शनिवार, 14 जुलाई 2018

टेलीकॉम कंपनियों को भारी नुकसान !

  • यह जग जाहिर है कि बडबोले और घूमंतू प्रधानसेवकजी ने खुल्लम खुल्लाअंबानी की Reliance Jio कंपनी को उपक्रत किया है!इस कंपनी के फ्री 4G की मार से BSNL सहित लगभग सभी टेलीकॉम कंपनियों को भारी नुकसान हुआ,बहुत सी कंपनियां तो बंद हो गई ।
    अब बारी है हैंडसेट कंपनी की ।
    Jio ला रहा है मात्र 501/- रू में हैंडसेट बस 8-10 दिनों की बात है ।
    एक तथ्य यह है कि यदि जनता को फायदा है तो अम्बानी की शुक्रगुजार होना चाहिए । किंतु दूसरी तरफ लाखो लोग हैं जो बाकी कंपनियों में काम करते हैं और अपनाघर चला...ते हैं वो सड़क पर आ जायेंगे! और आज की तारीख में नौकरी बहुत कम है, खासकर जो इस इंडस्ट्री से जुड़ा है उसे जल्दी कहीं और नौकरी मिलना मुश्किल होता है ।
    अब वो लाखो परिवार क्या करे , इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है ।
    इसका मतलब एक ही है, जिसके पास सबसे ज्यादा पूंजी है वही सब कुछ बेचेगा । पहले इतना सस्ता बेचेगा की बाकी कंपनी घाटे में आकर बन्द हो जाए, फिर सर्फ अपना चले (मतलब maximum मार्केट share हो) .

पूंजीवादी वित्तीय बाजीगरी

  • ताजा खबर है कि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की छठी अर्थव्यवस्था बन गई है!हमने फ्रांस को पीछे छोड दिया है और भारत एक पायदान ऊपर चढा है!बधाई!दरसल विकास के ये आंकडे, पूंजीवादी वित्तीय बाजीगरी के चोंचले हैं!वरना हकीकत जनताके सामने है!
  • यह किसी से छिपा नही कि भारत की जनता और गरीब हो गई है!न सिर्फ जनता गरीब हो गई बल्कि निजी क्षेत्र के कई कारोबारी भी दिवालिया हो रहे हैं क्योंकि अंबानी,अडानी जैसे सत्ता समर्थित लोग भ्रस्ट पूंजी के खेल में छोटी मछलियों को लील रहे हैं !बाकई क्या यही विकास ...है ?
    विश्व सूची में 6ठे नंबर पर हो जाना कोई आश्चर्य की बात नही ! वास्तव में भारत नंबर वन होने के काबिल है !क्योंकि यह तो एक सनातन से अमीर देश है !किंतु सैकडों सालों की गुलामी के कारण और पूंजीवादी लूट के कारण अब उधारी के बिना इस देश का काम नहीं चलता। आज जब मोदी जी के पास प्रचंड बहुमत है तो वे देशहित में कालाधन और बैनामी संपत्ति निरुद्ध क्यों नही कर देते?सम्पत्ति के हस्तनांतरण का क़ानून क्यों नही बना देते? यह सब करने के बजाय वे अमीरों के फिक्रमंद हो रहे हैं! एक तरफ देश में धनाढ्यों,बड़े जमींदारों ने बैंकों का अकूत कर्ज ले रखा है ,कुछ तो देश छोडकर भी भाग गये हैं !दूसरी ओर देश का निम्न मध्यम वर्ग और बुर्जुवावर्ग का पैसाभी वर्षों से बैंकों के पास डूबत खातों में (NPA)पडा हुआ है।
    इसी तरह धर्मार्थ संस्थाओं में भी अपार धन सड रहा है! केरल के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में ,तिरुपति बालाजी ,शिरडी साईँ ट्र्स्ट और तमाम बक्फबोर्ड धर्मादा संस्थानों और देश के अनेक धर्म स्थलों, मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों,गिरजाघरों और मठों में अकूत धन भरा पड़ा है। यदि इनसे राजसात में कोई अड़चन है, तो बिना ब्याज के रकम तो उधार मांगी ही जा सकती है। उपरोक्त स्त्रोत और संसाधनों से इतना धन जुट सकता है कि भारत को अमेरिका , इजरायल, जापान, जर्मनी या किसी अन्य देश से उधार नहीं मांगना पड़ेगा ! वामपंथ को भी इस संदर्भ में उचित मांग उठाकर जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए।
ज्यों ज्यों चुनाव नजदीक आ रहे हैं,त्यों-त्यों शशि थरूर जैसे कुछ व्हाइट कालर नेता राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिये देश में काल्पनिक भय पैदा कर रहे हैं !वे कह रहे हैं कि अमुक फिरसे जीता तो संविधान बदल दिया जायेगा!यह सरासर गलत बयानी है !कोई लाख कोशिश करके देख ले,वो थोडा बहुत सकारात्मक सुधार भले करवा ले,किंतु मौजूदा संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों को नही बदल सकता!खुद बाबा साहिब भी यदि लौटकर आ जायें तो वे भीअब भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को पाकिस्तान जैसा धर्मांध राष्ट्र कदापि नही बना सकते

"एकम सद विप्रः बहुधा बदन्ति''

  • अपने स्वभाव से ही यह भारतीय 'सनातन धर्म' चाहकर भी किसी बिधर्मी का अहित
    नहीं कर सकता!और इसके द्वारा धर्मांतरण की तो कोई संभावना ही नही क्योंकि उसकी जाति -गोत्र की बुनावट या खाप संरचना में नव-आगुंतक 'अतिथि' को कोई स्थान ही नहीं है!न ही यह 'सनातन धर्म' किसी व्यक्ति अथवा समाज पर तलवार या बन्दूक की ताकत से थोपा जा सकता है। हालांकि इस सनातन धर्म के अंदर 'कर्मयोग,ध्यानयोग और सुदर्शन क्रिया इत्यादि आध्यात्मिक गुण सूत्र ऐंसे हैं कि संसार का कोई भी मनुष्य बिना धर्म परिवर्तन के ही 'स...नातन धर्म'का अनुशरण कर सकता है। चूुकि इसके मूल में ही वे मूल्य छिपे हैं ,जिनसे साम्यवाद और भौतिकवादी दर्शन का यूरोप सहित सारे संसार में विस्तार हुआ है!हालाँकि इस्लाम , बौद्ध ,जैन ,सिख और ईसाइयों की भाँति 'सनातन धर्म' में भी अनेक मत-मतांतर और झगड़े हैं। किन्तु इससे सनातन धर्म की सेहत पर कोई फर्क नही पडता!क्योंकि इसके कुछ सिद्धांत और सूत्र वैज्ञानिक हैं,तार्किकता से परिपूर्ण हैं। उपनिषद,वेदांत दर्शन और गीता की शिक्षाएं अपनी रचनात्मक बुनावट में ही सार्वभौम और कालजयी हैं।जगतगुरू आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धाम और श्री ज्योतिष पीठ की परम्परा,द्वादश ज्योतर्लिंग 52 शक्तिपीठ की स्थापना और भारत में भौगोलिक आधार पर प्रमुख नदियों के किनारे 'कुम्भ मेला' स्नानकी परम्परा ने भी 'सनातन धर्म' को मानवीय सम्वेदनाओं से जोड़ने का काम किया है। चूंकि इसके प्रारंभ का कोई प्रमाण नही है इसलिये शायद इसे सनातन धर्म 'कहा गया है। उसके अधिकांस प्रमुख आर्ष ग्रंथों -वेदों को 'अपौरषेय' कहा गया है। इनमें 'सनातन धर्म'की विनम्रता और उदारता के प्रमाणस्वरूप प्रक्रति सहित मिथकीय देवों के लाखों मन्त्र हैं!इन शास्त्रों में दर्ज एक -दो मंत्र यहाँ प्रस्तुत है :
  • ''इन्द्रम् मित्रम् वरुणं अग्निम अहुरथो,दिव्या सा सुपर्णों गरुत्मान,एकम सद विप्रः बहुधा बदन्ति''
  • अर्थात :-इंद्र,मित्र ,वरुण ,अग्नि ,अहुरमज्द एवं संसार के सभी देवी -देवता ,नैतिक आदर्श ,धर्म सिद्धांत मूलतः एक ही हैं। विद्वान लोग उन्हें भिन्न -भिन्न नामों से याद करते हैं, उनके नाम और उपासना के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं ,किन्तु अंततोगत्वा वह 'सत् 'एक ही है !
  • अयं निजः परोवेत्ति ,गणना लघुचेतसाम। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम।अर्थात : ये मेरा है ,ये तेरा है इस प्रकार की सोच 'निम्नकोटि' के लोगों की हुआ करती है। उदार चरित्र के लोग तो सारे संसार को अपना कुटुंम्ब मानते हैं।

बचपन कितना .....?

  • एक जन्मना महानगरीय सेवानिव्रत अधिकारी उर्फ सीनियर सिटीजन बोले-"बचपन कितना शानदार था कि छत पर सो जाओ,सोफे पर सो जाओ,माता-पिता की गोद में सो जाओ ,कहीं भी कभी भी सो जाओ,किंतु नींद बिस्तर पर ही खुलती थी!"
    मेरा जबाब-"बचपन कितना तकलीफदेह है कि खेत की निदाई गुडाई करते हुये- गीली मिट्टी पर सो जाओ,भूंखे -प्यासे फसल की रखवाली करते हुये-खेत के मचान पर या ढबुआ में सो जाओ,जंगल में लकडी काटते हुये या ढोर चराते हुये- पेड के नीचे या डाल पर सो जाओ,मिट्टी पत्थर खोदते हुये खदान में सो जाओ,किंतु नींद भूंख प्यास लगने पर या किसी के लात मारने पर ही खुलती है"!
    श्रीराम तिवारी

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत -: कार्ल मार्क्स

  • सामान्य रूप से यह समझ जाता है कि धन और पूंजी एक ही चीज है,लेकिन यह दोनों एक ही चीज नहीं है।हर तरह की पूंजी धन है,लेकिन हर धन पूंजी नहीं है।धन का वह भाग जो धन को बढ़ाने के लिए काम में लाया जाता है वही धन हीपूंजी है।कोई भी धनवान व्यक्ति प्रायःअपना सारा धन ,धन कमाने में नहीं लगाता।क्योंकि उस धन का प्रतिफल जल्द ही नहीं मिलता।मिल कारखाना खड़ा करने और उससे उत्पादन लेने में कई कई साल भी लग जाते है और धन डूब जाने की भी संभावना रहती है।प्रायः यह समझा जाता है कि पहले के व्यापारियों ने अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को मिल कारखानों में लगाया तब जाकर वह पूंजीपति बने।मार्क्स का कहना है कि नहीं,पश्चिमी देशों में पूंजीवाद की स्थापना और प्रगति का कारण समुद्री डकैती की दौलत,अमरीका ,भारत,मिश्र की लूट और अफ्रीका के दासों के व्यापार आदि की दौलत थी।अफ्रीका के सभ्यता से दूर नंगे आदिवासियों को पकड़ कर यूरोपीय व्यापारियों को बेचने वाले भी यूरोपीय व्यापारी ही थे।वह बंदूकों और जाल की मदद से लोगों पकड़ कर दासों बना कर बेच दिया जाता था।झुंड के झुंड अफ्रीकी पकड़े जाते थे।लूट और दूसरे क्रूरता से पैदा हुआ धन जिन देशों में गया वहां के सामंती शासकों ने उसका सहर्ष स्वागत किया और इस तरह के क्रूरता पूर्ण तरीके से पैदा किए गए धन को वैध बनाने का काम किया जाता रहा।उदाहरण के लिए सोलहवीं सदी में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने अंग्रेज़ जलदस्यु फ्रांसिस ड्रेक का ,लूट की भारी दौलत लाने पर ,उसके जहाज पर स्वयं जाकर,स्वागत ही नहीं किया,उसे ,, सर,,की उपाधि भी दिया।वह दक्षिणी अमेरिका के स्पेनी उपनिवेश के खजाने की बेशुमार दौलत को लूट कर आया था। इसी तरह का धन जिन व्यापारियों के हाथ लगा उन्होंने उस धन को उद्योग धंधे में लगाया।इं पूंजीपतियों ने जमीदारों को अपना सहयोगी बनाया। इन जमींदारों ने अपनी जमीनों से उन पर बसे किसानों कारीगरों को उजाड़ कर उसकी बाड़ा बंदी की और भेंडों को पालना शुरू किया।तब ऊन को सबसे मूल्यवान उत्पाद माना जाता था।उस समय कहा जाने लगा,,,भेड़ें लोगों को निगल रही हैं,,।इस तरह पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली कि शुरुआत हुई।क्रमशः,,,

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय' बनाम 'अम्बानी, University of Eminenceऔर बाज़ार"


मैं स्वयं डॉ.सर हरीसिंह गौर द्वारा स्थापित सागर विश्वविद्यालय में पढ़ा हूँ. सन् 1946 -48 में स्थापित यह भव्य विश्वविद्यालय आज एक आधुनिक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है! परन्तु तब यह डॉ. हरीसिंह गौर की निजी कमाई से बनाया गया था. डॉ.सर हरीसिंह गौर आज के अम्बानियों की तरह कोई अरबपति - खरबपति व्यापारी या सत्ता के दलाल नहींथे जिनके लिए स्कूल-कॉलेज खोलना इमेज मेकिंग, ब्लैक मनी से वाइट कन्वर्शन या घर बैठी फुरसती पत्नियों को परोपकार का मनोरंजन करवाने का एक जरिया होता है. वे एक वकील, शिक्षाविद, लेखक तथा कानून सुधारक थे. उनका जन्म सागर के एक गरीब परिवार में ही हुआ था और स्कालरशिप के ज़रिये वे कैंब्रिज पढने गए थे. वे दिल्ली और नागपुर विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी रहे और अंत में उन्होंने सागर जैसे पिछड़े क्षेत्र में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की. मितव्ययी ऐसें कि कार नहीं खरीदी, हमेशा थेगडे लगे कोट पहनते रहे, विश्वविद्यालय में एक एक पैसा लगाते रहे!
भारत के श्रेष्ठतम प्रोफेसर जो भारत में कई विषयों के जन्मदाता भी माने जाते है, इस सुविधाविहीन शहर में पढ़ाने बुलाये गए.
डॉ.गौर को सागर में विश्वविद्यालय बनाने में तमाम असुविधाओं का सामना करना पड़ा. कहते हैं यहाँ स्याही तक नहीं मिलती थी. डॉ गौर को जबलपुर में विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव दिया गया था जो सुविधायुक्त और फायदेमंद साबित होता पर वे लाभ-हानि के गणितको नहीं ज़रुरत के विज्ञान को तवज्जो देते रहे. कई वर्षों तक यह संस्था विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय में गिनी जाती रही. विख्यात दार्शनिक ओशो,महर्षि महेश योगी,आशुतोष राणा इत्यादि ने यहीं से शिक्षा प्राप्त की थी! परन्तु कम उपजाऊ ज़मीन पर एक उन्नत बीजभी कितनाही संघर्षकरे किंतु कुटिल राजनीतिके कारण धीरे-धीरे इसका स्तर गिरता गया.उसका स्तर ऊूंचा उठानै के बजाय भारत के रहनुमा अम्बानी जिओ एजुकेशन इंस्टिट्यूट' खोलने जा रहे हैं. इतने दशकों से पैसा कमा रहे हैं पर इन्हें यह संस्था तब खोलना है जब प्रधानमंत्री एक अतिभेदभाव और बाजारू किस्म की पूर्ण अनैतिक “University of Eminence” योजना की घोषणा एक भाषण में करते हैं. उनकी घोषणाएं किसी राजा की तरह भाषणों में ही होती हैं, संसद में नहीं. इस योजना के अंतर्गत चुनिन्दा शिक्षणसंस्थाओं को हजार करोड़ की ग्रांट दी जाएगी. इसके विपरीत यूजीसी के फंड में लगातार कटौती की जाती रही. एक अजीब किस्म की टैक्स मोरालिटी लादी गई कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्र के टैक्स के पैसे का दुरूपयोग हो रहा है. ये कहने वाले वे लोग थे जिनका पढाई लिखाई से युवा काल से कोई वास्ता नहीं होता, जिनके चुनाव सबसे महंगे होते हैं, जो विज्ञापनों में अरबों रूपये खर्च कर चुके हैं.
University of Eminence का विचार घोर अनैतिक इसलिए है क्योकि एक ओर यह शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देता है जो हमारे राष्ट्रीय मूल्यों के खिलाफ है वही दूसरी ओर यह फाइव स्टार मॉल और झुग्गी जैसी असमानताओं को पैदा करता है. देश की पहले से स्थापित कई विश्वविद्यालयों की हालत ख़राब होने का मुख्य कारण भ्रष्टाचार और ओछी राजनीति है. यह सरकार पिछली सरकार के इसी मुद्दे को खिलाफ सत्ता में आई थी, अतः इसे शिक्षणसंस्थाओं में व्याप्त समस्याओं को दूर करना चाहिए था जिनमे पिछली सरकारे नाकाम रही पर यह स्थापित शिक्षण संस्थाओं पर ही जैसे ताला लगा देना चाहती है- गरीबी न हटे तो गरीबों को हटाकर एक आलिशान होटल खोल दो सब कुछ रंग बिंरगा दिखने लगता है. कुछ ऐसा ही. अम्बानी का संस्थान केवल प्रस्ताव के आधार पर University of Eminence का दर्जा पा लेता है. जहाँ तक प्रश्न अम्बानी का है तो निपट बनियाई उनका चरित्र रहा है और टैक्स चोरी उनका इतिहास. गुरु फिल्म उनकी चोरी का महिमामंडन वैसे ही करती है जैसे संजू अपराधी संजय दत्त का. देश में हरीसिंह गौर जैसो के संघर्ष की कोई चर्चा नहीं होती पर अम्बानी, सुनील दत्त जैसों के संघर्ष बाज़ार को भाते हैं और नेताओं को भी. ऐसे व्यक्ति जो भारत से अरबों रूपये कमाते हैं, अरबों की छूट पाते हैं, बेंको को चपत लगाते हैं उनके बिना बने बने कथित शिक्षण संस्थान को राष्ट्र के टैक्स का अरबो रूपये देना और जिन संस्थानों ने आज़ादी के पूर्व से ही भारत के निर्माण को आधार दिया, ऐसी महापुरुषों या राष्ट्र द्वारा स्थापित संस्थाओं के फंड में कटौती करते जाना कौन सी नैतिकता है.
ये सवाल उनसे है जो अपनी विचारधारा परोसती स्कूलों में डेढ़ घंटे नैतिक होने की प्रार्थना करवाते हैं और नैतिक शिक्षा का एक पीरियड लगवाते हैं.
अम्बानी इस कदर के बनिए हैं कि वह अपने फायदे के लिए सबसे कम नौकरी सृजित करते हैं. टाटा, अजीम प्रेमजी आदि की तुलना में उनके कर्मचारियों को सबसे कम सुविधाए प्राप्त हैं. देश के सामाजिक-शैक्षणिक विकास में इतने वर्षों में इनका कोई योगदान नहीं है. इन्होने इस देश से इतना कमा लिया है कि इन्हें बिना किसी शासकीय ग्रांट के कई शिक्षण संस्थान और स्कालरशिप स्कीम देश भर में चलानी चाहिए थी पर वे नदारद हैं. वे उतना ही इन क्षेत्र में खर्च करते हैं जितना वे करने के लिए कानूनी तरीके से बाध्य हैं इसके विपरीत हरीसिंह गौर जैसे लोग अपने लिए एक पैसा भी नहीं बचाते सब लुटा जाते हैं.


क्रांति सतत अनवरत अक्षुण और स्थाई नही रह सकती ,

  • मार्क्सवाद सिर्फ मजदूरों -किसानों की कोरी राजनैतिक नीरस विचारधारा मात्र नही है!यह एक संपूर्ण मानवीय दर्शन है!यह मनुष्य को महामानव बनाने और धरती के संपूर्ण मानव समाज को उच्च मानवीय मूल्यों में ढालने की वैज्ञानिक विचारधारा है!वेअज्ञानी लोग जो द्वंदात्मक भौतिकवाद के अविचल वैज्ञानिक सिद्धांत को नही जानते,वे ही लोग पूंजीवादी प्रोपेगंडा के प्रभाव में सामंतवादी खटारा गाडी को पुष्पक विमान समझने लगते हैं!
    1924 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. देशबंधु चित्तरंजनदास ने कांग्रेस अधिव...ेशन में कहा था-"चूंकि मार्क्सवादी दर्शन आर्थिक सामाजिक जैसे शुष्क और नीरस मुद्दों परही जोर देता है,इसलिये यह भारत में कभीभी सफल नही होगा और रूस में भी प्रतिक्रांति होकर रहेगी.अहिंसा ही सही मार्ग है"
    पता नही तत्कालीन वामपंथियों ने उनका क्या जबाब दिया !किंतु कुछ लोगों के दिमाग में यह सवाल अब भी उठता है!क्योंकि बाकई रूस में प्रतिक्रांति हो गई!मेरी तरफ से इसका समीचीन जबाब यह है कि वैज्ञानिक विकास के मद्देनजर कोई भी क्रिया या क्रांति सतत अनवरत अक्षुण और स्थाई नही रह सकती ,किंतु उस क्रांति के कारण दुनिया ने जो जो हासिल किया वह इस एतिहासिक यात्रा में बहुत मूल्यवान और गरिमामय है!
    न केवल रूस,चीन, वियतनाम,क्यूबा बल्कि दुनिया की एक तिहाई आबादी ने श्रम का सन्मान जाना! दुनिया में आज साहित्य, कला,संगीत और अनेक मानवोचित विधाओं को जो सम्मान मिल रहा है,उसके मूल में मार्क्सवादी दर्शन और रूस चीन की महान साम्यवादी क्रांतियों का वरद हस्त रहा है!
    श्रीराम तिवारी.

बुधवार, 4 जुलाई 2018

अच्छे दिन कब आयंगे,पूंछ रहे हैं लोग।।

  • भृष्टाचार से लबालब ,मध्यप्रदेश भरपूर।
  • लोकायुक्त की शक्ल भी,उनको नामंजूर।।
  • नौकरशाही भृष्टतम,मध्यप्रदेश की आज।
  • कार्यवाही कीअनुमति,देते नही शिवराज।।
  • नमो-नमो सारे कहें,शिव-शिव कहे न कोय।
  • जोवंदा शिव-शिव कहे,व्यापमकांडमें रोय।।
  • बिल्डर माफिया हो गया,अरबपति धनवान।
  • खनन माफिया ले रहा, निर्दोषों की जान!!
  • मंत्री-अफसर कर रहे , सत्ता का दुरूपयोग।
  • अच्छे दिन कब आयंगे,पूंछ रहे हैं लोग।।

  • श्रीराम तिवारी

द्वंदात्मक भौतिकवादी द्रष्टिकोंण

  • वाद,प्रतिवाद और संवाद:-द्वंदात्मक भौतिकवादी द्रष्टिकोंण :हीगल के द्वंद्ववादी भाववादी विकास के अनुसार किसी द्रश्य,ध्वनि या अहसास से सर्वप्रथम मूलतः एक विचार प्रकट होता है,वह -वाद होता है।उस विचार के विरोध में एक दूसरा विचार आता है,वह- प्रतिवाद होता है।इस प्रतिवाद का भी विरोधी विचार आता है जिसमे वाद और प्रतिवाद दोनों के सकारात्मक गुण होते है,यह,,संवाद,,होता है।इसके आगे वह संवाद ही वाद बन जाता है!और फिर वाद ,प्रतिवाद,संवाद की अनंत कड़ियां बनती जुडती चली जाती हैं।और इस तरह सत्य क...ा विस्तार होता चला जाता है।यह प्रक्रिया न चक्रीयहै न सीधीहै अपितु सर्पीली या टेढ़े मेढ़े रास्ते से आगे बढ़ती है।मार्क्स के द्वंद्ववादी भौतिक वादी विकास मे भी यही तीन दशाएं होती हैं,किंतु उसका मूल 'विचार' नहीं है !वह पदार्थ या वस्तु या द्रव्य या ऊर्जा के नाम से भी जाना जाता है।यह वह सब है जो हमारे मन के बाहर स्वतन्त्र होकर भी हमारे मन को संवेदित करता है।वह कोई रंग शब्द या समाज की यथार्थ स्थिति भी हो सकती है।उदाहरण के लिए,,,गेहूं का दाना 'वाद' है।वह स्वयं को समाप्त कर पौधे को जन्म देता है।यह प्रतिवाद है।पौधा स्वयम को समाप्त कर अनेक दानों को जन्म देता है।यह संवाद है।फिर वे दाने वही क्रिया करते हैं और पहले से बहुत अधिक दाने पैदा करते हैं।यह अनंत विकास की संभावनाएं रखता है।यह दानों के मात्रात्मक और गुणात्मक विकास की गत्यात्मकता में द्वंद्वात्मक अध्ययन भी है।