शनिवार, 5 मार्च 2011

कूड़ेदान से अन्न बीनते , स्वर्णिम देश के बॉल गोपाला {कविता}

     एक हैं कोई शख्स जबरदस्त , शाहिद उस्मान  बलवा .
     चोरी -चोरी   सीना -जोरी ,  स्पेक्ट्रम ले गया ठलवा..
      कभी एक अंटी न थी जेब में , अब खा रहा है  हलवा .  
     पूँजी के लुटेरों ने दिखाया , भृष्टाचार का जलवा ..

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      आजकल मीडिया में कुख्यात है ,
      हसन अली खां घोड़ेवाला.
       अरे ये तो राजा का भी बाप निकला ,
      अरबों का करे घोटाला ..
       सत्ता जिसकी करे चाकरी ,
      काले धन का करे हवाला .
      यदि न्यायपालिका सजग न होती ,
      तो कोई नहीं था टोकनेवाला ..
      हतभागी ये  मंत्री  संतरी ,
      चोर -उचक्के  जीजा -साला .
       मुल्क के मालिक हुए भिखारी ,
       जान लेय सो जाननहारा..
       खाद बीज के दाम चौगुने,
        फसल पै पड़ता सूखा पाला. 
         कूड़ेदान से  अन्न बीनते   ,
         स्वर्णिम देश के बाल-गोपाला..
       
           श्रीराम तिवारी
        

1 टिप्पणी:

  1. हकीकत बयान करती कविता है.इसी प्रकार की घटना पर मेरे ब्लाग में 'इन्सान केन्ने जा रहल बा' भोजपुरी में है.

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