रविवार, 23 जुलाई 2017

हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े

अधिकांश धर्मप्राण हिन्दू जन अपने हिन्दू संगठन या हिन्दूवादी नेताओं में अगाध अंध श्रद्धा रखते हैं। ऐंसे अंधश्रद्धालु हिन्दू जन अपने हिंसक और बैर बढ़ाऊ धार्मिक नेताओं को चुनावों के माध्यम से राजनैतिक सत्ता सौंप देते हैं। इस प्रवृत्ति को असंवैधानिक तो नहीं कहा जा सकता ,क्योंकि अरब राष्ट्रों की कटटर मजहबी सरकारें तो इनसे कई गुना साम्प्रदायिक और अलोकतांत्रिक हैं। फिर भी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान में निहित लोकतंत्र की अवधारणा अनुसार, भारत की राजनीती में यह जातीय मजहबी आचरण नितांत निंदनीय है।  हिंदूवादी नेता यथार्थवाद ,प्रगतिवाद और  साइंस के जन्मजात विरोधी होने से देश और समाज को प्रतिगामी राह पर धकेलते जाते हैं। यही वजह है कि चीन और पाकिस्तान से सीमाओं पर चल रही तकरार को सैन्यबल अथवा कूटनीति से निपटाने के बजाय,ये हिंदूवादी साम्प्रदायिक नेता आवाम को सलाह दे रहे हैं कि आध्यत्मिक मन्त्र शक्ति से चीन और पाकिस्तान को भस्म करने का आयोजन करें ! भारत की दिगभ्रमित आवाम को और अल्पसंख्यक समुदाय को समझना होगा कि संघ परिवार से सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को खतरा है।

अधिकाँस अल्पसंख्यक जन समुदाय और धर्मनिपेक्षतावादी लोग हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की एकजुटता ,उनके संगठनों और उनकी प्रतिगामी बातों का तो विरोध करते हैं ,किन्तु वे अल्पसंख्यक संगठनों और उनके मजहबी नेताओं का रंचमात्र प्रतिवाद नहीं करते। वे हिन्दू धर्म को तो आरएसएस की जागीर समझकर उनपर संदेह करते हैं,किन्तु अपने कटटरपंथी मुल्ला मौलवियों से विज्ञान आधारित बहस मुसाहिबा नहीं करते। अधिकांश हिन्दू संत ,महात्मा,महामंडलेश्वर और शंकराचार्य लोग हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई,बौद्ध ,जैन पारसी- सभी धर्मों का आदर करना सिखाते हैं। जबकि देवबंदी अथवा अन्य अल्पसंख्यक उलेमा और उनके अनुयायी केवल इस्लाम का ही अनुशीलन और आदर सिखाते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की नजरमें खुदके याने अल्पसंख्यकों के जुझारू संगठन तो ठीक हैं,और सिमी जैसे संगठनों की अवैध गतिविधियों भी ठीक हैं,लेकिन मोहन भागवत या नरेंद्र मोदी ठीक नहीं। अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ कटटरपंथी ही नहीं बल्कि अमनपसंद आमजन भी अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर तो खूब हल्ला करते हैं ,लेकिन गोधरा काण्ड,सिम्मी,अलकायदा और आईएसआईएस की हरकतों पर चुप्पी साध लेते हैं। अधिकांश अल्पसंख्यक नरनारी मजहबी तौर पर शोर शराबा और राजनीतिक आक्रामकता का भौंडा प्रदर्शन करते रहते हैं। इस तरह की मानसिकता से हिन्दू कौम भी 'हर हर मोदी' चिल्लाने लगती है। हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े यदि आपस में इसी तरह अड़े रहे, तो देश का जो होगा सो होगा किन्तु दोनों कौम की भावी पीढ़ियों का भविष्य भी अच्छा नहीं होगा।
जो लोग वर्तमान मोदी सरकार को चरम हिंदूवादी मान रहे हैं वे जरूरत से ज्यादा  वितंडा खड़ा कर रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की चालों से मौजूदा सरकार खुद बेहद आक्रान्त है। जो लोग इस सरकार या उसके समर्थकों की डींगों से आहत हैं वे यह ख़याल में लाएं कि जिनके नेतत्व का आलम यह है कि सीमा पर हर रोज आधा दर्जन जवान शहीद हो रहे हों और नेता यज्ञ,अनुष्ठान ,मन्त्र जाप से शत्रु देश को पराजित करने के लिए ज्योतिष विभाग और  को स्तर क्या है ?चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !

भारत में सत्तारूढ़ नेताओं द्वारा तथा अफसरों द्वारा धनाड्य वर्ग के रिश्तेदारों एवं उनकी ओलादों को उपकृत किये जाने की परम्परा कोई नयी या आकस्मिक घटना नहीं है।सिर्फ लालू यादव का परिवार ही भ्रस्ट नही है! हर्षद मेहता,बंगारू,जुदेव, एदुरप्पा , रेड्डी बंधु ,विजय माल्या,सुब्रतो सहारा,ललित मोदी,करूँणाकरन, डीएम् के परिवार, जय ललिता इत्यादी भी हांडी के दोचार चावल मात्र हैं !असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !
मानव सभ्यता के इतिहास में सबल मनुष्य द्वारा निर्बल मनुष्य का शोषण ,सबल समाज द्वारा निर्बल समाज का शोषण और सबल राष्ट्र द्वारा निर्वल राष्ट्र के शोषण का सिलसिला जितना पुराना है। भाई-भतीजावाद और भृष्ट तत्वों के अनेतिक संरक्षण का इतिहास भी उतना ही पुराना है। भ्रस्टाचार का यह दस्तूर आजादी और लोकतंत्र से भी पहले से इस भूभाग पर चला आ रहा है। इसका सिलसिला तो तुगलकों, खिुलजियों और सल्तनतकाल जमाने से ही चला आ रहा है ।
जब सात समंदर पार से योरोपियन व अंग्रेज पधारे तो उन्होंने भी २०० साल तक भारतीय जनता को 'क्लर्क' के लायक ही समझा। वह भी तब ,जब १८५७ की क्रांति या विद्रोह असफल हुआ और महारानी विक्टोरिया हिन्दुस्तान की मलिका बनी ! क्वीन् ने देशी हिन्दुस्तानियों को और कुछ देशी राजाओं को अपनी नौकरशाही में छोटे पदों पर 'सेवाओं' की इजाजत दी।बाद में उन्हीं में से कुछ वकीलों और बॅरिस्टरों ने देश को आजाद कराने का सपना देखा!
आजादी के बाद कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने तथा देश के चालाक सभ्रांत वर्ग ने इसी परम्परा को परवान चढ़ाया।
आज विपक्ष में आकर कांग्रेस हरिश्चंद्र बन रही है। लेकिन उसका अतीत बेदाग नही है !एमपी में व्याप्त व्यापम के खिलाफ कांग्रेस ने कोई खास आंदोलन नही किया !विगत भारत बंद में भी उसने केवल 'वाम मोर्चे' की नकल की है।
इसी कांग्रेस के ६० सालाना दौर में आजादी के बाद वर्षों तक देशी पूंजीपतियों -भूस्वामियों और कांग्रेस के नेताओं के खानदानों को ही शिद्द्त से उपकृत किया जाता रहा है। एमपी और छग में द्वारिकाप्रसाद मिश्रा से लेकर शुक्ल बंधूओं तक ,अर्जुनसिंह से लेकर ,प्रकाश चंद सेठी तक , शिव भानु सोलंकी , सुभाष यादव और जोगी से लेकर दिग्विजयसिंह तक कोई भी उस 'अग्निपरीक्षा' में सफल होने का दावा नहीं कर सकता। जिसके लिए उन्होंने बार-बार संविधान की कसमें खाईं होंगी कि -''बिना राग द्वेष,भय, पक्षपात के अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा ......." !
अब यदि मोदी युग में 'संघ परिवार' वाले और उसके अनुषंगी भाजपाई भी उसी 'भृष्टाचारी परम्परा' का शिद्द्त से निर्वाह किये जा रहे हैं ,जो परम्परा और 'कुलरीति' कांग्रेस ने बनाई है तो किसी को आश्चर्य क्यों ? सवाल किया जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है ? जो लोग कभी कांग्रेस को 'चोर' कहा करते थे वही लोग इन दिनों भाजपा को 'डाकू' कहने में जरा भी नहीं हिचकते। चोर और डाकु में जो भी फर्क है वही कांग्रेस और भाजपा का चारित्रिक अंतर है।
कुछ लोगों को इन दोनों में एक फर्क 'संघ' की हिंदुत्व वादी खंडित मानसिकता का ही दीखता है। वैसे तो कांग्रेस ने पचास साल तक पैसे वालों व जमीन्दारों को ही तवज्जो दी है। किन्तु यूपीए के दौर में वाम के प्रभाव में कुछ गरीब परस्त काम भी किये गए। यदि आज आरटीआई ,मनरेगा और मिड डे मील दुनिया में प्रशंसा पा रहे हैं तो उसका कुछ श्रेय तो अवश्य ही वामपंथ को जाता है । लेकिंन जनता को और मीडीया को कांग्रेस और भाजपा से आगे कुछ भी नजर नही आता !

रविवार, 16 जुलाई 2017

नौरत्नों की हत्या का राष्ट्रघाती संकल्प !

कुछ सत्ता शुभचिंतकों और दकियानूसी अंधभक्तों को हमेशा शिकायत रहती है कि कुछ लेखक,कवि,और पत्रकार सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिकूल अप्रिय सवाल क्यों उठाते हैं ? ये पढ़े लिखे विवेकशील लोग भी अंधभक्तों की तरह 'भेड़िया धसान' होकर सत्ता समर्थक जयकारे में शामिल क्यों नहीं हो जाते ? एतद द्व्रारा उन अभागों को सूचित किया जाता है कि मौजूदा शासकों से उनकी कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है। मोदीजी जब पहली बार संसद पहुंचे और सीढ़ियों को मत्था टेका,तब वे सभी को अच्छे लगे!जब कभी उन्होंने राष्ट्रीय विकास की बात की ,युवाओं के भविष्य की बात की ,विदेश में जाकर हिंदी का मान बढ़ाया ,और जब वे नामवरसिंह जैसे वरिष्ठ साहित्यकार को प्रणाम करते दिखे तब भी मोदीजी सभी को प्रिय लगे !लेकिन सवाल किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि या विमर्श का नहीं है। सवाल समग्र राष्ट्र के, समग्र समाज के हित का है !और इस कसौटी पर मोदी सरकार नितांत असफल होती जा रही है। इन हालात में भारत के प्रबुद्ध जन यदि मौजूदा शासन प्रशासन के कामकाज पर पैनी नजर रखते हैं,उसकी तथ्यपरक शल्य क्रिया करते हैं और वैकल्पिक राह सुझाते हैं तो उनको गंभीरता से लिया जाना चाहिए ! उनका सम्मान किया जाना चाहिए। बजाय इसके कि अंधभक्त लोग विपक्ष एवं आलोचकों से गाली गलौज करें !

देश के राजनैतिक विपक्ष को कमजोर बनाने वाले आमजन मूर्ख हैं। वैसे भी भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति किसी आपातकाल से बेहतर नहीं है। यदि राष्ट्रपति 'यस सर'की प्रवृत्ति वाला होगा तो कहीं भी कभी भी साइन कर देगा। देश में फिलवक्त शिकायत सिर्फ साम्प्रदायिक हिंसा की,अल्पसंख्यक असुरक्षा की और प्रतिगामी कुचाल की ही नहीं है। बल्कि मोदी सरकार ने नीति आयोग की अनुशंसा के तहत भारत के प्रमुख नौरत्नों की हत्या का संकल्प भी ले रखा है। जिन नवरत्नों ने अतीत में भारत को कभी भी आर्थिक मंदी में फिसलने नहीं दिया,जिन नौरत्नों की बदौलत हमारे नेता  इतराते फिरते हैं उन सार्वजनिक उपक्रमों को अब मौजूदा मोदी सरकार ठिकाने लगाने जाए रही है। मोदी सरकार खुद की कंपनियों को चूना लगा रही है और उसने रिलायंस के मैनेजरों को ठेका दिया है कि वे  देश के नौरत्नों को शीघ्र ठिकाने लगाएं ! देश के वर्तमान शासकों ने अपने ही वतन के आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की सुपारी देशी विदेशी बदमाश पूँजीपतियों को दे रखी है. इससे न केवल लाखों मजदूरों का अहित होगा,न केवल वेरोजगारी बढ़ेगी, बल्कि राष्ट्र की वित्तीय स्थति की अनिश्चितता भी बढ़ेगी और स्थिति भंवर में होगी। नवरत्न रुपी राष्ट्रीय धरोहर की स्वायत्तता खत्म होते ही वे खुद ख़त्म हो जायेंगे।

राजनीती के एरिना में जो लोग बात बात पर 'हर हर मोदी' करते रहते हैं और जो लोग बात बात में 'अल्लाहो अकबर' घुसेड़ते रहते हैं, ये निम्न कोटि के उजबक कलंकी इतिहास के खंडहरों की भटकती दुरात्माएं हैं।  मेहनतकश आवाम को 'हंस' की मानिंद खुद ही नीर क्षीर करना आना चाहिए ,कि क्रांति की लौ बुझने न पाए। इस बाबत युवा सुशिक्षित पीढ़ी को क्रांतिकारी विचारों  की थाती संभालना चाहिये और अन्याय शोषण के खिलाफ संघर्ष की गगनभेदी आवाज बुलंद करनी चाहिए। वर्तमान युवा पीढ़ी को इस बाबत  देश और दुनिया का आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक और क्रांति संबंधी  अध्यन अवश्य चाहिए।     

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

यदि मैं एमपी का सीएम होता तो ८०० करोड़ का हेलीकाप्टर खरीदने बजाय, बाइक से गाँव गाँव फेरी लगाता !मानसून बिचलन से जिन किसानों की फसल सूख गई या दुबारा - तिबारा खरीफ की बोनी में अड़चन आई है ,मैं उनकी मौके पर ही पैसे से, बीज से, खाद से, मदद करता !श्रीराम तिवारी !

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...: मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी और ट्रेड यूनियन के साथी अक्सर कहा करते थे कि ''जिस तरह प्राकृतिक रूप से गंगा मैली नहीं है बल्कि उसे कुछ...

चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो !


मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी और ट्रेड यूनियन के साथी अक्सर कहा करते थे कि ''जिस तरह प्राकृतिक रूप से गंगा मैली नहीं है बल्कि उसे कुछ गंदे लोग मैला करते रहते हैं ,उसी प्रकार यह राजनीति भी जन्मजात गन्दी नहीं है, बल्कि स्वार्थी लोग ही इसे गंदा करते रहते हैं। जिस तरह धर्मांध और संकीर्ण लोग पवित्र गंगा नदी को गटरगंगा बनाने में जुटे रहते हैं ,उसी तरह अधिकांश फितरती, धूर्त लोग इस राजनीतिक गंगा को भी गटरगंगा बनाने में जुटे रहते हैं।  दुष्ट प्रवृत्ति लोग सत्ता में आने के लिए जाति,धर्म-मजहब और 'राष्ट्रवाद' का वितंडा खड़ा करते हैं, लोक लुभावन वादे करते हैं। और जब ये सत्ता में आजाते हैं तो वे खुद  और उनके सहयोगी भस्मासुर बन जाते हैं। जब चुनावी वादे पूरे नहीं हो पाते हैं ,तो वे नए-नए बहाने खोजने लगते हैं। इनकठिन हालात में जनता की एकजुटता ही देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकती है। अकेले सैन्य बलों की, किसी नेता विशेष की, राजनैतिक दल की क्षमता  नहीं कि हर समय सीमाओं की रक्षा कर सके ! इसीलिये राष्ट्रहित में जनता को जागरुक रहना बहुत ज़रूरी है!और अतीत के समग्र इतिहास का विंहगावलोकन भी बहुत जरुरी है।

 विगत जुलाई -२०१७ को अमरनाथ य़ात्रा की ज़िस बस के सात यात्री मारे गये, वह बस अवैध रूप से गुजरात से ही चलाई गई थीं!इतना ही नही वह बस अनंतनाग वाले रूट पर शाम के बाद दबंगई पूर्वक आगे बढाई गई!केन्द्रिय मंत्रियों ने सेन्य बलों की चूक बताया है! इस प्रकरण में मिलिट्री लापरवाह सिद्ध हूई है या स्थानीय पुलिस दोनों किन्तु सरकार और उसके भक्त यह न भूलें कि कहावत वही चरितार्थ हुई है की ''बस्तु न राखे  आपनी ,चोरे गाली देय ''!किसी भी
नीतिविहीन रीढ़विहीन नेतत्व में कूबत नहीं कि के प्रमाद से देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सके। जो नेतत्व अपनी असफलता से उतपन्न जनाक्रोश से बचने के लिए घटिया तरकीबें खोजने में जुटा हो,जो नेतत्व अपने देश की सीमाओं पर दुश्मन देश के हमले रोकने में लगातार नाकाम रहा हो,जो नेतत्व अपनी खीज और -खिसियाहट निकालने के लिए सिर्फ 'बातों का धनी ' हो ,जो नेतत्व अपने देश के लोगों को अँधेरे में रखकर रातों-रात शरीफ के घर जाकर चाय पीता रहा हो, जो नेतत्व अतीत में केवल डींगे मारता रहा हो ,जो नेतत्व अपनी असफलता की शर्मिंदगी ढकने की कुचेष्टा करने में लगा हो ,ऐसे नेतत्व के 'मन की बात' पर विश्वास करना आत्मघात है।
जनता को चाहिये कि वह किसी खास तुर्रमखां के भरोसे न रहे। जो चौकीदार सोते हुए मार दिए जाएँ ,जनता उनके भरोसे कदापि न रहे। देशके सभी नर-नारी और सरकारी सेवक अपनी-अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करें। पुलिस ,डाक्टर,अफसर ,वकील ,बाबू और जज संकल्प लें कि भारत का गौरव और आत्मबल बढ़ाने के लिए न रिश्वत देंगे, न रिश्वत लेंगे। जनता स्वयमेव इसका अनुशरण करे। देशके नेता और दल भी राष्ट्रीय संकट मानकर 'देशभक्तिपूर्ण आचरण करें !
 
जिन मिलिट्री वालों ने विगत कुछ साल पहले इंदौर में उधम मचाया ,वियर बार में लड़कियों को छेड़ा ,विजयनगर थाना तोडा था और जिन्होंने ऋषिराज हॉस्टल के निर्दोष छात्रों को वेवजह कूटा ,जिन आर्मी अफसरोंने महू से लेकर इंदौर विजयनगर तक -राह चलते सिविलियन को कुत्ता समझकर मारा-पीटा ,वे मिलिटरीवाले अब अपना शौर्य -जौहर पाकिस्तान के खिलाफ क्यों नहीं दिखाते ? हमारे ये जाँबाँज फौजी क्यों नहीं पाकिस्तान के किसी आर्मी बेस पर वैसा ही हमला कर देते ,जैसा की पाकिस्तान के फौजी भारतके खिलाफ पठानकोट पर,उरी सेक्टर और उधमपुर में करते हैं ? हमारे बहादुर फौजी अफसर अपने बाहुबल का जौहर सिविलियन भाइयों पर दिखने के बजाय या पुलिसपर दिखाने के बजाय सीमाओं पर जाकर क्यों नहीं दिखाते ? सीमाओं पर अधिकांस भारतीय फौजी सोते हुए ही क्यों मारे जाते हैं ? उरी के आर्मी बेस तक पहुँचने वाले पाकिस्तानी आतंकियों को किसी जागते हुए भारतीय फौजी के दर्शन क्यों नहीं हुए ? इन सवालों से मुँह मोड़कर ,'राष्ट्रवाद' की कोरी डींगे हांकने से पाकिस्तान के मंसूबों को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान को नाथना है तो ' इंदिरा गाँधी 'से सीखो ! जनरल मानेकशा से सीखो ! बहादुर शास्त्री से सीखो !उन तमाम भारतीय फौजियों और जनरलों सीखो जिन्होंने १९७१ में पाकिस्तान फ़तेह किया था।

इंदिराजी ने सिर्फ भारतीय सेना के भरोसे पाकिस्तान से पंगा नहीं लिया था। उन्होंने बँगला देश के मुजीव जैसे नेताओं और बँगला मुक्तिवाहनी को आगे करके , सोवियत संघ की ताकत को यूएनओ में इस्तेमाल करके,भारत के पूंजीपति वर्ग को पाकिस्तान की आर्थिक नाके बंदी में झोंककर , १९७१ में पाकिस्तान को चीर डाला था। तब भारतीय सेना की भूमिका बहुत शानदार रही थी । आज के फौजी जनरल अपने प्रमोशन जन्म तिथि परिवर्तन के लिए मुकदद्मे बाजी करते हैं और फिर मंत्री बन जाते हैं। इस दौर के पूँजीपति और व्यापारी सिर्फ अपनी दौलत बढ़ाने में व्यस्त हैं । ये सिर्फ मुनाफाखोरी ,मिलावट ,कालाधन और मेंहगाई ही बढ़ाते रहते हैं। मौजूदा नेतत्व की तदर्थ और अनिश्चयवाली नीतियों के कारण भारत खतरे में है। सत्ता पक्ष को सिर्फ कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए , विपक्ष को 'संघ' मुक्त भारत चाहिए ,जातिवादियों को आरक्षण चाहिए ! धर्म-मजहब वालों को 'नरसंहार' बहाना चाहिए। जनता को यदि बाकई अमन-खुशहाली चाहिए तो आइंदा चुनावों में कोई  सच्चा देशभक्त नेतत्व ही चुने ! बड़बोले जुमलेबाजों से बचकर रहे। इसके साथ -साथ इस भृष्ट सिस्टम को भी तिलांजलि देनी होगी। तभी भारत की सीमाओं पर स्थाई शांति हो सकेगी।

किसी भी क्रांति के बाद ईजाद एक बेहतर सिस्टम तभी तक चलन में जीवित रह सकता है ,जब तक अच्छे लोग राजनीति में आते रहें। और जब तक कोई 'महान क्रांति'का आगाज न हो जाये ! इसके लिए देशभक्ति वह नहीं जो सोशल मीडिया पर दिख रही है। बल्कि सच्ची देशभक्ति वह है कि हम अपना -अपन दायित्व निर्वहन करते हुए कोई भी ऐंसा काम न करें जिससे देश का अहित हो। सरकारी माल की चोरी ,सराकरी जमीनों पर कब्जे, आयकर चोरी,निर्धन मरीजों के मानव शरीरअंगों की चोरी ,हथियारों की तस्करी ,मादक द्रव्यों की तस्करी और शिक्षा में भृष्टाचार इत्यादि हजारों उदाहरण है जहाँ देशद्रोही बैठे हैं। इनमें से अधिकांस लोग अपने पाप छिपाने के लिए सत्ताधारी पार्टी के साथ हो जाते हैं। इसलिए सत्ताधारी पार्टी का नैतिक और  चारित्रिक पतन तेजी से होने लगता है।

मुझे भली भांति ज्ञात है कि मेरे कुछ खास मित्र ,सुहरदयजन , शुभचिंतक और सपरिजन लोग मेरे आलेखों को खूब पंसद करते हैं । लेकिन जो पसंद नहीं करते हैं वे सिर्फ इसलिए प्रशंसा के पात्र नहीं हैं कि वे ढपोरशंखी नेताओं पर भरोसा करते हैं। हालांकि वे लोग आदर और सम्मान के पात्र हैं कि जिनका नजरिया वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है और जो सत्य,न्याय के साथ हैं ! मेरे आलेख और कविताएँ नहीं पसंद करने वालों को मैंने तीन श्रेणियों में बाँटा है। एक तो वे जो यह मानते हैं कि राजनीति ,आलोचना और व्यवस्था पर सवाल उठाना उन्हें पसंद उन्हीं। दूसरे वे जो घोर धर्माधता के दल-दल में धसे हुए हैं और जो साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा निर्देशित सोच से आगे कुछ भी देखना-सुनना ,पढ़ना नहीं चाहते, सांसारिक तर्क-वितरक पर कुछ भी लिखना -पढ़ना नकारात्मक कर्म समझते हैं । तीसरे वे निरीह प्राणी हैं जो कहने सुनने को तो वामपंथी राजनीति में नेतत्व कारी भूमिका अदा करते हैं ,किन्तु व्यवहार में वे दक्षिणपंथी कटटरपंथ के आभाषी प्रतिरूप मात्र हैं। राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की उनकी समझ बड़ी विचित्र है। उन्हें हर अल्पसंख्य्क दूध का धुला नजर आताहै ,किन्तु हर हिन्दू धर्मावलम्बी उन्हें पाप का घड़ा दीखता है। पता नहीं दास केपिटल के किस खण्ड में उन्होंने पढ़ लिया कि भारत के सारे सवर्ण लोग जन्मजात बदमास और बेईमान हैं। न जाने उनकी नजर में हरेक आरक्षण धारी,दूध का धुला और परम पवित्र क्यों हैं? 
भारत में संकीर्ण मानसिकता के वशीभूत होकर दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों धड़े एक-दूसरे को फूटी आँखों देखना पसन्द नहीं करते। वामपंथ के दिग्गज,नेताओं,प्रगतिशील साहित्यकारों को लगता है कि धरती की सारी पुण्याई सिर्फ उनके सिद्धांतों,नीतियों और कार्यक्रमों में ही निहित है। दक्षिणपंथी सम्प्रदायिक खेमें के विद्व्तजन गलतफहमी में हैं कि भारतीय 'राष्ट्रवाद'उनके बलबूते पर ही कायम है और देश के अच्छे-बुरे का भेद सिर्फ वे ही जानते हैं । मेरा अध्यन और अनुभव कहता है कि 'लेफ्टफ्रॉन्ट'के पास जो 'सर्वहारा अंतर्राष्टीयतावाद का सिद्धांत है , मानवता के जो सिद्धांत -सूत्र और नीतियाँ हैं, बेहतरीन मानवीय मूल्य हैं और शोषण से संघर्ष का जो जज्वा है ,भारत में या संसार में वह और किसी विचारधारा में ,किसी धर्म-मजहब में कहीं नहीं है। लेकिन वामपंथ में भी अनेक खामियाँ हैं। परन्तु विचित्र किन्तु सत्य यह है कि केवल वामपंथी ही हैं ,जो 'आत्मविश्लेषण'या आत्मालोचना को स्वीकार करते हैं।लेकिन दक्षिणपंथी ,प्रतिक्रियावादी और पूँजीवादी केवल प्रशंसा पसंद करते हैं ,और इसके लिए वे मीडिया को पालते हैं। वे शोषण की व्यवस्था की रक्षा करते हैं, ताकि यह भृष्ट निजाम उनके कदाचरण को ,उनके राजनैतिक,आर्थिक ,सामाजिक और मजहबी हितों की हिफाजत करता रहे। इस तरह वाम- दक्षिण दोनों ध्रुवों में एक दूसरे के प्रति अनादर भाव और अविश्वास होने से भारत में वास्तविक 'राष्ट्रवादी चेतना ' का विकास अवरुद्ध है।
राजनीति का एक रोचक पहलु यह भी है कि इसकी वजह से भारत गुलाम हुआ था, और इसीकी वजह से वह आजाद भी हो गया । इसके अलावा और भी कई उदाहरण हैं कि इसी राजनीति की वजह से दुनिया अधिकांश देशों से क्रूर सामंतशाही -राजशाही खत्म हो गई। और उसकी जगह अब अधिकान्स दुनिया में डेमोक्रेसी अथवा लोकतंत्र कायम है। स्कूल कालेजों में राजनीति पढ़ना,पढ़ाना अलहदा बात है,मौजूदा 'गन्दी राजनीति' को भोगना जुदा बात है। व्यवहारिक किन्तु करप्ट -राजनीति सीखने-समझने के लिए तो भारतमें बहुतेरे संगठन मौजूद हैं। किन्तु राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक राजनीति का ककहरा सीखने के लिए भारत में सरकारी तौर पर कोई शैक्षणिक पाठ्यक्रम नहीं है। आरएसएस जैसे गैर संवैधानिक संगठन जरूर दावा करते हैं कि वे नयी पीढ़ी को राष्ट्रवाद सिखाने के लिए बहुत कुछ ,करते रहते हैं। लेकिन अपनी कट्टरवादी साम्प्रदायिक सोच के कारण वे दुनिया भर में बदनाम हैं। इसके विपरीत भारत का ट्रेड यूनियन आंदोलन काफी कुछ बेहतर सिखाता है। आरएसएस वाले तो केवल हिंदुत्व और राष्ट्रवाद ही सीखते-सिखाते होंगे,लेकिन भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र [सीटू] वाले तो धर्मनिरपेक्ष -राष्ट्रवाद.अन्तर्राष्टीयतावाद,जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षताके साथ-साथ फ्री एन्ड फेयर डेमोक्रेटिक फंकशनिंग की भी शिक्षा देते हैं। वे न केवल देशभक्ति ,शोषण से मुक्ति ,अन्याय से संघर्ष बल्कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सन्निहित सभी दिशा- निर्देशों के अनुशरण की वकालत करते हैं। उनकी स्पष्ट समझ है कि आतंकवाद के जनक साम्राज्यवाद और मजहबी कट्टरता दोनों ही हैं। केवल आतंकवाद की निंदा करने से या पूँजीवाद को कोसने से ये चुनौतियाँ खत्म नहीं होंगी ! जनता का विराट एकजुट जन-आन्दोंलन , उसकी जनवादी 'अंतर्राष्टीयतावादी' चेतना ही मौजूदा मजहबी आतंक और पाकिस्तानी कारिस्तानी से निपटने में सक्षम है। मजहबी आतंकवाद को सर्वहारा अंतर्राष्टीयतावाद ही रोक सकता है। लेकिन जब तक यह आयद नहीं होता तब तक इंदिराजी वाला रास्ता ही सही है। श्रीराम तिवारी

रविवार, 9 जुलाई 2017

उदारीकरण की नीतियों ने भारत को उधारीलाल बना दिया है

निरंतर तदर्थवादी थेगड़े लगाऊ पूँजीवादी आर्थिक नीतियों के कारण ,सस्ते चुनावी हथकंडों के कारण ,जातीय आरक्षण की वैमन्सयता के कारण और पड़ोसी देश -चीन पाकिस्तान की चालों से भारत असुरक्षित हो चला है। भृष्ट राजनीति और अनैतिक व्यापार से भारत का अंदरूनी लोकाचार भी पतित को चुका है। विकास केवल भाषणों और नारों में ही है। असल में तो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक चेहरा बदरंग हो गया है ।केंद्र की उपेक्षा के चलते अधिकांस राज्य सरकारें कंगाली की कगार पर हैं ! नोटबंदी ,१००% एफडीआई और  वस्तु एवं सेवा कर में २८ %  बृद्धि से सरकार को भी कोई उम्मीद नहीं, तभी तो पीएम महोदय, दुनिया भर में आर्थिक 'उधारी' के लिए,हथियारों के लिए और  आतंकवाद के खिलाफ विश्व बिरादरी के समर्थन के लिए रत दिन भटक रहे हैं !

संत कबीर ने सात सौ साल पहले कहा था :-कस्तूरी कुंडल बसे ,मृग ढूंडे वन माहिँ ! ऐंसे  घट घट राम हैं ,दुनिया देखे नाहिं !!  कबीर की इस साखी अथवा  दोहे का मतलब शायद ही मोदीजी को मालूम हो! क्योंकि यदि उन्हें इस दोहे का मतलब मालूम होता तो वे देश की समस्याओं का हल देश में ही ढूंडते ! इस तरह खर्चीली और उबाऊ विदेशी यात्राओं को तोबा करते। यदि इसमें कुछ भी सफलता मिलती तो  सैकड़ों बार भूमंडल की निरर्थक परिक्रमा क्यों करते?उनके आर्थिक सिपहसालारों को और 'वजीर-ऐ-खजाना' जेटली जी को भी शायद यह नहीं मालूम कि संत 'कबीर' साहब क्या संदेश दे गए हैं ?काश वे जानते होते !

भृष्टाचार के खिलाफ यदि मोदी जी बाकई गंभीर हैं,तो उन्हें एक महत कार्य करना चाहिए। केवल  लालू यादव या अखिलेश -मुलायम परिवार ही नहीं बल्कि विगत ७० साल में जो लोग ,राज्यों या केंद्र की सत्ता में रहे हैं -उन सबके आर्थिक सर्वेक्षण किये जाएँ। जो जो संदेहास्पद हो उन सबके यहाँ वेशक छापे डाले जाएँ !अधिकांश पटवारी,रेवेन्यू अफसर, तहसीलदार,वकील, डाक्टर, मंत्री , अफसर ,कलैक्टर, एसपी,आईजी ,कमिश्नर, सेक्रेटरी,राजदूत, सरकारी बिभागों के आला अफसरों ,इत्यादि के निजी और पारिवारिक समपत्ति के आंकड़े देखे जाएँ! पता चल जाएगा कि हर शाख पै उल्लू बैठा है या नहीं !और आजादी का मजा कौन लूट रहा है? खास तौर से पुलिस विभाग, आरटीओ विभाग ,एक्ससाइज,पीडब्ल्यूडी,इनकम टेक्स बिभाग ,सेल टेक्स और अन्य कमाऊ विभागों के वर्तमान एवं रिटायर अफसरों की सम्पत्ति का मीजान भी किया जाये!  ८०% भॄस्ट निकलेंगे ! इन सबकी सम्पत्ति का एक खास हिस्सा राजसात किया जाए ! वैसे भी उदारीकरण की नीतियों ने भारत को उधारीलाल बना दिया है !विदेशों से भीख मांगने के बजाय देशी चोटटों के खीसे में हाथ क्यों न डाला जाए !स्विस बैंकों का पैसा ,माल्याओं का पैसा ,दाऊद का अकूत पैसा ,अम्बानी -अडानी का पैसा ,पैसा ही पैसा ,फिर काहे को गरीब किसानों को आत्महत्या पर मजबूर कर रहे हो साहिब जी ?

भारत एक ऐंसा अमीर देश है जिसमें आर्थिक असमानता प्रचंड है। पूंजीपतियों और धर्म मजहब के ठेकदारों पास बहुत रुपया है। सब कुछ जिसका उधारी के बिना काम नहीं चलता। मोदी जी के पास इतना प्रचंड बहुमत है कि वे देशहित में सम्पत्ति हस्तनांतरण का क़ानून बना सकते हैं !सभी धनाढ्यों,बड़े जमींदारों पास बैंकों पास डूबत खातों का जो अकूत पैसा सड़ रहा है। इसी तरह केरल के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में ,तिरुपति बालाजी ,शिरडी साईँ और तमाम बकफबोर्ड इत्यादि जैसे धर्मादा संसथानों में और देश भर के अनेक धर्म स्थलों,मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों,गिरजाघरों और मठों में अकूत धन भरा पड़ा है। यदि इनसे राजसात में कोई अड़चन है, तो बिना ब्याज के रकम तो उधार मांगी ही जा सकती है। उपरोक्त स्त्रोत और संसाधनों से इतना धन जुट सकता है कि भारत को अमेरिका , इजरायल,जापान,जर्मनी या किसी अन्य देश से उधार  नहीं मांगना पड़ेगा ! वामपंथ को भी इस संदर्भ में उचित मांग उठाकर जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए।
                                                          उपसंहार :-
हालांकि भारतीय वामपंथ अब हाराकिरी याने आत्महत्या की ओर अग्रसर है !तभी तो मोदी सरकार की निरर्थक विदेश यात्राओं पर चुप है। मोदी सरकार की जन विरोधी नीतियों की मुखाल्फत करने के बजाय,पूँजीवादी शोशण के खिलाफ लडने के बजाय ,भारतीय वामपंथ कभी लालू जैसे महाचोर के पक्ष में खड़े हो जाते हैं ,कभी बुरहान बानी जैसे आतंकी की मौत पर सवाल खडा करते हैं, कभी जे एन यु के फच्छर में फंसते हैं। कभी धर्मनिर्पक्षता के बहाने बहुसंख्यक हिन्दू कौम का ही उपहास करते रहते हैं !वे आतंकवाद के सवाल पर, पाकिस्तान और चीन की घटिया हरकतों के सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं ! वे कभी गौ हत्या बनाम् बीफकांड को लेकर फटे में टांग अडा देते हैं !शायद इसीलिये आधुनिक भारतीय युवा और छात्र मार्क्सवाद जैसे बेहतरींन वैज्ञानिक दर्शन को समझने के लिये बिलकुल तैयार नही हैं !सौ में से ९९ युवा आज मोदी मोदी कर् रहे हैं ! जिसे यकीन न हो वो एमपी,राजस्थान,महाराष्ट्र ,यूपी और उड़ीसा ,बंगाल में में खुद जाकर जनमत संग्रह कर ले !

 :-श्रीराम तिवारी !


शनिवार, 8 जुलाई 2017

धनलोलुप नवधनाढ्य परिवारों से देश को खतरा है। 


संविधान की मंशानुसार विधिक रूप से भारत 'संघीय गणराज्य' है, अर्थात राज्यों का संघ है। संविधान की मंशानुसार यह धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी-गणतंत्र भी है। किन्तु वर्तमान पूँजीवादी भृष्ट व्यवस्था में न तो धर्मनिरपेक्षता बची है ,न समाजवाद का कोई चिन्ह मौजूद है और न कहीं पर गणतंत्र साबुत बचा है!जो कुछ भी इस देश में चल रहा है,वह सब भेड़िया धसान शासन तंत्र है,जिसकी लाठी उसकी भैंस है। कोई भी पूंजीवादी पार्टी दूध की नहाई नहीं है !जो अपने आपको समाजवादी कहते हैं वे महाभ्रुष्ट लालू यादव परिवार ,मुलायम परिवार, राकांपा परिवार के रूप में कुख्यात हो रहे हैं। जो अति भॄस्ट क्षेत्रीय क्षत्रप हैं वे भी माया परिवार,करूणानिधि परिवार,रेड्डी परिवार,बादल परिवार,मोमता परिवार,राणे परिवार ,वीरभद्र परिवार, हुड्डा परिवार ओवेसी परिवार ,आजम खां परिवार और फारुख अब्दुला परिवार जैसे धूर्त नव धनाढ्य भृष्ट परिवारों में शुमार हो  रहे हैं। दरअसल देश को कांग्रेस से या गाँधी नेहरू परिवार से कोई खतरा नहीं।इस देश को संघ परिवार से भी उतना खतरा नहीं,जितना इन महापातकी गैरजिम्मेदार और धनलोलुप नवधनाढ्य परिवारों से देश को खतरा है। सीबीआई और ईडी को न केवल लालू यादव परिवार पर बल्कि हर उस राजनेतिक परिवार पर छापा डालना चाहिए जो कोई कामधंधा नहीं करता और केवल राजनीति की ताकत से धन बटोरता रहता है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मुर्गा नही भी होगा तब भी सुबह होगी

  1. प्रधानमंत्री मोदी जब विदेशी दौरों पर होते हैं,तब सत्ता के दलालों के द्वारा विग्यापनों के रूप में कुछ प्रमुख समाचार पत्रों ,टीवी चैनलों और मीडिया के मालिकों को दलाली भेज दी जातीहै ! मीडिया वाले भी बड़े बफादार हैं,वे देश की सारी समस्याओं को किनारे रखकर यह दिखाना शुरू कर देतेहैं कि देखिए मोदी जी का विदेशों में कितना जलवा है?वे क्या क्या आसमानी तारे तोडकर तोडकर भारत ला रहें हैं !सबको मालामाल किया जा रहा है!
    देश  का कुपढ़ वर्ग जन मानस मीडिया के इस झूठ को कभी नहीं पकड़ पाता,कि विदेशों.में जलवा मोदी का नहीं बल्कि हमारे इस महान भारत देश के प्रधानमंत्री का है! जो पहले भी था और आगे भी रहेगा। मुर्गा नही भी होगा तब भी सुबह अवश्य होगी !

  2. मोदी की जगह यदि आप मायावती ,मुलायम या किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनाकर विदेश भेजोगे तो भी इतना ही जलवा उनका भी रहेगा।।स्वाधीनता के पूर्व जब महात्मा गाँधी विदेश जाते थे तो गुलाम भारतके एक बड़े जननायक के तौर पर उनका भी खूब जलवा था। लोग
    धोती से लिपटे और लाठी लेकर चलते एक 40-45 किलो वजन के दुबले पतले आदमी को देखने लाखों लोग उमड़ पड़ते थे। देश आजाद हुआ और पंडित नेहरू पहले प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका गए, तो तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति न केवल उन्हें रिसीव करने एयरपोर्ट पहुँचे,बल्कि प्लेन के लैंड करते ही नेहरूजी के उतरने के पूर्व ही वे उनकी सीटतक पहुंच गए। उनका जो भव्य स्वागत हुआ ,वो नेहरू का नहीं बल्कि आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का था।
  3. ततकालीन पीएम श्री राजीव गाँधी को बारिश से बचाने अमरीका का राष्ट्रपति छाता पकड़े खड़ा रहा !तब तक खड़ा रहा जब तक राजीव अपनी कार में बैठकर रवाना नहीं हो गए।। वो भी तो एक प्रधानमंत्री का सम्मान था। फर्क इतना है कि उस समय के नेताओं को ब्रान्डिंग की आवश्यकता नहीं होती थी. और तब ये घटिया प्राइवेट न्यूज़ चैनल भी नहीं थे।लेकिन अब भारत के प्रधानमंत्री के विदेश दौरों उसी तरह प्रचारित किये जा रहे हैं जैसे कोई कलाकार अपनी फ़िल्म का प्रमोशन कर रहा हो।।हर दौरे के पहले दो ढ़ाई सौ लोगों की टीम का उस देश पहुँच जाना,स्थानीय उद्योगपति की मदद से वहाँ निवासरत भारतीय समुदाय को डिनर/लंच के नाम पर प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में आमंत्रित करना,लोगों से नारे लगवाना,फ़ोटो सेशन और वो सब कुछ जो शाहरुख या सलमान करते हैं,अपनी पिक्चर के लिए। सत्ता से विदेशी दौरों का परिणाम पूँछो तो पीएम भी चुप और पीएमओ भी!

  4. समर्थक तो इसी बात पे फूल के गुब्बारा हुए जा रहें हैं कि आज साहेब अमरीकी व्हाइट हाउस में डिनर करेंगें।।अरे कुबुद्धियो!! अमेरिका तो दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा व्यापारी है !और भारत उसका सबसे बड़ा ग्राहक!!अब कोई बड़ा ग्राहक दुकान पर आएगा तो उसे चाय-नाश्ता कराओगे या नहीं ? यह सब गुणगान करने के लिए मीडियाको तो सरकारी विज्ञापन के खूब पैसे मिलतेहैं। लेकिन सत्ता के अंध भक्तों को क्या मिलेगा ?क्या वही जो आड्वा्नी को मिला ! याने ठनठन गोपाल या बाबाजी का घंटा !
  5. बुन्देलखण्डी में कहावत मशहूर है "बैठा बानियां का करे ,इधर को बांट उधर करे " मतलब किसी व्यापारी की दुकान पर जब बेचने का माल ही न हो तो कोई ग्राहक क्यों आयेगा ?और जब कोई ग्राहक ही न आये तब बेचारा बणिक तराजु के बांट इधर से उधर तो करेगा ही!ठीक इसी तरह जब भारत के वर्तमान56 इंच वाले शासक, देश के युवा - वेरोजगारों को नौकरी नही दे सके ,गरीबों और बुजूर्गं लोगों को इलाज नही दे सके ,किसानों का दर्द नही समझ सके ,विदेश से कालाधन नही ला सके ,मेंहगाई नही रोक सके , काष्मीर में धारा 370 नही लगा सके ,आतंकवाद और भ्रूषटाचार नही रोक सके और चींन पाकिस्तान जैसे पडोसियों से देश की सीमाओं की रक्षा भी नहीं कर सके तो कभी नोटबन्दी ले आये कभी जी एस टी ले आये ! और उस पर तुर्रा यह कि विदेशी दौरे करते हुए केवल ताश के पत्ते फेंट रहे हैं !ये शायद भारत की जनता की गहरी नींद का असर भी है !इसीलिये अब सत्ता धारी नेता जनता को मूर्ख बनाने में सफल हो रहे हैं !

शनिवार, 24 जून 2017

मीराकुमार के राष्ट्रपति बनने से एनडीए को भी लाभ होगा।


 भारत में राष्ट्रपति का पद कहने को तो 'ब्रिटिश क्राउन' जैसा है। किन्तु व्यवहार में आम तौर पर वह रबर स्टाम्प ही है। चूँकि संविधान अनुसार सत्ता संचालन के सारे सूत्र कार्यपालिका और विधायिका में सन्निहित हैं।इसीलिये कार्यपालिका प्रमुख की हैसियत से प्रधानमंत्री ही कार्यकारी प्रमुख होता है। देश में पीएम से ताकतवर केवल संसद होती है।संसद भी कहने को सर्वोच है,लेकिन उसकी असल ताकत बहुमत के पास सुरक्षित है। बहुमत दल का नेता याने प्रधानमंत्री ही भारत राष्ट्र में सर्वशक्तिमान होता है।भारत में राष्ट्रपति की जो हैसियत संविधान में है,चुनाव भी उतने ही ढुलमुल और अनगढ़ हैं। जो लोग राज्यों की विधान सभाओं या लोकसभा अथवा राजयसभा में पहले से ही निर्वाचित हैं ,वे ही इस पद के लिए मतदान के पात्र हैं। अर्थात भारत की जनता को अपना राष्ट्र्पति चुनने का कोई अधिकाऱ नहीं है। यदि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार तीन साल में कुछ नहीं कर सकी और हर मोर्चे पर फ़ैल है तो जनता उसे ढोने को अभिसप्त है। और इस अनर्थकारी बहुमत द्वारा चुना गया व्यक्ति ,राष्ट्रपति के रूप में  राष्ट्र की जनता का असल प्रतिनिधित्व नहीं करता। चूँकि वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन पूर्ण बहुमत में है,इसीलिये स्वाभाविक है कि जीत उनके ही प्रत्याशी की होगी।

एनडीए और भाजपा की और से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी श्री रामनाथ कोविंद जी की कुल दो अहर्तायें है !एक यह कि वे संघ पृष्ठभूमि से हैं।दूसरी यह कि वे दलित जाति से हैं। इसके अलावा उनकी और कोई अहर्ता नहीं है। इन्ही दो अहर्ताओं की वजह से वे विहार के राजयपाल बने और इन्ही दो अहर्ताओं की वजह से वे एनडीए और संघ परिवार की ओर से राष्ट्र्पति पद के उम्मीदवार बनाये गए हैं।जिस व्यक्ति ने अपने भाई की सम्पति भी हड़प ली हो ,जिस  शख्स ने अपनी पत्नी की मौत के सिर्फ 6 महीने बाद ही अपनी शिष्या बनाम प्रेयसी से शादी कर ली हो,जो शख्स तीन -तीन बार चुनाव लड़ने के बावजूद लोक सभा का चुनाव ना जीत पाया हो, क्या ऐसे व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बनाया जाना उचित है ? उन्होंने लोकसभा के तीन चुनाव लड़े ,तीनो हारे। वे राज्य सभा में सिलेक्ट किये गए ,केवल संघ का अनुयाई होने और दलित वर्ग की पात्रता की वजह से। यदि वे अनायास जीत ही गए तो देश में पूँजीवाद और साम्प्रदायिकता के जलजले होंगे। और हर शहर में गाँव -गाँव में  दंगे और बलबे होंगे। क्योंकि राष्ट्र्पति का विवेक सत्ता की जेब में होगा।

महान दलित नेता बाबू जगजीवनराम की सुपुत्री -श्रीमती मीराकुमार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतीं हैं । वे बहुत समय तक सफल केंद्रीय मंत्री भी रहीं हैं । लोकसभा स्पीकर के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय संसद के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। वे एक बेदाग़ और गरिमामय व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं। वे धर्मनिपेक्षता की शानदार मिशाल हैं। वे सर्व जातीय,सर्व समाज ,सर्व धर्म समभाव की प्रतिमूर्ति हैं। वे लोकतंत्र और संविधान में बेइंतहा यकीन रखतीं हैं। निर्धारित  इलेक्ट्रोरल यदि मीराकुमार को राष्ट्रपति चुनता है,तो यह न केवल दलितों के लिए ,न केवल महिलाओं के लिए ,बल्कि लोकतंत्र के लिए तथा समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए भी शुभ है । इससे राष्ट्रका कल्याण होगा। मीराकुमार के राष्ट्रपति बनने से एनडीए को भी लाभ होगा। श्रीराम तिवारी !