मंगलवार, 29 जून 2021

*पाँच तत्व प्रकृति पच्चीसा

 _विचारणीय_*

मन में एक प्रश्न आया कि 1 मन = 40 सेर (किलो)ही क्यों माना गया ? बाद में इसका उत्तर मिला । दरअसल भारतीयों ने सभी जीवन के व्यवहारिक शब्द, वास्तु, श्रृंगार, मानक आदि इस आधार पर रखे हैं कि उनसे हमें आत्मा, प्रकृति, सृष्टि, जीव और जीवन के 4 पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के बारे में बारबार स्मृति होती रहे ।
अतः उत्तर मिला -
*पाँच तत्व प्रकृति पच्चीसा । दस इन्द्री मन भौ चालीसा*
*5 महाभूत* - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश
इन 5 महाभूतों की 5-5 = *25 प्रकृतियां* भी इनके साथ ही उत्पन्न हो गयीं :
*आकाश की* - काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय
*वायु की* - चलन, बलन, धावन, प्रसारण, संकुचन
*अग्नि की* - क्षुधा, तृषा, आलस्य, निद्रा, मैथुन
*जल की* - लार, रक्त, पसीना, मूत्र, वीर्य
*पृथ्वी* - अस्थि, चर्म, मांस, नाङी, रोम
*5 ज्ञानेन्द्रियाँ* - नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण ।
*5 कर्मेन्द्रियाँ"* - पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक ।
( पाद - *पैर* , हस्त - *हाथ* , उपस्थ - *शिश्न* , पायु - *गुदा* , वाक - *मुख* )
इस तरह
*पाँच तत्व + पच्चीस प्रकृति + 5 ज्ञानेन्द्रियाँ+5 कर्मेन्द्रियाँ* = *मन

सोमवार, 28 जून 2021

कबीर पर सात दोहे

 कबीर पर सात दोहे

💐💐💐*
मन तरकश,अनुभव धनुष,कथनों के कटु तीर!
कबिरा के परिहास में, चर्चा है गंभीर!!
सपने में कबिरा कहे,"खींचो नहीं लकीर"!
बंधन में रहते नहीं, सूफ़ी, संत, फ़क़ीर!!
जग में रहकर भी कभी,किया न जग से प्यार!
कबिरा को भाया नहीं, यह नश्वर संसार!!
कबिरा आकर चल दिए, सागर के उस पार!
युगों-युगों से आजतक, राह तके संसार!!
अखिल जगत में एकमत, हैं सारे कविराज!
कविता संत कबीर की, प्रासंगिक है आज !!
लगते थे सबको सदा, निर्धन और फ़क़ीर।
मिलते हैं जग में कहाँ, कबिरा तुल्य अमीर।
कबिरा केवल रूह है, कबिरा नहीं शरीर।
कहता है हर आदमी, मेरे संत कबीर।

आप क्या वरदान मांगेंगे ?

 यदि अचानक किसी सर्वशक्तिमान दैवी शक्ति से आपका साक्षात्कार हो जाए,और वह शक्ति आपसे मन वांछित वरदान मॉंगने को कहे,तो आप क्या वरदान मांगेंगे ?

आपकी सुविधा के लिए मैं यहाँ कुछ अपनी च्वाइस बता देता हूँ !
पहला वर :-हे प्रभु ! यदि बाकई पुनर्जन्म होता है,तो मेरा हर जन्म भारत भूमिपर ही हो और जिस घर में सभी धर्मों के श्रेष्ठ मूल्यों और मानवीय आदर्शों का सम्मान हो ! वहीं मेरा जन्म हो!
दूसरा वर :-जो लोग भारत में पैदा हुए ,यहाँ की खाते हैं ,यही जिनकी मातृभूमि है ,वे सभी अपने धर्म मजहब से ऊपर भारत देश को ही अव्वल माने ! हे प्रभो!
तीसरा वर :-जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी तत्व पूँजीपतियों की चरण वंदना करते हैं,जो लोग मजदूरों,किसानों,अल्पसंख्यकों,वामपंथियों को गाली देते हैं,उन्हें सद्बुद्धि देना प्रभु !
चौथा वर :-जो लोग भारत के मुसलमानों को कट्टर बनाते हैं और धर्मनिर्पेक्ष भारत राष्ट्र के खिलाफ भड़काते हैं,इसकी बर्बादी के सपने देखते हैं ,उन दुष्टों का सत्यानाश हो प्रभु !
पाँचवाँ वर :-जो लोग स्वयंभू देशभक्त हैं,और जो किसानों,मजदूरों और आदिवासियों को देशद्रोही बताते हैं,हे प्रभु उन्हें सदबुद्धि प्रदान करो !
6ठा वर:- हे परमेश्वर हर हाथ को काम दो और हर एक को उसकी आवश्यकतानुसार, याने गुजारे लायक संसाधन दो,दीन हीन गरीबों,शरीफों और धरती के जल जंगल जमीन को लूटने वालों का एवं कमजोरों के हक मारने वालों का संहार करो प्रभू!

आपात्काल की सालगिरह पर घड़ियाली आँसू .

 विगत 25 जून को कुछ कपटी और बेईमान लोगों ने *आपात्काल की सालगिरह पर खूब घड़ियाली आँसू बहाये! इनमें 99% वे थे जो आपात्काल में एक दिन के लिये भी जेल नही गये!और जिनको आपात्काल की वजह से ही प्रसिद्धि मिली,सत्ता मिली और राज मिला!

नई पीढ़ी के युवाओं को मालूम हो कि पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाया था!वेशक यह एक तानाशाही पूर्ण और संविधान विरोधी हरकत थी! किंतु इससे भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता का बाल भी बांका नही हुआ! बल्कि जिनकी औकात चपरासी बनने की नही थी,वे इस मनहूस आपात्काल की वजह सेसत्ता का स्वाद चखने में सफल रहे!
इतना ही नहीं आज जो सत्ता सुख भोग रहे हैं,वे न भूलें कि इसमें भी आपात्काल की ही असीम अनुकम्पा छिपी हुई है!कुछ खामियों और ज्यादतियों के बावजूद आपात्काल तो वरदान ही साबित हुआ है !मेरा खुदका निजी अनुभव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है!
आपात्काल घोषणा के एक माह पहले ही मैं सीधी से ट्रांसफर होकर गाडरवारा आया था! गाडरवारा आने के तीन महीने बाद ही मुझे चार्जसीट दी गई कि 'आप ड्युटी पर नही पाये गये,अत: 24 घंटे में चार्जसीट का लिखित जबाब दें!अन्यथा क्यों न आपको पी & टी विभाग की सेवाओं से बर्खास्त कर दिया जाये?'आरोप था कि आप नाइट ड्युटी के दौरान टेलीफोन एक्सचेंज में ताला डालकर घर चले गए! चूँकि उस दिन तत्कालीन संचारमंत्री स्व.शंकरदयाल शर्मा किसी काम से,दिल्ली से जबलपुर जा रहे थे और गाडरवारा रास्ते में ही पड़ता है!उनसे सौजन्य भेंट के लिये इंतजार कर रहे रामेश्वर नीखरा और नीतिराजसिंह चौधरी,कलेक्टर पटवर्धन इत्यादि नेताओं/अफसरों को पता चला कि मंत्रीजी की गाड़ी गाडरवारा नही रुकी! तब उन्होंने तुरंत एक्सचेंज से संपर्क किया, किंतु वहां से कोई जबाब नहीं मिला!क्योंकि मैं नया नया था,विभागीय नियमों से पूर्णत: अवगत नही था एवं मेरे पास तत्काल रहने का कोई ठिकानाभी नहीथा,अत: ड्युटी खत्म होने के बाद रात्रि वहीं एक्सचेंज के विश्राम गृह में सो गया! अल सुबह नगर में हड़कम मच गया,कि मुझे चार्जसीट मिल गई है!यह आपात्काल का ही प्रतिफल था कि लोग कुछ डरे हुए से थे और सभी विभागों में कसावट आ गई थी!
आपातकाल की उस छोटी सी गफलत की वजह से मुझे कोई सजा नही दी गई ! सिर्फ एक लाइन की चेतावनी दी गई!कि 'आइंदा सावधान रहें' और तत्काल मेरा ट्रांसफर भी इंदौर कर दिया गया!उस घटना से सबक सीखकर मैने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से 40 साल ड्युटी की! फिर किसी नेता मंत्री-अफसर से कभी नही डरा,बल्कि भ्रस्ट और बदमास अधिकारी मुझसे डरते थे!इस घटना से सबक सीखकर न केवल ड्यूटी सावधानी से की अपितु पढ़ना लिखना भी जारी रखा!
चूंकि इंदौर में तब मजबूत ट्रेड यूनियनें हुआ करतीं थीं,अत: सामूहिक हितों के लिये वर्ग चेतना से लैस कामरेडों का अनुशीलन करने का अवसर भी खूब मिला!इसकी बदौलत अपनी शानदार क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन में लोकल से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संघर्षों में नेतत्वकारी भूमिका अदा की! और उसी की बदौलत आत्म विश्वास बढ़ता चला गया! हर किस्म का भय काफूर हो गया! मेरे कानौं की पुरानी बीमारी का इलाज भी इंदौर में हो गया!आपात्काल लगना और इंदौर ट्रांसफर होना,मेरे लिये वरदान बन गया! मेरे अनुज डॉ. Parshuram Tiwari के लिये भी इंदौर में ही सीखने और आगे बढ़ने के लिये बहुत कुछ मिला!हम यदि सीधी,गाडरवारा या सागर में होते तो शायद वह संभव नही हो पाता,जो इंदौर में बेहतर संभव हुआ! मेरे लिये तो आपात्काल का भोगा हुआ यथार्थ यही है!
हो सकता है कि किसी को आपातकाल में कुछ नुकसान हुआ हो! किंतु मेरी नजर में तो आपातकाल कुछ मामूली खामियों,त्रुर्टियों के बावजूद वास्तव में मक्कारों,रिस्वतखोरोंऔर जमाखोरों को ठीक करने का अनुशासन पर्व ही था!

मोदीजी ने 15 लाख देने का वादा किया था..

 मरणासन्न पिता के पास दो भाई और एक बहन बैठी थी!

पिता ने कहा- "मैंने जिनसे उधार लिया था, सबको चुका दिया है। जिनसे पैसे वापस लेने थे, उनसे ले भी चुका हूँ। सिर्फ एक जगह बड़ी रकम फंसी है। तुमलोग वसूल सको, तो आपस में बांट लेना।"
तीनों संतान एक साथ बोली- "जी बाबूजी, जैसी आपकी आज्ञा। किससे कितने पैसे लेने हैं?"
पिताजी बोले- "पता नहीं कब मेरे प्राण निकल जाएं, इसलिए मैंने घर के नीचे वाले कमरे की अलमारी में एक खत लिख कर रखा है। मेरी मृत्यु के बाद देख लेना।"
थोड़ी देर बाद पिताजी ने अंतिम सांस ली। सब काम निपटाने के बाद बच्चों ने घर के कमरे में रखा खत निकाला। लिखा था-
"2014 में मोदीजी ने 15 लाख देने का वादा किया था। मेरे हिस्से के रुपये मिल जाऐं तो तुम तीनों पांच-पांच लाख बांट लेना!"
# हरि ओम् #नमो नमो #ओम् शांति:

शुक्रवार, 25 जून 2021

मानव इतिहास उत्थान का ही इतिहास नहीं है.

 1. आंगिक एकता – विश्व का चरित्र भौतिक है तथा उसकी वस्तुएं और घटनाएं एक दूसरे से पूर्णतः संबद्ध है। अतः उसके महत्व को निरपेक्षता के आधार पर नहीं सापेक्षता के आधार पर ही समझा जा सकता है अर्थात् प्रकृति के सभी पदार्थों में आंगिक एकता पाई जाती है।

2. गतिशीलता – प्रकृति में पाया जाने वाला प्रत्येक पदार्थ जड़ या स्थिर न होकर गतिशील होता है।

3. परिवर्तनशीलता – पदार्थिक शक्तियां सामाजिक विकास की प्रेरक शक्तियां हैं। वे गतिशील ही नहीं, परिवर्तनशील भी हैं। अतः सामाजिक विकास भी उन्हीं के अनुरूप परिवर्तनशील है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया द्वंदवाद के माध्यम से चलती है।

4. परिमाणात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तन के कारक होते हैं निरंतर होने वाले परिवर्तन प्रारंभ में परिमाणात्मक (quantitative) चरित्र के होते हैं तथा धीरे-धीरे घटित होते हैं तथा जब उनकी मात्रा बढ़ जाती है तो एकाएक वह गुणात्मक (qualitative) परिवर्तन में बदल जाते हैं। गेहूं का बीज इसका अच्छा उदाहरण है। गेहूं के बीज को बोया जाना वाद है, उसका अंकुरण प्रतिवाद है, और धीरे-धीरे गेहूं के पौधे का बड़ा होना और उसकी बाली का पकना संवाद है। गेहूं के एक दाने का बाली के माध्यम से बहुत से दाने में परिवर्तन उसके मात्रात्मक परिवर्तन से गुणात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। बीज के रूप में गेहूं का बोया जाना, उसका अंकुरण होना उसका पौधा बनना तथा बाली पकना और एक से अनेक दाने हो जाना यह द्वंद्वात्मक प्रक्रिया का ही अच्छा उदाहरण नहीं है, वरन् मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तन का भी एक अच्छा उदाहरण है।

5. क्रांतिकारी प्रक्रिया – परिमाणात्मक परिवर्तन के गुणात्मक परिवर्तन में अभिव्यक्त होने की प्रक्रिया को एक क्रांतिकारी प्रक्रिया माना जाता है, जो एक छलांग के रूप में होती है अर्थात् वह एक मौलिक परिवर्तन की निशानी होती है।

6. सकारात्मक नकारात्मक संघर्ष – हर वस्तु में उसके विरोधी तत्व विद्यमान होते हैं जो समय पाकर अभिव्यक्त होते हैं। उनमें होने वाले संघर्ष से वह वस्तु नष्ट हो जाती है और नई वस्तु उसका स्थान ले लेती है, जो पहले वाली वस्तु से अधिक विकसित होती है तथा जो विकास के क्रम की निरंतरता को बनाए रखती है।

मार्क्स के अनुसार इस प्रकार कार्य करते हुए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पद्धति विश्व तथा मानव सभ्यता के विकास को समझने में हमारे लिए एक पथ प्रदर्शक सूत्र या यंत्र का कार्य करती है।

आलोचना –

1. भौतिक तत्व निर्णायक तत्व नहीं – विश्व सभ्यता के विकास में मार्क्स भौतिकवादी तत्व अर्थात् पदार्थ को निर्णायक तत्व मानता है तथा यह प्रतिपादित करता है कि मानवीय चेतना उसी का परिणाम है। मानवीय चेतना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है , यह मानना उचित नहीं है। मनुष्य सिर्फ एक भौतिक प्राणी ही नहीं एक अतिरिक्त चेतनाशील प्राणी है।

मनुष्य पशु की तरह नहीं बल्कि मनुष्य की तरह जीना चाहता है और यह तभी संभव है जबकि वह भौतिकवाद को एक साधन और आत्मिक उत्थान को अपने जीवन का एक लक्ष्य मानकर उसकी उपलब्धि हेतु प्रयत्नशील हो। भौतिकवाद मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं करता है जो कि एक अनुचित धारणा है। पेट भर खाने पीने के बाद भी पशुओं में वह आत्मिक चेतना उत्पन्न नहीं होती जो मनुष्य में होती है। यह चेतन तत्व ही उसे पशु जगत से पृथक् कर मनुष्य होने का अनुभव कराता है। मार्क्स इस बात का अनुभव नहीं कर सका और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति को ही द्वंदवाद के माध्यम से मानव जीवन का लक्ष्य घोषित कर बैठा। मनुष्य की मनुष्य होने के नाते आत्मसंतुष्टि, भौतिक उत्थान से ही नहीं वरन् उसके माध्यम से आत्मिक उत्थान के लक्ष्य प्राप्त करके ही संभव है। भौतिकवाद इस दृष्टि से मनुष्य की बहुत अधिक सहायता नहीं करता है। यह उसके उत्थान की लक्ष्मण रेखा नहीं है।

2. एक समय विशेष में वाद, प्रतिवाद और संवाद का पता लगाना संभव नहीं – मनुष्य समाज का विकास एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया का प्रतीक है। विभिन्न तत्व और क्रियाएं इस तरह आपस में घुली मिली होती हैं कि उनका वाद, प्रतिवाद और संवाद में विभाजित करना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव होता है। विरोध और विरोध में निहित अंतर्विरोध सामाजिक विकास को इतना जटिल बना देते हैं कि साधारण मनुष्य के लिए तो क्या बल्कि बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए भी उसकी दशा दिशा को ठीक प्रकार से समझ पाना और उसके अनुसार अपने आचरण को निर्धारित करना एक कठिन ही नहीं, असंभव सा कार्य है। दरअसल ये क्रियाएं अलग-अलग चरणों में सक्रिय होने के बजाय संभव रूप से चलती हैं तथा एक दूसरे की सीमा रेखाओं का अतिक्रमण करती रहती हैं। वाद प्रतिवाद और प्रतिवाद वाद हो सकता है ऐसी स्थिति में संवाद का पता लगाना एक उलझन भरा और भ्रमित करने वाला कार्य हो सकता है। अतः इस सिद्धांत के आधार पर सामाजिक विकास के सही रूप को समझना अपने आप में एक दुष्कर कार्य होगा।

3. आदर्श के उपलब्ध होने पर भी नियम निष्क्रिय नहीं होगा – मार्क्स ने वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज की स्थापना पर तुलनात्मक नियम का निष्क्रिय होने का मत प्रतिपादित किया है, लेकिन ऐसा संभव नहीं होगा। पदार्थ को मार्क्स गतिशील और परिवर्तनशील प्रकृति का बताता है। उसमें निहित अंतर्विरोध उसे निरंतर आदर्श स्थिति में नहीं बने रहने देगा। यह नियम एक निरंतर सक्रिय रहने वाला नियम है। अतः आदर्श को यह शनै: शनै: पतनशील बनाकर गुणात्मक परिवर्तन के कारण आदर्श की स्थिति में ले जाएगा। आदर्श और अनादर्श का संघर्ष विश्व इतिहास का एक सनातन तथ्य है। मनुष्य की गतिशील सक्रियता मूर्ति निर्माण और मूर्ति-भंजक दोनों रही है। पुरानी मूर्तियों से असंतुष्ट होकर वह उनका विध्वंस और उनके स्थान पर नई मूर्तियां स्थापित कर रहा है। जो उसे एक समय आदर्श लगता है वही समय बीतने के साथ उसे अनादर्श लगने लगता है या लग सकता है। मनुष्य अपने सृजन से कभी भी संतुष्ट नहीं होता। वह नित्य नए प्रयोग करने का आदी रहा है। यह एक तरह से उसके स्वभाव का गुण है। अतः न पदार्थ और न उससे निर्मित मनुष्य कभी आदर्श स्थित पाकर शांत बैठेगा और न वह स्थिति अनवरत बनी रहेगी।

4. द्वंदवाद एक खतरनाक पद्धति – मार्क्स ने आर्थिक नीतिवाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए यह बताया कि सामाजिक परिवर्तन में आर्थिक स्थितियां निर्णायक भूमिका का निर्वाह करती हैं। इसका सीधा साधा अर्थ यह हुआ कि मनुष्य में अपने विकास क्रम को बदलने की सामर्थ्य नहीं है। यदि हम मार्क्स की इस मान्यता को स्वीकार कर लेते हैं तो इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह होगा कि आर्थिक शक्तियों द्वारा समर्पित आदर्श के अतिरिक्त मनुष्य के अन्य सारे धार्मिक, नैतिक और आत्मिक आदर्श व्यर्थ हैं जबकि वास्तव की स्थिति ऐसी नहीं है। आर्थिक स्थितियों का सामाजिक परिवर्तन में महत्व स्वीकार करते हुए भी हम उनसे दिगर आदर्शों और मूल्यों के महत्व को स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकते। आर्थिक स्थितियों के बावजूद वह भी सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण शक्ति का निर्वाह करती हैं और कभी-कभी तो ऐसे परिवर्तन कर देती हैं जिनका आर्थिक स्थितियों से मेल बिठाना लगभग असंभव सा हो जाता है।

5. मानव इतिहास उत्थान का ही इतिहास नहीं है – मार्क्स ने द्वंदवादी सिद्धांत के अनुसार यह बताया है कि विकास हमेशा ऊर्ध्वगामी होता है अर्थात् हमेशा यह मनुष्य समाज को प्रगति की दिशा में ले जाता है। यदि ऐसा होता तो आज मानव समाज की जैसी स्थिति है उससे उसकी स्थिति पूर्णतया भिन्न होती और उस आदर्श व्यवस्था अर्थात् वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज व्यवस्था की स्थापना कब की हो गई होती, जिसकी व्याख्या मार्क्स ने अपने चिंतन के माध्यम से की है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न तो मनुष्य समाज का विकास मार्क्स द्वारा प्रतिपादित तरीके से हुआ और न उसके वे परिणाम हुए जिनकी संभावना मार्क्स ने व्यक्त की थी। मानव जाति का इतिहास उत्थान और पतन दोनों का है। कभी स्थितियां समाज को उत्थान की ओर ले जाती हैं तो कभी पतन की ओर। मानव इतिहास उत्थान पतन का एक मिश्रित उदाहरण है, वह सिर्फ उत्थान की दास्तान ही नहीं है।

6. संघर्ष विकास का एकमात्र आधार नहीं – द्वंदवाद के माध्यम से मार्क्स संघर्ष को विकास का एकमात्र आधार घोषित करता है। यह एक अर्ध सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं। संघर्ष और सहयोग स्थिति अनुसार दोनों ही विकास के साधन है तथा इन दोनों के माध्यम से ही मनुष्य अपने आदर्शों को प्राप्त करने का प्रयास करता है तथा अतीत में भी करता आया है।

मूल्यांकन – मार्क्स द्वारा प्रतिपादित भौतिकवादी द्वंदात्मक सिद्धांत का उपर्युक्त आलोचनाओं के कारण उसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अपनी सारी कमियों और कमजोरियों के बावजूद वह हमें सामाजिक प्रगति के स्वरूप और विकास को समझने हेतु एक पैमाना प्रदान करता है। चाहे पैमाना एकांकी चरित्र का ही हो लेकिन एक पैमाना एक मापदंड तो है ही। फिर पूर्ण सत्य कोई वस्तु नहीं होती। सभी पैमाने चाहे वे आदर्शवादी हों या भौतिकवादी, अपूर्ण हैं लेकिन फिर भी अपना महत्व रखते हैं क्योंकि मनुष्य इन सभी पैमानों में समर्थ हो सकता है जो हमें आदर्श नहीं तो आदर्श के निकट अवश्य पहुंचा सकता है। हर पैमाने का यही महत्व है और इस दृष्टि से मार्क्स द्वारा प्रदत इस पैमाने का भी महत्व है। वह हमें देखने की एक दृष्टि देता है जिसका प्रयोग करके हम संपूर्ण को नहीं तो कम से कम उसके एक पक्ष को अवश्य देख सकते हैं।

मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूं,

 एक दोस्त से पूछा, जो 60 की वय पार कर चुका है और 70 की ओर जा रहा है। वह अपने जीवन में किस तरह का बदलाव महसूस कर रहा है?*

I asked one of my friends who has crossed age of 60 & is heading to 70. What sort of change he is feeling in him?
*उसने निम्नलिखित बहुत दिलचस्प पंक्तियाँ भेजीं, जिन्हें आप सभी के साथ साझा करना चाहूँगा ....।*
He sent me the following very interesting lines, which I would like to share with you all.....
*• मेरे माता-पिता, मेरे भाई-बहनों, मेरी पत्नी, मेरे बच्चों, मेरे दोस्तों से प्यार करने के बाद, अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूं।*
• After loving my parents, my siblings, my spouse, my children, my friends, now I have started loving myself.
*• मुझे बस एहसास हुआ कि मैं "एटलस" नहीं हूं। दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है।*
• I just realized that I am not “Atlas”. The world does not rest on my shoulders.
*• मैंने अब सब्जियों और फलों के विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी बंद कर दी। आखिरकार, कुछ रुपए अधिक देने से मेरी जेब में कोई छेद नहीं होगा, लेकिन इससे इस गरीब को अपनी बेटी की स्कूल फीस बचाने में मदद मिल सकती है।*
• I now stopped bargaining with vegetables & fruits vendors. After all, a few Rupees more is not going to burn a hole in my pocket but it might help the poor fellow save for his daughter’s school fees.
*• मैं बची चिल्लर का इंतजार किए बिना टैक्सी चालक को भुगतान करता हूं। अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक मुस्कान ला सकता है। आखिर वह मेरे मुकाबले जीने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है|*
• I pay the taxi driver without waiting for the change. The extra money might bring a smile on his face. After all he is toiling much harder for a living than me.
*• मैंने बुजुर्गों को यह बताना बंद कर दिया कि वे पहले ही कई बार उस कहानी को सुना चुके हैं। आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें ताज़ा करती है और जिंदगी जीने का होंसला बढाती है |*
• I stopped telling the elderly that they've already narrated that story many times. After all, the story makes them walk down the memory lane & relive the past.
*• कोई इंसान अगर गलत भी हो तो मैंने उसको सुधारना बंद किया है। आखिर सबको परफेक्ट बनाने का ठेका मुझ पर नहीं है। ऐसे परफेक्शन से शांति अधिक कीमती है।*
• I have learnt not to correct people even when I know they are wrong. After all, the onus of making everyone perfect is not on me. Peace is more precious than perfection.
*• मैं अब सबकी तारीफ बड़ी उदारता से करता हूं। यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की मनोदशा को उल्लासित करता है, बल्कि यह मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है!*
• I give compliments freely & generously. After all it's a mood enhancer not only for the recipient, but also for me.
*• अब मैंने अपनी शर्ट पर क्रीज या स्पॉट के बारे में सोचना और परेशान होना बंद कर दिया है। मेरा अब मानना है कि दिखावे के अपेक्षा व्यक्तित्व ज्यादा मालूम पड़ता है।*
• I have learnt not to bother about a crease or a spot on my shirt. After all, personality speaks louder than appearances.
*•मैं उन लोगों से दूर ही रहता हूं जो मुझे महत्व नहीं देते। आखिरकार, वे मेरी कीमत नहीं जान सकते, लेकिन मैं वह बखूबी जनता हूँ।*
• I walk away from people who don't value me. After all, they might not know my worth, but I do.
*• मैं तब शांत रहता हूं जब कोई मुझे "चूहे की दौड़" से बाहर निकालने के लिए गंदी राजनीति करता है। आखिरकार, मैं कोई चूहा नहीं हूं और न ही मैं किसी दौड़ में शामिल हूं।*
• I remain cool when someone plays dirty politics to outrun me in the rat race. After all, I am not a rat & neither am I in any race.
*• मैं अपनी भावनाओं से शर्मिंदा ना होना सीख रहा हूं। आखिरकार, यह मेरी भावनाएं ही हैं जो मुझे मानव बनाती हैं।*
• I am learning not to be embarrassed by my emotions. After all, it's my emotions that make me human.
*• मैंने सीखा है कि किसी रिश्ते को तोड़ने की तुलना में अहंकार को छोड़ना बेहतर है। आखिरकार, मेरा अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा। जबकि रिश्तों के साथ मैं कभी अकेला नहीं रहूंगा।*
• I have learnt that it’s better to drop the ego than to break a relationship. After all, my ego will keep me aloof whereas with relationships I will never be alone*.
*• मैंने प्रत्येक दिन ऐसे जीना सीख लिया है जैसे कि यह आखिरी हो। क्या पता, आज का दिन आखिरी हो!*
• I have learnt to live each day as if it's the last. After all, it might be the last.
*सबसे महत्वपूर्ण*–
MOST IMPORTANT
• I am doing what makes me happy. After all, I am responsible for my happiness, and I owe it to me.
*• मैं वही काम करता हूं जो मुझे खुश करता है। आखिरकार, मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूं, और मैं उसका हक़दार भी हूँ।*

द्वंदात्मक प्रक्रिया वाद

 द्वंदात्मक पद्धति – द्वंदात्मक पद्धति का सर्वप्रथम प्रतिपादन हीगल द्वारा अपनी विश्वात्मा (world spirit) संबंधी मान्यता को सिद्ध करने के लिए किया गया था। इस दृष्टि से उसने द्वंद को वैचारिक द्वंद के रूप में प्रतिपादित कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि किसी विचार के उत्पन्न और परिमार्जित होने की प्रक्रिया क्या है। हीगल की इस द्वंदात्मक पद्धति को स्पष्ट करने हेतु हंट का कथन है कि – द्वंदात्मक प्रक्रिया वाद (thesis), प्रतिवाद(antithesis) तथा संवाद(synthesis) की प्रक्रिया है। वाद एक विचार की पुष्टि करता है, प्रतिवाद उसका निषेध करता है और ‘संवाद’ वाद और प्रतिवाद में जो सत्य है उसे स्वयं में समाहित करता है। इस तरह वह हमें यथार्थ के अधिक निकट ले आता है, लेकिन जैसे ही हम संवाद को अधिक निकट से देखते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि वह अभी भी अपूर्ण है। अतः वह पुनः वाद का रूप धारण कर लेता है और पुनः वहीं पूर्व की संघर्ष की प्रक्रिया को प्रारंभ कर देता है। फलत: उसका प्रतिवाद द्वारा निषेध होता है और संवाद में पुनर्मिलन होता है। इस प्रकार यह त्रिकोणात्मक विकास प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि तत्व या विचार आदर्श रूप ग्रहण नहीं कर लेता है।”

इस प्रकार हीगल के अनुसार वैचारिक विकास की यह प्रक्रिया वाद, प्रतिवाद और संवाद के माध्यम से तब तक चलती रहती है, जब तक विचार सारे अंतर्विरोधों से मुक्त होकर आदर्श रूप धारण नहीं कर लेता है।

बुधवार, 23 जून 2021

आप पंडित हैं या वामपंथी?"

 एक विद्वान साथी ने मेरी एक पोस्ट पर बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाया है:-

"कि आप पंडित हैं या वामपंथी?"
मेरा निवेदन है कि मैं जन्म से और कर्म से पंडित ही हूँ,इस पर मेरा कोई कसूर नही! इसे विशुद्ध वंशानुगत परिलब्धि कहा जा सकता है!
किंतु यदि मुझे भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के साथ साथ यदि पश्चिम के भौतिकवादी साम्यवादी दर्शन का भी ज्ञान है तो क्या यह मेरा अपराध है?
चूंकि मैने गरीबी मुफलिशी देखी है और मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर मुझे पक्का यकीन है कि कमजोर वर्ग संगठित होकर अपने हितों की रक्षा कर सकता है! इसलिये मैं मजदूरों किसानों के लिये सतत संघर्ष करने वाले *वामपंथ* के साथ हो लिया,क्या यह मेरा गुनाह है?
हम विगत 45 साल तक मजदूर किसान के पक्ष में खड़े होकर शोषण की ताकतों से लड़ते आ रहे हैं! किंतु भारत में गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है और अमीर और ज्यादा अमीर! आजादी के बाद जनाधार के मामले में भारत में कांग्रेस नंबर वन और कम्युनिस्ट नंबर दो पर थे! 50 साल लगातार संघर्ष करने के बाद परिणाम यह रहा कि सिर्फ केरल में सरकार बची है! किंतु भारत की संसद में आधा दर्जन वामपंथी सांसद भी नही हैं!
वैसे तो हम हर जायज संघर्ष में मजूरों और किसानों के साथ हैं,किंतु 68 साल की उम्र और क्रानिक बीमारी के चलते अपनी क्षमता के अनुसार ही सहयोग कर सकता हूँ!हमें यह भी याद रखना चाहिये कि मार्क्सवादी दर्शन किसी की गुलामी नहीं सिखाता ! हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हम सार्थक सहयोगी तो बने,किंतु कट्टरपंथी साम्प्रदायिक धर्मांधों की तरह हम भी किसी विचारधारा या राजनैतिक पार्टीके अंधभक्त न बन जाएं! वरना सुसभ्य वामपंथियों और असभ्य नितांत दकियानूसी अंधभक्तों में फर्क क्या रह जाएगा?
वेशक मार्क्सवाद स्वतंत्रता समानता बंधुता का अलमवरदार है,किंतु जो लोग शोषित पीड़ित नही हैं, किंतु मानवता और नैतिकता के कारण वामपंथ के साथ हैं,तो आप उनके वंशानुगत मूल्यों पर सवाल नही उठा सकते !
उदाहरण के लिये वामपंथ से मेरा कोई स्वार्थ सिद्ध नही होने वाला,किंतु फिर भी हम उसके सहयोगी हैं! हम पर किसी का कोई ऐहसान नही है!वामपंथ का भी नही और ईश्वर का भी नही! ईश्वर का यों नही कि बिना कर्म किये वह किसी को कुछ दे ही नही सकता! वामपंथ का यों नही कि देश में अब तक न तो पूंजीवाद कमजोर हुआ और न साम्यवाद की संभावनाएं द्रष्टिगोचरित हुईं!
सर्वहारा क्रांति तो अब इतिहास की वस्तु रह गई है! ऐंसे हालात में कुछ मंदमति जड़मति स्वनामधन्य किताबी मार्क्सवादी केवल धर्म जाति मजहब के घूरे पर फूँक मारते रहते हैं!भारतीय आध्यात्मिक दर्शन और सभी धर्म मजहब की सच्चाईयों को ठीक से जाने बिना केवल थोथा मखौल उड़ाकर, जनता के बीच वामपंथ और मार्क्सवादी दर्शन को बदनाम करते रहते हैं!
दरसल मार्क्सवाद एक सर्वोत्क्रष्ट दर्शन है, किंतु भारत की जनता को वह समझ में नही आ पा रहा है! इसकी वजह हम वामपंथियों का भारतीय दर्शन के बारे में आधा अधूरा ज्ञान भी एक कारण है! यही कारण है कि बंगाल में 40 साल तक वामपंथ का प्रभुत्व रहा है ! किंतु आज वहाँ की विधान सभा में एक भी वामपंथी नही है! जो असली और ईमानदार वामपंथी बच रहे,वे इंसाफ की लड़ाई आज भी लड़ रहे हैं ! किंतु जो नकली थे वे सब त्रणमूल में ममता के पैर धोकर पी रहे हैं! विदेशी घुसपैठियों को वोट के लिये सहन कर रहे हैं! इन हालात में विचारशील और विवेकवान साम्यवादियों का कर्तव्य है कि अपनी आत्मालोचना करें और भारतीय दर्शन का सांगोपांग अध्यन करें!
श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 22 जून 2021

उद्भिज गगन अमिय झलकावै है

 बन बाग़ खेत मैढ़ चारों ओर हरियाली ,

उद्भिज गगन अमिय झलकावै है।
पिहुँ -पिहुँ बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,
चिर-बिरहन मन उमंग जगावै है।।
जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ,
गजगामिनी मानों पिया घर जावै है।
झूम-झूम वर्षें आषढ़ा गहन घन,
झूलनों पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।"

"योगश्वचित्तवृत्तिनिरोध:

 विगत वर्ष की तरह इस साल भी 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया!किंतु यह सुखद संदेश है कि कोरोना महामारी के अति भयानक साये में इस बार का अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पूर्व की अपेक्षा और ज्यादा हर्षोल्लास से मनाया गया! किंतु वास्तव में यह *योग* नही है! अपितु अष्टांगयोग या राजयोग का यह एक चरणमात्र है! पतंजलि और पाणिनि का कथन है कि:-

"योगश्वचित्तवृत्तिनिरोध:"अर्थात चित्त की वृत्तियों के निरोध ( नियमन) का नाम ही योग है! यद्यपि कल 21 जून को संपन्न तथाकथित वैश्विक आंशिक योगाभ्यास में योग का मूल तत्व नदारद रहा?
आधुनिक विज्ञान और योग को समझने वाले स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि योग के मार्ग में काम क्रोध,लोभ मोह मिथ्या संकल्प. और मिथ्या भाषण बड़ी बिघ्न बाधा है। मुझे याद है कि विगत दो वर्ष पहले ही योग गुरु स्वामी रामदेव ने और खुद श्रीमान नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में बताया था कि स्विट्ज़रलैण्ड बैंकों में भारतीय चोट्टों ने कालेधन के रूप में लाखों करोड़ रूपये जमा कर रखे हैं। उन्होंने तो उस रकम का बटवारा भी कर दिया था कि हम[मोदी सरकार] यदि सत्ता में आये तो हरेक के खाते में १५ लाख रूपये जमा करेंगे। बड़े खेद की बात है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया। स्विस सरकार ने पहली बार पूर्ण आंकड़े घोषित किये हैं। उनके पास दुनिया के ६३ देशों की कुल जमा रकम १६०० अरब डॉलर याने १०२४०० अरब रूपये मात्र हैं।
इस कालेधन की रकम में भी भारत का हिस्सा मात्र ०. १२३ है। याने रूपये की शक्ल में मात्र १२६१५ करोड़ रूपये ही भारत का कालधन के रूप में जमा है। इस बदनाम चोट्टासूची में भी भारत महा फिसड्डी है। यहाँ भी वह ६१ वें स्थान पर है। याने दुनिया के ६० देशों के चोट्टे -यहाँ भारत के चोट्टों से बाजी मार गए।
स्विस सूची में तो भारत के कालेधन वाले अंतिम पायदान से सिर्फ दो राष्ट्रों के ही ऊपर हैं। उस पर भी लुब्बो-लुआब ये है कि कालेधन की इस चोट्टाई में भी हम खेलों की पदक तालिका जैसे ही फिसड्डी निकले ।चुनाव में जनता को बरगलाने के लिए जिस झूंठ का सहारा लिया गया वो योग के लिए मुफीद नहीं हो सकता !
बड़ी अजीब स्थिति है कि जो लोग योग का प्रचार -प्रसार करते हैं वे ही महा झूंठ और पाखंड के शिकार हैं।सत्ता में आने के बावजूद भी ये झूंठी वयान बाजी करने वाले लोग, आइन्दा यदि योग को बदनाम न करते हुए, चीन-जापान-कोरिया की तरह अपने भारतीय खिलाडियों को कुछ बेहतर सुविधाएँ और टिप्स देंतो ही बेहतर होगा। ताकि वे आगामी ओलम्पिक में और कॉमनवेल्थ गेम्स में भी, भारत का नाम पदक तालिका में सबसे ऊपर ले जा सकें। तभी ये दुनिया वाले आपके 'योग' का लोहा मानेगे । वैसे भी बिना सत्य ,अहिंसा अस्तेय , अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के कोई भी योग नहीं सधता। शारीरिक कसरत को योगविद्द्या का नाम देने , उसको भी केवल किसी नेता या समाज सुधारक के जन्मदिन पर जश्न जैसा दिन मना लेने के निहतार्थ तब तक सकारात्मक नहीं हो सकते ,जब तक भारत में धर्म ,मजहब ,खेल और संस्कृति को राजनैतिक पाखंड से मुक्त नहीं किए जाता।जिस शारीरिक कसरत को बाबा रामदेव और उनके अनुयाई योग कह रहे हैं,वो हम उनके पैदा होने के 10 साल पहले से ही करते करते चले आ रहे हैं ! सौभाग्य से 50 -60 साल पहले सरकारी स्कूलों में बाकायदा व्यायाम शाला और अखाड़े हुआ करते थे! कसरत कराने वाले टीचर भी हुआ करते थे! किंतु वे उसे योग नही कसरत या व्यायाम कहा करते थे! आजकल लोग जिसे योग कह रहे हैं,वास्तव में वह योग नही है,बल्कि राजयोग के आठ अंगों में से तीसरा चरण मात्र है !
स्वामी रामदेव जो कुछ कर रहे हैं,दिखा रहे हैं,वो महज शारीरिक मशक्कत याने कसरत मात्र है।योग तो शरीर,मन,बुद्धि और आत्मा के बेहतर तालमेल से दुखों के निवारण और *आत्म साक्षात्कार* का साधन है!
योग के बारे में भगवान शिव,आदिनाथ अष्टाबक्र, गुरू वसिष्ठ,भगवान दत्तात्रेय, महर्षि व्यास, भगवान श्रीक्रष्ण महर्षि पतंजलि और गुरू गोरखनाथ आदि ने विस्तार से वर्णन किया है! वैसे राजयोग के आठ अंग होते हैं!यथा:-
यम,नियम,आसन,प्रत्याहार,प्राणायाम,ध्यान, धारणा और समाधि!किंतु आजकल सारी मशक्कत 'आसन' पर ही केंद्रित है! यह योग नही शारीरिक कसरत है!
श्रीराम तिवारी!

गुरुवार, 17 जून 2021

मंदिर निर्माण का चंदा भी धंधा ही है।

 उधर चीन ने दक्षिण एशिया में पाकिस्तान,नैपाल,म्यांमार,श्रीलंका को साधकर,भारत को लगभग मित्रविहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है ।  इधर हमारे सत्ताधारी नेता हमेशा चुनावी मोड परही रहते है। वे सरकारी कामकाज की बात कम करते हैं,किन्तु पार्टीबाजी, दलबदल,विपक्ष मुक्त भारत और ऐन केन प्रकारेण सत्ता पर कब्जा बनाये रखने की तिकड़म में व्यस्त रहते हैं।इनके कुछ अनुयाइयों के लिए चुनाव भी धंधा है और मंदिर निर्माण का चंदा भी धंधा ही है।  

घड़ी बिकट दिन-रेन।

 मानसून बागी हुआ, हैं किसान बैचेन।

लॉकडाउन की छूट में, घड़ी बिकट दिन-रेन।।

बिजली संकट बढ़ चला,महँगाई की मार।
वित्त अनुशासन में विफल, हो गइ ये सरकार।।
सारे भारत में बढे, हिंसा रेप व्यभिचार।
बेसिक मूल्य से अधिक है,पैट्रोल पर अधिभार।।
कोरोना संकट बिकट,मच रई हा हा कार ।
केंद्र राज्य सबंध की,अब उल्टी बहे बयार ! !