रविवार, 25 मई 2014

यह तो एक मामूली लहर की आकस्मिक झाँकी है ,असल जनादेश अभी बाकी है !



     भारत में अभी-अभी युगांतकारी  सत्ता परिवर्तन हुआ है।  वैचारिक और नीतिगत  नजरिये से यह परिवर्तन वेशक दक्षिणपंथी एवं पूँजीवादी कहा जा सकता है। किन्तु वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही वैयक्तिक या  दलगत  सत्ता परिवर्तन  के उपरान्त  भी  देश में एक उमंग और आशावादी लहर संचरित हो रही है।आवाम का यह क्षणिक  वर्चुअल  आशावाद महज एक आकस्मिक लहर की झाँकी है। असल जनादेश तो अभी भी बाकी है।   इस वर्तमान  जनादेश के पीछे छिपी अपेक्षाओं का विराट रूप इतना दयनीय   है कि उसे   'हाड-मांस 'का कोई'लौह पुरुष'या वीरोचित गुणों से सम्पन्न कोई खास  व्यक्ति तो क्या कोई ' दैवी -  चमत्कार 'भी युगों-युगों तक पूरा नहीं कर पायेगा। विगत दिनों चुनावी घमासान की  रश्मिरथियों  पर सवार मतदाताओं का आइन्दा जब भी  मोहभंग होगा तब वह किसी  'दल-बदलू'  नेता की मानिंद नहीं बल्कि लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी की तरह उसमें अपनी साझेदारी के बरक्स इस  सद्द विजयी निजाम को भी घर बिठाने में कोताही नहीं बरतेगा।
                        चूँकि किसी भी राजनैतिक व्यवस्था  का कालखण्ड अजर-अमर नहीं है । अतीत के अध्यन सहित - विश्व की तमाम आधुनिक राज्य-संस्थाओं और व्यवस्थाओं पर नजर डालें तो वेशक सामंतशाही  या तानाशाही का दौर भले ही कुछ दीर्घजीवी रहा हो. किन्तु लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का जीवन तो नितांत अल्पजीवी ही हुआ करता है।  इसलिए भारत में  अभी ताजातरीन चुनाव परणामों के बरक्स ठीक उसी की तर्ज पर  यह  भी  संभव है कि  आइन्दा  किसी दौर में  अंततोगत्वा जनता का 'वास्तविक जनादेश भी लोकतंत्र को पुष्ट कर दे। देश की प्रबुद्ध आवाम आइन्दा  किसी और दीर्घकालीन बेहतर परिवर्तन  के लिए  भी लालायित हो सकती  है। यह  भी  संभव  है  कि  बाज मर्तबा वह जनादेश और ज्यादा प्रतिगामी हो जाए या  किसी आत्मघाती   कबीलाई व्यवस्था की ओर फिसलता चला जाये। कभी यह भी  संभव है कि किसी दौर की चैतन्य पीढ़ी अपने दौर की  व्यवस्था को उखाड़ फेंके या  किसी तदनुरूप बेहतर प्रगतिशील उच्चतम क्रांतिकारी परिवर्तन को अपना लक्ष्य घोषित कर दे।तब वह न केवल अपने जातीय, भाषायी ,साम्प्रदायिक आर्बिट से बाहर आकर न   केवल अतिरिक्त राष्ट्रीय ऊर्जा का उत्सर्जन कर सकेगी बल्कि   सत्ता -परिवर्तन के  लिए  'व्यवस्था  - परिवर्तन'  के लिए भी तैयार हो  सकेगी ! आज के  उत्तर - आधुनिकतावादी, समाजशाश्त्री और राजनैतिक विश्लेषक  शायद अनुमान नहीं  लगा सकेंगे कि वर्तमान दौर का 'राजनैतिक परिदृश्य' तो आगामी दौर की  राजनैतिक यात्रा के पूर्व की एक प्रतिगामी  फिसलन मात्र  है।
                       वेशक अच्छे सपने देखने -दिखाने  वाले  और उन्हें पूरे करने के लिए आत्मोत्सर्ग की बात करने वाले ,सर्व समावेशी विकास और गुड गवर्नेस की बात करने वाले नीतिविहीन और आधारहीन  तथ्यों पर हवाई महल बनाने की  हद तक अतिश्योक्तिपूर्ण वाग्मिता के लिए तो अवश्य ही  जिम्मेदार हैं। वरना कौन नहीं जानता कि केवल लच्छेदार भाषणों से  चुनाव तो जीते जा  सकते हैं किन्तु सूखा पीड़ित ,ओला-पाला पीड़ित किसान के परिवार का ,बेरोजगार गरीब -मजदूर का ,निजी क्षेत्र में लगभग गुलामी की हद तक १२ से १८ घंटे काम करने वाले  आधुनिक युवाओं का  पेट नहीं भरा जा सकता। सेंसक्स बढ़ने ,रूपये और डॉलर की नूरा-कुस्ती तथा खर्चीले  'शपथ ग्रहण समारोह' की नाटकीय  भव्यता  से किसी अमीर के  आनंद में इजाफा तो हो सकता है किन्तु किसी गरीब भारतीय  की तकदीर नहीं बदल सकती । इन  'महानायकवादी'प्रदर्शनों से लगता है कि एक और नई गुलामी का जुऑ देश के मेहनतकशों पर लादा जाने वाला है। शायद  ही वे कह सकें किउनके  अच्छे  दिन आ गए  हैं। महज  भड़काऊ  - दिखाऊ,प्रशासनिक आडम्बरों से  भारत के करोड़ों ठेका -मजदूरों का,  बदनसीब अनाथ आबाल-बृद्धों का , पिछड़े इलाके की ग्रामीण जनता  का उद्धार  कैसे हो सकता है? इस तरह के अपव्ययी आडम्बर से निर्धन  भारत की वास्तविक  तस्वीर   कैसे बदल सकती है? ऊँचे सिंहासन चढ़ने वाले यह अवश्य  स्मरण  रखें कि उनकी  इस विजय के हक में केवल देश के ३१% मतदाता ही  उनके सहयात्री रहे  हैं। बाकी के ६९% मतदाताओं  ने  अर्थात वास्तविक बहुमत आवाम ने तो उस  बिखरे हुए विपक्ष को ही  वोट किया है जो मर्मान्तक  हार  से आक्रान्त है।  यही तो भारतीय लोकतंत्र की बिडंबना ही है कि  न केवल इस बार बल्कि अनेकों बार इसी तरह बेहतरीन 'वोट मैनेजमेंट ' और तात्विक ध्रवीकरण  के जरिये संसद में बहुमत  पाने वाले विजेताओं ने जनता का वास्तविक जनादेश शायद ही कभी प्राप्त किया हो!संसदीय संख्या में अप्रत्याशित सफलता और स्पष्ट बहुमत पाने वालों को भी अभी  वास्तविक चुनावी विश्लेषण की दरकार है। 
                   इस १६ वीं लोक सभा के चुनाव में भाजपा ने भले ही अपने बलबूते २८३ सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल किया है। किन्तु यह भी काबिले गौर है कि ५४५ में से २८३ सीटें पाकर भी कुल मतदाताओं कामात्र  ३१% वोट ही उसे  प्राप्त  हुआ है।  यह तो  कांग्रेस की बदमिजाजी  और बदकिस्मती का परिणाम है कि १९.३ % वोट पाकर भी वह ४४ सांसद ही जिता  पाई है।  जबकि  २००९ के आम चुनाव में भाजपा को मात्र १८. ५ % वोट मिले थे और उसने ११६ सीटे  जीतीं थीं। इस बार कांग्रेस और भाजपा दोनों का सम्मिलित वोट  टोटल मतदाताओं का %५० से कम ही है. जबकि  गैरकांग्रेस और गैर भाजपा दलों अर्थात लेफ्ट,और अन्य दलों   को मिले  कुल  वोट ५०% से अधिक हैं फिर भी वे आपसी अलगाव और विचारधारात्मक मतैक्य के कारण  संसद की सीटों में संतोषजनक आंकड़ा प्राप्त नहीं कर सके। यह स्मरणीय है कि  इस आम चुनाव  में १० मतदाताओं में से केवल  ४ ने ही एनडीए को वोट किया है ।  'संघ परिवार ' का अथक परिश्रम ,स्वामी रामदेव का 'भारत स्वभिमान ',मोदी जी के मीडिया मैनेजर्स , राजनाथसिंह ,अमित शाह जैसे कद्दावर नेताओं की मेहनत  और स्वयं  मोदी जी की सतत आक्रामक -मैराथन चुनाव सभाओं  के साथ-साथ  - देश  - विदेश के साधन  सम्पन्न अभिजात्य वर्ग  का तन -मन -धन से समर्थन होने के वावजूद यदि भाजपा को मात्र ३१% वोट  ही मिल पाये हैं. तो यह उनके लिए भी चिंतनीय है। वेशक सीटें २८३ मिल गई हों ! किन्तु  क्या यही  वास्तविक जनादेश है ?यदि नहीं तो यह सभी के सोचने का विषय है। यदि ६९% वोट पाकर भी कांग्रेस ,लेफ्ट और  शेष गैरभाजपा दल  बारहबाँट हो चुके हैं और सब मिलकर भी २५० सीट नहीं प्राप्त कर सके तो यह हरल्लों की  चुनावी चूक नहीं तो और क्या है ?क्या यह  भारतीय लोकतंत्र की बिडंबना नहीं  है ? हालांकि इस पूंजीवादी संसदीय प्रजातंत्र में इस तरह की  हार जीत को अंतिम सत्य किसी  ने कभी नहीं  माना ! १९८४ में भाजपा को १८ % वोट मिले थे जबकि उसे  मात्र दो सीटें ही मिली सकीं  थीं । लेफ्ट का तो आजादी के बाद से ही देश में बोलवाला रहा है। अभी भी उसकी मैदानी ताकत ज्यों की  त्यों बरकरार है। केवल गफलत यह हुई की वोट %बढ़ाने के वाबजूद सीटसंख्या नहीं बढ़ा सके। त्रिपुरा में माकपा को शानदार विजय मिलीहै। केरल में संतोषजनक सीटें मिली है।  केवल बंगाल में गच्चा खा गए। इसमें सारा कसूर केवल वाम का ही नहीं है । ममता  और उसकी तृणमूल गुंडा वाहिनी ने बंगाल  में जो पोलिंग बूथ केप्चर किये  हैं ,नृसंस  हत्याएं कीं हैं वे भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और   शर्मनाक हैं। ममता ने बांग्लादेश के घुसपैठियों को केवल वोटर मानकर महज अपनी जीत के लिए नरेंद्र मोदी  को भी जरुरत से ज्यादा हौआ बनाकर पेश किया। इसी वजह से बंगाल केशतप्रतिशत  मुसलमान ममता  को मुस्लिमों का रक्षक मानकर तृणमूल  को जिताने में जुट गए।  यदि वामपंथ ने  भी ओरों की तरह जाति -धर्म यासामाजिक  ध्रवीकरण की  घटिया राजनीति की होती तो शायद वे भी  बंगाल में ३०-३५ सीटें आराम से जीत जाते। संसद में भले ही कमजोर हों किन्तु संघर्ष के मैदान में वामपंथ अभी भी शेर है।
                      हालाँकि  यूपीए -२ की नाकामी,हद दर्जे के 'ढीले' प्रधानमंत्री मनममोहनसिंह का प्रधानमंत्रित्व तथा 'आम आदमी पार्टी 'का भृष्टाचार उन्मूलन राग भी एक महत्वपूंर्ण फेक्टर है जिसने भाजपा और मोदी जी का काम आसान किया है। महँगाई ,भृष्टाचार और मीडिया द्वारा निर्मित वर्चुअल इमेज ने भी  कांग्रेस सहित अन्य   स्थापित दलों का पाटिया उलाल किया है।  मौजूदा दौर में यह अत्यंत आवश्यक  है कि  जब तलक  व्यवस्था परिवर्तन का सवाल देश के 'बहुमत -जन'को आंदोलित नहीं करता तब तलक इसी व्यवस्था के अंतर्गत 'क्रांति के मूल्यों ' की सुरक्षा उसी तरह जरूरी है जैसे  कि दुर्भिक्ष्य काल में भी किसान अपने 'बीजों' की  प्राणपण से सुरक्षा करता है।

        श्रीराम तिवारी    

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