सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

२३ फ़रवरी को देश के मेहनतकशों का विशाल पार्लियांमेंट मार्च....

          भारत के  संगठित और असंगठित क्षेत्र का कारखाना  मजदूर-भूमिहीन खेतिहर मजदूर -सरकारी क्षेत्र के मजदूर - सार्वजानिक उपक्रमों के मजदूर ,कर्मचारी   -छात्र -बेरोजगार  नौजवानों की राष्ट्रीय अभियान समिति ने विगत ७ सितम्बर की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के दौरान केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी कि उनके सुझावों-प्रस्तावों पर अमल नहीं किया गया तो आगामी दिनों में संघर्ष तेज होगा , उसी कि अगली कड़ी के रूप में २३ फरवरी -२०११ को लाखों मेहनतकशों ने  पार्लियामेंट मार्च में शिरकत करने कि तैयारियां प्रारम्भ कर दी हैं.
    केंद्र    सरकार कि कार्पोरेट घरानों से यारी अब किसी से छिपी नहीं है. उसी के नक़्शे  कदम पर अधिकांश  राज्य सरकारें भी इकोनोमिक रिफोर्म के नाम पर देश कि सम्पदा दोनों हाथों से सरमायेदारों कि तरफ खिसका रहीं हैं,  इन राजनीतिज्ञों कि हिम्मत इतनी बढ़ती जा रही थी कि न्यायपालिका और मीडिया ने यदि सजगता नहीं दिखाई होती तो भारत को इथोपिया या सूडान बना डाला होता. देश का मजदूर-वर्ग सरकर की जन-विरोधी तथा मेहनतकश विरोधी-नीतियों के खिलाफ
एक बड़े संघर्ष के लिए जोरदार तैयारियां कर रहा है. सभी केन्द्रीय श्रमिक संघों ने २३ फरवरी-२०११ को संसद मार्च का आह्वान किया है .
                                                  आजकल विपक्ष के एन डी ऐ और वामपंथ दोनों ही सत्तापक्ष को नाकों चने चबवा रहे हैं ,ये तो उनकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी  है ,किन्तु गैर राजनीती  का दावा करते रहने वाले कुछ मौसमी स्वनाम-धन्य सामाजिक कार्यकर्ता और इक्का -दुक्का बाबा -जोगी लोग भी भ्रष्टाचार  ख़त्म करने के लिए खूब जोर-जोर से व्यवस्था को कोष रहे हैं,  ईमानदारी का ढिंढोरा पीट रहे हैं .वे अरब देशों में फ़ैली बदलाव की लहर को क्रांति बताकर जनता को बरगला रहे हैं .मुख्यधारा का मीडिया भी जान बूझकर लफ्फाजों को तो हाईलाईट करता है किन्तु देश के मेहनतकश-मजदूर -किसान जब यही मुद्दे  वर्षों से उठाता रहा तो जानबूझकर नजर अंदाज किया गया .
         विभिन्न राज्यों और फेडरेशनो की ओर से दिल्ली कूच की तैयारी के समाचार मिल रहे हैं .ऐसा संकल्प व्यक्त किया गया है कि श्रमिक-संघों द्वारा आहूत 'संसद मार्च' देश के इतिहास में मील का पत्थर बनने जा रहा है .श्रमिक संगठनो ने जो मुद्दे उठाए  हैं वे देश कि ८० फीसदी जनता के हितों के पक्ष पोषक साबित  होंगे.
      उनका नारा है ....
  ' क्या मांगे मजदूर किसान ?'
    'रोटी -कपडा -और मकान' ......ही नहीं है वे इससे से काफी आगे जा चुके हैं .आर्थिक उदारीकरण ने पूँजी का तो भूमंडलीकरण स्वीकार किया किन्तु श्रम के वैश्वीकरण किये जाने पर अपने-अपने कुकर्मों का दुष्परिणाम भोग रहे पश्चिम के पूंजीवादी राष्ट्रों को आपति है ,वे तीसरी दुनिया समेत तमाम अविकसित निर्धन राष्ट्रों को अपने उत्पादों को  पाट डालने को आमादा तो है ,किन्तु इन गरीब मुल्कों के कामगारों को अपने यहाँ काम देने से इनकार कर रहे हैं, फिर भी भारत जैसे उत्तमकोटि की  विकास  दर वाले राष्ट्र अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ हो रहे हैं  .इसी आर्थिक तानाशाही ने दुनिया भर में कुहराम मचा रखा है. भारत में परिपक्व लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की अहिंसात्मक आजादी होनेसे  -प्रदर्शन ,धरनों और हडतालों के संघर्ष जनित अस्त्रों  की मर्यादित संघर्ष-विधा होने से लगातार धरना-प्रदर्शन-हडतालों-बंद इत्यादि से विपन्न वर्गों की आवाज पहले भी उठती रही है .
आज जो पैसे वाले धनाड्य बाबा लोग - बहती गंगा में हाथ धोने के लिए , देश के लिए ,समाज के लिए भ्रष्टाचार  के निरोध के  लिए बेताब हैं उनके पास कोई व्यवस्थापिक  विकल्प कहाँ है ? वे सिर्फ
 शासन -प्रशासन  को गरिया रहे हैं ,विदेशों में जमा काला धन उनकी आलोचना के केंद्र में आ चूका है, किन्तु वे देश की आम जनता को यह नहीं बताते कि कुएं में पडी भांग से निपटने कि क्या योजना है . दूसरी ओर देश कि मेहनतकश जनता और संघर्षरत गरीब किसानों कि ओर से केन्द्रीय श्रम-संगठनों  ने न केवल सड़कों पर संघर्ष किया अपितु अपनी बात कुछ ईमानदार सांसदों के मार्फ़त संसद में तो उठवाई ही बल्कि बजट पूरब विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किये जाने पर अपनी और से लगभग ३० सूत्रीय सुझाव पेश कर वर्तमान बजट सत्र के माध्यम से उनके अमल पर व्यवस्थापिका की भी नजरे इनायत का मशविरा दे दिया .
        मनरेगा का दायरा बढ़ाने, महंगाई पर काबू रखने ,असंगठित क्षेत्र के कामगारों को कानूनी सुरक्षा देने ,बैंक .बीमा, बी एस एन एल, गैल, तेल, स्टील ,पोर्ट ,बंदरगाह तथा कोयला क्षेत्र समेत देश के २५० सार्वजानिक उपक्रमों की रक्षा करने और जन-कल्याण मद में ज्यादा  वित्तीय प्रावधानों को तरजीह देने के लिए देश की सबसे बड़ी श्रमिक ट्रेड यूनियन सीटू के नेतृत्व  में -एतुक, एच एम् एस समेत अधिकांश श्रम-संगठन २३ फरवरी को संसद मार्च करेंगे .भाजपा समर्थित बी  एम् एस और कांग्रेस समर्थित इन्तुक इसमें शामिल नहीं हैं .
          श्रीराम तिवारी

1 टिप्पणी:

  1. हमारे अनेक साथी इसमें भाग लेंगे.मेरी शुभकामनाएं इस रैली की पूर्ण सफलता हेतु हैं.

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