार होते हैं। यह तथ्य न केवल तार्किक या बौद्धिक आधार पर , बल्कि आध्यात्म दर्शन के कार्य कारण सिद्धान्तानुसार  भी यह स्वयं सिद्ध है कि ''कोई किसी को सुख दुःख दने वाला नहीं हो सकता,सभी अपने अपने कर्म का फल भोगते हैं ''!
असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता याने अपने समय के समांनातर उनके पिछड़ने का खास कारण सिर्फ देश, काल, परिस्थतियाँ नहीं होतीं !और चतुर चालाक लोग भी पूर्णतः जिम्मेदार नहीं होते ! बल्कि असफल लोगों, असफल समाजों और असफल राष्ट्रों में जो संकल्प शक्ति और चेतना का अभाव हुआ करता है वह 'अभाव' ही उनकी तमाम असफलताओं का प्रमुख घटक माना जाना चाहिए। असफल लोगो,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता के लिए- सफल लोग,सफल समाज और सफल राष्ट्र कुछ हद तक कसूरवार अवश्य होते हैं। यह भी सम्भव है कि उनकी असफलता का कारण -देश, काल, परिस्थितियाँ भी हों! लेकिन  जिसके संकल्प में ईमानदारी ,मेहनत ,परिश्रम और सच्चाई न हो उसका रास्ता कभी सही नहीं हो सकता।  जिसका रास्ता सही नहीं हो ,उसका संकल्प भी सही नही होगा ! ऐंसा व्यक्ति,ऐसा समाज और  ऐसा राष्ट्र न तो आरक्षण से, न तर्कसे ,न कुतर्क से और न राज्य सत्ता प्राप्ति से आगे नहीं बढ़ सकता। वह  किसी बेहतर मंजिल पर कभी नहीं पहुँच सकता। मंजिल पर पहुंचने का हकदार वही है, जिसका संकल्प  सही  है !सवाल उठ सकता है कि सही रास्ता कौन सा है ? इसकी पड़ताल के लिए दुनिया का अनुभव मनुष्य के सामने पसरा पड़ा है।

यदि आपको साइंस टेक्नॉलॉजी और धर्म -दर्शन के साथ साथ आध्यत्मिक जगत के अध्यन में रूचि है, तो आपको जिंदगी के हर क्षेत्र में औरों की अपेक्षा अधिक जटिल सवालों से जूझना होगा। यदि आप 'परमानंद' प्राप्ति की ओर अग्रसर हैं ,यदि आप कैवल्यपद ,परमपद,अव्वयपद या मोक्ष की कामना पूर्ण करने में अनुरक्त हैं।  तो भले ही आपने संसार त्याग दिया हो ,सन्यास ले लिया हो, किन्तु आपको मुमुक्षु तभी कहा जा सकता है जब आप जीवित रहकर उसकी साधना कर सके। निसंदेह योगारूढ़ सन्यासी का मुमुक्षु हो जाना अर्थात अवतारी पुरुष जैसा हो जाना जैसा है ! लेकिन उसके लिए यह जरुरी है कि उसकी संकल्प साधना  के लिए वह जिन्दा कैसे रहेगा। ज़िंदा रहने के लिए उसे इस 'चैतन्य आत्मा' को इस नश्वर साधन धाम मानव शरीर में जिन्दा रहना होगा ! साधक को जिन्दा रहने के लिए आग पानी हवा ,रोटी ,फल के अलावा एक शांतिपूर्ण स्थल भी चाहिए । यदि उसके मुल्क में अमन नहीं ,फसलें नहीं और सुरक्षा या शांति नहीं तो देश फिर से गुलाम भी हो सकता है। तब साधक का कैवल्य ज्ञान ,बोधत्व और मोक्ष सब बेकार है।


शनिवार, 13 मई 2017

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का '' पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में दुर्गोत्सव के दौरान इंदौर के जेल रोड पर किसी बड़बोले साम्प्रदायिक कवि मुखारविंद से यह तथाकथित 'देशभक्तिपूर्ण' कविता  सुनी थी ! यह कविता खतरनाक संदेश के  उस अर्थ में अव्यवहारिक है कि पाकिस्तान कोई स्लेट पेन्सिल के द्वारा श्यामपट्ट पर लिखा गया कोरा  शब्द मात्र नहीं है ,कि जब चाहा लिख दिया और जब चाहा मिटा दिया। आज हम जिस धरती को  पाकिस्तान कहते हैं अतीत में वह न केवल सिंधु घाटी सभ्यता अपितु ऋग्वेद सहित अधिकाँस वैदिक वाङग्मय के सृजन की पावन धरा रही है ! आज पाकिस्तान का मूल स्वभाव हिंसा आधारति मजहबी कदाचरण भले हो गया है ,किन्तु अतीत में जब वह कुरु -पांचाल था ,प्रागज्योतिषपुर था और सैंधव सभ्यता का केंद्र था, तब सारी दुनिया इस उर्वर शस्य स्यामला भूमि को ललचाई नजरों से देखती थी। आर्यावर्त-जम्बूद्वीप और भरतखण्ड के क्रमिक विकाशवादी दौर में इस भूमि पर ''वसुधैव कुटुंबकम'' और ''ईश्वर: सर्वभूतानाम....... " का भी उद्घोष बहुत काल तक होता रहा है !अब यदि वहां कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का वर्चस्व है, तो इससे वहाँ की तमाम नदियां,पर्वत और माटी को 'पापी' कैसे माना जा सकता है ?आज के पाकिस्तान में भी कुछ अमनपसंद आवाम और मेहनतकश हैं और सभ्य शहरी लोगों को भारत से कोई दुश्मनी नहीं है। !इसलिए उन मुठ्ठी भर आतंकियों के कारण जो कश्मीर में आग मूत रहे हैं ,पत्थर फनक रहे हैं मारने के लिए यह कहना उचित नहीं कि ''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''!

वेशक पाकिस्तान में छिपे आतंकियों ,पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी सरकार की ओर से भारत के खिलाफ अनेक आपत्तिजनक खुरापातें निरंतर जारी रहती हैं ! लेकिन जब उसका माकूल जबाब हमारी सेनाऐ दे रहीं हैं, तो फिर सो शल मीडिया पर और नेताओं की भाषणबाजी में 'पाकिस्तान को माकूल जबाब देने का विधवा विलाप क्यों ? नेताओं और मंत्रियों को यह कहने की  क्या जरूरत कि 'हमारे शहीद  सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जायगी' ? वेशक शहीदों की कुर्बानी अनमोल है,किन्तु दो के बदले दस मार दने से उनकी भरपाई कैसे होगी ?क्या सारी अच्छाइयां भारत में मौजूद हैं? गांधी हत्या से लेकर निर्भया काण्ड तक की तमाम काली करतूतें क्या पाकिस्तान ने कीं हैं? क्या पाकिस्तान में शिया,सूफी और हिन्दू ईसाई नहीं हैं। भले ही वे बहुत कम बचे हैं ,लेकिन जब तह वे वहां हैं ,तब तक पाकिस्तान की बर्बादी के बारे में सोचना ही मूर्खता है !यदि कश्मीर समस्या को व्यवहारिक तरीके से सुलझाया गया होता ,यदि अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान को अपना पिट्ठू न बनाया होता ,तो पाकिस्तान की मजाल नहीं थी किवह भारत की ओर आँख उठाकर देख सके ! वैसे भी भारतीय सनातन धर्म परम्परा और वैदिक मतानुसार जिस परमात्मा ने भारत [इण्डिया] बनाया है ,उसी ने पाकिस्तान का भी निर्माण किया है ,इसलिए धरती के नक्शे पर से उसका नाम मिटाना मनुष्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं है । मार्क्सवाद ,लेनिनवाद और सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद भी किसी राष्ट्र को नष्ट करने के पक्ष में नहीं है। केवल अंध्रराष्ट्रवाद और मजहबी आतंकवाद से ही समस्त धरती को खतरा है।  श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 11 मई 2017

यदि कोई व्यक्ति चारों वेद-पुराण अष्टदश ,बाइबिल ,जेंदावस्ता और कुरआन का परम ज्ञाता -उदभट विद्वान है ,तो उसको नमन !लेकिन यदि कोई व्यक्ति निपट अंगूठा टेक है ,चरवाहा है , किसान -मजदूर है और वह शोषण -उत्पीड़न ,धर्मान्धता से संघर्ष का माद्दा रखता है तो उसे बारम्बार नमन !

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

१ -मई  अन्तरराष्ट्रीय  मजदूर दिवस -जिंदाबाद !


मई दिवस के शहीदों को लाल सलाम ! शिकागो के अमर  शहीदों को लाला सलाम !

दुनिया के मेहनतकशो - एक हो जाओ ! एक हो जाओ !!

हर धंधे के मेहनतकशो -एक हो जाओ ! एक हो जाओ !!

हर धर्म मजहब ,हर जात के मेहनतकशो -एक हो जाओ !एक हो जाओ !!

प्राइवेट सेक्टर में काम के घंटे आठ करो ! निनी क्षेत्र के कामगारों को जॉब की गारंटी दो !

अम्बानी ,माल्याओं ,सहाराओं की जागीर नहीं -हिन्दुस्तान हमारा है !

शिक्षा स्वास्थ्य का बजट कम करने वाले होश में आओ !

रिलायंस -जिओ की पैरवी करने वाले नेता होश में आओ !!

जो अडानी अम्बानी का यार है,,, वो देश का गद्दार है !

सरकारी सार्वजनिक उपक्रमों की लूट बंद करो !

भृष्टाचार पर रोक लगाओ !

जम्मू- कश्मीर और बस्तर में मची  तकरार- कौन है इसका जिम्मेदार ? ये सरकार वो सरकार बड़बोले नेताओं की सरकार !!

गुरुवार, 30 मार्च 2017

रामलला टाट में और भाजपाई ठाठ में हैं।

यूपी चुनाव जीतने के दुसरे दिन ही लखनऊ में स्वामी रामदेव ने यूपी के नए नवेले मुख्यमंत्री 'योगी आदित्यनाथ' के साथ मंच साझा किया। योगी जी ने इस अवसर पर कहा कि 'सूर्य नमस्कार' और 'नमाज' की शारीरिक मानसिक क्रियाएं लगभग एक जैसी ही हैं । उन्होंने और ज्यादा कुछ नहीं बोला । लेकिन स्वामी रामदेव ने अपने 'योगबल' के आवेश में आकर न केवल यूपी बल्कि सारे 'अखण्ड भारत' में  'रामराज्य' का ऐलान भी  कर दिया है। उन्होंने हर्षातिरेक में आकर आगामी २१ जून-२०१७ के योग कार्यक्रमों का एजेंडा प्रस्तुत किया। तदनुसार वे 'रामराज्य' की चर्चा यों कर रहे थे तो मानों अपने 'पंतजलि- साम्राज्य' का ही प्रचार कर रहे हों! यह तो वक्त ही बतायेगा कि आइंदा 'रामराज्य' आएगा या 'माहिष्मती साम्राज्य' के उस 'बाहुबली' जैसा हश्र होगा,जिसे उसके ही वफादार सेवक 'कटप्पा' ने धोखे से मार दिया था । बहरहाल इस तरह के मंचों के आयोजन से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिनों दिन बढ़ती जाती व्यक्तिगत ख्याति और उनकी संविधानेतर पलटन के तेवरों से मोदीजी को नयी चुनौती तैयार हो रही है। इससे वे लोग ज्यादा शशँकित हैं जो धर्मनिरपेक्ष हैं। इसके अलावा 'एंटी रोमियो स्काड' और बूचड़खाने नियंत्रित करने के बहाने यूपी के रोजनदारी मजदूर-कर्मचारी,छोटे कारोबारी,सीमान्त किसान,दलित और अल्पसंख्यक का जीवन संकट में आ चुका है। वे लोग भी चिंतित हैं जो किसी तरह का साम्प्रदायिक फसाद नहीं चाहते !

भाजपा के चुनावी एजेंडे में अथवा 'संघ नेतत्व' के जेहन में 'रामराज्य' की आकांक्षा कोई नयी बात नहीं है। आजादी से पूर्व 'हिन्दू महासभा'और 'संघपरिवार' ने  आजादी के उपरान्त अपने इन्ही उद्देश्यों के निमित्त 'जनसंघ' का निर्माण किया था। जिसके सिद्धांतों में 'हिन्दू अस्मिता' और 'रामराज्य' को प्रमुखता से तस्दीक किया जाता रहा है। ई.सन १९८० के मुम्बई स्थापना अधिवेशन में 'भाजपा'ने अपने घोषणापत्र में 'गांधीवादी समाजवाद' का बहुत गुणगान किया। रामराज्य को गांधीवादी रास्ते से लाने का संकल्प भी लिया गया। गाहे बगाहे उसका प्रचार प्रसार भी किया जाता रहा है। गलतफहमी या बदकिस्मती से उनके इस रामराज्य अभियान को अल्पसंख्यकों ने अपने खिलाफ मान लिया। परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी सुरक्षाके लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की चुनावी राजनीति में साम्प्रदायिक ध्रुबीकरण करते हुए 'टेक्टिकल वोटिंग' का खतरनाक रास्ता चुना । धर्मनिरपेक्ष पूँजीवादी दलों और अल्पसंख्यक नेताओं ने इस वर्ग का खूब भयादोहन किया। इमाम बुखारी से लेकर लालू,मुलायम, माया ,ममता और कांग्रेस ने भी इसे सालों तक खूब भुनाया है । चूँकि हिन्दू समाज तो जातियों और भाषाई खेमों में बुरी तरह बँटा हुआ है,इसलिए जब गैरभाजपा राजनीतिक शक्तियोंने ने दलित -अल्पसंख्यक एवम पिछड़े वर्ग को एकजुट कर नकली धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की खिचड़ी पकाई, तो बहुसंख्यक वर्ग के साम्प्रदायिक नुमाइंदों को सत्ता में आने का मौका मिल गया। मंडल आयोग की रिपोर्ट का अमल यदि क्रिया था तो 'कमण्डलवाद' उसकी प्रतिक्रिया रहा और कमण्डल की प्रतिक्रिया स्वरूप संघ का 'कमलदल' अब शिद्दत से खिल रहा है !लेकिन रामलला अभी भी बेघर हैं !

विगत यूपीए -दो के मनमोहन राज में जब उच्च वर्ण के गरीब मजदूरों, बेरोजगार युवाओं को लगा कि आजादी के ७० साल भी उनका किसी पार्टी के राज में कोई उत्थान नहीं हुआ तो वे अन्ना हजारे- स्वामी रामदेव के बहकावे में आ गए। उनसे कहा गया कि यदि कांग्रेसको हरा दोगे तो कालाधन वापिस सफेद हो जाएगा। यदि भाजपाको जिताओगे तो रामराज आ जाएगा। अच्छे दिन आयँगे। चूँकि मनमोहन सरकार के कुछ मंत्रियों और नेताओं ने भृष्ट-आचरण को बढ़ावा दिया था। और बहुतेरे आरक्षित वर्ग के परिवारों का नाम भी मलाईदार सूची में शामिल हो चुका था, इसलिए सवर्ण -दलित -पिछड़े वर्ग के लोगों ने भाजपा और मोदीजी को सत्ता सौंप दी! लेकिन बहुसंख्यक समाज ने  'संघ' की शरण में जाकर मोदी और योगी पर जो यकीन किया है ,उसका निर्णय आगामी इतिहास करेगा ,कि उनका यह जनादेश सही था या गलत ! मोदी इफेक्ट की बदौलत बिहार यूपी के अधिकांस युवाओं ने बहरहाल जातिय आरक्षण के मंडल अवतार पर कमण्डल को तवज्जो देना शुरूं कर दिया है । इससे आइंदा भाजपा को शेष राज्यों में भी बढ़त मिलेगी और आगामी २०१९ के आम चुनाव में भी मोदी जी को ही विजय मिल सकती है। भारत विकास का यह मोदी मॉडल रुपी 'बेड़ा'आइंदा 'मंदिर-मस्जिद विवाद' के भंवर से दूर रहता है,साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखता है तो निसन्देह भारत भी विकास की लंबी छलांग लगा सकता है। लेकिन इसके लिए हिन्दू -मुस्लिम दोनों पक्षों को बहुत सब्र से काम लेना होगा।

सुब्रमण्यम स्वामी ,स्वामी रामदेव और यूपी के विजयी उत्साहीलाल भले ही योगीजी और मोदीजीको मंदिर निर्माण के लिए उकसाने की फिराकमें हों किन्तु ये दोनों दिग्गज नेता 'सबका साथ सबका विकास' छोड़कर साम्प्रदायिक दंगों के गटर में अब शायद ही डुबकी लगाने को तैयार हों। भारतीय आशा की किरण वह गंगा-जमुनी तहजीव है जो हर संकटमें राष्ट्रीय एकता की राह दिखाती रहती है। अयोध्या का मंदिर -मस्जिद विवाद इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सुप्रीम कोर्ट में है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि दोनों पक्ष इस मामले को अदालत के बाहर द्वीपक्षीय समझौते से हल करने का प्रयास करें। कोर्ट की इस अपील के बाद कमोवेश दोनों पक्षों की संतुलित प्रतिक्रिया रही है। हिन्दू -मुस्लिम पक्षके चन्द अगम्भीर कट्टरपंथी भलेही अल्ल -बल्ल बकते रहते हैं ,किन्तु दोनों ओर के कुछ जिम्मेदार लोग बहुत सावधानी बरत रहे हैं। यह आशाजनक और सौभाग्यसूचक है। अधिकान्स मुस्लिम उलेमाओं और बाबरी मस्जिद के पक्षकारों का कहना है कि अदालत जो भी फैसला देगी हम उसे तहेदिल से मान लेंगे। उधर मुख्यमंत्री योगीजी और अन्य हिन्दू धर्मगुरु भी अब संविधान के दायरे में हल निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन फिर विवाद के सुलझने में अड़चन क्या है ? इस सवाल का जबाब आसान नहीं है। यह इतिहास का वह काला पन्ना है जिसे फाड़ा नहीं जा सकता।
अयोध्या मंदिर -मस्जिद विवाद पर आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निवृत्तमान सहनिर्देशक श्री केके मोहम्मद के अनुसार विवादित स्थल की खुदाई में जो अवशेष मिले हैं वे सावित करते हैं कि पहले वहाँ मंदिर अवश्य था। कायदे से श्री केके मोहम्मद साहिब के बयान और खुदाईमें प्राप्त तत्सम्बन्धी मृदभाण्डों और सबूतों के आधार पर यह उम्मीद बनती है कि फैसला मंदिर के पक्ष में होना चाहिए। लेकिन ब्रिटिश संविधान प्रेरित आधुनिक भारतीय न्याय व्यवस्था को इतना साक्ष्य पर्याप्त नहीं है। उसे लिखित प्रमाण चाहिए। शायद इस कमजोरी को दोनों पक्ष के विद्वान समझते हैं। इसीलिये स्वर्गीय अशोक सिंघल और आडवाणी जैसे लोग इस विवाद को कानून से परे,आस्था का मुद्दा मानते रहे हैं। इसी नवागन्तुक ब्रिटिश कानून की बिना पर बाबरी मस्जिद के पक्षकार मौलाना हाजी साहबका कहना है कि खुदाई में 'राम के ज़माने की कोई चीज 'नहीं मिली। गनीमत है कि उन्होंने ये नहीं कहा कि 'राम तो मिथ हैं '! वैसे भगवान श्रीराम को 'मिथ' बताने वाले नामवरसिंह और रामचन्द गुहा अब मोदीभक्त हो गए हैं। प्रोफेसर हबीब इरफ़ान शायद मस्जिद मोह के कारण 'श्रीराम' को 'मिथ' बताने में जुटे हैं। यदि वे आर्केलॉजिकल सर्वे के रिपोर्ट पढ़ेंगे तो मंदिर के पक्ष में भी हो सकते हैं। वैसे हाजी साहब की बात में दम है.उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि खुदाई में वेशक बहुत कुछ मिला है लेकिन 'श्रीराम के समय का कोई चिन्ह नहीं मिला' !उनके इस तर्कका जबाब मेरे पास है। हालाँकि मैं न तो हिंदुत्ववादी हूँ और न बाबरी मस्जिद का समर्थक!किन्तु  हाजी साहब और तमाम मित्रों के समक्ष एक सच्चा उदाहरण पेश करता हूँ !

मेरे पितामह का जन्म पुरानी 'धामोनी' रियासत में हुआ था। हैजा फैलने पर वे १९वीं शताब्दी के अंत में सपत्नीक पास के ही गांव पिड़रुवा आ वसे थे ! जब हमारी पीढी के जिज्ञासु वंशजों ने वहां की खोज खबर ली तो पता चला कि जिस जगह हमारे पूर्वजों का छोटा सा पत्थरों का मकान था,वहां अब खण्डहर भी  नहीं बचा जो बताए कि 'इमारत बुलन्द' थी! ज्ञातव्य हो कि १६वीं सदी के बादसे धामोनी स्टेटपर मुगलों के किसी अदने से सूवेदार का कब्जा रहा है उन्होंने धीरे-धीरे हमारे पूर्वजों को वहाँ से खदेड़ना जारी रखा !धामोनी में ब्राह्मण और जैन समाज के अलावा गौड़ आदिवासी और लोधी ठाकुर बहुतायत में थे। चूँकि जैन और ब्राह्मण वर्ग शुद्ध शाकाहारी थे अतएव आक्रांताओं के मांसाहारी कल्चर और युद्ध जैसे निरंतर रक्तपात से उतपन्न महामारी के कारण घबराकर धामोनी छोड़ गए। उनके खेत खलिहान मकान,दूकान सब कुछ मुस्लिम परिवारों को दे दिए गए । मेरे पूर्वजों के मकानके पत्थरों से किसी मुस्लिमने मकान बना लिया। जिस जगह  पूर्वजों का मकान था वहाँ उन्होंने किसी मरहूम को दफ़्न कर दिया ,और जहाँ मंदिर था वहां उन्होंने मस्जिद बनाली। अब यदि सुप्रीम कोर्टके आदेश पर मेरे पूर्वजों की जन्मभूमि पर खुदाई की जाये तो वहाँ किसी मरहूम मुस्लिम स्त्री या पुरुष के नरकंकाल ही शेष मिलेंगे ! और हमारे पूर्वजों ने समझदारी दिखाई कि 'ठाकुरबाबा' और अन्य देवताओं को बाइज्जत  साथ लेते आये ,जो आज भी पिड़रुवा ग्राम में आबाद हैं। वर्ना वे सभी देवी देवता किसी  कुआँ बाउड़ी में फेंक दिए गए होते या धसान नदी में बहा दिए गए होते। अथवा किसी मस्जिद के द्वार पर जमींदोज कर दिए गए होते !अब प्रोफेसर हबीब इरफ़ान या रोमिला थापर कहे कि आपके पूर्वज तो मिथ हैं ,आपके पूर्वजों के खेत ,खलिहान ,मंदिर और देवी देवता मिथ हैं ,तो इससे बड़ा महाझूंठ और  पाखंड क्या होगा ?

धामोनी रियासत  पर मुगलों के आक्रमणों और महामारियों से उसके उजड़ने से पूर्व,अधिकांश निर्वासित हिन्दू आसपास के गाँवों - पिड़रुवा,सेसई मालथोन या सागर नगर जा वसे !लेकिन वे किस तारीख को उधर से इधर हुए और मूर्तियों के विस्थापन की कोई तारीख किसी सरकारी गजट में दर्ज नहीं है। वे किस जगह से उखाड़ी गइं ? कौन लाया ? कैसे लाया यह विवरण भी कहीं लिखित में उपलब्ध नहीं है। लेकिन वे मूर्तियां आज भी उपलब्ध हैं। हमारे पूर्वजों के खेतों पर जिनका कब्जा है वे भी उपलब्ध हैं। और वे भी मानते हैं कि 'यह सब तुम्हारे पूर्वजों का ही है लेकिन लिखित में अब  सब कुछ हमारा है।' कोई भी ईमानदार और समझदार इंसान बखूबी सोच सकता है कि जब इस छोटी सी घटना का एक सभ्य सुशिक्षित हिन्दू ब्राह्मण परिवार के पास पूर्वजों की थाती का कोई सबूत नही है, तो पुरातन अयोध्या नगरी उर्फ़ साकेत उर्फ़ अवध के ५ हजार साल पूर्व की किसी राजसी वैभवपूर्ण की सभ्यता के अवशेषों को,लकड़ी मिट्टी,पत्त्थर के भवनों को २१वीं शतब्दी की अयोध्या में खोजने की मशक्कत कितनी बेमानी है? सोचने की बात है कि इन हालात में कोई भी न्यायालय क्या निर्णय दे सकता है ? वैसे भी अयोध्या का इतिहास सिर्फ मुगल आक्रमण का बर्बर ही इतिहास नहीं है,बल्कि उनसे पूर्व तुर्कों,अफगानों,शक ,हूण ,कुषाणों और तोरमाणों ने भी उसे बर्बाद किया है। इसके अलावा भारत के ही अनेक रक्तपिपासु राजाओं ने भी उसे लूटा होगा! जब सारी दुनिया में कुदरती उथल पुथल निरन्तर मचती रहती है तो विगत ५-६ हजार सालमें इस अयोध्याकी कितनी दुर्गति न हुई होगी ?इतनी शतब्दियों में कितने प्राकृतिक झंझावत नहीं आये होंगे ? इसलिए 'राम जन्म' भूमि का सबूत मांगने वालों से निवेदन है, कि भगवान् श्रीरामचंद्र जी के ज़माने के अवशेष खोजने की बात करके 'सत्य' का उपहास न करें !

वेशक आप धर्म -मजहब वाले हों या विधर्मी हों किन्तु मजहब -धर्म की राजनीति न करें !और धर्म -मजहब को राजनीती में न घसींटे !विगत लोक सभा चुनाव में अल्पसंख्यक टेक्टिकल वोटिंग से प्रभावित होकर ,विराट संख्या में हिन्दू समाज के निम्न मध्यमवर्ग के युवाओं ने भी एकजुट होकर मध्यप्रदेश, छग राजस्थान ,झारखण्ड और अब यूपी में खूब ताकत हासिल कर ली है । हालांकि उन्होंने पहले भी इन प्रान्तों में भाजपा को ही थोक में वोट दे दिए हैं । लेकिन अब तो मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा का समर्थन करना शुरूं कर दिया है ,यह बात जुदा है कि कुछ लोग इसे अभी मान नहीं रहे हैं। लेकिन यूपी की जीत और वोटों का गणित स्पष्ट बता रह है कि कुछ तो अवश्य हुआ है। वेशक मोदीजी और योगीजी वाली आक्रामकता धर्मनिरपेक्ष दलों में नहीं है किन्तु उनके समर्थक भी रामभक्त हो सकते हैं । इसीलिये भले ही अभी कांग्रेस की जगह भाजपा ने लेली है ,लेकिन भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बनाए रखते हुए न केवल मंदिर -मस्जिद विवाद हल करना है बल्कि आम सहमति से रामलला का मंदिर भी बन जाये तो कोई बुराई नहीं। यदि कुछ दूरी पर मस्जिद भी हो तो सोने में सुहागा !
बहुसंख्यक सवर्णोंको एकजुट करने में साईं लालकृष्ण आडवाणी,मुरलीमनोहर जोशी और सुश्री उमा भारती का विशेष हाथ रहा है। उनके अरमानों को तब पंख लग गए जब गोधरा में कुछ मुस्लिम आतंकियों ने रेल में कारसेवकों को जिन्दा जला दिया। इस जघन्य घटनाके बाद जब मुम्बई बम बिस्फोट नरसंहार हुआ तो 'हिंदुत्ववादी' नेताओं को 'रामराज्य' का इल्हाम होने लगा । इसके निमित्त वे फिर से 'रामलला' की ओर मुखातिब हुए । और तब अयोध्या का मंदिर मस्जिद विवाद तेज होता चला गया !  जिसकी बदौलत मोदीजी सुर्खुरू होते चले गए ! उसी के प्रसाद पर्यन्त अब तमाम हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा का परचम लहरा रहा है। 'रामलला'की असीम अनुकम्पा से एनडीए की अटल बिहारी सरकार भी ६ सालतक सत्ताका स्वाद चख चुकी है।लेकिन वह सरकार 'शाइनिंग इण्डिया' एवम 'फील गुड' महसूस करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गयी थी ! परिणामस्वरूप २००४ से २०१४ तक मनमोहनसिंह के नेतत्व में यूपीए की गठबंधन सरकार सत्ता में रही। चूँकि कांग्रेस अल्पमत में थी ,इसलिए डॉ मनमोहनसिंहको अनेक बार झुकना पड़ा और गलत समझौते करने पड़े। वे भ्र्ष्टाचार को रोक नहीं सके तो जनता ने फिर से एनडीए को याने भाजपा को याने मोदी सरकार को सत्ता सौंप दी। इस बार यूपीमें मोदीजी की बाचालता रंग लायी और चुनाव में बम्फर जीत हुई इसीलिये अब उनके अलावा योगीजी भी उनके सहयात्री हो गए हैं। इन हालात में मंदिर वाली बात उठना स्वाभाविक है।

मंदिर निर्माण विषयक योगी जी और संघ परिवार की समझ बिलकुल स्पस्ट है। लेकिन अदालत के निर्णय को जस का तस मानेंगे या संविधान संशोधन करते हुए रामलला को टाट से निकालकर 'भव्य मंदिर' में उचित सम्मान दिलाएंगे ये दोनों ऑप्शन उनके सामने विद्यमान हैं।क्योंकि भारी जनादेश केवल विकास के लिए या केवल किसान कर्जमाफी के लिए नहीं दिया गया है। ,,,,,,,,, 

दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद ने जो कहर बरपाया है और चेरिटी के नाम पर ईसाई मिशनरीज ने विगत ३०० सालमें इस भारत भूमिपर जोकुछ भी किया है ,उसका इतिहास हिंदुओं ने कभी नहीं लिखा। वास्तविक हिंदुत्ववाद में क्षमा,दया, करुणा,परोपकार और विनम्र शरणागति वाले मूल्योंको अधिक महत्व दिया जाता रहा है।किन्तु इस दौर का राजनैतिक ' हिंदुत्ववाद' और उसका काल्पनिक 'रामराज्य' केवल छलना मात्र है। उसके आभासी दुष्प्रचार मात्रसे भारत के केंद्र में मई -२०१४ से मोदी सरकार सत्ता में है,२० मार्च -२०१७ से यूपी स्टेट में योगी सरकार अपने प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में है। लेकिन रामलला अभी भी टाट में हैं और भाजपाई ठाठ में हैं। इसके अलावा आतंकवाद ,आर्थिक विकास ,शैक्षणिक- सामाजिकउत्थान ,वैदेशिक नीति में सकारात्मक सुधार, महँगाई- भृष्टाचार के मामले में  कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दृष्टव्य नहीं है। इतने लंबे अरसे बाद देश में कहीं भी 'रामराज्य' का कोई नामोनिशान नहीं है। शायद इसीलिए अब अपराधबोध से पीड़ित लोग 'रामराज्य' की चर्चा फिर करने लगे हैं। स्वामी,बाबा और योगीजन तो इस प्रयोजन में 'निमित्तमात्रम च भवसव्यसाचिन' हैं।

रामराज्य बनाम पूँजीवादी लोकतंत्र के विमर्श में बहुसंख्यक हिन्दू युवाओं को मोदीजी का अनगढ़ 'विकासवाद' खूब पसन्द आ रहा है !आम तौर पर आधुनिक युवाओं को सोशल मीडिया पर 'हर हर मोदी' कहते सुना जा सकता है। इन वेरोजगार युवाओं को पूँजीवाद के घृणित शोषण -उत्पीड़न से कोई शिकायत नहीं। अपने जीवन के निमित्त कोई आर्थिक सामाजिक चेतना और समझ कायम करने के बजाय वे 'मन्दिर मस्जिद विवाद' पर अधिक चर्चा करते हुए देखे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बात की तो युवा वर्ग ने तत्काल रूचि दिखाई किन्तु जबलपुर के खमरिया डिफेंस फेक्ट्री में दो हजार करोड़ का असलाह जल जाने से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। देश का अधिकांस मिल्ट्री इंतजाम ढुलमुल है पर किसी को कोई चिंता नहीं। अधिकान्स सत्तारूढ नेताओं को सिर्फ वोट की फ़िक्र है। इसीलिये वे  हिन्दू मुस्लिम दोनों पक्षों को साधनेकी दिशामें प्रयत्नशील हैं। इसके लिए उन्हें स्वामी रामदेव ,श्रीश्री रविशंकर और मोहन भागवत जी की सेवायें उपलब्ध हैं। वे सभी इस जुगाड़ में हैं कि राज्यसभा में बहुमत होने के बाद संविधान में कुछ बड़े संशोधन कर दिए जायें !इसके वावजूद यह अकाट्य सत्य है कि जबतक मोदीजी पीएम हैं ,वे पूँजीवादी विकासवाद का दामन नहीं छोडेगे। 'सबका साथ -सबका विकास'केअनुसार मोदी जी वास्तविक धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करने के पक्ष में रहेंगे क्योंकि गुजराती वणिक संस्कार यही सीख देते हैं। मोदी जी ने मुख्यमंत्री के रूप में अतीत में भी  'हिन्दुत्वाद' और 'रामराज्य' से ऊपर बाजारबाद को ही तरजीह दी थी। दरअसल  हिंदुत्व और रामराज्य तो केवल वोट कबाड़ने का मंतव्य मात्र है।

यद्द्पि 'रामराज्य' को गोस्वामी तुलसीदास जी ने खूब सराहा है। सभी जानते हैं कि 'हरि व्यापक सर्वत्र समाना' की तरह ही भृष्टाचार और अनैतिकता भी सर्वव्यापी है!और सभी जन यह भी जानते हैं कि जिस 'रामराज्य' के लिए 'संघ परिवार' वाले लालायित हैं वह भी परफेक्ट नहीं था। उसमें भी सैकड़ों विसंगतियां और हजारों असहमतियां थीं ! कैकेयी जैसी विमाता से आधुनिक महिलाओं को क्या सीखना चाहिए ? जिसने खुद तीन-तीन शादियाँ कीं हों ,जिसने शिकार के लालच में एक निर्दोष  श्रवणकुमार को मार डाला हो ,उस नरेश  आधुनिक युग के पिताओं को क्या सीखना चाहिए ?से क्या सीखना चाहिए धोबी जैसा कृतघ्न आलोचक था और लक्ष्मण जैसे कठोर हृदय देवर भी थे जो केवल बड़े भाई की आज्ञा के सामने हमेशा नतमस्तक रहते और उन्ही की आज्ञा से अपनी माँ समान गर्भवती भावी को वियावान जंगल में अकेला छोड़ने को तैयार हो गए। रामायण यदि बाकई इतिहास हैए तो 'शम्बूक बध' भी मिथ नहीं हो सकता। उसे भी स्वीकार करना होगा।  

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

इस्लामिक आतंकवाद से इस्लाम को सबसे अधिक खतरा है

२२-२३ मार्च को जब सारा संसार 'आईएसआईएस' के ब्रिटश माड्यूल्स द्वारा लंदन पर जघन्य और हिंसक हमले के खिलाफ लामबन्द हो रहा था ,एक स्वर से इस दरिंदगी की भर्त्सना कर रहा था ,तब भारतीय मीडिया शुतरमुर्ग की भूमिकामें फोकट की जुगाली कर रहाथा। भारतीय मीडिया के विमर्श के केंद्र में या तो यूपी का 'योगीराज' था या नवजोतसिंह सिद्धू और शिवसेना के कुख्यात सांसद गायकवाड़की जिद के चर्चे थे। भारतका प्रगतिशीलऔर बुद्धिजीवी वर्ग हो या राजनैतिक विपक्ष हो, इस दौर में दोनोंको मोदीजी एवम योगीजी  का राजयोग सता रहा है।

किसी इरफ़ान हबीब ने, किसी रोमिला थापर ने, किसी ओबेसी ने, किसी आजमखान ने ,किसी तीस्ता शीतलबाड़ ने, किसी लोहियावादी ने और किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने लंन्दन पर हुए नृसंश हमले की शाब्दिक निंदा भी नहीं की।कायदे से हरेक सच्चे मुसलमान का भी यह फर्ज था कि वह लंदन के इस हत्याकांड की निंदा करता, चूँकि अभी कुछ महीनों पहले ही लंदन की बहुमत ब्रिटिश जनताने एक अल्पसंख्यक मुसलमान को मेयर चुना है।और यह दुनिया जानती है कि 'आईएसआईएस' के कट्टरवादी इस्लामिक आतंकवाद से तमाम सभ्यताओं और कोमों को खतरा है। भारत के बहुसंख्यक हिन्दू भी इन घटनाओं से खासे प्रभावित हैं। चूँकि मोदीजी ,योगीजी और संघ परिवार वाले तथा भाजपा के अन्य नेता इस मुद्दे पर अंदर-अंदर हवा देते रहते हैं और उधर कांग्रेस,कम्युनिस्ट या अन्य धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दल -केवल मोदी-मोदी या नोटबंदी ही जपे जारहे हैं। यही कारणहै कि यूपीके इस  चुनाव में जितनी उम्मीद खुद मोदीजी या भाजापा को नहीं थी उससे अधिक सफलता उन्हें मिली है।

दुनिया जानती है कि कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद से सर्वाधिक खतरा किसे है ? अभी अभी पाकिस्तान दिवस पर भारत के कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे फहराये गए। उधर सीमा पार आतंकियों ने लाहौर कराची में भारत को खूब गालियां दीं।विपक्ष के हरल्ले जमानतखोर नेताओं को समझना चाहिए कि इन भारत विरोधी निरंतर घटनाओं की वजह से ही उत्तरभारत की हिंदी भाषी जनता का देशप्रेम और राष्ट्र्वाद हिलोरें ले रहा है। और उसी कट्टरपंथी आतंकवाद को जबाब देने के लिए यूपी की जनता ने भाजपा को प्रचण्ड बहुमत दिया है। उसी इस्लामिक आतंक का प्रतिसाद पाकर मोदी जी और योगीजी गदगदायमान हो रहे हैं। मोदीजी ने तो फिर भी लन्दन के आतंकवादी हमले की निंदा तुरन्त करदी! किन्तु सपा ,वसपा और कांग्रेस जैसे हरल्ले दलों तथा विचारशील व्यक्तियों को कुछ सूझ ही नही रहा है। वे तो केवल मोदी सिंड्रोम अथवा फास्जिम फोबिया में तल्लीन हैं।

वेशक इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया की तमाम सभ्यताओं और कोमों को गंभीर खतरा है। लेकिन भारत के गरीब हिंदुओं को सबसे ज्यादा खतरा है। चूँकि दुनिया के अमीर लोग हमेशा दर्जनों हथियारबन्द रक्षकों से घिरे होते हैं, इसलिए उन्हें किसी से कोई खतरा नहीं।युद्ध की वस्था में या आतंकवादी भीषण नर संहार में दोनों ओर से जो सर्वाधिक नर -नारी  मारे जाते हैं वे अधिकांस असुरक्षित सर्वहारा या निम्न मध्यम वर्ग के ही हुआ करते हैं।
इसके अलावा  इस्लामिक आतंकवाद से खुद इस्लाम को ही सबसे अधिक खतरा है ! लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं कि कट्टरपंथ से लड़नेके बजाय 'इस्लाम' को कोसा जाए ! जो लोग इस्लामिक आतंकवाद को धरतीका सबसे बड़ा खतरा मानते हैं वे सही हैं। लेकिन जो लोग सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद को ही खतरा मानते हैं वे गलत हैं। दरसल इस्लाम का सारतत्व उतना ही मानवीय और अमनपसन्द है ,जितना कि भारत का सनातन धर्म या दुनिया का कोई और धर्म-मजहब ! वेशक हरेक धर्म मजहब की कट्टरता पर अंकुश होना चाहिए। चूँकि भारत मेंअसली लोकतंत्र है इसलिए यहाँ किसी भी कट्टरता को वोट के द्वारा खत्म किया जा सकता है। किन्तु इस्लामिक वर्ल्ड में  हर जगह न केवल आपसी मारामारी है, अपितु वे लंदन ,पेरिस ,मुम्बई कहीं भी मरने -मारने को आतुर रहते हैं !इसलिए भारत के हिंदुओं -मुसलमानों को असली खतरे को ठीक से समझना होगा। शायद यूपी की जनता ने इस बार ठीक से समझ लिया है। योगी जी और मोदीजी की किसी कार्यशैली या नीति के खिलाफ लिखना बोलना तो जैसे अब जनता के खिलाफ बोलना  हो चूका है। इसीलिये इस दौर में मोदीजी या हिंदुत्व के खिलाफ जो जितना ज्यादा बोल रहा है उसे उतने ही कम वोट मिल रहे हैं। श्रीराम तिवारी      

    

सोमवार, 20 मार्च 2017

आधुनिक युवा वर्ग और शहीद भगतसिंह

आर्थिक ,सामाज़िक ,राजनैतिक हर तरह  की स्वतंत्रता की कामना केवल कोई सचेतन मन ही कर सकता है। कोई सुसुप्त मन वाला मिडिल क्लास व्यक्ति चाहे जितना खाता -कमाता हो ,भले ही उसेअभी 'अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता' या व्यवस्था परिवर्तन से कोई सरोकार न हो,लेकिन हर एक दमित ,शोषित,पीड़ित,नंगा-भूंखा इंसान  किसी किस्म की आजादी चाहने से पहले अपने तात्कलिक दुखों के निवारण की भरसक चेष्टा पहले करता है। चूँकि आधुनिक युवाओं को  शहीद भगतसिंह ,राजगुरु और सुखदेव वाले संघर्ष ,क्रांति और व्यवस्था परिवर्तन के सिद्धांत -सूत्र और साधन बहुत जटिल मालूम पड़ते हैं ,उन्हें भगतसिंह के क्रांतिकारी विचार मानों  'दूर के ढोल सुहावने' जैसे लगते हैं। इसीलिये अधिकांस आधुनिक भारतीय युवा ,खास तौर से जन्मना हिन्दू युवा मोदी-मोदी में लीन होकर भाजपाकी राजनैतिक नाव पर सवार है। मोदीजी के विकासवाद की अनजानी राह पर आगे बढ़ने का ख्वाब देख रहा है।भले ही यह मोदीयुगीन नाव कहीं भी न जाती हो, या किसी अज्ञात भंवर की ओर ली जाती हो !
इसीलिये यह बहुत जरुरी है कि आधुनिक युवावर्ग शहीद भगतसिंह को अपना आदर्श बनाये !

अफ्रिका ,यूरोप,अमेरिका,चीन रूस का तो मुझे पक्का पता नहीं,किन्तु अधिकांस छुधित-तृषित भारतीय युवा वर्ग अपने कष्ट निवारण के लिए ,सबसे उस सरल सुगम मार्ग  की ओर देखता है,जो मंदिर ,मस्जिद गुरूद्वारे अथवा चर्च की ओर जाता है। धर्म-मजहब के पारलौकिक ठिकानों पर किसी को कुछ और मिले न मिले,किन्तु अस्थायी मानसिक शांति और तसल्ली तो अवश्य मिलती है। किसी का यह लोक ही बर्बाद हो रहा हो किन्तु उसे परलोक सुधार की गारन्टी देने वाले बाबाओं, योगीयों और साम्प्रदायिक नेताओं का दामन नहीं छोड़ता । इसीलिये भारतमें इन दिनों कुछ परलोक सुधारक लोग खूब फल फूल रहे हैं। वे राजनीति में भी प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं। आने वाला वक्त ही बताएगा कि उनके सत्ता में आगमन से देश आगे बढ़ रहाहै या अतीतके गहन अन्धकार में फिर प्रतिगामी डुबकी लगाने जा रहाहै ! भारतीय युवजन को यह ध्यान तो रखना ही होगा कि कहीं ऐंसा न हो कि 'दुविधा में दोउ गये,माया मिली न राम' ? उन्हें यह ज्ञान होना भी जरूरी है कि इस सन्दर्भ में शहीद भगतसिंह की सोच क्या थी।

हिन्दुत्वाद की लहर के प्रभाव से मंदिर -मस्जिद विवाद में देश को फिर से घसीटा जा रहा है। भारतीय युवाओं और छात्रों को सोचना चाहिए कि इस घनचक्कर में कहीं उनका भविष्य चौपट न हो जाए,या विकास धरा न रह जाए ! यदि 'सबका साथ,सबका विकास'सत्ता के हृदय की गहराई से निकला है तो वैसा आचरण भी दृष्टिगोचर होना चाहिए! वेशक मोदीजी और योगीजी अतीत में विवादास्पद रहे हैं। उन पर अतीत में बहुत से आरोप लगे हैं। जिस तरह प्रधानमंत्री बनते ही मोदीजी के ऊपर लगे तमाम आरोप खत्म हो गए ,उसी तरह योगीजी के मुख्यमंत्री बनते ही उनपर लगाईं गईं तमाम दीवानी और फौजदारी धाराएं अतिशीघ्र शून्य हो जाएंगी। यह आचरण न तो 'रामराज्य 'से मेल खाता है और न ही सत्य हरिश्चंद्र वाले 'हिंदुत्व' के उच्चतर सिद्धांत से मेल खाता है। भगतसिंह के सिद्धांतों से मेल खाने का तो सवाल ही नहीं। यदि आरोपों में दम नहीं था तो अखिलेश और मायावती की सरकार के दौरान इन 'महात्मा नेताओं' पर लगे आरोपों के लिए मानहानि का मुकद्दमा दायर होना चाहिये।

सत्तामें आनेके कारण यदि मोदी जी की तरह अब योगी जी भी 'निर्दोष' सावित हो जाते हैं ,तो वही लोग डरेंगे जो अब तक योगीजी को परेशांन करते रहे हैं या वे लोग भयभीत होंगे जो वास्तविक अपराधी हैं ! गुजरात में मोदीजी से भी वही लोग डरते रहे हैं जिन के दिल में चोर था। मोदीजी के राज में तो शेर और बकरी एक घाट पानी भले न पी सके हों किन्तु चिंदी चोर भी अब  बड़े-बड़े आर्थिक अपराधी बनकर देश और दुनिया में फल फूल रहे हैं !
युपी विधान सभा चुनाव में मोदीजी ने 'श्मशान बनाम कब्रिस्तान' वाले जुमले के अलावा विकासवाद का भी खूब   प्रचार किया था। किन्तु जब विकास वाले नेतत्व की तलाश की गयी तो ३२५ में से उन्हें एक भी नहीं मिला! अंततः आंतरिक दबाव में सत्ता सुंदरी एक योगी को सौंप दी। ऐंसा लगता है कि मोदीजी और योगी जी आइंदा दोनों नाव पर सवार होंगे। हिन्दू -मुस्लिम दोनों को खुश किया जायगा। और साथ में विकास का उपक्रम भी जारी रहेगा। यदि 'संघ' का राष्ट्रवाद असली चेहरा है, तब वे भी ऐंसा कुछ नहीं करेंगे जिससे फसाद हो। यदि अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेकर योगीजी उत्तरप्रदेश का विकास करते हैं ,तब तो उनके 'हिंदुत्व'का सिक्का अवश्य चल जाएगा। अन्यथा अतीत में कल्याणसिंह ने जो बोया और काटा था ,वही  योगी आदित्यनाथ के दौर में भी भाजपा और संघ परिवार को काटना होगा!वे जब तक धर्मनिरपेक्षता का सम्मान नहीं करते तबतक यही बार-बार होता रहेगा ।  

यूपी चुनाव के इकतरफा परिणाम से किसी को निराश नहीं होना चाहिए। मायावती को ईवीएम मशीन में त्रुटि खोजने के बजाय मुलायम सिंह यादव ,अखिलेश यादव -पिता -पुत्र से नसीहत लेनी चाहिए। जिन्हें मोदीजी और योगी जी को साधना आता है। मुलायम परिवारतो हारने के बाद भी आश्स्वस्त है कि उन्हें  किसी से कोई खतरा नही !बहिनजी और आजमख़ाँ जैसे जातिवादी -साम्प्रदायिक नेता  कुछ ज्यादा ही शोर मचा रहे हैं। हालाँकि वे इस काबिल नहीं हैं कि मोदी या योगी  पर अंगुली उठायें ,जिन्हें प्रचण्ड जनादेश मिला है। मोदी और योगी का हिन्दू होना उसी तरह 'पाप' नहीं है,जिस तरह बहिनजी का दलित होना और आजमख़ाँ का मुसलमान होना पाप नही है ! हरेक चुनाव जीतने वाले को कुछ वक्त अवश्य मिलना चाहिये ताकि वह जनादेश की कसौटी पर टेस्ट दे सके। हारे हुए लोगों द्वारा जीते हुए दल की बेबजह आलोचना से 'संघ परिवार'के बड़बोले बयानवीरों को उपद्रव करने का मौका मिलता है। इस सूरत में देश का विकास हो न हो किन्तु आपसी कटुता का विकास अवश्य होता रहेगा। मानवता का उद्देश्य सनातन कटुता में जीना-मरना नहीं है। मौजूद जिंदगी ही वास्तविक सच्चाई है !

अभी-अभी यूपी  विधान सभा चुनाव के दरम्यान और योगी जी के मुख्य मंत्री 'मनोनीत'किये जाने को लेकर हर किस्म के मीडिया में मुख्य रूप से दो प्रकार के बोल बचन कहे सुने गए। एक तरफ हर-हर मोदी ,विकास और हिन्दुत्व का स्वर था। दूसरी ओर जातिवाद,अल्पसंख्यकवाद और परिवारवाद का शोरगुल था। किन्तु सर्वहारा वर्ग के रूप में वामपंथ का स्वर नक्कारखाने में तूती की आवाज भी नहीं था। उधर चुनाव जीतने वालों को यह गलत फहमी हो गई कि अखिलेश यादव ,राहुल गाँधी और तमाम अलायन्स वाले सबके सब वामपंथी और 'सेकुलर' हैं। और उन्हें यह गलत फहमी भी हो गई कि असली हिन्दू सिर्फ वे ही हैं जो मोदी जी [अब योगीजी]के साथ हैं। इस गलफहमी के लिए प्रगतिशील ,धर्मंनिरपेक्ष विचारों वाले लोग भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं।

माना कि सत्ताधारी सपा को उसके गुंडाराज और जातिवाद ने हराया,मायावती को उनके फूहड़ व्यक्तिवाद और अहंकार ने हराया!  यह भी जग जाहिर है कि कांग्रेस को मंडलवाद और कमण्डलवाद ने मिलकर हराया। लेकिन प्रगतिशील -वामपंथी प्रत्याशियों को जनता ने क्यों हराया ?जबकि इस धारा के प्रत्याशियों को आजादी के बाद से अब तक केंद्र में या यूपी जैसे हिंदी भाषी राज्यों में कोई अवसर ही नहीं मिला। केरल,त्रिपुरा और बंगाल में जरूर वा,पन्थ को कई अवसर मिले ,किन्तु बंगाल में ममता बनर्जी ने भृष्ट पूंजीपतियों और आतंकवादियों की मदद से न केवल राज्य की सत्ता छीन ली,अपितु किसानों,मजूरों के लिए सीपीएम ने जो कुछ किया उसको दुष्प्रचार से उसने शून्य कर डाला !भाजपा और संघ ने भी सीपीएम को टारगेट करते हुए निरन्तर बदनाम किया।लेकिन उसका फायदा ममता को ही मिला। वामपंथ का इस धर्म-मजहब वाली कट्टरता के कारण ,भारत में लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव जीत पाना बहुत कठिन है। क्योंकि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर वामपंथ की समझ भले ही सही हो किन्तु धर्म-मजहब और साम्प्रदायिकता के बारे में वामपंथ की परम्परागत समझ सही नहीं है।  

धर्म-मजहब -पन्थ अब सिर्फ 'अफीम' नहीं रह गए !बल्कि बाकई स्वर्ग की सीढी बन गए हैं। जब से बाबाओं और स्वामियों ने अपने उत्पादों को  में बाजार में उतारा है ,तबसे धर्म-मजहब  सिर्फ 'अफीम ' नहीं रहे, बल्कि बाजार और राजनीति की प्रमुख ताकत हो गए हैं। यह दुहराने की जरूरत नहीं कि भारत सदियों से एक त्यौहार प्रधान देश रहा है। किन्तु लोकतान्त्रिक राजनीति और बाजारबाद ने धर्म -मजहब -पन्थ की चिन्गारी को प्रचण्ड ज्वाला में तब्दील कर डाला है। भारत के त्यौहारों से सिर्फ भारत का बाजार ही नहीं फलता-फूलता, बल्कि अब तो चीन नेपाल भी लगे हाथ कुछ न कुछ कमा लेते हैं। भारत में त्यौहार मनाने की मध्यम वर्गीय प्रतिस्पर्धा का आलम यह है कि चाहे जेब खाली हो ,घर में भुजी भांग भी न हो,चाहे कोई वेरोजगार ही क्यों न हो ,लेकिन ज्यों ही कोई तीज - त्यौहार आया कि वह भी काल्पनिक आभासी ख़ुशी की तलाश में निकल पड़ता है। नागर सभ्यता का झंडावरदार भी झाबुआ के 'भगोरिया' का भील मामा हो जाता है!जनता का यह सांस्कृतिक -धार्मिक रुझान,भाजपा और संघ परिवार के पक्ष में जाता है।

इन धार्मिक आयोजनों,तीज -त्यौहारों और मेलों-ठेलों के तामझाम से जिन लोगों के आर्थिक स्वार्थ जुड़े हैं ,वे भले ही मिलावट करते हों ,कम तोलते हों, शहद की जगह शक्कर का शीरा बेचते हों ,स्वर्ण भस्म और मोती भस्म की जगह मानव खोपड़ी का चूर्ण बेचते हों,वे भले ही धर्म का लेबल लगाकर अधर्म बेचते हों, किन्तु भारतकी धर्मप्राण जनता श्रद्धा-आस्था के वशीभूत होकर न केवल उनके घटिया उत्पाद खरीदती है, बल्कि समय आने पर इन्ही धर्म -मजहब के ठेकेदारों को वोट देकर सत्ता भी सौंप देती है। इस धार्मिक बाजारीकरण और राजनीतिकरण से ऐंसा आभास होता है कि मानों भारत भूमि पर 'सतयुग' उतर आया है। इस देश की जनता कितनी धर्मप्राण है कि जो शहर जितना बड़ा तीर्थ हैं,वह उतना ही गन्दा होगा और अपेक्षाकृत महँगा भी होगा।

भारत में सर्वाधिक वेश्यावृत्ति वहीँ होती रही है ,जहाँ पवित्रतम तीर्थस्थल हैं। अतिधर्मान्धता के वावजूद बात जुदाहै कि इस धर्मप्रधान देश में कहीं कोई अकेली दुकेली लडकी दिल्ली,मुम्बई बेंगलुरु में सफर नहीं कर सकती। नारी उत्पीड़न या निर्बलों के शोषण में कस्बों,गाँवों के हालात इससे कई गुना भयावह हैं। उत्तरप्रदेश को सपा,बसपा ने जितना बर्बाद किया उतना कांग्रेसने भी नहीं किया। उम्मीद है कि योगीजी भी उतना बुरा नहीं करेंगे जितना कभी माया और मुलायम के राज में बुरा हुआ है। तब और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि माया और मुलायम खुद ही सुप्रीम पावर हुआ करते थे,किन्तु अब योगीजी के ऊपर मोदीजी हैं और मोदीजी के ऊपर विकास का भूत सवार है,अतः सभी को यह उम्मीद  चाहिए कि यूपी में बाकई अच्छे वाले हैं। किसानों का कर्ज शीघ्र माफ़ होने जा रहा है। गंगा यमुना स्वच्छ सुंदर होने जा रहींहैं। पहले यूपी के गाँवों कस्बों में बारदात की 'बात' वहीँ दबा दी जातीथी ! या तो रिपोर्ट नहीं लिखी जाती थी ,जो पीड़ित रिपोर्ट लिखाने का दुस्साहस करता उसे मरवा दिया जाताथा। अब जिन -यूपी में जिन्होंने आग मूती उन्हें अंजाम भुगतना ही होगा।

यूपी में विगत ३० साल से जो सिस्टम चला आ रहा है,वह भारत देश की धार्मिक और सांकृतिक विरासत नहीं है!भारत में अब तक जितने भी सच्चे समाज सुधारक और धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हुए हैं वे दक्षिण भारत बंगाल अथवा महाराष्ट्र में ही अधिक हुए हैं। यही वजह है कि यूपी वाले 'भाइयो-बहिनों'धर्म-मजहब के परम्परागत मकरजाल में उलझे हैं। वे आजादी के ७० साल में भी पूँजीवादी -सामन्ती आर्थिक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अंतर्जाल को नहीं समझ पाए। यूपी के अधिकान्स स्वाधीनता सेनानी खुद ही धर्मभीरु रहे हैं, इसलिए बदलाव को नजर अंदाज करते रहे हैं। भारत में धर्मनिपेक्षता केवल संविधान की प्रस्तावना तक ही सीमित रही है। यही वजह है कि जिन राजनैतिक दलों के पास कोई जातीय -मजहबी जनाधार नहीं रहा वे केवल धर्मनिरपेक्षता का झुनझुना बजाते रहते हैं। इसीलिये धर्मोन्मादिनि हिंदीभाषी जनता रुपी 'मोहिनी', वेचारे नारद मुनि रुपी वामपंथियोंको कोई तवज्जो नहीं देती। जबकि धर्म -मजहब के ठेकेदार रुपी कलियुगी योगियों  को राजनीतिक सत्ता सुंदरी आसानी से वरण  कर रही है !

क्या विचित्र बिडम्बना है कि पूँजीवादी साम्प्रदायिक दल तो सत्ता में आने के बाद 'विकासवाद' और 'सबका साथ - सबका विकास' जप रहे हैं ? किन्तु जिन्हें अपने कार्यक्रमों पर नाज है ,नीतियों पर नाज है,अपने संघर्षोंकी परम्परा पर नाज है वे कहाँ हैं ?वे अपने जन संगठनों की साज संवार करने के बजाय ,नीतियों,योजनाओं -कार्यक्रमों का प्रचार -प्रसार करने के बजाय ,जनकल्याणकारी वैकल्पिक नीतियोंका खुलासा करने के बजाय केवल बहुसंख्यक -साम्प्रदायिकता पर फब्तियां कसते रहते हैं। उधर अल्पसंख्यक वर्ग को मुलायम,माया, ममता ,लालू,केजरीवाल और नीतीस जैसे अवसरवादियों से मतलब है। शायद यह भी एक  वजह  है कि धर्म-मजहब में खण्डित भारतीय जनता, वामपन्थ को गंभीरता से नही लेती ! वामपंथ की असली धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को सम्मान देने के बजाय धर्मांध जनता झूंठे वादों -जुमलों को ज्यादा महत्व देती है। भारत की जनता भूल रही है कि उसके पास जो लोकतान्त्रिक अधिकार अभी तक सुरक्षित बचे हैं ,उसके लिये वाम-धर्मनिपेक्ष लोगों ने अतीत में बहुत कुर्बानियाँ दीं हैं। और अभी भी निरतंर संघर्ष जारी है। किन्तु जब भी कोई चुनाव आता है तो जनता ढपोरशंखियों की ओर देखने लगती है। यह सर्वहारा वर्ग के लिए शुभसूचक नहीं है।  श्रीराम तिवारी !