सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

गोधरा कांड के लिए कौन ज़िम्मेदार है? यह तय होना बाकी है ....

  जैसा की दार्शनिक, चिन्तक कहते आये हैं और प्रकारांतर से साइंस ने भी उस पर प्रमाणिकता कि मुहर लगा दी है कि बिना क्रिया के प्रतिक्रिया संभव नहीं.यह सिद्धांत लेकर हम यदि गोधरा काण्ड कि असलियत और उससे सबक सीखते तो उस  काण्ड में जो दिवंगत हुए उन्हें , और पूरे गुजरात  भर में  जो तात्कालिक  प्रतिक्रियात्मक हिंसक-दंगों में काल के ग्रास बने उनको सच्ची श्रद्धांजली अर्पित होती.
              क्या यह स्वाभाविक उत्तेजना में आकर किया गया दुष्कृत्य था ? क्या यह सोची समझी साम्प्रदायिक प्रतिक्रिया थी ? क्या यह महज मानवीय त्रुटिवश  हुई लोमहर्षक घटना थी? क्या यह महज इत्तफाक था कि आधा सैकड़ा से कुछ ज्यादा जाने रेल-बोगी समेत जल जाने से हुईं ? इनमे से किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने में नौ साल भी कम क्यों पड़ रहे हैं ? हालाँकि विशेष अदालत ने गोधरा रेल-काण्ड को साजिश मान लिया है. २७ फरवरी २००२ को अयोध्या से साबरमती  जा रही एक्सप्रेस गाडी  में अधिकांश कार सेवक ही थे .उस बीभत्स अग्निसंहार में जो ५८ लोग मारे गए ;उनकी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है ?देश कि जनता को यह हकीकत जानने की भरसक कोशिश करनी होगी . जो लोग मारे गए उनमें महिलायें और बच्चे भी थे.
विशेष-अदालत ने ३१ अभियुक्तों को दोषी माना है . ६३ लोग बरी किये गए हैं. जो अभियुक्त ठहराए गए वे उपरी अदालत में जाने का प्रयास अवश्य करेंगे. सबूतों के आभाव में जो छोड़े गए वे भी न्याय का दरवाजा खटखटाएंगे और मांग कर सकते हैं कि जब हम बेक़सूर थे तो ९ साल तक हमें जेल में क्यों रखा गया ? वास्तविक अपराधी खोजने में इतना वक्त क्यों लगा की उनमें से कई एक का परिवार तबाह  हो चूका है? कई एक का कारोबार और नौकरी जा चुकी है ,और कई एक के तो जेल में रहने से उनके परिवारों को लोकनिंदा समेत चौतरफा संकटों का सामना करना पड़ा है. जेल से रिहा हुए इन ६३ लोगों को अब नए सिरे से आजीविका तलाशनी होगी . वैसे भी उनके माथे पर ९ साल की जेल का ठप्पा तो लग ही गया है . यदि ये ६३ लोग निर्दोष हैं तो इनका जीवन बर्वाद करने वाले उन अफसरों और जिम्मेदार एजेंसियों पर कोई कठोर कार्यवाही क्यों नहीं होंना चाहिए ?
हादसा और साजिश में कोई फर्क नहीं लगता ,जिस तरह साजिश के पक्ष में सबूत जुटे उस तरह के तर्क इसके विपरीत की अवस्था में भी दिए जा सकते हैं .अभी तो यह प्रारम्भिक फैसला है , कोई आश्चर्य नहीं कि आगे कि ऊँची अदालतों में भारी चौंकाने   वाले निर्णय भी दिए जा सकते हैं . हो सकता है कि कोई बड़ी अदालत इसे साजिश मानने से ही इनकार कर दे .ये भी हो सकता है कि पूर्व में नामजद सभी ९० लोगों को इस बात के लिए दोषी करार दे कि साम्प्रदायिकता के  भावात्मक उन्माद में आकर उन्होंने रेल के डिब्बे में आग लगा दी थी और ५९ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था  .इन सभी संभावनाओं का कारण है कि नानावटी कमीशन कि रिपोर्ट  पर आधारित इस फैसले  को बनर्जी कमीशन कि रिपोर्ट के सापेक्ष कूट-परीक्षण से गुजरना अभी बाकी है .बनर्जी कमीशन ने क्या रिपोर्ट दी थी या उसके निहतार्थ क्या हैं ?यह सब जानने के लिए उस पर उच्च न्यायालय के बहु-प्रतीक्षित फैसले का सबको बेसब्री से इन्तजार है .
       
                                                                   श्रीराम तिवारी

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय का.
    कृपया इस अखबार को हटा दें ,जैसे ही लेख पड़ना शुरू करते हैं यह उसको धक् लेता है.में कंटेंट्स नहीं पढ़ सके.फिर भी आपका कहना सही है कि,क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है.

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  2. Mathur ji krupaya batae- aap kaun se akhbar(akhbar ka naa) ki baat kar rahe hai. Hum apni pratyek nai post me aisa kuchh nahi kar rahe hai. Krupaya apna computer check karae, aisi shikayat aap ke alawa kahi se nahi hai... Shriram Tiwari

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