गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

हिगेल के दर्शन के अधिकार की समालोचना"

  हिगेल के दर्शन के अधिकार की समालोचना"

( 1843-44) की" भूमिका" में मार्क्स ने कहा कि धर्म की समालोचना अंततोगत्वा उन सामाजिक आधारों की समालोचना है, जो धर्म को अपनी विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करते हैं! #लोगों के भ्रमात्मक सुख के रूप में धर्म का खात्मा ही उनका वास्तविक सुख की चाह है।लोगों से यह कहना कि अपनी स्थिति के बारे में भ्रमों को समाप्त करें, उनसे यह कहना है कि वे अपनी उस स्थिति को समाप्त कर दें जिसे भ्रमों की आवश्यकता है।धर्म की समालोचना ही, इसलिये, भ्रम में उन आंसुओं की घाटी की समालोचना है, जिसका धर्म ही प्रभामंडल है।इसप्रकार स्वर्ग की आलोचना घूम-फिर कर पृथ्वी की आलोचना हो उठती है।धर्म की आलोचना, कानून की आलोचना और धर्म-दर्शन की आलोचना, राजनीति की आलोचना में बदल जाती है#( कार्ल मार्क्स, अर्ली राइटिंग्स, पेग्विन बुक्स, हरमंडवर्थ, 1975, पृष्ठ 244-45)!..यह आलोचनात्मक बोध, बुर्जुवा विचारकों, जैसे मेकियावेली, बेकन, हाब्स आदि से होता हुआ कार्ल मार्क्स में अपनी तार्किक परिणति में पहुंचता है!

*नया साल मुबारक*

हर आम और खास को नया साल मुबारक!

मित्रो और सपरिजनों को नया साल मुबारक!!
सुशासन और विकास का ढपोरशंख बजाने वालो,
करकमलों में झाड़ू लेकर फोटो खिचवाने वालो,
चुनावी ध्रुवीकरण के लिये धर्मांधता फैलाने वालो,
लुटे पिटे भारत को चरागाह समझने वालो,
कालेधन का निरंतर खटराग राग सुनाने वालो,
दाऊद,हाफिज सईद-मसूद को न पकड़ पाने वालो,
स्विस बैंकों से कालाधन नहीं ला पाने वालो,
किसान मजदूर विरोधी कानून बनाने वालो,
शोषण -उत्पीड़न -जहालत का बचाव करने वालो,
सीमाओं पर अमन शांति स्थापित न कर पाने वालो,
नक्सलवाद का बाल न बांका कर पाने वालो,
चुनावी सभाओं की भीड़ और मरकज के जमाती,
किसान आंदोलन को बदनाम करने वालो,
भृष्टाचार,और कोरोना वायरस से न लड़ पाने वालो,
सोशल मीडिया पर किसानों को गद्दार बताने वालो,
नया साल मुबारक हो !!!
श्रीराम तिवारी

*पेंसनर्स को इन्कम टैक्स रिट्रर्न फाईल करना जरूरी !

 *पेंसनर्स को इन्कम टैक्स रिट्रर्न फाईल करना जरूरी क्यों?*

Many pensioners do not file IT returns claiming senior citizenship rebate by signing the form 16 in the bank. But what they do not realize is by not filing IT a zero tax returns they loose out on one major facility, hope this information is shared with Max pensioners so they do not loose out on this benefit
FROM SHRI N V NAGARAJ A LAWYER N EX BANKER FROM MYSORE.WE THANK HIM FOR HIS INFORMATION.
*Pensioner's Accidental Death*
Most of the Pensioners hesitate in filing returns, but, here is an important information that shows that filing IT returns has great advantage to the family of Pensioners at the time of any accidental death of the Pensioner.
As per section 166 of the motor vehicle act, 1988 ( Supreme Court Judgement under Civil appeal No. 9858 of 2013, arising out of SLP ( C) No. 1056 of 2008 dated 31st October 2013),
The family of the Pensioner died in accident is entitled to 10 times of average income of the last three years, provided he or she had filed the IT returns for the past three years.
For example, if the monthly pension of a pensioner is 25000 /- his annual income is 3,00,000. For three years his average income also say, for easy calculations is 3,00,000, then his family will get 10 times of 3 lakhs - 30, 00, 000 Rupees from the Government. No other proof, other than IT returns will be admitted by the Court also. So, filing IT returns by the Pensioner regularly, will go a long way in providing a big economic relief to the bereaved family of the Pensioner on his / her death by accident.
Failure to file IT returns due to lack of information about this advantage leads to huge loss to the family of the Pensioner on his death
(Source: Pensioner Ki Awaz)

रविवार, 27 दिसंबर 2020

तुमने हंसी-हंसी में, हर ग़म को भुला दिया!!

 तुम अकेले ही चले थे आसमां को चूमने,

नीहारिका में अंजुमन को तुमने सजा लिया !
दुर्दिन गुलामी भार ढोते हंसते रोते कट गये,
तुमने हंसी-हंसी में, हर ग़म को भुला दिया!!
शातिर लुटेरे जब वतन की आत्मा में घुस गये,
तुमने बंदीगृह को फिर से मंदिर बना दिया!
सोचते होंगे आप कि दिन फिरेंगे फिर वतन के,
फ़ांकाक़शी को इसलिये सत्याग्रह बना लिया!!
सुखी रहें भावी पीढ़ियां बने ये भारत महान,
अमर शहीदों ने इसलिये खुद को मिटा दिया।
श्रीराम तिवारी

धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी

 उम्र साठ के पार लेकिन

शक्ल हमारी 36 के जैसी
मुझको uncle कहने वाले,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी
बेटी के कॉलेज गया तो,
टीचर देख मुझे मुस्कुराई
बोली क्या मेंटेंड हो मिस्टर,
पापा हो, पर लगते हो भाई
क्या बतलाऊँ उसने फिर,
बातें की मुझ से कैसी कैसी
मुझको uncle कहने वालो,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी
पडोसन बोली, सेकंड हैंड हो,
लेकिन फ़्रेश के भाव बिकोगे
बस थोड़ी सी दाढ़ी बढ़ा लो,
कार्तिक आर्यन जैसे दिखोगे
अब भी बहुत जोश है तुम में,
हालत नहीं है ऐसी की वैसी
मुझको uncle कहने वालो,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी
बीवी सोच रही है शौहर,
मेरा कितना अच्छा है जी
पढ़ती नहीं गुलज़ार साहेब को,
दिल तो आख़िर बच्चा है जी
नीयत मेरी साफ़ है यारो
नही हरकतें ऐसी की वैसी
मुझको uncle कहने वालो,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी
कितने जंग लड़े और जीते हैं
इन गुज़रे सालों में जीवन के,
दो-एक झुर्रियाँ गालों में हैं,
और चंद सफ़ेदी बालों में है
इरादे मगर मज़बूत हैं अब भी,
उमंग भी सॉलिड पहले जैसी
मुझको uncle कहने वालो,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी
जीने का जज़्बा क़ायम हो तो,
उम्र की गिनती फिर फ़िज़ूल है
अपने शौक़ को ज़िंदा रखो,
जीने का बस यही उसूल है
ज़िंदादिली का नाम है जीवन,
परिस्थितियाँ हों चाहे जैसी
मुझको uncle कहने वालो,
धत्त तुम्हारी ऐसी की तैसी 🙂 🙂 🙂

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

हठयोग

 आज से करीब ५००० वर्ष पूर्व पतंजलि ऋषि ने एक ग्रंथ लिखा था जिसका नाम है योग- दर्शन। जिनमें योग के ८ अंगों की चर्चा है ,जिसे "अष्टाङ्ग-योग" भी कहते हैं।

आज योग के जिन आसन , प्राणायाम आदि क्रियाओं का प्रचलन योग के नाम से हो रहा है , उसका मुख्य स्रोत १५ वीं शताब्दी में घेरण्ड मुनि द्वारा रचित घेरण्ड संहिता , गुरु गोरखनाथ जी द्वारा शिव संहिता तथा स्वामी स्वात्माराम जी द्वारा हठयोग प्रदीपिका है।
इसमें चार अध्याय हैं
प्रथमोपदेशः - इसमें आसनों का वर्णन है।
द्वितीयोपदेशः - इसमें प्राणायाम का वर्णन है
तृतीयोपदेशः - इसमें योग की मुद्राओं का वर्णन है
चतुर्थोपदेशः - इसमें समाधि का वर्णन है।
इन अध्यायों में आसन, प्राणायाम के अतिरिक्त षट- कर्म शुद्धि क्रियाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन है। जिनमें नेति, धौति , बस्ती, नौलि, कपालभाति और त्राटक ये छ: क्रियाएं भी आती हैं । इसके साथ साथ मुद्राओं, बन्ध, चक्र / कुण्डलिनी जागरण क्रिया का भी मार्गदर्शन है।
वास्तविक रूप में आजकल हमलोग जो भी योग आसन करते है अथवा जो भी प्राणायाम की क्रियाएं करते हैं , वे सब इन्ही हठयोग आदि ग्रंथो से ली गई हैं, न कि पतञ्जलि के योगदर्शन से। क्योंकि योगदर्शन में किसी भी आसन व प्राणायाम का विस्तृत वर्णन नहीं है , मात्र संकेत के रूप में सूक्त दिए गए हैं। उदाहरणार्थ आसन के बारे मे पतञ्जलि जी ने लिखा -" स्थिर सुखम असानम "। बस और कुछ नहीं। इसी प्रकार प्राणायाम के बारे मे एक एक पंक्तियां ही लिखी गयी हैं, कैसे करने हैं, उनकी विधि क्या है , हिदायतें क्या है, लाभ हानियां क्या है, कुछ नहीं बताया गया। इन समस्त आसनों व प्राणायाम की गहन चर्चा हठयोग- प्रदीपिका ग्रंथ में ही है।
किन्तु जब भी कभी योग क्रियाओं की चर्चा होती है तो लोग उसे अक्सर पतंजलि के योग से जोड़ते हैं,वास्तव में वे हठयोग से संबंधित हैं। पतंजलि योग एक राज योग है, ध्यान योग है , शारीरिक योग नहीं।
अब एक मुख्य प्रश्न खड़ा होता है - यदि ऐसा है तो फिर लोग हठयोग के नाम से घबराते क्यों हैं ? इसका कारण यह है कि इस हठयोग में कई ऐसी क्रियाएं भी हैं जो बहुत कठिन हैं , दुष्कर हैं। जिसे आम आदमी नहीं कर पाता है । वो किसी कुशल योग गुरु के सानिध्य में करनी चाहिए और उस आसन में सिद्धहस्त होने के लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता होती है। कुछ कठिन आसनों की वजह से हम योग (हठयोग) ही न करें या उसको पूर्ण रूप से त्याग दें , यह कदापि उचित नहीं ।
इन कठिन आसनों को देखते हुए स्वामी दयानंद जी ने हठयोग को त्याज्य बताया था। किंतु उनका यह भाव न था कि समस्त हठयोग को ही छोड़ देवें। बल्कि सिर्फ उन कठिन आसनों को ही छोड़ना उनका उद्देश्य था। क्योंकि वे समझ रहे थे कि आम आदमी बिना विवेक के इन कठिन आसनों को करेगा तो लाभ की जगह हानि न कर बैठेगा
स्वामी जी की जीवनी पढ़ें तो पता चलता है कि उन्होंने अनेक योगी ,साधु , तपस्वियों से हठयोग सीखा और अनुभव प्राप्त किया । अपने लंबे अनुभव के आधार पर ही उन्होंने आम आदमी के लिए हठयोग को मना करके मात्र अष्टांग योग जैसे सरल योग को अपनाने के लिए सोचा होगा।
स्वामी जी ने स्वयं अपने जीवन में इस हठयोग का बहुत अधिक अभ्यास किया था । उनका शरीर, उनका बल हठयोग से प्राप्त की गई शक्ति व ऊर्जा की ओर स्वयं संकेत करता है। बाल ब्रह्मचर्य एवम हठयोग की शक्ति से ही वो खड्डे में फंसे बैलों को बाहर निकाल सके, दो सांडो को लड़ते हुए छुड़ा सके , दो गुंडों को अकेले पानी में डूबा कर रख सके, तलवार के दो टुकड़े कर सके, काफी दिनों तक भूखे प्यासे रह सके, दुर्जनो की लाठियों पत्थरों को सह सके। भयंकर ठंडी में भी वे कोपीनधारी ही रहे ,ये सब हठयोग का ही तो परिणाम था । प्राणायाम की विशेष क्रिया द्वारा वे भीषण सर्दी में भी अपने शरीर से पसीना निकाल लेते थे।
हठयोग की एक खास क्रिया होती है जिसे 'वमन धौति' कहते हैं , जिसमें पेट मे पड़े दूषित पदार्थो को उल्टी की विशेष प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाला जाता है। स्वामी जी को उनके जीवन मे 16 बार विष दिया गया। किन्तु जब भी उनको धोखे से भोजन में विष दिया जाता था , वे वमन धौति की क्रिया द्वारा उसको उल्टी करके बाहर निकाल देते थे।नौलि क्रिया द्वारा नाभि तक जल में खड़े होकर गुदा द्वार से १,२ लीटर पानी खींचकर बाहर आकर झाडियों के निकाल देते थे। इस प्रकार वे बार बार बच जाते थे।यह हठयोग का ही वरदान था ।
हठयोग में एक 'कुण्डली - जागरण' की विधा भी होती है , जिसमे साधक आसन , प्राणायाम, मूलाकर्षण आदि क्रियाओं से अपने शक्ति केंद्र को जागृत करता है। इसके जागरण से व्यक्ति में असीम शक्ति का उदय होता है और मूलाधार से उठी यह शक्ति का विस्फोट मनुष्य को अत्यंत शरीरिक व मानसिक ऊर्जा से भर देता है।जिससे वह अनेक विस्मयकारी सामाजिक कार्य करने में सक्ष्म हो जाता है और आध्यात्मिक विकास- पथ पर आरोहण करने लगता है। किंतु कभी कभी इससे विपरीत भी होता है जब कमज़ोर व्यक्ति इसे संभाल नहीं पाते हैं और जो शक्ति का ऊर्ध्वगमन होना चाहिए था वह अधोमुखी हो जाता है , नाभि केंद्र से सहस्रार चक्र की ओर बहने वाली धारा पुनः मूल की ओर आने लगती है और वह व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों में कुछ इस तरह फंस जाता है कि शक्ति का दुरुपयोग कर बैठता है ।
वह इस प्रकार यह शालीन योग अश्लीलता की तरफ दौड़ने लगता है । इन्ही बातों को ध्यान में रख कर सामान्य जनों को स्वामी जी ने हठयोग अपनाने के लिए मना किया।
सो आइये,हलके फुलके आसन करने में न हिचकिचाएं । आज हम इस आधुनिक युग में ज़्यादा शारीरिक श्रम नहीं कर पाते जो कि पहले दिनचर्या में ही शामिल होते थे अतः कुछ आसन कर हम अपनी मांसपेशीयो से काम लेकर उनको सुडौल और सही रख सकते है वरना वो शिथिल होने से कई रोगों का कारण बन सकती हैं।
सो हम हठयोग पर पुर्नविचार करें और इसके नाम से फैली हुई भ्रांतियों को दूर करें तथा आज के दौर में जो योग है जो योग्य है उसे विवेकपूर्ण ढंग से अपनाकर लाभ प्राप्त करें।
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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷ओ३म् सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यानेनी यतेऽभीशुभिर्वाजिन इवर। हत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन :शिवसड्कल्पमस्तु।(यजुर्वेद ३४|६)
💐अर्थ :- हे सर्वान्तर्यामी ! जो मन रस्सी से घोड़ो के समान अथवा घोड़ो के नियन्ता सारथी के तुल्य लोगों को अत्यंत इधर- उधर ले जाता है, जो ह्रदय में प्रतिष्ठित वृद्धादि अवस्था से रहित और अत्यन्त वेग वाला है , वह मेरा मन सब इन्द्रियों को धर्माचरण से रोक कर धर्म पथ में सदा चलाया करें।
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🕉🙏 ज्ञान रहित भक्ति अंधविश्वास है
🕉🙏भक्ति रहित ज्ञान नास्तिकता है

*कोयलिया की कूक नदारद।*

देहरी, आंगन, धूप नदारद |

*ताल, तलैया, कूप नदारद।*

*घूँघट वाला रूप नदारद।*

*डलिया,चलनी,सूप नदारद।*
आया दौर फ्लैट कल्चर का,
देहरी, आंगन, धूप नदारद।
हर छत पर पानी की टंकी,
ताल, तलैया, कूप नदारद।।
लाज-शरम चंपत आंखों से,
घूँघट वाला रूप नदारद।
पैकिंग वाले चावल, दालें,
डलिया,चलनी, सूप नदारद।।
🤨🤨
बढ़ीं गाड़ियां, जगह कम पड़ी,
सड़कों के फुटपाथ नदारद।
*लोग हुए मतलबपरस्त सब,*
*मदद करें वे हाथ नदारद।।*
मोबाइल पर चैटिंग चालू,
यार-दोस्त का साथ नदारद।
बाथरूम, शौचालय घर में,
कुआं, पोखरा ताल नदारद।।
🤨🤨
हरियाली का दर्शन दुर्लभ,
*कोयलिया की कूक नदारद।*
घर-घर जले गैस के चूल्हे,
चिमनी वाली फूंक नदारद।।
मिक्सी, लोहे की अलमारी,
सिलबट्टा, संदूक नदारद।
*मोबाइल सबके हाथों में,*
*विरह, मिलन की हूक नदारद।।*
🤨🤨
बाग-बगीचे खेत बन गए,
जामुन, बरगद, रेड़ नदारद।
सेब, संतरा, चीकू बिकते
गूलर, पाकड़ पेड़ नदारद।।
ट्रैक्टर से हो रही जुताई,
जोत-जात में मेड़ नदारद।
*रेडीमेड बिक रहा ब्लैंकेट,*
*पालों के घर भेड़ नदारद।।*
🤨🤨
लोग बढ़ गए, बढ़ा अतिक्रमण,
जुगनू, जंगल, झाड़ नदारद।
कमरे बिजली से रोशन हैं,
ताखा, दियना, टांड़ नदारद।।
चावल पकने लगा कुकर में,
*बटलोई का मांड़ नदारद।*
कौन चबाए चना-चबेना,
भड़भूजे का भाड़ नदारद।।

मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे मार दीजिए !

 काफ़िर हूँ, सिर फिरा हूँ मुझे मार दीजिए

मैं सोचने लगा हूँ, मुझे मार दीजिए
है एहतराम हज़रते-इंसान मेरा दिल
बेदीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिए
मैं पूछने लगा हूँ सबब अपने क़त्ल का
मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे मार दीजिए
करता हूँ मुल्लाओं से मैं सब सवाल
गुस्ताख़ हो गया हूँ मुझे मार दीजिए
ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम
कितना भटक गया हूँ मुझे मार दीजिए
बे दीन हूँ मगर हैं ज़माने में जितने धर्म
मैं सब को मानता हूँ मुझे मार दीजिए
ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूँ साफ़ ज़ुल्म
क्या ज़ुल्म कर रहा हूँ मुझे मार दीजिए
ज़िंदा रहा तो करता रहूँगा हमेशा प्यार
मैं साफ़ कह रहा हूँ, मुझे मार दीजिए
है अमन मेरी शरीयत तो मुहब्बत मेरा जेहाद
बाग़ी बहुत बड़ा हूँ, मुझे मार दीजिए
बारूद का नहीं मेरा मसलक है दारुद
मैं ख़ैर मनाता हूँ, मुझे मार दीजिए

फरहाद अहमद

शिव के दरवाज़े बैठकर गिरजाघर देखने की साध!

 आज रात विश्व ईश-पुत्र ईसा मसीह का जन्मोत्सव मनाएगा। पता नहीं कितने ईसाइयों और हिंदुओं को यह मालूम है कि इस भारत में एक ऐसा हिंदू संत साक्षात् रह चुका है जिसने ईसा मसीह के प्रेम में आविष्ट होकर उनका साक्षात्कार किया था, ईसा की राह से भी ईश्वर प्राप्त किया था।

पढ़िए करुणामूर्ति जीसू पर परमहंस रामकृष्ण देव का आत्मकथ्य पद्मश्री डा. कृष्ण बिहारी मिश्र की विलक्षण पुस्तक ‘कल्पतरु की उत्सवलीला’ से।
“सुन मास्टर, भीतरी बात तुझसे कहूँ , पंचवटी में एक दिन प्रेममूर्ति जीसू से माँ ने मिलाया। उसने हुलसकर गले लगा लिया था। और सच कहता हूँ उसके प्रेम में विभोर हो गया था, जैसे बाल्यकाल में माँ अपने छोह से नहलाती थी, कुछ वैसा स्वाद। जीसू के प्रेम को समझाना असंभव है मास्टर। वह दिव्य आस्वाद उस सौन्दर्य-राशि के रोम-रोम से झर रहा था। निहाल कर दिया माँ के अनुग्रह ने।
यह जो बाइबिल की और तू जिसे ‘टेस्टामेंट’ कहता है, उसकी , अच्छा, यह ‘न्यू’ क्या है मास्टर? अच्छा, नया, जैसे केशव का ‘नव विधान’ , क्यों? तो यह सारी बातें शम्भू ने मुझे बहूत पहले सुना समझा दी थीं। न्यांगटा (वेदान्तगुरु तोतापुरी) कहता था कि भागवत चर्चा बराबर होनी चाहिए जैसे लोटा को रोज़ मांजना चाहिए। इसीलिए प्रेमी योगी जीसू के प्रसंग सुनाने के लिए तुझसे बीच बीच में आग्रह करता हूँ।
.........
शम्भु और यदुनाथ के घर प्रायः धर्म-चर्चा के लिए अपरान्ह में चला जाता था और देर रात में लौटता था। और शम्भु चरण से बाइबिल सुनकर प्रेम योगी जीसू के दिव्य जीवन पर मन-प्राण अनुरक्त हो गया था। वही दिव्य ज्योति हर क्षण मेरे भाव-लोक को बाँधे रहती। एक दिन माँ से कहा था, ‘माँ, सभी कहते हैं, मेरी घड़ी ठीक चल रही है। ईसाई, हिंदू, मुसलमान सभी कहते हैं, मेरा धर्म ठीक है, परंतु माँ, किसी की भी तो घड़ी ठीक नहीं चल रही है। तुझे ठीक-ठीक कौन समझ सकेगा, परन्तु व्याकुल होकर पुकारने पर, तुम्हारी कृपा होने पर सभी पथों से तेरे पास पहुँचा जा सकता है माँ! तूने मेरी आँख की मैल साफ़ कर दी है माँ, सही राह दिखा दी है तेरी करुणा ने। ...
फिर प्रदोष के दिन शिव मंदिर की सीढ़ियों पर भावाविष्ट दशा में बैठा अपनी माँ से प्रार्थना की थी, ‘माँ , ईसाई लोग गिरजाघरों में तुम्हें कैसे पुकारते हैं, एक बार दिखा देना। परंतु माँ, भीतर जाने पर लोग क्या कहेंगे? यदि कुछ गड़बड़ हो जाए तो? गिरजाघर में जाने से काली मंदिर के पुजारी यदि रुष्ट होकर मंदिर का दरवाज़ा तेरे बालक के लिए बंद कर दें तो फिर गिरिजाघर के दरवाज़े के पास से ही दिखा देना माँ। ‘ और माँ ताली बजाकर हँसने लगी थी, ‘ख़ूब! शिव के दरवाज़े बैठकर गिरजाघर देखने की साध! ख़ूब! यही असली बोध है, इसे ही उन्मीलित नेत्र कहते हैं रे वत्स! सर्च रे मास्टर, अपने गहरे उल्लास से माँ ने अपने भीतू बालक को आश्वस्त कर दिया था। और गिरजाघर दिखा दिया एक दिन। जैसे एक दिन मेरी प्रार्थना से पसीजकर करुणामूर्ति जीसू के दर्शन कराए थे।
सच कहता हूँ, पहली बार तो उस दिव्य पुरुष के प्रभाव से मैं काँप गया था। वह यदु का घर दिखाया था न तुझे, वहाँ जब-तब जाता था। यदु नहीं रहता था तब भी कभी-कभार जाकर कुछ समझ बैठता था। एक दिन जीसू के चित्र पर दृष्टि गड़ी रह गई। वही चित्र जो तुझे दिखाया था। माता मेरी की गोद में शिशु जीसू की मोहिनी छवि। एकाएक देखता क्या हूँ मास्टर कि वह चित्र जीवित और ज्योतिर्मय हो उठा है। और देव-जननी मैरी और देव-शिशु ईसा के अंगों की ज्योति रश्मियाँ मेरे हृदय को अभिभूत करने लगीं और मेरे मन की दशा में आलोड़न शुरू हो गया। नैसर्गिक संस्कारों का लोप होने लगा और एक अपरिचित संस्कार मुझे दबाने लगा। पहले तो अपने को संभालने की कोशिश की पर जब नई संस्कार-ज्योति के प्रभाव से हारने लगा तो घबराकर अपनी माँ को हाँक लगायी, ‘माँ, तू आज मुझे यह क्या कर रही है? कहाँ ले जा रही है माँ? और वह हँस रही थी मास्टर! हताश होते बड़े ज़ोर से डाटा माँ को, ‘तेरा बेटा डूब रहा है और तू पागल की तरह ताली बजाकर हँस रही है!’ मेरी भाषा माँ से सही नहीं गई। हँसी पर विराम देते मुझे छोह से झिड़कना शुरू किया, ‘यह क्या रे! ईसा के लिए पागल बना था, आर्त्त होकर उस दिन उसको पाने की भीख माँग रहा था! वह मिला तो झोली में जगह नहीं बनाना चाहता, आतंकित है। छि:। तेरी कौन सी सम्पदा बिला रही है जो इस तरह काँप रहा है? संस्कार के संहार से डर रहा है? उसके मरे बिना दिव्य ज्योति को ग्रहण कैसे करेगा? इतनी सी बात नहीं समझता और प्रभु-पुत्र के साक्षात्कार की तेरी व्याकुल भूख! दिव्य ज्योति का मालिक बनना चाहता है? छि:! कूड़ा के प्रति इतना मोहासक्त है। संस्कार की ज़मीन को ढहते-डूबते देख कर इस तरह से काँप रहा है। आँख की मैल साफ़ कर, ज्योति का साक्षात्कार करना चाहता था। और सुन, कूड़ा कचरा में दिव्य चेतना नहीं उतरती। देख, यह प्रेम मूर्ति जीसू अपने साथ करूणा का सागर लिए तेरे सामने खड़ा है। इसमें डूब कर जीवन को धन्य कर। ‘ और मेरे भीतर बल रचकर माँ एकाएक अदृश्य हो गई। जाने किस लोक में ग़ायब हो गई कि मैं उसका नाम तक भूल गया। उसके मंदिर के सामने माथा पटकता रहा, पर न माँ दिखाई पड़ती और न तो उसका नाम मेरे कण्ठ से फूटता। प्रेमी योगी जीसू के सिवा मुझे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। केवल उसी की सुधि में डूबा रहता। हां रे मास्टर, जीसू की लहर ने ऐसा आबिद्ध कर लिया था कि कमरे की सारी देव-छवियों को बाहर निकलवा दिया। देख मास्टर, मेरी माँ का कौतुक! दिखाया उसने कि पादरी लोग गिरजाघर में ईसा की मूर्ति के सामने धूप-दीप जलाकर आर्र्त स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं। और मेरा भी राग उसी से जुड़ गया है। यह जो भाव तरंग माँ ने जगायी थी वह तीन दिनों तक मुझे बाँधे रही, मास्टर। उसके बाद पंचवटी में टहल रहा था। माँ ने अपूर्व दृश्य दिखाया। देखता क्या हूँ कि एक अपूर्व सुंदर ग़ौर वर्ण देव-मानव स्थिर दृष्टि से मुझे निहार रहा है और धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ता चला आ रहा है। चकित अभिभूत दृष्टि से उसे देखने लगा। समीप पहुँचते ही मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा, ‘ईसा मसीह!’ और उसने मुझे अपने आलिंगन में भरकर मुझे अपनी दिव्यता से सींच दिया। रोम-रोम पुलकित और क्षण भर में देश-काल का बोध मर गया। मैं महाभाव में प्रवेश कर सगुण विराट ब्रह्म के साथ एकीभूत हो गया। ईसा की दिव्य विभूति से तू सुपरिचित है मास्टर। माँ ने मुझे उसके सत्य का साक्षात्कार कराया था। सच मास्टर, वह दैवी प्रकाश जीव के यातना-मोचन के लिए मेरी की कोख से पृथ्वी पर उतरा था।
और मेरी माँ का अनुग्रह देख अपने बालक को उसके आलिंगन की दिव्य ज्योति में बँधने का सुयोग रच दिया था। और इसी प्रकार गिरजा दिखाने के पहले माँ ने अल्लाह की राह दिखाकर मस्जिद में दौड़ाया था। वह प्रसंग तो तुझे बताना ही भूल गया। बताऊँगा किसी दिन।...”