'' उत्तरप्रदेश सरकार यह सुनिश्चित करे कि आगामी शैक्षणिक सत्र १५-१६ से प्रदेश के समस्त सरकारी और सार्वजानिक उपक्रमों के कर्मचारियों /अधिकारीयों /स्टेकहोल्ड्र्स /सरकारी अनुदानप्राप्त संस्थान में कार्यरत अधिकारीयों/कर्मचारियों के पुत्र/पुत्रियों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाये जाने की अनिवार्यता लागू करे "
प्रस्तुत आदेश कल १८ अगस्त -२०१५ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित किया गया है।माननीय न्यायालय के इस क्रांतिकारी फैसले का सम्मान न केवल उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए ,अपितु देश की सभी राज्य सरकारों द्वारा और केंद्र सरकार द्वारा भी स्वतः संज्ञान लेकर अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो संसद द्वारा भी संविधान में उचित संशोधन किया जाना चाहिए।
कोर्ट का यह वर्डिक वेशक नीतिगत है। किन्तु जब नियत साफ़ हो तो उसे यथासम्भव कानूनी जामा पहनाये जाने में भी कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए !इस निर्णय को लागू किये जाने से शिक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी और दूरगामी सुधार अपरिलक्षित होंगे !निजी क्षेत्र की अंधाधुंध लूट , मध्यप्रदेश के व्यापम-डीमेट जैसे फर्जीवाड़े , समाज में गरीब-अमीर का अलगाव और सामाजिक - आर्थिक-विषमता का भयानक रौद्र रूप, इन सबसे देश को कुछ तो राहत अवश्य ही मिलेगी। इस दौर की यह बेहद राजनैतिक -सामाजिक बिडंबना है कि जो लोग कभी सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं ,बे सुर्खरू होकर देश के राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री भी हो चुके हैं। किन्तु सरकारी स्कूल में ही पढ़कर सरकारी सेवाओं में सरकार से बेहतर वेतन ,भत्ते और सुविधायें पाने वाले शिक्षक भी अब अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूल /कालेज में पढने भेज रहे हैं । सरकारी शिक्षण संस्थान की दुर्गति करने वाले देशद्रोही तत्वों ने न केवल शिक्षा का सत्यानाश किया है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को भी निजी क्षेत्र - कार्पोरेट लाबी के हाथों में सौंपकर देश की वर्तमान साधनहीन युवा पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय बना दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला देश की शिक्षानीति को मांजने का सबब बने !
नागपंचमी की शुभकामनाएं !
श्रीराम तिवारी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें