शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

करे धरती श्रृंगार ,दिन वासंती चार!


  पुरवा हुम -हुम करे ,पछुवा गुन -गुन करे ,

  ढलती जाए शिशिर की जवानी हो।


  आया पतझड़ का दौर ,झूमें आमों में बौर ,

  कूँकी  कुंजन में कोयलिया कारी हो।


  उपवन खिलने लगे ,मन मचलने लगे ,

  ऋतु फागुन की आई सुहानी हो।


  करे धरती  श्रृंगार ,दिन वासंती चार,

   अली करने लगे मनमानी हो।


  फलें -फूलें दिगंत ,गाता  आये वसंत ,

  हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो।


               श्रीराम तिवारी

      


 

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