मंगलवार, 20 जून 2017

क्रिकेट का खेल और राष्ट्रवाद !

यदि अचानक कभी, आपका किसी दैवीय ईष्वरीय शक्ति से साक्षात्कार हो जाए,और वो आपसे पांच वरदान मॉंगने को कहे तो आप कौनसे वरदान मांगेंगे ?
आपकी सुविधा के लिए मैं अपनी च्वाइस बता देता हूँ !

पहला वरदान :-यदि  पुनर्जन्म होता है,तो मेरा जन्म भारत भूमि पर ही हो, किन्तु जिस घर में जन्म हो वो भगतसिंह के आदर्शों को जानता और मानता हो !

दूसरा वरदान :-जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ की खाते हैं ,यही जिनकी मातृभूमि है ,वे सभी अपने धर्म मजहब से ऊपर भारत देश को ही अव्वल माने !

तीसरा वरदान :-जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी तत्व पूँजीपतियों की चरण वंदना करते हैं,मजदूरों,किसानों और वामपंथ को गाली देते हैं ,उनका सत्यानाश हो !

चौथा वरदान :-जो लोग भारत के मुसलमानों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं ,भारत की बर्बादी के सपने देखते हैं ,उनका सत्यानाश हो !

पाँचवाँ वरदान :-जो लोग स्वयंभू देशभक्त हैं वे भारत के सभी मुसलमानों को संदेह से देखते हैं,उन्हें आतंकी समझते हैं , ईस्वर उन्हें सद्बुद्धि दे !

   १८ जून २०१७ इंग्लैंड मे आई सी सी चैम्पियनशिप के फाइनल में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम जीत गई और  भारतीय टीम हार गई। चूँकि हार जीत अधिकाँस खेलों का अहम हिस्सा है ,इसलिए जब दो टीमें आमने सामने हों तो कोई एक तो अव्वल होगी ही !और  फाइनल हारने वाली दूजे पायदान पर ही होगी। इसमें आश्चर्य और अनर्थ जैसा क्या है ? हालाँकि किसी अंतर्राष्ट्रीय मैच के फाइनल में पहुँचना भी कम गर्व की बात नहीं !और हारना भी उतना बुरा नहीं !लेकिन जब मामला भारत  विरुद्ध पाकिस्तान का हो तो खेल भावना कीऐंसी-तैंसी हो जाती है। तब दोनों मुल्कों में छद्म राष्ट्रवाद उभरकर गंदे बदबूदार परनाले की तरह खदबदाने लगता है। वेषक किसी अति सम्मानित टीम का नाक आउट या सेमीफाइनल में हारकर घर लौटना अवश्य शर्मनाक है। किन्तु इतने सारे दिग्गजों को हराने के बाद किसी खास देश की टीम से आख़िरी में हार जाना किसी को गवारा नहीं।जबकि फाइनल हारने वाला खुद उस विजेता टीम को पहले ही राउंड में बुरी तरह निपटा चुके हो !सांत्वना एवं संतुष्टि सिद्धांत के अनुसार भारतीय टीमकी हारको शर्मनाक हार कहना गलत है। बल्कि उसे काबिले तारीफ हार कहा जाना चाहिए ! लेकिन नादान क्रिकेट प्रेमियों ने क्रिकेट के खेल में अंधराष्ट्रवाद घुसेड़कर खेल को युद्ध बना डाला है। भारत केजो लोग अंधराष्ट्रवादी हैं उनका दुखी होना तो स्वाभाविक है। किन्तु जो लोग 'परराष्ट्रवादी' हैं याने प्रतिद्व्न्दी या दुश्मन देश पाकिस्तान के खैरख्वाह हैं वे मेरी नज़रों में हरामी हैं।

भारत- पाकिस्तान के फाइनल में पहुँचते ही भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट समर्थक अपनी -अपने टीमों की जीत के दावे कर रहे थे। जहाँ पाकिस्तान के भूतपूर्व दिग्गज खिलाड़ी अपनी ही टीम को कमजोर बता रहे थे,अपने कप्तान को नौसीखिया बता रहे थे, और पाकिस्तानी मीडिया भी उनकी अपनी टीम की जीत के प्रति अधिक आशान्वित नहीं था! वहीं  भारत के तमाम क्रिकेट मैनेजर्स और समर्थक बड़ी हेकड़ी से भारतीय टीम को बाबुलंद ,कप्तान कोहली को शेर पाकिस्तानी टीम को चूहा और भारतीय टीम की जीत को सौ फीसदी सुनिश्चित बता रहे थे। दुर्भाग्य से जब फाइनल में भारत के शब्दभेदी कागजी शेर ढेर हो गए तो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को गहरा धक्का लगना स्वाभाविक था !बहरहाल इस मैच से पूर्व मैंने अपनी फेस बुक टाइम लाइन पर लिखा था -;

कबीरा गर्व न कीजिये ,कबहुँ न हँसिये कोय।
अबहुँ नाव मझधार में ,का जाने का होय।।

मेरी पोस्ट को हालाँकि बहुत कम लोगों ने पसंद किया ,क्योंकि एक तो यह नकारात्मक अप्रिय भविष्यबाणी थी ,दूसरे भारतीय टीम की जीत पर किसी को भी संदेह नहीं था। लेकिन दुर्भाग्य से मेरी भविष्यबाणी अप्रत्याशित रूप से सही साबित हुई ! इस संदर्भ में मेरी प्रतिभा का कोई कमाल नहीं बल्कि यह तो भारतीय खिलाडियों की लापरवाही और प्रमाद का प्रतिफल है।

बहुत बरसों बाद पाकिस्तानी टीम भारतीय टीम से जीत सकी है, इसलिए पाकिस्तानी आवाम का ख़ुश होना जायज है ! में उन्हें मुबारकवाद देता हूँ उन्हें शाबाशी भी देता हूँ ,क्योंकि पाकिस्तानी टीम ने उस बहुश्रुत शेर का तहेदिल से जी जान से अनुशरण किया है कि : -

सुर्खुरू होता है इंसा ठोकरें खाने के बाद ! रंग लाती है हिना पत्थर पाई पीस जाने के बाद !!

किन्तु भारत के कश्मीर में ,बुरहानपुर में ,कोलकाता में और देश के अन्य अनेक हिस्सों में कई जगह एक खास तबके के लोगों ने पाकिस्तानी टीम के जीतने पर जो ख़ुशी मनाई वो मेरी समझ से परे है। सिर्फ फटाके फोड़े होते और केवल जश्न ही मनाया होता तो भी हम मान लेते कि यह तो खेल भावना है बड़ा दिल और बडड़प्पन  रखना उचित है !लेकिन कुछ हरामजादों ने भारत में अनेक जगह पाकिस्तान के झंडे लहरायें हैं ,भारत विरोधी नारे भी लगाए हैं और भारतीय टीम के समर्थकों को चिढ़ाया भी है ! कष्मीर और बुरहानपुर में रातभर आतिशबाजी और पत्थरबाजी  हुई , पाकिस्तानी झंडे भी लहराए गए तथा भारत विरोधी नारे भी लगाए गए । भले ही वे खास फिरके या तबके के बहुत कम तादाद के गद्दार तत्व हैं,किन्तु इस खतरनाक देशद्रोही प्रवृत्ति को कमतर नहीं आँका जाना चाहिये !
खेद की बात है कि इस संदर्भ में भरत के वर्तमान सत्तापक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष ने भी कोई संज्ञान नहीं लिया और अभी तक कोई आपत्ति भी नहीं ली !

जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ के हवा पानी में पले बढे,यहीं जीवन यापन कर रहे हैं ,वे इतने हरामी कैसे हो सकते हैं कि क्रिकेट की हारजीत पर भारत में पाकिस्तान का झंडा लहरायें ?और भारत की बार बर्बादी के नारे लगाएं ! जिन लोगों ने जनरल विपिनचंद रावत को गुंडा कहा ,उन्हें अमानवीयतावादी भी कहा ,वे लोग यदि खुद रंचमात्र भी देशभक्त हैं तो पाकिस्तानी पिट्ठुओं और मजहबी साम्प्रदायिक गद्दारों  के खिलाफ अपना मुँह क्यों नहीं खोलते ?

यदि इस बाबत केंद्र सरकार को राज्य सरकारों से कठोर कार्यवाही की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए ! मेहबूबा मुफ्ती कुछ नहीं करेगी। इधर मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए एमपी के दर्जनों पुलिस अफसर एक बेकसूर किसान के मासूम लड़के को गिरफ्तार करने सिर्फ इसलिए पहुँच जाते हैं कि उसने वाट्सएप पर कोई बहुत बड़ा गुनाह कर डाला था ! एमपी में नक्सलियों ,आतंकियों ,सिम्मियों और पाकिस्तानी एजेंटों की भरमार है।उसपर ध्यान देने के बजाय किसानों पर गोली दाग रहे हैं ,मासूम बेकसूर किसानों को गिरफ्तार कर रहे हैं।      

शनिवार, 3 जून 2017

भारत में  अलगाववाद बनाम उग्र राष्ट्रवाद !


यदि पर्यावरणविद और धरती के प्रति फिक्रमंद लोग ईमानदारी से सोचें तो वे पाएंगे कि पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण की वजह से हुआ है। चूँकि अमेरिका,यूरोप,चीन और जापान इत्यादि देशों ने बहुत पहले ही बहुत तेजी से, प्रतिस्पर्धात्मक और अँधाधुंध विकास कर लिया है, इसलिए उनके द्वारा धरती के पर्यावरण का सर्वाधिक सत्यानाश हुआ है। गनीमत है कि अफ्रीकी और भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षेस देश उतने ज्यादा 'एड्वान्स' नहीं हुए कि धरती को बर्बाद करने में इन तथाकथित उन्नत राष्टों की बराबरी कर सकें !

हालाँकि यह सौ फीसदी सच है कि दुनिया के हर मनुष्य ने, हर समाज ने, हर राष्ट्र ने धरती के अन्य प्राणियों की बनिस्पत बहुत अधिक कूड़ा-कचरा इस हरी भरी पृथ्वी पर पैदा किया है। कुछ पर्यावरणविद बुद्धिजीवियों ने तो यहाँ तक कहा है कि धरती पर'मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है !' हालाँकि इस पदबंध के और भी दूरगामी निहितार्थ हैं। जैसे कि मानव मस्तिष्क ने ही हिरोशिमा नागासाकी का बीभत्स नरसंहार किया था। मानव मष्तिष्क द्वारा धरती को बर्बाद करने का ही भयानक प्रमाण है यह है कि उसी की बदौलत बीसवीं शताब्दी में दुनिया के दो 'महायुद्ध' हो चुके हैं। और मानव मस्तिष्क से ही धरती के अन्य प्राणियों को एवं वन सम्पदा को खतरा है। मानव मष्तिष्क ने ही ओजोन परत में अनगिनत छेद किये हैं! धरतीपर आबादी बढ़ाने में मानव शरीर का जितना रोल रहा, उससे अधिक मानव मष्तिष्क का और मनुष्य जाति के खुरापाती मजहबी उसूलों का नकारात्मक रोल रहा है।

धरती पर मानव आबादी बढ़ाने में चीन भले ही नंबर वन है,किन्तु आबादी की सापेक्ष बृद्धि दर में तो भारत ही दुनिया में अव्वल है। भारत में जनसंख्या बृद्धि में ,वे व्यक्ति और समाज सबसे आगे हैं जो अपढ़ हैं ,पिछड़े हैं ,जाहिल हैं ,गंवार हैं !जो लोग एक से अधिक शादियां करते है ,जिनको वैज्ञानिक निरोध मंजूर नहीं!जिन्हें उनके पुरातन सड़े गले पुरुषसत्तातात्मक रीति रिवाजों से बड़ा लगाव है। जिन्हें देश की फ़िक्र नहीं ,जिन्हें अपने ही बच्चों की फ़िक्र नहीं,जिन्हे केवल अपने घटिया अंध विश्वाश और अपनी कूड़मगज मानसिकता पर नाज है,वे ही कृतघ्न व्यक्ति व समाज आबादी बढ़ाने के लिए गुनहगार हैं। आबादी के विस्तार में उनका भी खूब योगदान है जो अपने बच्चों को बेहतर मानव बनाना ही नहीं चाहते !बल्कि वे उन्हें जेहादी,फिदायीन,आतंकी-अपराधी बनाकर देश-समाज में मरने मारने को छोड़ देते हैं। जो धरती को और मानवता को खुदा भगवान् और अल्लाह के भरोसे छोड़ देते हैं।  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को पैरिस संधि से अलग करने की धमकी दी है। ट्रम्प ने विश्वपर्यावरण संरक्षण संधि से अलग होने की वजह चीन और भारत की बढ़ती जनसंख्या को कारण बताया है। वेशक ट्रम्प और अमेरिकी नीतियां साम्राज्य्वादी हैं ,किन्तु उसका आरोप नितांत कड़वा सच है !जब यह सिद्धांत माने हो गया कि ''मनुष्य ही संसार का सबसे बड़ा कचरा उत्पादक प्राणी है" तो भारत और चीन की ज्यादा जबाबदेही बनती है कि जनसंख्या नियंत्रण पर अधिक ध्यान दें। चूँकि चीन के पास उसकी जनसंख्या के अनुपात में ज्यादा बड़ा भूभाग है,कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव के विरोध में वहां कोई पृथक तबका या असहमत वर्ग नहीं है।  इसीलिये चीन में अपने राष्ट्र को जिन्दा रखने की अनंत सामर्थ्य है। इसलिए चीन को किसी की फ़िक्र नहीं है।

भारत में किसी भी सार्थक योजना पर और विकास के किसी भी प्रोग्राम पर महज दो राय ही नहीं बल्कि प्रतिरोध के भी अनेक स्वर हैं। दुनिया के अधिकांश मुल्कों में आमतौर पर एक सा खानपान,एक सा रहन सहन ,एक सा बोलना चालना और एक् सा राष्ट्रीय चरित्र है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत में न केवल मजहबी या सांस्कृतिक वैविद्ध्य है ,अपितु जनसंख्या बृद्धि और परिवार नियोजन जैसी चीजों पर भी साम्प्रदायिकता का सामंतयुगीन रंग चढ़ा हुआ है। एक देश में ही अनेक जातियां ,अनेक मत पंथ सम्प्रदाय,अनेक भाषा और जीवन शैलियाँ तो हो सकते हैं, किन्तु संविधान और राष्ट्रीय चरित्रगत मूल्य जुदा जुदा हों तो राष्ट्र की एकता को खतरा है। शायद इसीलिये कश्मीर से और उत्तरपूर्व के अन्य राज्यों से धारा ३७० हटाने और समान नागरिक क़ानून की मांग बार बार उठते रहती है। मुगलकाल में अयोध्या ,काशी ,मथुरा जैसे हिन्दू तीर्थ स्थलों पर अल्पसंख्यकों का प्रभुत्व स्वाभाविक था ,क्योंकि वे विजेता थे। किन्तु २१ वीं शताब्दी के लोकतान्त्रिक गणतंत्र भारत में बहुसंख्यक वर्ग को ब्लेक मेल नहीं किया जा सकता। इसीलिए २० वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण और २१ वीं शताब्दी में उसकी प्रतिक्रिया 'उग्र राष्ट्रवाद' के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। परिणामस्वरूप इन दिनों हिंदुत्व की आवाज कुछ ज्यादा ही बुलंद है। अंधराष्ट्रवादियों का सत्ता में आना भी एक ऐतिहासिक और आवश्यक प्राकृतिक घटना है। आइंदा यह सत्ता हस्तांतरण या परिवर्तन तब तक सम्भव नहीं जब तक कि अल्पसंख्यक वर्ग खुद राष्ट्रवादी नहीं हो जाता! जब तक वे खुद तीन तलॉक , चार शादी तथा परिवार नियोजन पर वैज्ञानिक दॄष्टि नहीं अपनाते तब तक भारत में बहुसंख्यक वर्ग को उदारवाद की ओर मोड़ पाना असम्भव है। जब तक अल्पसंख्यक वर्ग आतंकवाद का खुलकर विरोध नहीं करता ,जब तक वे अयोध्या ,काशी मथुरा का मोह नहीं छोड़ देते,तब तक भारत में 'संघ परिवार' ही सिरमौर रहेगा। किन्तु यदि अल्पसंख्यक वर्ग ने पुरातनपंथी कटटरता छोड़कर अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण को हरी झंडी दे दे और देश के संविधान को मजहब से ऊपर मान ले तो  भारत में धर्मनिरपेक्षता समाजवाद का झंडा बुलंद होने से कोई नहीं रोक सकता। बिना रामलला मंदिर बने,बिना कश्मीर से आतंकवाद खत्म होने और  शांति स्थापित हुए बिना भारत से कटटर हिन्दुत्ववाद को द्रवीभूत नहीं किया जा सकता। जब तक मुसलमान मुख्यधारा से खुद नहीं जुड़ते तब तक कटटरपंथियों को सत्ताच्युत कर पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं !   
   

मंगलवार, 30 मई 2017

ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद

मेरे पिता पंडित तुलसीराम तिवारी ठेठ ग्रामिणि सीमान्त किसान हुआ करते थे। उच्च कुलीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण होंने के वावजूद वे सभी जात और समाजों का बहुत आदर किया करते थे। उनके पास आजीविका के निमित्त कमाने के लिए वैद्द्यगिरी का भरपूर ज्ञान भण्डार था। लेकिन वे बिना फीस लिए मुफ्त दवा देकर गाँवके उन तथाकथित पिछड़ों,दलितों अहीरों,लोधियों और बनियों की आजीवन मुफ्त सेवा करते रहे जो मेरे पिता से अधिक जमीन के मालिक हुआ करते थे। चूँकि हमारे पूर्वज यूपी से सागर जिले के धामोनी स्टेट आ वैसे थे। और जब धामोनी को मुगलों ने आग लगा दी तो जान बचाकर वे पिड़रुवा आ वसे। सहज  ही समझा जा सकता है कि है कि किसी बाहरी व्यक्ति के पास स्थानकों के सापेक्ष जमीन जायदाद कितनी होगी ? पिताजी ने थोड़ी सी जमीन बटाई पर लेकर,  जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचकर और गौ पालन के दमपर अपने परिवार का जैसे तैसे गुजर वसर किया। लम्बी आयु उपरान्त २८ जुलाई  १९८८  को वे इस संसार को अलविदा हो गए । वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार और विरासत में नेकनामी यह कि आसपास के सात गांव के लोग आज भी उनकी समाधि पर मत्था टेकने आते हैं। क्योंकि उन्होंने ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। पूज्य पिताश्री के लिए वे दलित हरिजन आज भी ज्यादा पूज्य मानते हैं जिन्हे शहर के कुछ जातिवादी नेताओं ने, मनुवाद और ब्राह्मणवाद जैसे काल्पनिक शब्दों के जहरीले इंजेक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव में कोई भाईचारा नहीं बचा ! हर जगह अधिकार और नफरत की बबूल उग चुकी है। जिस किसी ने ब्राह्मणवाद बनाम मनुवाद का नामकरण किया है वो भारतीय समाज के नीर क्षीर में नीबू निचोड़ने के लिए जिम्मेदार है।

उनके निधन के बाद जब बटवारा हो गया तब मैंने अपने  हिस्से की जमीन बड़े भाईयों को कमाने के निमित्त दे दी।  जमीन पिताजी के समय जितनी थी वह आज भी उतनी ही है।  गाँव में मेरे दो बड़े भाई जैसे तैसे उससे गुजारा करते हैं। जब तक मैं सर्विस में रहा उनकी कुछ मदद कर दिया करता था ,लेकिन अब चूँकि सेवानिवृत्त हूँ और पति-पत्नी दोनों बीमार रहते हैं ,इसलिए उनकी मदद बहुत कम कर पा रहा हूँ। बड़े भाइयों के बच्चे उचित मार्गदर्शन के अभाव में पर्याप्त तालीम हासिल नहीं कर सके। ५५ साल पहले गरीबी और अभाव में जो संघर्ष का माद्दा गाँव के युवाओं में हुआ करता था वो अब नदारद है। गाँवों में सेलफोन या इंटरनेट तो   केवल मुझमे था उसे  मुझे बचपन की धुंधली सी याद है की थोड़ी सी असिंचित जमीनके अलावा आठ - दस भेंसें,पन्द्रह - बीस गायें ,तीन जोडी बेल और दस पन्द्रह छोटे मोटे बछेरु- पडेरू हुआ करते थे ! बडा भारी सन्युक्त परिवार था!मुझसे बड़े तीनों भाई चुंकी खेती में पिताजी का हाथ बटाया करते थे ,इसलिये मुझे पढाई का सुअवसर मिल गया !लेकिन मुझे यह सदाश्यता इस शर्त पर मिली कि रात का चारा ,रातेबा और सुबह की सानी में हाथ बटाना होगा !इसके अलावा दो अलिखित शर्तें और थीं ,एक तो आधी रात... को भेंसें चराने के लिये जन्गल ले जाना और तीनों बड़े भाइयों में से कोई यदि बीमार पढा या किसी नेवते में गया तो उसका एवजी मुझे आवश्यक रूप से बनना ही होता था,इसके वावजूद मैं प्रथम श्रेणि में ही पास होता था !किंतु मेरे दो मित्र मुझे हमेशा पछाड् दिया करते थे ! जबकी मेरे मित्र खुद मानते थे कि मैं उनसे अधिक मेधावी हूँ !लेकिंन उनमें से एक के पिता जनपद सी ईओ थे और एक की माताजी खुद लेक्चरर हुआ करती थीं ! मेरे पिता एक निर्धन किसान थे ,ऊँहोने कभी स्कूल या पढ़ाई वावद दखल नही दिया अत: मैं भरसक प्रयास के वावझूद हमेशा एक दो नम्बर से तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ता था!पिताजी को मुझपर बडा नाज था और मेरे प्रथम श्रेणी उत्तरींण होने को ही वे प्रथम याने टापर मान बैठते थे

हर साल केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल सहित अन्य वार्षिक परीक्षाओँ के तथाकथित टापर्श की बड़ी पूँछ परख होने लगती है ! टीवी चेनल वाले उनके घर पहुँच जाया करते हैं !औरों से आगे रहना ,प्रसिद्धी पाना और फिर परिवार एवं स्कूल को गौरवान्वित करना वाकई गर्व की बात तो है ! भगवद गीता में योगेश्वर श्रीक्रष्ण ने हर प्रकार के यश की कामना को याने ईशना को भी एक मायिक दूर्गुण माना है !जो आदिवासी और गरीब ग्रामींणों के बच्चे मेहनत मजूरी करके अपनी पढाई पूरी करते हैं, वे यदि सेकिन्ड् या थर्ड डिविजन भी उत्तीर्ण हुये तो मेरी नजर में ज्यादा प्रशंसा के पात्र हैं ! नोयडा दिल्ली बेंगलूरू में आली शान सर्वसुविधा सम्पन एलीट्स क्लास् की औलाद य़दि स्कूल के स्टाफ की मदद से टाप करे तो वह नेकनामि नही !ऐंसे टापर तो बिहार में भी नाम कमा चुके हैं !

बुधवार, 24 मई 2017

बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग !

भारतीय समाजों में जातीयता की गांठें बहुत मजबूत हैं, ये तो सर्वविदित है !किन्तु शोषण के लिए खुद शोषित लोग ही जिम्मेदार हैं यह मुझे अभी यूपी चुनाव में बहिन मायावती की हार के बाद समझ में आया। हालांकि हार का तगड़ा झटका तो सपा और मुलायम परिवार को लगना चाहिए था,किन्तु वे  सबके सब मजे में हैं। शिवपाल यादव पर ,अखिलेश पर ,मुलायम सिंह पर ,उनके घराने पर और यादव घराने की बहु बेटियों पर योगी ठाकुर की महती अनुकम्पा है। पूरा का पूरा समाजवादी कुनवा मय बगुलाभगत आजम खां के सकुशल है। केवल कुछ चंद अवैध बूचड़खाने,कुछ लौंडे -लफंगे और सौ पचास भॄस्ट अधिकारी ही योगी जी के निशाने पर हैं। लेकिन योगी सरकार पर झूंठे आरोप लगाकर बहिन मायावती जी ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यदि वे चाहतीं तो कुछ दिन बाकायदा महारानी एलिजाबेथ की तरह  अपना जातीय कुनबा और आर्थिक साम्राज्य बरकरार रख सकतीं थीं !किन्तु 'भीमसेना' और उसके नेता एक नए नेता चंद्रशेखर की प्रसिद्धि और  बढ़त से चिढ़कर उन्होंने अलीगढ़ ,सहारनपुर सहित पूरे यूपी में  बैमनस्यतापूर्ण  हिंसक तांडव मचाने की जुगत की है! इसमें उनके नव धनाढ्य अरबपति भाई आनंदकुमार कुछ जायदा ही अनुरक्त पाए गए हैं। राजनैतिक पंडित चमत्कृत हैं कि बहिनजी किस वजह से अपने राजनैतिक पराभव का खुद इंतजाम कर रहीं हैं ?सहारनपुर में आनंदकुमार के इशारे  पर एक निर्दोष राजपूत को मार दिया गया। पहले तो लोगों को लगा कि यह नवोदित दलित नेता चंद्रशेखर की 'भीमसेना' के युवा दलित दवंगों की भीड़ का काम है !किन्तु जब बहिनजी ने एक पत्रकार वार्ता में 'भीमसेना' को भाजपा और संघ का ही छाया संघठन बता दिया और चंद्रशेखर को संघ का एजेंट बता दिया तो सब को सब समझ में आ गया कि माजरा क्या है ? याने कि अब खिसयानी  बिल्ली खम्भा नोचे !

चूँकि चंद्रशेखर और उसकी भीमसेना वाले अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते हैं और बहिनजी के नेतृत्व और आर्थिक साम्राज्य को इससे खतरा है !इसलिए अभी-अभी बहिनजी उवाच -भीमसेना तो संघ [rss]]की उपज है। बहिनजी की जय हो ! भाई आनंदकुमार की जय हो ! नोटों की मालाओं पर बलिहारी जाने वाली बहिनजी को शायद अपने कालेधन की चिंता ने ही पगला दिया है। स्वर्गीय काशीराम  देख रहे होंगे - स्वर्ग से या नर्क में जहाँ भी हों - कि कैसी सामाजिक क्रांति हो रही है। उनके सिखाये पढ़ाये लोग कैसी हिंसात्मक क्रांति के लिए लोकतंत्र को तार-तार करने पर आमादा हैं। ब्राह्मणवाद ,मनुवाद तो जुमले हैं असल चीज है जातिगत मक्कारी और व्यक्तिगत मुफ्तखोरी !सहांरनपुर की  हिंसक घटनाओ से बखूबी समझा जा सकता है कि भारत में कोई जातीय परिवर्तन सम्भव नहीं। आर्थिक या राजनैतिक क्रांति भले हो जाए किन्तु सांस्कृतिक सामाजिक क्रांति कभी सफल नहीं होगी ! यूपी की जनता ने बहिनजी और मुलायम परिवार को हराकर अच्छा ही  किया है।  मोदी जी ने भी योगी आदित्यनाथ को  मुख्यमंत्री बनाकर कुछ अनर्थ नहीं किया !

मायावती को काशीराम ने और काशीराम को पता नहीं किसने सपने में आकर कह दिया कि 'दलित शोषित समाज' के सनातन शोषण का कारण ब्राह्मण हैं। खुद नोटों की माला पहनती हैं !आदानी ,अम्बानी और टाटा बाटा से लेकर एससी /एसटी अफसरों से चंदा और चुनाव में उम्मीदवारों से धन वसूलती हैं। उन्होंने इस सिद्धांत को ब्राह्मणवाद या मनुवाद का नाम देकर देश की राजनीती में बरसों तक खूब मजे लिए हैं। बदकिस्मती से या राजनैतिक जनाधार की चिंता में कुछ प्रगतिशील और वामपंथी साथी भी इसी शब्दावली का प्रयोग करते रहते हैं। हालाँकि अंदर ही अंदर वे दिल से चाहते हैं की देश और दुनिया के तमाम गरीब शोषित वर्ग को शोषण से मुक्ति मिले !किन्तु विगत कुछ दिनों से उन्हें भी स्वर्गस्थ दलित नेताओं की सवारी आने लगी है। यूपी चुनाव के पूर्व देश का प्रगतिशील वर्ग कुछ हद तक अखिलेश और सपा के पक्ष में था। किन्तु जब जनता ने या ''श्रीराम लला'' जाने ईवीएम मशीन ने भाजपा को भरपल्ले से जिता दिया ! किन्तु सत्य कभी निरपेक्ष नहीं होता !जब देखा कि संघ परिवार और भाजपा ने योगी ठाकुर को सीएम बनाया है तो लोगों को लगा कि कमसे कम अब गरीब दलित और गरीब ब्राह्मण एक होकर अन्याय के खिलाफ लड़ सकेंगे। चूँकि एक ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया है ,इसलिए अब कोई ब्राह्मणवाद या मनुवाद  का  काल्पनिक खम्भा नहीं नोचेंगा । किन्तु जब विगत दिनों मेरठ ,अलीगढ़ ,सहारनपुर में दलित भीड़ ने एक झटके में पहले पिछड़ों को धोया। फिर  राजपूतों पर हमला किया तो बेचारे घासाहारी ब्राह्मणों का तो अब भगवान् ही मालिक है। दलित गुंडों ने एक निर्दोष राजपूत की जान लेकर योगी ठाकुर को ही चेलेंज कर डाला ,तो निरीह निहथ्ते वामन बनिया किस खेत की मूलीहैं ! अरे भाई जब भीमसेना ने सत्ता धारी दल के कार्यकर्ता को ही पीट दिया तो अब काहे के निर्बल -शोषित ? आपने तो  सावित कर दिया कि आप शोषित अथवा निर्बल नहीं हैं। ऐंसा आभासित हो रहा है कि आप लोगों को अब आइंदा आरक्षण -वारक्षण की नहीं बल्कि मुफ्त भक्षण की आवश्यकता है। अब बहिनजी और उनकी सोशल इंजीनियरिंग का क्या होगा ?

भारत के टॉप १०० भूतपूर्व सामंतों -पूंजीपतियों -नेताओं और व्यापारिक घरानों की लिस्ट में एक भी ब्राह्मण नहीं !लेकिन दलित वर्ग के दर्जनों लोग इस लिस्ट में होंगे। करूणानिधि,ऐ राजा ,दयानिधिमारन ,मायावती अजीत जोगी और अन्य अनेक नेता अफसर अरबपति  हैं। पिछड़ों में नवोदित अरबपतियों में स्वामी रामदेव ,सुब्रतो राय सहारा , आंध्र कर्नाटका के रेड्डी बंधू ,यूपी के मुलायमसिंह ,बिहार के लालू यादव,महाराष्ट्र के मुण्डे महाजन तो प्रतीक मात्र हैं!एमपी के सीएम शिवराजसिंहजी और राजस्थान सीएम वसुंधरा राजे की तो कोई चर्चा ही नहीं। खुद पिछड़े वर्ग के ज्योतिरादित्य सिंधिया,होल्कर परिवार और बड़ौदा के गायकवाड़ परिवारों को नहीं मालूम की कितना काला सफ़ेद धन कहाँ पर पड़ा हुआ है?लेकिन भीमसेना और बहिनजी को उससे क्या?उन्हें तो किसी महा गुरु घंटाल ने एक मंत्र रटा दिया कि जो कुछ है सो -ब्राह्मणवाद ही है !इससे आगे कुछ नहीं कहना सुनना !क्योंकि भेड़चाल का फ़क़त इतना ही अफसाना है। यदि उन्हें आर्थिक असमानता की नहीं सामाजिक असमानता की फ़िक्र थी,तो राजा मनु [ठाकुर] से लेकर योगी [ठाकुर]तक की महायात्रा में सिर्फ ब्राह्मणवाद का आविष्कार क्यों किया ? यूपी में बहिनजी को जब सत्ता अकेले दलित वर्ग के दम पर नहीं मिली तो सोशल इंजीनियरिंग के बहाने बेचारे गरीब वामनों को खूब फुसलाया। अपना उल्लू सीधा कर लिया। लेकिन वे उसका जबाब नहीं दे सकीं की तिलक तराजू और तलवार का क्या हुआ ? उन्होंने यूपी में जातीय आधार पर आर्थिक सर्वेक्षण क्यों नहीं करवाया ? इस उन्हें पता चल जाता कि  यूपी के ब्राह्मण हों या दक्षिण के ब्राह्मण हों ,अधिकांस को भगवान और गीता रामायण से ही संतोष है। बेचारे वामनों का वह हक भी योगियों [योगी आदित्यनाथ]र स्वामियों [स्वामी रामदेव]ने छीन लिया है ! ब्राह्मण यदि शोषक हैं ,अमीर हैं तो उनकी सूची जारी की जाये। जैसे अलपसंख्यक वर्ग में अजीम प्रेम जी ,दारुवाला ,घोड़ेवाला ,रेशमवाला,टाटा और नुस्ली वाडिया हैं ऐंसे ही धनिक ब्राह्मणों के नाम हों तो बताएं ! वैसे यदि देखा जाये तो अधिकांस वामपंथी वुद्धिजीवी और साहित्य्कार ब्राह्मण ही मिलेंगे। क्योंकि वे स्वयं शोषक नहीं हैं और  वे सम्पूर्ण मानव समाज को शोषण मुक्त देखना चाहते हैं। बहिनजी और भीमसेना को सोचना चाहिए कि हजारों लाखों ब्राह्मण वामपंथी ही क्यों होते हैं ?लाल झंडा हाथों में लेकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा क्यों लगाते हैं ? और हिंसा पर उतारू दलित वर्ग को पूंजीपतियों की लूट नहीं दिखती ?

यूपी विधानसभा चुनाव में वसपा- सपा की करारी हार के बाद सामाजिक क्रांति की जातीयतावादी नकारात्मक  शक्तियां वेरोजगार हो चुकी हैं ! कुख्यात तथाकथित मुल्ला 'मुलायम परिवार'ने तो पिछले दरवाजे से मोदी -योगी युतिसे गुप्त मैत्री गांठ ली है !लेकिन बहिन् जी के राजनेतिक अरमा आंसुओं में बह गये हैं ! इसीलिये पहले तो उन्होंने चुनाव में हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की कोशिश की ,किन्तु जब  नही फूट् सका तो भीमसेना के कंधे पर चढ़कर वे यूपी में कपालकुण्डला बनकर रक्तपान पर आमादा हैं। बहिनजी और उनके जातीयतावादी संरक्षण में पले बढे 'नव दवंग' तत्व विगत कुछ वर्षों से यूपी में ठाकुरों पर गुर्राने लगे थे ! अब योगी ठाकुर के गद्दीनशीन होते ही ठाकुरों कोअपनी ठकुराई दिखाने का पुनः इंतजाम किया जा रहा है। इसके मूल में बहिन जी और उनके पालित पोषित वे तत्व हैं जो दो-दो हजार के नोटों से बनी करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहनाते रहे हैं !योगी जी यदि बाकई ईमानदार हैं और यदि वे बाकई यूपी को अपराध मुक्त बनाना चाहते हैं तो गाय ,गोबर बूचड़खाने छोडकर ,लोगों को वेरोजगार बनाने के बजाय उन अधिकारियों ,नेताओं और भूतपूर्व मंत्रियों के वित्तीय साम्राज्य का विच्छेदन करें जो यूपी पर ३० साल से राज कर रहे हैं। इसमें कांग्रेस,सपा ,बसपा और भाजपा सभी के अनैतिक आर्थिक स्वार्थों का उच्छेदन किया जाना चाहिए। अकेले हाथी के बुतों को या बहिनजी के आर्थिक साम्राज्य को टारगेट नहीं किया जाना चाहिए !

बहिनजी के वित्तीय उद्गमों उदित राज और रामदास आठवले के अलावा यह सवाल अब तक किसी और दलित नेता या सवर्ण वुद्धिजीवी कभी नहीं उठाया ,क्यों ? सवाल यह भी है कि जो व्यक्ति या समूह  करोड़ों की मालाएं बहिनजी को पहना सकने में सक्षम है,वह यदि सरकारी अधिकारी हो ,नेता हो ,मंत्री हो तो उसके वित्तीय श्रोत की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए ?

!इसलिये उनके हताश अनुयाई अब धर्मांतरण की धमकी से अलीगढ़ ,आगरा,मुजफ़रपुर ,सहारनपुर ,मथुरा में योगिराज को और गुजरात ,महाराष्ट्र ,दिल्ली में मोदीराज को ही सांप्रदायिक च...ुनौती दे रहे हैं ! लेकिंन जो लोग धर्म परिवर्तन के लिये गंभीर हैं ,वे ज़िस किसी भी धर्म में शामिल होने की सोच रहे हैं ,उन समाजों के अन्दर अपनी आगामी पोजीशन का ठीक से पता कर लें ! क्योंकी जातीय असमानता सभी धर्म मजहब और देशों में है !पाकिस्तान में दलित की आवाज ही नही निकलती !देश विभाजन पर भारत के जो शेख सेयद मुगल पठान उधर गये थे , वे मुहाजीर होकर अभी भी मारे मारे फिर रहे हैं !

बुधवार, 17 मई 2017

नंगा भूंखा इंसान और मेरा भारत महान !

 यदि कभी यह सवाल उठे कि वर्तमान उद्दाम सरमाएदारी और भूमंडलीकरण के दौर में एवं अतीत की मरणासन्न सभ्यताओं के द्व्न्दात्मक दौर में मज़दूर वर्ग से ज्यादा किसान आक्रामक क्यों हैं ?आंदोलित क्यों हैं? तो चौंकना लाजमी है। जब यूरोप,अमेरिका, और भारत जैसे देशों का मजदूरवर्ग संघर्षों के बियावान में खो गया तब दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों में किसान आंदोलन जगने होने लगे हैं। भारत में यह संघर्ष की ज्वाला हालाँकि सत्ता पक्ष ने भड़काई है ,किन्तु भारतीय किसानों का  चरम संघर्ष पूर्व से ही अपेक्षित था। यदि भारतीय किसानों का दमन उत्पीड़न मध्यप्रदेश के मंदसौर ,रतलाम, नीमच की तरह देश भर में जारी रहा, तो मौजूदा केंद्र -राज्य की सरकारें अच्छे दिन लाने के बावजूद और 'राम लला मंदिर' बन जाने के उपरान्त भी सत्ता से बेदखल कर दी जाएगी !

भारत के अनेक प्रतापी सामाजिक कार्यकर्ता [अण्णा हजारे टाइप ]और स्वामी रामदेवनुमा संत महात्मा वैदिक वाङ्ग्मय प्रणीत धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की बात करते हैं। वे अबोध जनता को एक खास राजनैतिक पार्टी के पक्ष में जुटाने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। उनके समक्ष देश के नंगे भूंखे किसानों पर दनादन गोलियां चलीं , लेकिन वे सभी जुए में हारे हुए पांडवों की तरह,हस्तिनापुर से बचनबध्द पितामह भीष्म की तरह निपट मौन रहे ! स्वयं ५६ इंची सीने के धारक स्वघोषित महाबली भी किसान हत्या पर मौन रहे !उनसे सवाल किया जाए कि गाय यदि पूज्य है ,अबध्य है, तो किसान क्या हलाल किये जाने का ही हिन्श्र पशु है ? निर्ममता और जघन्यता का इससे बड़ा -जीवंत उदाहरण और क्या हो सकता है ? आप बेधड़क आधुनिक कारपोरेट जगत के उदीयमान नक्षत्र बने रहिये। अम्बानी, अडानी, विजय माल्या ,सुब्रतो राय सहारा का 'सहारा' बने रहिये ,आप बेखौप बड़े पूंजीपतियों को अरबों की सब्सिडी और बेलआउट पैकेज दीजिये ,किन्तु अन्नदाता की ऐसी दुर्गति तो न कीजिये ! योगगुरु स्वामी रामदेव,श्री श्री और तमाम साधु संत महात्मा यदि चाहें तो किसानों की मदद कर सकते हैं !क्योंकि उनके समक्ष न केवल आवारा पूँजी [लक्ष्मी],न केवल 'नीम -हकीम खतरेजान' वाले वेरोजगार,न केवल सनातन मिलाबटिये ,न केवल आधुनिक तकनीकी में दक्ष युवा बल्कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी भी नतमस्तक हैं । सिर्फ किसान और मजदूर को ही बेमौत  मरने क्यों छोड़ दिया गया है ?

भारत में वेशक अभी हिंदुत्ववादियों का बहुमत है। हालाँकि भारत में अभी भी धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र की ही व्यवस्था है।लेकिन यदि भारत को हिन्दुत्ववाद के खूंटे से बाँध दिया गया, तो गरीबों पर बड़ी आफत आ जाएगी। क्योंकि हिन्दू धर्म-दर्शन और  विचार के अनुसार गरीबी -अमीरी,सुख- दुःख, शोषण -दमन को मनुष्यमात्र के निजी कर्मफल या 'हरिच्छा' से जोड़ दिया जाएगा ! कहने सुनने को तो हिन्दू और जैन धर्म बहुत बड़े अपरिग्रहवादी हैं। किन्तु उनका पूँजीवाद से बिचित्र नैसर्गिक और अपनत्व का नाता है। जबकि इस्लाम ,ईसाई ,यहूदी और और बुद्ध धर्म-मजहब में अपरिग्रह का नाम भी नहीं है,किन्तु इन मजहबों में मजदूर ,किसान के हितों की खूब परवाह की गई है। ईसाई धर्म में तो अनेक संत हुए जो सुतार -बढ़ई और चरवाहेभी थे। शायद यही वजह है कि इन पाश्चत्य धर्म मजहब में वैज्ञानिक आविष्कारों की गुंजायश बनी रही। जबकि हिन्दू और जैन धर्म में परम्परा से मुनि,ऋषि केवल अपरिग्रह पर बल देते रहे , कुछ तो  राजाओं और चक्रवर्ती सम्राटों के गुरु भी रहे, किन्तु जनता की लूट और शोषण को बंद कराने में कोई दिलचस्पी नहीं रही। कुछ हिन्दू जैन धर्मावलम्बी तो उच्चकोटि के विचारक होते हुए भी अधिसंख्य जनता के दुखों को उनके 'पूरब भव' के कर्म के हवाले करते रहे हैं । यही वजह है कि विदेशी हमलों के वक्त अधिकांस जनता 'अहिंसा परमोधर्म :' या 'प्रभु की इच्छा' 'संघं शरणम गच्छामि 'अथवा 'होहहिं सोइ जो राम रचि राखा' का समवेत गायनकरते हुए सदियों के लिए गुलाम होती चली गयी !मेहनतकशों की एकता ,उनका सही मार्गदर्शन और संघर्ष का माद्दा जिन्दा रहता तो भारत कभी गुलाम नहीं होता !

यह सर्वविदित है कि सिर्फ भारत में ही नहीं, एसिया में ही नहीं, बल्कि सारे संसार में एक चीज बहुत कॉमन है कि राजनैतिक विचरधाराओं के रूप में - लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद का कांसेप्ट उन्होंने यूरोप से ही लिया है । यह दुहराने की भी जरूरत नहीं कि इसकी केंद्रीय जन्मदात्रि ब्रिटिश संसद रही है। उन्होंने ११ वीं सदी के मैग्नाकार्टा से लेकर बीसवीं सदी के दो दो महायुद्धों और उपनिवेशवाद विखंडन तक के दौर से सीखते हुए लोकतंत्र ,समाजवाद और पूंजीवाद के विचारों को दुनिया में समृद्ध किया है। भारत ने  ब्रिटिश हुकूमत से वो सब सीखा जो ब्रिटिश ,फ्रेंच, जर्मन ,अमेरिकन और सारे संसार ने उनसे सीखा है। रेल ,बिजली, टेलीफोन,मोटरकार, स्कूटर, सायकिल,घड़ी,अखवार,टीवी, रेडिओ,कम्प्यूटर मोबाइल इत्यादि की तरह भारत के लोगों ने विभिन्न 'राजनैतिक विचारधारायें'  भी विलायत से ही उधार लीं हैं।  फिर भी मैं यही कहूंगा कि मेरा भारत महान ! भले ही मुझे दो रोटी के लिए आठ घंटे मजूरी करनी पडी हो!

वेशक भारत के पास कहने को अपना खुद का बहुतकुछ है। अजंता, एलोरा, एलिफेंटा ,कोणार्क ,नालंदा और महाबलीपुरम जैसे पुरातन खंडहर अवशेष तथा ताजमहल ,हुमायुंका मकबरा -अकबरका मकबरा जैसे ऐतिहासिक दाग भी यहाँ शिद्द्त से मौजूद हैं !हल्दीघाटी ,पानीपत ,कुरक्षेत्र, तराइन,पलाशी के रणक्षेत्र भी भारत की शर्मनाक पराजय के प्रतीक रूप में अजर अमर हैं। इसके अलावा ज्ञान ,ध्यान,कर्मयोग गीता,रामायण,वेद -पुराण,नाट्यशास्त्र,आयुर्वेद ,कामसूत्र तथा बाइबिल,कुरआन जैसी अनेक वेशकीमतीं साहित्यिक कृतियाँ भी यहाँ मौजूद  हैं। नागा साधुऒं की जमात ,धूतों -अवधूतों ,मलंगों-कापालिकों ,सूफियों ,नटों-मदारियों और चारण -भाटों की तो यह भारत भूमि हमेशा से ही उर्वरभूमि रही है ! इसके अलावा यहाँ और भी अनेक अद्भुत चीजें ऐसी हैं जो दुनिया के लिए किसी उजबक अजूबे से कम नहीं हैं । त्रिपुरा से लेकर हिंद्कुश पर्वत तक -हिमालय पर्यन्त और केरल से लेकर कष्मीर तक जो कुछभी भौगोलिक विस्तार है , वो सब भारत का सांस्कृतिक वैभव ही तो है। खजुराहो,कोणार्क, एलोरा, अजंता और दक्षिण भारत के मंदिर उनमें सर्वाधिक महत्व के हैं।     

रविवार, 14 मई 2017

सत्य की खोज का सही रास्ता !

सभ्य संसार में आदिम मानव से लेकर ऋग्वेद काल तक की यात्रा में  जितने भी अनसंधान या अन्वेषण हुए उनमें मनुष्य द्वारा 'ईश्वर की खोज' सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि  है !यदि धर्मान्ध और धर्मभीरु लोगों की बातों को न भी माने तो भी जानकारों ,इतिहासविदों ,पुरारतत्वविदों,वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की आम राय है कि सभ्यताओं के उत्थान -पतन ,भौतिक विकास और 'धर्म' का उदय इत्यादि उपादान ईश्वर अल्लाह की  परिकल्पना से पूर्व के हैं। भारतीय संस्कृत- वैदिक वांग्मय में अष्टाबक्र,जनक ,कपिल ,कणाद और अन्य मन्त्र द्रष्टा ऋषियों  के'तत्वदर्शन' में अद्भुत वैज्ञानिकता का समावेश निहित है।इसी तरह ओल्ड टेस्टामेंट और कुरान शरीफ में भी साइंटिफिक मानवीय जीवन जीने की कला का ही निर्देशन है। लेकिन कालांतर में अरब -मध्य एशियाई सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों ने अपनी युद्धपिपासा और साम्राज्य्वादी लूट की तृष्णा के कारण सारे एशिया और यूरोप को केवल चरागाह मन लिया। जबकि भारतीय उपमहा द्वीप के प्रगत मनुष्य ने आत्मा ,अविद्द्या , माया और इन सबके सर्वेश्रवा ' ईश्वर' को  अपना सर्वश्व अर्पित कर दिया। जब सारे विश्व का एक सृष्टा ,पालनहार और संहारक मान लिया तो फिर कोई पराया भी नहीं रहा। इसीलिये जब शकों,हूणों,कुषाणों ,तुर्को ,खिलजियों सैयदोंमुगलों ,अंग्रेजों ने भारत को चरागाह मानकर यहाँ मुँह मारा तो इन बर्बर कबीलाई समाजों को भारतीय सनातन परम्परा ने 'ईश्वर पुत्र 'मानकर 'बसुधैव कुटुंबकम' धर्म का पालन किया ! मिश्रित जीवन संस्कृति की यात्रा में व्यक्ति ,परिवार ,समाज को संचालित करने के लिए इस भारतीय भूभाग में सभी समाजों ने अपने धर्मग्रंथ ,और अपने अपने रीति रिवाज सहेज लिए। किन्तु आधुनिक पूँजीवाद और लोकतान्त्रिक राजनीती ने पुरातन मूल्यों, धर्म ,श्रद्धा और  पुरातन रीति रिवाजों को अप्रासंगिक बना दिया है। हिन्दुओं में जिस तरह सती प्रथा या बालविवाह अप्रासंगिक हो आगये उसे तरह इस्लामिक जगत में 'तीन तलाक'की अब कोई अर्थवत्ता नहीं रही। वेशक इस पर वोट की राजनीती और मजहबी उन्माद की खेती की जा सकती है !

इस २१वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, न केवल जाहिल बर्बर मजहबी आतंकी  बल्कि सभ्य शिक्षित और वैज्ञानिक समाज भी बुरी तरह गुत्थत्मगुत्थःहो रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर ,इस युग की दुनिया दो हिस्सों में बँटकर ,दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है। हर देश में, हर समाज में,हर मजहब में,हर कबीले में,हर परिवार में , तमाम नर नारी  विपरीत मोर्चों पर आपने सामने खड़े हैं ! हाँलाकिं वैश्विक स्तर पर कार्ल मार्क्स द्व्रारा आविष्कृत 'वर्ग संघर्ष' के सिद्धांत से पूर्व भी दुनिया इस धरती पर 'सभ्यताओं के संघर्ष' या कबीलाई संघर्ष विद्यमान रहे हैं। अशांति, द्व्न्द, विप्लव का सिलसिला  तो उतना ही पुराना है ,जितना पुराना परिवार, समाज और राष्ट्र !सभ्यताओं के संघर्ष का इतिहास भी बहुत पुराना है। लेकिन अतीतमें चूँकि 'शांति की खोज' और 'सत्य की खोज' के संसाधन बहूत सीमित थे ,और थे भी तो केवल धर्म दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित थे।  लेकिन वर्तमान लोकतान्त्रिक दुनिया में और आजाद एवं रोशन ख्याल दुनिया में अशांति क्यों बढ़ती जा रही है ?इसकी पड़ताल बहुत जरुरी है कि 'सभ्य संसार' में अशांति और  विप्लवी कोलाहल क्यों बढ़ रहा है ? 

जिस तरह असफल व्यक्ति ,असफल समाज और असफल राष्ट्र की दुनिया में कोई एक आदर्श स्थति नहीं हो सकती !उसी तरह सफल व्यक्ति ,सफल समाज और सफल राष्ट्र का भी दुनिया में कोई आदर्श मानकीकरण नहीं हो सकता ! जो व्यक्ति ,समाज या राष्ट्र सफल कहे जाते हैं वे देश, काल, परिस्थतियों के अलावा असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल  राष्ट्रों की मूर्खता का बेजा फायदा उठाते हैं। इस संसारमें हमेशा ही कुछ शक्तिशाली और नेकदिल करुणावान लोगों की मौजूदगी बनी रहती है,उनकी सदाशयता का बेजा फायदा उठाकर ही कुछ बदमाश और काइंयां लोग तथाकथित सफलता को प्राप्त होते रहते हैं। लेकिन तमाम असफल लोगो की असफलता के लिए बहुत हद तक वे खुद ही जिम्मेदार होते हैं। यह तथ्य न केवल तार्किक या बौद्धिक आधार पर , बल्कि आध्यात्म दर्शन के कार्य कारण सिद्धान्तानुसार  भी यह स्वयं सिद्ध है कि ''कोई किसी को सुख दुःख दने वाला नहीं हो सकता,सभी अपने अपने कर्म का फल भोगते हैं ''!
असफल व्यक्तियों ,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता याने अपने समय के समांनातर उनके पिछड़ने का खास कारण सिर्फ देश, काल, परिस्थतियाँ नहीं होतीं !और चतुर चालाक लोग भी पूर्णतः जिम्मेदार नहीं होते ! बल्कि असफल लोगों, असफल समाजों और असफल राष्ट्रों में जो संकल्प शक्ति और चेतना का अभाव हुआ करता है वह 'अभाव' ही उनकी तमाम असफलताओं का प्रमुख घटक माना जाना चाहिए। असफल लोगो,असफल समाजों और असफल राष्ट्रों की असफलता के लिए- सफल लोग,सफल समाज और सफल राष्ट्र कुछ हद तक कसूरवार अवश्य होते हैं। यह भी सम्भव है कि उनकी असफलता का कारण -देश, काल, परिस्थितियाँ भी हों! लेकिन  जिसके संकल्प में ईमानदारी ,मेहनत ,परिश्रम और सच्चाई न हो उसका रास्ता कभी सही नहीं हो सकता।  जिसका रास्ता सही नहीं हो ,उसका संकल्प भी सही नही होगा ! ऐंसा व्यक्ति,ऐसा समाज और  ऐसा राष्ट्र न तो आरक्षण से, न तर्कसे ,न कुतर्क से और न राज्य सत्ता प्राप्ति से आगे नहीं बढ़ सकता। वह  किसी बेहतर मंजिल पर कभी नहीं पहुँच सकता। मंजिल पर पहुंचने का हकदार वही है, जिसका संकल्प  सही  है !सवाल उठ सकता है कि सही रास्ता कौन सा है ? इसकी पड़ताल के लिए दुनिया का अनुभव मनुष्य के सामने पसरा पड़ा है।

यदि आपको साइंस टेक्नॉलॉजी और धर्म -दर्शन के साथ साथ आध्यत्मिक जगत के अध्यन में रूचि है, तो आपको जिंदगी के हर क्षेत्र में औरों की अपेक्षा अधिक जटिल सवालों से जूझना होगा। यदि आप 'परमानंद' प्राप्ति की ओर अग्रसर हैं ,यदि आप कैवल्यपद ,परमपद,अव्वयपद या मोक्ष की कामना पूर्ण करने में अनुरक्त हैं।  तो भले ही आपने संसार त्याग दिया हो ,सन्यास ले लिया हो, किन्तु आपको मुमुक्षु तभी कहा जा सकता है जब आप जीवित रहकर उसकी साधना कर सके। निसंदेह योगारूढ़ सन्यासी का मुमुक्षु हो जाना अर्थात अवतारी पुरुष जैसा हो जाना जैसा है ! लेकिन उसके लिए यह जरुरी है कि उसकी संकल्प साधना  के लिए वह जिन्दा कैसे रहेगा। ज़िंदा रहने के लिए उसे इस 'चैतन्य आत्मा' को इस नश्वर साधन धाम मानव शरीर में जिन्दा रहना होगा ! साधक को जिन्दा रहने के लिए आग पानी हवा ,रोटी ,फल के अलावा एक शांतिपूर्ण स्थल भी चाहिए । यदि उसके मुल्क में अमन नहीं ,फसलें नहीं और सुरक्षा या शांति नहीं तो देश फिर से गुलाम भी हो सकता है। तब साधक का कैवल्य ज्ञान ,बोधत्व और मोक्ष सब बेकार है।


शनिवार, 13 मई 2017

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''

''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का '' पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में दुर्गोत्सव के दौरान इंदौर के जेल रोड पर किसी बड़बोले साम्प्रदायिक कवि मुखारविंद से यह तथाकथित 'देशभक्तिपूर्ण' कविता  सुनी थी ! यह कविता खतरनाक संदेश के  उस अर्थ में अव्यवहारिक है कि पाकिस्तान कोई स्लेट पेन्सिल के द्वारा श्यामपट्ट पर लिखा गया कोरा  शब्द मात्र नहीं है ,कि जब चाहा लिख दिया और जब चाहा मिटा दिया। आज हम जिस धरती को  पाकिस्तान कहते हैं अतीत में वह न केवल सिंधु घाटी सभ्यता अपितु ऋग्वेद सहित अधिकाँस वैदिक वाङग्मय के सृजन की पावन धरा रही है ! आज पाकिस्तान का मूल स्वभाव हिंसा आधारति मजहबी कदाचरण भले हो गया है ,किन्तु अतीत में जब वह कुरु -पांचाल था ,प्रागज्योतिषपुर था और सैंधव सभ्यता का केंद्र था, तब सारी दुनिया इस उर्वर शस्य स्यामला भूमि को ललचाई नजरों से देखती थी। आर्यावर्त-जम्बूद्वीप और भरतखण्ड के क्रमिक विकाशवादी दौर में इस भूमि पर ''वसुधैव कुटुंबकम'' और ''ईश्वर: सर्वभूतानाम....... " का भी उद्घोष बहुत काल तक होता रहा है !अब यदि वहां कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का वर्चस्व है, तो इससे वहाँ की तमाम नदियां,पर्वत और माटी को 'पापी' कैसे माना जा सकता है ?आज के पाकिस्तान में भी कुछ अमनपसंद आवाम और मेहनतकश हैं और सभ्य शहरी लोगों को भारत से कोई दुश्मनी नहीं है। !इसलिए उन मुठ्ठी भर आतंकियों के कारण जो कश्मीर में आग मूत रहे हैं ,पत्थर फनक रहे हैं मारने के लिए यह कहना उचित नहीं कि ''नक़्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का ''!

वेशक पाकिस्तान में छिपे आतंकियों ,पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी सरकार की ओर से भारत के खिलाफ अनेक आपत्तिजनक खुरापातें निरंतर जारी रहती हैं ! लेकिन जब उसका माकूल जबाब हमारी सेनाऐ दे रहीं हैं, तो फिर सो शल मीडिया पर और नेताओं की भाषणबाजी में 'पाकिस्तान को माकूल जबाब देने का विधवा विलाप क्यों ? नेताओं और मंत्रियों को यह कहने की  क्या जरूरत कि 'हमारे शहीद  सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जायगी' ? वेशक शहीदों की कुर्बानी अनमोल है,किन्तु दो के बदले दस मार दने से उनकी भरपाई कैसे होगी ?क्या सारी अच्छाइयां भारत में मौजूद हैं? गांधी हत्या से लेकर निर्भया काण्ड तक की तमाम काली करतूतें क्या पाकिस्तान ने कीं हैं? क्या पाकिस्तान में शिया,सूफी और हिन्दू ईसाई नहीं हैं। भले ही वे बहुत कम बचे हैं ,लेकिन जब तह वे वहां हैं ,तब तक पाकिस्तान की बर्बादी के बारे में सोचना ही मूर्खता है !यदि कश्मीर समस्या को व्यवहारिक तरीके से सुलझाया गया होता ,यदि अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान को अपना पिट्ठू न बनाया होता ,तो पाकिस्तान की मजाल नहीं थी किवह भारत की ओर आँख उठाकर देख सके ! वैसे भी भारतीय सनातन धर्म परम्परा और वैदिक मतानुसार जिस परमात्मा ने भारत [इण्डिया] बनाया है ,उसी ने पाकिस्तान का भी निर्माण किया है ,इसलिए धरती के नक्शे पर से उसका नाम मिटाना मनुष्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं है । मार्क्सवाद ,लेनिनवाद और सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद भी किसी राष्ट्र को नष्ट करने के पक्ष में नहीं है। केवल अंध्रराष्ट्रवाद और मजहबी आतंकवाद से ही समस्त धरती को खतरा है।  श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 11 मई 2017

यदि कोई व्यक्ति चारों वेद-पुराण अष्टदश ,बाइबिल ,जेंदावस्ता और कुरआन का परम ज्ञाता -उदभट विद्वान है ,तो उसको नमन !लेकिन यदि कोई व्यक्ति निपट अंगूठा टेक है ,चरवाहा है , किसान -मजदूर है और वह शोषण -उत्पीड़न ,धर्मान्धता से संघर्ष का माद्दा रखता है तो उसे बारम्बार नमन !

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

१ -मई  अन्तरराष्ट्रीय  मजदूर दिवस -जिंदाबाद !


मई दिवस के शहीदों को लाल सलाम ! शिकागो के अमर  शहीदों को लाला सलाम !

दुनिया के मेहनतकशो - एक हो जाओ ! एक हो जाओ !!

हर धंधे के मेहनतकशो -एक हो जाओ ! एक हो जाओ !!

हर धर्म मजहब ,हर जात के मेहनतकशो -एक हो जाओ !एक हो जाओ !!

प्राइवेट सेक्टर में काम के घंटे आठ करो ! निनी क्षेत्र के कामगारों को जॉब की गारंटी दो !

अम्बानी ,माल्याओं ,सहाराओं की जागीर नहीं -हिन्दुस्तान हमारा है !

शिक्षा स्वास्थ्य का बजट कम करने वाले होश में आओ !

रिलायंस -जिओ की पैरवी करने वाले नेता होश में आओ !!

जो अडानी अम्बानी का यार है,,, वो देश का गद्दार है !

सरकारी सार्वजनिक उपक्रमों की लूट बंद करो !

भृष्टाचार पर रोक लगाओ !

जम्मू- कश्मीर और बस्तर में मची  तकरार- कौन है इसका जिम्मेदार ? ये सरकार वो सरकार बड़बोले नेताओं की सरकार !!

गुरुवार, 30 मार्च 2017

रामलला टाट में और भाजपाई ठाठ में हैं।

यूपी चुनाव जीतने के दुसरे दिन ही लखनऊ में स्वामी रामदेव ने यूपी के नए नवेले मुख्यमंत्री 'योगी आदित्यनाथ' के साथ मंच साझा किया। योगी जी ने इस अवसर पर कहा कि 'सूर्य नमस्कार' और 'नमाज' की शारीरिक मानसिक क्रियाएं लगभग एक जैसी ही हैं । उन्होंने और ज्यादा कुछ नहीं बोला । लेकिन स्वामी रामदेव ने अपने 'योगबल' के आवेश में आकर न केवल यूपी बल्कि सारे 'अखण्ड भारत' में  'रामराज्य' का ऐलान भी  कर दिया है। उन्होंने हर्षातिरेक में आकर आगामी २१ जून-२०१७ के योग कार्यक्रमों का एजेंडा प्रस्तुत किया। तदनुसार वे 'रामराज्य' की चर्चा यों कर रहे थे तो मानों अपने 'पंतजलि- साम्राज्य' का ही प्रचार कर रहे हों! यह तो वक्त ही बतायेगा कि आइंदा 'रामराज्य' आएगा या 'माहिष्मती साम्राज्य' के उस 'बाहुबली' जैसा हश्र होगा,जिसे उसके ही वफादार सेवक 'कटप्पा' ने धोखे से मार दिया था । बहरहाल इस तरह के मंचों के आयोजन से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिनों दिन बढ़ती जाती व्यक्तिगत ख्याति और उनकी संविधानेतर पलटन के तेवरों से मोदीजी को नयी चुनौती तैयार हो रही है। इससे वे लोग ज्यादा शशँकित हैं जो धर्मनिरपेक्ष हैं। इसके अलावा 'एंटी रोमियो स्काड' और बूचड़खाने नियंत्रित करने के बहाने यूपी के रोजनदारी मजदूर-कर्मचारी,छोटे कारोबारी,सीमान्त किसान,दलित और अल्पसंख्यक का जीवन संकट में आ चुका है। वे लोग भी चिंतित हैं जो किसी तरह का साम्प्रदायिक फसाद नहीं चाहते !

भाजपा के चुनावी एजेंडे में अथवा 'संघ नेतत्व' के जेहन में 'रामराज्य' की आकांक्षा कोई नयी बात नहीं है। आजादी से पूर्व 'हिन्दू महासभा'और 'संघपरिवार' ने  आजादी के उपरान्त अपने इन्ही उद्देश्यों के निमित्त 'जनसंघ' का निर्माण किया था। जिसके सिद्धांतों में 'हिन्दू अस्मिता' और 'रामराज्य' को प्रमुखता से तस्दीक किया जाता रहा है। ई.सन १९८० के मुम्बई स्थापना अधिवेशन में 'भाजपा'ने अपने घोषणापत्र में 'गांधीवादी समाजवाद' का बहुत गुणगान किया। रामराज्य को गांधीवादी रास्ते से लाने का संकल्प भी लिया गया। गाहे बगाहे उसका प्रचार प्रसार भी किया जाता रहा है। गलतफहमी या बदकिस्मती से उनके इस रामराज्य अभियान को अल्पसंख्यकों ने अपने खिलाफ मान लिया। परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी सुरक्षाके लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की चुनावी राजनीति में साम्प्रदायिक ध्रुबीकरण करते हुए 'टेक्टिकल वोटिंग' का खतरनाक रास्ता चुना । धर्मनिरपेक्ष पूँजीवादी दलों और अल्पसंख्यक नेताओं ने इस वर्ग का खूब भयादोहन किया। इमाम बुखारी से लेकर लालू,मुलायम, माया ,ममता और कांग्रेस ने भी इसे सालों तक खूब भुनाया है । चूँकि हिन्दू समाज तो जातियों और भाषाई खेमों में बुरी तरह बँटा हुआ है,इसलिए जब गैरभाजपा राजनीतिक शक्तियोंने ने दलित -अल्पसंख्यक एवम पिछड़े वर्ग को एकजुट कर नकली धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की खिचड़ी पकाई, तो बहुसंख्यक वर्ग के साम्प्रदायिक नुमाइंदों को सत्ता में आने का मौका मिल गया। मंडल आयोग की रिपोर्ट का अमल यदि क्रिया था तो 'कमण्डलवाद' उसकी प्रतिक्रिया रहा और कमण्डल की प्रतिक्रिया स्वरूप संघ का 'कमलदल' अब शिद्दत से खिल रहा है !लेकिन रामलला अभी भी बेघर हैं !

विगत यूपीए -दो के मनमोहन राज में जब उच्च वर्ण के गरीब मजदूरों, बेरोजगार युवाओं को लगा कि आजादी के ७० साल भी उनका किसी पार्टी के राज में कोई उत्थान नहीं हुआ तो वे अन्ना हजारे- स्वामी रामदेव के बहकावे में आ गए। उनसे कहा गया कि यदि कांग्रेसको हरा दोगे तो कालाधन वापिस सफेद हो जाएगा। यदि भाजपाको जिताओगे तो रामराज आ जाएगा। अच्छे दिन आयँगे। चूँकि मनमोहन सरकार के कुछ मंत्रियों और नेताओं ने भृष्ट-आचरण को बढ़ावा दिया था। और बहुतेरे आरक्षित वर्ग के परिवारों का नाम भी मलाईदार सूची में शामिल हो चुका था, इसलिए सवर्ण -दलित -पिछड़े वर्ग के लोगों ने भाजपा और मोदीजी को सत्ता सौंप दी! लेकिन बहुसंख्यक समाज ने  'संघ' की शरण में जाकर मोदी और योगी पर जो यकीन किया है ,उसका निर्णय आगामी इतिहास करेगा ,कि उनका यह जनादेश सही था या गलत ! मोदी इफेक्ट की बदौलत बिहार यूपी के अधिकांस युवाओं ने बहरहाल जातिय आरक्षण के मंडल अवतार पर कमण्डल को तवज्जो देना शुरूं कर दिया है । इससे आइंदा भाजपा को शेष राज्यों में भी बढ़त मिलेगी और आगामी २०१९ के आम चुनाव में भी मोदी जी को ही विजय मिल सकती है। भारत विकास का यह मोदी मॉडल रुपी 'बेड़ा'आइंदा 'मंदिर-मस्जिद विवाद' के भंवर से दूर रहता है,साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखता है तो निसन्देह भारत भी विकास की लंबी छलांग लगा सकता है। लेकिन इसके लिए हिन्दू -मुस्लिम दोनों पक्षों को बहुत सब्र से काम लेना होगा।

सुब्रमण्यम स्वामी ,स्वामी रामदेव और यूपी के विजयी उत्साहीलाल भले ही योगीजी और मोदीजीको मंदिर निर्माण के लिए उकसाने की फिराकमें हों किन्तु ये दोनों दिग्गज नेता 'सबका साथ सबका विकास' छोड़कर साम्प्रदायिक दंगों के गटर में अब शायद ही डुबकी लगाने को तैयार हों। भारतीय आशा की किरण वह गंगा-जमुनी तहजीव है जो हर संकटमें राष्ट्रीय एकता की राह दिखाती रहती है। अयोध्या का मंदिर -मस्जिद विवाद इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सुप्रीम कोर्ट में है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि दोनों पक्ष इस मामले को अदालत के बाहर द्वीपक्षीय समझौते से हल करने का प्रयास करें। कोर्ट की इस अपील के बाद कमोवेश दोनों पक्षों की संतुलित प्रतिक्रिया रही है। हिन्दू -मुस्लिम पक्षके चन्द अगम्भीर कट्टरपंथी भलेही अल्ल -बल्ल बकते रहते हैं ,किन्तु दोनों ओर के कुछ जिम्मेदार लोग बहुत सावधानी बरत रहे हैं। यह आशाजनक और सौभाग्यसूचक है। अधिकान्स मुस्लिम उलेमाओं और बाबरी मस्जिद के पक्षकारों का कहना है कि अदालत जो भी फैसला देगी हम उसे तहेदिल से मान लेंगे। उधर मुख्यमंत्री योगीजी और अन्य हिन्दू धर्मगुरु भी अब संविधान के दायरे में हल निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन फिर विवाद के सुलझने में अड़चन क्या है ? इस सवाल का जबाब आसान नहीं है। यह इतिहास का वह काला पन्ना है जिसे फाड़ा नहीं जा सकता।
अयोध्या मंदिर -मस्जिद विवाद पर आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निवृत्तमान सहनिर्देशक श्री केके मोहम्मद के अनुसार विवादित स्थल की खुदाई में जो अवशेष मिले हैं वे सावित करते हैं कि पहले वहाँ मंदिर अवश्य था। कायदे से श्री केके मोहम्मद साहिब के बयान और खुदाईमें प्राप्त तत्सम्बन्धी मृदभाण्डों और सबूतों के आधार पर यह उम्मीद बनती है कि फैसला मंदिर के पक्ष में होना चाहिए। लेकिन ब्रिटिश संविधान प्रेरित आधुनिक भारतीय न्याय व्यवस्था को इतना साक्ष्य पर्याप्त नहीं है। उसे लिखित प्रमाण चाहिए। शायद इस कमजोरी को दोनों पक्ष के विद्वान समझते हैं। इसीलिये स्वर्गीय अशोक सिंघल और आडवाणी जैसे लोग इस विवाद को कानून से परे,आस्था का मुद्दा मानते रहे हैं। इसी नवागन्तुक ब्रिटिश कानून की बिना पर बाबरी मस्जिद के पक्षकार मौलाना हाजी साहबका कहना है कि खुदाई में 'राम के ज़माने की कोई चीज 'नहीं मिली। गनीमत है कि उन्होंने ये नहीं कहा कि 'राम तो मिथ हैं '! वैसे भगवान श्रीराम को 'मिथ' बताने वाले नामवरसिंह और रामचन्द गुहा अब मोदीभक्त हो गए हैं। प्रोफेसर हबीब इरफ़ान शायद मस्जिद मोह के कारण 'श्रीराम' को 'मिथ' बताने में जुटे हैं। यदि वे आर्केलॉजिकल सर्वे के रिपोर्ट पढ़ेंगे तो मंदिर के पक्ष में भी हो सकते हैं। वैसे हाजी साहब की बात में दम है.उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि खुदाई में वेशक बहुत कुछ मिला है लेकिन 'श्रीराम के समय का कोई चिन्ह नहीं मिला' !उनके इस तर्कका जबाब मेरे पास है। हालाँकि मैं न तो हिंदुत्ववादी हूँ और न बाबरी मस्जिद का समर्थक!किन्तु  हाजी साहब और तमाम मित्रों के समक्ष एक सच्चा उदाहरण पेश करता हूँ !

मेरे पितामह का जन्म पुरानी 'धामोनी' रियासत में हुआ था। हैजा फैलने पर वे १९वीं शताब्दी के अंत में सपत्नीक पास के ही गांव पिड़रुवा आ वसे थे ! जब हमारी पीढी के जिज्ञासु वंशजों ने वहां की खोज खबर ली तो पता चला कि जिस जगह हमारे पूर्वजों का छोटा सा पत्थरों का मकान था,वहां अब खण्डहर भी  नहीं बचा जो बताए कि 'इमारत बुलन्द' थी! ज्ञातव्य हो कि १६वीं सदी के बादसे धामोनी स्टेटपर मुगलों के किसी अदने से सूवेदार का कब्जा रहा है उन्होंने धीरे-धीरे हमारे पूर्वजों को वहाँ से खदेड़ना जारी रखा !धामोनी में ब्राह्मण और जैन समाज के अलावा गौड़ आदिवासी और लोधी ठाकुर बहुतायत में थे। चूँकि जैन और ब्राह्मण वर्ग शुद्ध शाकाहारी थे अतएव आक्रांताओं के मांसाहारी कल्चर और युद्ध जैसे निरंतर रक्तपात से उतपन्न महामारी के कारण घबराकर धामोनी छोड़ गए। उनके खेत खलिहान मकान,दूकान सब कुछ मुस्लिम परिवारों को दे दिए गए । मेरे पूर्वजों के मकानके पत्थरों से किसी मुस्लिमने मकान बना लिया। जिस जगह  पूर्वजों का मकान था वहाँ उन्होंने किसी मरहूम को दफ़्न कर दिया ,और जहाँ मंदिर था वहां उन्होंने मस्जिद बनाली। अब यदि सुप्रीम कोर्टके आदेश पर मेरे पूर्वजों की जन्मभूमि पर खुदाई की जाये तो वहाँ किसी मरहूम मुस्लिम स्त्री या पुरुष के नरकंकाल ही शेष मिलेंगे ! और हमारे पूर्वजों ने समझदारी दिखाई कि 'ठाकुरबाबा' और अन्य देवताओं को बाइज्जत  साथ लेते आये ,जो आज भी पिड़रुवा ग्राम में आबाद हैं। वर्ना वे सभी देवी देवता किसी  कुआँ बाउड़ी में फेंक दिए गए होते या धसान नदी में बहा दिए गए होते। अथवा किसी मस्जिद के द्वार पर जमींदोज कर दिए गए होते !अब प्रोफेसर हबीब इरफ़ान या रोमिला थापर कहे कि आपके पूर्वज तो मिथ हैं ,आपके पूर्वजों के खेत ,खलिहान ,मंदिर और देवी देवता मिथ हैं ,तो इससे बड़ा महाझूंठ और  पाखंड क्या होगा ?

धामोनी रियासत  पर मुगलों के आक्रमणों और महामारियों से उसके उजड़ने से पूर्व,अधिकांश निर्वासित हिन्दू आसपास के गाँवों - पिड़रुवा,सेसई मालथोन या सागर नगर जा वसे !लेकिन वे किस तारीख को उधर से इधर हुए और मूर्तियों के विस्थापन की कोई तारीख किसी सरकारी गजट में दर्ज नहीं है। वे किस जगह से उखाड़ी गइं ? कौन लाया ? कैसे लाया यह विवरण भी कहीं लिखित में उपलब्ध नहीं है। लेकिन वे मूर्तियां आज भी उपलब्ध हैं। हमारे पूर्वजों के खेतों पर जिनका कब्जा है वे भी उपलब्ध हैं। और वे भी मानते हैं कि 'यह सब तुम्हारे पूर्वजों का ही है लेकिन लिखित में अब  सब कुछ हमारा है।' कोई भी ईमानदार और समझदार इंसान बखूबी सोच सकता है कि जब इस छोटी सी घटना का एक सभ्य सुशिक्षित हिन्दू ब्राह्मण परिवार के पास पूर्वजों की थाती का कोई सबूत नही है, तो पुरातन अयोध्या नगरी उर्फ़ साकेत उर्फ़ अवध के ५ हजार साल पूर्व की किसी राजसी वैभवपूर्ण की सभ्यता के अवशेषों को,लकड़ी मिट्टी,पत्त्थर के भवनों को २१वीं शतब्दी की अयोध्या में खोजने की मशक्कत कितनी बेमानी है? सोचने की बात है कि इन हालात में कोई भी न्यायालय क्या निर्णय दे सकता है ? वैसे भी अयोध्या का इतिहास सिर्फ मुगल आक्रमण का बर्बर ही इतिहास नहीं है,बल्कि उनसे पूर्व तुर्कों,अफगानों,शक ,हूण ,कुषाणों और तोरमाणों ने भी उसे बर्बाद किया है। इसके अलावा भारत के ही अनेक रक्तपिपासु राजाओं ने भी उसे लूटा होगा! जब सारी दुनिया में कुदरती उथल पुथल निरन्तर मचती रहती है तो विगत ५-६ हजार सालमें इस अयोध्याकी कितनी दुर्गति न हुई होगी ?इतनी शतब्दियों में कितने प्राकृतिक झंझावत नहीं आये होंगे ? इसलिए 'राम जन्म' भूमि का सबूत मांगने वालों से निवेदन है, कि भगवान् श्रीरामचंद्र जी के ज़माने के अवशेष खोजने की बात करके 'सत्य' का उपहास न करें !

वेशक आप धर्म -मजहब वाले हों या विधर्मी हों किन्तु मजहब -धर्म की राजनीति न करें !और धर्म -मजहब को राजनीती में न घसींटे !विगत लोक सभा चुनाव में अल्पसंख्यक टेक्टिकल वोटिंग से प्रभावित होकर ,विराट संख्या में हिन्दू समाज के निम्न मध्यमवर्ग के युवाओं ने भी एकजुट होकर मध्यप्रदेश, छग राजस्थान ,झारखण्ड और अब यूपी में खूब ताकत हासिल कर ली है । हालांकि उन्होंने पहले भी इन प्रान्तों में भाजपा को ही थोक में वोट दे दिए हैं । लेकिन अब तो मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा का समर्थन करना शुरूं कर दिया है ,यह बात जुदा है कि कुछ लोग इसे अभी मान नहीं रहे हैं। लेकिन यूपी की जीत और वोटों का गणित स्पष्ट बता रह है कि कुछ तो अवश्य हुआ है। वेशक मोदीजी और योगीजी वाली आक्रामकता धर्मनिरपेक्ष दलों में नहीं है किन्तु उनके समर्थक भी रामभक्त हो सकते हैं । इसीलिये भले ही अभी कांग्रेस की जगह भाजपा ने लेली है ,लेकिन भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बनाए रखते हुए न केवल मंदिर -मस्जिद विवाद हल करना है बल्कि आम सहमति से रामलला का मंदिर भी बन जाये तो कोई बुराई नहीं। यदि कुछ दूरी पर मस्जिद भी हो तो सोने में सुहागा !
बहुसंख्यक सवर्णोंको एकजुट करने में साईं लालकृष्ण आडवाणी,मुरलीमनोहर जोशी और सुश्री उमा भारती का विशेष हाथ रहा है। उनके अरमानों को तब पंख लग गए जब गोधरा में कुछ मुस्लिम आतंकियों ने रेल में कारसेवकों को जिन्दा जला दिया। इस जघन्य घटनाके बाद जब मुम्बई बम बिस्फोट नरसंहार हुआ तो 'हिंदुत्ववादी' नेताओं को 'रामराज्य' का इल्हाम होने लगा । इसके निमित्त वे फिर से 'रामलला' की ओर मुखातिब हुए । और तब अयोध्या का मंदिर मस्जिद विवाद तेज होता चला गया !  जिसकी बदौलत मोदीजी सुर्खुरू होते चले गए ! उसी के प्रसाद पर्यन्त अब तमाम हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा का परचम लहरा रहा है। 'रामलला'की असीम अनुकम्पा से एनडीए की अटल बिहारी सरकार भी ६ सालतक सत्ताका स्वाद चख चुकी है।लेकिन वह सरकार 'शाइनिंग इण्डिया' एवम 'फील गुड' महसूस करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गयी थी ! परिणामस्वरूप २००४ से २०१४ तक मनमोहनसिंह के नेतत्व में यूपीए की गठबंधन सरकार सत्ता में रही। चूँकि कांग्रेस अल्पमत में थी ,इसलिए डॉ मनमोहनसिंहको अनेक बार झुकना पड़ा और गलत समझौते करने पड़े। वे भ्र्ष्टाचार को रोक नहीं सके तो जनता ने फिर से एनडीए को याने भाजपा को याने मोदी सरकार को सत्ता सौंप दी। इस बार यूपीमें मोदीजी की बाचालता रंग लायी और चुनाव में बम्फर जीत हुई इसीलिये अब उनके अलावा योगीजी भी उनके सहयात्री हो गए हैं। इन हालात में मंदिर वाली बात उठना स्वाभाविक है।

मंदिर निर्माण विषयक योगी जी और संघ परिवार की समझ बिलकुल स्पस्ट है। लेकिन अदालत के निर्णय को जस का तस मानेंगे या संविधान संशोधन करते हुए रामलला को टाट से निकालकर 'भव्य मंदिर' में उचित सम्मान दिलाएंगे ये दोनों ऑप्शन उनके सामने विद्यमान हैं।क्योंकि भारी जनादेश केवल विकास के लिए या केवल किसान कर्जमाफी के लिए नहीं दिया गया है। ,,,,,,,,, 

दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद ने जो कहर बरपाया है और चेरिटी के नाम पर ईसाई मिशनरीज ने विगत ३०० सालमें इस भारत भूमिपर जोकुछ भी किया है ,उसका इतिहास हिंदुओं ने कभी नहीं लिखा। वास्तविक हिंदुत्ववाद में क्षमा,दया, करुणा,परोपकार और विनम्र शरणागति वाले मूल्योंको अधिक महत्व दिया जाता रहा है।किन्तु इस दौर का राजनैतिक ' हिंदुत्ववाद' और उसका काल्पनिक 'रामराज्य' केवल छलना मात्र है। उसके आभासी दुष्प्रचार मात्रसे भारत के केंद्र में मई -२०१४ से मोदी सरकार सत्ता में है,२० मार्च -२०१७ से यूपी स्टेट में योगी सरकार अपने प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में है। लेकिन रामलला अभी भी टाट में हैं और भाजपाई ठाठ में हैं। इसके अलावा आतंकवाद ,आर्थिक विकास ,शैक्षणिक- सामाजिकउत्थान ,वैदेशिक नीति में सकारात्मक सुधार, महँगाई- भृष्टाचार के मामले में  कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दृष्टव्य नहीं है। इतने लंबे अरसे बाद देश में कहीं भी 'रामराज्य' का कोई नामोनिशान नहीं है। शायद इसीलिए अब अपराधबोध से पीड़ित लोग 'रामराज्य' की चर्चा फिर करने लगे हैं। स्वामी,बाबा और योगीजन तो इस प्रयोजन में 'निमित्तमात्रम च भवसव्यसाचिन' हैं।

रामराज्य बनाम पूँजीवादी लोकतंत्र के विमर्श में बहुसंख्यक हिन्दू युवाओं को मोदीजी का अनगढ़ 'विकासवाद' खूब पसन्द आ रहा है !आम तौर पर आधुनिक युवाओं को सोशल मीडिया पर 'हर हर मोदी' कहते सुना जा सकता है। इन वेरोजगार युवाओं को पूँजीवाद के घृणित शोषण -उत्पीड़न से कोई शिकायत नहीं। अपने जीवन के निमित्त कोई आर्थिक सामाजिक चेतना और समझ कायम करने के बजाय वे 'मन्दिर मस्जिद विवाद' पर अधिक चर्चा करते हुए देखे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बात की तो युवा वर्ग ने तत्काल रूचि दिखाई किन्तु जबलपुर के खमरिया डिफेंस फेक्ट्री में दो हजार करोड़ का असलाह जल जाने से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। देश का अधिकांस मिल्ट्री इंतजाम ढुलमुल है पर किसी को कोई चिंता नहीं। अधिकान्स सत्तारूढ नेताओं को सिर्फ वोट की फ़िक्र है। इसीलिये वे  हिन्दू मुस्लिम दोनों पक्षों को साधनेकी दिशामें प्रयत्नशील हैं। इसके लिए उन्हें स्वामी रामदेव ,श्रीश्री रविशंकर और मोहन भागवत जी की सेवायें उपलब्ध हैं। वे सभी इस जुगाड़ में हैं कि राज्यसभा में बहुमत होने के बाद संविधान में कुछ बड़े संशोधन कर दिए जायें !इसके वावजूद यह अकाट्य सत्य है कि जबतक मोदीजी पीएम हैं ,वे पूँजीवादी विकासवाद का दामन नहीं छोडेगे। 'सबका साथ -सबका विकास'केअनुसार मोदी जी वास्तविक धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करने के पक्ष में रहेंगे क्योंकि गुजराती वणिक संस्कार यही सीख देते हैं। मोदी जी ने मुख्यमंत्री के रूप में अतीत में भी  'हिन्दुत्वाद' और 'रामराज्य' से ऊपर बाजारबाद को ही तरजीह दी थी। दरअसल  हिंदुत्व और रामराज्य तो केवल वोट कबाड़ने का मंतव्य मात्र है।

यद्द्पि 'रामराज्य' को गोस्वामी तुलसीदास जी ने खूब सराहा है। सभी जानते हैं कि 'हरि व्यापक सर्वत्र समाना' की तरह ही भृष्टाचार और अनैतिकता भी सर्वव्यापी है!और सभी जन यह भी जानते हैं कि जिस 'रामराज्य' के लिए 'संघ परिवार' वाले लालायित हैं वह भी परफेक्ट नहीं था। उसमें भी सैकड़ों विसंगतियां और हजारों असहमतियां थीं ! कैकेयी जैसी विमाता से आधुनिक महिलाओं को क्या सीखना चाहिए ? जिसने खुद तीन-तीन शादियाँ कीं हों ,जिसने शिकार के लालच में एक निर्दोष  श्रवणकुमार को मार डाला हो ,उस नरेश  आधुनिक युग के पिताओं को क्या सीखना चाहिए ?से क्या सीखना चाहिए धोबी जैसा कृतघ्न आलोचक था और लक्ष्मण जैसे कठोर हृदय देवर भी थे जो केवल बड़े भाई की आज्ञा के सामने हमेशा नतमस्तक रहते और उन्ही की आज्ञा से अपनी माँ समान गर्भवती भावी को वियावान जंगल में अकेला छोड़ने को तैयार हो गए। रामायण यदि बाकई इतिहास हैए तो 'शम्बूक बध' भी मिथ नहीं हो सकता। उसे भी स्वीकार करना होगा।  

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

इस्लामिक आतंकवाद से इस्लाम को सबसे अधिक खतरा है

२२-२३ मार्च को जब सारा संसार 'आईएसआईएस' के ब्रिटश माड्यूल्स द्वारा लंदन पर जघन्य और हिंसक हमले के खिलाफ लामबन्द हो रहा था ,एक स्वर से इस दरिंदगी की भर्त्सना कर रहा था ,तब भारतीय मीडिया शुतरमुर्ग की भूमिकामें फोकट की जुगाली कर रहाथा। भारतीय मीडिया के विमर्श के केंद्र में या तो यूपी का 'योगीराज' था या नवजोतसिंह सिद्धू और शिवसेना के कुख्यात सांसद गायकवाड़की जिद के चर्चे थे। भारतका प्रगतिशीलऔर बुद्धिजीवी वर्ग हो या राजनैतिक विपक्ष हो, इस दौर में दोनोंको मोदीजी एवम योगीजी  का राजयोग सता रहा है।

किसी इरफ़ान हबीब ने, किसी रोमिला थापर ने, किसी ओबेसी ने, किसी आजमखान ने ,किसी तीस्ता शीतलबाड़ ने, किसी लोहियावादी ने और किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने लंन्दन पर हुए नृसंश हमले की शाब्दिक निंदा भी नहीं की।कायदे से हरेक सच्चे मुसलमान का भी यह फर्ज था कि वह लंदन के इस हत्याकांड की निंदा करता, चूँकि अभी कुछ महीनों पहले ही लंदन की बहुमत ब्रिटिश जनताने एक अल्पसंख्यक मुसलमान को मेयर चुना है।और यह दुनिया जानती है कि 'आईएसआईएस' के कट्टरवादी इस्लामिक आतंकवाद से तमाम सभ्यताओं और कोमों को खतरा है। भारत के बहुसंख्यक हिन्दू भी इन घटनाओं से खासे प्रभावित हैं। चूँकि मोदीजी ,योगीजी और संघ परिवार वाले तथा भाजपा के अन्य नेता इस मुद्दे पर अंदर-अंदर हवा देते रहते हैं और उधर कांग्रेस,कम्युनिस्ट या अन्य धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दल -केवल मोदी-मोदी या नोटबंदी ही जपे जारहे हैं। यही कारणहै कि यूपीके इस  चुनाव में जितनी उम्मीद खुद मोदीजी या भाजापा को नहीं थी उससे अधिक सफलता उन्हें मिली है।

दुनिया जानती है कि कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद से सर्वाधिक खतरा किसे है ? अभी अभी पाकिस्तान दिवस पर भारत के कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे फहराये गए। उधर सीमा पार आतंकियों ने लाहौर कराची में भारत को खूब गालियां दीं।विपक्ष के हरल्ले जमानतखोर नेताओं को समझना चाहिए कि इन भारत विरोधी निरंतर घटनाओं की वजह से ही उत्तरभारत की हिंदी भाषी जनता का देशप्रेम और राष्ट्र्वाद हिलोरें ले रहा है। और उसी कट्टरपंथी आतंकवाद को जबाब देने के लिए यूपी की जनता ने भाजपा को प्रचण्ड बहुमत दिया है। उसी इस्लामिक आतंक का प्रतिसाद पाकर मोदी जी और योगीजी गदगदायमान हो रहे हैं। मोदीजी ने तो फिर भी लन्दन के आतंकवादी हमले की निंदा तुरन्त करदी! किन्तु सपा ,वसपा और कांग्रेस जैसे हरल्ले दलों तथा विचारशील व्यक्तियों को कुछ सूझ ही नही रहा है। वे तो केवल मोदी सिंड्रोम अथवा फास्जिम फोबिया में तल्लीन हैं।

वेशक इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया की तमाम सभ्यताओं और कोमों को गंभीर खतरा है। लेकिन भारत के गरीब हिंदुओं को सबसे ज्यादा खतरा है। चूँकि दुनिया के अमीर लोग हमेशा दर्जनों हथियारबन्द रक्षकों से घिरे होते हैं, इसलिए उन्हें किसी से कोई खतरा नहीं।युद्ध की वस्था में या आतंकवादी भीषण नर संहार में दोनों ओर से जो सर्वाधिक नर -नारी  मारे जाते हैं वे अधिकांस असुरक्षित सर्वहारा या निम्न मध्यम वर्ग के ही हुआ करते हैं।
इसके अलावा  इस्लामिक आतंकवाद से खुद इस्लाम को ही सबसे अधिक खतरा है ! लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं कि कट्टरपंथ से लड़नेके बजाय 'इस्लाम' को कोसा जाए ! जो लोग इस्लामिक आतंकवाद को धरतीका सबसे बड़ा खतरा मानते हैं वे सही हैं। लेकिन जो लोग सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद को ही खतरा मानते हैं वे गलत हैं। दरसल इस्लाम का सारतत्व उतना ही मानवीय और अमनपसन्द है ,जितना कि भारत का सनातन धर्म या दुनिया का कोई और धर्म-मजहब ! वेशक हरेक धर्म मजहब की कट्टरता पर अंकुश होना चाहिए। चूँकि भारत मेंअसली लोकतंत्र है इसलिए यहाँ किसी भी कट्टरता को वोट के द्वारा खत्म किया जा सकता है। किन्तु इस्लामिक वर्ल्ड में  हर जगह न केवल आपसी मारामारी है, अपितु वे लंदन ,पेरिस ,मुम्बई कहीं भी मरने -मारने को आतुर रहते हैं !इसलिए भारत के हिंदुओं -मुसलमानों को असली खतरे को ठीक से समझना होगा। शायद यूपी की जनता ने इस बार ठीक से समझ लिया है। योगी जी और मोदीजी की किसी कार्यशैली या नीति के खिलाफ लिखना बोलना तो जैसे अब जनता के खिलाफ बोलना  हो चूका है। इसीलिये इस दौर में मोदीजी या हिंदुत्व के खिलाफ जो जितना ज्यादा बोल रहा है उसे उतने ही कम वोट मिल रहे हैं। श्रीराम तिवारी      

    

सोमवार, 20 मार्च 2017

आधुनिक युवा वर्ग और शहीद भगतसिंह

आर्थिक ,सामाज़िक ,राजनैतिक हर तरह  की स्वतंत्रता की कामना केवल कोई सचेतन मन ही कर सकता है। कोई सुसुप्त मन वाला मिडिल क्लास व्यक्ति चाहे जितना खाता -कमाता हो ,भले ही उसेअभी 'अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता' या व्यवस्था परिवर्तन से कोई सरोकार न हो,लेकिन हर एक दमित ,शोषित,पीड़ित,नंगा-भूंखा इंसान  किसी किस्म की आजादी चाहने से पहले अपने तात्कलिक दुखों के निवारण की भरसक चेष्टा पहले करता है। चूँकि आधुनिक युवाओं को  शहीद भगतसिंह ,राजगुरु और सुखदेव वाले संघर्ष ,क्रांति और व्यवस्था परिवर्तन के सिद्धांत -सूत्र और साधन बहुत जटिल मालूम पड़ते हैं ,उन्हें भगतसिंह के क्रांतिकारी विचार मानों  'दूर के ढोल सुहावने' जैसे लगते हैं। इसीलिये अधिकांस आधुनिक भारतीय युवा ,खास तौर से जन्मना हिन्दू युवा मोदी-मोदी में लीन होकर भाजपाकी राजनैतिक नाव पर सवार है। मोदीजी के विकासवाद की अनजानी राह पर आगे बढ़ने का ख्वाब देख रहा है।भले ही यह मोदीयुगीन नाव कहीं भी न जाती हो, या किसी अज्ञात भंवर की ओर ली जाती हो !
इसीलिये यह बहुत जरुरी है कि आधुनिक युवावर्ग शहीद भगतसिंह को अपना आदर्श बनाये !

अफ्रिका ,यूरोप,अमेरिका,चीन रूस का तो मुझे पक्का पता नहीं,किन्तु अधिकांस छुधित-तृषित भारतीय युवा वर्ग अपने कष्ट निवारण के लिए ,सबसे उस सरल सुगम मार्ग  की ओर देखता है,जो मंदिर ,मस्जिद गुरूद्वारे अथवा चर्च की ओर जाता है। धर्म-मजहब के पारलौकिक ठिकानों पर किसी को कुछ और मिले न मिले,किन्तु अस्थायी मानसिक शांति और तसल्ली तो अवश्य मिलती है। किसी का यह लोक ही बर्बाद हो रहा हो किन्तु उसे परलोक सुधार की गारन्टी देने वाले बाबाओं, योगीयों और साम्प्रदायिक नेताओं का दामन नहीं छोड़ता । इसीलिये भारतमें इन दिनों कुछ परलोक सुधारक लोग खूब फल फूल रहे हैं। वे राजनीति में भी प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं। आने वाला वक्त ही बताएगा कि उनके सत्ता में आगमन से देश आगे बढ़ रहाहै या अतीतके गहन अन्धकार में फिर प्रतिगामी डुबकी लगाने जा रहाहै ! भारतीय युवजन को यह ध्यान तो रखना ही होगा कि कहीं ऐंसा न हो कि 'दुविधा में दोउ गये,माया मिली न राम' ? उन्हें यह ज्ञान होना भी जरूरी है कि इस सन्दर्भ में शहीद भगतसिंह की सोच क्या थी।

हिन्दुत्वाद की लहर के प्रभाव से मंदिर -मस्जिद विवाद में देश को फिर से घसीटा जा रहा है। भारतीय युवाओं और छात्रों को सोचना चाहिए कि इस घनचक्कर में कहीं उनका भविष्य चौपट न हो जाए,या विकास धरा न रह जाए ! यदि 'सबका साथ,सबका विकास'सत्ता के हृदय की गहराई से निकला है तो वैसा आचरण भी दृष्टिगोचर होना चाहिए! वेशक मोदीजी और योगीजी अतीत में विवादास्पद रहे हैं। उन पर अतीत में बहुत से आरोप लगे हैं। जिस तरह प्रधानमंत्री बनते ही मोदीजी के ऊपर लगे तमाम आरोप खत्म हो गए ,उसी तरह योगीजी के मुख्यमंत्री बनते ही उनपर लगाईं गईं तमाम दीवानी और फौजदारी धाराएं अतिशीघ्र शून्य हो जाएंगी। यह आचरण न तो 'रामराज्य 'से मेल खाता है और न ही सत्य हरिश्चंद्र वाले 'हिंदुत्व' के उच्चतर सिद्धांत से मेल खाता है। भगतसिंह के सिद्धांतों से मेल खाने का तो सवाल ही नहीं। यदि आरोपों में दम नहीं था तो अखिलेश और मायावती की सरकार के दौरान इन 'महात्मा नेताओं' पर लगे आरोपों के लिए मानहानि का मुकद्दमा दायर होना चाहिये।

सत्तामें आनेके कारण यदि मोदी जी की तरह अब योगी जी भी 'निर्दोष' सावित हो जाते हैं ,तो वही लोग डरेंगे जो अब तक योगीजी को परेशांन करते रहे हैं या वे लोग भयभीत होंगे जो वास्तविक अपराधी हैं ! गुजरात में मोदीजी से भी वही लोग डरते रहे हैं जिन के दिल में चोर था। मोदीजी के राज में तो शेर और बकरी एक घाट पानी भले न पी सके हों किन्तु चिंदी चोर भी अब  बड़े-बड़े आर्थिक अपराधी बनकर देश और दुनिया में फल फूल रहे हैं !
युपी विधान सभा चुनाव में मोदीजी ने 'श्मशान बनाम कब्रिस्तान' वाले जुमले के अलावा विकासवाद का भी खूब   प्रचार किया था। किन्तु जब विकास वाले नेतत्व की तलाश की गयी तो ३२५ में से उन्हें एक भी नहीं मिला! अंततः आंतरिक दबाव में सत्ता सुंदरी एक योगी को सौंप दी। ऐंसा लगता है कि मोदीजी और योगी जी आइंदा दोनों नाव पर सवार होंगे। हिन्दू -मुस्लिम दोनों को खुश किया जायगा। और साथ में विकास का उपक्रम भी जारी रहेगा। यदि 'संघ' का राष्ट्रवाद असली चेहरा है, तब वे भी ऐंसा कुछ नहीं करेंगे जिससे फसाद हो। यदि अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेकर योगीजी उत्तरप्रदेश का विकास करते हैं ,तब तो उनके 'हिंदुत्व'का सिक्का अवश्य चल जाएगा। अन्यथा अतीत में कल्याणसिंह ने जो बोया और काटा था ,वही  योगी आदित्यनाथ के दौर में भी भाजपा और संघ परिवार को काटना होगा!वे जब तक धर्मनिरपेक्षता का सम्मान नहीं करते तबतक यही बार-बार होता रहेगा ।  

यूपी चुनाव के इकतरफा परिणाम से किसी को निराश नहीं होना चाहिए। मायावती को ईवीएम मशीन में त्रुटि खोजने के बजाय मुलायम सिंह यादव ,अखिलेश यादव -पिता -पुत्र से नसीहत लेनी चाहिए। जिन्हें मोदीजी और योगी जी को साधना आता है। मुलायम परिवारतो हारने के बाद भी आश्स्वस्त है कि उन्हें  किसी से कोई खतरा नही !बहिनजी और आजमख़ाँ जैसे जातिवादी -साम्प्रदायिक नेता  कुछ ज्यादा ही शोर मचा रहे हैं। हालाँकि वे इस काबिल नहीं हैं कि मोदी या योगी  पर अंगुली उठायें ,जिन्हें प्रचण्ड जनादेश मिला है। मोदी और योगी का हिन्दू होना उसी तरह 'पाप' नहीं है,जिस तरह बहिनजी का दलित होना और आजमख़ाँ का मुसलमान होना पाप नही है ! हरेक चुनाव जीतने वाले को कुछ वक्त अवश्य मिलना चाहिये ताकि वह जनादेश की कसौटी पर टेस्ट दे सके। हारे हुए लोगों द्वारा जीते हुए दल की बेबजह आलोचना से 'संघ परिवार'के बड़बोले बयानवीरों को उपद्रव करने का मौका मिलता है। इस सूरत में देश का विकास हो न हो किन्तु आपसी कटुता का विकास अवश्य होता रहेगा। मानवता का उद्देश्य सनातन कटुता में जीना-मरना नहीं है। मौजूद जिंदगी ही वास्तविक सच्चाई है !

अभी-अभी यूपी  विधान सभा चुनाव के दरम्यान और योगी जी के मुख्य मंत्री 'मनोनीत'किये जाने को लेकर हर किस्म के मीडिया में मुख्य रूप से दो प्रकार के बोल बचन कहे सुने गए। एक तरफ हर-हर मोदी ,विकास और हिन्दुत्व का स्वर था। दूसरी ओर जातिवाद,अल्पसंख्यकवाद और परिवारवाद का शोरगुल था। किन्तु सर्वहारा वर्ग के रूप में वामपंथ का स्वर नक्कारखाने में तूती की आवाज भी नहीं था। उधर चुनाव जीतने वालों को यह गलत फहमी हो गई कि अखिलेश यादव ,राहुल गाँधी और तमाम अलायन्स वाले सबके सब वामपंथी और 'सेकुलर' हैं। और उन्हें यह गलत फहमी भी हो गई कि असली हिन्दू सिर्फ वे ही हैं जो मोदी जी [अब योगीजी]के साथ हैं। इस गलफहमी के लिए प्रगतिशील ,धर्मंनिरपेक्ष विचारों वाले लोग भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं।

माना कि सत्ताधारी सपा को उसके गुंडाराज और जातिवाद ने हराया,मायावती को उनके फूहड़ व्यक्तिवाद और अहंकार ने हराया!  यह भी जग जाहिर है कि कांग्रेस को मंडलवाद और कमण्डलवाद ने मिलकर हराया। लेकिन प्रगतिशील -वामपंथी प्रत्याशियों को जनता ने क्यों हराया ?जबकि इस धारा के प्रत्याशियों को आजादी के बाद से अब तक केंद्र में या यूपी जैसे हिंदी भाषी राज्यों में कोई अवसर ही नहीं मिला। केरल,त्रिपुरा और बंगाल में जरूर वा,पन्थ को कई अवसर मिले ,किन्तु बंगाल में ममता बनर्जी ने भृष्ट पूंजीपतियों और आतंकवादियों की मदद से न केवल राज्य की सत्ता छीन ली,अपितु किसानों,मजूरों के लिए सीपीएम ने जो कुछ किया उसको दुष्प्रचार से उसने शून्य कर डाला !भाजपा और संघ ने भी सीपीएम को टारगेट करते हुए निरन्तर बदनाम किया।लेकिन उसका फायदा ममता को ही मिला। वामपंथ का इस धर्म-मजहब वाली कट्टरता के कारण ,भारत में लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव जीत पाना बहुत कठिन है। क्योंकि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर वामपंथ की समझ भले ही सही हो किन्तु धर्म-मजहब और साम्प्रदायिकता के बारे में वामपंथ की परम्परागत समझ सही नहीं है।  

धर्म-मजहब -पन्थ अब सिर्फ 'अफीम' नहीं रह गए !बल्कि बाकई स्वर्ग की सीढी बन गए हैं। जब से बाबाओं और स्वामियों ने अपने उत्पादों को  में बाजार में उतारा है ,तबसे धर्म-मजहब  सिर्फ 'अफीम ' नहीं रहे, बल्कि बाजार और राजनीति की प्रमुख ताकत हो गए हैं। यह दुहराने की जरूरत नहीं कि भारत सदियों से एक त्यौहार प्रधान देश रहा है। किन्तु लोकतान्त्रिक राजनीति और बाजारबाद ने धर्म -मजहब -पन्थ की चिन्गारी को प्रचण्ड ज्वाला में तब्दील कर डाला है। भारत के त्यौहारों से सिर्फ भारत का बाजार ही नहीं फलता-फूलता, बल्कि अब तो चीन नेपाल भी लगे हाथ कुछ न कुछ कमा लेते हैं। भारत में त्यौहार मनाने की मध्यम वर्गीय प्रतिस्पर्धा का आलम यह है कि चाहे जेब खाली हो ,घर में भुजी भांग भी न हो,चाहे कोई वेरोजगार ही क्यों न हो ,लेकिन ज्यों ही कोई तीज - त्यौहार आया कि वह भी काल्पनिक आभासी ख़ुशी की तलाश में निकल पड़ता है। नागर सभ्यता का झंडावरदार भी झाबुआ के 'भगोरिया' का भील मामा हो जाता है!जनता का यह सांस्कृतिक -धार्मिक रुझान,भाजपा और संघ परिवार के पक्ष में जाता है।

इन धार्मिक आयोजनों,तीज -त्यौहारों और मेलों-ठेलों के तामझाम से जिन लोगों के आर्थिक स्वार्थ जुड़े हैं ,वे भले ही मिलावट करते हों ,कम तोलते हों, शहद की जगह शक्कर का शीरा बेचते हों ,स्वर्ण भस्म और मोती भस्म की जगह मानव खोपड़ी का चूर्ण बेचते हों,वे भले ही धर्म का लेबल लगाकर अधर्म बेचते हों, किन्तु भारतकी धर्मप्राण जनता श्रद्धा-आस्था के वशीभूत होकर न केवल उनके घटिया उत्पाद खरीदती है, बल्कि समय आने पर इन्ही धर्म -मजहब के ठेकेदारों को वोट देकर सत्ता भी सौंप देती है। इस धार्मिक बाजारीकरण और राजनीतिकरण से ऐंसा आभास होता है कि मानों भारत भूमि पर 'सतयुग' उतर आया है। इस देश की जनता कितनी धर्मप्राण है कि जो शहर जितना बड़ा तीर्थ हैं,वह उतना ही गन्दा होगा और अपेक्षाकृत महँगा भी होगा।

भारत में सर्वाधिक वेश्यावृत्ति वहीँ होती रही है ,जहाँ पवित्रतम तीर्थस्थल हैं। अतिधर्मान्धता के वावजूद बात जुदाहै कि इस धर्मप्रधान देश में कहीं कोई अकेली दुकेली लडकी दिल्ली,मुम्बई बेंगलुरु में सफर नहीं कर सकती। नारी उत्पीड़न या निर्बलों के शोषण में कस्बों,गाँवों के हालात इससे कई गुना भयावह हैं। उत्तरप्रदेश को सपा,बसपा ने जितना बर्बाद किया उतना कांग्रेसने भी नहीं किया। उम्मीद है कि योगीजी भी उतना बुरा नहीं करेंगे जितना कभी माया और मुलायम के राज में बुरा हुआ है। तब और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि माया और मुलायम खुद ही सुप्रीम पावर हुआ करते थे,किन्तु अब योगीजी के ऊपर मोदीजी हैं और मोदीजी के ऊपर विकास का भूत सवार है,अतः सभी को यह उम्मीद  चाहिए कि यूपी में बाकई अच्छे वाले हैं। किसानों का कर्ज शीघ्र माफ़ होने जा रहा है। गंगा यमुना स्वच्छ सुंदर होने जा रहींहैं। पहले यूपी के गाँवों कस्बों में बारदात की 'बात' वहीँ दबा दी जातीथी ! या तो रिपोर्ट नहीं लिखी जाती थी ,जो पीड़ित रिपोर्ट लिखाने का दुस्साहस करता उसे मरवा दिया जाताथा। अब जिन -यूपी में जिन्होंने आग मूती उन्हें अंजाम भुगतना ही होगा।

यूपी में विगत ३० साल से जो सिस्टम चला आ रहा है,वह भारत देश की धार्मिक और सांकृतिक विरासत नहीं है!भारत में अब तक जितने भी सच्चे समाज सुधारक और धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हुए हैं वे दक्षिण भारत बंगाल अथवा महाराष्ट्र में ही अधिक हुए हैं। यही वजह है कि यूपी वाले 'भाइयो-बहिनों'धर्म-मजहब के परम्परागत मकरजाल में उलझे हैं। वे आजादी के ७० साल में भी पूँजीवादी -सामन्ती आर्थिक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अंतर्जाल को नहीं समझ पाए। यूपी के अधिकान्स स्वाधीनता सेनानी खुद ही धर्मभीरु रहे हैं, इसलिए बदलाव को नजर अंदाज करते रहे हैं। भारत में धर्मनिपेक्षता केवल संविधान की प्रस्तावना तक ही सीमित रही है। यही वजह है कि जिन राजनैतिक दलों के पास कोई जातीय -मजहबी जनाधार नहीं रहा वे केवल धर्मनिरपेक्षता का झुनझुना बजाते रहते हैं। इसीलिये धर्मोन्मादिनि हिंदीभाषी जनता रुपी 'मोहिनी', वेचारे नारद मुनि रुपी वामपंथियोंको कोई तवज्जो नहीं देती। जबकि धर्म -मजहब के ठेकेदार रुपी कलियुगी योगियों  को राजनीतिक सत्ता सुंदरी आसानी से वरण  कर रही है !

क्या विचित्र बिडम्बना है कि पूँजीवादी साम्प्रदायिक दल तो सत्ता में आने के बाद 'विकासवाद' और 'सबका साथ - सबका विकास' जप रहे हैं ? किन्तु जिन्हें अपने कार्यक्रमों पर नाज है ,नीतियों पर नाज है,अपने संघर्षोंकी परम्परा पर नाज है वे कहाँ हैं ?वे अपने जन संगठनों की साज संवार करने के बजाय ,नीतियों,योजनाओं -कार्यक्रमों का प्रचार -प्रसार करने के बजाय ,जनकल्याणकारी वैकल्पिक नीतियोंका खुलासा करने के बजाय केवल बहुसंख्यक -साम्प्रदायिकता पर फब्तियां कसते रहते हैं। उधर अल्पसंख्यक वर्ग को मुलायम,माया, ममता ,लालू,केजरीवाल और नीतीस जैसे अवसरवादियों से मतलब है। शायद यह भी एक  वजह  है कि धर्म-मजहब में खण्डित भारतीय जनता, वामपन्थ को गंभीरता से नही लेती ! वामपंथ की असली धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को सम्मान देने के बजाय धर्मांध जनता झूंठे वादों -जुमलों को ज्यादा महत्व देती है। भारत की जनता भूल रही है कि उसके पास जो लोकतान्त्रिक अधिकार अभी तक सुरक्षित बचे हैं ,उसके लिये वाम-धर्मनिपेक्ष लोगों ने अतीत में बहुत कुर्बानियाँ दीं हैं। और अभी भी निरतंर संघर्ष जारी है। किन्तु जब भी कोई चुनाव आता है तो जनता ढपोरशंखियों की ओर देखने लगती है। यह सर्वहारा वर्ग के लिए शुभसूचक नहीं है।  श्रीराम तिवारी !  



  

शनिवार, 18 मार्च 2017

भाग मछन्दर योगी आया !



जब तक यूपी के चुनाव परिणाम नहीं आये, तब तक मैंने तहेदिल से चाहा कि भले ही सपा ,वसपा या अखिलेश और राहुल का अस्थायी गठबंधन  यूपी की सत्ता में आ जाए,किन्तु भाजपा की हार सुनिश्चित हो !और तमन्ना की थी कि मोदी जी और उनका पूँजीवादी कुनबा कभी कामयाब न हों ! लेकिन यूपी में सब कुछ उलटा -पुल्टा ही हो गया। किसी ने ठीक ही कहा है 'हर किसी को  मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता' सो वह मुझे भी नहीं मिला ! यूपी की   जनता ने भरपल्ले से -तीन चौथाई बहुमत के साथ भाजपा को जिता दिया।ऐंसा लगा जैसे दिल के अरमाँ आंसुओं में बह गए ! पुरानी भदेस कहावत याद आ गयी -'कौओं के कोसने से ढोर नहीं मरते' ! अब यदि मोदी जी और भाजपा नेता किसी काले चोर को मुख्यमंत्री बनायें या किसी छद्म योगी को मुख्यमंत्री बनायें या तीन चौथाई बहुमत का मजाक उड़ाएं ,यह उनका आंतरिक मामला है।  हमें  तो गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपाई स्मरण रखना है की ''कोउ होय नृप हमें का हानी ,चेरी छोड़ होहिं का रानी ''!  

मैं यूपी का मतदाता नहीं हूँ ,भाजपा  समर्थक नहीं हूँ ,फिर भी यूपी की जनता के जनादेश का आदर करता हूँ !लेकिन भारतीय लोकतंत्र की हत्या होते नहीं देख सकता। ३२५ में से यदि एक भी 'योग्य' भाजपाई  विधायक नहीं है तो  एक नकली योगी पर भरोसा कैसे किया जा सकता है ? वह व्यक्ति 'योग्य' कैसे हो सकता है जिसे जनादेश ही नहीं दिया गया ? जिसके खिलाफ हत्या जैसे आधा दर्जन गंभीर मुकद्दमे कायम किये गए हों !यूपी की जनता को कमसे कम इस अंधेगर्दी पर अपना आक्रोश अवश्य व्यक्त करना चाहिये ! यदि मोदी जी या उनके कारकुन यूपी के नवनिर्वाचित ३२५ विधायकों में से किसी एक को भी मुख्यमंत्री लायक या उपमुख्यमंत्री लायक नहीं पाते तो यह यूपी की जनता का घोर अपराध है ! यदि जनता का कोई अपराध नहीं तो समस्त चुने गए ३२५ विधायकों का यह घोर अपमान क्यों ? जिन ४४ विधायकों को जातिगत आधार पर समायोजित करके यूपी का  मंत्रिमंडल बनाया गया है, उसमें एक तिहाई तो वे चेहरे हैं जो चुनाव के पहले दल बदल करके कांग्रेस ,सपा,वसपा, भालोद से आये थे। जब वे भाजपा में नहीं थे तब पाप का घड़ा या घड़ियाल थे ,लेकिन अब वे भाजपा मंत्रिमंडल में शामिल हैं ,इसलिए प्रतिष्ठित हैं ,परम पवित्र हैं।

यूपी की जनता को और नव निर्वाचित  विधायकों को भी गंभीरता से सोचना होगा कि मुख्यमंत्री के चुनाव में और सरकार के गठन में कहीं कोई  चूक तो नहीं हुई ? कहीं  लोकतंत्र का मजाक तो नहीं उड़ाया जा रहा है ?क्योंकि असली गोरखपंथी योगी सन्यास धारण कर घर-घर 'भवति भिक्षाम देहि'की अलख जगाता है !वह अपने आराध्य - महादेव शिवकी भांति 'अलख निरंजन' में नित्य लींन रहता है! वह सत्ताके लिए लोकतंत्र की उपासना नहीं करता!वह हिन्दू, मुस्लिम ,दलित, ब्राह्मण ,ठाकुर से भी परे होता है !क्या श्री आदित्यनाथ वाकई ऐसे ही सिद्ध योगी हैं ? यदि हाँ तो फिर उन्हें गोस्वामी तुलसीदास जी का यह आप्त वाक्य क्यों याद नहीं रहा कि- 'संतन्ह को का सीकरी सों का काम '?

जो लोग धर्म,नैतिकता और आदर्श का लबादा  ओढ़कर राजनैतिक बढ़त हासिल करते हैं ,उनकी धर्म -आस्था खोखली होती है। यदि उनका ईश्वरीय विश्वाश किसी पारलौकिक उन्नति के लिए नहीं अपितु इहलौकिक उन्नति के लिए होता है,तो फिर उनका परिव्राजक होना या योगी होना केवल ढोंग है। एक परिव्राजक या एक योगी के लिए इस धरती पर कोई भी वस्तु छद्म माया मात्र ही है। मायिक संसार का आनन्द लेने के लिए कोई व्यक्ति धर्म और आस्था का दुरूपयोग करता है तो वह पाखण्डी है। यदि कोई योगी अपना योग छोड़कर राजनीतिक पद अथवा राजसत्ता का मोह पालता है तो वह अपरिग्रही नहीं रहा । बिना अपरिग्रह के कोई मनुष्य योग को प्राप्त नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति असली योगी है तो वह 'ईशरीय इच्छा'का सम्मान अवश्य करेगा,वह अपने धर्म गुरुओं के पवित्र सन्देशों की अनदेखी नहीं करेगा और 'राग-द्वेष' में कभी नहीं फसेगा।मोदीजी कभी परिव्राजक थे, अब प्रधानमंत्री हैं। योगी आदित्यनाथ अभी भी 'योगी' की उपाधि धारण करते हैं और वे मुख्यमंत्री भी हैं। लोकतंत्र में वेशक उन्हें यह अधिकार है ,किन्तु हिंदुत्व की धार्मिक आस्था और ऋषि परम्परा के अनुसार कदाचित यह सही नहीं है। परिव्राजक होकर मोदी जा का पीएम हो जाना और योगी होकर आदित्यनाथ का सीएम हो जाना ही यदि 'हिंदुत्ववाद' है तो शंकराचार्यों को  पीएम और सभी महामण्डलेश्वरों को सीएम क्यों नहीं बना देते ?   

यूपी में इतना प्रचण्ड बहुमत मिलने के बाद लोगों को बहुत उम्मीद थी किशपथ ग्रहण समारोह के दरम्यान पीएम खुद कोई सार्थक घोषणा तत्काल करते। कम से कम चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने जो कुछ यूपी वालों से वादे किये ,उसका एक सहस्त्रांश वाक्य तो स्वीकार करते। किन्तु बजाय किसानों के कर्ज पर कोई बात करने के तमाम 'रामभक्त' जनता पर ऐंसे टूट पडे ,मानों पिंडारियों का गिरोह ही यूपी पर चढ़ आया हो ! टोल नाके पर मार कुटाइ,'रोमियो स्क्वाड' की असंवैधनिक गुंडागर्दी,सत्ताधारी दल के लोगों का उदण्ड स्वच्छन्द व्यवहार 'हिंदुत्व' तो कदापि नहीं है। खजुराहो,कोणार्क,अजन्ता, एलोरामें 'रति-कामदेव' की चित्र -विचित्र झाँकियाँ,नाथपन्थ -गोरखपंथ के परम आराध्य भगवान् शिव और उनकी अर्धांगनी -शक्तिस्वरूप पार्वती का रतिभाव प्रतीकात्मक विग्रह किसी 'रोमियो' या पिकासो ने नहीं बनाये हैं। भारत में फैली शैव परम्परा के खजुराहो नुमा दृश्य और राधाकृष्ण की प्रेम कहानी को अध्यात्म जागत ने सर माथे लिया है। यदि 'रोमियो जूलियट' या 'सीजर एन्ड  क्लियोपेट्रा'अथवा एंटनी एंड क्लियोपेट्रा' इस भारत भूमिमें पैदा हुए होते,तो हिंदुत्ववादी भक्त 'राधेकृष्ण' सीताराम ,शिव -पार्वती की तरह उनका भी जाप करते। गनीमत है कि इस्लाम में बुतपरस्ती का कट्टर निषेध है,वरना तमाम कामुक और अश्लील मूर्तियोंके निर्माणका ठीकराभी मुसलमानों  के माथे मढ़ दिया गया होता! हालांकि इसका आशय यह कदापि नहीं कि अतीत के हमलावर मुस्लिम शासक कोई दयालु-कृपालु संत महात्मा थे ! वे सौ फीसदी खूंखार और बर्बर थे!     
मोदी जी ने स्वेच्छा से यदि आदित्यनाथ को यूपी का सीएम  बनाया है तब और अधिक चिंता की बात है क्योंकि यूपी विजय का श्रेय इन योगी जी को कदापि नहीं है। बल्कि मोदीजी अमित शाह के प्रयत्नों की बदौलत और सपा-बसपा के कुकर्मों के कारण यह विजय सम्भव हुई है। लोकतंत्र की परम्परा के मुताबिक जीते हुए विधायकों में से ही किसी एक को यूपी विधान सभा का नेता चुना जाना चाहिए था। लेकिन एक सांसद को सीएम और एक अन्य सांसद को डिप्टी सीएम यह किसीभी दृष्टि से बाजिब नहीं है। पूर्व में कांग्रेस और अन्य दलों ने भी ऐंसा किया होगा। किन्तु 'राष्ट्रवाद' और 'देशभक्ति' का दावा करने वाली 'पार्टी बिथ डिफरेंट' को यह कतई मुनासिब नहीं था की वह गलत परम्परा का अनुगमन करे ! यदि मोदीजी ने किसी मजबूरी में योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाया है तो यह भाजपा में सिर फुटौवल को बयाँ करने के लिए काफी है!इससे यह सावित होता है कि यूपी में जीते हुए नेताओं पर मोदी जी का नियंत्रण नहीं है। और जब अपनी पार्टी पर ही उनका नियंत्रण नहीं है, तो यूपी की जनता का उद्धार वे कैसे कर सकेंगे ?

प्रसिद्ध विधिवेत्ता 'फाली नरीमन ' के इस विचार से सहमत होना कठिन है कि मोदीजी ने यूपी में एक योगी को मुख्यमंत्री बना दिया तो भारतीय संविधान खतरे में पढ़ गया है । भारतीय संविधान की चिंता उन्हें बिलकुल नहीं करनी  चाहिए। क्योंकि भारतीय संविधान इतना कमजोर नहीं है कि एक मुख्यमंत्री के गेरूवे वस्त्रों से खतरे में पड़ जाए ! नरीमन साहब भारतीय सम्विधान कोई कुम्हड़े की वेलि नहीं 'जो तर्जनी देख मुरझाहीं '! वैसे भी जिन्हें इस मौजूदा संविधान की बदौलत बड़े-बड़े मंत्री पद और सरकारी पद मिले ,नौकरियाँ मिलीं और आधी शताब्दी जिन्होंने बिना योग्यता के केवल संविधान की आड़ में  ऐश किया वे  भी तो इस संविधान की  कुछ चिन्ता करेंगे !

फाली नरीमन साहब का ऐलान है कि एक योगी को यूपी का मुख्यमंत्री बना देने से भारत में हिन्दुराष्ट्र की बुनियाद रखी गई है। इसी तरह कुछ धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रवादी भी बैचेन हैं कि भगवा वस्त्र धारण किये हुए एक योगी को ही मुख्य मंत्री बना दिया-हाय अब क्या होगा? अव्वल तो यह 'गांव वसा नहीं -मांगने वाले पहले पहुँच गए' जैसी बात हो गयी ! आलोचना गेरुए वस्त्रों की अथवा किसी योगी की नहीं, बल्कि आलोचना उन खतरनाक नीतियों की और कार्यक्रमों की होनी चहिये जिनसे देश को खतरा है। संविधान तो देशका रक्षाकबच है यदि वह रक्षाकबच ही खतरे में है तो उसे गले में लटकाये हुए उसकी असफलता का मातम मनाना बुद्धिमानी नहीं है !दरसल भारत को  मोदीजी और योगी जी से नहीं बल्कि उद्दंड पूँजीवाद ,बेरोजगारी और भृष्ट सिस्टम से खतरा है। इसके लिए सिर्फ योगी जी या मोदी जी ही जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए अतीत का हर शासक जिम्मेदार है।

यूपी चुनाव में सपा,वसपा तथा कांग्रेस की हार के बहाने पिछड़ावाद,दलितवाद और अल्पसन्ख्यकवाद के चुनावी सिद्धांत की बुरी तरह धुनाई हुई है। ऊपर से तुर्रा यह कि जले पर नमक छिड़कते हुए कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया है। लेकिन इस दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद से लड़ने का माद्दा केवल उसी में हो सकता है जो धर्मनिरपेक्षतावादी हो ,जो लोकतंत्रवादी हो ! असदुददीन ओवेसी या आजमखाँ  की औकात नहीं कि वे अपनी साम्प्रदायिक जुबान से योगी आदित्यनाथ या नरेद्र मोदी का सामना कर सकें ! क्योंकि नमक से नमक नहीं खाया जाता ! ईसा मसीह का बचन भी स्मरण रखें कि पापी को पत्थर वही मारे जिसके हाँथ पाप से अछूते हों !

आजमख़ाँ  को आइंदा अब अपनी भैंसों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि यूपी पुलिस अब दूसरे काम पर लगाने वाली है। और असदुद्दीन ओवेसी को उन भटके हुए भारतीय युवा लड़कों की फ़िक्र करनी चाहिए जो सीरिया-ईराक में आईएसआईएस  की चपेट में आकर बर्बाद हो रहे हैं ! हिन्दुत्वाद से लड़ने की तो वे बात ही ना करें !उसके लिए भारत की ७० % धर्मनिरपेक्ष जनता सक्षम हैं!जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी शामिल हैं !इस धर्मनिरपेक्ष जनता ने वक्त आने पर हर दौर में अपनी शानदार भूमिका अदा की है।अभी यूपी चुनाव की बात कुछ जुदा है! वहां ३० साल से जातीयवाद, और अल्पसंख्यकवाद का गठजोड़ चल रहा था, उसमें सड़ांध आ गई थी , इसलिए इस बार जनता की गफलत से योगी सरकार बन गयी। लेकिन ध्यान रहे कि 'रहिमन हांडी काठ की चढ़े न दूजी बार !' वक्त आने पर भारत की जनता शहीद भगतसिंह के वोल्शेविक सिद्धांतों को जरूर अपनाएगी !

       यूपी की राजनीति में आगामी दिनों में कुछ भी सामान्य नही रहने वाला !क्योंकी जो 30 साल से जीम रहे थे वे अब खाली बैठे हैं और खाली दिमाग शैतान का घर होता है ,इसलिये बड़ी द्वंदात्मक  स्थिति निर्मित होने वाली है !भाजपा को प्रचण्ड बहुमत मिलने और योगी आदित्यनाथ के सी एम बनने से धर्म -अध्यात्म की पूँछ परख बढ़ने की कोई सम्भावना भले न हो किन्तु साम्प्रदायिक वैमनस्य जरूर बढेंगा !नाथपंथ का अब तक आप्त वाक्य था -" जाग मछन्दर गोरख आया " आइन्दा नया मंत्र यह हो सकता है -" जाग बबंण्डर योगी आया " !

श्रीराम तिवारी ! 

बुधवार, 15 मार्च 2017

'एक अनार और सौ बीमार'

इस बार की होली कुछ खास रही। यूपी उत्तराखण्ड में खाँटी भाजपाई जीते यह तो उनकी ३० साल की पुन्याई हो सकती है। जो नेता- नेत्रियाँ कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल  होकर जीत गए हैं ,वे कल तक भले ही कांग्रेस रुपी 'पाप की पिटारी'में थे,किन्तु अप्रत्याशित जीत मिलने पर वे अब परम पवित्र  हो चुके हैं ! लेकिन जीतने वालों को ज्यादा इतरानेकी जरूरत नहीं है ,क्योंकि जनताकी अपेक्षाओं पर खरा उतरनेके लिए इनके पास कोई वैकल्पिक नीतियां और कार्यक्रम ही नहीं हैं।

 भारत का वोटर अब  समझदार होता जा रहा है।इसीलिए अब वह टीवी चैनल्स को ,एग्जिट पोल वालों को और राजनैतिक पंडितों को धुल चटा सकता है। मतदाता अब  चुनाव हारने वाले दलों और नेताओं का ही नहीं बल्कि जीतने वालों का भी सुख चैन छीन सकता है। क्योंकि जो चुनाव हारे हैं वे और जो जीते हैं वे दोनों ही परेशान हो रहे हैं। हारने वाले इसलिए कि अब वेरोजगार हो गए और जीतने वाले इसलिए कि सरकार बनाने में हलकान हो रहे हैं !बल्कि जीतने वाले ज्यादा मानसिक तनाव में गुजर रहे हैं। उनकी रातों की नींद हराम हो गई है। इस तरह की स्थिति के अध्येता शायर ने  कहा होगा -'ये इश्क नहीं आशां इतना समझ लीजे ,इक आग का दरिया है और डूबके जाना है '

कोई जाहिर करे या न करे किन्तु यह सच है कि अपनी अप्रत्याशित जीत से भाजपा नेतत्व बहुत परेशान हैरान है। हैरान तो खुद अमित शाह और मोदी जी भी हैं, कि 'एक अनार और सौ बीमार हैं' !इसलिए  यह अनार आखिर दें किसे ? उत्तराखण्ड में जिसे सीएम घोषित किया वह सिर्फ एक काबिलियत रखता है कि वह 'रावत' है। उन्हें कोई ऐंसा नजर ही नहीं आ रहा कि सारे 'कुनबे' को सम्भाल सके और संघ एवम मोदी जी के एजेंडे को पूरा कर सके !

चूँकि यूपी -उत्तराखण्ड में 'नौ कनवजिया तेरह चूल्हें' हैंऔर अधिकांस जीते हुए विधायक या तो भूतपूर्व कांग्रेसी हैं या जाति विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं ,इसलिए सर्वानुमति से मुख्यमंत्री तय कर पाना मुश्किल है। उत्तराखण्ड और यूपी की जीत भाजपा के लिए पचा पाना मुश्किल है। उनकी स्थिति बहुत जल्दी  'उगलत बने न लीलत केरी , भई गत साँप छछूंदर जैसी' होने वाली है।  यूपी के नवनिर्वाचित विधायकों में से किसी में दमगुर्दे नहीं हैं कि इस बिकराल जीत का सामना कर सके। यदि राजनाथ सिंह के सिर पर यूपी के काँटों का ताज रख दें तो शायद कुछ बात बन जाए। यूपी से जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा के चतुर सुजानों ने गोवा -मणिपुर में लोकतंत्र की ऐंसी तैसी कर डाली। वहाँ सत्ता के लिए उन्होंने अपवित्र कांग्रेसियों को अपनी पंगत में जिमाकर पवित्र कर दिया है। जय हो !

बड़ी विचित्र स्थिति है ,यदि किसी 'सत्ताभक्त' को 'द्वेषभक्त' कहो या मणिपुर- गोवा में सरकार बनाने की बधाई दो तो  वह इसे कटाक्ष ही समझ रहा है।हालाँकि यह 'द्वेषभक्त' शब्द मैंने खुद ईजाद किया है। जिसका संधि विग्रह है- द्वेषभक्त याने द्वेष - घृणा फैलाने वाला ! यदि कोई व्यक्ति अथवा संगठन समाज में द्वेष फैलाता है तो हम उसे 'द्वेषभक्त' ही कहेंगे !अब यदि कोई अपने आपको 'द्वेषभक्त' समझता है और दूसरों को 'द्वेषद्रोही'तो इसमें मेरा क्या कसूर है ? द्वेशद्रोही याने घृणा से दूर रहने वाला याने परम संत ! हमारे शास्त्रों ने हमें 'द्वेष' अर्थात घ्रणा से दूर रहना सुखाया है। जब वामपंथी ,प्रगतिशील- बुद्धिजीवी इन शास्त्रीय मूल्यों का आदर करते हैं तो किसी 'हिंदुत्व- वादी' की यह फितरत क्यों होती है कि वह उपनिषद और गीता के सिद्धांतों को भूलकर उनकी अवमानना करे।

यूपी में यदि सपाकी जीत होती तो अब तक अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनाये जा चुके होते। यदि वसपा  की जीत होती तो बहिनजी का 'राज्यारोहण' हो चुका होता। किन्तु भाजपा की बम्फर जीतने अब मामला टेड़ा  है! यूपी में विगत ४० साल से या तो कोई पिछड़ा व्यक्ति मुख्यमंत्री रहा है या दलित नेता के रूप में बहिनजी मुख्यमंत्री रहीं हैं ! लेकिन भाजपा को हरतरफ से वोट मिले हैं ,अगड़े- ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया तो उनके खास आधार हैं ही किन्तु इस चुनाव में पिछड़े ,दलित और मुस्लिम महिलाओं ने भी वोट दिए हैं ,इसलिए भाजपा को सबकी आशाओं को साधना बहुत कठिन है। एतद द्वारा भाजपा संसदीय बोर्ड को,अमित शाह को और उनके सर्वेसर्वा नरेन्द्र मोदी जी को बिन माँगे सुझाव दिया जाता है कि राजनाथसिंह को ही उत्तरप्रदेश का मुख्य मंत्री बनाया जाये ! क्योंकि वे सर्वस्वीकार हो सकते हैं और उम्मीद है कि उनके नेतत्व में लोग जातीय -साम्प्रदायिक द्वेष कतई नहीं  फैलाएंगे !

   

शनिवार, 11 मार्च 2017

यूपी में भाजपा की जीत को सकारात्मक रूप में देखें।

१९८० में जब जनता पार्टी टूटी तो उसके हिन्दुत्वादी धड़े ने मुम्बई में नई पार्टी बनाई। नाम रखा गया 'भारतीय जनता पार्टी '!तब उसके संस्थापक अध्यक्ष अटल बिहारी बाजपेई ने पार्टी घोषणा पत्र में 'गांधीवादी समाजवाद'का सिद्धांत पेश किया था। उसके दो साल बाद हुए लोक सभा चुनाव में भाजपा को ५४० लोक सभा सीटों में से सिर्फ दो सीटें मिलीं। दुनिया ने मजाक उड़ाया। मैंने भी खूब उपहास किया। लेकिन जब वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर हिन्दू समाज के दूध में आरक्षण का नीबू निचोड़ा तो साईं आडवाणीजी 'कमण्डल'लेकर रथ यात्रा पर निकल पडे। अयोध्याकाण्ड हुआ ,गोधराकांड हुआ और हरेक साम्प्रदायिक दंगे के बाद भाजपा का राजनैतिक कद बढ़ता चला गया। लेकिन यूपी और बिहार में मंडलवाद का खासा असर होने से कमण्डल पिछड़ गया था। जब मोदी जी ने 'विकासवाद' और 'हिंदुत्ववाद' दोनों का सहारा लेकर मोर्चा संभाला तो उन्हें पर्याप्त सफलता मिली। परिणाम स्वरूप यूपी में अभी तो  सारे 'बाद' कोमा में हैं ! उम्मीद है कि भाजपा वाले अपनी इस जीत से बौरायेंगे नहीं। क्योंकि जनता का कोई भरोसा नही बड़ी जल्दी नाराज हो जाती है। १९७७ में इंदिराजी को बुरी तरह परास्त किए और जब जनता पार्टी ढाई साल में ढेर हो गई तो १९८० में फिर इंदिराजी को सत्ता सौंप दी।

आरक्षण की बढ़ती भूंख से हिन्दू समाज का अंदरूनी जातीय संघर्ष बहुत तेज होता जा रहा था। उत्तरप्रदेश की जनता ने ३० साल जो भुगता है उसके परिणामस्वरूप उतपन्न जनाक्रोश ने ही भाजपा को  विजयश्री दिलाई है।हिन्दू समाज के इस विखण्डन का फायदा सिर्फ लालू,मुलायम या ममता, मायावती ने ही नहीं बल्कि का कुछ अल्पसंख्यक नेताओं ने भी बेजा फायदा उठायाहै। सिर्फ आजमख़ाँ ,ओवेसी ही नहीं  नीतीश और केजरीवाल ने भी इसका बेजा फायदा उठाया। लेकिन यूपी की जनता ने अभी जो जनादेश दिया है ,उससे इस जातीयतावाद पर कुछ विराम लगेगा और बाकई ''सबका साथ -सबका विकास' ही भारत का मूल मन्त्र हो सकता है। इसलिए मोदी जी और अमित शाह के नेतत्व में भाजपा को मिली इस जीत का तहेदिल से स्वागत किए जाना चाहिए। इन चुनावों के मार्फ़त यूपी की जनता ने पिछड़ावाद,दलितवाद,अल्पसंख्यकवाद और गुण्डावाद पर जमकर प्रहार  किया है। बधाई ! धन्यवाद ! यदि भाजपा के नेतत्व में देश का और गरीबों का उद्धार होता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन मेहनतकश जनता को चाहिए कि अपने वर्गीय संगठनों का निर्माण करें। ताकि जब भाजपा और मोदी जी असफल हो जाएं तो 'वामपंथ' के नेतत्व में देश का मजूर-किसान सत्ता सम्भल सके !      

जब कभी तर्कबुध्धि और विवेकबुद्धि चकरघिन्नी होने लग जाए,तो भाववाद के उस सिद्धांत को इस्तेमाल करने में कोई उज्र नहीं,जिसके अनुसार ''जो होता है अच्छे के लिए होता है ,जो हो रहा है वह भी गुजर जाएगा,आगे भी जो होगा सही होगा,कर्मफल की इच्छा मत करो,तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने मात्र पर है ,कर्मफल तो ईश्वर के हाथ में है ''! चूँकि तार्किकता - बौद्धिकता का अब भारतीय राजनीति में कोई काम नहीं ,अब तो लठैतों के अच्छे दिन आये हैं। इसलिए यूपी की उस जनता को धन्यवाद, जिसने छोटे लठैत- लठैतनियों की जगह बड़े लठैतों को चुना है। आशा है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से अब यूपी का उद्धार अवश्य होगा ! यदि यूपी का उद्धार होगा तो गंगा का उद्धार अवश्य होगा,यदि यूपी का विकास होगा तो बिहार भी जातिवाद से मुक्त हो जाएगा। यदि यूपी में जातिवादी- अल्पसंख्यकवादी टेक्टिकल वोटिंग असफल हो गयी तो पूरे भारत में स्वच्छ लोकतान्त्रिक चुनाव की सम्भावना बढ़ेगी। तब जातीय संघर्ष की जगह 'वर्ग संघर्ष' होने लगेगा और  वर्ग चेतना का विस्तार होगा। वर्ग चेतना से असली समाजवादी क्रांति का सूत्रपात होगा। इसलिए प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष लोगों को चाहिए कि यूपी में भाजपा की जीत को सकारात्मक रूप में देखें। उत्तरप्रदेश की राजनीति को जो जातीयता और साम्प्रदायिकता का काँटा लगा था ,वो निकल गया। लेकिन जख्म अभी हरा है और काँटा निकालने वालों की नियत पर कुछ लोगों को शक है !

एक नजरिया काबिले गौर है। यूपी में भाजपा रुपी दक्षिणपंथ की महाविजय को देखने सुनने के वावजूद भी यदि कोई मेरी तरह अब भी 'सर्वहारा क्रांति' के प्रति आशावान है,तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि जब तक यह भारत देश असुरक्षित है ,जबतक बहुसंख्यक हिन्दू समाज को यकीन नहीं हो जाता,कि अतीत के सामंती दौर की तरह अब उनका अस्तित्व खतरे में नही है,जब तक वे यह नहीं समझ लेते कि उन्हें अब इस्लाम या ईसाइयत से नहीं बल्कि जातीयतावाद और सम्प्रदायकता युक्त पूँजीवाद से ही भयानक खतरा है ,तब तक वे सर्वहारा क्रांति के लिए तैयार नहीं होंगे। यदि किसी की तमन्ना है कि भारत में मजूरों-किसानों की और आम जनता की वास्तविक सत्ता हो,तो उसे इस दौर की राजनैतिक स्थिति का स्वागत करना चाहिए!  यदि कांग्रेस का विकल्प वामपंथ नहीं बन पाया तो इसमें किसी की कोई गलती नहीं ! क्योंकि भारत एक अर्ध सामंती अर्ध पूँजीवादी पुरातन पंथी धर्म -प्रधान राष्ट्र है। भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज अभी भी अतीत की गुलामी को भूल नही पाया है।इसलिए उसे  विदेशी शराब तो पसन्द है ,विदेशी औरत पसन्द है ,विदेशी चिकित्सा पद्धति पसन्द है ,विदेशी कम्प्यूटर,मोबाइल कपडे और जूते भी पसन्द हैं ,उसे विदेशी डेमोक्रसी और उसका संविधान भी पसन्द है ,उस विदेशी विचारधारा  आधारित पूँजीवाद भी पसन्द है ,किन्तु मजदूर -किसान की पक्षधर शोषणमुक्त साम्यवादी शासन व्यवस्था पसन्द करने में झिझक रहा है। यही वजह है कि हिंदी भाषी राज्यों में वामपंथ को उचित रिस्पांस नहीं मिल पा रहा है !देश में जब तक कोई उचित व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता तब तक कांग्रेस और भाजपा को यदि देश सम्भालने का अवसर मिलता है तो वह उतना बुरा नही जितना कि सपा,बसपा ,तृणमूल,अकाली,जदयू,राजद,एआईडीएमके और अन्य क्षेत्रीय दलों ने देश को और समाज को बरगलाया है। इसलिए यूपी में भाजपा की जीत पर पीएम मोदी और अमित शाह को बधाई दी जानी चाहिए।

यदि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया मनोरंजन को माइनस कर दिया जाए, तो प्रस्तुत चुनावों में किसी ने कुछ नहीं खोया। ये बात अलग है कि मायावतीजी ने आपा खो दिया है और  कुछ भाजपा समर्थक-मोदीभक्त भी आपा खोने की ओर अग्रसर हैं। इन चुनाव परिणामों से तो यही लगता है कि सबको वही मिला जो जिसके लायक था। जिनकी जमानत जब्त हुई वे उसी काबिल थे। जो भीतरघात या कम वोटिंग से कम मतों से हारे वे यह सोच कर सन्तोष करें कि 'हरि इच्छा भावी बलवाना' ! उनकी आस्था और पूजा में शायद कोई कमी रही होगी,इसलिए बाबा विश्वनाथ ने सौ -दो सौ वोटों से निपटवा दिया। क्योंकि बाबा विश्वनाथ तो इस बार अपने परम भक्त नरेन्द्र मोदीजी की झोली लबालब भरने में व्यस्त थे। इसलिए भौतिकवादी और भाववादी दोनों ही दर्शन के मुताबिक इन चुनावों में सब कुछ ठीक ही हुआ है।     

विगत २०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बम्फर बहुमत मिला था ,उसमें एमपी, यूपी-बिहार ,राजस्थान का सर्वाधिक योगदान रहा था।उसके कुछ समय बाद दिल्ली ,बिहार विधान सभा चुनाव में जब भाजपा और मोदीजी को बड़े बड़े झटके लगे,तो देश और दुनिया में कुछ इस तरह की धारणा बनने लगी कि नरेन्द्र मोदीके अश्वमेध का घोडा अब और आगे नहीं बढ़ सकता। मोदी सरकार की कालाधन स्कीम टांय-टॉय फीस होने पर आरोप लगे कि ये भी केवल बातों के धनी ही निकले। मोदीजी की तमाम घोषणाओं,वादों ,जुमलों और तूफानी दौरों से जनता को विगत ढाई-तीन साल में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल नहीं हुई। मोदी सरकार ने सिवाय कांग्रेसके कार्यक्रमों के नामपट्ट बदलने और नोटबंदी जैसे अदूरदर्शी फैसलों के अलावा अभी तक कुछ खास नहीं किया।किन्तु यूपी में बाबा विश्वनाथजी ने मोदीजी को उबार दिया! जयहो बाबा भोलेनाथ! इसी प्रकार देश के निर्धन शोषित जनपर भी कभी थोड़ी सी कृपा कर देना।

भारतीय लोकतंत्र की चुनावी नाव में इतने छेद हैं कि इसे वास्तविक किनारा कभी नहीं मिला। प्रस्तुत पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत रूपसे बहुत बढ़चढ़कर अपनी पार्टीके लिए प्रचार किया। उनके अथक प्रयासों से अंततोगत्वा बहुसंख्यकवाद बनाम हिंदुत्ववाद की नाव को यूपी में किनारा मिल ही गया। उत्तराखण्ड और यू पी में भाजपा की बम्फर जीत का श्रेय निसन्देह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम मोदीजी को ही जाता है। उनके धुंआधार जबरजस्त प्रचार के सामने गरीबी,भुखमरी ,बेकारी,नोटबन्दी ,राममंदिर ,हिदुत्व और विकास सब मुद्दे गौड़ होते चले गए। केवल एक ही नारा जनता को याद रह गया -'हर हर मोदी '!यूपी में जो कुछ हुआ उसके निहतार्थ यह हैं कि देश की जनता को जिन राजनैतिक दलों ने  जाति ,धर्म,मजहब की राजनीती में धकेल दिया था वे अब आइंदा इतिहास के कूड़ेदान में जनर आएंगे।

देश के प्रगतिशील वामपंथी सोच वालों की हमेशा हार्दिक तमन्ना रही है कि भारत के केंद्र में और सभी राज्यों में मजूरों -किसानों की सरकार हो। और जबतक यह नहीं हो जाता तबतक  देश में कम से कम कोई ऐंसी पूँजीवादी सरकार हो जो कमजोर वर्गों और शोषित पीड़ित जनताके लिए कुछ राहत प्रदान करे। कांग्रेस ने इस बाबत बहुत कुछ किया,किन्तु वह भृष्टाचार पर अंकुश लगानेमें असमर्थ रही। कांग्रेसकी यही गंभीर चूक भाजपा और मोदीजी के लिए वरदान सावित हुई। यही स्थिति यूपी में सपा ,वसपा के लंबे कार्यकाल की रही है। विगत ३० साल से यूपी की जनता जातिवादी राजनैतिक अखाड़ों के पहलवानों की गुलाम रही है ! पीएम नरेन्द्र मोदी ने  यूपी विधान सभा चुनाव में मायावती ,मुलायम और आजमखां के उस मिथ को ध्वस्त कर दिया है कि जातीय -सम्प्रदायिक दलों के वोट अहस्तांतरणीय हैं। उत्तरप्रदेश में आरएसएस का 'सकल हिन्दू एकत्वाद' सफल रहा है। २०१४ के लोकसभा वाला अक्स अभी बरकरार है।यह सिलसिला २०१९ और २०२४ तक जारी रहेगा। जब मंदिर नहीं बनाये जाने पर अभी ये आलम है,तो मंदिर बनाये जाने पर हिन्दुत्वाद का उभार कितना प्रवल होगा? इसका अंदाज लगाना भी कठिन नहीं है।

यूपी में भाजपा को जीत मिली इससे  देश की राजनीति के कुछ सकारात्मक सन्देश भी हैं। बक्त आने पर वामपंथ को भी मौका मिलेगा। जब १९८२ में दो सीट पाने वाली भाजपा आज बुलन्दियों को छू सकती है तो केडरबेस औरविचारधारा आधारित वामपंथ को जनता क्यों अवसर नही देगी ?लेकिन जिस तरह जनता ने कांग्रेस को अवसर दिया और उनकी नीतियों से नाराज होकर सत्ता से हटा दिया ,उसी तरह भाजपा भी जब उसके एजेंडे पूरे नहीं करेगी ,जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तब वामपंथ को भी अवसर मिलेगा ,बशर्ते आप,सपा और बसपा जैसी क्षेत्ररीय पार्टियों की खरपतवार समाप्त हो ! इसलिए यदि मोदी जी और अमित शाह इस खरपतवार को खत्म कर रहे हैं तो यह कांग्रेस और वामपंथ के लिए सुविधाजनक और अनुकूल ही है। श्रीराम तिवारी

 



रविवार, 5 मार्च 2017

केवल एबीवीपी कसूरवार नहीं है!

 'संघ परिवार' और उनकी छात्र इकाई 'एबीवीपी' अक्सर कानून को अपने हाथों में लेने को तैयार रहा करते हैं। उनके इस दुष्कृत्य को ही फासिज्म कहते हैं। वे यदि वास्तव में सच्चे देशभक्त -राष्ट्रवादी होते तो हर बार कानून को ठेंगा नहीं दिखाते। यदि वे सच्चे देशभक्त होते तो उन्हें मालूम होता कि देशभक्त नागरिक अपने संविधान के अनुरूप ही आचरण करते हैं। वे सिर्फ जेएनयू -डीयू में ही नहीं बल्कि देशके किसीभी शिक्षण संसथान में बेवजह हंगामा खड़ा करते रहने के आदि हैं। हर छात्र द्वंद मामले में पुलिस ,कानून और न्याय को धता बताकर वे अपनी मर्जी से तथाकथित 'देशद्रोहियों' पर लट्ठ लेकर  टूट पड़ते हैं ! यदि  पुलिस का काम 'संघ परिवार' को ही करना है तो संविधान संशोधन क्यों नहीं कर देते कि आइंदा पुलिस और कोर्ट कचहरी का काम सिर्फ वेतन -भत्ते लेना और रिश्वत लेना ही है!और बाकी का काम 'संघ' के सभी फ्रेंचाइजी ही करेंगे !

जब कभी भी साम्प्रदायिक और संविधानेतर संस्थाओं के अलोकतांत्रिक कारनामों की मुखर आलोचना होती है , तो वे अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय ,पुराने गढ़े मुर्दे उखाड़कर अपने फासिस्ट चरित्रको जस्टीफाई करने लगते हैं। उनके अंध समर्थक भी सोशल मीडिया पर इस अराजकता का नैतिक विरोध करने के बजाय खुद ही उस साम्प्रदायिक गंदगी में मुँह मारने लगते हैं। धर्मनिपेक्षता और प्रगतिशीलता तो उन्हें फांस की तरह चुभती है।

वेशक जेएनयू तथा डीयू के तथाकथित उपद्रव में केवल एबीवीपी ही कसूरवार नहीं है ,हालांकि वे इसी तरह गलतियां करते रहे तो उनका विनाश सुनिश्चित है। किन्तु वामपंथी छात्र संगठनों को भी अपनी कतिपय गंभीर भूलोंको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए!उन्हें मार्क्स एंगेल्स की शिक्षाओंका यह अत्यंत आवश्यक नियम हमेशा याद रखना चाहिए कि क्रांतिकारी व्यक्ति या संगठन बिना 'आत्मालोचना' के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते!अव्वल तो यह मान लेना ही गंभीर भूल होगी कि किसी छात्र संघर्ष का कारण सिर्फ 'संघ परिवार' या एबीवीपी ही है। क्योंकि देश में सैकड़ों विश्वविद्यालय और शिक्षा संसथान हैं, जहाँ एबीवीपी,एसएफआई,भाराछासं इत्यादि संघ और एक साथ संगठन चला रहे हैं। आपस में स्वाभाविक मतभेद के वावजूद कमोवेश संवाद हरजगह कायम है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि शिमला विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संघ 'एसएफआई' की जो इज्जत है, जो सम्मान हासिल है उससे एनएसयूआई ,एबीवीपी वाले भी ईर्ष्या करते हैं। किन्तु जेएनयूके तथाकथित वामपंथी छात्र संगठन किस सिद्धांत को लेकर चल रहे हैं ,यह मेरी समझ में कभी नहीं आया। गैर जरुरी और विवादास्पद मुद्दे उठाकर 'वामपंथ 'का नाम बदनाम कर रहे हैं।सवाल किया जाना चाहिए कि जेएनयू के वामपंथी छात्र संघोंने देश और दुनिया के सर्वहारा वर्ग,किसान,मजदूर, शोषित वर्ग के लिए अब तक क्या किया ?उन्होंने कभी अफजल गुरु और कभी कश्मीर के अलगाववादियों को पनाह देकर कौनसा क्रांतिकारी काम किया है ?उनके द्वारा दूसरे विश्वविद्यालय के मामले में दखल देने और अभिव्यक्ति की आजादी के बहाने फोकट की भाषणबाजी करनेसे प्रश्न उठता है कि उनमें और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों में अंतर क्या है ? क्या यह आचरण देश की मेहनतकश आवाम को पसन्द है ? इस तरह के अराजक और उदण्ड व्यवहार से देश में क्रांति नहीं होने वाली है । वे सृजनात्मक क्या कर रहे नहीं ? केवल अभिव्यक्ति की 'आजादी' और हकों के पक्ष में नारे लगाना ही क्रांतिकारी का अभीष्ट नहीं है, अपितु वामपंथी क्रांतिकारी व्यक्ति और संगठन जो कुछ भी करता है वह सारे राष्ट्र और समाज को दिशा देता है।

श्रीराम तिवारी