गुरुवार, 15 नवंबर 2018

संचार क्रांति का युग :- नवयुग उत्तर आधुनिक,

-
नवयुग उत्तर आधुनिक,
तकनीकी उत्कर्ष ।
'फेक -वर्चुअल' पर टिका,
जग व्यवहार विमर्श ।।
गूगल ट्विटर फेसबुक ,
इंटरनेट संचार।
सर्च इंजन में छुपा,
आभासी संसार।।
क्रांति दूरसंचार की,
कम्प्यूटर उथ्थान ।
मोबाईल सिम हो चुकी,
व्यक्ति की पहचान ।।
वे नर हो गये हुक्मरां
जाने गुणा न भाग ।
आतंकी भी सीख गए
डिजिटल एनालॉग।।
पुलिस तंत्र को भेदकर,
सक्रिय हैं हैकर्ष।
हाई टेक अपराध भी ,
होने लगे सहर्ष।।

खास हुआ कागज कलम,
ब्रॉड बेंड अब आम।
लेपटॉप पर लिख रहे,
पंडित कवि 'श्रीराम'।।

सोमवार, 12 नवंबर 2018

गरीब सवर्ण कोभी अंबानी या टाटा ही समझते हैं!

इस देश के कुछ लोग एक तरफ तो सवर्णों को पानी पी पीकर कोसते रहते हैं,वे गरीब सवर्ण कोभी अंबानी या टाटा ही समझते हैं!दूसरी ओर किसी पिछड़े वर्ग या दलित वर्ग के व्यक्ति का कलैक्टर कमिश्नर हो जाने पर भी आरक्षण रूपी वैशाखी की खातिर खुद को अनंतकाल तक दलित,पिछड़ा और निम्नजाति का ही मानते रहना कहाँ तक उचित है? इस तरह से तो भारत में जातिवाद खत्म होने के बजाय और ज्यादा मजबूत ही होगा!इस तरह की मानसिकता से कोई भी ऊपर कैसे उठ सकता है? दलित पिछड़े होने का सबूत-देकर और जाति प्रमाणपत्र केनाम पर-आरक्षण का लाभ लेकर कोई ऊंचा कैसे उठ सकता है?
राजनीतिक पटल पर भी जो लोग इस या उस जाति के नाम पर चुनाव लडते़ रहते हैं वे भले ही हारें या जीतें किंतु ये सब लोकतंत्र और संविधान के दुश्मन हैं!बाबा साहिब ने यह सपना नही देखा था कि शोषित दमित जन अनंत काल तक आरक्षण की बैशाखी के सहारे औरों के गुलाम ही बने रहें!

शनिवार, 10 नवंबर 2018

वह सिर्फ रोटी से खेलता है-Dhumil

#धूमिल: हिंदी कविता का एंग्री यंगमैन
हिंदी कविता के एंग्री यंगमैन-सुदामा पांडे जो हिंदी साहित्य जगत में धूमिल के नाम से मशहूर हुए,जिनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंगकी पीड़ा और आक्रोश की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है.व्यवस्था जिसने जनता को छला है,उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य रहा है.इसलिए उन्होंने कहा-
"क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई मतलब होता है?"
धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था.धूमिल का जन्म नौ नवंबर, 1936 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के खेवली गांव में माता रसवंती देवी के गर्भ से हुआ था.३८ वर्ष की अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई.उनके परिजन रेडियो पर उनके निधन की खबर सुनने के बाद ही जाना कि वे कितने बड़े कवि थे.
धूमिल के जीवित रहते 1972 में उनका सिर्फ एक कविता संग्रह प्रकाशित हो पाया था- संसद से सड़क तक. ‘कल सुनना मुझे’ उनके निधन के कई बरस बाद छपा और उस पर 1979 का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें मरणोपरांत दिया गया. बाद में उनके बेटे रत्नशंकर की कोशिशों से उनका एक और संग्रह छपा- सुदामा पांडे का प्रजातंत्र.आज उनके जन्मदिन पर उनकी इस लोकप्रिय कविता को याद करें------
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं
यह तीसरा आदमी कौन है
और मेरे देश की संसद मौन है…
आज उनके जन्मदिन पर #शत_शत_नमन

कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत*


मार्क्सवाद वर्ग संघर्ष के लिए सर्वहारा में स्वयं में वर्ग के बाद स्वयं के लिए वर्ग की चेतना के विकास को प्राथमिकता देता है।
पूंजीवादी व्यवस्था में एक तरफ पूंजीपति वर्ग की तो दूसरी तरफ सर्वहारा वर्ग की निर्णायक भूमिका को स्वीकार करता है।
पूंजीवादी व्यवस्था में लाभ पाने वाले छोटे बड़े कई वर्ग ,संघर्ष में पूंजीपति वर्ग के पक्ष में चले जाते हैं या उनके चले जाने की अधिक संभावना रहती है।
इस व्यवस्था मै शोषण दमन के शिकार सर्वहारा के अतिरिक्त छोटे बड़े दूसरे वर्ग भी होते हैं किन्तु वह कुछ देर से सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में संघर्ष करने के लिए तैयार होते हैं।
छोटा और मझोला किसान सर्वहारा का सबसे अच्छा दोस्त होता है।
खुद सर्वहारा और निम्न मध्यम वर्ग के अनेक ऐसे भी होते हैं जिनका चारित्रिक पतन इतना अधिक हो जाता है कि वह लंपट बन कर पूंजीपति वर्ग के लिए काम करने लगता है।यह पूंजीपति वर्ग के फेंके हुए टुकड़ों पर पलता है और मजदूरों पर आक्रमण करने,नेताओं की हत्या करने ,हड़तालों के समय अराजकता फैलने का काम करता है।
कुछ पूंजीवादी पार्टियों की सरकारें इन पर काफी खर्च करती हैं।
पूंजीपति वर्ग ने जिस सामंत वर्ग को सत्ता से बेदखल किया उसकी बहुत सी संताने पूंजीपतियों की लठैत बन जाने को अपना सौभाग्य समझ ती हैं।यह भी लम्पटों की कतार में खड़ी हो जाती हैं।
बीते दिनों के सामंतों की अधिकतर संताने तो पूंजीपतियों के यहां उनकी नौकरी करती हैं और इस तरह सर्वहारा बन जाती हैं।

कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है

सवाल उठना लाजिमी है कि कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है ? एक अंतर तो यही है कि कांग्रेस यदि सत्ता में हो और गलती करे तो जनता उसे आसानी से हटा सकती है!किंतु यदि दुर्भाग्य से भाजपा सत्ता में आ जाये तो फिर वो चाहे कितना ही गलतियां करे,किंतु उसे सत्ता से हटाना बहुत मुश्किल है!भाजपा -कांग्रेस में एक ठौ अंतर और है !जो लोग कभी कांग्रेस को 'चोर' कहा करते थे,वही लोग इन दिनों भाजपा को 'डाकू' कहने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। चोर और डाकु में जो भी फर्क है वही कांग्रेस और भाजपा का वर्चुअल चारित्रिक अंतर है।

सोमवार, 5 नवंबर 2018

गागरमें सागर है हिन्दी।

संस्कृत की एक लाड़ली बेटी है ये हिन्दी।
बहनों को साथ लेकर चलती है ये हिन्दी।
सुंदर है, मनोरम है, मीठी है, सरल है,
ओजस्विनी है और अनूठी है ये हिन्दी।
पाथेय है, प्रवास में, परिचय का सूत्र है,
मैत्री को जोड़ने की सांकल है ये हिन्दी।
पढ़ने व पढ़ाने में सहज है, ये सुगम है,
साहित्य का असीम सागर है ये हिन्दी।
तुलसी,कबीर,मीरा के उदगारों की भाषा,
पद्माकर के छंदों की गागरमें सागर है हिन्दी।
वागेश्वरी का वरदहस्त रहा सूर केशव पर,
रैदास बिहारी भूषणकी काव्य भाषा है हिंदी।
उर्दू अंग्रेजीसे कभी कोई बैर नहीं रहा इसका,
अब तो देशी विदेशी सभी को लुभाती है हिन्दी!
यूं तो सैकड़ों भाषाएं हजारों बोलियां हैंयहां,
किंतु भारतीय अस्मिता की भाषा है हिन्दी।

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2018

हर हाथ को काम मिलना चाहिए!

नंगे -भूँखों को मंदिर प्रवेश नहीं ,
रोजगार राशन -पानी चाहिये!
मुर्दों को बैंकों का खाता नहीं,
बदन पर दो गज कफ़न चाहिए!!
स्वच्छता सदाचार सुशासन के,
नारों की राजनैतिक लफ्फाजी नहीं,
हरएक को शिक्षा का समान अधिकार,
और हर हाथ को काम मिलना चाहिए!
प्रजातंत्र में दलगत जुबानी जंग-
कोई अलोकतांत्रिक बात नहीं,
वशर्ते देश की अखंडता और जनता-
के हितों पर आंच नहीं आनी चाहिए!!
यह संभव नहीं कि इस सिस्टम में,
हर किसी के मनकी मुराद पूरी हो पाए ,
किन्तु न्यूनतम संसाधनों की आपूर्ती
देश के हर नागरिक तक पहुंचनी चाहिए!
इतना तो इस धरती पर मौजूद है कि-
उसके तमाम वाशिंदे जिन्दा रह सकें ,
मुनाफाखोरी,शोषण,उत्पीड़न और
बेकारी का उन्मूलन होना चाहिये!!
बार बार पूंजीवादी सत्ता परिवर्तन से-
अब तक जिन चोट्टों का हुआ विकास,
उन कालेधन वालों को संरक्षण नहीं,
बल्कि माकूल सजा होना चाहिए।।
श्रीराम तिवारी
तूँ तैरकर इंग्लिश चैनल पार कर सकती है,अंतरिक्ष में जा सकती है,एवरेस्ट पर चढ़ सकती है,ओलंपिक खेलों के ढेरों मेडल ला सकती है-किंतु शबरीमला(अयप्पा) मन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकती!क्योंकि तुझे आस्था की जंजीरों ने जकड़ रखा है!

किसी भी राजनैतिक दल के पास सर्वसमावेशी सिद्धांत,विचार और कार्यनीतिक लाइन नहीं है!

पूंजीवादी सरकार और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ जुलूस,हड़ताल और नारेबाजी करने से अव्वल तो कुछ होने वाला नही क्योंकि मीडिया पूरी तरह पूंजीपतियों के कदमों में औंधा पड़ा है!किंतु इन संघर्षों से यदि कभी कहीं कोई सत्ता परिवर्तन या कोई अस्थाई क्रांति हो भी जाये,तो भी सामाजिक आर्थिक असमानता का मिट पाना असंभव है!जब तक भारत में जाति और वर्ण है,और जातिपर आधारित आरक्षण की बैसाखी है, तब तक मेहनतकशों के बीच व्यापक एकता असंभव है!और तब तक किसी भी तरह की सर्वहारा क्रांति तथा सामाजिक समरसता भी असंभव है!इस समय इस विषयमें किसी भी राजनैतिक दल के पास सर्वसमावेशी सिद्धांत,विचार और कार्यनीतिक लाइन नहीं है!

स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व '


अठारहवी सदी के महान फ्रांसीसी चिंतक रूसो ने मानव समाज के इतिहास में पहली बार मनुष्य के जिन तीन प्राकृतिक अधिकारों की बड़े ही स्पष्ट शब्दों में चर्चा की वह हैं,,स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व के प्राकृतिक अधिकार।
1789 की महान फ्रांसीसी क्रांति को सामंतवाद पर पूंजीवाद की निर्णायक विजय के रूप में देखा जाता है।उस क्रांति के क्रांतिकारियों ने रूसो द्वारा बताए गए प्राकृतिक अधिकारों अर्थात स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को अपना नारा बना लिया था।
उस क्रांति कि विजय के बाद से फ्रांस ही नहीं दुनिया भर के अधिकांश देशों में जो संविधान बनाए गए उनमें किसी न किसी रूप में इन तीनों अधिकारों का उल्लेख होता आ रहा है।
विचारणीय बात यह है कि रूसो ने स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार क्यों स्थापित किया? रूसो ने मानव समाज के इतिहास के प्रारंभिक चरण अर्थात आदिम अवस्था ऐतिहासिक स्रोतों और अपनी कल्पना के द्वारा अपने आलेख में चित्रित किया। उसे उसने प्राकृतिक अवस्था का नाम दिया।प्राकृतिक अवस्था जंगली अवस्था थी।लोग जंगली थे,सभ्य नहीं थे।कपड़ा क्या होता है,वह नहीं जानते थे।किन्तु लोग बड़े नेक थे।भले मानुष थे।उस अवस्था में किसी व्यक्ति का नहीं ,बल्कि प्रकृति का कानून चलता था।उस अवस्था में सभी स्वतंत्र थे,सभी सामान थे और सबमें आपस में भाई चारा था अर्थात् बंधुत्व था।
इसीलिए रूसो ने स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार कहा।अर्थात ये वे अधिकार हैं जिन्हें मनुष्य से छीना नहीं जा सकता।
उन्नीसवीं सदी के सबसे बड़े चिंतकों मार्क्स और एंगेल्स ने इतिहास की भौतिक वादी व्याख्या की।इन्होंने अपनी व्याख्या में रूसो की अनेक बातों को सत्य पाया।इसके साथ ही इस बात को भी जोड़ा कि जब समाज शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित हो गया तो मनुष्य की स्वतंत्रता और समानता की दो बातों का अंत हो गया।
इसके बावजूद शोषित वर्ग दास और किसान ,दस्तकार आदि ने अपने भाई चारे अर्थात बंधुत्व को कायम रखा।इतना ही नहीं सामंत वादी युग में सामंतों का किसानों ,दस्तकारों से व्यक्तिगत संबंध था और अपनी अनेक कमियों के बावजूद सामंत भी अपनी प्रजा के सुख दुख में शरीक होता था।वह भी भाई चारा रखता था।मुद्रा आधारित संबंध की निर्णायक स्थिति न होने के कारण जो पैदा होता था वह लोगों के काम आता था।सामंती क़ाल में पूंजीवाद के आगमन के कारण वह भाई चारा नष्ट होने लगा था।इसीलिए रूसो ने स्वतंत्रता और समानता के साथ ही बंधुत्व की भी रक्षा की गुहार लगाई।
पूंजीवाद ने सामंत वाद के विरुद्ध अपने संघर्ष में इन तीनों अधिकारों की रक्षा की बड़ी बड़ी बातें की किन्तु सत्तासीन होने के बाद उसकी बातें दिखावा भर ही रह गईं।इं अधिकारो में जिसको सबसे अधिक क्षति पहुंचाई गई वह ,,भाई चारे की,बंधुत्व की क्षति ,की ही बात है।
आज सारे संबंध,यहां तक कि बाप बेटे,पति पत्नी,रिश्तेदारों,गुरु शिष्य आदि के संबंध भी मुद्रा पर आधारित हो गए हैं।गोदाम अनाज से भरा हो,वह सड़ जाए तो सड़ जाए किन्तु उस भूखे को नहीं मिल सकता जिसके पाकेट में मुद्रा नहीं है। दवा एक्स्पायर भले ही हो जाए किन्तु वह मर रहे उस मरीज को नहीं मिल सकती जिसके पास मुद्रा नहीं है।
इस तरह पूंजीवाद और उसकी रक्षा में खड़ी सरकारों का आज तक उन्नीस बीस बच कर चले आए भाई चारे ,बंधुत्व पर संकट आन खड़ा है।
भारत में बंधुत्व की जड़ें बड़ी गहरी हैं किन्तु देश की सत्ता पर बैठी पार्टी,भारतीय जनता पार्टी का मूलाधार ही बंधुत्व को छिन्न भिन्न करने का है।पहले धर्म के नाम पर यह काम कर रही थी और अब जाति को भी उसमे जोड़ रही है।
देश की जनता की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह आपसी बंधुत्व को बचाने के काम में जुट जाए।