गुरुवार, 10 मार्च 2011

यू. पी. की जनता नये सामंती शिकंजे में-.. यौर ओनर की नज़रें इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी...

हम भारतवासी सदियों की गुलामी से तो आजाद हो गए किन्तु गुलामों जैसी मानसिकता से छुटकारा पाने के लिए ६४ वर्ष पर्याप्त नहीं हैं. जिन से उम्मीद बनी थी कि ये दमित-शोषित-पीड़ित समाज का उत्थान करेंगे वे 'माया' के वशीभूत होकर अनीति,अलोक्तान्त्रिकता और अमानवीयता के अलमबरदार बन चुके हैं. बागड़ ही खेत चर रही हो तो क्या कीजियेगा? कविवर मुकुटबिहारी 'सरोज' कि चार पंक्तियाँ प्रासंगिक हैं ;-


ये दर्द नासूरी है / इलाज जरुरी है /चीरफाड़ जरुरी है /

लोग कहेंगे कि ये तो हिंसा है /पर क्या करें मजबूरी है /

उत्तरप्रदेश में लोकतंत्र और मानवीय मूल्य खतरे में हैं. मायावती जैसी पद-लोलुप, नलोलुप और दंभ-लोलुप महिला को यू पी कि सत्ता में बिठाने के लिए कांग्रेस ,भाजपा, सपा और बसपा तो जिम्मेदार हैं ही , यू पी कि जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है. कांग्रेस इसलिए जिम्मेदार है कि आजादी के बाद उसे पूरे ४५ साल मिले थे यू पी पर राज करने के लिए ,किन्तु उसने वर्गीय समाज को समतामूलक और आर्थिक रूप से सशक्त करने के बजाय सिर्फ सत्ता कि सीढ़ी ही समझा, अतएव आफत कि मारी जनता ने जातीयतावादी ,साम्प्रदायिक ताकतों को क्रमशः आजमाया.

जब दलितों और पिछड़ों को लगा कि वे कांग्रेस के हाथों छले जा रहे हैं , तो उन्होंने लोहियावादियों को, आंबेडकरवादियों को भी सत्ता में मौका दिया ,पहले मुलायम और फिर भाजपा ,फिर मुलायम जब इन सबने निराश किया तो अब फिर माया .इस तरह यू पी ने "सब कारे आजमा लिए"अतेव आज यू पी में तारीफ के लिए सिर्फ दो चीजें बची हैं एक-पोलिस का आतंक और दूसरी -महिलाओं पर अत्याचार. सर्वाधिक अत्याचारों के लिए मायावती का नाम इतिहास में दर्ज किया जायेगा. एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के सबसे अमीर और भृष्ट मुख्यमंत्री का नाम है- मायावती और सबसे ईमानदार और कम पैसे वाला मुख्यमंत्री है -बुद्धदेव भट्टाचार्य.

विगत ९ मार्च -२०११ को उत्तरप्रदेश सरकार के खिलाफ सपा के आन्दोलन पर पुलिस अत्याचार देखकर जिसके रोंगटे खड़े न हों वो ही मायावती को सहन कर सकता है. लोकतान्त्रिक और अहिंसक आन्दोलन को जलियांवाला बाग़ कि तर्ज पर घेर कर क्रूरतापूर्वक पुलिसिया बूटों से लोगों को कुचला गया, उन्हें घसीटा गया और इस हरकत में आला-अफसर बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे -मानो मायावती के कृपा-कटाक्ष के लिए ही ये सब वीभत्स दमनात्मक कार्यवाही कि गई हो.



जिस प्रदेश के आई ए एस इतने गिरे हुए हों कि भ्रष्टतम नेताओं या नेत्रियों के जूते साफ़ करना अपनी शान समझते हों , जिस प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी बसपा के बाहुबली नेता बलात्कार और हत्याओं के कीर्तिमान बना चुके हों ,जिस प्रदेश कि मुख्यमंत्री करोड़ों कि माला पहनकर देश और प्रदेश कि नंगी-भूखी गरीब जनता को कीड़े-मकोड़े समझकर पुलिस के बूटों तले मसले जाने योग्य समझती हो उस प्रदेश पर अब माननीय उच्चतम न्यायालय कि कृपादृष्टि ही अपेक्षित है . क्योंकि केंद्र कि मजबूर सरकार के सामने सौ अफ़साने हैं. निस्संदेह मायावती ने न केवल भृष्टाचार के नए कीर्तिमान गढ़े हैं,बल्कि शोषण-दमन और आतंक की वे पर्याय बन चुकी हैं. इसके लिए यू पी कि जनता भी जिम्मेदार है किन्तु यू पी की जनता यदि देश का इतिहास बदल सकती है तो अपने प्रदेश कि भी किस्मत बदलने का वह जरुर अवसर देख रही है. तब तक भारत कि न्यायिक सक्रियता का एक नमूना यू पी के मदमस्त नेताओं और नौकरशाहों को जरुर दिखाया जाना चाहिए. कवन सौ काज कठिन जगमाहीं ....माननीय 'यौर ओनर' की नजरे इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी............ श्रीराम तिवारी

2 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है आपने .जनता स्वामी ही जिम्मेदार है इस गैर जिम्मेदार सरकार को गद्दी पर बैठने में.

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  2. janta par poora dosh dalna uchit nahi hai.janta ke pas koi uchit vikalp na hone ke karan hi is prakar ki paristhiti bani hai.sabhi lagbhag ek jaise hai so sapnath so nagnath ab janta kya kare.

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