गुरुवार, 31 मार्च 2011

क्रिकेट उन्माद राष्ट्रवाद का निम्नतर सत्य है.

   महाभारत  के १८ दिवसीय युद्ध में शकुनि मामा की जो भूमिका थी और कृष्ण ने जो अरणि मन्थक का रोल अदा किया था इतिहास में कल ३० मार्च -२०११ को मोहाली भारत पाक क्रिकेट द्वन्द में क्रमशः इलेक्ट्रोनिक मीडिया और पोलिटिशियन ने अदा की है.फर्क सिर्फ इतना था कि शकुनि के हाथ में पांसे थे तो मीडिया के हाथ में माइक था.उधर कृष्ण के हाथ में रथ के घोड़ों कि रास थी तो हमारे मनमोहन के हाथ में द्विपक्षीय वार्ता कि डोर.
             बहर हाल 'खेल'याने क्रिकेट में भारत जीत गया और पाकिस्तान कि बडबोली टीम हारकर पाकिस्तान लौट गई.अब इतिहास ही तय करेगा कि द्विपक्षीय संबंधों को मित्रवत बनाने में इस क्रिकेट कूटनीति का कितना असर पड़ा.मीडिया ने जो पासे फैंके उसमें वास्तविक राष्ट्रवाद कितना था और भारतीय प्रधान मंत्री ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी को आमंत्रित कर कितना देश भक्तिपूर्ण कार्य किया?ये तमाम उदेश्य आगामी पीढ़ियों कि गवेषणा के हेतु सुरक्षित करते हुए मैं सिर्फ अपने नजरिये कि बात रखूँगा.
                                मैंने  स्वयं  भारत -पाकिस्तान मोहाली सेमीफ़ाइनल क्रिकेट मैच कि पूर्व संध्या पर अपने ब्लॉग पर क्रिकेटीय उन्माद को अंध राष्ट्रवाद से आप्लावित निरुपित किया था. जब भारतीय क्रिकेट टीम ने पाकिस्तानी टीम को २९ रनों से पराजित कर दिया और सचिन रमेश तेंदुलकर को 'मेन आफ मैच'दिया गया तो अपनी ख़ुशी को मैंने  भी सारे भारतीय जन-मानस से एकाकार किया.अब प्रश्न यह है कि यदि यह सिर्फ खेल भर था तो पाकिस्तानियों द्वारा सचिन को शतक न बनाने देने पर मैं नाखुश क्यों हुआ? और यदि यह राष्ट्रीय चेतना जैसा कुछ था तो भारतीय टीम के हार जाने कि स्थिति में मेरा राष्ट्रीय गौरव किस स्थिति में होता?और यह सवाल भारत बनाम श्रीलंका के बीच होने वाले फ़ाइनल मैच के लिए भी प्रासंगिक क्यों नहीं हो सकता?
        कुछ लोग कहा करते हैं कि ये क्रिकेट का खेल तो समय कि बर्बादी है.गुलामी कि निशानी है.सटोरियों ,बाजारियों द्वारा खाते पीते शहरियों को लूटने का सभ्रान्त स्तरीय खेल है. इन लोगों को मालूम हो कि आज़ाद हिन्दुस्तान में कभी कभार ही ऐंसा हुआ होगा कि पूरे  वतन -हर  जाति,हर मज़हब,हर प्रान्त और हर भाषा -भाषी- ने एक साथ ऐंसी ख़ुशी मनाई होगी जैसी कि ३० मार्च -२०११ कि  आधी रात को मनाई.शायद १५ अगस्त -१९४७ कि आधी रात को  भी इतनी एकता से हिंदुस्तान -जिन्दावाद के नारे नहीं लगे होंगे! क्योंकि यह सर्वविदित है कि तब तो भारतीय उपमहाद्वीप में कौमी वैमनस्यता और अविश्वाश का ज़हर फिजाओं में फैला हुआ था.आज़ादी के बाद जब -जब भी सड़कों पर जश्न मना है 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद'के नारे तो निश्चय ही तब ही सुनाई देते हैं जब भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान क्रिकेट टीम का मान मर्दन करती है.भारतीय सेनाओं ने और देशभक्त जनता ने अतीत में कई बार दुश्मनों से लोहा लिया है और जीते भी हैं,किन्तु १९७१ के बांगला देश उदय और पाकिस्तान पर मुक्तिवाह्नी कि फ़तेह के अलावा और कोई अवसर उल्लेखनीय नहीं कि जिसमें भारत कि जनता ने वैसा कोई "सम्पूर्ण जश्न"मनाया हो जैसा कि मोहाली में पाकिस्तान क्रिकेट टीम को परास्त करने पर भारत कि जनता ने मनाया.
        इस विजयोल्लास में कोई रंग ,रूप,आकार,समय,परिस्थति या शख़सियत आवश्यक नहीं.सबके मन में एक विचार,सबकी आस्था सबकी  तमन्ना ,सबकी मनोकामना "कमेव  द्वीतीयू नास्ति "जैसी हो जाती   है. ऐसा लगता है मनो देश-भक्ति का ठेका  सिर्फ क्रिकेट ने ही ले रखा है .स्वाधीनता दिवस  और गणतंत्र दिवस  पर अवकाश होने के बावजूद लोग तिरंगा फहराने  के लिए नियत सार्वजानिक स्थलों तक जाने से बचते  हैं. लेकिन क्रिकेट के उन्माद ने राष्ट्रवाद कि महीन  डोर को थाम रखा  है.यदि लोग भारत पाकिस्तान मैत्री के प्रतीक चिन्ह  भारत के मोहाली में मित्र  का आव्हान  करते हैं तो पाकिस्तान कि अमन पसंद अवाम  को भी चाहिए  कि भारत कि जनता को अपना सहोदर मानकर  न केवल क्रिकेट का बल्कि ज़िन्दगी  के हर खुशनुमा लम्हे  का आनंद लेकर जिए.
       भारत कि आवाम भी यह स्मरण रखे कि क्रिकेट में जीत ही राष्ट्रवाद कि चेतना का करक नहीं. वह  सिर्फ उत्प्रेरक  भर हो सकती  है.                                      _श्रीराम तिवारी       
             

मंगलवार, 29 मार्च 2011

क्रिकेट के बहाने भारत पाकिस्तान में अंध-राष्ट्रवाद परवान चढ़ रहा है,,,,,,,,

      कल ३० मार्च को  भारत और पकिस्तान का सेमीफ़ाइनल क्रिकेट मैच  मोहाली में खेला जाने वाला है. दोनों देशों की सरकारें,आम-जनता,क्रिकेट टीमें,समग्र मीडिया,सटोरिये और क्रिकेट से बावस्ता तमाम स्टेक-होल्डर्स की आज की रात बड़ी बेचेनी से गुजरने वाली है.हालाँकि यह कोई नया वाकया नहीं है,यह कोई अनहोनी भी नहीं है.पहले भी भारत-पकिस्तान कई बार इस दौर से गुजर चुके हैं.
         दोनों मुल्कों के क्रिकेट प्रेमी अपने -अपने{यदि इश्वर एक नहीं है तो} उपास्य देवताओं से मिन्नतें और प्रार्थना कर रहें हैं, मैं  भी तहे दिल से चाहता हूँ की इंडिया ही जीते.यह न केवल मेरी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए बल्कि दोनों मुल्कों की आवाम के हित में और क्रिकेट के हित होगा.
          कल भारतीय क्रिकेट टीम जीती तो क्या होगा?और यदि पाकिस्तान टीम जीती तो क्या होगा?
मैं  क्यों चाहता हूँ की भारत ही जीते? क्योंकि फ़ाइनल मुंबई में होने जा रहा है.मुंबई में विगत ४५ साल से वही होता है जो ठाकरे परिवार और शिवसेना चाहती है.यदि बाई चांस पाकिस्तान जीतता है तो भारत फ़ाइनल खेलने से तो वंचित  होगा ही बल्कि पाकिस्तानी टीम मुंबई में फ़ाइनल के लिए अस्वीकार्य जैसी होकर रह जाएगी. उस सूरत में गेंती-फावड़े लेकर शिव सैनिक  तैयार खड़े हैं.हर किस्म की विकेट मिनटों में खोदने की प्रेक्टिस उन्हें है.मुंबई को ठुप्प करना उनका बाएं हाथ का खेल है ही. पाकिस्तानी क्रिकेट टीम यदि फ़ाइनल में पहुँचती है तो यह भारतीय क्रिकेट टीम की हार होगी न की भारत की. किन्तु शिवसेना ने और अंध-राष्ट्रवादी मीडिया ने क्रिकेट के खेल को राष्ट्रों की जंग बना डाला है ,अतएव वे क्रिकेट टीम की हार को देश की हार निरुपित करते हैं.हालाँकि यह शुरुआत पाकिस्तान से ही हुई थी ,किन्तु अब ये हालत है की पाकिस्तान की कबड्डी टीम भी मातोश्री के अगल-बगल जीत कर चली जाये तो फर्क पड़ता है.अतः पाकिस्तान  की हार में ही सबकी भलाई है.यदि विश्वकप  आयोजन शांतिपूर्वक और ससम्मान होते देखने की तमन्ना है तो आइये दुआ करें की भारतीय क्रिकेट टीम को मोहाली के मैदान मैं विजय श्री अवश्य मिले.
     भारतीय और पाकिस्तानी  खिलाड़ी बेहद दबाव  में यह रात गुजारेंगे.कल दोनों टीमें अपने सर्वोच्च शक्ति और कौशल का प्रदर्शन करेंगे ही,जो क्रिकेट में वास्तविक दिलचस्पी रखते हैं उनसे निवेदन है कि क्रिकेट कि हार-जीत पर देश कि आन-बान-शान को दाव पर न लगाकर केवल और केवल विशुद्ध क्रिकेट का आनंद लें. पाकिस्तान  कि आवाम को भी यही पैगाम हमारा है कि जीतें तो इतरायें न और हारें तो खाजवायें न. खेल को दोनों देशों के बीच मैत्री और भाईचारे का माध्यम बनाकर दोनों टीमों को क्रिकेट खेलने दें उनसे जंग कि आरजू न करें.                                       _ श्रीराम तिवारी

सोमवार, 28 मार्च 2011

दक्षिण में हिन्दी अब पराई नहीं...

     जिस दिन उत्तर-भारत में रंगपंचमी का धूम धड़ाका हो रहा था  उसी दिन मैं चेन्नई के प्रख्यात आर जी एम् सांस्कृतिक सभागार में शाम को एक अत्यंत गरिमामय सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहा था. अधिकांश  कार्यक्रम टीन एजर्स लड़कियों ने प्रस्तुत किये .संचालन प्रोफ़ेसर मिस चंद्रा ने किया सभी टोलियाँ बारी-बारी से अपने नृत्य ,संगीत ,शस्त्र- कौशल तथा गायन वादन कार्यक्रम प्रस्तुत कर प्रशंसा बटोरते जा रहे थे. जहां तक भाषा और माध्यम का प्रश्न है तो यह स्वाभाविक ही था कि ९९%तमिल और १%इंग्लिश का प्रयोग हो रहा था. मुझे और मेरे अलावा उत्तर भारत के विभिन्न शहरों से पहुंचे हिंदी भाषी श्रोता और दर्शकों को सिर्फ दृश्य और पश्य का सहारा था. कार्यक्रम के अंत में संचालिका ने पहले तमिल में और बाद में इंग्लिश में दर्शकों से कोई कविता सुनाने का आग्रह किया. मुझसे रहा न गया और झपटकर माइक लपका और दनादन अपनी सद्यप्रकाशित 'वसंत ऋतू ' कविता कि चार पंक्तियाँ सस्वर सुना डालीं. जब मैं कविता सुना चूका तो मानों सुई पटक सन्नाटा छा गया. कुछ क्षणों बाद सामूहिक करतल ध्वनि से मुझे सम्मान नवाजा गया.
       इसके बाद संचालिका ने एक  अपनी टीम को वापिस मंच पर बुलाया और जब संगीत कि स्वर लहरियों ने उस  सुहानी शाम को गुंजायमान  किया तो कई लोग मंच पर थिरकने लगे -गीत के बोल थे ...केशरिया बालम पधारो जी म्हारे देश ...इसके बाद तो जैसे झिझक टूटी और फिर पंजाबी वैशाखी का नृत्य, असमी बिहू नृत्य और ब्रिज बरसाने के होली नृत्य गीत ने मुझे अचम्भे में डाल दिया .इसमें कोई शक नहीं कि गीत आडिओ केसेट के माध्यम से ध्वनित हो रहे थे किन्तु बॉडी लेंगुवज और अंग-सञ्चालन से बेहतर ताल मिलकर प्रस्तुती देने वाली लड़कियां ने बाद में समवेत स्वर में- होली आई रे कन्हाई .....गा कर सुखद विस्मय में डाल दिया.
  बाद में जिज्ञाषा-वश जब आयोजकों से भाषा के बारे में और खासतौर से तमिल और हिंदी के रिश्तों के बारे में पूँछतांछ कि तो मुझे जो बताया गया उससे अभिभूत हुए बिना नहीं रहा. बजाय मेरे सवालों के जबाब देने के एक कन्नड़ मूल के तमिलभाषी ने मुझसे पूंछा कि मुझे कितनी भाषाएँ आतीं हैं? मैंने   कहा कि आधी हिंदी ,आधी संस्कृत और आधी इंग्लिश कुल जमा डेड  भाषा का माद्दा,प्रतिप्र्श्नकर्ता  महोदय ने बताया कि वे एल आई सी के सेवानिवृत डायरक्टर  हैं और हिंदी ,इंग्लिश ,फ्रेंच, बंगला, मराठी ,तमिल,मलयालम तो भरपूर आती है और कन्नड़ उनकी मातृभाषा है .उन्होंने ये भी बताया कि हिंदी का विरोध एक राजनैतिक चालबाजी मात्र थी.
मैंने  पुनः जिज्ञाषा व्यक्त की-  १९९१ में तत्कालीन मद्रास और पूरे तमिलनाडु में जहाँ कहीं भी मैं गया, हर केन्द्रीय कार्यालय और रेलवे स्टेशन पर हिंदी के शब्दों पर कालिख पुती रहती थी अब तो हर जगह -सरकारी बैंक ,बीमा ,बी एस एन एल ,केन्द्रीय और सार्वजानिक उपक्रमों के बाहर तीन भाषाओँ-तमिल ,हिंदी, इंग्लिश  में नाम पट्टिका चमक रही है. यह कैसे सम्भव हुआ?
      मुझे बताया गया कि वक्त कि मांग, ज़माने कि रफ़्तार और गठबंधन कि राजनीत ने सभी को लचीला बना दिया है. अब कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय-दल भाषा और धरम के नाम पर जनता को मूर्ख बनाकर शासन  नहीं कर सकता. अब संभल कर चलना पड़ता है ,पता नहीं किस मोड़ पर किसकी जरुरत आन पड़े. इसीलिये कट्टर तमिल या द्रविण-वादी आजकल अपने बच्चों को चोरी छिपे हिंदी सिखा रहे हैं कि कल को यदि अखिल-भारतीय सेवाओं में जाना हो,गठ्बंधानीय राजनीती करनी  पड़े या बोलीवुड में कोई चांस मिले तो बिना हिंदी कोई किनारा नहीं,अतः न  केवल चेन्नई ,न केवल तमिलनाडु बल्कि समूचे दक्षिण भारत में स्वतःस्फूर्त रूप से हिंदी सीखी जा रही है. सरकार के हिंदी अधिकारी और राजभाषा समितियां इत्यादि सब चोंचले भर रह गए हैं.अत्यंत सोचनीय तो यह है कि उत्तर-भारतीय जनता को दक्षिण कि भाषाओँ तक ले जाने का कोई उपक्रम न तो सरकार का है और न एन जी ओ का है. देश कि एकता और अखंडता के लिए सामाजिक -सांस्कृतिक समन्वय के लिए उत्तर-भारतीयों को दक्षिण  कि भाषाओँ में भी दिलचस्पी लेनी चाहिए.
          श्रीराम तिवारी

चेन्नई केंद्रीय कार्यसमिति ने केरल सरकार को बधाई दी....

   दिनांक २२ मार्च से २५ मार्च तक चेन्नई के राजीव गाँधी मेमोरिअल सी टी टी सी में संपन्न मान्यता प्राप्त संघ की केन्द्रीय कार्य समिति बैठक में निम्नांकित प्रस्ताव पारित किये गए ...
       एक- तमाम पूंजीवादी आक्रमणों के वावजूद पी एसयु  को बचाया जा सकता है.इसके लिए दो ही रास्ते हैं  अ-प्रतिगामी नीतियों के खिलाफ जनांदोलन खड़ा किया जाये जिसका नेत्रत्व कर्मचारियों को करना चाहिए . बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के मद्देनज़र उसकी मांग के अनुसार उत्पादनों का और मानव संसाधनों का युक्तियुक्तकरण किया जाये.
दो- केन्द्रीय सार्वजनिक उद्द्य्मों में जो बीमार या घाटे में हैं वे यह आशा नहीं करते की जो सरकार अकेले टेलीकाम सेक्टर में ही एकअदद टू-जी स्पेक्ट्रम के लिए १  लाख ७६ हजार करोड़ का घपला चुप चाप पचा सकने की क्षमता के वावजूद निजी  कारपोरेट क्षेत्र को स्वान टेलिकॉम या कलिग्नार टी वी की तर्ज पर वेळआउट पैकेज दे सकती है, यह सब चलता  रहता  यदि बड़ी अदालत  ने करारी  चोट  न  की होती  , वो विश्व बैंक या इंटर नेशनल मोनिटरी फंड के  घोषित दिशा निर्देशों की अवग्याँ कैसे कर सकती है? अर्थात अपने ही सार्वजनिक उपक्रमों को लूटने की खुली छूट देंने से इनकार कैसे कर सकती है? चूँकि यहाँ संगठित कर्मचारी अधिकारी संघर्ष के लिएमैदान में  हैं सो इन सार्वजनिक उपक्रमों को ओउने -पोने दाम पर बाजार में ठीकरे के भाव बेचने और निजी क्षेत्र को अबाध मुनाफा कमाने की छूट देने के वावजूद सरकार की किरकिरी हो रही है.की अब तक २५० पी एस यूज भारत की जनता के कल्याण हेतु न केवल जिन्दा हैं बल्कि -एल आई सी ,एस बी आई बी एस एन एल एवं ओ एन जी सी जैसे महारत्न तो अभी भी शक्तिशाली मुद्रा में निजी क्षेत्र को चुनौती बने हुए हैं.कर्मचारियों को सी ई सी चेन्नई का सन्देश है ' करो या मरो' का नारा नहीं चलेगा अब तो 'हर हल में सिर्फ जीतना ही अंतिम विकल्प बचा है.
    हालांकि मजदूर वर्ग कि कतारों में भी 'सरेंडर करो ...मैदान छोडो ...जो मिले सो ले लो ...या न मिले तो किस्मत को..कोसो .जैसे विचार तेजी से संक्रमित हो रहे हैं......किन्तु ये  विचार सिर्फ एग्जीक्यूटिव  तक   ही  सीमित नहीं बल्कि ग्रुप सी और डी में भी इसकी धमक पहुँच चुकी है.
    चेन्नई सी ई सी का आह्वान है कि 'हम लड़ेंगे ...जब लड़ेंगे तो जीतने कि भी सम्भावनाएं रहेंगी . नहीं लड़ने और सरेंडर होना श्रमिक वर्ग के खाते में नहीं लिखा .
तीन- अब आर्थिक मांगो-पेंशन,वेतन पुनरीक्षण,मेडिकल या एल टी टी सी को बढवाने कि मांग उठा पाना संभव नहीं,क्योकि यह एक वास्तविकता है कि देश का निजी क्षेत्र ,आउट सोर्सिंग और ठेका सिस्टम बेहद कम मूल्य पर श्रम  को बाज़ार में खरीदकर सरकार का तथाकथित सर दर्द कम कर रहा है कि पेंशन ,भत्ते या बोनस कि देनदारियों से मुक्ति  दिलाने में निजी क्षेत्र के सहयोग का सरकार कि ओर से शुक्रिया.
    चेन्नई सी ई सी ने निजी क्षेत्र के  और ठेका मजदूरों को लामबंद कर उनके बाजिब हितों कि लड़ाई के लिए अपनी ओर से मुक्म्म्बिल सहयोग का आह्वान किया है. वास्तव में यह कोई यह्सान नहीं है यह तो संगठित क्षेत्र पर आने वाली सुनामी से बचाव कि महज एक मशक्कत भर है.
यह थोड़े से साहस और संघर्ष कि बात नहीं बल्कि चट्टानी एकता और अनवरत संघर्ष से ही संभव है कि संगठित क्षेत्र के मजदूर -कर्मचारी और एग्जिक्यूटिव अपने वेतन भत्ते और पेंशनरी वेनिफिट्स सुरक्षित रखने में तभी कामयाब हो सकते हैं जबकि वे निजी क्षेत्र में हो रही श्रम कि लूट का जनता के बीच खुलासा करें और निजी क्षेत्र के कामगारों को एकजुट संघर्ष के लिए प्रेरित करें. .
 चार- एन ऍफ़ टी ई,  एस एन टी टी ऐ ,ऍफ़ एन टी ओ और मेनेजमेंट कि मिलीभगत ने यु पि ऐ सरकार की टेलिकाम पालिसी का समर्थन किया था और बी एस एन एल ई यु ,जो कि प्रतिगामी नीतियों कि घोर मुखालफत करती रही ,उसे मान्यता से महरूम किये जाने कि भरपूर कोशिश कि किन्तु सभी को मुंह कि खनी पडी .सी ई सी का आह्वान है कि आगामी संघर्षों में हमारा साथ देवें.
  पांच- सभी पी एस यूज में और खास तौर से सिक इंडस्ट्रीज में न केवल श्रमिक वर्ग का अपितु स्टेक होल्डर्स कि भी भागीदारी हो वैचारिक आधार पर मजदूर कर्मचारी संगठनों से जुड़ें  ताकि उनप्रतिगामीनीतियोंको बदलाजा सके जिनसे राष्ट्र के आधुनिक मंदिरों के ध्वंस का खतरा है. भारत संचार निगम में इसकी पहल हो चुकी है. 
     छे- वी आर एस और आउट सोर्सिंग कि नीति का पुरजोर विरोध किया जायेगा. जनता के उपक्रमों को मेनेजमेंट और राजनीतिज्ञों का चारागाह मात्र नहीं बनाए दिया जायेगा. जन भागीदारी और उत्तरदायित्व का अनुशासन  कायम किया जायेगा.
      
                         इसके अलावा वित्तीय जीवन्तता के लिए पी एस यूज को बचाने में स्टील इंडिया ,कोल इंडिया ,सीटू तथा केरल सरकार ने जो राह दिखाई है उससे से सबक सीखने का संकल्प लिया गया.यह सुखद अनुभूति है कि जिन राजकीय सार्वजनिक उपक्रमों को पहले कि एन डी ऐ ,यु पीए और केरल कि यु डी ऍफ़ सरकारें लगभग मृत घोषित कर चुकीं थीं,केरल के  वे अधिकांश {लगभग ४२]पी एस यूज आज मुनाफे में चलने लगे हैं,निस्संदेह  इसका श्रेय सीटू और केरल कि वाम मोर्चा सरकार को जाता है.
           बी एस एन एल ई यु के महासचिव  काम. पी अभिमन्यु ,ए आई आई इ ऐ के महासचिव काम .अमानुल्लाह खान जे ऐ सी कन्वीनर वी ऐ एन नम्बूदिरी तथा टॉप लेवल अधिकारियों/सी ई ई सी मेम्बरों की उपस्थिति में गगनभेदी नारों के साथ यह केन्द्रीय कार्य कारिणी बैठक सम्पन्न हुई.
 यूनियन सत्यापन पर चर्चा हुई कहा गया- विजय का जश्न मनाइए.आपको जो कम वोटों से जीत हुई वो चिंता का कारन नहीं है.लगातार चौथी बार जीतना फक्र की बात है ,जीत -जीत है चाहे कम वोट हों या ज्यादा.हमने बैंक एल आई सी से और अन्य पी एस यूज से ज्यादा वेतन बढ़वाया,हमने प्रमोसन पालिसी लागु कराया,इसी आधार पर जब हमने चुनाव पूर्व के आकलन में सभी सर्कल सेक्रेटरी से जानकारी ली तो १३६०००वोट मिलने की उम्मीद बताई गई थी.किन्तु कुछ परिस्थितियों के कारण -जिन पर  हमारा कोई जोर नहीं था कोई गलती भी हमारी नहीं थी -फिर भी हमें कम वोटों से जीत मिली और १०६००० वोट पाकर हम प्रथम रहे.
   एस एन टी टी ऐ ने अपने आपको जिन्दा रखने के लिए यह बचकाना कदम उठाया और एन ऍफ़ टी ई को सपोर्ट किया. उनका कहना है की मेनेजमेंट ने अंदाज लगाया था की यदि स न टी टी ए ने एन ऍफ़ टी ई को वोट किया तो बी एस एन एल ई यु हार जायेगी. किन्तु मजदूरों के भाग्य से और दलालों के दुर्भाग्य से एन ऍफ़ टी ई हार गई ,जबकि एस एन टी टी ऐ ने जी जान से ताकत लगाईं थी क्योंकि वे यह सावित करना चाहते थे की एस एन टी टी ऐ जहां होगा विजय श्री वहां होगी .ऍफ़ एन टी ओ की तरह इनका भी भ्रम टूट गया और लगातार अकेले दम पर बी एस एन एल ई यु जीत गया.
        कुछ नकारात्मक बिन्दुओं की ओर भी ध्यानाकर्षण किया गया.इसमें सबसे बड़ी बात थी मेनेजमेंट का आशीर्वाद प्राप्त करने वाले तत्वं द्वारा दुष्प्रचार.हमारे कुछ साथी भी सजग नहीं रहे या अपनी बात ठीक से नहीं रख पाए.लगातार दो दो हड़तालों का पैसा कटना और यूनियन फंड में ६०० रुपया लेना भी निम्न सोच के कर्मचारियों को हमसे दूर रखने में काम आया.इस मानसिकता को दुष्प्रचार की आग ने हवा दी और हम १०६००० पर आ गिरे. फिर भी जीत तो जीत है.
      चर्चिल से तो ठीक ही रहे.द्वितीय विश्व युद्ध में स्टालिन और चर्चिल दोनों ने शानदार काम किया ,दोनों ने हिटलर को और फासिस्टों को हराया किन्तु इतिहास ने क्या न्याय किया?पूरे विश्व
 युद्ध के दौरान न केवल ब्रिटेन को बचाया बल्कि सारी दुनिया में फेले ब्रिटिश साम्राज्य को जिन्दा रखा.किन्तु १९४५ में विश्व युद्ध की समाप्ति पर जब ब्रिटेन में आम चुनाव हुए तो जनता ने चर्चिल को नकार दिया और उनकी कंजर्वेटिव टोरियन पार्टी सत्ता से पहली बार विमुख हुई.लेबर पार्टी के एटली जीत गए.इसी तरह जिस स्टालिन ने सोवियत यूनियन का शानदार नेत्रत्व करते हुए हिटलर को पराजित करने में योगदान किया उसे न केवल सोवियत संघ की भावी पीढीयों ने बल्कि विश्व के माध्यम मार्गी वामपंथियों ने भी विस्मृत कर दिया.
   अतः बी एस एन एल ई यु की लगातार चौथी जीत को हम बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.हम जीते हैं ,हमारी जीत शानदार है या नहीं यह उनसे पूंछो जो हारे हैं.
     यदि हम बी एस एन एल को बचाना चाहें तो अवश्य बचा पाएंगे ,यदि हमारी आत्मा मर चुकी है या हम कायर हैं तो ही बी एस एन एल ख़त्म हो सकता है. जनता के बीच जाकर एल आई सी जैसा प्रोपेगंडा करना होगा कि सरकारी क्षेत्र कि दूर संचार कम्पनी के बेहतरीन उत्पाद और टेरिफ्स क्या हैं?बिना जन समर्थन के बी एस एन एल तो क्या कोई भी शाशक वर्ग  भी सत्ता में नहीं रह सकता.इस महीने कि २९ तारिख को जे ऐ सी में कोई आये तो ठीक वर्ना बी एस एन एल ई यु अकेले दम पर ही बी एस एन एल को बचने कि लड़ाई छेड़ देगी.
      इस चेन्नई केन्द्रीय कार्य कारिणी समिति ने निर्णय लिया है कि एल आई सी कि तरह हम भी बिना मान्यता के कैसे लड़ें इस हेतु कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना होगा.इसके लिए ट्रेड यूनियन क्लास का भी निर्णय लिया गया.सी डी आर सिस्टम एक बहुत जरुरी और गतिशील आवश्यक सिस्टम है.आगामी तकनीकी बदलावों के लिए इसकी उपयोगिता असंदिग्ध है.सी एम् डी साब ने भी माना है कि प्रचालन और संधारण के कार्यों में वित्तीय कठिनाई आड़े नहीं आयेगी.
      श्रीराम तिवारी ..आल इंडिया संगठन सचिव -बी एस एन एल ई यु
        

रविवार, 27 मार्च 2011

पेंशन फंड संशोधन विधेयक पर यू पीए ओर भाजपा की नूरा कुश्ती ...

 विगत २४-२५ मार्च को लोकसभा में यु पी ए सरकर की ओर से पेंशन-संशोधन बिल   प्रस्तुत किया गया, इस बिल के विरोध में कुल ४६ मत पड़े और भाजपा ने बहिर्गमन किया ,इस प्रकार भाजपा ने २८-जुलाई २००८ वाला  रास्ता ही अपनाया याने कांग्रेस यदि आर्थिक नीतियों को अमेरिकी जामा पहनाने में नौ कदम चलती है तो भाजपा दस कदम चलकर न केवल अमेरिकी पूंजीपतियों बल्कि भारतीय नव-धनाड्यों को पुरजोर अपील करती है की ...'में हूँ ना' ....
       यह सब इस आलेख में दुहराना जरुरी नहीं की पेंशन संशोधन विधेयक के निहतार्थ क्या हैं? सरकार इस भारी-भरकम रकम को जो की देश के मेहनतकशों की गाढे पसीने की कमाई है ; को म्युचुअल फंड में लगाने को यु पी ऐ प्रथम के दौर से ही लालायित है किन्तु तब वामपंथ के बाहरी समर्थन को पाने के लिए' 'कामन मिनिमम प्रोग्राम' के तहत ही यह मजबूरी रही थी की पेंशन फंड से छेड़-छाड़ नहीं की जाये, जब सारे  जहां ने इस अनैतिक  कर्म को जान ही लिया है तो अब लाज के घूंघट की जरुरत कहाँ? जिन ४६ सांसदों [वामपंथी]ने पेंशन फंड बचाने के लिए जबरदस्त पहल की और सरकार के सामने घुटने टेकने या बिकने से इनकार किया उन क्रांतिकारियों को लाल सलाम ..
     जिस यु पी ऐ सरकार ने इस फंड को दांव पर लगाया है और जिन भाजपाइयों ने नूरा कुश्ती  की तर्ज पर यु पी ऐ द्वितीय को बार-बार बचाया है उन्हें भी देश का सचेत मजदूर और कर्मचारी आसानी से माफ़ नहीं करेगा.
      यह पहला प्रतिगामी कदम नहीं है. इससे से पहले भी अनेकों मौकों पर भारतीय मीडिया ने  चाहे भृष्टाचार का सवाल हो,२-जी स्पेक्ट्रम या कामनवेल्थ -आदर्श सोसिअटी,या विदेशी बेंकों में जमा काले धन का सवाल हो,हर बार भाजपा को घोर विरोधी  और नैतिकतावादी दिखाया  है किन्तु स्वयम भाजपा के अन्दर जो ७० %कांग्रेसवाद घुसा हुआ है वो मूल कांग्रेस को बचाने के लिए सामने आ जाता है. यह सिर्फ आनुषांगिक भाजपा में ही नहीं बल्कि संघ-परिवार के शीर्षस्थ पांच-पांडवों में भी जी एम् वैद्य जैसों की वैचारिक आस्था के केंद्र में मौजूद है.
           श्रीराम तिवारी

शनिवार, 19 मार्च 2011

फागुन के दिन चार होली खेल मणा रे .......

     ब्लोगिंग  की दुनिया के तमाम सुधिजनो को होलिकोत्सव  की शुभकामनायें...

     मित्रो ,मैं होली नहीं खेलता ,बचपन  से ही पढ़ाकू ,एकांगी ,लजालू और दुनिया भर की चिंताओं का भार- वहन करने वाला 
मैं अकिंचन बहुधा भरी पूरी भीड़ में सदा अकेला ही रहा हूँ. होली खेलने और मनाने में आनंदित होने वालों  की ओर देखता हूँ तो सदा ही मुंह  बिचका कर अपने कमरे में कैद  होकर होली के त्यौहार मनाने और उसको ईजाद करने वालों को मन ही मन कोसता हूँ .होली में आनंदित होने वाले कहते हैं कि इसका श्री गणेश बरसाने या मथुरा से हुआ था .कृष्ण ने गोपियों {बहुवचन}के साथ खूब रास रचाया और खूब होली खेली . हिन्दू समाज में जितने लुच्चे-लफंगे हैं, अमर्यादित आचरण की जानिब के शख्स हैं वे अपने कदाचरण को जस्टीफाई करने के लिए कृष्ण, राधा और ब्रिज की सनातन परम्पराओं  की आड़ लेते रहे  हैं .
           आज घर गली  में दो-दो होलिकाएं जल रहीं  हैं लाखों वृक्ष कटे जाते हैं ,चारों और असमान  में धुल-धुआं  और केमिकल रंगों  की जहरीली घटाएँ छायीं  हैं. यह किस ख़ुशी  में किया जा  रहा है.  क्या जापान  में हो रहे जलजलों  से हम जरा भी आहत नहीं? क्या भारत  में इस साल सूखा  ,पाला और भुखमरी  से आत्महत्या  करने वाले किसानों की मौत  पर हम रंग  गुलाल अबीर  का छिडकाव नहीं कर रहे ?
          वैसे  तो सभी त्यौहार विकृत हो चुके  हैं किन्तु होलिका दहन  या होलिकोत्सव तो नितांत अमानवीय और धरा-द्रोही  हो चुका है. कोई किसी के चेहरे को कला कर दे  या लाल, उतना तो फिर भी  ठीक किन्तु  करोड़ों गैलन  पानी सड़कों  पर, नालियों में बहा देना  कौनसी सभ्यता है. जंगल, जमीन, पेड़ और असमान सब  चीख रहे  हैं की हे मानवों  {दानवों}दया करो अब तो, धरती  को बक्श दो. इससे अछि तो मीराबाई थी की अपने प्रियतम  {कृष्ण} से सूफिया प्रेम की फाग  खेलने को  भक्तिराग   के रंग में गति है-
    फागुन के दिन चार  ...होली  ..खेल मना  रे....
                                                                              -श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

यूरोपियन रेनेसां और फ्रांसीसी क्रांति से भारत ने क्या सीखा !

यूरोपियन रेनेसां और फ्रांसीसी क्रांति की मध्यावधि में यूरोपियन दर्शन-शास्त्रियों  द्वारा   एक सर्वमान्य, सर्वव्यापी सिद्धांत स्थापित किया जा चुका था कि "सामंतवाद के गर्भ से पूंजीवाद का जन्म होता है., और पूंजीवाद के गर्भ से साम्यवाद का उदय होगा" इसी दरम्यान भारतीय उपमहाद्वीप में भी प्रतिगामी एवं अधोगामी दोनों ही प्रकार के मिले-जुले सामाजिक- राजनैतिक -आर्थिक बदलावों का यूरोपियन रेनेसां जैसा ही कुछ कुछ  दृष्टिगोचर हुआ था.
                जहां फ्रांसीसी क्रांति और सोवियत अक्टूबर क्रांति  की लहरों  ने और उसकी  समस्थानिक आनुषांगिक तरंगों ने सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका ,अफ्रीका और अधिकांश  एशिया महाद्वीप की सनातन से दलित -शोषित -गुलाम रही आवाम को बन्धन-मुक्ति की राह दिखाई ,वहीं दूसरी ओर उसी दौरान अंग्रेज कौम और उसकी समर्थक भारतीय सामंतशाही ने  भारत की शोषित -पीड़ित   आवाम को दोहरी -तिहरी गुलामी की घातक बेड़ियों में जकड़ने का एतिहासिक घृणित  कुकृत्य किया है.
        दुनिया भर के आधुनिक पाश्चात्य दार्शनिकों कि आमराय है कि पूंजीवादी समाज व्यवस्था को सामंती -  राजसी पतनशील व्यवस्था   से बेहतर  होना, मानव समाज कि एतिहासिक मानवीय सकारात्मक छलांग  का आवश्यक परिणाम है. उनका यह निष्कर्ष भी है कि पूंजीवादी निजाम अपने तमाम भयावह विनाशकारी विकृत रूपों के बरक्स एक शानदार भूमिका में प्रगतशील हुआ करता है. कबीलाई समाज से सामंतशाही  संमाज में  स्थापित होने कि लम्बी प्रक्रिया का उल्लेख मैं नहीं करूंगा, क्योंकि एक तो यह दीर्घ कालीन सामाजिक -एतिहासिक संक्रमण कि विपथ गाथा है,दूसरी बात ये है कि यह परिवर्तन हर मुल्क में अपने -अपने मिज़ाज में दरपेश हुआ है. सेकड़ों पुस्तकों में यह विषय समेत पाना दुरूह लगता है.
                          यूरोपियन समाजों को वैज्ञानिक भौतिकवादी विकास  धारा ने जिस भी रूप में ढाला वह अपने पूर्ववर्ती अधम व्यवस्थाओं से बेहतरथा. भारत या पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अखंड हिन्दोस्तान  कि आवाम का वर्गीय स्वरूप बेहद जटिल और रूढ़ होने से यहाँ पूंजीवाद का जन्म भी 'उत्तरा के गर्भस्थ शिशु' परीक्षित जैसा ही हो पाया. भारत के समकालीन सामंतों कि अय्याशियों  ,बदमाशियों और निरंकुश्ताओं कि वजह से भारत का "जागृत" जन-गन तीन हिस्सों में विभाजित था. एक- जो सामंती दमन के प्रतिकार को भाग्य या किस्मत का या कर्मफल  का परिणाम मानकर "हरी इच्छा भावी बलवाना." से बंधे थे. दो-अपने आपको तत्कालीन व्यवस्था के अनुकूल बनाकर उस शोषण और दमन कि व्यवस्था के अंग बनकर उसी में नष्ट होने को अभिशप्त थे.तीन-राज्य सत्ता से बड़ी ईश्वरीय सत्ता कि परिकल्पना  कर ,अतीत कि पुरातन   गाथाओं के उदात्त चरित्रों को महाकाव्यों के मार्फ़त आम जनता कि भाषा प्रस्तुत करने वाले -महाकवि और भक्तिमार्गी संतजन.
    अतीत के काल्पनिक उज्जवल -धवल चरित्रों को अपने समकालिक बदमिजाज़ शासकों  के सामने  आदर्शरूप में प्रस्तुत करने कि एतिहासिक, साहित्यिक सृजनशीलताको किसी भी रूप में रूढ़ या पुरोगामी नहीं कहा जा सकता.कबीर  तुलसी ,सूरदास ,चेतन्य , केशव रहीम रैदास और मीरा इत्यादी के भक्ति साहित्य में मानवीय मूल्यों को पाने कि ललक साबित  करती है कि अधिकांश भक्तिकालीन साहित्य सृजन प्रगतिशील और मानवतावादी था. कुछ इनसे अलग किस्म के तत्व भी इस दौर में हुए जो अपने समकालिक सामंतों कि ठकुर सुहाती या  भडेती करने में लगे रहे. चंदवर दाई,विद्द्यापति ,कल्हण,जयदेव,जगनिक और बिहारी जैसे  भी थे जो स्वामीनिष्ठ भाव से काव्य सृजन में-कनक ,कामिनी और कंचन कि तलाश में लगे रहे.
                हालाँकि इस भक्ति का इश्वर ,अध्यात्म या दर्शन से कोई सरोकार नहीं था.यह प्रारंभ में दासत्व का कातरभाव मात्र था. यह दक्षिण भारत में जागृत महामानवों की जन-मानस को अनुपम देन थी कि वे अपने आपको सनातन दासत्व से मुक्त करें किन्तु परिवर्ती काल में कुछ धूर्तों ने इस भक्तिरूपी वेदनामूलक मलहम को मंदिरों में सीमिति कर दिया और वहां अकिंचनों ,अनिकेतों ,दासों तथा तथाकथित शूद्रों का प्रवेश निषेध कर दिया.इस प्रकार जो भक्तिमार्ग प्रारंभ में मानव कि चतुर्दिक मुक्ति का साधन था वो उत्तरकाल में शासक  वर्गों के खुशामदियों द्वारा शोषण का साधन बना दिया गया. यही वजह है कि रेनेसां और पुनर्जागरण जैसी सामाजिक क्रांतियों के बावजूद  भारत और दुनिया भर में पूंजीवादी क्रांतियों के उभार के बावजूद  भारत में ,पाकिस्तान में ,बंगला देश में और अफगानिस्तान तक में अधिकांश  समाज'खाप पंचायतों' जैसाहीहै. इसके खिलाफ कोईबाबा ,कोईसामाजिक कार्यकर्त्ता या स्वनामधन्य वुद्धिजीवी जुबान नहीं खोल रहा, सिर्फ भृष्टाचार कि दुग्दुगी बजाकर पूंजीवादी जामात कि लूट को बरकरार रखने में यथेष्ठ सहयोग किया जा रहा है.  यही काम आज के नवउदारवादी वैश्विक व्यापारिक दौर में भारत के  कुछ चतुर चालक 'बाबा'  लोग कर रहे हैं या  करने वाले हैं. 
                  जैसा कि  इस आलेख के प्रारंभ में भी मैंने  लिखा है कि पूंजीवाद कि एक मात्र अच्छाई है कि वह जातीयता के संकीर्ण बन्धनों को काट फैंकता है. भले ही वह विश्व युद्धों का जन्मदाता भी है ,किन्तु सामाजिक क्रांतियों का वह एतिहासिक अलमबरदार है. पूंजीवादी और उसके बाद साम्यवादी क्रांतियों ने पूर्वी यूरोप,सोवियत यूनियन  चीन,क्यूबा इत्यादि में तो जातिवाद  कभी का समाप्त हो चुका है ,यहाँ तक कि जो  साम्यवाद से  परहेज करनेवाले घोर पूंजीवादी राष्ट्र हैं उनमें भी जातीयता  का इतना वीभत्स रूप नहीं है ,जितना कि भारत में. भारत में अर्ध-पूंजीवादी एवं अर्ध-सामंती मिलावट ने अजीबोगरीब स्थिति निर्मित कर डाली है. यहाँ पूंजीवाद ने आर्थिक मोर्चे पर तो  गरीबों को और ज्यादा गरीब बनाकर रख छोड़ा है और पूंजीपतियों को करोड़ पति से अरब पति ,खरबपति बना दिया है .इतना ही नहीं इस अर्ध-पूंजीवादी निजाम ने एक और कमाल कर दिखाया कि जहां पहले  लगभग १०-१५ पूंजीपति थे इस देश में ,वहीं अब ६७  'त्रिलियानार्स' भारत को दुनिया भर में सुशोभित कर रहे हैं.शायद यह इसकी इन्तहा ही है कि भारत का एक पूंजीपति 'बैंक ऑफ़ अमेरिका ' के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर  में नामजद किया जा चुका है.हम मुकेश धीरुभाई अम्बानी को बधाई देते हैं किन्तु भारत के आमजनों कि आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर जो दुर्गति हो रही है उसमें इस उद्दाम पूंजीवाद ने भी बजाय सामाजिक बन्धनों को ढीला करने के, सारे देश {केरल बंगाल त्रिपुरा को छोड़कर} का 'खापीकरण' कर के रख दिया है.प्रश्न यह है कि जिस पूंजीवाद ने भारत जैसे गरीब मुल्क को इतनी इज्जत बक्शी  कि एक भारतीय को अमेरिकी बैंक में सर्वेसर्वा बनवा दिया वहीं ७७ करोड़ भारतीयों को एक वक्त  भरपेट भोजन जुटाने कि असफलता के साथ यह तमगा सा माथे पर ज्यों का त्यों बरकरार क्यों  है ?अक्सर कहा जाता है कि 'हम सब भारतीय एक नहीं बल्कि अनेक हैं .हम ब्राम्हण ,बनिया ,ठाकूर,जाट,गूजर,आर्य द्रविण दलित ,महादलित ,पिछड़ा महापिछ्डा और हिन्दू -मुस्लिम -सिख ईसाई बगेरह मात्र हैं.इस सामंत्कालीन सोच और पतनशील व्यवस्था को पूंजीवाद भारत में एक इंच भी इधर से उधर खिसकाने में असमर्थ रहा है?भले ही इस लफंगे पूंजीवाद ने यूरोप और अमेरिका या दुनिया भर में जीत के झंडे गाड़े हों किन्तु भारत को तो दोनों ओर से बुरी तरह रोंदा है .एक तरफ सामंती जातीय जकड़न ,साम्प्रदायिक घृणा और दूसरी ओर कृतिम उत्पीडन ,हत्या ,बलात्कार ,भय -भूंख ,और भृष्टाचार इत्यादि ने दो पाटों के बीच में भारत कि जनता को दबोचकर रखा है. इस व्यवस्था के खिलाफ जब तक आवाम का सामूहिक अवज्ञा आन्दोलन जैसा कदम नहीं उठता तब तक कांग्रेस ,भाजपा या वामपंथ भी इस कि चूल भी नहीं हिला सकते.
        जो काम भारत के मध्ययुग में श्रृंगार-वादियों या पोंगा-पंडितों ,कठमुल्लों ने सामंतवाद को खुश रखने के लिए किया था वही काम बाबा रामदेव या उनसे हित-संबल पाने वाले अब पूंजीवादी पतनोमुखी  व्यवस्था के लिए कर रहे हैं. उनके पास कोरी शाब्दिक लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं है.
      श्रीराम तिवारी

रविवार, 13 मार्च 2011

मध्यप्रदेश भाजपा कार्य समिति उवाच -सिंहासन खाली करो ,सुषमा आती है...

  मध्यप्रदेश  भाजपा की  दो दिवसीय कार्य समिति बैठक उज्जेन में संपन्न हुई.इस बैठक के मुख्य सूत्रधार व् शिल्पकार रहे भाजपा के राष्ट्रीय महा सचिव और मध्यप्रदेश प्रभारी श्री अनंतकुमार ने प्रेस को जो बताया उससे से न केवल आम भाजपाई बल्कि नेत्रत्वकारीभूमिका अदा करने वाले भी चिंतनीय मुद्रा धारण किये हुए हैं.
                                                     उज्जैन में संपन्न प्रादेशिक कार्यसमिति के कुछ निष्कर्ष इस प्रकार हैं. "केंद्र सरकार का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन टूट की कगार पर है, तमिलनाडु ,केरल ,बंगाल ,असम और पांडिचेरी के चुनावो में कांग्रेस और उसके साथियों की पराजय होने जा रही है,देश को शीघ्र ही मध्यावधि चुनाव का सामना करना होगा,भाजपा ने तय किया है कि अगला आम चुनाव सुषमा जी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा.मध्यप्रदेश से २९ सीटें जीतना जरुरी है.'
    श्री अनंत कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि भाजपा कि ताकत देश भर में तेजी से बढ़ रही है ,मध्यप्रदेश में कांग्रेस लगभग खत्म हो चुकी है बिहार में हमने शानदार प्रदर्शन किया.मध्यप्रदेश में सुष्माजी के नेत्रत्व में हम २९ सीटों पर विजयी होंगे.
        अनंतकुमार के उदगार जिनको बैचेन कर रहे थे वे तमाम मंत्री और संगठन पदाधिकरी उस मंच पर इस परिद्रश्य के
 साक्षी हैं. किसी भी नेता या वक्ता ने श्री लाल कृष्ण आडवानी ,अटलजी ,मुरलीमनोहर जोशी या जेटली का नाम नहीं लिया .क्या इन सभी दिग्गजों
को चूका हुआकारतूस  ,जनाधारविहीन और सत्ता प्राप्ति हेतु अशक्य मानकर यों दुसरे विकल्प गढ़े जा रहे हैं मानों - 
 "देखहिं चराचर नारिमय जे राम मय देखत रहे" रामचरित मानस के इस उद्धरण में राम का प्रयोग मेने ब्रह्म कि जगह किया है क्योंकि भाजपा ही नहीं पूरा हिन्दू समाज राम को ब्रह्म के रूप में देखता है ,अब कांग्रेसी हिन्दू ,वाम हिन्दू ,समाजवादी हिन्दू ,पिछड़ा हिन्दू ,दलित हिन्दू और प्रच्छन्न हिन्दू तो फिर भी अपने -अपने नेत्रत्व में आश्था लिए अडिग है ,सवाल तो सत्ता प्राप्ति कि सम्भावनाओं के मद्देनजर भाजपा में शीर्शष्ठ नेत्रत्व में मन मुटाव का है?जो लोग  श्रीराम को छोड़ ,उनके परम अनुयायिओं-आडवानी ,उमा ,मुरली मनोहर और संघ प्रमुख को छोड़ सुषमाजी का स्तुति गान कर आगामी  केन्द्रीय मंत्री  परिषद् में एडवांस बुकिंग कराना चाहते हैं वे  चीख -चीख कर कह रहे हैं कि '"दिल्ली कि सत्ता का रास्ता भोपाल से होकर जाता है" ,चूँकि सुषमाजी मध्यप्रदेश से सांसद हैं ,विपक्ष कि नेता हैं,उद्भट बकता हैं,दूसरे भाजपाइयों कि तरह भृष्ट अरब पति {पत्नी} नहीं हैं ,अभी -अभी सी वी सी मामले में सरकार और प्रधान मंत्री का फलूदा बनाने में उनकी भी भूमिका रही है ,वे समाजवादी पृष्ठभूमि से भाजपा में आयीं हैं उनके व्यक्तित्व और नेत्रत्व से भाजपा और भारत दोनों को फायदा होगा.किन्तु सवाल तो अब भी अपनी जगह स्टैंड कर रहा है कि यदि ये ही करना था-यानि विकाश वादी सोच और धर्मनिरपेक्षता की राह ही चलाना था और  सुषमा जैसे उदार हिदुत्व वादियों  को  ही यदि आगे बढ़ाना था -जो की भाजपा में व्यक्तिगत तौर से ;पहले से ही बहुतायत में मौजूद थे,  तो ये  -रथयात्राएं ,त्रिशूल बांटना,मस्जिद बनाम मंदिर ढहाना,गोधरा कराना,गुजरात में हिंसा और मुंबई दिल्ली समेत सारे देश में कट्टरवादी हमलों का उत्प्रेरक बनना क्या जरुरी था? कहा जा सकता है कि इसका भाजपा ,संघ परिवार और हिन्दुओं से कोई लेना देना नहीं. ये तो सब पाकिस्तान परस्तों और भारत के दुश्मनों की काली करतूतें हैं.तब भी प्रश्न और उलझता जायेगा कि कुछ खास नेताओं और नेत्रियों को साम्प्रदायिकता के मोर्चे पर भेजकर बलि का बकरा क्यों  बनाया जाता रहा ? और अब सत्ता प्राप्ति में उनको बाधा मान  कर किनारे क्यों  किया जा रहा है?  श्रीराम तिवारी ..... 

शनिवार, 12 मार्च 2011

विनाशकारी भूकम्प ओर विध्वंशक सूनामी में जापान -जर्जर


    जापान में कल आये महा विनाशकारी भूकंप और सुनामी लहरों की  भयानक विभीषिका ने न केवल सैदाई ,याकोहामा बल्कि टोकियो तक को हिला कर रख दिया है. जापान में हजारों जाने चली गईं है. 
 लगभग एक तिहाई जापान तहस नहस होचूका  है,सारी दुनिया से और भारतसे भीमदद के हाथ बढे हैं .इंसानी  
जज्वे ने अतीत में भी ऐसीं अनेक आपदाओं का सामना किया है.जापानी जनता तो प्राकृतिक झंझावातों को झेलने की आदी सी हो चुकी है.इस अवसर पर जबकि जापान में रेलों  सड़कों  टेलिफोन
तथा अस्पतालों की स्थिति ही संकटापन्न है तब दुनिया के तमाम जन-गणों की यह नैतिक और मानवीय जिमेदारी है की जापानी जनता का होसला बढ़ाएं और हर संभव मदद करें.
         इस प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए दिवंगतों को विनम्र श्रधांजलि अर्पित करता हूँ.
        श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

गेंदवाज को मजदूर और बल्लेबाज को अफ़सर मानना सरासर अन्याय है....

  इन दिनों भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट की चर्चा सबसे ऊपर और सबसे ज्यादा रुचिकर बनी हुई है.
क्या खिलाडी? क्या छात्र? क्या मजदूर? क्या किसान?क्या व्यापारी?क्या अफसर?क्या बाबु?आवाल वृद्ध नर-नारी क्रिकेटमय हो रहे हैं. शादी हो या तलाक ,जन्म हो मृत्यु  ,शहर हो या गाँव ,खेत हो या कारखाना कहीं ज्यादा -कहीं कम, कहीं ख़ुशी -कहीं गम ...जो  जहां है क्रिकेट की प्रतिध्वनी चाहे -अनचाहे सुनने को मजबूर है. विश्वकप की संयुक मेजवानी में भारत अर्थात बी सी सी आई की भूमिका  बिग-ब्रदर जैसी है
                                                     मुझे क्रिकेट का ककहरा भी नहीं मालूम.बचपन में जहां -पला बढ़ा वहां क्रिकेट की नहीं मल-खम्ब,कबड्डी, अखाड़ेवाजी,लठ्ठ-वाजी और मुगदर -वाजी जैसे खेल अवश्य थे . गिल्ली डंडा और डंडा-डाल जैसे खेलों में कुछ -कुछ क्रिकेटी रंग हुआ करता था . अक्सर दवंग किस्म का लड़का मनमानी करता और वही  खेलता {बेटिंग करता}था. उम्र में छोटे या दव्वु किस्म के बच्चे गेंद उठा लाने {फील्डिंग या गेंदवाजी करते  } या तीमारदारी का काम करते थे.  याने यदि भाई -भाई भी थे तो भी ताकत ने वर्गभेद खड़ा कर रखा था .कमजोर के हिस्से में ज्यादा परिश्रम और कम खुशियाँ आतीं और जिसके कल्ले में जोर होता तो परिश्रम और खुशियों का चयन  स्वयम कर सकने में समर्थ होता. पूर्व भारतीय दिग्गज हर- फन-मौला क्रिकेट खिलाड़ी और विश्वविजयी कप्तान कपिलदेव निखंज के एक बयान ने मुझे इतना प्रभावित किया कि उस पर प्रस्तुत संक्षिप्त  आलेख लिखने का लोभ संवरण न कर सका. उन्होंने हाल ही में इस दौर के विश्वकप में बल्लेबाजों कि मददगार पिचों के निर्माण पर सख्त आपत्ति लेते हुए निम्नांकित उदगार व्यक्त किये.
              कपिलदेवने कहा "  क्रिकेटमें गेंदबाजको तो मात्र एक मजदूर समझा जाता  है. इसीलिये इस टूर्नामेंट में 
       में भी बल्लेबाजों को मदद करने बाली पिचें बनाई गईं है. यही वजह है कि अधिकांस टीमें  धड़ा-धड ३०० के  स्कोर  पर  पहुँच रहीं हैं ."  
                 कपिलदेव ने खेल जगत की यादों से जुडी पुस्तक 'वर्ल्ड कप' के विमोचन कार्यक्रम में कहा-"विश्व कप जीतने के लिए टीम के पास अच्छा गेंदवाजी आक्रमण होना जरुरी है ,लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि क्रिकेट कि दुनिया में गेंदवाज को बल्लेबाज से कमतर आंका जाता है .एक विकेट गिराने पर दर्शक दीर्घा से उतनी शाबाशी भी नहीं मिलती जितनी बल्लेबाज को एक चौका मार देने  पर मिल जाया करती है. क्रिकेट के मैंदान में बल्लेबाज मानों आफीसर है और गेंदवाज महज मजदूर "
           अपनी कप्तानी में १९८३ में भारत को अब तक का एकमात्र वन डे विश्वकप दिलाने वाले कपिल ने कहा- "इस मर्तवा विश्वकप के लिए ऐंसी पिचें तैयार कीं गईं हैं जो बल्लेबाजों कि तो मददगार हैं किन्तु गेंदबाजों को विकेट लेने में पसीना बहाना पड़ रहा है. इन पिचों को पूर्णरूप से आदर्श तभी माना जा सकेगा जब गेंदबाजों  को भी थोड़ी सी मदद मिले सके. क्रिकेट में जितने भी नए नियम बन रहे हैं वे सिर्फ बल्लेबाजों को ध्यान में रखकर बनाये जा रहे हैं,गेंदवाजों कि उपेक्षा से क्रिकेट का वजूद संकट में है" 
                                   जैसा कि मैनें इस आलेख के प्रारंभ में ही निवेदन किया है कि मैं क्रिकेट का बल्ला भी ठीक से नहीं पकड़ सकता किन्तु कपिलदेव के वयान से  मेरे जैसे आम आदमी या सर्वहारा के लिए एक शानदार  रूपक तो क्रिकेट के बहाने मिल ही गया. और वो रूपक क्या है?
   प्रस्तुत आलेख में कुछ शब्द बदल दीजिये ,जैसे कि गेंदवाज को मजदूर तो कपिल ने ही नाम दिया है अतः यह नाम करण मेहनतकशों के इतिहास में कपिल के नाम से ही जाना जाएगा.अब बल्लेबाज को पूंजीपति या भूस्वामी नाम देवें.पिच याने [शासन) पूंजीवादी भृष्ट व्यवस्था. क्रिकेट याने उत्पादन के साधन विश्वकप याने पूंजीवादी आर्थिक सुधारवाद.
                     कपिल का यह कहना कि गेंदवाज पसीना बहाकर भी विकेट को तरसता है तो इसमें जो पिचों का कमाल है वो बल्लेवाजों का पक्षधर है यही इस दौर के नव्य आर्थिक उदारीकरण -भूमंडलीकरण -सर्वसत्तावादिकरण के निहितार्थ हैं.कपिल को धन्यवाद और आभार कि क्रिकेट का रूपांकन इस ढंग से किया कि मालिक -मजदूर ,अफसर-क्लर्क और बल्लेबाज-गेंदबाज के साथ -साथ पिच और ये संपूर्ण व्यवस्था बेनकाब हो रही है....                                                      श्रीराम तिवारी
    
      

गुरुवार, 10 मार्च 2011

यू. पी. की जनता नये सामंती शिकंजे में-.. यौर ओनर की नज़रें इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी...

हम भारतवासी सदियों की गुलामी से तो आजाद हो गए किन्तु गुलामों जैसी मानसिकता से छुटकारा पाने के लिए ६४ वर्ष पर्याप्त नहीं हैं. जिन से उम्मीद बनी थी कि ये दमित-शोषित-पीड़ित समाज का उत्थान करेंगे वे 'माया' के वशीभूत होकर अनीति,अलोक्तान्त्रिकता और अमानवीयता के अलमबरदार बन चुके हैं. बागड़ ही खेत चर रही हो तो क्या कीजियेगा? कविवर मुकुटबिहारी 'सरोज' कि चार पंक्तियाँ प्रासंगिक हैं ;-


ये दर्द नासूरी है / इलाज जरुरी है /चीरफाड़ जरुरी है /

लोग कहेंगे कि ये तो हिंसा है /पर क्या करें मजबूरी है /

उत्तरप्रदेश में लोकतंत्र और मानवीय मूल्य खतरे में हैं. मायावती जैसी पद-लोलुप, नलोलुप और दंभ-लोलुप महिला को यू पी कि सत्ता में बिठाने के लिए कांग्रेस ,भाजपा, सपा और बसपा तो जिम्मेदार हैं ही , यू पी कि जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है. कांग्रेस इसलिए जिम्मेदार है कि आजादी के बाद उसे पूरे ४५ साल मिले थे यू पी पर राज करने के लिए ,किन्तु उसने वर्गीय समाज को समतामूलक और आर्थिक रूप से सशक्त करने के बजाय सिर्फ सत्ता कि सीढ़ी ही समझा, अतएव आफत कि मारी जनता ने जातीयतावादी ,साम्प्रदायिक ताकतों को क्रमशः आजमाया.

जब दलितों और पिछड़ों को लगा कि वे कांग्रेस के हाथों छले जा रहे हैं , तो उन्होंने लोहियावादियों को, आंबेडकरवादियों को भी सत्ता में मौका दिया ,पहले मुलायम और फिर भाजपा ,फिर मुलायम जब इन सबने निराश किया तो अब फिर माया .इस तरह यू पी ने "सब कारे आजमा लिए"अतेव आज यू पी में तारीफ के लिए सिर्फ दो चीजें बची हैं एक-पोलिस का आतंक और दूसरी -महिलाओं पर अत्याचार. सर्वाधिक अत्याचारों के लिए मायावती का नाम इतिहास में दर्ज किया जायेगा. एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के सबसे अमीर और भृष्ट मुख्यमंत्री का नाम है- मायावती और सबसे ईमानदार और कम पैसे वाला मुख्यमंत्री है -बुद्धदेव भट्टाचार्य.

विगत ९ मार्च -२०११ को उत्तरप्रदेश सरकार के खिलाफ सपा के आन्दोलन पर पुलिस अत्याचार देखकर जिसके रोंगटे खड़े न हों वो ही मायावती को सहन कर सकता है. लोकतान्त्रिक और अहिंसक आन्दोलन को जलियांवाला बाग़ कि तर्ज पर घेर कर क्रूरतापूर्वक पुलिसिया बूटों से लोगों को कुचला गया, उन्हें घसीटा गया और इस हरकत में आला-अफसर बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे -मानो मायावती के कृपा-कटाक्ष के लिए ही ये सब वीभत्स दमनात्मक कार्यवाही कि गई हो.



जिस प्रदेश के आई ए एस इतने गिरे हुए हों कि भ्रष्टतम नेताओं या नेत्रियों के जूते साफ़ करना अपनी शान समझते हों , जिस प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी बसपा के बाहुबली नेता बलात्कार और हत्याओं के कीर्तिमान बना चुके हों ,जिस प्रदेश कि मुख्यमंत्री करोड़ों कि माला पहनकर देश और प्रदेश कि नंगी-भूखी गरीब जनता को कीड़े-मकोड़े समझकर पुलिस के बूटों तले मसले जाने योग्य समझती हो उस प्रदेश पर अब माननीय उच्चतम न्यायालय कि कृपादृष्टि ही अपेक्षित है . क्योंकि केंद्र कि मजबूर सरकार के सामने सौ अफ़साने हैं. निस्संदेह मायावती ने न केवल भृष्टाचार के नए कीर्तिमान गढ़े हैं,बल्कि शोषण-दमन और आतंक की वे पर्याय बन चुकी हैं. इसके लिए यू पी कि जनता भी जिम्मेदार है किन्तु यू पी की जनता यदि देश का इतिहास बदल सकती है तो अपने प्रदेश कि भी किस्मत बदलने का वह जरुर अवसर देख रही है. तब तक भारत कि न्यायिक सक्रियता का एक नमूना यू पी के मदमस्त नेताओं और नौकरशाहों को जरुर दिखाया जाना चाहिए. कवन सौ काज कठिन जगमाहीं ....माननीय 'यौर ओनर' की नजरे इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी............ श्रीराम तिवारी

राष्ट्रीयतावादी कांग्रेस ने क्षेत्रीयतावादी द्रुमुक के सामने झुकने से इनकार कर क्या ग़लत किया?

       गठबंधन की राजनीति से देश और प्रजातंत्र को क्या फायदा हुआ या आगे होगा यह कहना मुश्किल है.यह स्पष्ट है कि
  कि  क्षेत्रीयतावादी ,जातीयतावादी, व्यक्तिवादी ,इलिमवाला,फिलिमवाला और संप्रदायवाला खूब फलाफुला.  
यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि जिस मतान्ध विचारधारा ने राजीव गाँधी का क़त्ल किया उसके परिवर्ती संवाहक  स्वयम श्री करूणानिधि रहे हैं.   उनकी द्रविण मुनेत्र कड़गम भी   प्रभाकरण  और  लिट्टे  को   पयपान कराती रही है.  ऐसी अलगाववादी ,हिन्दी विरोधी और महाभ्रष्ट  क्षेत्रीय पार्टी को लतिया कर सोनिया गाँधी ने जो किया उससे न केवल  कांग्रेस अपितु देश का भी कुछ भला होगा ऐसी आशा की जानी चाहिए.
                               करूणानिधि या द्रुमुक ने तमिलनाडु को तो वर्षों पीछे धकेला ही है किन्तु अपने मंत्रियों के मार्फ़त अपने विशाल कुनबे  का न केवल भरणपोषण अपितु इस परिवार की भावी पीढ़ियों
 के ऐशो-आराम का भी इंतजाम कर दिया है.दयानिधि मारन,टी आर बालू , ऐ.राजा  ,कनिमौझी ही नहीं बल्कि पूरा द्रुमुक परिवार  ही भृष्टाचार की वैतरणी में फुदक रहा है. जयंती नटराजन और कांग्रेस के शुभचिंतकों ने कांग्रेस हाई कमान को सलाह दी कि द्रुमुक हमारे साथ रहे या न रहे ,हमें अब कोई फर्क नहीं पड़ता.उनका निष्कर्ष है कि आगामी विधान सभा चुनावों में द्रुमुक का पराभव निश्चित है अतएव जयललिता को और तमिल जनता को  ठोस सन्देश भेजा जाये कि न केवल वर्तमान दौर के भृष्टाचार के लिए बल्कि तमिलनाडु कि जनता कि मौजूदा परेशानियों -महंगाई ,बेकारी, भृष्टाचार और भाई-भतीजावाद के लिए जो जिम्मेदार हैं ,उस द्रुमुक से  हम {कांग्रेस} नाता तोड़  रहे हैं. उसकी पारिवारिक ध्रुष्ट्ताओं का खामयाजा कांग्रेस क्यों भुगते?
        इससे से पूर्व की जयललिता के पिद्दे-घोड़े आगे बढ़ पाते करूणानिधि ने अंतिम प्रयास  हेतु अपने विश्वस्तों  को सोनिया दरबार  में भेज दिया. करूणानिधि को भारत की जनता से कोई लेना देना नहीं, तमिल जनता और  तमिलनाडु तो उनके परिवार का साम्राज्य  हैं. कांग्रेस से नाता टूटा तो अभी तो सिर्फ ए राजा ही जेल में हैं ,आइन्दा दयानिधि मारन,कावेरी मारन, कनिमौझी,ए बालू तो बो बालू पता नहीं कौन -कौन तिहाड़ प्रवास पर होंगे.सो घबराहट में कांग्रेस के उन दिग्गजों को जो की इस गठबंधन के शिल्पकार हुआ करते थे उन्हें स्मरण किया और उनके ही सुझाव पर यह पुनर मूषको भव का नाटक खेला गया.सोनिया जी ने द्रुमुक दूतों की कैसी लू उतारी और कांग्रेस को भले ही सत्ता से जाना पड़े तो मंजूर ,किन्तु एक परिवार विशेष के लिए कांग्रेस को कुर्वान नहीं किया जा सकता,६० या ६३ सीटें तो प्रतीक मात्र थीं वास्तविकता यही है की कांग्रेस की इस दौर में बीसों घी में हैं. देश का हर जिम्मेदार दल भाजपा या वाम कोई भी देश में तुरंत लोक सभा के चुनावों के लिए तैयार नहीं. प्रकारांतर से ये सभी विपक्षी दल किसी तरह के नकारात्मक ध्रुवीकरण के पक्ष में तो बिलकुल नहीं ,द्रुमुक या उन तत्वों से तो अभी सभी अपना दामन बचाना चाहेंगे.
          सोनिया जी ने द्रुमुक के संकट से कांग्रेस को तात्कालिक  राहत  पहुंचाई यह अन्य राष्ट्रीय दलों के लिए एक सबक है कि क्षेत्रीयतावाद ,भाषावाद या साम्प्रदायिकतावाद के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण को शिद्दत से जनता के बीच ले जाकर  महंगाई ,भृष्टाचार ,बेरोजगारी तथा अन्य प्रासंगिक  विषयों पर आगामी विधानसभा के चुनाव फेस करना चाहिए ,यही  लोकतंत्र और देश के प्रति राष्ट्रीयतावादी उत्तरदायित्व होगा...........श्रीराम तिवारी
       

मंगलवार, 8 मार्च 2011

प्रधान मंत्री की एक ओर अग्नि परीक्षा -मोदी कमेटी पर अमल कैसे हो?

     चौतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यु पी ऐ सरकार को कहीं ठौर नहीं है. निरंतर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और विपक्षी हंगामों के चलते जांच-पड़ताल और ठोस  नतीजों की अपेक्षा सुनिश्चित करने में जुटी सरकार और कांग्रेस के दिग्गज सिपहसालार एक नई चुनौती से रूबरू होने जा रहे हैं.
       महंगाई पर काबू पाने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गठित महंगाई- रोधी कमेटी ने द्रढ़ता के साथ निर्णय लिया है कि 'वायदा बाजार'  कारोबार तुरंत बंद किया जाना चाहिए यह एक एतिहासिक और महत्वपूर्ण  दूरगामी प्रगतिशील फैसला है, नाकेवल सत्तापक्ष  अपितु विपक्ष का प्रमुख दल भाजपा भी इस फैसले से यु  निश्चित ही द्विविधा में होगा .जहां तक वाम पंथ का सवाल है इसे तो मानो बिन मांगेमुराद मिली  ;क्योंकि विगत यु पी ऐ प्रथम के दौर से ही वाम ने  वायदा बाजार को महंगाई का एक बड़ा कारक सावित कर इसे समाप्त करने कि रट लगा राखी थी . तब प्रधानमंत्री जी ने कोई ध्यान नहीं दिया था .किन्तु विगत वित्तीय सत्र २००९-२०१० में   महंगाई से मची त्राहि -त्राहि को जब संयुक विपक्ष ने मुद्दा बनाया तो   प्रधान मंत्री जी ने गत अप्रैल-२०१० में महंगाई पर रोक लगाने बाबत महंगाई-रोधी कमेटी गठित की. महाराष्ट्र , तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सदस्य के रूप में शामिल किये गए और गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को अध्यक्ष बनाया गया. विगत वर्षों में भी जब संसद और उसके बाहर सड़कों पर विभिन्न राजनैतिक दलों ने आवाज उठाई तो कोई भी इसी तरह की कमेटी बिठाकर मामले की आंच को धीमा किया गया, योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने भी पहले तो वायदा कारोवार के विरोध में रिपोर्ट वनाई किन्तु दिग्गज खाद्द्यान्न माफिया के प्रभाव ने रिपोर्ट को वायदा बाजार का समर्थन करते हुए दिखाने पर मजबूर कर दियाथा. नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने महंगाई जैसे मुद्दे पर सुझाव देने में भले ही ११ महीने लगाए हों किन्तु वायदा बाजार का स्पष्ट विरोध करके अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूर्ण की है. देखना यह है कि अब इस रिपोर्ट को लागू करने में सरकार कितना समय लेती है . वैसे केंद्र सरकार को शायद न तो महंगाई की चिंता है और न घोटालों की.
                      देश को वैश्वीकरण की राह पर ले जाने वाले हमारे प्रधान मंत्री जी हर जगह विवश और ढीले नजर आ रहे हैं. उनका दर्शन था की कोई और विकल्प नहीं है सिवाय एल पी जी के. यदि विकल्प नहीं थे तो अब मोदी कमेटी के सुझाव पर तो  अमल  करो. 
   देश में भरी बेरोजगारी बढी है, परिणामस्वरूप चोरियां ,ह्त्या लूट ,डकेती और बलात्कार आम बात हो चुकी है. लोग न घर में सुरक्षित हैं और न बाज़ार में.
      अधिकांश   विपक्ष और मुख्यमंत्री इस वायदा बाज़ार को बंद करने के पक्ष में हैं. वायदा कारोबार का मुद्दा सीधेतौर से महंगाई से जुड़ा है . कृषि जिसों में अरबों रूपये के वायदा सौदे हो रहे हैं. इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बड़े-बड़े औद्योगिक  घराने भी कूद  पड़े हैं . किसान वर्ग को इससे से रत्तीभर फायदा नहीं है. भृष्ट व्यपारियों ,बड़े अफसरों और सत्ता में बैठे मंत्रियों की इस सबमें हिस्सेदारी है.
   आज देश घोटालेबाजों ,सट्टेबाजों के चंगुल में सिसक रहा है. आम जनता त्राहि-त्राहि कर रही है. कहा जाता है कि महंगाई तो सर्वव्यापी और सर्वकालिक है. क्या बाकई यह सच है? नहीं..नहीं...नहीं...
       विश्व कि महंगाई और भारत कि महंगाई में कोई समानता नहीं. विश्व के कई देशों में खाद्यान्न  कि भारी कमी है,  जबकि भारत में गेहूं-चावल के भण्डार भरे हैं और रखने को गोदाम नहीं, सो खुले में रखा -रखा सड़ रहा है. यदि दयालु न्यायधीश कहते हैं कि गरीबों में बाँट दो तो सरकार मुहं फेर लेती है.क्यों? शक्कर के भण्डार भरे पड़े हैं. कमी थी तो रुई और यार्न को निर्यात प्रोत्साहन क्यों? गरीब दाल-रोटी मांगता है आप उसे मोबाइल और इन्टरनेट का झुनझुना पकड़ा रहे हैं. भारत में महंगाई का मूल कारण मुनाफाखोरी और सरकार की जन-विरोधी नीतियाँ हैं मोदी कमेटी ने यदि वायदा बाजार को बंद करने की सिफारिश  की है तो केंद्र सरकार उस पर अमल क्यों नहीं कर रही? यदि सरकार इस रिपोर्ट को मानने से इनकार करती है तो देश  के साथ और खास तौर से देश की निम्न वित्तभोगी जनताके साथ नाइंसाफी तो  होगी ही , साथ ही भाजपा के उदारपंथियों पर उग्र  दक्षिणपंथ के नायक नरेंद्र मोदी की बढ़त में भी कोई नहीं रोक सकेगा.
                             श्रीराम तिवारी

सोमवार, 7 मार्च 2011

भारत रूपी गेंहूँ को भृष्टाचार का घुन आजकल में नहीं लगा.....

संसद के विगत शीतकालीन सत्र में टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर एन डी ऐ और वामपंथ ने २० दिन  तक संसद के बाहर सत्यागृह और प्रदर्शन करते हुए वर्तमान यु पी ऐ द्वितीय सरकार को संयुक्त संसदीय समिति बनाने पर मजबूर किया.यद्यपि सारे आरोप सही हैं किन्तु क्या इस भृष्टाचार का इतिहास सिर्फ एक दो सालों का है या की ये सिलसिला वर्षों से चला आ रहा था चूँकि अब ये सब असहनीय हो चला है सो न्यायिक सक्रियता के हुंकारे में विपक्ष ने भी लगे हाथ अपना दायित्व पूरा कर दिखाया .
एक विचित्र संयोग है कि जहां एक ओर  कतिपय स्वनाम धन्य ईमानदार{?}सफ़ेद पोश
लोग लगातार भृष्टाचार पर अपना  ध्यान केन्द्रित किये हुए हैं, और भारत को दुनिया में भ्रष्टतम देश सावित करने में जुटे हुए हैं. वहीं दूसरी ओर विश्व स्तरीय  'ग्लोवल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच' के प्रवक्ता रिचर्ड हंटर ने कहा है कि "भारत में भृष्टाचार औरों कि बनिस्पत कम है" अमेरिका .ब्रिटेन और अरब राष्ट्रों में तो इन्तहा हो चुकी है. फिर भी सदियों तक गुलाम रही,  शोषण की अनवरत शिकार जनता मानती है कि   भारत में इतना भृष्टाचार है कि गिने-चुने सरकारी विभागों को छोड़कर कहीं भी बिना कुछ दिए लिए कोई काम नहीं होता, यदि आपका राजनैतिक रुतवा है या आप "धाक" रखते हैं तो विना दिए लिए घर बैठे भी आपका उल्लू  सीधा हो सकता है, ये रीति सनातन से चली आ रही थी किन्तु जब से मनमोहनी  नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का आगाज हुआ है तबसे प्रतिस्पर्धा में निर्वल वर्ग बेहद तेजी से  पिछड़ रहा है, सवल को तेजी से  ताकत के इंजेक्सन देकर उतरोत्तर सफलता के शिखर पर पहुँचाया जा रहा है. कुछ  ताकतवर लोग जो इस भ्रष्ट व्यवस्था में अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुजार चुके हैं, शायद ऊबने  लगे हैं या अब अपनी वैयक्तिक ख्याति और चरम यश- लोलुपता के आवेग में सरकार पर लाल-पीले हो रहे हैं. जबकि दूरगामी  राष्ट्रीय हितों से सरोकार रखने वाले  कोई वैकल्पिक उपाय उनके पास नहीं हैं. वे अर्थशाश्त्र, राजनीति, अधुनातान साइंस और टेक्नालोजी के बारे में ककहरा भी नहीं जानते लेकिन वे किसी खास अनुत्पादक पेशे से ताल्लुक रखने के कारन आधुनिक परजीवी वर्ग में अपनी पेठ बना चुके ये ढपोरशंखी चाहते हिं कि देश में, हर घर में भगतसिंह पैदा हो किन्तु उनके अपने घर में नहीं. देश की ८०% मेहनतकश जनता को-जो रोज कमाती और बड़ी मुस्किल से उदरपूर्ती के साधन जुटा पाती है, इन तथाकथित स्वनामधन्य "ईमानदारों" 
 से कोई लेना -देना नहीं. किसी को यकीन न हो तो दिल्ली-मुंबई ,कलकत्ता मद्रास में भवन निर्माण में लगे या सड़कें बनाने में जुटे किसी मजदूर से पूंछे की किरण बेदी या स्वामी अग्निवेश कौन हैं?अन्ना हजारे या अरुंधती कौन हैं? खेतों में पसीना बहाते किसी खेतिहर मजदूर से पूंछो या झाबुआ ,अबूझमांड के आदिवासी से पूंछो  कि लोम-विलोम वाले बाबाजी का नाम क्या है? प्राणायाम क्या   होता है? भृष्टाचार क्या है ?लब्बो लुआब ये है कि वर्तमान दौर के इन सफ़ेदपाशों ने यदि  गजानन माधव मुक्तिबोध,दुष्यंतकुमार,गणेशशंकर विद्ध्यार्थी या हरिशंकर परसाई ,शरद जोशी जैसें साहित्यकारों को ही  ठीक से पढ़ा होता तो भृष्टाचार और राजनीति पर इस तरह कि तोतली बातें  नहीं करते.इन सस्ती लोकप्रियता के सम्बाह्कों में से कोई भी दूध का धुला नहीं है  चाहे वो कितना भी ईमानदार  क्यों न बनता हो दावे से नहीं कह सकता कि वह वर्तमान दौर के जिम्मेदार  राजनीतिज्ञों{कांग्रेसी ,भाजपाई ,वामपंथी} का बेहतर विकल्प बन सकता है.सत्ता में जो हैं उनकी जबाबदेही जनता और जनता कि सबसे बड़ी पंचायत अर्थात संसद के प्रति है,सत्ताधारी लोग यदि गलत करते हैं तो जनता अपने मताधिकार कि ताकत से सत्ताचुत कर सकती है.आज जो विपक्ष में हैं वे अपने उत्तरदायित्व का भरसक निर्वहन कर ही रहें हैं कल को सत्ता में भी आ सकते हैं. न्यायपालिका कि सक्रियता जग जाहिर है.यदि सत्ता पक्ष ने कुछ ऐसा वैसा किया है तो भारत कोई ट्युनिसिया नहीं ,मनमोहन सिंह कोई  गद्द्फी नहीं ,भारत कि जनता कोई भेड़िया धसान नहीं.कुछ भी जनता के नियंत्रण से बाहर नहीं.
                                        किरण कर्णिक ने प्रधानमंत्री जी को   तथाकथित एस -बैंड स्पेक्ट्रम स्केम के बारे में पत्र लिखा है.तदनुसार अव्वल तो इसरो ने किसी को कोई स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं दूसरी बात जो रेखांकित कि गई वो ये कि इसरो के पास स्पेक्ट्रम नहीं बल्कि "आर्विट स्लाट्स" हैं.यह विद्दयुत चुम्बकीय तरंग क्षेत्र {स्पेक्ट्रम}न होकर एक किस्म का अंतर राष्ट्रीय अनुबंध का भारतीय  अन्तरुक्षीय पारगमन क्षेत्र है .देवोस  कम्पनी को इसे ऐसे ही दे देने का सवाल ही नहीं था.इन 'आर्विट स्लाट्स' को खरीदने जब कोई नहीं आया तो देवोस से एम् ओ यु बाबत चर्चा  शुरूं ही  हुई थी कि 'दूध के जलों ने छांछ फूंकना'शुरू करदिया.अधकचरे ज्ञान वाले मीडिया और विकृत मस्तिष्क के उपरोक्त सयानो ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा भृष्टाचार निरुपित करते हुए    केंद्र सरकार पर हल्ला बोल दिया.अब जांच जारी है.जांच में क्या निकलेगा?जब कुछ हुआ ही नहीं तो नतीजा सिफ़र ही होगा.
          निसंदेह आज के निजीकरण -उदारीकरण -भूमंडलीकरण के दौर ने दुनिया को एक गाँव जैसा बना दिया है,जिस तरह गाँव का बदमासऔर दवंग  किसान अपने खेत की मेंड़ पर खड़े होकर अपने बेलों को दूसरे के खेत में चराता है;उसी तरह बाजारीकरण के दौर ने शक्तिशाली मुल्कों कोयह अवसर प्रदान किया है कि वे  निर्वल राष्ट्रों में अपनी घटिया कालातीत तकनीकी खपायें .अपने अनियंत्रित उत्पादनों को तथाकथित अविकसित या विकाशशील देशों में एन -केन-प्रकारेण जबरन खपायें.  इन सब खुरापातों के लिए ये पूंजीवादी मुल्क आपस में एका करके  विशेष फंड  में कुछ रकम भी  खर्च करते हैं,यही आवारा पूँजी वास्तव में तमाम आधुनिक बड़े -बड़े काण्डों की जननी है . 
         इस नव्य उदारवाद कि आवारा पूँजी से भारत जैसे देशों में  सरकारें बनती हैं .सांसद खरीदे ,बेचे जाते हैं,गठबंधन होते हैं,उन्हें चलाने कि मजबूरियाँ होतीं हैं ,राजा होते हैं ,रादियायें होतीं हैं.कभी एन डी ऐ सत्ता में होता,कभी यु पी ऐ सत्ता में होता,कभी चारा घोटाला होता ,कभी बोफोर्स घोटाला होता ,कभी टू -जी स्पेक्ट्रम घोटाला होता ,कभी कामनवेल्थ कांड होता और कभी तेलगी ,कभी हसन अली घोड़े वाला -हवाला कांड होता .ये एक सतत प्रक्रिया है जो एन डी ऐ ,यूपी ऐ के ही नहीं बल्कि तब थी जब आदरणीय मनमोहनसिंह जी वित्त मंत्री हुआ करते थे .ये भृष्टाचार कि गटर गंगा तब भी बहा करती थी जब इंदिरा -मोरारजी या नेहरु थे.ये नासूर तब भी था जब अंग्रेज थे और तब भी था जब मुग़ल थे.फर्क सिर्फ इतना है किलक्ष्मी  पहले बहुत कम लोगों को पतित कर  पाती थी .अब इस बाजार बाद ने अधिक से अधिक लोगों को भृष्ट बना दिया है . यक्ष प्रश्न ये है कि या तो हम सब ईमानदार हो जाएँ या जो अभी तक इस गटर में नहाने से वंचित हैं उन्हें भी मौका दिया जाए.चूँकि ये दोनों ही असम्भव विकल्प हैं  अतएव जो कम बेईमान हो उसे सत्ता में और राजनीति में स्वीकार्य बनाया जाये.                                   श्रीराम तिवारी
      

शनिवार, 5 मार्च 2011

मेरी नज़र में ऐसे थे- दाऊ अर्जुनसिंग...

  1.  यदि   भारतीय राजनीति के विगत ६ दशकों की  राजनीतिक हस्तियों को  उनके- व्यक्तित्व,कृतित्व,विचारधारा,  ,शैक्षणिक योग्यता, लोकप्रियता  एवं सामाजिक सरोकारों के नार्म्स पर आधारित- सिलसिलेवार श्रेष्ठता क्रम में  सूचीबद्ध किया जाये,तो मेरी सूची इस प्रकार होगी ..
 {१}मोहनदास करमचंद गाँधी  {२}पंडित जवाहरलाल नेहरु  {३}बाबा साहिब वी आर आंबेडकर
   {४}मौलाना आज़ाद      {५}लाल बहादुर शाश्त्री    {६}सर्व पल्ली राधाक्र्ष्णन
    {७}सरदार पटेल       {८}ई एम् एस नम्बूदिरिपाद    {९}इंदिरा गाँधी
     {१०}जयप्रकाश नारायण   {११]ज्योति वसु   {१२}माधव सदाशिव गोलवलकर
      {१३}वी टी रणदिवे    {१४]श्रीपाद अमृत डाँगे  {१५}हरकिसन सिंह सुरजीत
       [१६}शंकरदयाल शर्मा   {१७}अटलबिहारी वाजपई {१८}राजीव गाँधी
        {१९]लालकृष्ण आडवानी  {२०}सोनिया गाँधी   {२१}अर्जुन सिंह ....
मेनें  यह   यह वरीयता सूची १०० तक ही बनाई  है. हममें से हरेक अपनी मेधा शक्ति के आधार पर कुछ इसी तरह की सूची बनाकर देखे तो स्वर्गीय अर्जुन सिंह  के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व  को अपने मानकों पर मूल्यांकित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि  व्यक्त कर सकता है .  मैनें {२१}वें क्रम पर  श्री अर्जुन सिंह जी को स्थापित किया है.    वो अब हमारे बीच नहीं है,कल४ मार्च -२०११ को   एम्स-नई दिल्ली में उनका निधन हो गया है.  हालाँकि उक्त सूची में भी अब तीन ही मौजूद हैं -अटलजी ,अडवाणी जी और सोनिया गाँधी .शेष सभी अब इस दुनिया में नहीं हैं.
                    किसी भी महान व्यक्तित्व के धीरोदात्त  चरित्र चित्रण के लिए किसी साहित्यिक विशेष योग्यता की जरुरत भले न हो किन्तु मानवीय सम्वेदनाओं की अजश्र धारा और व्यक्ति विशेष के सन्दर्भ में सटीक जानकारियों के साथ -साथ उसके समकालिक घटनाक्रम की वास्तविक छवि निरूपण की क्षमता तो होना ही चाहिए.इस हेतु मैं श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन सुधी पाठकों पर छोड़ता हूँ .
  घटना एक -आज से लगभग २८ वर्ष पूर्व का वाकया है.मैं बज्रंग्नगर -इंदौर में किराये के मकान में रहता था.मकान मालिक ने आधा हिस्सा खाली रख छोड़ा था . एक दिन सुबह उठा तो देखा की पड़ोस वाले हिस्से में काफी चहल- पहल है, उत्सुकता वश किसी से पूंछा की कौन है ? हमें बताया गया की १२ अधेढ़ उम्र के लोग रीवा-सीधी आँचल से आर आई ट्रेनिंग के लिए इंदौर आये हैं. वे बघेली में ही बात करते थे. बात बात में दाऊ साब के बारे में फुसफुसाते रहते थे तब मैं नहीं जनता था कि ये दाऊ कौन हैं ? उनको  परिवार साथ लाना संभव नहीं था अतएव वे सभी इस डेड़ कमरे के मकान में ठस गए .उनका ट्रेनिंग सेण्टर यहीं अनूप टाकिज के पास था.वे सभी उम्र में मुझसे काफी बड़े थे किन्तु रोज सुबह सुबह उठकर'पायं लगी' कहते और पैर छूते थे,वे सभी अपने आपको अर्जुनसिंह जी का रिश्तेदार बताते थे . मेरे कई मित्र और सपरिजन वेरोजगार थे अतः इन नवागंतुक पड़ोसियों से जानकारी ली कि  राजस्व विभाग में भरती कि प्रक्रिया क्या है?  इन लोगों ने हमें  बताया कि सब दाऊ साब कि कृपा है और जब मैंने आग्रह किया कि दाऊ साब से कहकर दो -चार गरीबों का भला और करवा दो ,तो  दूसरे ही दिनउन सबने  मकान ही  छोड़ दिया.मैंने काफी खोज खबर ली तो पता चला की ये सभी पटवारी थे जिन्हें एक सरलीकृत प्रशाशनिक प्रक्रिया से रेवेनुए इंस्पेक्टर बना दिया गया,ये सभी भर्तियाँ संदेहास्पद थीं .उसी समय पटवारी वर्ग  तथा मध्य प्रदेश के अन्य कई विभागों में हजारों की तादाद में नियुक्तियां हुईं किन्तु ये सौभाग्य  सिर्फ उन्ही को प्राप्त हुआ   जिनके पास रिश्वत देने का इंतजाम था.उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह थे .
 घटना दो -जब१९९५-९६ में  प्रदेश के प्रख्यात आदिवासी नेता शिव भानु सिंह सोलंकी  को मुख्यमंत्री प्रस्तावित  किया जा रहा था,अधिकांस विधायक उनके साथ थे  .श्री अर्जुनसिंह जी का भी  वरदहस्त उनके साथ था तो उनके रिश्तेदार दिग्विजय सिंह ही मुख्य मंत्रीपद  पर आसीन कैसे हो गए? 
  घटना तीन-राजीव गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के कर्णाटक अधिवेशन में और कांग्रेस के इतिहास में शायद पहली बार और अंतिम बार ऐंसा हुआ की २० सदस्यीय  कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव गुप्त मतदान से हुए.सबसे ज्यादा वोट अर्जुनसिंह को मिले वे कांग्रेस के नंबर वन हो चुके थे ,फिर ऐंसा क्या हुआ की नरसिम्हाराव ने सभी चुने गए कार्य समिति सदस्यों से त्याग पत्र ले लिया और बाद में पराजित लोगों को कार्य समिति में लपक लिया .अर्जुन सिंह शानदार विजय के बाद भी २० वें नंबर पर नामजद कैंसे हो गए ?
          
    घटना चार -देश भर से अर्जुन सिंह को समर्थन मिल रहा था ,लेकिन वे बार बार सोनिया गाँधी को आगे आने -बागडोर संभालने ,नेत्रत्व करने की विनती करते रहे और सोनियाजी  ने उनकी एक नहीं सुनी .नरसिम्हाराव ने तो उन्हें लगभग अप्रसांगिक कर दिया और फिर दाऊ ने तिवारी कांग्रेस बनाकर देश की कौनसी सेवा की .आज न तो वो कांग्रेस है और न वे तिवारी {नारायण दत्त} इस लायक हैं की दाऊ को श्रधा सुमन अर्पित कर सकें .
                                            इन घटनाओं के अलावा और भी ढेरों हैं जो दाऊ अर्जुन सिंह के व्यक्तित्व पर रौशनी डालती हैं .अर्जुनसिंह के कई रूप थे वे कुँअर अर्जुन सिंह के रूप में भारत के सामंत वर्ग को सुहाते थे.वे सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए कभी कभार कल्याणकारी नीतियों पर सकारात्मक वक्तब्य रखकर वामपंथ को बहलाते थे. वे वामपंथी वुद्धिजीवियों के आश्रयदाता ,राजीव गाँधी साक्षरता मिशन के प्रणेता और भारत ज्ञान -विज्ञान -समिति जैसी अनेकों एन जी ओ के सृजनहार थे .
   श्री अर्जुनसिंह जी ने डी पी मिश्र  और पंडित जवाहरलाल नेहरु कि मिश्रित नीतियों को अपना अलग पैटर्न दिया. मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक उन पर भरोसा करते थे,क्योंकि दाऊ अक्सर दक्षिण पंथी हिंदुत्व वाद पर आक्रमण करते रहते थे ,मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी उन तत्वों का विरोध किया हो जो minorities के नाम पर समाज में और देश में ग़दर मचाते रहे.अजीत जोगी जैसे ब्यूरोक्रेट और टेक्नोक्रेट अर्जुन सिंह का सहारा पाकर सत्ता में पहुंचे फिर उन्होंने वक्त पर अर्जुन सिंह का साथ क्यों नहीं दिया ?
     देश कि जनता  ने अर्जुन सिंह को खूब प्यार दिया . वे प्रधानमंत्री वनने कि स्थिति में भी एक दो बार आ चुके थे किन्तु उनका राजनीतिक पराभव इस ढंग से हुआ  कि वे  सीधी और चुरहट तक सीमित रह गए . जीवन के अंतिम आम चुनाव में अपनी वेटी को भी हारता देखा . जिन्दगी भर नेहरु परिवार को देश से ऊपर माना .दाऊ का अंत क्या   द्वारका के पतन जैसा नहीं है .
          दुर्वासा के श्राप से द्वारका के यादव जब आपस में लड़ मरे तो कृष्ण ने अपनी अंतिम यात्रा के समय अर्जुन को हस्तिनापुर से बुलवा भेजा .अर्जुन के साथ बचे खुचे यादवों ,औरतों ,बच्चों को हस्तिनापुर भेज दिया.रास्ते में झाबुआ के भीलों ने उन सबको लूट लिया .अर्जुन ने गांडीव कि धोंस दी तो भील बालकों ने अर्जुन का गांडीव भी छीन लिया ...अर्जुन को मार पीट कर जिन्दा छोड़ दिया बाकि सभी धन दौलत लूट ली .



     लोक प्रसिद्द है .
    पुरुष बली न होत है ,समय होत बलवान .
     भिल्लन लूटीं गोपिका ,वही अर्जुन वही बाण ...
      
  दाऊ  अर्जुन सिंह को -जन -काव्य भारती की ओर से श्रद्धा सुमन समर्पित ....                                                                           
              श्रीराम तिवारी  

कूड़ेदान से अन्न बीनते , स्वर्णिम देश के बॉल गोपाला {कविता}

     एक हैं कोई शख्स जबरदस्त , शाहिद उस्मान  बलवा .
     चोरी -चोरी   सीना -जोरी ,  स्पेक्ट्रम ले गया ठलवा..
      कभी एक अंटी न थी जेब में , अब खा रहा है  हलवा .  
     पूँजी के लुटेरों ने दिखाया , भृष्टाचार का जलवा ..

         ==========+=========+=========== 
      आजकल मीडिया में कुख्यात है ,
      हसन अली खां घोड़ेवाला.
       अरे ये तो राजा का भी बाप निकला ,
      अरबों का करे घोटाला ..
       सत्ता जिसकी करे चाकरी ,
      काले धन का करे हवाला .
      यदि न्यायपालिका सजग न होती ,
      तो कोई नहीं था टोकनेवाला ..
      हतभागी ये  मंत्री  संतरी ,
      चोर -उचक्के  जीजा -साला .
       मुल्क के मालिक हुए भिखारी ,
       जान लेय सो जाननहारा..
       खाद बीज के दाम चौगुने,
        फसल पै पड़ता सूखा पाला. 
         कूड़ेदान से  अन्न बीनते   ,
         स्वर्णिम देश के बाल-गोपाला..
       
           श्रीराम तिवारी
        

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

यूपीए द्वितीय ओर वामपंथ दोनो की अग्नि परीक्षा होने वाली है .

     पाँच राज्यों -पश्चिम बंगाल,तमिलनाडु,केरल,असम और पुद्दुचेरी के विधान सभा चुनाव कार्यक्रम घोषित हो चुके हैं . देश की राजधानी दिल्ली में और सम्बंधित राज्यों में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गईं हैं.घोषित चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक -तमिलनाडु ,केरल और पुद्दुचेरी में एक ही चरण में १३ अप्रैल को जबकि  असम में दो चरणों में ४ और ११ अप्रैल को मतदान होगा . सबसे लम्बी चुनावी प्रक्रिया पश्चिम बंगाल   में निर्धारित की गई है , जहां १८ अप्रैल से १० मई तक ६ चरणों में मतदान कराया जायेगा . इन पाँच राज्यों 
       के चुनावों को स्थानीय मुद्द्ये तो प्रभावित करेंगे ही,साथ ही महँगाई , भृष्टाचार और आर्थिक नीतियों का असर भी पडेगा.  ये विधानसभा चुनाव सम्बन्धित राज्यों के कामकाज की समीक्षा रेखांकित करेंगे,साथ ही केद्र की सत्तारूढ़ संयुक प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कामकाज पर भी  लघु जनमत संग्रह के रूप में देखे जायेंगे ,केंद्र में आसीन संप्रग सरकार का नेत्रत्व का रही कांग्रेस इन चुनाव वाले राज्यों में से सिर्फ दो में -असम और पुदुचेरी में ही सत्ता में है. तमिलनाडु में उनके 'अलाइंस पार्टनर'द्रुमुक की सरकार है. कांग्रेस का अधिकतम जोर यही हो सकता है कि यथास्थिति बरकरार रहे.आसार भी ऐसे ही बनते जा रहे हैं.उक्त पाँच राज्यों में देश कि तथाकथित मुख्य विपक्षी पार्टी का कोई वजूद नहीं है अतेव कांग्रेस को  भाजपा  कि ओर से संसद में भले ही  चुनौती  मिल रही हो किन्तु इन राज्यों में कोई चनौती नहीं है.
   पश्चिम बंगाल में पिछले करीब ३५ साल से माकपा के  नेत्रत्व में वाम मोर्चा काबिज है,उसे कामरेड ज्योति वसु का शानदार नेत्रत्व मिला था . उनके बाद का नेत्रत्व भी कमोवेश सुलझा हुआ और सेद्धान्तिक क्रांतीकारी आदर्शों का तरफदार है किन्तु भूमि सुधार कानून लागू करने,मजदूरों -किसानो को संगठित संघर्ष से अपने अधिकारों कि रक्षा का पाठ पढ़ाने,वेरोज्गरी भत्ता देने,राज्यमें धर्म निरपेक्ष मूल्यों कि हिफाजत करने के वाबजूद आज का नौजवान बंगाली आर्थिक सुधारों के पूंजीवादी पैटर्न का हामी हो चला है.उसे किसीप्रजातांत्रिक  क्रांति या समाजवाद में कोई दिलचस्पी नहीं,वह या तो  हिंसक -बीभत्स  नग्न छवियों का शिकार हो चला है,या उग्रवाम कि ओर मुड़ चला है.  अतः उसे प्रतिकार कि भाषा का सिंड्रोम हो गया है ,इन तत्वों ने बंगाल में माओवाद,ममता ,तृणमूल और गैरवामपंथी दकियानूसी जमातों का 'महाजोत' बना रखा है ,कहने को तो कभी कांग्रेस और कभी तपन सिकदर भी इनके साथ हो जाते हैं किन्तु ये उनका एक सूत्रीय संधिपत्र है कि वाम को हटाओ .बाकि एनी सवालों ,नीतियों पर इन में जूतम पैजार होती रही है ,अतः कोई आश्चर्य नहीं कि घोर एंटी इनकम्बेंसी फेक्टर के वावजूद वाम फिर से{आठवीं बार}  पश्चिम बंगाल कि सत्ता का जनादेश प्राप्त करने में कामयाब हो जाये.
                                        केरल में तो आजादी के बाद से ही दो ध्रुवीय  व्यवस्था कायम है .प्रतेक पाँच साल बाद सत्ता परिवर्तन में कभी कांग्रेस  के नेत्रत्व में यु डी ऍफ़ और कभी माकपा के नेत्रत्व में लेफ्ट .अभी लेफ्ट याने वाम मोर्चे कि पारी है देश और दुनिया के राजनीतिक विश्लेषक , पत्रकार ,स्तम्भ लेखक और वुद्धिजीवी मानकर चल रहे होंगे कि अबकी बारी यु डी ऍफ़ याने कांग्रेस के नेत्रत्व में केरल कि सरकार बनेगी.विगत एक साल से यु पी ऐ द्वितीय कि सरकार कि जिस तरह से भद पिट रही है ,एक के बाद एक स्केम का भन्दा फोड़ हो रहा है ,कभी शशी थरूर ,कभी पी जे थामस और कभी टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला ,ये सब घोटाले न जाने देश को कहाँ ले जाते यदि न्यायपालिका कि भृष्टाचार के खिलाफ ईमानदार कोशिशें न होतीं !इन सब भयानक भूलों चूकों को केरल कि जनता भी जरूर देख सुन रही होगी.केरल कि शतप्रतिशत साक्षरता और साम्प्रदायिक सहिष्णुता के परिणाम स्वरूप कोई आश्चर्य नहीं कि केरल में भी वामपंथ पुनः सत्ता में आजाये.
          तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम् करूणानिधि अब जनता और राज्य पर बोझ बन चुके हैं , उनके परिवार का हर वंदा और वंदी बुरी तरह बदनाम हो चुके हैं ,ऐ राजा,कनिमोझी ,अझागिरी ,दयानिधि मारन,स्टालिन और उस कुनवे का हर शख्स आपादमस्तक पाप पंक में डूब चूका है सो द्रुमुक तो डूवेगी ही, अपने साथ कांग्रेस को भी खचोर डालेगी, कांग्रेस का नेत्रत्व अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह करने में असफल रहा सो खमियाजा तो भुगतना ही होगा .जयललिता को पुनः सत्तासीन होने कि तैयारी करनी चाहिए .
        जहां तक भाजपा कि बात है , इन चुनावों में उसके सरोकार कहीं भी उपस्थिति दर्ज करने में असमर्थ हैं.कुल मिलाकार इन चुनावों के नतीजे केंद्र कि संप्रग सरकार , कांग्रेस , वामपंथ , के भविष्य  की दिशा तो तय करेंगे ही, साथ ही इन प्रान्तों की जनता का वर्तमान भृष्ट व्यवस्था से सरोकार रखने वालों के प्रति क्या सोच है ?यह भी जाहिर होगा .....श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 3 मार्च 2011

दरवेश का चोला पहनने से डाकू- संत नहीं हो जाते...

 लगता है कि  आदरणीय मुकेश धीरूभाई अम्बानी को बोधत्व प्राप्त हो गया है. देश के सबसे बड़े रईस और रिलायंस इंडस्ट्रीज के सर्वेसर्वा श्री मुकेश अम्बानी ने गत मंगलवार {१ मार्च-२०११}को नई दिल्ली में  फिक्की {फेडेरशन ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज} के ८३ वें अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए जो आप्त वाक्य कहे वे उन्हें भारतीय इतिहास में अमरत्व प्रदान करने के लिए काफी हैं. उपस्थित तमाम दिग्गज  पूंजीपतियों को सम्बोधित करते हुए मुकेश भाई ने कहा कि 'अब वक्त आ गया है कि हम पूंजीपति लोग - सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन को अपने एजेंडे में शामिल करें' उन्होंने व्यवसाय, काराबोर  और कार्पोरेट सेक्टर को जन-सरोकारों से जोड़ने कि बात कहकर न केवल उद्द्योग जगत बल्कि देश और दुनिया के वामपंथी विचारकों को भी  आश्चर्य चकित कर दिया  है.
      मुकेश अम्बानी ने अमीर भारत और गरीब भारत के बीच की बढ़ती जाती खाई की ओर उपस्थित उद्योगपतियों का ध्यानाकर्षण करते हुए आह्वान किया कि वे इन दोनों -शाइनिंग इंडिया और निर्धन भारत को जोड़ने के लिए काम करें . उन्होंने कहा- 'कारोबार का एकमात्र उद्देश्य मुनाफा ही नहीं होना चाहिए' मुकेश भाई ने कहा -सिर्फ कार्पोरेट सामाजिक जबाबदेही{सी एस आर} कि जगह अब सतत सामाजिक सरोकार {continuous  socail business }के माडल को अपनाया जाना चाहिए. सामाजिक जबाबदेही के साथ वित्तीय जबाबदेही भी जरुरी है. किसी कारोबार का एकमात्र  उद्देश्य मुनाफा कमाना ही नहीं होना चाहिए. जब तक लाखों लोगों के जीवन को बदलने वाले व्यापक उद्देश्य के साथ कारोबार
नहीं किया जायेगा- कोई भी कारोबार सतत नहीं चल पायेगा.
      उन्होंने देश के दो पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहा -एक तरफ तो उद्द्योग जगत को भारी लाभ हो रहा है और दूसरी ओर ऐसे  करोड़ों लोग हैं जो मूल भूत सुविधाओं -स्वच्छता ,पीने का पानी ,स्वास्थ सेवाओं से महरूम हैं.
      मुकेश भाई ने कहा" कि देश कि प्रति-व्यक्ति आय १००० डालर से कम है, जो कि चीन के एक तिहाई से भी कम है. उन्होंने भारतीय मध्यम वर्ग को विराट संभावनाओं का कारक बताते हुए  कहा कि यदि एक अरब से ज्यादा विपन्न  लोग असंतुष्ट हैं, तो बाकि के संपन्न लोग खुशहाल कैसे  रह सकते हैं? भारत कि विकास  गाथा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक देश के करोड़ों लोगों को प्रगति में भागीदार नहीं बनाया जाता."
        जहां तक मुकेश अम्बानी का इंडिया और भारत के बीच खाई पाटने कि सद- इच्छा का सवाल है  तो उसका हमें सम्मान करना चाहिए. किन्तु एक अज्ञात भय भी है कि उस कुत्सित विचार का क्या होगा? जो सुनील मित्तल भारती ने इसी फोरम में ,वर्ष -२००८ में व्यक्त किया  था . तब माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंग जी के समक्ष उनके इस आग्रह पर कि उद्योग जगत को देश के गरीबों का भी ध्यान रखना चाहिए  ,निजी क्षेत्र में उच्च पदों पर ज्यादा  आकर्षक वेतन देने से सरकारी क्षेत्र पर दवाव पड़ता है, आप सी ई ओ लोगों को भारी भरकम वेतन नहीं लेना चाहिए ,वगेरह -वगेरह .सुनील मित्तल भारती ने तब तपाक से उत्तर दिया "कि  हम  यहाँ व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाने आये हैं जन सरोकारों या जनता कि परेशानियों से हमें कोई लेना-देना नहीं" सुनील मित्तल भारती  के इस कटु वक्तव्य  से तब मुझे बहुत बुरा लगा था तत्काल एक आलेख भी उनके अमर्यादित व्यवसायिक सरोकारों पर मैनें  लिखा था -जिसका तात्पर्य यह  था कि भारतीय लोकतंत्र पर पूंजीपतियों का कब्जा कराने में सिद्धहस्त  श्री मनमोहन सिंग जी को एक नव-धनाड्य पूंजीपति के आगे इस तरह असम्मानित होना स्वीकार नहीं करना चाहिए .लोकतंत्र के लिए यह उचित सन्देश नहीं है.लगता है कि सुनील मित्तल भारती ने माल्थस ,एडम स्मिथ और कीन्स  को पढ़े बिना ही कार्पोरेट जगत में कुछ उसी तरह से अवसरों को भुना लिया जैसे कि युद्धकाल में वेइमान बनिया  कमाता है.
              आज      श्री मुकेश अम्बानी और श्री सुनील मित्तल भारती दोनों ही भारत के दिग्गज पूंजीपति हैं. दोनों ने खूब धन कमाया. दोनों का राजनीती और समाज पर अपनी-अपनी हैसियत का प्रभाव है ,किन्तु दोनों के विचारों में दो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर क्या दर्शाता है? मित्तल का दर्शन है "मुनाफा और केवल मुनाफा" उसका परिणाम होगा शोषित आवाम का विद्रोह या जन-क्रांति .
 मुकेश अम्बानी ने जो जन-कल्याणकारी कार्पोरेट कल्चर कि पैरवी की है वो नयी नहीं है .विगत कुछ महीनों पहले अमेरिकी पूंजीपति बिल गेट्स ने ,वारेन बफेट  ने अपनी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा जन सरोकारों में लगाने का ऐलान किया था .उनका कहना था कि जो जहां से लिया वो वहां वापिस तो नहीं किया जा सकता किन्तु उसका आंशिक तो लौटाया ही जा सकता है. भारत के अजीम प्रेमजी भी इस विषय में पहल कर  चुके हैं .इससे पहले भारत के स्थापित पूंजीपतियों  -बिडला ,टाटा और अन्य पूंजीपतियों ने भी "दान" और 'लोक- कल्याण ' कि परम्परा में सदियों से  अपनी भागीदारी जारी रखी थी. 
          जिस देश में इतने दूरदर्शी और घाघ पूंजीपति होंगे वहां जनता का जनाक्रोश समय-समय पर दान -दक्षिणा के नाम पर  निसृत होते रहने से किसी तरह कि बगावत या क्रांति कि संभावना नहीं रहेगी .  .भारत और अमेरिका में इसी वजह से क्रांति कि संभावनाएं वैसी नहीं वन पा  रही हैं जैसी कि सोवियत संघ ,चीन ,क्यूबा ,वियेतनाम या कोरिया में बनी थीं .आज अरब   राष्ट्रों में क्रांति के नाम पर जो बबाल मच  रहा है उसका कारण भी वही व्यवस्था जनित आक्रोश है .चूँकि वहां के  पूंजीपति और शासक  वर्ग सुनील मित्तल भारती कि तरह  जनता के सरोकारों को अपने व्यापारिक  और प्रबंधकीय  सरोकारों से अपडेट नहीं कर पाए अतः वे जनता के हाथों पिट रहे हैं ,देश कि सत्ता  और लूटी गई सम्पदा का अधिकार भी उनसे छीना जा रहा है. भारत में जब तक मुकेश अम्बानी जैसे लोग अथाह पैसा कमाते हुए गरीब जनता का मुंह बंद करने के लिए  तथाकथित  जनकल्याणकारी सरोकारों कि पैरवी करते रहेंगे  तब तक जनाक्रोश सघन नहीं हो पायेगा , जब तक जनाक्रोश सघन नहीं होगा तब तक आर्थिक-सामाजिक और राजनैतिक  क्रांति कि संभावनाएं भी क्षीण रहेंगी . अस्तु! मुकेश अम्बानी के वक्तब्य को एक घाघ पूंजीपति की वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में भारत कि निर्धन जनता को निरंतर कष्ट उठाते रहने , शांति बनाये  रखने ,क्रांति से दूर रहने,  इंडिया बनाम भारत में मेल -मिलाप बनाये रखने ,  और पूंजीपतियों को राज्य सत्ता का  कृपा- भाजन बनाये रखने  में देखा जाना चाहिए.
                                       श्रीराम तिवारी