शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

भारत की जातीय व्यवस्था को अमानवीय बनाने के लिए विदेशी हमलावर सर्वाधिक जिम्मेदार हैं।

ताजा खबर है कि आइन्दा गुजरात के पटेलों को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा।  संविधान निर्माताओं ने सिर्फ दस साल के लिए केवल  एससी/एसटी को ही यह आरक्षण  प्रस्तावित किया था। लेकिन उनका आरक्षण अब शायद सनातन के लिए पक्का हो गया है। वीपीसिंह के राज में मंडल आयोग की सिफारिश पर पहले केवल कुछ  खास  किस्म के  समाज पिछड़े मानकर उपकृत किये गए थे । और  अब शुद्ध  सामाजिक दादागिरी की बदौलत  जाटों,गूजरों और पटेलों को आरक्षण  दिया जाने वाला  है। सड़कें-पुल उड़ाने,रेल-पटरियाँ उखाड़ने ,बसें जलाने वालों  - सामूहिक बलात्कार के दोषियों को उनके दुष्कृत्य  के लिए  उचित दण्ड दिए जाने  के बजाय आरक्षण का शौर्य पदक  पेश किया जा रहा है। अब तक जिन्हें  कोई आरक्षण नहीं मिला है और आइन्दा भी घोर गरीबी - भुखमरी के वावजूद जिन्हें 'सवर्ण' जातिु का ठप्पा लगा होने से कोई आरक्षण नहीं मिलना है ,वे निर्धन मजदूर - किसान क्या मनुवादी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं ? क्या अब यह मान लिया जाए कि जिन्हे आरक्षण रुपी कवच-कुंडल मिल चुके हैं ,वे आइन्दा 'अवर्ण ' नहीं रहेंगे बल्कि 'सवर्ण' हो  जाएंगे ?इन सवालों की पड़ताल किए बिना भारतीय आवाम  का सर्व समावेशी सामूहिक विकास असम्भव है !हमलावर

उत्तर वैदिक काल से लेकर ईसापूर्व पांचवीं -छठी शताब्दी तक अधिकांश भारतीय कबीलाई समाजों का वैदिक वर्ण व्यवस्था में पर्याप्त रूपांतरण  हो चुका था। संस्कृत भाषा का विशद वाङ्ग्मय और उसके वैदिक सूत्र ही इस धारा के प्रमुख उत्प्रेरक -पथप्रदर्शक रहे हैं। शिक्षित भद्रलोक  के लिए वेद ,उपनिषद, स्मृति ,आरण्यक  संहिताएँ और पुराणों के  दिशा निर्देश अनुकरणीय रहे हैं। इस प्राच्य सभ्य वाङ्ग्मय में आदिम साम्यवाद व  सामाजिक समरसता दोनों मौजूद थे।  इसमें रंचमात्र जातीय या सामाजिक असमानता  नहीं थी । यह विशुद्ध आध्यात्मिक उत्थान की वैश्विक यात्रा थी।  विकासवादी धारा के समानांतर देश काल परिश्थिति के प्रभाव से कुछ 'आदिम-कबीलाई ' समाजों ने सभ्यता के  प्रारंभिक दौर में  'लोक -मान्यताएँ स्थिर बना लीं थीं। उन्हें  पत्थर की लकीर बनाकर सदा के लिए आत्मसात कर लिया गया । अतः उनकी अन्वेषण क्षमता प्रायः जड़वत होने लगी । और उनकी  यह तुष्ट जीवन शैली ही  अतीत के  अंधानुकरण को मजबूत करती रहीं। जबकि क्रांतिकारी आर्य कबीले अपनी सृजनशीलता और वैज्ञानिक सोच से ऐतिहासिक विकास के हर मोड़ पर सभ्यता की उत्तरोत्तर छलाँग लगाते चले गए । सिर्फ ऋग्वेद की वैश्विक प्रमाणिकता ही नहीं बल्कि  वेदांत के  अनुशीलन करने वाले वैदिक समाज की उत्कृष्ट रचनाधर्मिता को  भी संसार की  समस्त पुरातन सभ्यताओं में सर्वोच्च सम्मान  प्राप्त है। निसंदेह यह वैदिक समाज ही अतीत के भद्रलोक में सबसे पहले  दीक्षित  होना प्रारम्भ हुआ था। कालांतर में वर्णाश्रम की तरह  वर्ण व्यवस्था उसकी अपनी वैज्ञानिक खोज रही।यह  पुरातन सामाजिक विज्ञान के आदिम  अनुसंधानों का प्रयोग मात्र था। इसे विकृत और पतनशील बनाने  वाले  विदेशी आक्रान्ता ही हैं। 

 पांच हजार साल पुरानी उक्त  वर्ण व्यवस्था के अवशेषों-भग्नावेशों को अब 'ब्राह्मणवाद' कहा जा रहा है। विगत कुछ वर्षों से राजनीतिक  मकसद के लिए कुछ लोग इसे  मनुवाद के नाम से भी गरियाते  देखे गए हैं। अनार्य या अवैदिक  सामाजिक धारा में जो  वैदिक सूत्रों  को नहीं मानते थे , जो अपभ्रंस ,पाली,प्राकृत,द्रविड़ और अन्य गैर संस्कृत भाषाओँ से योगरूढ़ हुए , वे  ग्राम्य जनों और आदिवासी समाजों की 'लोक मान्यताओं' का प्रमुख आधार बने रहे । कालान्तर में  वेदांत के ही कुछ विज्ञान सम्मत -प्रगत -अनीश्वर वादी सूत्रों को कपिल,कणाद ,चार्वाक, बुद्ध ,महावीर और नानक  ने क्रमश : सांख्य ,नास्तिक,बौद्ध ,जैन और सिख पंथ की स्थापना की । और भारतीय समाज  की ये दोनों प्रमुख सामाजिक धारायें-वैदिक और अवैदिक के दवंद से  ही  जातीय-समाज व्यवस्था के उत्थान -पतन की प्रक्रिया जारी  रही हैं। लेकिन वह अंतर्दवन्द कारी होते हुए भी उतनी  जटिल या भयावह नहीं थी। तब  दासीपुत्र जाबालि,नारद ,विदुर को उनके ज्ञान की बदौलत 'आर्यपुत्रों 'से भी श्रेष्ठ मान मिला करता था।

विदेशी आक्रमण कारियों ने  वेदमत और लोकमत के  दवंद की  इन दोनों धाराओं से बेजा फायदा  उठाया। अपने निहित स्वार्थों के लिए हर विदेशी आक्रान्ता कबीले  और कॉम  ने भारतीय समाज की इन धाराओं  के सनातन द्वन्द और  इस वर्ण -जाति व्यवस्था से खूब फायदा उठाया । चूँकि इसे यथावत बनाए रखने में ही उनका स्वार्थ सध रहा था ,इसलिए किसी भी विदेशी आक्रमणकारी ने इस जातीय व्यवस्था को छूने की भी हिम्मत नहीं दिखाई। जातिवाद समाप्त करने या उसे मानवीय रूप प्रदान करने की बुद्ध ,गोरक्षनाथ ,रामानन्द ,
कबीर,रैदास और नानक जी ने बहुत कोशिश की थे। लेकिन उनके अनुयाई तो और ज्यादा नयी  नयी जात -पंथ  बनाते चले गए।  जो दमित  ,दलित  और शोषित थे उन्हें  कभी सम्मान नहीं मिला।  अब यदि  जातीवादी  आधार पर आरक्षण से यह सम्मान वापसी होती है तो शुभस्य शीघ्रम !

 भारत के जातीय विमर्श को समझने के लिए अधिकांश समाज शास्त्रियों ने अंग्रेजों और यूरोपियन का विशेष  अनुकरण किया है।  प्रगतिशील वामपंथी  समाज शास्त्री अपने अहंकार में डूबकर वेद ,उपनिषद और मनुस्मृति को पढ़ना तो दूर उसे छूना भी प्रतिगामी समझते हैं। अतएव वे  पुरातन भारतीय समाज की सांस्कृतिक धाराओं को यूरोप और पश्चिम के चस्मे से देखने के लिए बाध्य  हैं। भारत के दक्षिणपंथी तथाकथित भगवा दल वाले तो और ज्यादा कूप मण्डूक हो रहे  हैं , वे यूरोप की सांइस -टेक्नॉलजी का भरपूर उपयोग करते हुए ,अपने पुरातन आर्य ऋषियों के चमत्कारों का अतिश्योक्तिपूर्ण बखान करने में मग्न रहते  हैं। आरक्षण सिद्धांत पेश करने वाले जातीयतावादी नेताओं ने भी जातीय वैमनस्य बढ़ाने में  हदें पार कीं हैं। इसीलिये  इस कृत्य के लिए  कुछ हद तक ये तीनों  धड़े  जिम्मेदार हैं। लेकिन भारत की जातीय व्यवस्था को अमानवीय  बनाने  के लिए तो विदेशी आक्रान्ता  -हमलावर सर्वाधिक   जिम्मेदार रहे  हैं।

 ब्राह्मणों ,क्षत्रियों,वैश्यों के खिलाफ भारत के शेष समाजों को खड़ा करने में कभी बौद्धों और शक-हूणों ने भी  भारी मशक्कत की है ।  इस्लामिक  हमलावर कबीलों और सुलतानों ने भी इसमें खूब रोटियाँ सेंकीं । लेकिन  ईस्ट इण्डिया कम्पनी और अंग्रेजों की भूमिका सबसे खास रही ।अंग्रेज  कूटनीति का असर ही था कि वे शुरुं में  हजार दो हजार अंग्रेज ही आये और ३३ करोड़ [तत्कालीन] भारतीयों  को गुलाम बना लिया। उन्होंने मुसलमानों हिन्दुओं द्रविड़ों ,मराठों और सिखोंको अलग-अलग धड़े में बांटने के लिए भारतीय इतिहास को चालाकी से मिथ बता दिया। यह सवाल उठना लाजमी है कि  जब भारतीय या हिन्दुओं के वेद ,पुराण,संहिताएं मिथ हैं ,उनकी सब  मान्यताएं मिथ हैं ,तो फिर उनके आधार पर खड़ी जातीय व्यवस्था ऐतिहासिक कैसी हो गयी ? यदि यह जातीय सामाजिक वयवस्था एक सच है तो उसका जनक भारतीय वैदिक वाङ्ग्मय  मिथ कैसे  हुआ ?

 आजादी के आंदोलन के दौरान कुछ जातीय नेता ,कुछ मजहबी और साम्प्रदायिक नेता ,कुछ अंग्रेजी चापलूस    अंग्रेजों की दुर्नीति का शिकार हो गए। उन्होंने कांग्रेस और गांधी जी को खूब परेशान किया। वेशक इस जातीय और समाज की दयनीय स्थिति के लिए कुछ ब्राह्मण भी दोषी अवश्य होंगे। किन्तु सामाजिक शोषण के लिए   महज ब्राह्मणों को दोष देना सरासर अन्याय  है। यह सर्व विदित है कि आरक्षण की वैशाखी  लिए 'मनुवाद' की कल्पना गढ़ी गयी है। जबकि  मनुवाद व  ब्राह्मणवाद का कोई सार्थक और सीधा संबंध नहीं है । मनु एक राजा थे ,क्षत्रिय थे। तपस्या की होगी सो वे ऋषि हो गए। उन्होंने एक आचार संहिता बना दी ,कुछ लोगों को पसंद आयी। कुछ ने नहीं माना। इसमें ब्राह्मण कहा से आ गए ? मनु स्मृति पढ़े बिना ही उस पर दोषपूर्ण रुबाइयां लिखना एक किस्म का सामाजिक  अपराध ही  है। सामाजिक -आर्थिक शोषण तो सारे संसार में व्याप्त है ,क्या यह सब ब्राह्मणों ने ही किया है ? क्या अफ्रीका के नेल्सन मंडेला को ,क्यूबा के फीदल कास्त्रो को या अमेरिका के  मार्टिन लूथर 'किंग' को  भारत के निर्धन वामनों ने जेलों में डाला था  ?क्या ये सभी मनुवाद के शिकार हुए ?

भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के दौर में ,२० वीं -२१ वीं शताब्दी में भी भारत की कुछ  प्राचीन -सामन्तयुगींन धाराओं का असर  देखा जा सकता  है। सामाजिक  लोक व्यवहार में  'भद्रलोक 'और 'भदेस' दोनों ही धाराओं ने हर  किस्म की वैज्ञानिक क्रांति का हमेशा ही  विरोध किया है।  उन्होंने  आधुनिक भौतिक वैज्ञानिक क्रांति  को तो आत्मार्पित कर लिया ,किन्तु हर किस्म की नकारात्मक मान्यताओं व  छुआछूत की परम्परा को ज्यों का  त्यों शाश्वत 'अछूत' ही बनाए रखा है । यह निर्मम और शोषणकारी -अमानवीय  सिलसिला -मामूली  हेर -फेर  के साथ २१ वीं सदी  में  भी यथावत जारी है। बड़े ही अचरज की बात है कि जो  वर्ण व्यवस्था किसी भी  समाज विशेष को संतुष्ट नहीं कर पाई। वह  सामन्तकालीन समाज व्यवस्था मरी हुई  बंदरिया की मानिंद अभी भी  अपने  अतीत के व्यामोह से चिपकी हुई है। अतीत में प्रबुद्ध कबीलों ने जब इस व्यवस्था को जरूरत के अनुसार ईजाद किया होगा, शायद  जिन्हे यह पसंद नहीं आयी वे तब  के प्रथम विद्रोही या क्रांतिकारी रहे  होंगे। लेकिन ऐंसे विद्रोही कबीले हर दौर में पिछड़ते ही चले गए। जिन् बाह्य  आक्रमणकारी  -तोरमाण ,शक-हूण -कुषाण  , उज्वेग और मुगल  जैसे बर्बर कबीलों ने इस तत्कालीन चातुर्वर्ण्य  सभ्यता' को  अपना लिया और वे  यहाँ के शासक भी  बन बैठे। और जिन तुर्क,गुलाम और मंगोलों ने इसे  बहुत बाद में अपने तरीके से अपनाया  उन्हें दारा  शिकोह या  शरमद जैसी शहादत प्राप्त हुई । आंशिक रूप से इस  वर्ण व्यवस्था का कायल  हो जाने के कारण ही हुमांयू पुत्र अकबर  को हिन्दुस्तान में इतना बड़ा मुकाम और रुतवा हासिल हुआ । आमेर के राजपूत राजा भारमल की पुत्री जोधा से अकबर की शादी कोई परी कथा या प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह जातीय और  वर्णव्यवस्था के सामने अकबर की कदमबोसी कही जा सकती  है। 

 जिन् स्थानीय आदिवासियों और अन्य भारतीय समुदायों  ने इसे  तहेदिल से स्वीकार नहीं किया वे मानव  समूह अपने पिछड़ेपन के लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते जो खुद ही सनातन से सताए हुए हैं। इस आजाद  भारत में अब भी कुछ  लोग अपने-आपको  दलित-पिछड़े  मानकर  ही चल रहे है। वे  यदि इस वर्ण-जाति आधारित  व्यवस्था को ही नकार दें तो  उन्हें आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। यह  बड़ी विचित्र स्थिति है कि  जो लोग इस वर्ण जाति  की व्यवस्था से तृस्त  हैं वे  इसे नकारने के बजाय आरक्षण सिद्धांत पेश कर रहे हैं। मानों इस आरक्षण रुपी हर्जाने से उन्हें सामाजिक सम्मान अपने-आप प्राप्त होने लग जाएगा !ऐंसा आभासित होता है कि  भारत में कुछ  सम्पन्न और खाते -पीते  लोगों को  पिछड़ा- दलित कहलाने  का पैदायशी  शौक है। वास्तव में ऊंच नीच -छुआछूत तो  राष्ट्रीय अभिशाप है। लेकिन आरक्षण के बहाने इसे और मजबूत क्यां बनाया जा रहा है ?  भारत में अमीरी  या   धन -दौलत से सामाजिक सम्मान शायद ही किसी को मिला हो ! तात्या टोपे ,मंगल पांडेय गरीब थे या अमीर इससे नहीं बल्कि आजादी के लिए शहादत दी इससे  सम्मान के पात्र  हो गए। शहीद चन्द्रशेखर आजाद ,भगतसिंह ,सुखदेव ,राजगुरु को  भरपेट खाना कभी नहीं मिला बल्कि देश की आजादी के लिए वे  अनेक कष्ट झेलते हुए शहीद हो गए। उन्हें जो सम्मान प्राप्त है वह किसी आरक्षण धारी  को कभी नहीं मिल सकता। केवल  अधिकार की बात करना सच्ची वतनपरस्ती उन्हीं है। देश के लिए त्याग करना पर ही सम्मान का हक मिल सकता है।

वास्तव में  सामाजिक हींन बोध ही बेहद पतित  अवस्था है। जब कोई कहता है कि ' मै पिछड़ा या दलित हूँ' तो इस पतित नकारात्मक सोच के साथ ही वह मानसिक रूप से विकलांग [अब दिव्यांग] होने लगता है। लेकिन जब कोई चिराग पासवान या जीतनराम माझी कहता है कि  ''हम  अब आरक्षण नहीं चाहते ''- ''हमारी जगह दूसरे गरीबों को आरक्षण मिलना चाहिए '' - तो इतना कह देने मात्र से  ही उनका सामाजिक  कद ऊँचा होने लग  जाता है। फिर वह किसी ब्राह्मण से कमतर नहीं रह जाता। वह अपने चिराग नाम को सार्थक कर लेता है। उसे  अब पासवान शब्द भी पावन लगता  है। जब जीतनराम माझी स्वेच्छा से आरक्षण  सुविधा का त्याग करते हैं तो  वह दलित नहीं रह जाते। बल्कि  जीतनराम हो जाते हैं। और अब उन्हें माझी  शब्द से दलित होने का  नहीं बल्कि श्रेष्ठ होने  का भाव होने  लगता है। यही  उत्कृष्ट मानसिक अवस्था है जो  मनुष्य मात्र को सामाजिक तौर पर श्रेष्ठ बना  सकती है। आरक्षण की वैशाखी से कोई किसी दौड़ में जीत हासिल नहीं कर सकता। आर्थिक शोषण से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है सर्वहारा क्रांति। एकमात्र यही एक साधन है जिससे सभी वर्गों-वर्णों के लोगों को एक साथ सामाजिक ,आर्थिक और हर किस्म की असमानता से निजात दिलाई जा सकती है। कार्ल  मार्क्स - एंगेल्स ,लेनिन और भगतसिंह ने इसे वैज्ञानिक नजरिए से भली भांति प्रस्तुत  किया है।यह तय है कि  बिना किसी ठोस समग्र क्रांति के सामाजिक न्याय केवल दिवा केवल स्वप्न ही  है।

कोई भी व्यक्ति जब सम्पूर्ण राष्ट्र, सकल शोषित समाज को एकीभाव से देखने लगता है तो उसका सनातन दारिद्र  और पिछड़ापन  भी अपने आप  दूर होने लगता है।  जब वह नानक ,कबीर ,रैदास ,ज्योतिबा फुले,सावित्री वाई फुले या बाबा साहिब अम्बेडकर हो जाता है ,तो उसके 'वर्ण' या जात की नहीं बल्कि उसके शौर्य और शील की जय जयकार  होती है। लेकिन लोग  जब तक आरक्षण की वैशाखी की कामना करते रहेंगे तब तक मानसिक रूप से दलित-पिछड़े ही  बने  रहेंगे ! इस राह पर कुछ  देर के लिए पेट की छुधा शांत हो सकती है ,किन्तु मानसिक संतोष कदापि उन्हीं मिल सकता।

कुछ लोग अवश्य  भारतीय संविधान की बदौलत ही इस व्यवस्था में ठीक से खड़े हो पाए हैं। किन्तु  शताब्दियों से विद्रोही रहे कुछ भारतीय  आज भी इस सिस्टम में प्रवेश नहीं कर पाये हैं।  शायद वे अभी भी अपनी प्राचीन विरासत  से चिपके रहना चाहते हैं। या अपने पुरातन  ढर्रे को यथावत रखना चाहते होंगे ! झाबुआ ,काल हांडी , अबूझमांड  और  सरगुजा के आदिवासी आज भी अपनी पुरातन पध्दति से हीं चलते जा रहे  हैं। वे मनुस्मृति को  नहीं जानते। उन्हें उस से कोई शिकायत भी नहीं। हालाँकि इन आदिवासियों के बीच 'रक्तिम  ' सशत्र क्रांति का प्रचार करने वाले  माओवादी भी वर्षों से काम कर रहे हैं। लेकिन ये नक्सलवादी  शिक्षित युवा अपने ही सजातीय आदिवासियों को गुमराह कर रहे  है।  वे उन्हें अब तक  वोल्शेविक नहीं बना सके। 'मनुवाद' से लड़ने की घृणित  जातीयतावादी ढपोरशंख भी वे नहीं बजा पाये। दरअसल  इन आदिवासियों को ,  देश के अन्य  करोड़ों  ग्रामीण दलितों को  -जो खेती बाड़ी -मजदूरी से  जीवन यापन करते हैं ,तथाकथित  'मनुवाद से या ब्राह्मणवाद से कोई लेना देना नहीं है।  उनका टकराव तो इस पूँजीवादी  सामन्ती अर्थ व्यवस्था से है और उन्हें इससे लड़ने के लिए तैयार करने के बजाय जातिवादी नेता 'वर्ण संघर्ष  की धुन छेड़ते रहते हैं।

तमाम पूँजीवादी पार्टियों के नेताओं  और जातीय -संगठन द्वारा सामाजिक क्रांति के बहाने  थोक बंद वोटों के लिए आरक्षण की आग को हवा दी जा रही है। जातीयता की आंच पर सभी  राजनीतिक दल  रोटी सेंक रहे हैं। लेकिन  वंचितों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका देश  है भी या नहीं ! यदि देश है भी तो वह गुलाम है या आजाद ? ईश्वर और उसके  खास एजेंट-ब्राह्मण  के होने या न  होने से भी इन्हें  कोई  फर्क नहीं पड़ता। इस विपन्न वर्ग में  करोड़ों दलित-आदिवासी तो हैं ही किन्तु उनके जैसे करोड़ों गरीब सवर्ण -मजदूर -किसान भी हैं। इनकी एकता जातीय  आरक्षण की राह पर असम्भव है। क्योंकि आरक्षण की लौह  दीवार ही उनके आपसी वैमनस्य का कारण भी है ,और भारतीय सर्वहारा वर्ग की यही  सबसे कारुणिक बिडंबना है।देश काल परिस्थितियों की आवश्य्कता अनुसार समाज के अंदर की सहज द्वंद्वात्मकता रुपी चिंगारी कभी-कभी  तीखी भी होती रही है। हरएक दौर में ताकतवर -व्यक्तियों,समाजों और राष्ट्रों को कमजोर व्यक्तियों,समाजों और राष्ट्रों ने 'क्रांति' की चुनौती दी है। कालांतर में समाज व्यवस्था संचालन के निमित्त वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ। प्रारम्भ में तो  आर्थिक श्रम -विभाजन के हेतु से सिर्फ  तीन वर्ण-ब्राह्मण,क्षत्रिय वैश्य ही प्रचलन में रहे। किन्तु काल प्रवाह की  लम्बी एतिहासिक यात्रा के उपरान्त  अनेक कारणों से चौथा वर्ण ''शूद्र' अवतरित हुआ। किसी कवि की  उस निरुक्ति को प्रमाणिक और विज्ञान सम्मत नहीं कहा जा सकता ,जिसमें कहा गया है कि 'ब्राह्मण ब्रह्म मुख्य से ,क्षत्रिय भुजाओं से ,वैश्य जंघा से और शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए हैं। ''

तो यह सब  कुछ -कुछ  रोमन और यूनानी समाज जैसा ही था। किन्तु कालांतर में जब   नदी घाटी सभ्यताओं से आगे नागर सभ्यताओं का उदय हुआ तब  अन्य विजेता कबीलों ने  विजित जनों और द्विजेतर वर्णों पर आधिपत्य जमा लिया।  श्रम शोषण की शुरुआत भी यहीं से आरम्भ हुई। कार्ल मार्क्स ने  भी सरसरी तौर पर  भारतीय  आदिम साम्यवादी वर्ण व्यवस्था के इस क्रमिक विकाश  पर  नजर डाली है। लेकिन उन्होंने इस जातीय -वर्ण की व्यवस्था को  इस नजर से नहीं देखा , जिस नजर से भारत के जातीयतावादी लेखक -चिंतक सोच रहे  हैं।

 उत्तर वैदिक काल के उपरान्त -उत्तर भारत का आदिम कबीलाई समाज ,दक्षिण भारत का कबीलाई समाज ही नहीं बल्कि पूर्व -पश्चिम के कबीलाई समाजों में भी वर्ण व्यवस्था को समाहित  किया जाने लगा था। तब शायद अछूत शब्द का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था । लेकिन दस्यु , दास ,सुदास [अच्छे दास] कोल - किरात ,भिल्ल , सेवक, इत्यादि शब्दों का चलन शनेः-शनेः बढ़ता  चला गया। आदिम समाज को 'राज्य 'के  द्वारा शासित करने  और  व्यवस्था के रूप में स्थापित होने के कारण एक नया शब्द 'शूद्र भी इस वर्ण व्यवस्था का लगभग स्थाई अंग बन गया।  तब चातुर्वर्ण्य व्यवस्था एक आवश्यक बुराई के रूप में समाज का अस्तित्व बन गयी। आदिम  कबीलाई युद्धों की  अनवरत जय-पराजय  से ही इस  चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का निर्माण हुआ है । इसमें ब्राह्मण ,क्षत्रिय या वैश्य  वर्ण की कोई भूमिका नहीं। इस वर्णाश्रम  व्यवस्था को  कालांतर में  जो बीभत्स और  घृणित रूप प्राप्त हुआ उसके लिए विदेशी आक्रमणकारी  पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं। जिस दौर में मध्य एसिया के यायावर लुटेरे- कबीले मारकाट मचाते हुए भारत  के उत्तर -पश्चिमी  भूभाग पर चढ़ दौड़े ,उस दौर के खण्ड-खण्ड बिखर भारत को अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय -बृह्मचर्य ,अपरिग्रह ,क्षमा ,दया और शील जैसे मानवीय मूल्यों ने सराबोर कर रख था। विप्र ,ब्राह्मण ,ऋषि,मुनि,संत,महात्मा सिद्ध ,अरिहंत और भन्ते जैसे लोगों द्वारा केवल भारतीय समाज को ही नहीं बल्कि राजाओं-सामन्तों और जनपदों के श्रेष्ठियों को अहिंसा  का पाठ पढ़ाया जा रहा था। विदेशी खूँखार  भेड़ियों के लिए मैदान खाली था। नतीजे में भारत को सदियों की गुलामी भोगनी पडी।

चूँकि अहिंसा और पंचशील जैसे सिद्धांतों के दौर में ही  भारत गुलाम बना ,इसलिए अभी यह तय होना बाकी है कि भारत की इस सदियों की गुलामी के लिए कौन जिम्मेदार है? कभी विदेशी कबीलाई आक्रमण  ,कभी किसी मजहबी उन्माद की आयातित आंधी और कभी भारतीय वर्ण व्यवस्था  की जड़ता और कभी अहिंसा के सिद्धांत  ही इस समाज को को पददलित किये जाने के जिम्मेदार रहे हैं। इसमें ब्राह्मण वर्ग की  भूमिका सिर्फ इतनी थी कि वे केवल अध्यात्म ,दर्शन , चिकित्सा ,गणित और धर्म सूत्रों -मन्त्रों की तो खूब बेहतरीन रचनाएं करते रहे किन्तु  सनकी राजाओं  और बिखरे हुए समाज  पर उनकी कोई पकड़ नहींकभी नहीं रही । आचार्य चाणक्य  याने  कौटिल्य जैसे  दो -चार  अपवाद होंगे ,जिन्हें  राष्ट्र निर्माण का अवसर मिल पाया । यदि यह सिलसिला जारी रहता तो गुलामी की नौबत ही न आती।  तब शायद  आधुनिक साइंस के चमत्कार यूरोप से पहले  भारत में हो गए होते ! दरसल मनुवाद तो बुद्ध -महावीर के दौर में ही खत्म हुआ और 'अहिंसा परमो धर्म : के नारों की बाढ़ आ गयी।  जो विदेशी आक्रमणकारियों को मुफीद थी।

 उत्तर  वैदिक काल के बहुत अर्से  बाद  अवैदिक धार्मिक पाखंडवाद ने और भौगोलिक विविधता एवं परिवेश की जटिलतम भिन्नता का फायदा उठाकर  इस वैविध्यपूर्ण  भारतीय 'हिन्दू 'समाज को पंगु बना डाला। इन तत्वों ने  इसे सांस्कृतिक  आर्थिक  और सामाजिक रूप से बेहद जटिल एवं संकीर्णतावादी बना डाला।वर्ण व्यवस्था के दोषों के लिए और विदेशियों की गुलामी के लिए भी वही  तत्त्व जिम्मेदार हैं। जो इन दिनों जातीय आरक्षण की राजनीति कर रहे  हैं। इस बदनाम वर्ण वयवस्था के  संस्थापक  या निर्माता  ऋषि -मुनि या ब्राह्मण कभी नहीं रहे। प्रगतिशील  इतिहासकार -साहित्य्कार  बार-बार कह चुके हैं कि  वे पुराणों को इतिहास नहीं मानते ! जब पुराणों को इतिहास नहीं मानते तो मनुस्मृति को 'मिथ' क्यों नहीं मानते ? दरसल सामन्तों के आपसी युद्ध और  कबीलाई समाज की बर्बरता तथा  विदेशियों की गुलामी ने ही इस जाति वर्ण की व्यवस्था को पुष्पित पल्ल्वित किया है।  घोर आरक्षणवादी  नेता -लालू-मुलायम यदि सच्चे  यादव हैं तो बताएं कि महाभारत काल में - कृष्ण और सुदामा में से कौन इस व्यवस्था का असली संचालक  और पोषक था ? लालू ,मुलायम,और राबड़ी जी यह बताएं कि  सुदामा ने किसका कब  कितना शोषण किया ? सोलह हजार एक सौ आठ रानियां किसकी थीं ?  गरीब सुदामा ब्राह्मण की  या की द्वारकाधीश श्रीकृष्ण यादव की ? वर्ण व्यवस्था का आनंद  किसने लूटा? निर्धन सुदामा [ब्राह्मण] ने या श्रीकृष्ण [ यादव] ने ?  भीख मांगने वाले ब्राह्मण इस घृणित जातीय व्यवस्था के लिए कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। मनुवाद - ब्राह्मणवाद एक  काल्पनिक दुष्प्रचार है जो अंग्रेजों का रचा हुआ प्रपंच था। क्योंकि आजादी की लड़ाई में फांसी चढ़ने वाले अधिकांश ब्राह्मण ही थे। मंगल पांडे ,तात्या टोपे ,रानी झांसी ,नाना साहिब पेशवा ,चाफेकर बंधू ,तिलक, रवींद्रनाथ टेगोर,महर्षि  अरविन्द ,गोखले,विद्यासागर और  खुद गांहदी जी भी कर्म से शुद्ध ब्राह्मण ही थे। ब्राह्मणों को नाथने के लिए ही अंगर्जों ने न केवल दलितों बल्कि अन्य जातियों को उकसाया था।

 हर दौर के विदेशी यायावर कबीलों के आक्रमण उपरान्त जो विदेशी जीत गए वे आर्य ऋषि-मुनियों द्वारा  -राजपुत्रों' या क्षत्रियों में समाहित कर लिए गए । युध्दों में जो पराजित देशी-विदेशी जीवित रहे , वे गुलाम बनाए जाते रहे।  और चौथे दर्जे याने 'शूद्र वर्ण ' में डाल  दिए गए। कालांतर में 'आदिवासी' अनार्य ,यवन और द्रविड़  भी भारतीय  समाज का इसी तर्ज पर  हिस्सा बनते चले गए। जब  व्यवस्था में मूल्यों,आदर्शों और आर्थिक मुद्दों को लेकर  टकराव हुआ तो सामाजिक 'खापों' या गोत्रों का संस्थापन होने लगा। इस तरह जातीय -गोत्रीय  कटटरता का आग्रह बढ़ता चला गया। जब नियम-संयम ,आचार-विचार और धर्म के आधार पर कटटरता बढ़ी तो समाज में श्रेष्ठता  के अभिमान और वंचित-पराजित को लतियाने की जिद  ने जातीय  असहिष्णुता को जन्म दिया।  नियमों का पालन करने वाले 'रघुकुल रीति' का महिमा गान करते हुए श्रेष्ठ होते चले गए। और जो नियमों को नहीं मान सके वे अनायास ही पद दलित होते गए। हर तरह से तिरस्कृत और सताए गए लोगों में हींन भावना  , कुंठा ,प्रतिहिंसा और घृणा की धारणा  बनती चली गयी। इसकी  एक और खास वजह थी । तत्तकालीन सभ्य  समाज अपने  मूल्यों और परम्परागत रीति-रिवाजों के प्रति अटल  बने रहना चाहता था । याने  'प्राण जाय पर बचन न जाहि'।

 रीति-रिवाजों-नियमों की अवहेलना करने पर समाज द्वारा दण्डित व्यक्ति ही  'निम्नकोटि 'अथवा त्याज्य  या अछूत मान लिया जाता था। चूँकि  उत्तर वैदिक समाज  श्रम विभाजन की  वर्ण आधारित व्यवस्था पर आधारित था  इसलिए  सजायाफ्ता लोग  भी कदाचित अंतिम वर्ण अर्थात 'शूद्रवर्ण' में ही गिने जाने लगे होंगे।जो निम्न्वर्न का व्यक्ति  बेहतर मानवीय मूल्यों से युक्त होता उसे  गाध ,नारद ,विश्वामित्र,जावालि मरीचि और वाल्मीकि की तरह आर्य धर्मध्व मान लिया जाता था। जो उच्च वर्ण का व्यक्ति -महिला या पुरुष आर्य परम्पराओं या मूल्यों से पथविचलित होजाता उसे शूद्र वर्ण में धकेल दिया जाता था। सुदास ,सहस्त्रबाहु, ययाति ,इंद्र ,अहिल्या ,चन्द्रमा ,बुध ,राहु,केतु जैसे अनेक वैदिक  और पौराणिक उदाहरण  उल्लेखनीय हैं। काल प्रवाह  में यह व्यवस्था शोषण का साधन बनती चली गयी।जब ब्रिटेन में पूँजीवादी क्रांति हुई ,फ्रांसीसी क्रांति  हुई ,अमेरिकन क्रांति हुई ,सोवियत क्रांति हुई तब दुनिया से उपनिवेशवाद और  दास प्रथा का भी अंत होता चला गया ।चूँकि  भारत में दासप्रथा नाम मात्र की ही थी ,इसलिए उसके वैकल्पिक रूप में  ही यहाँ दलित-शूद्र जैसे निम्न  वर्ण उल्लेख में आये। इन  यूरोप के पुनजागरण काल ने और फ्रांसीसी क्रांति  के उदात्त मूल्यों ने न केवल भारतीय श्रमजीवी वर्ग,बल्कि दलित-शोषित समाज को  भी मुक्ति का मार्ग दिखाया  है।

सवर्ण-दलित ही नहीं ,बल्कि आर्य -अनार्य के रूप में भी यह भारतीय समाज बुरी  विभाजित रहा है। ,अतः इस वर्गीय समाज में सामाजिक समरसता बिलकुल नहीं है। राजनीति में जातीय धुर्वीकरण और जातीय  आधार पर आरक्षण की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र का मजाक बन डाला है। यूपी का मुलायम परिवार ,भारत का सबसे बड़ा जातीय परिवार है। कहने को मायावती 'सिंगल' हैं ,किन्तु उनका परिवार भी केवल यूपी बिहार तक सीमित नहीं है। उनके रिस्ते  पंजाब,कश्मीर ,हरियाणा और महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। लालू -नीतीश और बादल -ठाकरे भी अब व्यक्तियों के नाम नहीं बल्कि सामाजिक ताकतों के नाम हैं। जैसे स्थापित करने की चेष्टा को हमेशा प्रगतिशील कदम माना गया है।   मनुवाद बनाम ब्राह्मणवाद एक भ्रामक अवधारणा है   श्रीराम तिवारी !

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

दुनिया में भारतीय विदेश नीति की खिल्ली उड़ाई जा रही है।



 'मोदी सरकार' से पहले वाले किसी भी  भारतीय नेता या प्रधान मंत्री ने चीन और पाकिस्तान के नेताओं पर कभी  विश्वाश नहीं किया। और यही वजह है कि  भारत को इन दुष्ट पड़ोसियों के सामने कभी इतना शर्मिंदा नहीं होना पड़ा ,जितना कि अब मोदी जी के राज में  भारत को शर्मिन्दा होना पड़  रहा है। हमारे हिन्दू दर्शन पारंगत  प्रधान मंत्री जी और उनके 'हमसोच' संघ बौद्धिकों की सिद्धांत निष्ठां में  श्रीकृष्ण या चाणक्य का अक्स तो  बिलकुल नहीं दिख रहा है। किन्तु पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की रणनीति में भगवान  'श्रीकृष्ण की  नीति 'का असर  अवश्य झलक  रहा है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कर्ण के रथ का पहिया रुधिर जनित कीचड़ में धस गया तो वह रथ से नीचे उतर गया और  पहिया उचकाने में जुट गया। जाहिर है कि कर्ण ने अपने धनुष बाण इत्यादि जमीन पर रख दिए होंगे  ! उस निहत्थे कर्ण को मारने के लिए  ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उकसाया था। परिणाम सामने था। दानवीर  महाबली कर्ण छल-बल से मारा  गया। झूँठे  दम्भ में अपना ५६ इंची सीना ठोकने वाले  भारतीय नेताओं की नादानी से अब जबकि  भारत के रथ  का पहिया  धराशायी  हो रहा है ,अदूर - दर्शिता ,कुशासन, गरीबी,सूखा ,आतंकवाद , आरक्षण आंदोलन ,भृष्टाचार के दल-दल में  भारत बुरी तरह फंस गया है। ऐंसे में चीन रुपी  श्रीकृष्ण ने पाकिस्तान रुपी अर्जुन को उकसाया है कि वह आतंकवाद रुपी शिखण्डी की ओट से भारत रुपी  निहत्थे कर्ण पर  प्राणघातक हमला करे !

पहले तो भारत के सत्ताधारी नेताओं ने विदेश नीति का सही आकलन किये बिना ,संसद को विश्वाश में लिए बिना,यूएनओ में चीन की भूमिका को जाने बिना -पाकिस्तानी आतंकी अजहर मसूद और जेश -ए-मुहम्म्द पर प्रतिबंधात्मक पस्ताव पेश कर दिया। चूँकि चीन ने वीटो कर दिया और भारत यूएनओ में हार गया।भारत की याने  हमारी बहुत  किरकिरी हुई। दुनिया में  भारतीय  विदेश नीति की  खिल्ली उड़ाई जा रही है। इस गलती को सुधारने के लिए डोभाल साहब  और सुषमा जी ने चीन के अलगाववादी उइगर नेता दोलकुंन इशा  को भारत का बीजा दे दिया। इतना कदम उठाना तो फिर भी जायज लग रहा था। किन्तु चीन के एक इशारे पर  दोलकुन का  बीजा  वापिस ले लिया यह किस देशभक्ति का सबूत है ? दोलकुन का बीजा  किस मजबूरी  में रद्द किया गया ?यह भारत की जनता को अवश्य जानना चाहिए।

भाजपा और संघ परिवार को बहुत गलत फहमी है कि ''चीन और पाक़िस्तान तो दूध के धुले पड़ोसी देश हैं ,वो तो हमारे पहले वाले प्रधान मंत्री  ही नाकारा और नालायक थे इसलिए समस्याएं हल नहीं हुईं '' ! दरसल इसी गलत धारणा से संघ परिवार संचालित हो रहा है। वरना मोदी जी विदेशों में जाकर यह नहीं कहते कि 'भारत के पहले वालों  सत्तारूढ़ नेताओं ने  तो ६७ साल में कुछ  भी नहीं किया अब हम आ गए हैं सो सब ठीक कर देंगे ''!इन संघियों को एक और  बहुत बड़ी गलत फहमी है कि  भारत के वामपंथी  तो चीन के शुभचिंतक हैं। वास्तव में वे भारतीय वामपंथ  और कम्युनिस्ट पार्टी आफ चायना ' के बीच के मतभेदों को न तो जानते हैं और न ही उन्हें यह सब जानने में कोई रूचि है। वे तो इस २१वीं शताब्दी में भी उसी ९० साल पुराने गोलवलकरी साहित्य से ही  संचालितहो रहे हैं।जिसमें कम्युनिस्टों ,दलितों,मुस्लिमों ,ईसाइयों को संघ का स्थाई  शत्रु मान लिया गया है।

  प्रायः हरेक  प्रबुद्ध भारतीय को अपने  वतन की फ़िक्र है। यही वजह है कि  जब किसी खेल  विशेष में भारत के खिलाड़ी जीत दर्ज कराते  हैं ,तो  पूरे भारत में आतिशबाजी होती है।वैसे तो भारत की अधिकांश जनता अपने  सभी पड़ोसी मुल्कों से दोस्ताना मैत्रीभाव की कायल रही है।  किन्तु  जब  कभी कोई पड़ोसी मुल्क  भारत की ओर बुरी नजर डालता है तो भारत की आवाम उसे माकूल जबाब देने को सदैव  तैयार रहती है। किन्तु इस संदर्भ में 'संघमित्रों' का रवैया नितांत अभद्र और बचकाना रहा है। उन्हें पता नहीं कौनसी जन्म घुट्टी पिलाई जाती है कि  वे अपने अलावा बाकी सभी भारतीयों को देशद्रोही ही समझते हैं। भले ही उद्धव ठाकरे कहते रहें कि जेएनयू छात्र  कन्हैया कुमार को देशद्रोही कहना गलत है ।  किन्तु संघ परिवार' के दुमछल्ले बाज नहीं आयंगे क्योंकि  वे  ओंधी खोपड़ी जो ठहरे !  श्रीराम तिवारी
 

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

यह जातीय विमर्श तो सामन्ती दौर के जख्मों को कुरदने जैसा है।


 विगत बिहार विधान सभा चुनाव में एनडीए की हार और पिछड़े-दलित महागठबंधन की जीत के बाद भारतीय राजनीति में जातीय विमर्श और तेज हो गया है। जातीय महागठबंधन की जीत से उत्साहित नीतीश बाबू अब राष्ट्रीय नेता बनने के सपने देखने लगे हैं। अपनी हार से सबक लेकर संघ शुभ चिंतकों ने  भी हिन्दू समाज की एकजुटता पर अधिक जोर लगाना शुरू कर दिया है। तदनुसार इसी योजना के तहत ही प्रधान मंत्री मोदी जी ने १४ अप्रैल को महू [इंदौर] में बाबा साहिब अम्बेडकर जन्मभूमि पर दलित राजनीति का आह्वान किया है। वैसे तो बाबा साहिब का जन्म दिन हर साल मनाया जाता रहा है। लेकिन अब तक केवल नीले- सफ़ेद हाथी छाप झंडे ही दिखाई देते रहे हैं। किन्तु  इस बार अम्बेडकर जन्म स्थली पर  नीले झंडे बहुत कम थे,दस बीस ही रहे होंगे । दो-चार लाल झंडे भी इधर-उधर दिख रहे थे।  दो -चारा तिरंगे भी नजर आ रहे थे। किन्तु  भगवा झंडे हजारों में थे। इन केशरिया -भगवा  झंडों को थामने वाले हाथ  लाखों में थे। प्रदेश के कोने-कोने से ,दूर-दूर से आये हजारों दलित-आदिवासियों की यह विराट नरमेदनि क्या बाबा साहिब के प्रति श्रद्धावनत होकर  महू पहुंची थी ? या यह मध्यप्रदेश भाजपा का प्रधान मंत्री  मोदी जी के समक्ष शक्ति प्रदर्शन था ? इसका जबाब तो प्रदेश के मुखिया शिवराजसिंह चौहान ही दे सकते हैं। कुछ लोग तो इस राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन के फेर में उसी दिन दुर्घटनाओं में मारे भी गए। और कुछ भूंख -प्यास एवं सड़क हादसों में भी  घायल  हुए !

 समाजशास्त्री कहते हैं कि इस सरकारी जुगाड़ की भीड़ को डॉ बी आर अम्बेडकर की विचारधारा से कुछ लेना-देना नहीं है। जन चर्चा  है कि यह सब तो सरकारी तंत्र और राजकीय कोष  के दुरूपयोग की जीवंत झांकी है। वेशक आरोप में दम है। क्योंकि महू में बाबा साहिब भीमराव अम्बेडकर  के जन्म दिन के इस भव्य -विराट आयोजन में प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान और उनके नेतत्व में पूरी सरकार ने  इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । नतीजा  भी प्रचण्ड ही रहा , इन-गिने लाल-नीले और तिरंगे झंडों पर केशरिया झंडों की अनगिनत घटायें उमड़-घुमड़ रहीं थीं। नीले रंग के झंडे या नीला हाथी का तो वैसे भी इस क्षेत्र में  कभी कोई खास असर नहीं रहा। क्योंकि मालवा -निमाड़ की भूमि तो दशकों से 'संघम शरणम गच्छामि'' ही रही है । किन्तु इसमें आष्चर्य क्या है ? यही तो पूँजीवादी लोकतंत्र की खासियत है ! आदर्शवादी उतोपिया और सत्ता की राजनीति तो सदा अन्योन्याश्रित  ही रहे हैं। उनके अनुसार जब एक हिंसक  डाकू रत्नाकर बाल्मीकि हो सकता है तो कोई दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी दल  आम्बेडकरवादी -दलित-पिछड़ा वादी क्यों नहीं हो सकता ?

 महू में सम्पन्न बाबा साहिब जन्मोत्सव के  इस आयोजन से पहले कभी किसी दलित नेता या पार्टी ने ऐंसा  कोई कार्यक्रम नहीं किया। मोदी जी भारत के पहले प्रधान मंत्री रहे हैं जो १४ अप्रैल को बाबा साहिब अम्बेडकर जन्म भूमि पर उपस्थ्ति हुए  । उन्होंने इस अवसर पर जो कुछ भी कहा वह भारत की जातीय-असमानता और  आरक्षण की राजनीति का लब्बो लुआब हो सकता है। उनके इस प्रयोजन से हिन्दू समाज में  कितनी सामाजिक समरसता का संचार होगा ? बाबा साहिब के सपनों को  रूप -आकार मिलेगा  या नहीं ? इन सवालों के उत्तर - अभी तो समभव नहीं ! किन्तु नीतीश,लालू,मुलायम,मायावती जैसे जातिवादी नेताओं की जातीय इजारेदारी के पर कतरे जाने का पूरा इंतजाम 'संघ परिवार' ने बखूबी  कर लिया  है।

 आजादी के तुरंत बाद इंदौर -मालवा -निमाड़ क्षेत्र में  लाल झंडे की  मजबूत पकड़ रही है । किन्तु अब लाल झंडा इस क्षेत्र में सड़कों पर खुदे पड़े गढ्ढों के किनारे या किसी अन्य  खतरे के प्रतीक रूप में ही इस्तेमाल हो रहा है।  वेशक  कभी  यह  लाल झंडा मेहनतकशों की सर्वहारा क्रांति का प्रतीक रहा है। और भविष्य भी दुनिया में केवल  उसी का है। किन्तु अभी फिलहाल तो भगवा-केशरिया झंडों के ही अच्छे दिन आये हैं। जो राष्ट्रध्वज याने तिरंगा झंडा कभी भारतीय सम्प्रभुता, स्वतंत्रता -धर्मनिरपेक्षता -लोकतंत्रात्मक गणतंत्र का प्रतीक रहा है, अभी तो वह भी थरथरा रहा है। अम्बेडकर जन्म भूमि पहुंचे अधिकांश  दलित-आदिवासीयों  के हाथ में सिर्फ  केशरिया झंडा ही था। क्या उन्हें मालूम है कि कभी यह ध्वज आर्यों की विश्व विजय का प्रतीक रहा है ? क्या वे यह जानते हैं कि कालांतर में यह केशरिया झंडा  ही कभी आर्य , बौद्ध ,जैन और हिन्दू सनातन सभ्यता का संवाहक रहा है ? यह अतीत में कभी -सत्य शील,शौर्य ,बलिदान और  वैराग्य  इत्यादि मूल्यों का प्रतीक भी रहा है। क्या दिनांक - १४ अप्रेल -२०१६ को  महू में सम्पन्न बाबा साहिब को समर्पित विराट श्रद्धांजलि सभा में उपस्थ्ति लाखों दलित- आदिवासियों को मालूम है कि  बाबा साहिब अम्बेडकर की इस झंडे में कितनी रूचि थी ?और यदि कोई रुचि  नहीं थी -तो  क्यों  नहीं  थी ?

 वास्तव में  १४ अप्रैल को मोदी जी के  नेतत्व  में संघ और भाजपा के बौद्धिकों  ने  महात्मा बुद्ध के अनुयाई बाबा साहिब अम्बेडकर की जन्म भूमि -महू में केशरिया झंडे फहराकर एक तीर से कई  निशाने साधे  हैं। जिस तरह आदि शंकराचार्य ने एक प्रछन्न बौद्ध के रूप में -घोर नास्तिक और 'वेद विरोधी' महात्मा बुद्ध को सनातन -हिन्दू धर्म के 'दशावतार' में शामिल कराया ,ठीक उसी  तरह हिंदुत्व के आधुनिक दिग्विजयी -श्री नरेंद्र मोदी जी भी हिंदुत्व की विजय पताका को बाबा साहिब अम्बेडकर की जन्म भूमि महू में फहराकर बाबा साहिब को हिन्दुओं का ग्यारहवाँ  अवतार बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।इस जातीय और पुरोगामी विमर्श में  'संघ' ने यूपी बिहार के तमाम  जातीयतावादी नेताओं  को  भी पीछे छोड़ दिया है। हिन्दू समाज के सामाजिक अंतर्द्वंद' को 'संघ' ने बड़ी चतुराई से'टेकिल' किया है। उन्होंने इस प्रयोजन से हिदुत्व के एकीकरण' की चेष्टा  भी की है। लेकिन अभी यह तय होना बाकि है कि उन्हें सफलता मिली या नहीं। चुनावी गणित के अनुसार भाजपा और संघ को  फिलहाल  मध्यपर्देश में  इकतरफा जन समर्थन हासिल है। किन्तु असम ,बंगाल,केरल ,यूपी और अन्य राज्यों के विधान सभा चुनावों में उनकी इस सामाजिक इंजीनियरिंग का असर देखा जाना अपेक्षित है। इस संदर्भ में देश के कुछ प्रगतिशील - धर्मनिरपेक्ष विद्वान -विचारक लोग  केवल 'संघ परिवार' पर ही जातीयता की राजनीति और   साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप  लगा  रहे हैं। मैं उनसे भिन्न राय रखता हूँ।

वास्तव में संघ परिवार पर उक्त  इकतरफा आरोप लगाकर  सच का सामना करना असम्भव है। संघ ने महू में जो किया ,बिहार में लालू ,नीतीश और कांग्रेस ने भी वही किया वह क्या था ? ममता जो बंगाल में करती रही है और मुलायम जो यूपी में करते रहे हैं वह क्या है ? द्रमुक और एआईडीएमके वाले तमिलनाडु में जो करते रहे हैं, शिवसेना वाले  जो महाराष्ट्र में करते रहे हैं ,हरियाणा के जाट -विश्नोई जो करते वहाँ करते रहे हैं ,और अकाली जो पंजाब में करते रहे हैं ,वह क्या है ? भारत की राजनीति में वामपंथ के अलावा बाकी सभी दलों ने जातीय दल-दल में खूब डुबकी लगाई है। अब तक केवल  वामपंथ ही था जो  धर्म-मजहब जात  से ऊपर उठकर सभी वर्ग के गरीबों की आवाज हुआ करता था।वामपंथ ही दुनिया के तमाम मेहनतकशों -किसानों ,वंचितों -शोषितों-पीड़ितों की आवाज  हुआ करता था। मार्क्सवाद -लेनिनवाद  की शिक्षाओं में जातीय -मजहब की राजनीति को,दलित - सवर्ण  की राजनीति को त्याज्य मान गया है।  मार्क्सवाद में इन शब्दों को  ही कोई स्थान नहीं है। यह जातीय  विमर्श  घोर  दकियानूसी और पुरोगामी है। यह जातीय विमर्श तो सामन्ती दौर के जख्मों को कुरदने जैसा है। यह समाज को बाँटने और देश को तोड़ने जैसा कृत्य है। यदि कोई धन से निर्धन है , यदि कोई किसी शक्तिशाली जात या  समाज से पीड़ित है,तो समाजवादी या साम्यवादी व्यवस्था में उसका निदान सुनिश्चित है। एक सुंदर  वर्गविहीन समाज की स्थापना का मकसद भी वही है ,जोकि बाबा साहिब अम्बेडकर चाहते थे। कामरेड स्टालिन जाति  से मोची थे। लेकिन  वे आरक्षण की वैशाखी से या किसी की अनुकम्पा से  सोवियत संघ के राष्ट्रपति नहीं बने थे। अपितु मार्क्सवाद -लेनिनवाद  की शिक्षाओं के प्रकाश में सोवियत सर्वहारा वर्ग ने और उनके हरावल दस्ते ने उन्हें विश्व सर्वहारा का हीरो बन दियाथा । भाजपा ,कांग्रेस ,लालू ,नीतीश,माया -मुलायम की तरह वामपंथ को  भी जातीय  विमर्श के दल-दल में डूबने का शौक चर्राया है ,यह बेहद त्रासद स्थिति है। यह वैज्ञानिक सोच नहीं हो सकती।

श्रीराम तिवारी
 

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

उदार संसदीय लोकतंत्र के रहते किसी भी क्रांति की सम्भावना नहीं है।

पूँजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन करने वाली राजनीति के एक प्रमुख सिद्धांतकार और भाष्यकार - 'निकोलो मैकियावेली'की मशहूर  स्थापना  है कि ''पूँजीवादी राजनीति का नैतिकता से कोई संबंध नहीं ''!अर्थात जो कोई व्यक्ति अथवा संगठन  पूँजीवादी  संसदीय लोकतंत्र  की राजनीति का खिलाड़ी  है -उसे  भृष्ट ,बेईमान और चरित्रहीन होना ही होगा। सरल शब्दों में कहा जाए तो  मेकियावेली का कथन  यह है कि पूँजीवादी संसदीय लोकतंत्र का न्याय'-समानता और उदात्त चरित्र जैसे सनातन मानवीय मूल्यों से  कोई लेना -देना नहीं है।

इस सिद्धांत की अवहेलना करते हुए यदि कोई धर्मभीरु आदर्शवादी [ रामराज्य वादी]सख्स  दावा करता है कि  ''मैं न तो खाऊँगा  और न किसी को खाने दूँगा '' तो समझो वह सफ़ेद झूंठ बोल रहा है। मेकियावेली पूंजीवाद के सिद्धांतकार -समर्थक थे। अतएव वे उसके आदर्श आइकॉन भी रहे हैं। अब यदि कोई कहे कि  मेकियावेली झूंठा था ! तब उसे  स्वाभाविक रूप से मार्क्सवादियों के साथ  खड़ा होना पडेगा। लेकिन इस तरह का जिगर उसी का होगा जो मेकियावेली को नकार दे ! याने कारपोरेट कम्पनियों,अम्बानियों-अडानियों ,टाटाओं -बिरलाओं और मित्तलों -माल्याओं की भड़ैती छोड़ दे ! और यह कायाकल्प तभी सम्भव हो सकेगा जब वह  पूँजीवाद  के ६३ को  दव्न्दात्मक भौतिकवाद के ३६ में बदल डाले । अर्थात वर्ग सहयोग को त्यागकर वर्ग संघर्ष की रह चले !

 मार्क्स - एंगेल्स और  लेनिन ने अनेक बार  कहा है कि पूँजीवाद भले ही सामंतवाद की कोख से पैदा हुआ हो ,भले ही पूंजीवाद ने अपने जनक 'सामंतवाद' को ही खा लिया हो , लेकिन यह पूँजीवाद खुद अमरवेलि की तरह परजीवी और अनैतिकतावादी  ही है। यह खुद  सर्वहारा के श्रम शोषण की कीमत पर और समाज या राष्ट्र के उत्पादन संसाधनों पर कब्जे की कीमत पर जिन्दा है। वर्तमान दौर में तेजी से बढ़ रही आबादी ,मजहबी-धार्मिक अंधश्रद्धा और अति उन्नत सूचना  संचार तकनीकी  की बदौलत  वैश्विक पूँजी को सब पर बढ़त प्राप्त है। इसमें हर किस्म के जनाक्रोश को द्रवित कर डालने की क्षमता है। और इस दौर के उद्दाम पूँजीवाद को १९वी शताब्दी के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत से परिभाषित किये जाने की दरकार  भी नहीं है। अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत अब कालातीत हो चुका है। कारपोरेट पूँजी कोई आसमानी उल्कापिंड नहीं है। २१ वीं शताब्दी के इन दो दशकों में तमाम वैश्विक कॉरपोरेट  कम्पनियाँ ने  भारत जैसे राष्ट्रों की जन -सम्पदा को बाजारू तिकड़मों से सीधे - सीधे  हस्तगत किया है। इस आवारा वित्त पूँजी ने राज्य सत्ता के सभी संस्थानों पर पहले से ही कब्जा  कर रखा  है। और सार्वजनिक बैंकों के वित्तीय घालमेल के द्वारा भी इस उद्दाम पूँजीवाद का निस्तरण हो रहा है। इस आवारा पूँजी का अधिकांश मीडिया पर पहले से ही मजबूत नियंत्रण है। जन असंतोष  को द्रवीभूत करने में मीडिया की भूमिका रही  है । और  विभिन्न जन आंदोलनों के मार्फत भी जन असंतोष का गुब्बारा समय-समय पर फूटता ही रहता है। इसलिए भारत सहित दुनिया के तमाम अन्य देशों में फिलहाल अभी किसी किस्म की जनवादी -साम्यवादी क्रांति असम्भव है।

 फिर भी दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया वादी लोग और कारपोरेट  सेक़्टर के लोग हमेशा डरे रहते हैं। यह चोर की दाढ़ी में तिनके जैसा ही है।चूँकि संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रिया में सभी विचारधाराओं और दलों का अपना-अपना कुछ तो स्थाई जनाधार अवश्य  होता है। इसीलिये  जनाधार वाले हर एक राष्ट्रीय दल की प्रासंगिकता और सम्भावनाएं हमेशा बनी रहती है। इसका सबसे जीवंत  प्रमाण है भाजपा। सन १९८४ में  भाजपा  को सिर्फ दो सीट पर विजय मिली थी। किन्तु सन् २०१४ में उसे  २८२ सीट पर  प्रचण्ड बहुमत मिला। संसदीय लोकतंत्र के रस्ते तो इस देश में कभी भी कुछ भी हो सकता है। आवारा वित्त पूँजी से दोस्ती गाँठ ले  तो कोई भी सत्ता का स्वाद चख सकता है । लेकिन भारत में वाम-जनवादी विचारों को बहुमत का समर्थन मिलना असम्भव है। क्योंकि वे इस आवारा वित्त पूँजी और उसके कदाचार पर ही तो वार करते रहे हैं। और यदि खुदा  न खास्ता कभी बहुमत मिल भी गया तो आशंका है कि  बेनेजुएला,तुर्की,ब्राजील और  उत्तर कोरिया जैसी हालत न हो !

पश्चिम बंगाल में वामपंथ ने ३५ साल शानदार स्वच्छ साफ़ ईमानदार शासन दिया है। फिर क्या वजह है कि  बंगाल की जनता ने वाम के सापेक्ष तृणमूल जैसी निकृष्ट पार्टी को चुना ? और सीपीएम के महान  क्रांतिकारी नेताओं से ज्यादा  ममता जैसी उच्श्रंखल  औरत को तरजीह दी ? इन सवालों के जबाब देश की जनता को जब तक नहीं मिलते तब तक वामपंथ को संसदीय फोरम के मंच पर कोई खास सफलता नहीं मिल सकती।वामपंथ को यह भी संधारण करना चाहिए कि  जिस तरह वो  संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति पर हमला बर्दास्त नहीं करते  ,दक्षिणपंथी संकीर्णतावाद को पसंद नहीं करते  ,जिस तरह वह उद्दाम पूँजीवाद को हेय  समझते  है ,उसी  तरह भारत की जातिवादी-धर्मभीरु जनता भी 'साम्यवाद 'के अधीन अभिव्यक्ति के खतरे को निष्कंटक नहीं समझती। साम्यवादी कटटरवाद और संकीर्णतावाद को भी भारतीय आवाम संदेह की  दॄष्टि से देखती है। 

वैसे भी  उदार संसदीय लोकतंत्र के रहते किसी  भी क्रांति की सम्भावना नहीं है।  मेकियावेली के अनुसार कुटिल राजनीति   नैतिकता की परवाह नहीं करती । उसके लिए  हरकिस्म की राजनीति अनैतिक अड्डा है। सवाल है कि भारत के जो हिन्दुत्ववादी धर्मभीरु  नेता अभी  सत्ता में हैं ,उन्हें गीता -उपनिषद - वेद-पुरान का अनुसरण करना चाहिए या कि मेकियावेली का ? यदि वे  हिन्दुत्ववादी मर्यादाओं के आग्रही हैं तो उद्दाम नग्न  पूँजीवाद के सामने था-था थैया क्यों किये जा रहे हैं ? रामराज बैठे त्रिलोका ,,,,,' का अनुशरण क्यों नहीं करते ? यदि रामराज के सिद्धांतों का अनुशरण सम्भव  नहीं तो फिर  मार्क्सवाद  ही क्या बुरा है ? कम से कम गरीबों-दलितों के उद्धार कुछ तो सम्भावना है ! वैसे भी आर्थिक सामाजिक  समानता का वैज्ञानिक सिद्धांत सिर्फ वामपंथ के पास ही है।

श्रीराम तिवारी 

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

कमजोर वर्गों के पक्ष में सरकार तो क्या अब ईश्वर भी नहीं है।

 प्राचीन काल में  भारतीय उपमहाद्वीप में सैकड़ों  देश हुआ करते थे । सब के अलग अलग सिक्के भी हुआ करते थे । सबकी  अपनी-अपनी  'धरती माताएं' अलग -अलग हुआ करतीं थीं ! तब कोई 'भारत माता नहीं थी । किसी की अयोध्या ,किसी की मथुरा ,किसी का हस्तिनापुर ,किसी का इंद्रप्रस्थ , किसी का मगध , किसी  की  काशी,किसी का कौशल ,किसी का गांधार ,किसी का राष्ट्रकूट ,किसी का अंग, किसी  का बंग,किसी का विदर्भ , किसी का बुंदेलखंड ,किसी का चोल,चेदि ,पांड्य  और किसी का कलिंग हुआ करता था । इन सबके ऊपर कोई विजय हासिल कर लेता था तो उसे ही चक्रवर्ती सम्राट कहा जाता था। लेकिन इसके लिए उसे कई इम्तहान देने पड़ते थे। अष्वमेध और राजसूय  यज्ञ करने पड़ते थे। उसके लिए पूरे उप महाद्वीप के सभी  देशों पर विजय  हासिल करनी पड़तीथी। तब  भी वह सिर्फ नाम का  ही चक्रवर्ती सम्राट हुआ करता था. क्योंकी विदेशी हमलों के वक्त पराजित राजा लोग उस चक्रवर्ती सम्राट की हार देखने को  हमेशा लालायित रहते थे। पृथ्वीराज चौहान व्  जयचन्द इस तथ्य के ऐतिहासिक  प्रमाण हैं।  

वेशक सामन्त युग के अधिकांश राजे-रजवाड़े घोर स्वार्थी ,निरंकुश ,अय्यास और शोषणकारी हुआ करते थे।  किंतु कुछ अपवाद भी  थे। वे मानवीय मूल्यों का , नैतिकता का बड़ा सम्मान करते थे। उनके वंशानुगत  रीति  रिवाज -त्याग और बलिदान के लिए विख्यात हैं।जैसे कि  पराजित राजा को माफ़ कर देना। नारी पर हथियार न उठाना ,हथियार छोड़कर भागने वाले पर पीछे से वार न करना,इत्यादि कायदों के लिए तो कुछ राजवंश दुनिया में प्रसिद्ध रहे हैं। ऐंसे ही राजाओं को प्रजा विष्णु का अवतार मान लेती थी।  राजा अपने आप को 'विष्णु' स्वरूप  माने या न माने ,किन्तु उसके चारण -दरवारी भाट लोग उसे  ईष्वर तुल्य ही मानते थे।  ! श्रीकृष्ण भी गीता में इसका समर्थन करते हैं। ''नराणाम च नराधिपति '' । वे कहते हैं कि हे पार्थ -सभी मनुष्यों में जो -जो 'राजा ' हैं  वो मैं  ही हूँ।
\
अर्थात मनुष्यों का जो राजा हुआ करता था वो अपने आप को श्रीकृष्ण [विष्णु का लीला अवतार]  समझने लगा हो तो इसमें क्या आष्चर्य ? जब कोई राजा अपने आपको विष्णु का अवतार मानता होगा तो उसे 'श्रीराम चन्द्र ' का  उदात्त चरित्र भी याद रखना पड़ता होगा ! अर्थात कुछ  सामन्तों और राजाओं ने  राजकाज चलाने के लिए  जिस राजनीती को अंगीकृत किया होगा उसमें 'रामराज्य 'की कुछ  नैतिकता  भी हुआ करती थी। हरिशचन्द्र  , रघु ,दिलीप ,जनक ,राम ,शकुंतला पुत्र भरत ,युधिष्ठिर , विक्रमादित्य ,कर्ण ,जैसे पौराणिक और मिथकीय पात्र ही नहीं ,अपितु आचार्य चाणक्य के शिष्य -चन्द्रगुप्त मौर्य ,सम्राट अशोक,हर्षवर्धन ,राष्ट्रकूट राजा रामचन्द्र , चोल राजा कृष्ण्देव राय ,मुगल सम्राट अकबर ,चंदेल राजा परिमल  , चाँद बीबी ,अहिल्या बाई होलकर जैसे कुछ ऐतिहासिक राजा-रानियों का जीवन चरित्र  उदात्त और मानवीय हुआ करता था। उस मध्ययुगीन सामन्ती दौर में कठोर निरंकुशता के बावजूद भी न्याय की कुछ तो महक  अवश्य थी।

किन्तु २१वी शताब्दी की  पूँजीवादी लोकतंत्रात्मक व्यवस्थाओं  में न्याय केवल शक्तिशाली का ही पक्षधर होकर रह गया  है। शिक्षा,स्वास्थ्य और सभी जरुरी सुविधाएँ केवल सम्पन्न वर्ग तक ही सीमित हैं। केवल आरक्षित वर्ग  ही  इस चक्रव्यूह को भेदकर कुछ हासिल कर सका है। लेकिन  अधिकांश मजदूरों -गरीब किसानों  को इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में और पुरानी  सामन्ती व्यवस्था में  कोई फर्क नजर नहीं आ रहा  है। कुछ बुजर्ग लोग तो वर्तमान  राज्य व्यवस्था से अंगेरजी राज की व्यवस्था को ही  बेहतर  मानते हैं। उनके लिए यह तथाकथित  आजादी केवल दिखावटी है। बाजारबाद ,उद्दाम पूँजीबाद, कारपोरेट सिस्टम और जाति -सम्प्रदाय द्वारा निर्मित एवं शक्तिशाली राजनैतिक गिरोह द्वारा नियंत्रित  इस नीरस  व्यवस्था  की  मरुभूमि में कमजोर वर्गों के पक्ष  में  सरकार तो क्या अब ईश्वर भी नहीं है। केरल के प्रसिद्ध पुत्तिगर मंदिर में आतिशबाजी के नाम पर भेंट चढ़ गए सैकड़ों  लोगों की लाशों को देखकर पता नहीं किस देवता की भूंख शांत हुई ?  इन लाशों को देखकर सरकारें शायद  मरने वालों के परिजनों की कुछ मदद कर देंगीं । किन्तु उधर देश के सूखा पीड़ित गाँवों की गरीब जनता जो एक -एक बाल्टी पानी के लिए तरस रही है,उसके आंसू पोंछने का वक्त किसी भी मंत्री या नेता के पास नहीं है। सत्तारूढ़  मंत्री नेता केवल विकास के नारे और जुमले पोस्ट कर रहे हैं। वे खर्चीले हवाई जहाज में उड़ रहे हैं। वे एयरकंडीशंड कमरों में शयन कर रहे हैं। वे  शुद्ध पेय जल से  स्नान कर  रहे हैं। देश की  जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। लोग केवल राज्य नियंत्रित हिंसा के ही शिकार नहीं हो  हो रहे ,बल्कि वे  इस धर्मांध पतनशील दौर में उस ईश्वर के हाथों  बेमौत मारे जा रहे हैं। जिसका सृजन खुद इंसान ने ही किया है। अब तो इंसान को चेत जाना चाहिए  कि अपनी बुद्धि ,विवेक को धर्मान्धता और पूँजीवाद की भड़ैती में न गँवाए। तमाम शोषित और विपणन वर्ग के समक्ष केवल एक ही रास्ता है शोषण की ताकतों के खिलाफ  निर्मम संघर्ष ! इसके सिवा दूसरा कोई और विकल्प नहीं है। श्रीराम तिवारी !

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

पाकिस्तान अब चीन -अमेरिका और इस्लामिक आतंक की विध्वंशकारी प्रयोग स्थली बनकर रह गया है।

''तेरे आजाद बन्दों की, न ये दुनिया न वो दुनिया।

 यहाँ जीने की पावंदी , वहाँ   मरने  की  पावंदी।। ''


 स्वर्गीय अल्लामा इकबाल साहब की इन दो पंक्तियों  का अर्थ कुछ इस प्रकार हो सकता  है। शायद रूहानी ही हो कि मृत्यु लोक में कोई भी अजर-अमर नहीं है.अर्थात यहाँ जीने की पावंदी है। और जन्नत या स्वर्ग  में सब अजर अमर हैं ,याने वहाँ मरने की पावंदी है। लेकिन मुझे अल्लामा इकबाल साहब की ये पंक्तियाँ 'भारत माता की जय' पर भी लागू प्रतीत होती हैं। जेएनयू में  'भारत माता की जय ' के अलावा और कोई  नारा नहीं चलेगा। क्योंकि  दिल्ली पुलिस का यही  कानून है।और दिल्ली पुलिस केंद्र की भाजपा सरकार के अधीन है। अभिप्राय यह कि जेएनयू में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति पर पाबंदी  है नारा  नहीं लगाओगे तो पिटोगे !एनआईटी श्रीनगर में ''भारत माता की जय '' बोलने पर भाजपा समर्थित  कश्मीर सरकार की पुलिस गैर कश्मीरी छात्रों पर लाठी चार्ज करती है याने वहाँ 'राष्ट्रवाद' पर पाबंदी है। भारत माता की जय बोलोगे तो पिटोगे ! मतलब साफ़ है कि चाहे समर्थक हों या विरोधी -इस दौर में किसी की खैरियत नहीं !

 भारत को उसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से विचलित करने के दुष्प्रयास  तो उसके निर्माण के बाद से ही शुरूं हो गए थे। आजादी के बहुत पहले से ही धूर्त अंग्रेजों ने एक तरफ  बहुसंखयक हिन्दुओं को धार्मिक आधार पर संगठित होने के लिए उकसाया, और दूसरी ओर मुस्लिम लीग को बहला -फुसलाकर पाकिस्तान रुपी मुल्क का झुनझुना पकड़ा दिया। ब्रिटिश साम्राज्य के सिपहसालारों ने  पाकिस्तान रुपी भस्मासुर का निर्माण मुसलमानों की ख़ुशी के लिए नहीं किया था। उन्होंने इस्लाम को आदर देने के उद्देश्य से  भी यह धतकरम नहीं किया था। उन्होंने तो  मुस्लिम लीग और कट्टर मजहबी नेताओं की ब्रिटिश चाटुकारिता के बतौर इनाम-इकराम के रूप में पाकिस्तान रुपी विध्वंशक राष्ट्र भीख में दिया गया था। ब्रिटिश हुक्मरानों का  मकसद था कि हिंसक पड़ोसी के रूप में यह पाकिस्तान अपने निकटतम पड़ोसी -धर्मनिरपेक्ष शांतिप्रिय  राष्ट्र भारत  को लगातार  परेशान करने के काम आयेगा । और इस  तरह इस भारतीय उपमहाद्वीप में अनवरत अशांति बनी रहेगी और तब उन्हें वापिस यहाँ चौधराहट के लिए फिर से 'बुलौआ 'मिलेगा। आजादी से लेकर अब तक भारत केवल शांति पाठ ही किये जा रहा है।जबकि  पाकिस्तानी  फौज से डरे हुए पाकिस्तानी नेता और उसी फौज के पालतू मजहबी आतंकी भारत के खिलाफ छद्म युद्ध लड़ रहे  हैं।पाकिस्तानी फौज को अमेरिकी इमदाद तो है ही ,किन्तु अब चीन ने मानो उसे गोद ले रखा है।  इसके वावजूद  भी भारत की अमनपसंद धर्मनिरपेक्ष आवाम  यदि पड़ोसियों के साथ सौहाद्र और अमन  चाहती है तो यह एक जिम्मेदार राष्ट्र की गौरव शाली परम्परा का उद्घोष है।लेकिन इस स्थति में भारत का नव निर्माण सम्भव नहीं !

सारी दुनिया जानती है कि खुँखार आतंकी ओसामा-बिन-लादेन पाकिस्तानी फौज के संरक्षण में छुपा हुआ था। और अमरीका फौज ने  पाकिस्तान में घुसकर उस दुष्ट लादेन को मार  गिराया था। जबकि पाकिस्तान के नेता और फौजी  अंत तक खीसें निपोरते हुए  कहते रहे कि 'हम लादेन नहीं देख्याँ 'याने लादेन  उनके यहाँ नहीं था । भारत में आतंक  मचाने वाले हाफिज सईद,अजहर मसूद ,दाऊद इब्राहिम और जेश -ए -मुहम्म्द के सभी पाक प्रशिक्षित अन्य आतंकियों को पाक्सितान की फौज  खुले आम संरक्षण दे रही है। उन्हें भारत के खिलाफ निरंतर इस्तेमाल  किया जा रहा है। लेकिन फौजी बूटों तले रौंदी जा रही पाकिस्तानी जम्हूरियत व  सरकार इस सच्चाई को स्वीकार करने से डरती है। पंडित नेहरू से लेकर ,इंदिराजी,मोरारजी,राजीव गांधी ,नरसिम्हाराव व अन्य पूर्व प्रधान मंत्रियों को ही नहीं,बल्कि अपने गुरु अटल बिहारी की पाक विदेश नीति को भी असफल बताने वाले - बड़बोले ,तीसमारखां और छप्पन इंची सीने वाले 'महाबली'अब पाकिस्तान के समक्ष दण्डवत मुद्रा में क्यों  हैं ?

वर्तमान एनडीए की मोदी सरकार पाकिस्तान और चीन को 'साधने' में  पूरी तरह विफल रही है । अलगाववाद की आग कश्मीर में पहले से और ज्यादा भड़क गयी है।  कम-से कम अभी तक  श्रीनगर एनआईटी में तो अमन  था। किन्तु जेएनयू और अन्य  विश्वविद्यालयों की तर्ज पर वहाँ भी क्रिकेट जैसे खेल की  हार जीत को लेकर  बेफिजूल की नारेबाजी ने अलगाववाद  की आग को हवा दी है। जो लोग विपक्ष में रहकर  हमेशा पाकिस्तान को सबक सिखाने की डींगें हाँकते  रहे हैं,उन्हें  अब तो  स्वीकार कर लेना चाहिए कि पाक्सितान की नापाक हरकतों के लिए भारत के पूर्व प्रधान मंत्री या भारत की अमनपसंद जनता की लाचारगी  नहीं बल्कि पाकिस्तानी  फौज की 'द्वेषपूर्ण' कूटनीति ही  जिम्मेदार है। भारत  के तमाम स्वयम्भू 'राष्ट्रवादियों' को अपने ही  द्वारा कहे गए दुर्बचनों पर  न केवल प्रायश्चित करना चाहिए, बल्कि एक सच्चे देशभक्त भारतीय  की तरह अपने वरिष्ठों के प्रति आदरभाव और कृतज्ञता व्यक्त करने में  भी संकोच नहीं  करना चाहिए ! भारत के सम्पूर्ण विपक्ष को साथ लिए बिना , भारत की आवाम को विश्वाश में लिए बिना -'एकला चलो रे ' की अधिनायकवादी प्रवृति  के बलबूते  पाकिस्तान और चीन की कूटनीति का उचित जबाब नहीं दिया जा सकता ! विदेशों में पर्यटन करते हुए अपनी शेखी बघारने और विकास का ढपोरशंख बजाने से  न तो सर्वसंमावेशी विकास हो सकेगा और ना ही भारत राष्ट्र की एकता- अखंडता अक्षुण हो सकेगी ।

वर्तमान एनडीए सरकार ने मोदी जी की निजी छवि बनाने के फेर में अपने वतन को ही दाँव पर लगा दिया है। बिना सोचे समझे ,बिना दूरदृष्टि के, सिर्फ अपनी महत्ता सावित करने और अपने ही पूर्ववर्ती भारतीय नेताओं को पाकिस्तान विषयक मामलों में असफल सिद्ध करने की दुर्भावनापूर्ण चेष्टा की जाती रही है। इसी का ही यह  परिणाम  है कि पाकिस्तान बार-बार शांति प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहा है। भारत के ये दिग्भर्मित अनुभवहीन नेता पाकिस्तान की उस 'जेआईटी' को भारत आने की अनुमति  देते हैं ,जिसमें बदनाम आईएस के खुर्राट एजेंट होते हैं। हमारे नेता उन्हें पठानकोट ले जाते हैं। आईएस के  महा हरामी पाकिस्तानी अधिकारी हमारी आवभगत का मजाक उड़ाते है और पाकिस्तान लौटकर वैश्विक मीडिया के सामने  सफ़ेद झूँठ बकते हैं। वे उलटा भारत पर आरोप लगाते हैं कि ''भारत ने खुद  ही पठानकोट में आतंकी हमले का  ड्रामा '' ! वर्तमान  भारतीय  नेतत्व  न केवल पाकिस्तान की कुटिल चालों को  समझने में असफल रहा है , बल्कि अजहर मसूद और जेश-ए -मुहम्म्द  के मामले में चीन की पैंतरेबाजी  को समझने में भी नाकाम  रहा है। वर्तमान नेतत्व के पास  इनसे  निपटने की कोई कारगर रणनीति नहीं है। भारतीय संसद को  पाकिस्तान,चीन और पाकपरस्त आतंक की त्रयी से निपटने के लिए कोई सार्थक रणनीति अवश्य बनाना  चाहिए। उन्हें अपने पूर्व वर्ती प्रधान मंत्रियों का अनादर नहीं करना चाहिए। बल्कि अटल बिहारी बाजपेई के साथ परवेज मुशर्रफ ने जो सलूक किया था वो , और पंडित नेहरू के साथ चाउ -एन -लाइ ने जो सलूक किया था वो,  कभी नहीं भूलना चाहिए।

स्वाधीनता संग्राम का इतिहास जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि  भारत,पाकिस्तान -राष्ट्र  १५ अगस्त १९४७ को ही पैदा हुए हैं। बल्कि भारत तो सही मायने में तो २६ जनवरी -१९५० को  ही गणतंत्र घोषित हुआ था। एक लम्बे  रक्तरंजित दौर के बाद ,बड़ी मुश्किलों से ,अनगिनत कुरबानियों के बाद 'भारत' एक सम्प्रभु  राष्ट्र के रूप में संसार के सामने प्रकट हुआ था। साम्प्रदायिक  और जातीयता के उन्माद  से पीड़ित यह दीन -हीन राष्ट्र क्या किसी  जय-जयकार का हकदार हो सकता है ? पाकिस्तान नामक  'अवैध मुल्क ' तो किसी क्रूर नाजायज औलाद की तरह फौजी और आतंकी बूटों तले कसमसा रहा है ,क्या उसे पाकिस्तान -जिंदाबाद का नारा लगाने का हक है ? वहाँ सिर्फ दिखावे की डेमोक्रेसी  है। विगत शताब्दी के उत्तरार्ध में इन जाहिल फौजियों और काहिल आतंकियों की नापाक हरकतों से परेशान  होकर ही 'बंग बंधू' शेख मुजीबउर रहमान और इंदिराजी ने सोवियत संघ की मदद से उस नापाक - पाक्सितान के दो टुकड़े किये थे। और बांग्लादेश बनाया गया था।उसी प्रतिशोध की आग में  पाकिस्तान अब तक जल रहा है। पाकिस्तान  अब  कोई सम्प्रभु राष्ट्र नहीं है। उसने पीओके चीन  को दे दिया है। पाकिस्तान  अब  चीन -अमेरिका और इस्लामिक आतंक की विध्वंशकारी प्रयोग स्थली बनकर रह गया है।

अमेरिका ,चीन ,पाकिस्तान और आतंक की चंडाल चौकड़ी ने  मिलकर  भारत को  निरंतर परेशान किया है। अतीत में  पंडित नेहरू ,इंदिराजी ,राजीव ,अटलजी और डॉ मनमोहनसिंह ने भी  उक्त चांडाल चौकड़ी  का दंश भोगा है। किन्तु तब मोदी जी जैसे लोग  इन प्रधान मंत्रियों का खूब उपहास किया  करते थे- ' हमें सत्ता दो-हम   पाकिस्तान में  घुसकर आतंकियों को मारेंगे'' ! अब उनके बोल बचन से कई गुना उलट  हो रहा है। पाक्सितान को शांतिपाठ पढ़ाने के लिए मोदी जी बिन बुलाये  लाहौर क्या गए । नतीजे में कभी उधमपुर कभी कश्मीर कभी पठानकोट और कभी श्रीनगर एन आई टी में उनसे पाकिस्तान को  जबाब देते नहीं बन रहा है। वर्तमान सरकार  को  सूझ  ही नहीं रहा कि  भारत के बाहर और भारत के अंदर की इस  भारत विरोधी ज्वाला को कैसे भी शांत किया जाये ! पाक्सितान और उसके  आतंकी नेताओं को बचाने में चीन भी यूएनओ में लगातार भारत विरोधी भूमिका में है। मोदी सरकार की  चीन ,पाकिस्तान और मजहबी आतंकवाद पर रत्ती भर पकड़ नहीं है।

यह  याद रखा जाना चाहिये की भारत और उसके सभी नवोदित पड़ोसी राष्ट्रों का निर्माण किसी स्वतंत्र सम्प्रभु राष्ट्र के बटवारे से नहीं हुआ है। बल्कि सदियों से गुलाम रहे  आर्यावर्त , जमबूदीपे  ,भरतखंडे ,भारतवर्ष  जैसे विभिन्न  नामों से उल्लेखित  इस उपमहाद्वीप  के विखण्डन से ही दक्षेस के इन सभी राष्ट्रों -भारत, नेपाल  , बांग्लादेश,तिब्बत,नेपाल , भूटान  और पाकिस्तान का जन्म हुआ है। किन्तु यह समझ से परे  है कि जब बाकी के सभी दक्षेस देश पुरुषवाचक  ही हैं ,तो  भारतवर्ष ,इंडिया या हिन्दुस्तान को जबरन  'भारत माता' के रूप में परिवर्तित करने की कौनसी मजबूरी थी ? जब १९७१ के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह शिकस्त दी  तब दुनिया ने कहा ''भारत जीत गया ,पाकिस्तान हार गया ' !यह किसी ने नहीं कहा कि भारत माता जीती!जब क्रिकेट में भारत जीता तो किसी ने नहीं कहा  भारत माता जीत गयी !  यह सभी ने कहा और लिखा कि  इण्डिया जीता या भारत जीता ! बांग्ला साहित्यकार बंकिम बाबू  ने  भारत राष्ट्र ,भारतवर्ष ,इंडिया अथवा हिन्दोस्तान को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित कर अपने साहित्यिक सौंदर्य को  चरम पर पहुँचाया होगा। किन्तु बंकिम बाबू  के  इस देवी  तुल्य राष्ट्र रूप को भारतीय संविधान सभा ने मान्य नहीं किया।  

 बंकिम बाबू की सोच भी सही है कि गुलामी से पहले यह धरती शस्य श्यामला या नखलिस्तान ही थी। और इसके गुलाम होने का  विशेष कारण भी यही था। क्योंकि जो  बर्बर हमलावर  मध्य  एसिया और पश्चिम से आये वे रेगिस्तानों के यायावर कबीले ही थे। ये हमलावर जब 'सिंधु नदी' किनारे के उस पार पहुंचे  तब उनके लिए यह विशाल हरा-भरा भूभाग गुलिस्ताँ ,हेवन ,चमन,जन्नत और पता नहीं क्या-क्या था ? और वे इस हर-भरे भरतखण्ड या आर्यावर्त को -'इंडस'>हिंड्स>हिंदस >हिन्द >हिन्दोस्तान  पुकारते हुए इस पर भूँखे  भेड़ियों की तरह  झपट पड़े । वे अपने साथ हिंसा,बर्बरता जहालत,जातिवाद, साम्प्रदायिकता और घृणा की बीमारी भी लाये । ये अमानवीय बीमारियाँ सदियों बाद अब भी  इस उपमहाद्वीप पर लाइलाज नासूर के रूप में मौजूद  हैं।

मुगलों के पतन की सांध्यवेला में साम्प्रदायिकता की रक्तरंजित विभीषिका से आक्रान्त इस भारतीय भूभाग को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जिस दुर्दशा में पाया था,उसे स्वर्णिम भारत नहीं बल्कि पतनशील हिन्दोस्तान कहा जा सकता है। इसलिए किंगडम के अंतिम उत्तराधिकारी लार्ड  मांउंट वेटन भी इसे  उसी बदतर हालात में छोड़ गए। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जब ये अंग्रेज व्यापारी के रूप में भारत आये थे तो अपने साथ ब्रिटिश रहन-सहन के साथ-साथ बिजली ,रेल ,टेक्टर,बस, ट्रक,जीप ,पम्प, बन्दूक ,घड़ी,कैमरा फिल्म,रेडिओ ,डाक-तार,टेलीफोन , अंग्रेजी -भाषा -ज्ञान  ,कानून -संविधान ,एलोपेथिक  चिकित्सा इत्यादि बहुमूल्य चीजें भी साथ  लाये थे। आज जो कुछ भी भौतिक उपादान  हमारे भारतीय महाद्वीप के  घरों,सड़कों,नगरों और देशों  में है वह सब अंग्रेजों की  देन है। जबकि अंग्रेजों से पूर्व के - कासिम ,गोरी,गजनी ,बाबर -उजवेग ,तुर्क,मंगोल,पठान ,अफगान और तातार हमलावर  केवल लूट -खसोट ,नारी उत्पीड़न , जहालत,जातिवाद ,साम्प्रदायिकता ,मजहबी अंधश्रद्धा और बारूद की गंध ही अपने साथ लाये थे ।तोपें - बारूद तो बाबर ही भारत लाया था। एक और फर्क है कि वे यहीं मर खप गए और  अपनी तमाम जाहिल और हिंसक परमपरायें यहीं छोड़ गए। इसके विपरीत अंग्रेज वापिस अपने देश   चले गए और तमाम ,मशीनरी,क़ानून -व्यवस्था और उन्नत किस्म की साइंस -टेक्नालाजी छोड़ गए।

किन्तु जाते-जाते ये अंग्रेज  हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायिकता की सड़ांध और जातिवाद की दावाग्नि सुलगाकर चले गए। यदि अंग्रेज चाहते तो विभाजन होता ही नहीं। पाकिस्तान भी नहीं बनता। बांग्लादेश बनने का तो सवाल ही नहीं उठता । चूँकि अंग्रेज विश्व  विजेता थे। अपनी विजय को यादगार बनाने और गुलाम राष्ट्र को शक्तिशाली न होने देने की गन्दी मानसिकता के कारण उन्होंने  ऐंसा दुर्भागयपूर्ण  प्रयोग किया है। उन्होंने दुनिया के हर कोने में  यही किया है। वे भारत में जाति वाद की समस्या को फ्रांसीसी क्रांति या यूरोपियन रेनेसाँ की तर्ज पर सुलझाने के बजाय  इसे  रिजर्वेशन [आरक्षण] की वैतरणी में  धकेलकर  चले गए। और जाते-जाते यह यूरोपियन 'राष्ट्रवाद' का झुनझुना  भी पकड़ा गए। अंगर्जों का  संवैधानिक राष्ट्रवाद तो फिर भी ठीक -ठाक  ही है । किन्तु  जब से पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवाद ने जोर पकड़ा है ,कश्मीर में  भारत  के खिलाफ कमीनी  हरकतें बढ़ीं  हैं ,तबसे भारत के दक्षिणपंथी वर्ग को हिटलर-मुसोलनी याद आने लगे हैं. और कुछ अल्पसंखयक नेताओं की सन्देहास्पस्द हरकतों के कारण  'अंधराष्ट्रवाद' अँगड़ाइयाँ लेने लगा है।

  वास्तव में  यह एक  गलत धारणा  है कि किसी एक विशाल सुसंगठित भूभाग को विभाजित कर दो देश बनाए गए। जब अंग्रेज यहाँ  नहीं आये थे तब भी भारत,इंडिया अथवा हिन्दुस्तान में केवल मुगल खानदान की ही सल्तनत नहीं थी । बल्कि दक्षिण में निजाम हैदराबाद ,बीजापुर,मैसूर ,त्रावणकोर,तंजावुर,सतारा और पूना इत्यादि रियासतें खुदमुख्तारी में थीं। पूर्व और पश्चिम में जरूर  अंग्रेजों ने  व्यापारिक कोठियाँ बन लीं थीं। वास्तव में अंग्रेजों ने ही सबसे पहले इस महाद्वीप को एक 'राष्ट्र' की शक्ल में देखने का काम किया। इस उपमहाद्वीप में किसी खास  देश के बारे में कोई 'राष्ट्रवाद' की अवधारणा  कभी थी  ही नहीं। १८५७ में जो स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी गयी वह अंग्रेज बनाम देशी  राजाओं की लड़ाई थी। किसी को अपना ग्वालियर प्यारा था तो वह अंग्रेजों से दोस्ती करके मजे में रहा । किसी को अपनी झांसी प्यारी थी ,लेकिन अंग्रेजों से बैर ठाना  इसलिए वह मरते-मरते कहती रही 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी ''! दरसल भारतभूमि तो सनातन से है ,किन्तु एक मुद्रा ,एक कानून ,एक राष्ट्र और एक शासक यहाँ कभी नहीं रहा। मुगलों से पहले जो हिन्दू राजा थे वे आपस में बहुत बैर रखते थे। इसलिए  विद्वान ऋषिओं ने इन  एक चक्रवर्ती चुनने का सुझाव दिया। इसके लिए दो उपाय थे। एक तो आम सहमति और दूसरा अष्वमेध यज्ञ अथवा राजसूय यज्ञ। जो  राजा सबसे जयादा शक्तिशाली होता वह राजसूय या अष्वमेध यज्ञ करके अपना 'जयस्तंभ'गड देता था। किन्तु एक देश एक राष्ट्र  कभी नहीं बन पाया  ! यदि बन जाता तो तुर्क,मंगोल ,पठान नहीं आ पाते और अंग्रेज ,डच ,फ्रेंच ,पुर्तगीज भी नहीं आ पाते। और आज कोई भी भारत माता की जय बोलने से मना नहीं करता।

यह सुविदित है कि  जब अंग्रेज  इस भारतीय उपमहाद्वीप से जाने लगे तो जाते-जाते इसका कचूमर बना गए। हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाकर ,भारत -पाकिस्तान तो  वे आजादी डिक्लेयर करने से पहले ही  बना चुके थे। लगभग ६००  देशी राजाओं को खुली छूट  थी कि  वे चाहें तो 'भारत' में मिल जाएँ ,चाहें तो पाकिस्तान में मिल जाएँ। और यदि वे चाहें तो 'आजाद' राष्ट्र के रूप में भी रह सकते हैं। अधिकांश देशी राजे-रजवाड़े तो पटेल,नेहरू और जनता के दवाव के आगे झुकते गए। और भारत में शामिल हो गए। किन्तु कुछ  राजाओं ने 'भारतीय संघ ' में शामिल होने से  इंकार कर  दिया। कुछ राजा भारत-पाकिस्तान से अलग अपना आजाद मुल्क बनाए रखना चाहते थे। जैसे कि राजा हरिसिंग कश्मीर को आजाद मुल्क रखना चाहते थे ,लेकिन फारुख अब्दुल्ला के पिता और उमर  अब्दुल्ला के दादा 'शेख' अब्दुल्ला कश्मीर का  भारत में सशर्त विलय चाहते थे। तिब्बत  भूटान,सिक्किम और नेपाल के राजाओं ने अपनी -अपनी रियासतों  को  स्वतंत्र 'राष्ट'  का जाम पहना  दिया। चूँकि तिब्बत को चीन ने दबोच लिया ,इसलिए इंदिराजी ने सिककम को  भारत में मिला लिया। कुछ शेष  सामन्त जैसे कि निजाम हैदराबाद ,नवाब जूनागढ़ ,नवाब भोपल इत्यादि भी या तो पाकिस्तान की ओर  झुके थे या आजाद मुल्क चाहते थे  ,किन्तु नवजात भारत  की मेहनतकश जनता ने ,किसानों ने एकजुट होकर उनके मंसूबे असफल कर दिए। और राष्ट्र एकीकरण का  श्रेय कांग्रेस ,पटेल और नेहरू इत्यादि ले उड़े। लिए राष्ट राज्य तो  विविधता का महाकुंभ है !

 यह  दावा करना तो बहुत  मुश्किल है कि 'भारत माता की जय' नहीं बोलने वाला देश का गद्दार ही होगा। क्योंकि अधिकांश  पैदायशी [?] राष्ट्रवादी हिन्दू संत महात्मा भी संसार त्यागकर जब ब्रह्मलीन हो जाते हैं तो वे देश से परे होकर संसार से भी उपराम हो जाते हैं। तब वे ईश्वर के विभिन्न रूप -नामों का जाप करते हुए इस मायामय जगत का मोह छोड़कर आत्म  कल्याण की कामना करते हैं। चूँकि इस आध्यात्मिक यात्रा के किसी भी पड़ाव  पर  'भारत माता की जय' बोलने का आदेश  उन्हें किसी भी हिन्दू शास्त्र ,वेद ,पुराण ,स्मृति , उपनिषद  ने नहीं दिया। इसलिए वे 'भारत माता की जय' कभी नहीं बोलते। फिर भी किसी माई के लाल की औकात नहीं कि उन्हें 'देशद्रोही' कह सके !  प्रत्येक चार साल बाद आयोजित कुम्भ मेले में लाखों साधु संत स्नान करने के लिए कभी प्रयाग ,कभी नासिक और कभी उज्जैन आकर कुम्भ स्नान करते हैं। करोड़ों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए कुम्भ  में  आते हैं । सभी अपने-अपने अखाड़ों के नारे लगाते  हैं । किन्तु 'भारत माता की जय'  का नारा कोई भी नहीं लगाता। यदि कोई शख्स इस तरह का नारा कुम्भ के अवसर पर लगाता भी है तो वह इसलिए नहीं कि यह कुम्भ की परम्परा में है या धर्मानुकूल है ,बल्कि विशुद्ध राजनीति  उद्देश्य से ही इस तरह का धतकरम  कुम्भ मेले में कोई धूर्त व्यक्ति कर सकता है। सनातन धर्म के अधिकांश  नारे राजनीति से  बिलकुल अलग हैं उनमें  'विश्व कल्याण'  और  प्राणिमात्र का कल्याण निहित होता है। हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों में  घृणा का यह राजनीतिक ओछापन  कहीं नहीं है।  चूँकि  उज्जैन सिंहस्थ कुम्भ मेले  में मौजूद दो करोड़ श्रद्धालु हिन्दुओं में से कोई एक चिड़िया का पूत भी यह नारा नहीं लगा  रहा है। इसलिए क्या हम उन्हें देशद्रोही कह सकते हैं ?

भारत के कुछ 'भाई' लोग अपने देश की गंगा जमुनी तहजीव को न समझते हुए उसकी जड़ों में साम्प्रदायिकता और 'अंधराष्ट्रवाद' का मठा  डालने की फिराक में रहते हैं। इसी तरह हिन्दू -सनातन परम्परा का ज्ञान नहीं होने पर अधर्म को धर्म बताते रहते हैं। उनकी इस कूढ़मगज क्रिया की प्रतिक्रिया में कुछ अल्पसंख्य्क  कटटरपंथी महा मूर्ख लोग 'भारत माता की जय' को  भी मजहब से जोड़कर देखने लगते  हैं। ऐंसे ही  नादान लोग देश को आदर देने वाले  नारे को लगाने से इंकार कर खुद को देशद्रोही  सिद्ध करने में लगे रहते हैं। यह तो यकीन से नहीं कहा जा सकता कि 'भारत माता की जय' बोलने से इंकार करने वाला  हर वंदा  गद्दार ही होगा। लेकिन इस नारे का  हरएक विरोधी देशभक्त  ही होगा ,इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।

यह भी दावा करना मुश्किल है कि  'भारत माता  की जय'का नार लगाने वाले सभी देशभक्त ही होते हैं। 'पनामा लीक्स ' की काली सूची में दर्ज ५०० सौ  महान भारतीय नायक,महानायक क्या वहाँ देशभक्ति का झंडा गाड़ रहे थे ? बड़ी  विचित्र बात है कि  इन ५००  भारतीय चोट्टों में कोई मुसलमान नहीं है। इनमें किसी दलित  के होने का भी सवाल नहीं है। मुझे पूरा यकीन है कि कोई  ब्राह्मण भी इस सूची में शायद ही होगा।  इस काली सूची में सिंह हैं ,जैन हैं , सिंघल हैं  ,अडानी हैं , महानायक  बच्चन हैं ,बहु बच्चन हैं , थापर हैं , केजरिवाल [अरविन्द नहीं ] हैं। और हमारे इंदौर  वालों को भी इस काले कारनामें का अपयश मिला है क्योंकि इस सूची में इंदौर के सकलेचा हैं , सांखला हैं  ,जैन  और मल्होत्रा भी हैं। चूँकि इन  बेईमानों ने जीवन भर 'भारत माता  की जय 'बोली है , अतः ये सभी देशभक्त हैं। सहारा श्री ,विजय माल्या , सत्यम राजू  ,ऐ राजा ,दयानिधि मारन  ये सभी परम देशभक्त हैं। और जिन्होंने ललित मोदी ,सुब्रतोराय सहारा और विजय  माल्या की जूँठन खाई वे सभी नेता देशभक्त हैं। क्योकि वे  भी  'भारत माता की जय 'बोला करते हैं !

  हे देश के गद्दारो  !  भले  ही तुम सब अपने अपने  काले-पीले धंधे  में लगे हो !  भले ही तुम कानून को जूते की नोक पर रखते  हो !  फिर भी  ये  भॄस्ट व्यवस्था  तुम्हारा बाल -बाँका नहीं कर  सकती ! शर्त सिर्फ इतनी सी है कि  भृष्ट नेताओं,अफसरों और सुंदरियों के आगे जूँठन फेंकते रहो ! और 'भारत  माता की जय' अवश्य बोला करो !  बाकी की चिंता इस सिस्टम पर छोड़ दो ,जो कहता है कि -'योगक्षेमवहाम्यम् ''श्रीराम तिवारी !

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही है ? इसका फैसला कौन करेगा ?

आपातकाल के दौरान जेल में बंद रहे अधिकांश  क्रांतिकारी  नेताओं ने अपने-अपने विजन और थॉट्स को लेकर कुछ न कुछ जरूर लिखा है। लेकिन तत्कालीन सर संघ चालक  बाला साहिब  देवरस और उनके चेलों ने शायद कुछ  नहीं  लिखा। क्योंकि वे  माफी मांगकर जेल जाने से बचते  रहे। जबकि जनसंघ के अटल-आडवाणी जेल में थे।  इन नेताओं ने भी बाकी  के सभी ख्यातनाम  नेताओं  -जार्ज फर्नाडीस ,मामा बालेश्वर  दयाल ,लाड़लीमोहन निगम ,कल्याण जैन और राजनारायण  इत्यादि  की तरह ही  जेलों में १८ महीने  पढ़ने-लिखने में गुजारे।

शहीद भगतसिंह ने  जेल का एक-एक पल पठन-पाठन और चिंतन-मनन में लगाया था। उनके ही आदर्शों पर  चलकर  प्रख्यात मार्क्सवादी नेता कामरेड ,बी टी रणदिवे ,ज्योति वसु ,प्रमोद दासगुप्ता ,ईएमएस नबूदिरिपाद , हरकिशन सुरजीत,एकेजी और  अन्य दर्जनों कामरेडों  ने  आपातकाल के दौरान  अपनी जिंदगी के बेहद कीमती १८ माह  जेलों में रहते हुए भी अध्यन -मनन-चिंतन में गुजारे  हैं। ये सभी क्रांतिकारी साथी जेल  की यातनापूर्ण जिंदगी में  भी कुछ न कुछ क्रांतिकारी सृजन करते  रहे हैं ! उनका यह संघर्षपूर्ण क्रांतिकारी लेखन विश्व सर्वहारा की अमानत है।  हर दौर की उच्च शिक्षित एवं  संर्षशील  युवा पीढ़ी के लिए ये  महान सर्वकालिक आइकॉन जैसे हैं। यद्द्पि आधुनिक सूचना संचार तकनीक  के दौर में दक्ष युवा पीढ़ी को एंड्रॉयड मोबाइल पर हर किस्म की द्रुत  सूचनाएँ और संसाधन उपलब्ध हैं। किन्तु  इसके वावजूद भी इस पीढ़ी के शब्दकोश  में  कुछ  जरुरी शब्द मौजूद नहीं हैं। चिकने-चुपड़े चेहरे वाले  टीवी एकटर -ऐक्ट्रेस जैसे आइकॉन  की मुराद में  आधुनिक अधिकांश शिक्षित  मध्यमवर्गीय युवाओं के शब्दकोश में  -अभिव्यक्ति की आजादी,राष्ट्रचेतना,राष्ट्र-नवनिर्माण, इंकलाब  ,क्रांति जनवाद और  आर्थिक  असमानता  निवारण जैसे शब्द और वाक्य विन्यास सिरे से नदारद  हैं।

 जो उत्पादन के साधनों पर काबिज हैं वे और ज्यादा मजबूत  पकड़ बनाने की जुगत में रहते हैं। अर्ध शिक्षित   अथवा साधनविहीन भारतीय  युवाओं की भीड़  के लिए यदि  जीवन यापन के नैतिक और वैध साधन उपलब्ध नहीं होंगे तब वे वही करेंगे जो वे इस दौर में क्र रहे हैं। अर्थात अपराध जगत का दायरा बढ़ाने में या जेलों की रोटियाँ  निगलने के काम आ  रहे हैं। शिक्षित आधुनिक  युवा और विद्यार्थी  यदि कन्हैया कुमार या वेमुला को तथा जेएनयू को जानना चाहते  हैं,तो  वे   गैरीबाल्डी,  बाल्टेयर,गोर्की,देरेंदा बाल्जाक फुरिए ,ओवन ,मार्क्स या रोजा लक्समबर्ग  को भले ही न पढ़ें ,किन्तु अपने देश के उन  बलिदानी लोगों को तो अवश्य पढ़ें जिन्होंने देश की  आजादी के लिए कुरबानियाँ दीं हैं  और  आपातकाल  के प्रतिकार में जेल की सजा भुगती है ।

इस  विषम और दिग्भर्मित दौर में यह जानने के लिए कि कौन सच बोल रहा है ? सत्ता में बैठे लोग झूंठ परोस रहे हैं या जो विपक्ष में हैं वे  देश को गुमराह कर  रहे हैं ?  कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही है ,कौन सहिष्णु है और कौन असहिष्णु है ,यह तय करने के लिए जिस  विवेक बुद्धि की जरूरत है  उसकी  क्षमता अर्जित करनी  हो तो  थोड़ा समय निकालकर देश और दुनिया के महानतम नायकों के  क्रांतिकारी विचारों को समझने के लिए उनके  साहित्य को  अवश्य  पढ़ना  चाहिए। इस दौर में  राष्ट्रवाद और नारेबाजी के विमर्श में देशद्रोह शब्द को जबरन घुसेड़ा जा  रहा है।  दरसल तब तक कोई देशभक्त नहीं हो सकता जब तक वह 'राष्ट्र'  की परिभाषा नहीं जान ले। हम जब तक राष्ट्रवाद का तातपर्य नहीं समझ  लेते तब तक कोई भी किसी को 'देशद्रोही' बता सकता है। और यह महाझूंठ इस दौर में खूब बोला जा रहा है। कौन देशद्रोही है ,कौन देश भक्त है यह तय करने की  विवेक शक्ति अर्जित करने के लिए राष्ट्र के वर्तमान ,अतीत और स्वाधीनता संग्राम के साहित्य का अध्यन  बहुत जरुरी है।

आपातकाल की  सर्वाधिक  चर्चित पुस्तक ''भारतीय जेलों में पांच साल ''रही है। यह अत्यन्त -मार्मिक  पुस्तक मेरी टाइलर ने लिखी है । प्रशासनिक बर्बरता और संजय गांधी  की निजी गंगे का फासिज्म जब  चरम  पर था।  उस  भयानक दौर के दमन  -उत्पीड़न को खुद ही भोगने वाली उस  निर्दोष लड़की ने पूरे पांच  साल  हजारीबाग़  जेल की अँधेरी कोठरी में  गुजारे हैं ।  उसने अपनी पुस्तक ''भारतीय जेलों में पांच साल' का प्रत्येक शब्द  अपने लहु से लिखा था। वह आपातकाल की घोषणा  [१५ जून -१९७५] से कुछ दिनों पहले ही भारत आईं  थी। एक शोध छात्र की हैसियत से  भारत में अध्यन कर रही थी । उसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से छात्रवृत्ति मिल रही  थी।  वह शायद नक्सलवादी आंदोलन पर पीएच डी  करने के लिए इंग्लैंड से भारत  आयी थीं। उसे भारत की पुलिस  व्यवस्था का मिजाज नहीं मालूम था। आपातकाल में जब अचानक जेपी समर्थक छात्रों को पुलिस ने   धर दबोचा ,तभी वह ब्रिटिश छात्रा  भी नक्सलवादियों की हिमायती समझकर जेल में ठूंस दी गयी।  जैसे कि इस दौर में   छग पुलिस कर रही है।

 कम्युनिस्ट  पार्टियों को छोड़कर बाकी सभी गैर कांग्रेसी एकजुट होते चले गए। तब के तमाम जनसंघी भी  जनता पार्टी' में विलीन  होते  चले  गये ।  मोरारजी, अटलजी ,आडवाणीजी , मुरलीमनोहर जोशी ,जगन्नाथ राव जोशी  जैसे दक्षिणपंथी नेता , मुलायम, जनेश्वर ,राजनारायण जैसे  प्रशिक्षु  समाजवादी और चौधरी चरणसिंह  एवं  देवीलाल  जैसे किसान नेता  भी  राजनीति के उसी 'जनता'  घाट पर पानी पीने जा पहुंचे।  रहे थे।  चुनाव में जनता पार्टी को भारी  बहुमत मिला।  मोरारजी प्रधानमंत्री बने। अटल जी विदेश मंत्री बने। आडवाणी सूचना प्रसारण मंत्री बने।  राजनारायण  स्वास्थ्य मंत्री बने। समाजवादियों ने जनता पार्टी में आरएसएस से जुड़े नेताओं  की दुहरी सद्स्य्ता  को लेकर  आपत्ति लेना शुरू क्र दिया। जनता पार्टी में बिखराव , अलगाव शुरुं हुआ। जेपी बीमार पड़ गए और मर गए। दो ढाई साल में ही जनता पार्टी की सरकार गिर गयी थी ।  मोरारजी बीमार पड़े और मर गए। तब कांग्रेस से दलबदल कर  बाहर आये  जगजीवनराम के समर्थन से चौधरी चरनसिंह  प्रधान मंत्री बने। वे एक दिन भी प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं गए। केवल जाटों को  बहलाकर रैलियां करते रहे। अपना जन्म दिन मनाते रहे। जब चौधरी  की  सरकार अल्पमत में आई तो वे  भी घर बैठे गए।  वे तुरंत बीमार मार पड़ गए और मर गए।  दिल्ली के किसान घाट पर  उनकी  अंत्येष्टि सम्पन्न हुई। उसके बाद राजीव गांधी ,वी पीसिंह, चन्द्रशेखर ,नरसिम्हाराव,गुजराल ,देवेगौड़ा अटलजी,मनमोहनसिंग जी ने क्रमशः देश को उपकृत किया। अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी  इस भारत भूमि को उपकृत  किये जा रहे हैं।  रेल मंत्री सुरेश  प्रभु का कहना है  की आजादी के बाद एकमात्र इंदिराजी  ही सबसे सशक्त प्रधानमंत्री हुई हैं। मोदी जी के समक्ष दो  बिकट  चुनौतियाँ  खड़ीं  हो गएँ हैं। वे श्रीमती ईंदिरा का पुरष अवतार जैसे हैं।

पुस्तिका लिखने का लुब्बो -लुआब  शायद  यह रहा होगा कि समाजवादी ,जनसंघी और इंदिरा विरोधी कांग्रेसी - जो कि सभी  घोर विरोधी विचारधाराओं के हैं वे 'जनता पार्टी' नामक मंच पर एक कैसे हो गए ? और यदि हो भी गए तो  स्थिर सरकार कैसे दे पाएंगे ? यह सभी जानते हैं कि बाद में  यह 'अस्थिरता की आशंका सही सावित हुई !क्योंकि उन्ही राजनारायण ने 'संघी 'भाइयों की दोहरी सदस्य्ता का मसला उठाकर न केवल जनता पार्टी भस्म कर दी ,बल्कि जेपी आंदोलन को भी रुसवा कर दिया । खैर यह सब तो भारत के राजनैतिक उत्थान-पतन का जीवंत इतिहास है। इस आलेख का मकसद वह इतिहास दुहराना नहीं है। मेरा मंतव्य उस पुस्तिका में दी गई कुछ  जरूरी जानकारियों से है ,जो आज के ऍण्ड्रॉइड धारी , डिजिटिलाइज ,हाई -फाई युवाओं को भी शायद नहीं  मालूम होगी  । 

वह पुस्तिका तो जिस किसी को मैंने पढ़ने को दी उसने वापिस नहीं की। किन्तु उसका सार तत्व अब भी याद है! उसमें यह संछिप्त जानकारी दी गई कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में जो कांग्रेस आंदोलन का नेतत्व कर रही थी ,वह आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस से  बिलकुल जुदा  थी । आपातकाल  लगाने वाली कांग्रेस में इंदिराजी, संजय गांधी और  उनकी 'किचिन केबिनेट' ही बची थी। जबकि स्वाधीनता संग्राम का आंदोलन चलाने  वाली कांग्रेस में विराट नर मेदनी का सिंहनाद हुआ करता था। जिसमें वोल्शेविक विचारधारा वाले लोकमान्य  बाल गंगा धर तिलक थे।  हिन्दू महा सभा के सावरकर जैसे लोग भी शुरूं में कांग्रेस में ही  थे। तब मिस्टर जिन्ना जैसे  प्रोगेसिंव  -उदारवादी  मुसलमान  भी कांग्रेस के ही आश्रित थे। लाला लाजपत राय जैसे शुद्ध आर्य समाजी  भी कांग्रेस में ही  थे। चंद्रशेखर आजाद,भगतसिंह  ,नम्बूदिरीपाद और ज्योति वसु जैसे साम्यवादी क्रांतिकारी  नेता भी प्रारम्भ में कांग्रेस के  ही कार्यकर्ता थे। आचार्य  नरेंद्रदेव ,राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी भी कांग्रेस के झंडे के नीचे ही आंदोलनों में शामिल रहे। बाबा साहिब भीमराव अम्बेडकर, शेख अब्दुल्ला ,सीमान्त गांधी ,कामराज नाडार और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी पहले कांग्रेसी ही हुआ करते थे।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही जब गांधी जी बिड़लाओं के यहाँ ठहरने लगे ,ट्रस्टीशिप की बात करने लगे   , बिनोबा के मार्फत किसानों को और गुलजारी लाल नंदा [इंटक]के मार्फत मजदूरों को मालिकों के पक्ष में  फुसलाने लगे और जब कांग्रेस का वर्ग चरित्र बड़े -किसानों ,जमीन्दारों एवं सरमायेदारों की ओर  खिसकने  लगा ,तो १९२५ में 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। जब मुस्लिम लीग ने मजहब के आधार पर पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की बात  की  तो हिटलर-मुसोलनि से प्रेरित होकर डॉ मुंजे और डा हेडगेवार ने 'संघ' की स्थापना की। हालांकि   हिन्दू महा सभा पहले से ही कांग्रेस से बाहर आ चुकी  थी। जिन व्यक्तियों ,ग्रुपों का वैचारिक और  सैद्धांतिक आधार था वे सभी आजादी से पूर्व ही कांग्रेस को नमस्कार कर चुके थे। जो शेष रहे वे आजादी मिलने के बाद  जाग गए। अर्थात सभी विचारधाराओं के नेतत्व ने अपने-अपने अलग-अलग दल और  ठिये बना लिए।
 श्रीराम तिवारी