गुरुवार, 20 सितंबर 2018

अथ 'श्री मच्छर कथायाम्'....


जिस किसी पढ़े लिखे व्यक्ति ने संस्कृत नीति कथा 'पुनर्मूषको- भव:' नहीं पढ़ी,उसे मेरी यह नव उत्तर-आधुनिक 'मच्छरकथा' अवश्य रुचिकर लगेगी ! लोक कल्याण के लिए और 'स्वच्छ भारत' एवं स्वश्थ भारत के निर्माण के लिए यह सद्यरचित स्वरचित मेरी मच्छरकथा फेसबुक,ट्विटर,गूगल्र,वॉट्सएप समर्पयामि....
++++ ===++++==अथ मच्छर कथा प्रारम्भ ====+======+===++++
यद्द्पि मैं कोई तीसमारखां नहीं हूँ ! फिर भी एक खास तुच्छ प्राणी को छोड़कर और किसी भी ज्ञात-अज्ञात ताकत से नहीं डरता। यद्द्पि मुझे अपनी इस मानव देह से बड़ा लगाव है,किन्तु फिर भी मैं मृत्यु से किंचित भी नहीं डरता।
मैं कोई आदमखोर जल्लाद ,हिंसक 'मॉब लिंचड़',भेड़िया,बाघ,चीता या शेर नहीं हूँ ! मैं कोई देवीय अवतार,दुर्दांत दैत्य या दानव भी नहीं हूँ। फिर भी मैं यम से भी नहीं डरता। यद्द्पि मैं ज़रा-व्याधि और नितांत मरणधर्मा और मेहनतकश इंसान रहा हूँ। मैं एक महज सीधा-सरल सा मानव मात्र हूँ। फिर भी मैं किसी भी भूत-प्रेत -पिशाच से नहीं डरता। क्योंकि उसके लिए बाजार में चमत्कारीऔर शक्तिशाली 'हनुमान ताबीज'हैं,और 'अल्लाह लाकेट'भी उपलब्ध हैं। उसकेलिए चर्च वालों के पास एक खास किस्म का 'जल' और एक क्रास भी उपलब्ध है।मैं भूकम्प,सूखा ,बाढ़ और सुनामी से नहीं डरता। क्योंकि उससे बचने के लिए मेरे भारत में तैतीस करोड़ देवता ,चार धाम तीर्थ यात्रायें हैं। लाखों - मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे और चर्च हैं!सैकड़ों बाबा,स्वामी,गुरू घंटाल,धर्म-मजहब-पंथ हैं।
मैं गरीबी ,बेरोजगारी और मुफलिसी से नहीं डरता क्योंकि उनसे निजात दिलाने के लिए 'गरीबी हटाओ' के नारे हैं ,'मन की बातें हैं ' मनरेगा है,साइंस हैं ,टेक्नॉलॉजी है ,जन संगठन हैं,हड़तालें हैं,पक्ष-विपक्ष के बेहतरीन नेता हैं। मैं चीन की विशाल सैन्य ताकत से नहीं डरता ,पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद और उसकी परमाणु बम्ब की धमकी से नहीं डरता!क्योकि उसकी काटके लिए हमारे पास अम्बानी,अडानी,टाटा,बिड़ला,बांगर हैं! और इनके अलावा मोदीजीतो हैं ही!मैं किसी आईएसआईएस,अलकायदा, तालीवान,या जमात-उड़-दावा और जेहादियों से नहीं डरता क्योंकि मैं मुसलमान नहीं हूँ। जबकि आतंकी जेहादी-इराक,सीरिया पाकिस्तान, अफगानिस्तान ,यमन और सूडान में चुन चुन कर केवल गैर सुन्नी मुसलमानों को ही मार रहे हैं। भारत -पाकिस्तान सीमा पर और कष्मीर में भी अधिकांस मुसलमान ही मारे जा रहे हैं। यद्द्पि हिन्दुओं को भी वे नहीं छोड़ते,किन्तु यह केवल अपवाद ही है।
मैं दैहिक ,दैविक ,भौतिक तापों से नहीं डरता क्योंकि उसके लिए मेरे पास बाबा हैं साध्वियां हैं ,कांवड़ यात्राएं हैं, दुर्गोत्सव हैं ,गणेशोत्सव हैं , ईदोत्सव हैं ,फागोत्सव हैं ,वसंतोत्सव हैं,होली, दीवाली,दशहरा,और प्रकाशोत्सव हैं। वृत-उपवास, कथा-कीर्तन हैं। मैं सरकारी संरक्षण में पलने वाले घातक भृष्टाचारसेभी नहीं डरता क्योंकि उसके लिए आनन्द मोहन माथुर और आनंद राय जैसे व्हिस्लब्लोबर हैं। मैं ट्रांसफर माफिया से नहीं डरता क्योंकि मैं अब सेवा निवृत हो चुका हूँ। मैं दारू माफिया,बालू रेत खनन माफिया,खाद्यन्न-मिलावट माफिया,ठेका माफिया, जिंस -जमाखोर माफिया, व्यापम माफिया, भू माफिया, बिल्डर माफिया, ड्रग माफिया से भी मैं नहीं डरता ,क्योंकि इन सबसे निपटने के लिए लोकायुक्त हैं ,न्याय पालिका है,एनडीटीवी है,रवीशकुमार हैऔर जनता है ,विपक्ष के नेता हैं,बार-बार होने वाले चुनाव हैं।
और वैसे भी ये डराने वाली काली ताकतें- महापापी अपनी मौत मरते भी तो रहते हैं। इनसे क्या डरना ? इनसे तो वही डरता है जो इनसे चंदा लेकर चुनाव लड़ता है !और नेता, विधायक ,सांसद ,मंत्री बनता है। मेरे जैसे एक आम आदमी को इनसे क्यों डरना चाहिए ?
सफ़दर हाशमी,नरेंद्र दावोल्कर ,गोविन्द पानसरे ,कलीबुरगी और गौरी लंकेश को मारने वाले हिंस्र -अंधविश्वासी हत्यारों से भी मैं नहीं डरता। क्योंकि इनके हाथों मारे गये अमर शहीदों के जैसा महान क्रांतिकारी और समाज सुधारक तो मैं कदापि नहीं हूँ।
मार्क्सवादी-भौतिकवादी दर्शन पर विश्वास रखते हुए मैं भाववादियों के सभी धर्मों की अच्छी बातों और स्थापित मानवीय मूल्यों की कद्र करता हूँ। श्रीकृष्ण के इस सिद्धांत को मानता हूँ की
"नबुद्धिभेदमजनयेदज्ञानाम ,कर्मसङ्गिनाम ,जोषयेत्सर्व कर्माणि विद्वान युक्त समाचरन '' - अर्थात
"विज्ञानवादी -प्रगतिशील भौतिकवादि विद्वानों को चाहिए कि धर्म-मजहब का ज्यादा उपहास न करें ,लोगों को धर्मविरुद्ध ज्यादा ज्ञान न बघारें। उनकी गलत सलत मान्यताओं,कुरीतियों और अंधविश्वाशों पर चोट तो करें किन्तु यह सब करने से पहले खुद को आदर्श रूप में ढालें ,फिर दूसरों का पथ प्रदर्शन करें "
चूँकि मैं सच्चे मन से धर्म -मजहब को फॉलो करने वालों की इज्जत करता हूँऔर साथ ही उनको आगाह भी करताहूँ कि वे 'फतवावाद' संकीर्णतावाद,पाखंडवाद और ढोंगी पाखंडी मठाधीशों से बचकर रहें । इसीलिये कईसच्चे आस्तिक भी मेरे मित्र हैं। मैं अतल -वितल -सुतल -तलातल -तल -पाताल और भूलोक इत्यादि सातों लोकों के थलचर जलचर और नभचर इत्यादि नाना प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भयानक आदमखोर जीव-जंतुओं से नहीं डरता। मैं कोबरा ,करैत या विशालकाय ड्रेगन से नहीं डरता। मैं चील-बाज-गिद्ध या गरुड़ से नहीं डरता। मैं कोकोडायल, ,व्हेल या सार्क से भी मैं नहीं डरता। किन्तु मैं एक अदने से उस जीव से अवश्य डरता हूँ,जो कि दुनिया भर के किसी भी हिंस्र आतंकि से भी नहीं डरता।
जो प्राणी साहित्यकारों -व्याकरणवेत्ताओं के लिए महज एक तुच्छतर 'उपमान' है। उस तुच्छ जीव का काटा हुआ व्यक्ति पानी नहीं मांगता। इस तुच्छ कीट के काटने मात्र से किसी को डेंगू, किसी को मलेरिया किसी को चिकनगुनिया और किसी को परलोक की प्राप्ति भी हुआ करती है। मैं इस अति सूक्ष्म किन्तु भयावह जीव से भलीभांति सताया जा चुका हूँ। इस के दंश को याद कर सिहिर उठता हूँ। अब तो डर के मारे उसका उल्लेख भी नहीं करता।बल्कि सभी सज्जनों से इस कथा को वांचने की याचना करता हूँ।
अथ 'श्री मच्छर कथायाम' समाप्त !
प्रस्तुत कथा को जो नर-नारी नहां -धोकर ,साफ़ सुथरी जगह पर बैठकर नित्य -नियम से सपरिवार पढ़ेंगे ,सुनेंगे और गुनेंगे मच्छरदानी का और ऑल आऊट का प्रयोग करेंगे वे असमय ही 'परमपद' को प्राप्त नहीं होंगे। बल्कि इस धरा पर शतायु होंगे।ओम् शांति: एवमस्तु !
श्रीराम तिवारी

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत-कार्ल मार्क्स'


आदिम साम्यवादी युग में उत्पादन और स्वामित्व दोनों का स्वरूप सामूहिक था ।
दास स्वामी युग में उत्पादन का स्वरूप सामूहिक था।किन्तु स्वामित्व का स्वरूप वैयक्तिक था।अर्थात दास समूह में उत्पादन करते थे किन्तु एक स्वामी उसका मालिक हो जाता था।
सामंती युग में उत्पादन का स्वरूप वैयक्तिक हो गया ,तो इसके साथ ही उसका स्वामित्व भी वैयक्तिक हो गया।अर्थात उत्पादन का काम एक परिवार के सभी लोग मिल जुल कर करते थे और उत्पादित समान का मालिक वह परिवार ही होता था।
सामंती युग का उत्पादक परिवार सामंत को उसका हिस्सा देने के बाद अपने उपभोग के लिए जरूरत भर की चीजें रख लेता था।उसी को दूसरों द्वारा उत्पादित जरूरी सामानों से बदल लेता था।या उसे बेच कर मुद्रा प्राप्त कर लेता था।
अपनी जरूरत को पूरा करने भर के सामान को अपने उपभोग के काम में लाने के बाद वह जो बचाता था ,उस अतिरिक्त को वह उपकरणों के निर्माण में खर्च करता था।
कुल मिला कर उत्पादन मुख्यत : उपभोग के लिए किया जाता था। अर्थात लोग उपभोग के लिए पैदा करते और खरीदते थे ,न कि बेचने के लिए।उत्पादन, उपभोग की वस्तुओं का किया जाता था ,न कि ,माल,का।
लोग जगह जगह लगने वाले हाटों में अपनी अपनी जरूरत की चीजे खरीदते थे।मूल्य का मुख्य आधार मुख्यत : मांग और पूर्ति का संबंध था

लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।

माल गपागप खाएं चोट्टे,
कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ,
गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ,
सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगणमन को मूर्ख बनाते,
शासकगण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे,
पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,
मुल्क हुआ हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते मरते,
क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,
होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन खूब लड़ें आपस में,
जाति धर्म की घानी में।
सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,
काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा भूले,
जो लिखी है लहू लुहानी में।
संघर्षों की दिशा सही है ,
भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी

सोमवार, 17 सितंबर 2018

देश की जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री को 'हैप्पी बर्थ डे' कहने में किस बात की शर्म ?

देश की जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री को 'हैप्पी बर्थ डे' कहने में किस बात की शर्म ?
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दुनिया भर से तमाम राष्ट्रप्रमुखों ने,उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर मोदीजी को जन्म दिन की शुभकामनएं दीं। लगभग पूरे भारत में मोदी जी के जन्म दिन की गूँज है!इस अवसर पर मैं भी तहेदिल से मोदीजी को उनके जन्मदिन पर बधाई देता हूँ, उनके दीर्घ और स्वस्थ जीवन की कामना करता हूँ!
जिन विपक्षी नेताओं ने या राजनैतिक दलों ने मोदी जी को किसी वजह से शुभकामनाएँ न दीं हों या देनाही न चाहते हों,उनसे निवेदन है कि कम से कम जन्मदिन को तो राजनीति से दूर रखें ! जिन्होंने मोदीजीको आज बधाई नहीं दी,वे विरोधी नेता और दल यह सोचें कि क्या मोदी जी उनके प्रधान मंत्री नहीं हैं ?
वेशक मोदीजी-अम्बानी,अडानी,जियो टेलीकॉम ,भाजपा,संघ परिवार ,कारपोरेट कम्पनियों और जिन-जिन के अच्छे दिन आये हैं उन सबके परमप्रिय प्रधानमंत्री हैं। लेकिन भारतीय संविधान के मुताबिक तो वे हम सभी के प्रधान मंत्री हैं ! इसलिए जन्म दिन की शुभकामनाएँ देने का जितना हक सत्तावालों को है ,उतना ही हक उन सभी को है जो चुनाव हार गए हैं और विपक्ष में हैं!क्योंकि आम चुनाव में जिसे बहुमत मिलता है वही पूरे देशका एकमात्र प्रधानमंत्री हुआ करता है। और तब जो नेता या दल चुनाव हार जाते हैं ,उनके मतदाता- सपोर्टर यह नहीं कह सकते कि उनका कोई प्रधानमंत्री नहीं है। दरसल उनके प्रधानमंत्री भी मोदी जी ही हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति में भी यही रीति है कि जो जीता वही सिकन्दर !
इसलिए जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिये हर-हर मोदी जपने में की जरूरत नही है!किन्तु देशकी जनता द्वारा निर्वाचित देश के प्रधानमंत्री को 'हैप्पी बर्थ डे'कहने में किस बात की शर्म ? मेरे ख्याल से तो सभी भारत वासियों को एक स्वर में तहेदिल से अपने प्रधानमंत्री को 'जन्म दिन' की बधाई देनी चाहिए !साथ ही सभ्य तरीके से उनकी पूंजीवाद परस्त नीतियों और बड़बोलेपन का विरोध करना चाहिये!
सवाल उठ सकता है कि जिनको महँगाई ने मारा है ,जिन्हें सूखा-बाढ़ और व्यापम ने मारा है ,मोदीजी उनकेभी प्रधानमंत्री तो अवश्य हैं ,किन्तु राजधर्म कहाँ है ? जो अल्पसंख्यक हैं ,जो बीफ भक्षणके नाम पर धिक्कारे जाते हैं , जो दलित हैं और मृत पशु उठाने के नाम पर मोदी जी के गुजरात में मार दिए जाते हैं, मोदी जी उनके भी प्रधान मंत्री तो हैं किन्तु उन्हें प्रधानमंत्री का सहयोग क्यों नहीं मिलता ? जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता करते हैं मोदीजी उनके भी प्रधानमंत्री हैं ,जो सत्ताधारियों की असहिष्णुता के खिलाफ बोलते हैं ,मोदी जी उनके भी प्रधानमंत्री हैं, जो साम्प्रदायिक उन्माद और अंधश्रद्धा जनित पाखण्डवाद का विरोध करते हैं मोदी जी उनके भी प्रधान मंत्री हैं तो उनकी हत्या पर मौन क्यों रहते हैं ? 'राष्ट्रवाद' का आह्वान है कि इन सवालों पर कमर कस के रखें,खूब संगठित संघर्ष भी जारी रखें। लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री को दीर्घायु होने की शुभकामनाएं अवश्य दें।

नजर अपनीआसमानी रख।-[ Poem by -shriram tiwari]


परिंदे हौसला कायम रख!
अनवरत उड़ान जारी रख!!
हर इक निगाह है तुझ पर,
थोड़ी सी सावधानी रख!
बुलंदियाँ छूने की कलाबाजी,
परों में जान ओ दॉव बाकी रख!!
फिजायें हिम्मत आजमाएगीं,
नजर अपनी आसमानी रख!
परिंदे पहिले भी उड़े हैं कई,
सीख उनकी मुँह जुबानी रख!!
भटके,राह भूले न लौटे कभी,
याद उनकी भी निशानी रख!
दहक़ता आसमाँ होगा कहीं,
उड़ानों का पुरषत्व सानी रख!!
कहीं बादल घनेरे अँधेरा घुप्प,
कौंधतीं बिजलियाँ मानी रख!
धुंध के पार विहंगावलोकन कर ,
सितारों से आगे की रवानी रख !!
परिंदे हौंसला कायम रख!
अनवरत उड़ान जारी रख!!
(मेरे काव्य संग्रह 'शतकोटिमंजरी'से अनुदित)- श्रीराम तिवारी

नोटा रूपी ओखली

जब केंद्र की मोदी सरकार ने एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट-विषयक सुप्रीमकोर्ट के सही फैसले को पलटा,तो भारतके अधिकांस ओ/ सी-सवर्ण बंधु भाजपा और मोदी सरकार से नाराज हो गये! जो सवर्ण कांग्रेस और तीसरे पक्ष के हैं वे तो भाजपा के खिलाफ कांग्रेस या तीसरे विकल्प के लिये प्रतिबद्ध हैं! किंतु जो परंपरागत भाजपाई हैं,वे गलतफहमी के शिकार हैं!जाने क्यों वे 'नोटा' के विकल्प को अपनी समस्या का निदान मान रहे हैं!जबकि नोटा तभी आजमाया जाना चाहिये जब एक वोटर के समक्ष पहले आजमाये जा चुके सारे विकल्प चुक गये हों!किंतु यदि कोई विकल्प बाकी है,तो उसे भी एक अवसर दिया जाना चाहिये!सवर्णों को राहुल गांधी को भी एक मौका देना चाहिये!यदि राहुल असफल हों तो मायावती को भी सशर्त एक अवसर देना चाहिये!यदि वे असफल हों तो वामपंथ को भी कम से कम एक बार तो मौका मिलना चाहिये!जब ये सब चुक जाएं और तब भी यदि किसी को उचित न्याय न मिले तब भले ही इस नोटा रूपी ओखली में सिर घुसेड़कर हाराकिरी कर लेनी चाहिये

सामंतयुग से पूर्व की दास स्वामी व्यवस्था का कठोर सच:- कार्ल मार्क्स


आदिम दास-स्वामी युग में ही दासों के संघर्षों के परिणामस्वरूप सामंती प्रणाली का अर्थात सामंत और किसान वर्गों के संबंध की आर्थिक सामाजिक प्रणाली का जन्म हो गया था।
किन्तु उस युग की निर्णायक प्रणाली दास स्वामी संबंधों की ही प्रणाली थी।और उसका रक्षक राज्य दास स्वामी राज्य ही था।
जिस इलाके में और जिस समय दास स्वामी राज्य का पतन और सामंती राज्य की विजय हुई वहां और उसी समय से दास स्वामी युग का अंत और सामंती युग का श्री गणेश हो गया।यह एक क्रांति थी।
दास स्वामी युग आदिम साम्यवादी युग की अपेक्षा एक प्रगतिशील युग था।और सामंती युग दास स्वामी युग की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील था।
दास स्वामी युग का आगमन स्वाभाविक था।दासों पर अत्याचार भी स्वाभाविक था।बिना उसके वह दूसरों के लिए नहीं खट सकता था।और आर्थिक विकास संभव नहीं था ,तो दासों का विद्रोह ,संघर्ष और स्वामियों की सेना से युद्ध भी स्वाभाविक था।
इनके बिना दासों की मुक्ति संभव नहीं थी।
दासों के जीवन के लिए दास स्वामी युग में किए जाने वाले सारे सुधार उन सभी को मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से नहीं होते थे किन्तु इस मात्रात्मक परिवर्तन ने गुणात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया और दासों के अनवरत संघर्ष ने उसे पूरा कर दिया।

कस्तूरी कुण्डल बसत म्रग ढूंड़े वन माहिं!

विगत 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नीत यूपीएके १० वर्षीय मनमोहनी कुशासन से तंग आकर देश की आवाम ने भाजपा के नेतत्व में एनडीए को प्रचंड बहुमत प्रदान किया था। लेकिन विगत चार साल में जनता का मोह भंग हुआ है। मोदी सरकार के लिए यह खतरेकी घंटी है।पहले नोटबंदी,जीएसटी और अब एट्रोसिटी एससी,/एसटी संशोधित एक्ट गले पड़ रहा है!आमतौर पर विश्लेषकों की रायहै कि 'नमो' रुपी बरगदके पेड़के नीचे अन्य नेता-कार्यकर्ताओं रुपी पेड़-पौधों को अपना रूप -आकार विकसित करने का कोई अवसर नहीं मिला!इसलिये सरकार चलाने के आशाजनक परिणाम कैसे सम्भव हैं?
अभी तो हर चीज पीएम के ही कब्जे में है, यहाँ तक कि कोई केंद्रीयमंत्री तो क्या भारत का गृहमंत्री भी 'नमो'की इच्छा के बिना कुछ नहीं कर सकता। अतः यह बहुत सम्भव है कि व्यक्तिगत रूप से तो मोदीजी अपना 'आउट- पुट ' देने की पुरजोर कोशिश करेंगे, किन्तु विभिन्न राज्यों के भाजपाई नेता और केंद्रीयमंत्री और पार्टी पदाधिकारी-समष्टिगत रूप से अपने रण -कौशल का इजहार करने में असमर्थ हो रहे हैं।
आर्थिक संकट को नवरत्न और सार्वजनिक उपक्रम बेचने से या एफडीआई से नही टाला जा सकता! बल्कि अमीर कार्पोरेट घरानों और पूँजीपतियों के अलावा,मंदिरों,मठों, गिरजों, गुरुद्वारों और वक्फ बोर्डों के पास जो धन जमा हैंउसे राजसात किया जाना चाहिये! भारत में मौजूद इस अकूत धन से जापान को १० बार खरीदा जा सकता है। इसके अलावा भारत के मध्यमवर्ग के पास इतना सोना है कि अमेरिकाऔरसऊदी अरब का स्वर्ण भण्डार भी शर्मा जाए !
जापान,अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन के आगे सर झुकाने से कुछ नहीं होगा प्रधान मंत्री जी ! देश के अंदर झाँक कर देखिये, "कस्तूरी कुण्डल बसत म्रग ढूंड़े वन माहिं!" याद कीजिये!विनाशकारी पूँजीवादी नीतियां बदलिए श्रीमान ! यदि उठा सकें तो -दुनिया के सामने भारत का सर उठाकर दिखायें!फिर अपना '५६' इंच का सीना तानकर दिखायें ! तब शायद कोई बात बने' !
-; श्रीराम तिवारी ;-

रविवार, 16 सितंबर 2018

मुफ़्तखोर समाज का निर्माण !

यह सर्व विदित है कि केंद्र या राज्य सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ जब तब सिर्फ मुठ्ठीभर संगठित मजदूर कर्मचारी और किसानहीआवाज उठाते रहते हैं,जबकि देश का आम आगमी इस संघर्ष से कोई सरोकार ही नहीं रखना चाहता,तो सर्वहारा क्रांति का क्या होगा?इस प्रश्न के उत्तर में प्रस्तुत है यह आलेख:शीर्षक-*भारत में मुफ़्तख़ोरी की पराकाष्ठा!*
मुफ़्त दवा, मुफ़्त जाँच, लगभग मुफ़्त राशन, मुफ़्त शिक्षा, मुफ्त विवाह, मुफ्त जमीन के पट्टे, मुफ्त मकान बनाने के पैसे, बच्चा पैदा करने पर पैसे, बच्चा पैदा नहीं (नसबंदी) करने पर पैसे, स्कूल में खाना मुफ़्त, मुफ्त जैसी बिजली 200 रुपए महीना, मुफ्त तीर्थ यात्रा, मरने पर भी पैसे!
जन्म से लेकर मृत्यु तक सब मुफ्त । मुफ़्त बाँटने की होड़ मची है, फिर कोई काम क्यों करेगा ? देश का विकास मुफ्त में पड़े पड़े कैसे होगा?
पिछले दस सालों से ले कर आगे बीस सालों में एक एेसी पूरी पीढ़ी तैयार हो रही है और पूंजीवादी दलों के भ्रस्ट नेता बना रहे हैं!और इनके रहते तो पूर्णतया मुफ़्त खोर होगीही!
अगर आप को पिलंबर चाहिये,विद्दुत सुधार मेकेनिक चाहिये,पैंटर चाहिये,,अव्वल तो मिलेंगे नही,इनको फोन करो तो कलेक्टर से ज्यादा व्यस्त पाये जायेंगे!काम करने को कहेंगे तो गाली दे कर कहेंगे की सरकार क्या कर रही है?
ये मुफ़्त खोरी की ख़ैरात कोई भी राजनैतिक पार्टी अपने फ़ंड से नही देती। टैक्स दाताओं का पैसा इस्तेमाल करती है!
हम नागरिक नहीं परजीवी तैयार कर रहे हैं!
देश का अल्पसंख्यक टैक्स दाता बहुसंख्यक मुफ़्तखोर समाज को कब तक पालेगा ?
जब ये आर्थिक समीकरण फ़ेल होगा तब ये मुफ़्त खोर पीढ़ी बीस तीस साल की हो चुकी होगी जिसने जीवनमें कभी मेहनतकी रोटी नही खाई होगी!वो हमेशा मुफ़्त की खायेगा! नहीं मिलने पर, ये पीढ़ी चोर,चैन स्नैचर बन जाएगी!उग्रवादी बन जाएगी किंतु काम नही कर पाएगी!
सोचने की बात है कि सरकारें और समाज के रहनुमा कैसे समाज का और कैसे देश का निर्माण कर रहे हैं ?

जुदाई गीत

जरा दिल को तसल्ली दो,आरज सुनो मेरी।
रोको रवानी को,तुम्हें जल्दी भी क्या ऐंसी।।
लगी दिलकी बुझालें हम,तबतुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम,तब तुम चले जाना।।
चोट दिलमें लगी,प्रिय तुमसे बिछुड़ने की।
हरदम दिल में बसी,एक सूरत सलोनी सी।।
प्रीत अनमोल कैसी है,ए हमने अब जाना।
गम अपना सुना दें हम,तब तुम चले जाना।।
इतना ही था मिलन,आई वेला जुदा होने ।
सब होश उड़े हैं मेरे,अंत मेरा खुदा जाने ।।
जरा होश में आ जाऊं ,तब तुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम,तब तुम चले जाना।।
मन हल्का तो होने दो, हम गम के मारे हैं।
हमको न भुला देना ,सदा हम तुम्हारे हैं।।
नफरतों के दौर में ,यारी को निभा जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
हमें गम जुदाई का,देकर के तुम चल दिए।
पलकोंमें बसाकर तुम्हें,वक्त ने छल किये।।
तुम बिन कैसे जियें, जरा ये तो बता जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
आदत पुरानी है ,हमें गमें चोट खाने की।
जबजब जागे नसीब,आये बेला रुलाने की।।
तुमने पीर पराई को,कुछ देखा सुना जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
खूब चाहा तुम्हें हमने, हमको न भुला देना।
ग़मों को हमारे तुम ,अपना न बना लेना ।।
दिल का जख्म भर दे, दवा ऐंसी दे जाना।
गम अपना सुना दें हम तब तुम चले जाना।।
जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी (मेरी पुस्तक अनामिका से)