गुरुवार, 29 सितंबर 2022

मिनहाज़ सिराज की रिपोर्ट है–

 न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 और मुंबई में 26/11 को हुए भयावह आतंकी हमले की तरह अगर ईस्वी सन् 1235 में उज्जैन में आज जैसे जागरूक मीडिया की मौजूदगी होती तो उस समय दुनिया भर की सबसे चर्चित सुर्खियाँ कुछ इस तरह की होतीं-

“उज्जैन के महाकाल मंदिर पर आतंकी हमला हुआ है… मंदिर को पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया गया है… मंदिर के भीतर सदियों से जमा सोने-चांदी की मूर्तियों को लूट लिया गया है… राजा विक्रमादित्य की मूर्ति भी गिरा दी गई है…
हमले की जिम्मेदारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने ली है… उसका कहना है कि दिल्ली पर अब उसका कब्जा है और वही सुलतान है… उसके साथ बड़ी तादाद में आए हमलावरों ने सिर्फ उज्जैन ही नहीं विदिशा के भी बेमिसाल मंदिर मिट्‌टी में मिला दिए हैं… पूरे इलाके में दहशत का आलम है… हर जगह हमलावरों के मुकाबले में आए स्थानीय सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए हैं… इनकी संख्या अभी पता नहीं है।”
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के इस्लामी बहेलियों ने एक दिन विदिशा को बरबाद करने के बाद उज्जैन को घेरा था। यह 1235 की घटना है। वे अपनी तलवारें चमकाते हुए राजा विक्रमादित्य और कालिदास की स्मृतियों से जगमगाते ज्योर्तिलिंग की तरफ दौड़े।
तब गलियों-बाज़ारों में पहली बार वही भयंकर शोर सुना गया था, जो आज के दौर में दुनिया के कोने-कोने में सुनाई देता रहा है-“अल्लाहो-अकबर।“ तब उज्जैन में अपनी अंतिम शक्ति को बटोरकर परमार राजाओं के सैनिक मजहबी जुनून से भरे इन विचित्र वीर तुर्कों से सीधे भिड़े होंगे और अपने सिर कटने तक उन्हें रोका होगा। कई लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए मजहब बदला होगा, जो कि उन दिनों एक ज़रूरी और आम घटना थी।
उज्जैन को तबाह करने का फैसला करते वक्त मुमकिन है इन हमलावर आतंकियों ने विक्रमादित्य का नाम सुना होगा, कालिदास उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर थे, भर्तहरि के बारे में उनके फरिश्तों को भी ज्ञान नहीं होगा, वराहमिहिर से उनका कोई लेना-देना नहीं था। मंदिरों में लदा सोना-चांदी और रत्न-भंडार लूटना उन्हें मजहबी हक से हासिल था। बुतों से इस कदर नफरत जिसने उन्हें सिखाई थी, उसे वे इस्लाम कहते थे।
उस दिन महाकाल मंदिर में ट्विन टॉवर जैसा ही हाहाकार मचा होगा। मध्य भारत में मालवा के इस विध्वंस पर मिनहाज़ सिराज की रिपोर्ट है–
“1234-35 में इस्लामी सेना लेकर उसने मालवा पर चढ़ाई की। भिलसा के किले और शहर पर कब्जा जमा लिया। वहाँ के एक मंदिर को, जो 300 साल में बनकर तैयार हुआ था और जो 105 गज ऊँचा था, मिट्‌टी में मिला दिया।
वहाँ से वह उज्जैन की तरफ बढ़ा और महाकाल देव के मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। उज्जैन के राजा विक्रमाजीत की मूर्ति, जिसके राज्य को आज 1316 साल हो चुके हैं और जिसके राज्य से ही हिंदवी सन् शुरू होता है, तथा पीतल की अन्य मूर्तियों और महाकाल देव की पत्थर की मूर्ति को दिल्ली लेकर आया।”
अब सवाल यह है कि उज्जैन से हाथी-घोड़ों पर ढोकर दिल्ली ले जाई गई इन विशाल मूर्तियों का क्या किया गया?
उज्जैन पर हुए हमले के 77 साल बाद सन् 1312 में मोरक्को का मशहूर यात्री इब्नबतूता दिल्ली पहुंचता है। वह नौ साल दिल्ली में रहा। उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के बाहर इन मूर्तियों को पड़े हुए अपनी आंखों से देखा था। उसने इसे जामा मस्जिद कहा है और इससे सटकर बनी कुतुबमीनार का भी जिक्र किया है। इब्नबतूता कुतुबमीनार के सामने खड़ा होकर बता रहा है-
“मस्जिद के पूर्वी दरवाजे के बाहर तांबे की दो बड़ी-बड़ी मूर्तियां पत्थर में जड़ी हुई जमीन पर पड़ी हैं। मस्जिद में आने-जाने वाले उन पर पैर रखकर आते-जाते हैं। मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर बना हुआ था। दिल्ली पर कब्जे के बाद मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवाई गई। मस्जिद के उत्तरी चौक में एक मीनार खड़ है, जो इस्लामी दुनिया में बेमिसाल है।”
गौर करें, मिनहाज़ सिराज और इब्नबतूता दोनों ही इन हमलों को इस्लामी सेना और इस्लामी दुनिया से जोड़कर स्पष्ट कर रहे हैं कि यह एक राज्य का दूसरे राज्य पर अपने राज्य की सीमाओं के विस्तार की खातिर हुए हमले नहीं, बल्कि यह इस्लाम की फतह के लिए किए गए हैं और इसके लिए किसी कारण की ज़रूरत नहीं है।
ये एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच किसी मसले पर लड़े गए युद्ध या आक्रमण नहीं थे। यह साफ तौर पर आतंकी हमले थे, क्योंकि जिस पर हमला किया जा रहा है, उसे पता ही नहीं है कि उसका कुसूर क्या है? कोई चुनौती नहीं, कोई मुद्दा नहीं। सीधे हमला। लूट और मारकाट।
आप कल्पना कीजिए कि तब विदिशा या उज्जैन के आम निवासियों को क्या पता होगा कि अजीब सी शक्ल-सूरत और अजनबी जबान वाले ये हमलावर हैं कौन, क्यों उन्हें कत्ल कर रहे हैं, क्यों मंदिर को तोड़ रहे हैं, क्यों उनके देवताओंं की मूर्तियों को इस बेरहमी से तोड़ा जा रहा है, बेजान बुतों से क्या खतरा है, हमारी संपत्तियाँ लूटकर क्यों ले जा रहे हैं? श्रीराम तिवारी पिड़रुवा...
See insights

पर्सियन मान्यताओं के अनुसार यह युद्ध की देवी सिंह विराजमान ....

 प्राचीन जम्बूदीपे > आर्यान >ईरान (फारस) में इस्लाम के आगमन से पहले देवी मां भी थीं और उनमें से एक देवी *अनाहिता* नाम से प्रसिद्ध थीं! इस्लामिक आक्रांताओं ने संपूर्ण फारस (ईरान) को तत्कालीन जोराष्ट्रियन धर्म और सनातन धर्म की सभी शाखाओं को *शक्ति* विहीन कर डाला!

' ऑर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ ईरान' वालों को खुदाई में प्रस्तुत चित्र अवशेष के रूप में मिला!चित्र यह देवी अपने भक्त को बहादुरी का आशीर्वाद देती हैं। पौराणिक और पर्सियन मान्यताओं के अनुसार यह युद्ध की देवी सिंह विराजमान (विराजमामा) है! यह चित्र बता रहा है कि इस्लामिक आक्रमण और इस्लामिक आतंकवाद ने दुनिया की तमाम सभ्यताओं और संस्कृतियों की कैसी दुर्गति की है! सवाल उठता है कि आधुनिक इस्लामिक आतंकवाद की आँधी से ये बचे खुचे अवशेष बच पाएंगे क्या?
May be an illustration

गांधी जी चाहते तो भगतसिंह,राजगुरू,सुखदेव को फांसी से बचा सकते थे.....

 धीनता संग्राम के इतिहास से अनभिज्ञ कुछ अपढ़ गंवारों को मालूम नही कि फांसी की सजा को खुद शहीद भगतसिंह ने चुना था! कुछ गप्पाड़ियों का आरोप है कि यदि गांधी, नेहरु,पटैल,अंबेडकर चाहते तो शहीद भगतसिंह को बचाया जा सकता था ! कुछ तो नीचतापूर्ण आरोप लगाते हैं कि गांधी जी चाहते तो भगतसिंह,राजगुरू,सुखदेव को फांसी से बचा सकते थे!

दरसल भगतसिंह की लोकप्रियता से आतंकित अंग्रेज खुद नही चाहते थे कि भगतसिंह फांसी चढ़कर भारत की जनता के हीरो बन जाएं! यदि भगतसिंह चाहते तो मुकद्में की जरूरत ही नहीं थी! उनके पिता को वाइसराय का संदेश मिला था कि यदि भगतसिंह माफी मांग लें,तो फांसी की सजा रद्द हो सकती है!
यह काबिले गौर है कि जब भगतसिंह ने अपने बाप की नही मानी तो,गांधी नेहरु कहां लगते हैं?यदि भगवान भी वकील बनकर भगतसिंह की वकालत करते तो, भगतसिंह उनकी भीनही मानते! क्योंकि भगतसिंह ने ठान लिया था कि भारत की मुर्दा गुलाम कौम को जगाने के लिये शहादत बहुत जरूरी है! यदि वे फांसी नही चढ़ते तो भारत की जनता जागती ही नहीं और आज भारत, पाकिस्तान में उनका जितना सम्मान भगतसिंह का है,उतना कदापि नहीं होता! इंक्लाब जिंदावाद का नारा भले ही हजरत रूहानी * ने लिखा होगा, किंतु दुनिया के मजदूरों ने तो भगतसिंह से ही सुना था..

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

"जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्चते ''

 6-7 साल पहले ऋषि पंचमी के अवसर पर निमाड़ [मध्यप्रदेश] के 'टांडा 'ग्राम में गायत्री परिवार द्वारा एक विचित्र किन्तु अद्व्तीय सामाजिक -सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था! यह कार्यक्रम पूर्णतः प्रबुद्घ *आदिवासियों का ,आदिवासियों के द्वारा ,आदिवासियों के लिए* ही सम्पन्न किया गया था!

इस कार्यक्रम में यूपी राजस्थान छग, झाबुआ निमाड़ और मालवा के लगभग पांच हजार आदिवासी शामिल हुए थे सभी का विधिवत यगोपवीत संस्कार किया गया था! मुंडन ,जनेऊ , कुश -आशन एवं अधोवस्त्र इत्यादि समस्त 'ब्राह्मण' प्रतीकों से सुसज्जित इन सहस्त्रों 'वटुकों ' की ग्रुप फोटो 'नई दुनिया 'के रविवारीय अंक में प्रकशित हुई थी
यह दृश्य देखकर कई कुलीन ब्राह्मणों को ईर्ष्या हुई! वे कहते पाए गये कि " हम वंशानुगत कुलीन ब्राह्मण हैं, और इस तरह विधि विधान से हम में से कई एक का यज्ञोपवीत संस्कार इस तरह भव्य आयोजन से नही हो पाया! आयोजन का आँखों देखा वर्णन निम्नाकिंत है! :-
आयोजन में शामिल आदिवासियों के 'संत' श्री डेमिन भाई डाबर ने वहाँ स्वस्तिवाचन किया। तमाम आदिवासियों को वैदिक सूक्तियों के उद्धरणों से परम अभिषिक्त किया गया! उन्हें बताया गया कि
"जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्चते ''
अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य एक जैसे 'असंस्कृत' ही हुआ करते हैं। किन्तु ज्यों-ज्यों कोई मनुष्य उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों की ,समाज की ,देश की और विश्व कल्याण की भावनाओं को अंगीकृत करते हुए 'सुसंस्कृत' होता जाता है, त्यों-त्यों वह मनुष्यत्व के उच्चतर शिखर पर प्रतिष्ठित होता जाता है। तब वह 'विप्र' हो जाता है।" इस कार्यक्रम में आदिवासियों के अलावा और भी बहुत सारे स्थानीय पिछड़े -दलित और कास्तकार जन भी उपस्थित रहे।
आदिवासी 'संत' डोमिन भाई*के इन विचारों को सिरे से ख़ारिज तो नहीं किया जा सकता। किन्तु उन्हें यथावत स्वीकृति भी नहीं दी जा सकती। उनके इस उपक्रम को 'नवब्राह्णणवाद' कहें या क्रांतिकारी परिवर्तन यह निर्णय हर कोई एरा- गैरा -नत्थुखेरा नहीं कर सकता। बल्कि इसका फैसला सिर्फ वही लोग कर सकते हैं ,जिन्हे भारत के आदिवासियों की आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक जीवन यात्रा का सम्पूर्ण ज्ञान है। जिन्हे भारतीय सनातन संस्कृति के साथ साथ राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया का वास्तविक इतिहास मालूम है। और जिन्हे आधुनिक दुनियावी वैज्ञानिक-विकासवादी सिलसिले का यथासंभव ज्ञान है। इस विमर्श में हस्तक्षेप से पहले हम संछिप्त विषय प्रवर्तन भी किये देते हैं।
दुनिया की किसी भी सभ्यता और संस्कृति का नकारात्मक विकास साधारण मनुष्यों द्वारा या आदिवासियों द्वारा नहीं हुआ। और यह सिलसिला धरती की सेहत के लिए भी अच्छा ही था। क्योंकि आदिवासी बड़े 'प्रकृति-पारखी ' हुआ करते हैं। भले ही वे खुले आसमान के नीचे - झोपड़ों में गुजर-बसर करते रहे ,किन्तु किसी नदी , तालाब ,वन -उपवन ,पर्वत - झील की शक्ल सूरत उन्होंने कहीं -कभी नहीं बिगाड़ी । आदिवासी जानते और मानते रहे हैं कि "चींटियाँ घर बनाती हैं और साँप उसमें रहने आ जाते हैं ! " शायद इसीलिये प्राग ऐतिहासिक काल से ही आदिवासी सारी दुनिया में ऊँचे-ऊँचे महल ,बड़े-बड़े पुल ,हजारों मील लम्बे राजमार्ग और बड़ी-बड़ी नहरें तो बनाते रहे। किन्तु भारतीय गिरमिटियों की तरह इन अफ़्रीकी अश्वेतों[आदिवासियों] ने भी पश्चिम के श्वेत प्रभु वर्ग को वह सब सृजन करके दिया जो पौराणिक और परी कथाओं में केवल जिन्न ही कर सकते हैं। साइंस और टेक्नॉलॉजी के चरम विकास ने , विभिन्न क्रांतियों ने और राष्ट्रों के लोकतंत्रीकरण ने शिद्द्त से यह सुनिश्चित कर दिया है ,कि आधुनिक दुनिया के हर महाद्वीप के आदिवासी आइन्दा अपनी खुद की ही आदि - पुरातन संस्कृति को टाटा-बाय-बाय कर 'सभ्रांत' वर्ग की नकल शुरू कर दें । भारत के छग,झारखंड , झाबुआ - निमाड़ में यही सब हो रहा है।
कहा जा सकता है कि किसी अति -उन्नत नगरीय सभ्यता का विकास आदिवासियों ने नहीं किया। मानव इतिहास में न केवल आदिवासी बल्कि अन्य आमजन की भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है,कि इस वर्ग ने किसी नयी सभ्यता या संस्कृति का सृजन किया हो। बल्कि इस वर्ग के द्वारा 'सभ्रांत वर्ग'का सिर्फ अनुपालित ही किया जाता रहा है। अर्थात सभ्यताओं का उत्थान-पतन 'लोक' के द्वारा नहीं बल्कि ' राज्य सत्ताओं',सबलवर्ग ऐतिहासिक युद्धों -बड़ी लड़ाईयों ,महाँन क्रांतियों और कुर्बानियों की बदौलत ही आधुनिक सभ्यताएं परवान चढ़ी हैं। वेशक यह सभ्यता और संस्कृति परिष्करण आदिवासियों ,कारगर वर्ग एवं अन्य मेहनतकश सर्वहारा वर्ग के श्रम की बदौलत ही संभव हुआ है। उत्तर -दक्षिण अमेरिका , आस्ट्रेलिया ,न्यूजीलैंड , अफ़्रीकी महाद्वीप व समस्त 'गुलाम सन्सार' का कायाकल्प साधारण लोगों ने नहीं किया। बल्कि वे तो सत्ता के निर्जीव औजार मात्र रहे हैं। वेशक सम्पूर्ण श्रम तो आदिवासियों और आम साधारण इंसान का ही रहा है किन्तु नए सन्सार की खोज और साइंस के आविष्कार तो -कोलंबस ,वास्कोडिगामा,टॉमस -रो ,थॉमस अल्वा एडिसन ,न्यूटन और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों और यायावर महा नाविकों ने ही की है। नयी दुनिया की खोज करने के लिए, पानी के बड़े जहाज और खाना -खर्चा तो ततकालीन राज्य सत्ताओं द्वारा ही मुहैया किया जाता रहा है।
भारत के आदिवासी यदि उच्च वर्ण या सभ्रांत लोक का अनुसरण करते हैं तो यह भारत के लिए और भारत के आदिवासियों के लिए कुछ हद तक मुफीद हो सकता है। किन्तु उन्हें सोचना चाहिए कि जब किसी मुल्क में एक अनार और सौ बीमार हों ,जब एक बस में ५० सीटें हों और यात्री १०० हों ,जब एक ट्रेन की यात्री क्षमता ३०० हो और उसमें १००० यात्री चढ़ जायँ , और जब चपरासी की नौकरी के लिए २०० पद ही रिक्त हों और तीन लाख युवा ग्रजुऐट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करने लगें , तो हिन्दुत्ववादियों ,गायत्री परिवार वालों और 'सनातन परम्परा 'वालों को अपने इस 'दीक्षांत समारोह' पर पुनर्विचार करना होगा। और आदिवासियों के आधुनिक सनातनी नेता -संत 'डोमिन भाई को , अन्य मजहबी नेताओं को भी सोचना पडेगा कि केवल जनेऊ - यगोपवीत धरण करने से ,कुशाशन पर बैठकर लोम-विलोम करने से 'सभ्रांत लोक' की मुख्यधारा में शामिल नहीं हुआ जा सकता । वैसे भी यह सभ्रांत लोक तो मनुवादी कहकर दुत्कारा जा चुका है। जब बाबा साहेब श्री भीमराव अम्बेडकर जी ,श्री कासीराम जी ,श्री जगजीवनराम जी और अन्नादुराई को यह सभ्रांत लोक पसंद नहीं आया तो उनके आधुनिक सजातीय बंधू क्यों 'दंड-कमंडल'और जनेऊ धारण के लिए हलकान हो रहे हैं ?
वेशक हर दौर की सभ्यता और संस्कृति भी उस दौर की भाषा और वैज्ञानिक तकनीकी के अनुरूप लोकोपकारी रही होगी। किन्तु इस आधुनिक डिजिटलाइज युग में ,भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के युग में आदिवासियों को साइंस और टेक्नॉलॉजी से सुसज्जित करने और उन्हें आर्थिक रूप से सबल बनाने की जरुरत है। केवल पुरातन सांस्कृतिक रूपांतरण से रोटी-कपड़ा और मकान तो क्या आदिवासी को केवल वामनों कीतरह लंगोटी ही हाँथ आएंगी।
श्रीराम तिवारी

" एकम सद विप्रा बहुधा वदन्ति "

 परजीवी उपदेशकों को विशेषाधिकार है कि कोई उन्हें साधारण आदमी ट्रीट नहीं कर सकता! उनके कृतित्व या उनकी संपदा के स्वामित्व में आड़े नहीं आना पालतु लोकतंत्र की दुखती रग है!

संघ परिवार,भाजपा,विश्व हिन्दू परिषद् ,ये अखाड़ा -वो मठ या वक्फ बोर्ड ये सब पूँजीवादी व्यवस्था के टूल्स हैं!
हिंदूवादी भले ही कहें कि उनके पास गीता-रामायण जैसे संस्कृत साहित्य के अलावा कुछ नहीं तो कौन यकीन करेगा ? जब वे खुद चीख -चीखकर प्रचार कर रहे हैं कि उनके आविष्कारों की गूँज सारी दुनिया में है ,उनकी 'पतंजलि योग अनुसंधान केंद्र ' में तैयार की गईं वेश कीमती आयुर्वैदिक दवाएं अमेरिका ,यूरोप और इंग्लॅण्ड में भारी कीमत में खरीदें जातीं हैं. तो इसमें क्या शक है कि वे स्वयम भी अपने पेटेंट्स उत्पादनों के ब्राण्ड एम्बेसडर बनकर ही तो इंग्लेंड गए हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने भारत और हिन्दू धर्म पर बहुत कुछससचच
कि भारत में कुछ लोग सिर्फ हिन्दू स्वामियों ,बाबाओं और प्रवचन कारों को ही घेरते हैं. अल्पसंख्यक चय हिन्दुओं के सापेक्ष अल्पसंख्यकों को कम कुख्याति मिली हो।लेकिन इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं की किसी खास धर्म-मजहब के 'मज़हबजी लीडर' पाक -साफ़ हैं। कौन कहता है कि केवल हिन्दू धर्म के बाबा स्वामी या संत ही बड़े बदमाश हैं? धर्म-मजहब कोई भी हो उसका मूल आधार - अंध श्रद्धा ही है। सभी धर्मों-मजहबों -पंथों-दर्शनों में वक्त के साथ गिरावट आई है। वैसे भी दुनिया के तमाम धर्म-मजहब और उनके धार्मिक ग्रुन्थ सिखाते हैं कि "केवल उनका धर्म-पंथ -,मजहब ही श्रेष्ठ है ,उस पर ही यकीन करो ,उसके संस्थापक पर ही यकीन करो ,बाकी के धर्म मजहब सब झूंठे हैं " हिन्दू धर्म में इतनी कट्टर अवधारणा नहीं है। बल्कि केवल हिन्दू धर्म ही है जो सिखाता है की :-
" एकम सद विप्रा बहुधा वदन्ति "
'सत्य एक ही है ,संसार के सभी धर्म-मजहब के लोग उस परमात्मा या सत्य को अपनी भाषा या वाणी से उद्घोषित किया करते हैं "
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया , सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्वेत "
"सभी सुखी हों ,सभी निरोगी हों ,सभी में समग्र दृष्टी हो और सभी के दुखों का निवारण सभी मिलकर करें "
बहुत शर्मनाक है कि इस दौर के हिंदुवादियों -गुरु घंटालों और धंधेबाज स्वामियों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए 'हिन्दू धर्म' की वास्तविक छवि को धूमिल करने का काम किया है। हिन्दू धर्म के उच्चतम मूल्यों और सिद्धांत पर रमण करने वाले योगी महात्मा तिजारत-व्यापार नहीं किया करते। अन्य धर्मों में यदि ये मूल्य नदारत हैं तो यह उस धर्म-मजहब के अनुयाइयों के चिंतन का विषय है। सच्चे हिन्दू लोग सिर्फ इसलिए परिस्थितियों को स्वीकारने के लिए नहीं बैठे कि ये तो सभी संस्कृतियों और धर्मों-मजहबों की दुर्गति का दौर है। बहरहाल यहाँ भारत में तो हिन्दू धर्म के बाबाओं-स्वामियों का ही ज्यादा बोलबाला है अतेव उन्ही की पूजा और उन्ही की आलोचना का दौर है। गैर हिन्दू धर्म के बारे में उनके अनुयायी ही फैसला करेंगे कि क्या उचित है ? क्या अनुचित है ?
वेशक हिन्दू धर्म के स्वामी-बाबा और धर्माचार्य तो 'सत्पथ' पर नहीं चल रहे हैं। चंद सच्चे साधू-संतों को छोड़ अधिकांस 'धर्म-प्रचारक ' मठाधीश केवल www याने [welth,women,wine] में रमण कर रहे हैं। वे वर्तमान यूपी ऐ सरकार में अपने कर्मों के कारण न केवल बदनाम हो रहे हैं बल्कि जेल भी जा रहे हैं ,इसीलिये वे पाखंडी ढोंगी धर्मगुरु- कट्टरतावादी हिंदुत्व की राजनीती करने वालों के कट्टर प्रचारक बन चुके हैं। अधिकांस परजीवी धन्धेवाज, चालाक और धूर्त -ज्योतिषी -कर्मकांडी इस फिराक में रहते हैं की राज्यसत्ता का अविरल सम्मान और समर्थन उन्हें मिलता रहे। वे केवल 'राम-नाम जपना -पराया माल अपना ' के अभिलाषी हैं .
आशाराम ,निर्मल बाबा ,कंधारी बाबा , ये आश्रम वो डेरा और न जाने कितने नामी-गिरामी अपराधी हैं जो निरीह जनता को वेवकूफ बनाकर दौलत के ढेर पर बैठे हैं। स्वामी रामदेव इन सब में नंबर वन हैं। राजनैतिक भर्ष्टाचार को समाप्त करने ,विदेशी बेंकों से काला धन वापिस लाने की दुहाई देने वाले बाब रामदेव का राजनैतिक सरोकार तो समझ में आता है किन्तु धर्म- अध्यात्म और 'दर्शन ' से उनका कोई लेना देना नहीं है । वे अब व्यक्ति नहीं संस्था हो चुके हैं। वे योग गुरु, के बहाने सरकार से और समाज से अपने व्यापार के लिए ,तिजारत के लिए विशेषाधिकार की आकांक्षा रखते हैं। कांग्रेस और यूपीए से अब उन्हें कोई उम्मीद नहीं है इसलिए उगते सूरज-नरेन्द्र मोदी का "नमो-जाप" शुरू कर दिया है बाबा रामदेव ने। लेकिन भाजपा ,एनडीए या मोदी के सहयोग से ये सुविधा उन्हें शायद भारत में ही मिल सकती है । इंग्लेंड में या अमेरिका में 'संघ परिवार' की ताकत अभी सीमित है . अमेरिका में जब ईसाई जार्ज फर्नाडीज के कपडे उतरवा लिये जाते हैं और मुसलमान शाहरुख खान को अपमानित किया जाता है। तो बाबा रामदेव कुछ नहीं बोलते। लेकिन जब उन पर बीतती है तो ठीकरा कांग्रेस या 'धर्मनिरपेक्ष ' जमात पर फोड़ देते हैं। गनीमत है स्वामी रामदेव की इंग्लेंड में लंगोटी तो सलामत रही। रामदेव को सोचना चाहिए कि "संतों का सीकरी सों काम " यदि राजनीती ही करनी है या धंधा ही करना है तो योग का ढोंग छोड़ना होगा। विशुद्ध व्यापार के लिए तो अंग्रेज दुनिया में वैसे ही बहुत मशहूर हैं. आशा है कि स्वामी रामदेव जी को इंग्लेंड से जो कुछ भी अनुभव मिले वे उनके भविष्य में अवश्य काम आयेंगे
श्रीराम तिवारी

मेरी कटी, तो सबकी कटनी चाहिये!

एक थी लोमड़ी! बहुत तेज तर्राट चालाक धूर्त, बिल्कुल आधुनिक भारत के सत्ताधारी नेताओं की मानिंद! वैसे तो जंगल में सब ठीक -ठाक चल रहा था,किंतु हुआ यों कि सुश्री लोमड़ी की पूँछ कांटेदार झाड़ी में उलझकर कट गई थी! अत: जंगली जानवरों के बीच अपनी शर्म छिपाने के लिए लोमड़ी ने एक नायाब तरकीब निकाली! उसने अपनी झेंप दूर करने बाबत जंगली जानवरों की मीटिंग बुलवाई!

मीटिंग में चूहे -बिल्ली,सांप -नेवले से लेकर नीलगाय हाथी,हिरण- खरगोश,तेंदुआ- चीता और सिंह* साहिबान पधारे ! परम्परानुसार मीटिंग की अध्यक्षता श्रीमान सिंह साहब ने की ! मीटिंग में लोमड़ी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर गंभीर विचार विमर्श हुआ! लोमड़ी देवी एक झाड़ी की ओट में इस तरह सटकर बैठी थी कि किसी को शक न हो कि लोमड़ी देवी की पूछ नहीं है! किंतु एक सियार को लोमड़ी पर शक हो गया!
सियार ने अध्यक्ष सिंह साहब से निवेदन किया कि विमर्श के लिए लाया गया विषय जिनका है, उन्हें सबके सामने पेश होना चाहिए! सिंह साहब और मीटिंग में उपस्थित वन्य समुदाय को सियार की बात जच गई !सब के जोर देने पर लोमड़ी अपना पिछवाड़ा छिपाते छिपाते मीटिंग में आई! उसने सभी से कहा कि "क्यों न सभी जंगली जानवर अपनी -अपनी पूंछ कटवा लें, क्योंकि इसके कारण कई बार हमारे प्राण संकट में आ जाते हैं!
सभा में उपस्थिति अधिकांश जानवरों ने सहमति में गर्दन हिला दी! लेकिन सभा में उपस्थिति बूढ़े सियार ने असहमति व्यक्त की! जब अध्यक्ष सिंह साहब ने सियार से कारण पूछा, तो स्यार ने जबाब दिया कि पहले इस लोमड़ी को कहिये कि पिछवाड़ा न छिपाये बल्कि ये बताए कि माजरा क्या है?
सिंह साहब ने लोमड़ी को पिछवाड़ा दिखाने को कहा, सभी वनचरों ने देखा कि लोमड़ी की पूछ ही नहीं है!
सभी को समझते देर नही लगी कि पूछविहीन लोमड़ी ने सभी वनचरों को अपनी अपनी पूंछ से महरूम करने का मनसूबा ठान लिया था!
जब कोई कहे कि मैं जातिवाद नही मानता, समझो कि उसकी जाति चली गई, जब कोई कहे कि मैं धर्म मजहब नही मानता, समझो कि उसका धर्म मजहब है ही नही!
यदि किसी की जाति नही, धर्म नही तो समझो कि वह वीतरागी हो गया है! किंतु जब कोई धर्मविहीनता जातिविहीनता की बात करे और अपने घर में सबसे बड़े जातिवादी नेता का फोटो लगाकर रखे, तो यह पाखंड है!

सोमवार, 19 सितंबर 2022

सिस्टम है खूंखार

 राजनीति में घुस गई,जात-पाँत की बात !

लोकतंत्र पर हो रहे, सतत घात प्रतिघात!!
सतत घात प्रतिघात,हो रहे निर्बल पर हमले!
नेता देते भाषण, सब खोखले वादे जुमले!!
सिस्टम है खूंखार, बढ़ती जाती घोर विषमता।
मजहब का उन्माद,हर चुनाव में खूब मचलता!!
श्रीराम तिवारी

हिंदू-मुसलमान सवर्ण -दलित से ऊपर Bharat

 एक दूसरे के साम्प्रदायिक अंधविरोधी नर नारी उच्च शिक्षा के अभाव में मानव जन्म की जीव वैज्ञानिक सच्चाई याने हिंदू-मुसलमान; सवर्ण -दलित से ऊपर उठकर जो लोग सच्चे इंसान ही नहीं बन पाते,वे फोकट का बैर ठाने रहते हैं! ऐंसे कूड़मगज मनोरोगी लोगों से वस्तुनिष्ठ इतिहासबोध की उम्मीद करना व्यर्थ है।

समाज में नफरत फैलाने वाले और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सियासत के भरोसे मुल्क की संपदा अपने धनपशु आकाओं के सुपुर्द करने वाले हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सारे फिरकापरस्त राजनैतिक नेता और उनके जाहिल अंधभक्त हिंदू-मुसलमान नरेटिव से ही धर्म की दुकानदारी करके मानवता को शर्मसार करते हैं।
अपने शासनकाल की स्वर्णजयंती (50वे साल) के उपलक्ष्य में, राम-सीता की तस्वीर वाले अकबर द्वारा जारी सोने और चांदी के सिक्के राष्ट्रीय संग्रहालय में आज भी संग्रहित हैं। जहां तक भारत को तोड़कर पाकिस्तान बनाने की बात है तो यह बांटो-राज करो की नीति के तहत औपनिवेशिक परियोजना थी जिसे कार्यरूप देने में औपनिवेशिक शासन के हिंदू-मुस्लिम कारिंदों (हिंदू महासभा-मुस्लिम लीग; आरएसएस-जमाते इस्लामी) ने निर्णायक भूमिका निभाया। दो-राष्ट्र का प्रस्ताव सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने 1937 में पारित किया और मुस्लिम लीग ने 1940 में। उसके बाद 1942 में जब मुल्क 'भारत छोड़ो', राष्ट्रीय आंदोलन में मशगूल था तब दोनो औपनिवेशिक कारिंदे (मुस्लिम लीग-हिंदू महा सभा) अपने औपनिवेशिक आकाओं की शह पर सिंध, उत्तर-पश्चिम प्रांत और बंगाल में साझा सरकारें चला रहे थे।
भारतीय जनसंघ के पहले अध्यक्ष, श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिमलीग-हिंदू महासभा की मिली-जुली सरकार में उप मुख्य मंत्री थे। सांप्रदायिक दुराग्रह तथा अफवाहजन्य इतिहासबोध से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ इतिहासबोध से इतिहास पढ़ेंगे तो हिंदू-मुस्लिम नरेटिव से समाज को फिरकापरस्ती के जहर से प्रदूषित करना बंद कर मानवता की सेवा करेंगे।
May be an image of text that says 'राम टका मुगल सम्राट अकबर ने यह राम टका सन् 1604-1605 में जारी किया था इस सिक्के के एक ओर श्री रामचन्द्र जी और सीता जी का चित्र है और दूसरी ओर 'अकबर के शासन के 50 वर्ष' लिखा है| वर्तमान में एक सोने का दो चाँदी के राम टके संग्राहलयों में उपलब्ध हैं फाउंडेशन फॉर क्रिएटिविटी एंड कम्युनिकेशन की ओर से जनहित में जारी| Creativityfoundation2014@gmail.com'

राहुल गांधी यदि पैदल -पैदल....

 राहुल गांधी यदि पैदल -पैदल मानसरोवर पहुँच जाएं, लौटकर पैदल ही चार धाम,52 शक्ति पीठ नाप लें और वापिस आकर कांग्रेस की ऑल इंडिया कान्फ्रेंस में घोषणा कर दें कि मैं प्रधानमंत्री पद के लिए नही व्यवस्था परिवर्तन के लिये कांग्रेस का नेतृत्व करूंगा, तो उनकी लोकप्रियता में चार चांद लग जाएंगे! #राहुल गांधी

नाई को बालों की कटिंग करते देख बंदर ने उस्तरा उठा लिया #अखिलेश साइकल यात्रा करेगा ...

गांधी जी ने सूटबूट त्याग कर धोती क्यों धारण की?

 नई पीढ़ी के बहुत से युवाओं को शायद नही मालूम कि गांधी जी ने सूटबूट त्याग कर धोती क्यों धारण की?

विलायत से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे गांधी के सूटबूट उतार फेंकने, धोती धारण करने और महात्मा बनने की यात्रा काफी लंबी है। इसे न समझने वाले लोग भारत के बारे में कुछ भी नहीं जानते। गांधी के निर्वस्त्र होने का मजाक उड़ाने का मतलब भारत के भीषण संघर्ष, गरीबी और गुलामी से जूझते करोड़ों लोगों का मजाक उड़ाना है।
विंस्टन चर्चिल गांधी को 'अधनंगा फ़क़ीर' कहकर मजाक उड़ाता था तो उसके पास वजह थी। जिस आंदोलन की वजह से ब्रिटेन का साम्राज्य ढह रहा था, उसका मजाक वे उड़ा सकते थे। लेकिन आज़ादी के सत्तर साल बाद भी देश की सत्ता में बैठकर हृदय नारायण दीक्षित जैसे लोग या दूसरे गांधी के बारे में अनाप-शनाप क्यों बकते हैं?
चंपारण में नील की खेती करने के लिए अंग्रेज किसानों पर अत्याचार करते थे. गांधी यहां आए तो लोगों ने उन्हें अंग्रेजी अत्याचार की अनंत गाथाएं सुनाईं. जब गांधी को बताया गया कि नील फैक्ट्रियों के मालिक कथित निचली जाति के औरतों और मर्दों को जूते नहीं पहनने देते तो उसी दिन से गांधी ने जूते पहनने बंद कर दिए.
8 नवंबर 1917 को सत्याग्रह का दूसरा चरण शुरू हुआ. उनके साथ गए लोगों में कस्तूरबा समेत छह महिलाएं भी थीं. यहां पर लड़कियों के लिए तीन स्कूल शुरू हुए. लोगों को बुनाई का काम सिखाया गया. कुंओं और नालियों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रशिक्षण दिया गया.
गांधी ने कस्तूरबा से कहा कि वे औरतों को हर रोज़़ नहाने और साफ-सुथरा रहने के बारे में समझाएं. कस्तूरबा जब औरतों को समझाने लगीं तो एक औरत ने कहा, "बा, आप मेरे घर की हालत देखिए. आपको कोई बक्सा या अलमारी दिखता है जो कपड़ों से भरा हुआ हो? मेरे पास केवल एक यही एक साड़ी है जो मैंने पहन रखी है. आप ही बताओ, मैं कैसे इसे साफ करूं और इसे साफ करने के बाद मैं क्या पहनूंगी? आप महात्मा जी से कहो कि मुझे दूसरी साड़ी दिलवा दे ताकि मैं हर रोज इसे धो सकूं."
यह बात सुनकर गांधी ने अपना चोगा बा को दिया कि उस औरत को दे आओ. इसके बाद से ही उन्होंने चोगा ओढ़ना बंद कर दिया.
1918 में गांधी अहमदाबाद में करखाना मज़दूरों की लड़ाई में शामिल हुए. वहां उन्होंने महसूस किया कि उनकी पगड़ी में जितने कपड़े लगते हैं, उसमें 'कम से कम चार लोगों का तन ढंका जा सकता है.' इसके बाद उन्होंने पगड़ी पहनना छोड़ दिया.
31 अगस्त, 1920 को खेड़ा सत्याग्रह के दौरान गांधी ने प्रण किया था कि "आज के बाद से मैं ज़िंदगी भर हाथ से बनाए हुए खादी के कपड़ों का इस्तेमाल करूंगा."
1921 में गांधी मद्रास से मदुरई जाती हुई ट्रेन में भीड़ से मुखातिब होते हुए. गांधी के शब्दों में ही, "उस भीड़ में बिना किसी अपवाद के हर कोई विदेशी कपड़ों में मौजूद था. मैंने उनसे खादी पहनने का आग्रह किया. उन्होंने सिर हिलाते हुए कहा कि हम इतने गरीब है कि खादी नहीं खरीद पाएंगे."
गांधी ने लिखा है, "मैंने इस तर्क के पीछे की सच्चाई को महसूस किया. मेरे पास बनियान, टोपी और नीचे तक धोती थी. ये पहनावा अधूरी सच्चाई बयां करती थी जहां लाखों लोग निर्वस्त्र रहने के लिए मजबूर थे. चार इंच की लंगोट के लिए जद्दोजहद करने वाले लोगों की नंगी पिंडलियां कठोर सच्चाई बयां कर रही थीं. मैं उन्हें क्या जवाब दे सकता था जब तक कि मैं ख़ुद उनकी पंक्ति में आकर नहीं खड़ा हो सकता हूं तो. मदुरई में हुई सभा के बाद अगली सुबह से कपड़े छोड़कर मैंने ख़ुद को उनके साथ खड़ा किया."
चंपारण सत्याग्रह से अपने वस्त्रों पर खर्च कम करने का यह प्रयोग करीब चार साल तक चला और अंतत: गांधी गांव के उस अंतिम आदमी की तरह रहने लगे जिसके तन पर सिर्फ एक धोती रहती थी.
गांधी गरीब जनता का नेता था. गांधी का निर्वस्त्र शरीर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए हो रहे सत्याग्रह का प्रतीक बन गया, क्योंकि देश का शरीर भी निर्वस्त्र था.
खादी इन गरीबों का निर्वस्त्र शरीर ढंकने के लिए थी, जिसे जनता खुद बना सकती थी. चरखा लोगों के लिए अपना कपड़ा और अपनी रोटी का इंतजाम करने के लिए रोजगार का साधन था. चरखा गरीबी से लड़ने का एक हथियार था. चरखा और खादी स्वावलंबन का हथियार था, यह बात समझना क्या कठिन है?
जो लोग महंगे वस्त्र धारण किये नेताओ को देखते है तब धोती पहने लाठी लिए एक अधनंगा फकीर आपको मजाक का विषय लगेगा ही.
ऐसा तब होता है जब आपको अपनी जड़ों से उखाड़ दिया जाए. मेरी उम्र करीब तीन दशक की है और मैंने इसी सदी में अपने गांव के बुजुर्गों को गांधी की तरह एक धोती में देखा है. मुझे तो गांधी अपने बाबाओं और दादाओं की तरह लगते हैं. गांधी पर हंसने वाले अहमक किस ग्रह से आन कर लाए गए हैं?
गांधी के निर्वस्त्र रहने, चरखा चलाने और खादी पहनने का मजाक उड़ाने का अर्थ है आजादी के लिए संघर्ष कर रही करोड़ों भूखे और अधनंगे लोगों का अपमान करना. क्या हमारी पीढ़ी को अपने पुरखों को अपमानित करने की नीचता में फंसाया जा रहा है?
गांधी निर्वस्त्र हुए क्योंकि हमारा लुटा हुआ देश भूखा और नंगा था। इसीलिए उस बैरिस्टर ने जब अपने आधुनिक लिबास उतार दिए और मात्र एक धोती धारण की तो उस जमाने का हर आदमी उसका मुरीद हो गया। गांधी के महात्मा बनने की यात्रा एक अंतर्यात्रा है। इस अंतर्यात्रा ने गांधी के अंतर्मन को जनता के सामने रख दिया। जनता नतमस्तक हो गई। दुनिया में हम सब सामान्य आत्माएं हैं तो वह महात्मा था, क्योंकि वह असाधारण था।
जनता ने गांधी का नेतृत्व स्वीकार किया तो गांधी ने अपने दो पूंजीपतियों के हाथ देश बेचने का अभियान नहीं चलाया, बल्कि भारत को आज़ाद और आत्मनिर्भर बनाने का उपाय खोजा।
गांधी की अगुआई में अंग्रेजों से हुकूमत छिनी तो स्वदेशी सरकार बनी। लेकिन कट्टरपंथियों ने गांधी की हत्या कर दी। सावरकर और उसका चेला गोडसे दोनों पकड़े गए। सावरकर सबूत के अभाव में छूट गए। पटेल के शब्दों में, "आरएसएस ने ही वह उन्मादी माहौल तैयार किया जिसमें गांधी की हत्या संभव हो सकी।"
बीसवीं सदी की सबसे महान हस्तियों ने गांधी को महापुरुष माना और अब यह दुनिया में स्थापित इतिहास है। जुगनुओं के छटपटाने से चंद्रमा की चांदनी मद्धिम नहीं होती।
नफरती गिरोह के फेर में मत फंसिए। हमें पढ़ने वाले साथियों से हमारी अपील है कि आप अपने बच्चों को गांधी के बारे में बताएं। भगत सिंह जैसे शहीदों के बारे में बताएं। भूखे भारत के उत्कट संघर्षों के बारे में बताएं और इस गिरोह से अपने बच्चों को बचाएं।
महात्मा गांधी के बिना आधुनिक भारत का कोई इतिहास नहीं लिखा जा सकता और न कोई भविष्य हो सकता है। महात्मा गांधी!
साभार :- Damanjeet Singh Ahluwalia
May be an image of 4 people, people standing and outdoors
Insights unavailable for this post
Laxmikant Chaturvedi, G.s. Rawal and 22 others
2 Comments