सोमवार, 27 नवंबर 2017

मज़हबी  अंधश्रद्धा अथवा धार्मिक आस्था मूल रूप से एक अवधारणा ही है। आपके लिए कोई धर्म या मजहब इसलिए दुनिया में सबसे अच्छा है,क्योंकि आप उस धर्म /मजहब के मानने वाले कुटुंब /खानदान में पैदा हुए हैं ! इसी तरह देशभक्ति भी मूलरूप से एक अवधारणा ही है कि आपको कोई देश इसलिए दुनिया में सबसे अच्छा लगता है क्योंकि आप उस देश में पैदा हुए हैं !इसके बरक्स मार्क्सवादी दर्शन और प्राचीन भारत का 'वसुधैव कुटुंबकम' का सिद्धांत उच्चतर अंतर्राष्टीयतावाद की पैरवी करते हैं !
                           एक खाते पीते सम्पन्न राष्ट्रवादी और बुर्जुवा व्यक्ति का यह कहना उचित है कि ,"चूँकि मैं भारतीय हूँ इसलिए भारत मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है और यदि मैं यदि चीन ,पाकिस्तान या कहीं किसी अन्य देश में जन्मता तो वह राष्ट्र मेरे लिए श्रेष्ठ होता''! इसी तरह कोई भी सनातनी हिन्दू,बौद्ध,जैन,ब्राह्मण,ठाकुर,बनिया या कोई भी जाति, गोत्र ,खाप का व्यक्ति यह कह सकता है कि 'मैं अमुक कुल में जन्म हूँ इसलिए वह धर्म और जाति मुझे गर्व करने का आधार प्रदान करते हैं।'इसी तरह मुस्लिम, सिख, ईसाई,यहूदी और पारसी इत्यादि भी इस धर्म जाति गोत्र की मानसिक संकीर्णता के मारे हैं ! इस मानवकृत व्याधि याने अंध-धार्मिकता और अंध -राष्ट्रवाद से सिर्फ सच्चे योगी अथवा सच्चे कम्युनिस्ट ही मुक्त हुआ करते हैं। खेद की बात है कि समकालीन दौर में वर्तमान नकली योगी जहाँ धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता में आकंठ डूबे हैं ,वहीं चीनी कम्युनिस्ट नेता अंतर्राष्टीयतावाद  को लतियाकर साम्राज्य्वाद और नस्लवाद को तरजीह दे रहे हैं ! 

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

  1. बुरा बक्त किसी को बतलाकर नहीं आता।
  2. किया गया कुछ भी अपना बेकार नहीं जाता।।
  3. दूध के फट जाने पर दुखी होते हैं कुछ नादान,
  4. शायद  बापरों को रसगुल्ला बनाना नहीं आता।
  5. खुदा क्यों देता रहता खुदाई उनको इतनी सारी ,
  6. जिनको अपने सिवा कुछ और नजर नहीं आता।
  7. माना कि अभी बहारों का असर है फिजाओं में,
  8. फिर भी उन्हें गुलों से यारी निभाना नहीं आता।
  9. वेशक किसी से कोई गिला शिकवा न हो बंधूवर,
  10. लेकिन रूठों को मनाना तुम्हें बिल्कुल नहीं आता ।।
  11. खुदा की रहमत से बुलंदियों पर मुकाम है तुम्हारा ,
  12. लेकिन धरती पर पाँव ज़माना तुम्हें नहीं आता।
  13. क्या खाक करोगे उत्थान सृजन विकास मान्यवर,
  14. तुम्हें तो खेतों की सोंधी सुगंध में मजा नहीं आता।

  15. श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

बहिन जी की धर्म परिवर्तन की धमकी के निहितार्थ !

बहिन मायावती जी जबसे चुनावों में बुरी तरह हारी हैं तबसे न केवल वे ,न केवल उनकी पार्टी वसपा, अपितु मनुवाद ,ब्राह्मणवाद के उनके जुमले और तिलक तराजू ,तलवार वाले उनके घिसे पिटे नारे भी नीरस हो चले हैं। कुल मिलाकर इन दिनों उनकी पार्टी का अश्व राजनीतिक के बियाबान में भटक रहा है। वे अभी मानसिक रूप से बिलकुल खाली हैं।उनमें इतना भी साहस नहीं बचा कि मजूरों,किसानों की राष्ट्रव्यापी उद्घोष से अपनी संगति बिठा सकें। श्री शरद यादव ,देवेंद्र यादव और वामपंथी जनवादी कतारों के एकता अभियान उर्फ़ 'सांझी विरासत' का हिस्सा बन सकें ! वे केवल गाहे बगाहे एक जुमला उछाल देतीं हैं 'भाजपा सुधर जाए वरना मैं बौद्ध हो जाऊँगी !'
बहिन जी की इस धमकी के निहतार्थ क्या हैं ?क्या उन्होंने माल लिया कि एकमात्र भाजपा और संघ परिवार ही सारे हिंन्दू समाज की ठेकेदार है ? क्या वे मानती हैं कि भाजपा या संघ परिवार को हिन्दू धर्म की बाकई कोई फ़िक्र है ? और भाजपा के सुधर जाने से बहिनजी का क्या अभिप्राय है ? क्या गंगा में डुबकी लगा लेने से गधा घोडा हो सकता है ?क्या पीपल पर हग देने से कौआ हंस हो जाता है ? यदि नहीं तो बहिन जी ने कैसे मान लिया कि उनकी धमकी से भाजपा और संघ परिवार फासीवाद छोड़कर,धर्मोन्माद छोड़कर ,शांति की राह चल देंगे ?
वैसे भी मायावती की धमकी के निहतार्थ  कुछ इस तरह हैं कि जैसे कोई अपने शत्रु से युद्ध भूमि में कहे कि 'मुझ पर हथियार चलाना रोको वरना मैं घर जाकर पॉवभर रबड़ी खा लूँगी !'
क्या बहिन जी के बौद्ध धर्म अपनाने से भाजपा को कोई खतरा है ? क्या बहिन जी के बौद्ध हो जाने से हिन्दू समाज को या धर्म मजह्ब की राजनीति करने वालों को कोई खतरा है ? यदि नहीं तो फिर बहिन जी की धमकी के मायने क्या ?बौद्ध हो जाना न तो कोई निंदनीय कार्य है और न ही बौद्ध होना इतना आसान है !बौद्ध  होना याने बुद्ध की शरण में जाना ! 'बुद्धं शरणम गच्छामि '!अर्थात संसार के मायामोह से मुक्त होकर ,राजनीति से मुक्त होकर शुध्द प्रेमानंद परम कारुणिक महात्मा बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग पर चल देना ! क्या बहिन जी बौद्ध भिक्षुणी बनने को तैयार हैं ? यदि हाँ तो वे जगत पूज्य हो सकती हैं ,किन्तु यदि वे केवल कुछ दलितों के साथ धर्म परिवर्तन का नाटक कर अपनी मरणासन्न राजनीती को पुनर्जीवित करना चाहती हैं तो यह महात्मा बुद्ध का और बाबा साहिब अम्बेडकर का अपमान है ! मायावती  को यदि बुद्ध और अम्बेडकर में जरा भी श्रद्धा है तो संसार से विरक्त होकर ,राजनीति को लात मारकर धम्म पद पर प्रतिष्ठित होकर दिखाएं !  बहिन जी की धर्म परिवर्तन की धमकी के निहितार्थ शुध्द सात्विक नहीं हैं !

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

मानस के हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।

  1. यद्द्पि साहित्यिक विरादरी पूरी की पूरी विप्लवी या शहीद भगतसिंह और कार्ल मार्क्स जैसी सोच वाली नहीं है! हर जनवादी कवि लेखक साहित्यकार, माओ -लेनिन के उसूलों वाला ही हो यह भी जरूरी नहीं है। इस दौर में जो गौतम बुद्ध, बाबा सा. अमबेडकर और कार्ल मार्क्स की जुडवा वैचारिक छाँव में सृजन शील है वही असल वामपंथी साहित्यकार है! वेशक विशुधद जातीय विमर्श वादी हैं ,कुछ पूँजीवाद के आलोचक हैं ,कुछ केवल स्त्री विमर्शवादी हैं। बचे खुचे बाकी सब पूरे सौ फीसदी दक्षिणपंथी प्रतिक्रयावादी हैं...। यदि दस- बीस फीसदी साहित्यकार अपनी सही भूमिका अदा कर रहे हैं ,जो कि उनका सहज सैद्धांतिक स्वभाव और दायित्व भी है तो उन्हें गौरी लंकेश, कलिबुरगी, पानसरे या दाभोलकर की तरह नेस्तनाबूद किया जाना, केवल प्रतिक्रियावादी हिंसा नहीं है !बल्कि यह वर्ग युद्ध में शहादत भी है! वैसे भी हर मुश्किल दौर में जो कुछ बलिदान करने की क्षमता रखते हैं , हीरो भी वही हुआ करते हैं। इस विषम दौर में भारत के असली हीरो वही हैं जो सत्ता को आइना दिखा रहे हैं।और बलिदान दे रहे हैं!

रविवार, 23 जुलाई 2017

हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े

अधिकांश धर्मप्राण हिन्दू जन अपने हिन्दू संगठन या हिन्दूवादी नेताओं में अगाध अंध श्रद्धा रखते हैं। ऐंसे अंधश्रद्धालु हिन्दू जन अपने हिंसक और बैर बढ़ाऊ धार्मिक नेताओं को चुनावों के माध्यम से राजनैतिक सत्ता सौंप देते हैं। इस प्रवृत्ति को असंवैधानिक तो नहीं कहा जा सकता ,क्योंकि अरब राष्ट्रों की कटटर मजहबी सरकारें तो इनसे कई गुना साम्प्रदायिक और अलोकतांत्रिक हैं। फिर भी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान में निहित लोकतंत्र की अवधारणा अनुसार, भारत की राजनीती में यह जातीय मजहबी आचरण नितांत निंदनीय है।  हिंदूवादी नेता यथार्थवाद ,प्रगतिवाद और  साइंस के जन्मजात विरोधी होने से देश और समाज को प्रतिगामी राह पर धकेलते जाते हैं। यही वजह है कि चीन और पाकिस्तान से सीमाओं पर चल रही तकरार को सैन्यबल अथवा कूटनीति से निपटाने के बजाय,ये हिंदूवादी साम्प्रदायिक नेता आवाम को सलाह दे रहे हैं कि आध्यत्मिक मन्त्र शक्ति से चीन और पाकिस्तान को भस्म करने का आयोजन करें ! भारत की दिगभ्रमित आवाम को और अल्पसंख्यक समुदाय को समझना होगा कि संघ परिवार से सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को खतरा है।

अधिकाँस अल्पसंख्यक जन समुदाय और धर्मनिपेक्षतावादी लोग हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की एकजुटता ,उनके संगठनों और उनकी प्रतिगामी बातों का तो विरोध करते हैं ,किन्तु वे अल्पसंख्यक संगठनों और उनके मजहबी नेताओं का रंचमात्र प्रतिवाद नहीं करते। वे हिन्दू धर्म को तो आरएसएस की जागीर समझकर उनपर संदेह करते हैं,किन्तु अपने कटटरपंथी मुल्ला मौलवियों से विज्ञान आधारित बहस मुसाहिबा नहीं करते। अधिकांश हिन्दू संत ,महात्मा,महामंडलेश्वर और शंकराचार्य लोग हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई,बौद्ध ,जैन पारसी- सभी धर्मों का आदर करना सिखाते हैं। जबकि देवबंदी अथवा अन्य अल्पसंख्यक उलेमा और उनके अनुयायी केवल इस्लाम का ही अनुशीलन और आदर सिखाते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की नजरमें खुदके याने अल्पसंख्यकों के जुझारू संगठन तो ठीक हैं,और सिमी जैसे संगठनों की अवैध गतिविधियों भी ठीक हैं,लेकिन मोहन भागवत या नरेंद्र मोदी ठीक नहीं। अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ कटटरपंथी ही नहीं बल्कि अमनपसंद आमजन भी अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर तो खूब हल्ला करते हैं ,लेकिन गोधरा काण्ड,सिम्मी,अलकायदा और आईएसआईएस की हरकतों पर चुप्पी साध लेते हैं। अधिकांश अल्पसंख्यक नरनारी मजहबी तौर पर शोर शराबा और राजनीतिक आक्रामकता का भौंडा प्रदर्शन करते रहते हैं। इस तरह की मानसिकता से हिन्दू कौम भी 'हर हर मोदी' चिल्लाने लगती है। हिन्दू -मुस्लिम कौम के तत्ववादी धड़े यदि आपस में इसी तरह अड़े रहे, तो देश का जो होगा सो होगा किन्तु दोनों कौम की भावी पीढ़ियों का भविष्य भी अच्छा नहीं होगा।
जो लोग वर्तमान मोदी सरकार को चरम हिंदूवादी मान रहे हैं वे जरूरत से ज्यादा  वितंडा खड़ा कर रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की चालों से मौजूदा सरकार खुद बेहद आक्रान्त है। जो लोग इस सरकार या उसके समर्थकों की डींगों से आहत हैं वे यह ख़याल में लाएं कि जिनके नेतत्व का आलम यह है कि सीमा पर हर रोज आधा दर्जन जवान शहीद हो रहे हों और नेता यज्ञ,अनुष्ठान ,मन्त्र जाप से शत्रु देश को पराजित करने के लिए ज्योतिष विभाग और  को स्तर क्या है ?चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !

भारत में सत्तारूढ़ नेताओं द्वारा तथा अफसरों द्वारा धनाड्य वर्ग के रिश्तेदारों एवं उनकी ओलादों को उपकृत किये जाने की परम्परा कोई नयी या आकस्मिक घटना नहीं है।सिर्फ लालू यादव का परिवार ही भ्रस्ट नही है! हर्षद मेहता,बंगारू,जुदेव, एदुरप्पा , रेड्डी बंधु ,विजय माल्या,सुब्रतो सहारा,ललित मोदी,करूँणाकरन, डीएम् के परिवार, जय ललिता इत्यादी भी हांडी के दोचार चावल मात्र हैं !असल भ्रष्ट तो अभी भी परदे के पीछे हैं !
मानव सभ्यता के इतिहास में सबल मनुष्य द्वारा निर्बल मनुष्य का शोषण ,सबल समाज द्वारा निर्बल समाज का शोषण और सबल राष्ट्र द्वारा निर्वल राष्ट्र के शोषण का सिलसिला जितना पुराना है। भाई-भतीजावाद और भृष्ट तत्वों के अनेतिक संरक्षण का इतिहास भी उतना ही पुराना है। भ्रस्टाचार का यह दस्तूर आजादी और लोकतंत्र से भी पहले से इस भूभाग पर चला आ रहा है। इसका सिलसिला तो तुगलकों, खिुलजियों और सल्तनतकाल जमाने से ही चला आ रहा है ।
जब सात समंदर पार से योरोपियन व अंग्रेज पधारे तो उन्होंने भी २०० साल तक भारतीय जनता को 'क्लर्क' के लायक ही समझा। वह भी तब ,जब १८५७ की क्रांति या विद्रोह असफल हुआ और महारानी विक्टोरिया हिन्दुस्तान की मलिका बनी ! क्वीन् ने देशी हिन्दुस्तानियों को और कुछ देशी राजाओं को अपनी नौकरशाही में छोटे पदों पर 'सेवाओं' की इजाजत दी।बाद में उन्हीं में से कुछ वकीलों और बॅरिस्टरों ने देश को आजाद कराने का सपना देखा!
आजादी के बाद कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने तथा देश के चालाक सभ्रांत वर्ग ने इसी परम्परा को परवान चढ़ाया।
आज विपक्ष में आकर कांग्रेस हरिश्चंद्र बन रही है। लेकिन उसका अतीत बेदाग नही है !एमपी में व्याप्त व्यापम के खिलाफ कांग्रेस ने कोई खास आंदोलन नही किया !विगत भारत बंद में भी उसने केवल 'वाम मोर्चे' की नकल की है।
इसी कांग्रेस के ६० सालाना दौर में आजादी के बाद वर्षों तक देशी पूंजीपतियों -भूस्वामियों और कांग्रेस के नेताओं के खानदानों को ही शिद्द्त से उपकृत किया जाता रहा है। एमपी और छग में द्वारिकाप्रसाद मिश्रा से लेकर शुक्ल बंधूओं तक ,अर्जुनसिंह से लेकर ,प्रकाश चंद सेठी तक , शिव भानु सोलंकी , सुभाष यादव और जोगी से लेकर दिग्विजयसिंह तक कोई भी उस 'अग्निपरीक्षा' में सफल होने का दावा नहीं कर सकता। जिसके लिए उन्होंने बार-बार संविधान की कसमें खाईं होंगी कि -''बिना राग द्वेष,भय, पक्षपात के अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा ......." !
अब यदि मोदी युग में 'संघ परिवार' वाले और उसके अनुषंगी भाजपाई भी उसी 'भृष्टाचारी परम्परा' का शिद्द्त से निर्वाह किये जा रहे हैं ,जो परम्परा और 'कुलरीति' कांग्रेस ने बनाई है तो किसी को आश्चर्य क्यों ? सवाल किया जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है ? जो लोग कभी कांग्रेस को 'चोर' कहा करते थे वही लोग इन दिनों भाजपा को 'डाकू' कहने में जरा भी नहीं हिचकते। चोर और डाकु में जो भी फर्क है वही कांग्रेस और भाजपा का चारित्रिक अंतर है।
कुछ लोगों को इन दोनों में एक फर्क 'संघ' की हिंदुत्व वादी खंडित मानसिकता का ही दीखता है। वैसे तो कांग्रेस ने पचास साल तक पैसे वालों व जमीन्दारों को ही तवज्जो दी है। किन्तु यूपीए के दौर में वाम के प्रभाव में कुछ गरीब परस्त काम भी किये गए। यदि आज आरटीआई ,मनरेगा और मिड डे मील दुनिया में प्रशंसा पा रहे हैं तो उसका कुछ श्रेय तो अवश्य ही वामपंथ को जाता है । लेकिंन जनता को और मीडीया को कांग्रेस और भाजपा से आगे कुछ भी नजर नही आता !

रविवार, 16 जुलाई 2017

नौरत्नों की हत्या का राष्ट्रघाती संकल्प !

कुछ सत्ता शुभचिंतकों और दकियानूसी अंधभक्तों को हमेशा शिकायत रहती है कि कुछ लेखक,कवि,और पत्रकार सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिकूल अप्रिय सवाल क्यों उठाते हैं ? ये पढ़े लिखे विवेकशील लोग भी अंधभक्तों की तरह 'भेड़िया धसान' होकर सत्ता समर्थक जयकारे में शामिल क्यों नहीं हो जाते ? एतद द्व्रारा उन अभागों को सूचित किया जाता है कि मौजूदा शासकों से उनकी कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है। मोदीजी जब पहली बार संसद पहुंचे और सीढ़ियों को मत्था टेका,तब वे सभी को अच्छे लगे!जब कभी उन्होंने राष्ट्रीय विकास की बात की ,युवाओं के भविष्य की बात की ,विदेश में जाकर हिंदी का मान बढ़ाया ,और जब वे नामवरसिंह जैसे वरिष्ठ साहित्यकार को प्रणाम करते दिखे तब भी मोदीजी सभी को प्रिय लगे !लेकिन सवाल किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि या विमर्श का नहीं है। सवाल समग्र राष्ट्र के, समग्र समाज के हित का है !और इस कसौटी पर मोदी सरकार नितांत असफल होती जा रही है। इन हालात में भारत के प्रबुद्ध जन यदि मौजूदा शासन प्रशासन के कामकाज पर पैनी नजर रखते हैं,उसकी तथ्यपरक शल्य क्रिया करते हैं और वैकल्पिक राह सुझाते हैं तो उनको गंभीरता से लिया जाना चाहिए ! उनका सम्मान किया जाना चाहिए। बजाय इसके कि अंधभक्त लोग विपक्ष एवं आलोचकों से गाली गलौज करें !

देश के राजनैतिक विपक्ष को कमजोर बनाने वाले आमजन मूर्ख हैं। वैसे भी भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति किसी आपातकाल से बेहतर नहीं है। यदि राष्ट्रपति 'यस सर'की प्रवृत्ति वाला होगा तो कहीं भी कभी भी साइन कर देगा। देश में फिलवक्त शिकायत सिर्फ साम्प्रदायिक हिंसा की,अल्पसंख्यक असुरक्षा की और प्रतिगामी कुचाल की ही नहीं है। बल्कि मोदी सरकार ने नीति आयोग की अनुशंसा के तहत भारत के प्रमुख नौरत्नों की हत्या का संकल्प भी ले रखा है। जिन नवरत्नों ने अतीत में भारत को कभी भी आर्थिक मंदी में फिसलने नहीं दिया,जिन नौरत्नों की बदौलत हमारे नेता  इतराते फिरते हैं उन सार्वजनिक उपक्रमों को अब मौजूदा मोदी सरकार ठिकाने लगाने जाए रही है। मोदी सरकार खुद की कंपनियों को चूना लगा रही है और उसने रिलायंस के मैनेजरों को ठेका दिया है कि वे  देश के नौरत्नों को शीघ्र ठिकाने लगाएं ! देश के वर्तमान शासकों ने अपने ही वतन के आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की सुपारी देशी विदेशी बदमाश पूँजीपतियों को दे रखी है. इससे न केवल लाखों मजदूरों का अहित होगा,न केवल वेरोजगारी बढ़ेगी, बल्कि राष्ट्र की वित्तीय स्थति की अनिश्चितता भी बढ़ेगी और स्थिति भंवर में होगी। नवरत्न रुपी राष्ट्रीय धरोहर की स्वायत्तता खत्म होते ही वे खुद ख़त्म हो जायेंगे।

राजनीती के एरिना में जो लोग बात बात पर 'हर हर मोदी' करते रहते हैं और जो लोग बात बात में 'अल्लाहो अकबर' घुसेड़ते रहते हैं, ये निम्न कोटि के उजबक कलंकी इतिहास के खंडहरों की भटकती दुरात्माएं हैं।  मेहनतकश आवाम को 'हंस' की मानिंद खुद ही नीर क्षीर करना आना चाहिए ,कि क्रांति की लौ बुझने न पाए। इस बाबत युवा सुशिक्षित पीढ़ी को क्रांतिकारी विचारों  की थाती संभालना चाहिये और अन्याय शोषण के खिलाफ संघर्ष की गगनभेदी आवाज बुलंद करनी चाहिए। वर्तमान युवा पीढ़ी को इस बाबत  देश और दुनिया का आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक और क्रांति संबंधी  अध्यन अवश्य चाहिए।     

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

यदि मैं एमपी का सीएम होता तो ८०० करोड़ का हेलीकाप्टर खरीदने बजाय, बाइक से गाँव गाँव फेरी लगाता !मानसून बिचलन से जिन किसानों की फसल सूख गई या दुबारा - तिबारा खरीफ की बोनी में अड़चन आई है ,मैं उनकी मौके पर ही पैसे से, बीज से, खाद से, मदद करता !श्रीराम तिवारी !

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...

इंकलाब ज़िंदाबाद !: चीन और पाकिस्तान से निपटना है तो 'इतिहास' से सीखो ...: मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी और ट्रेड यूनियन के साथी अक्सर कहा करते थे कि ''जिस तरह प्राकृतिक रूप से गंगा मैली नहीं है बल्कि उसे कुछ...