- यदि कोई सभ्य सुशिक्षित मनुष्य 'भाववादी उटोपिया' की असफलताओं को समझना चाहता हो तो उसे विश्व मानव सभ्यताओं के इतिहास को वैज्ञानिक नजरिये से समझना होगा! मानव इतिहास में ऐंसा कोई भी धर्म-मजहब,पंथ,दर्शन या विचार नहीं है,जिसने अपने आपको स्थापित कराने में या दूसरों पर थोपने के लिए शक्ति का इस्तेमाल न किया हो ! भारत के वैदिक मन्त्रदृष्टा मुनियों ऋषियों,बौध्दों,जैनों,वैष्णवों और इस्लाम की सूफी धारा में भले ही 'अहिंसा परमो धर्मः' और 'अनलहक 'का जाप किया जाता रहा हो,किन्तु कट्टरपंथी अनु...यायीयों ,संरक्षकों शासकों और चक्रवर्ती सम्राटों ने अपने[अ ] धर्म के लिए अपने सहोदर भ्राताओं का खून बहाने में भी परहेज नहीं किया।भले ही बाद में अनगिनत लाशों को देखने के बाद किसी राजा या सेनापति को आत्मग्लानि हो गयी हो !और वह अपने बुढापे में अहिंसावादी' हो गया हो ! अतीत के भारत,चीन,और यूनान में आधुनिक लोकतांत्रिक बहस से भी बेहतर और सभ्य तरीके से पक्ष-विपक्ष के मध्य, विद्वान गुरुओं और उनके पट्ट शिष्यों के मध्य,प्रश्नोत्तर अथवा शास्त्रार्थ हुआ करते थे! धर्म और राजनीति के क्षेत्र में आलोचनात्मक मत व्यक्त करने का इतिहास आष्चर्यजनक रूप से बहुत पुराना है। किन्तु इस आलोचना अथवा 'मतखण्डन'को कट्टर पंथी इस्लाम ने और भारत के भाववादी -परम्परावादियों एवं स्वार्थी शासकों ने कभी पसंद नहीं किया।
गुरुवार, 28 जून 2018
धर्म और राजनीति !
मेरी नजर में आपातकाल !
- आपातकाल की घोषणा के एक माह पहले ही मैं सीधी से ट्रांसफर होकर गाडरवारा आया था! गाडरवारा आने के तीन महीने बाद ही मुझे चार्ज सीट दी गई कि आप 24 घंटे में चार्जसीट का जबाब दें!अन्यथा क्यों न आपको पी & टी विभागकी सेवाओं से बर्खास्त कर दिया जाये? आरोप था कि आप नाइट ड्युटी के दौरान टेलीफोन एक्सचेंज में ताला डालकर घर चले गए! चूँकि उस दिन तत्कालीन संचारमंत्री स्व.शंकरदयाल शर्मा किसी काम से,दिल्ली से जबलपुर जा रहे थे! और गाडरवारा रास्ते में पड़ता है!उनसे सौजन्य भेंट के लिये इंतजार कर र...हे रामेश्वर नीखरा और नीतिराजसिंह इत्यादि नेताओं तथा अफसरों को पता चला कि मंत्रीजी की गाड़ी गाडरवारा नही रुकी! तब उन्होंने तुरंत एक्सचेंज से संपर्क किया, किंतु वहां से कोई जबाब नहीं मिला!क्योंकि मैं नया नया ही था और नियमों से अनभिज्ञ भी,इसलिये रात्रि वहीं एक्सचेंज के विश्रामगृह में सो गया! यद्दपि आपातकाल की उस छोटी सी भूल की मुझे कोई सजा नही दी गई ! सिर्फ एक लाइन की चेतावनी दी गई!'आइंदा सावधान रहें' उस एक लाइन से सबक सीखकर मैने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से 40 साल ड्युटी की! फिर किसी नेता मंत्री-अफसर से कभी डरा नही!इस सावधानी और अपनी शानदार क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन में लोकल से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संघर्ष की बदौलत आगे बढ़ता गया! पूरे 5 प्रमोशन भी प्राप्त किये ! हो सकता है कि किसी को आपातकाल में कुछ नुकसान हुआ हो! किंतु मेरी नजर में तो आपातकाल कुछ तु्र्टियों के बावजूद वास्तव में अनुशासनविहीन भारतके लिये एक जरुरी अनुशासन पर्व ही था!इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को भारतमें आपातकाल लगाया,बुरा किया! तत्कालीन विपक्ष ने 1977 में जनता पार्टी बनाई और जीते भी !किंतु संघ और जनता पार्टी की दोहरी सदस्यता के सवाल पर सभी घटक आपस में लड़ मरे,बहुत बुरा किया!! 1980 में देश की जनता ने इंदिरा गांधी को पुनः जिता दिया! याने उस जनादेश के मार्फत जनता ने इंदिरा जी का आपातकाल वाला अपराध क्षमा कर दिया! यही वजह रही कि आपातकाल के बाद भी केंद्र में कांग्रेस नीत गठबंधन की सरकारें लगातार सत्ता में बनी रही!अब जो लोग आपातकाल के बहाने कांग्रेस को कोस रहे हैं वे दोगले हैं!
सोमवार, 25 जून 2018
दर्शन और उसकी पक्षधरता,,,कार्ल मार्क्स !
- मार्क्सवाद दर्शन की समस्याओं और उसके विविध रूपों को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि देता है।
- अक्सर धर्म दर्शन के विमर्श में दार्शनिक के सामने प्रश्न यह आता है कि ,,जड़ से चेतन पैदा हुआ या चेतन से जड़।
- ...
- एक तरफ वे हैं जो ,यह मानते हैं कि चेतन से जड़ पैदा हुआ। उनका मानना है कि कोई न कोई ऐसी शक्ति इस ब्रह्माण्ड में अवश्य है जिसने इस संसार की रचना की।वह परम शक्ति परम बुद्धिमान नैतिक और दोष रहित है।वह परम आत्मा है।उसका कोई रंग रूप नहीं है। चर अचर प्राणीमात्र उसका ही स्रजन है!
- इस मत की पुष्टि करने वाला दर्शन आध्यात्मवादी या आदर्शवादी या विचार वादी या प्रत्ययवादी के नाम से जाना जाता है।
- दूसरे वह लोग है,जो यह मानते हैं कि जड़ से ही चेतन की उत्पत्ति हुई है। क्षिति, जल,पावक,गगन समीर ,इन पांच तत्वों से जीव की रचनाहोती है। इस मत की पुष्टि करने वाला दर्शन भौतिकवादी कहा जाता है।अब तो बात इन पांच तत्वों से भी आगे जा चुकी है।इनको तत्व न मान कर सौ से अधिक मूल तत्वों की खोज हो गई है, जैसे ओक्सीजन ,हाइड्रोजन,लोहा आदि आदि।
- आध्यात्मवादी दार्शनिकों के लिए सुविधा की बात यह रही कि वह परमात्मा को रंग रूप रहित मान कर किसी भी तरह के स्पष्ट प्रमाण से मुक्ति पा जाते रहे हैं।
- भौतिकवादी दार्शनिकों के लिए असुविधा की बात यह रही कि जड़ से जीव के पैदा हो जाने की बात के कारण स्पष्ट प्रायोगिक प्रमाण की जरूरत को पूरा करने में वह अक्षम थे,इसलिए कि प्रारंभिक अवस्था का विज्ञान उसे सिद्ध करने में सक्षम नहीं था।
- इसके कारण सदियों तक दुनिया भर में आध्यात्मवादी दर्शन भौतिकवादी दर्शन पर भारी पड़ता रहा।किंतु समय के साथ बदलाव आया और भौतिकवाद आध्यात्मवाद पर भारी पद गया।
- अठारहवी उन्नीसवी सदी में विज्ञान अपनी युवावस्था में पहुंच गया।प्रयोगों के उपकरणों का विकास हो जाने से अनेक बातों को प्रमाणित किया जाने लगा।
- आम रूप से यह स्वीकार किया जाने लगा कि मनुष्य के शरीर में दिमाग है।यह भी जड़ है।दिमाग से विचार पैदा होता है ,न कि विचार से दिमाग।
- इसके बाद भी कई सवालों का जवाब भौतिकवाद को देना था और उसने उसे दिया।
'संघ परिवार' हिंदूधर्म और हिंदुत्व !
- अभी तक जितना अध्ययन मैने किया है, तदनुसार वेद,उपनिषद,गीता,रामायण और महाभारत में तो 'हिंदू'शब्द नही है!बहुत संभव है कि भारतीय उप महाद्वीप के आर्य, अनार्य,द्रविड शैव,वैष्णव शाक्त, गाणपत्य, जैन और बौद्ध मतों के साझे निष्कर्ष को 'सनातन धर्म' कहा गया है! और विदेशी हमलावरों ने ही इस उपमहाद्वीप के जन्मना निवासियों को हिंदू कहा होगा!जहां तक धर्म के रूप में 'हिंदू' शब्द की उत्पत्ति का सवाल है,भारतमें इस्लामके आगमन पर 'सिंधु'शब्द के फारसी उच्चारण से यह उत्पन्न हुआ है। यह सब जानते हुये भी 'संघ परिवार' हिंदूधर्म और हिंदुत्व के नाम पर सत्ता की राजनीति कर रहा है ! कुछ प्रगतिशील लोग भी जाने अनजाने धरमांधता पर चोट करने के बजाय हिंदू धर्म को निशाना बनाते रहते हैं, इससे संघ को खाद पानी मिलता रहता है और उसकी आनुषंगिक राजनैतिक पार्टी भाजपा की खेती भी भरपल्ले से चल रही है!
रविवार, 17 जून 2018
'राज्य' और उसकी सरकार विषयक कार्ल मार्क्स के विचार -
मार्क्सवाद राज्य के उद्देश्य और सरकार के उद्देश्य,सरकार के संगठन, तथा उसके विविध रूपों को समझने की दृष्टि देता है।
मार्क्सवाद यह बतलाता है कि राज्य समाज के ऊपर जरूर होता है किन्तु विकास की एक मंजिल पर समाज की ही उपज है।
राज्य की उपज तब हुई जब समाज स्वामी और दास नाम के दो परस्पर विरोधी हित समूहों या वर्गो का जन्म हुआ।
कोई ख़ुशी खुसी दूसरों के लिए जी तोड़ मेहनत करे यह नहीं हो सकता। दासों को दबा कर ही उनसे काम लि...या जा सकता था।
दासों को दबा कर रखने के लिए स्वामियों ने जिस व्यवस्था को जन्म दिया उसका नाम है ,,राज्य,,।
इस तरह राज्य का जन्म उत्पादन के साधनों के स्वामित्व से रहित वर्ग को दबा कर रखने की स्वामी वर्ग की आवश्यकता के कारण हुआ।
इस तरह राज्य का मूल उद्देश्य उत्पादन के साधनों के स्वामी वर्ग के हाथ में स्वामित्व हीन वर्ग को दबा कर रखना है।इसका जो उद्देश्य इसके जन्म के समय था,वहीं आज भी है और यह जब तक जिंदा रहेगा वहीं रहेगा।
इस तरह राज्य दमन का हथियार है।और इसकी प्रकृति तानाशाही की होती है।क्योंकि तानाशाही के स्वभाव के बिना किसी का दमन नहीं किया जा सकता।
इतिहास का पहला राज्य स्वामी वर्ग का ,दूसरा सामंत वर्ग का था और तीसरा पूंजीपति वर्ग का और चौथा सर्वहारा वर्ग का है।
अत: राज्य चाहे जिस वर्ग का हो तानाशाह राज्य ही होता है।
हां सरकारें तानाशाही या लोकतांत्रिक कोई भी हो सकती हैं।
मार्क्सवादी दृष्टि उस आदर्शवाद या प्रत्ययवाद को अमान्य करती है जो राज्य को नैतिक,निर्दोष,कल्याणकारी ,पवित्र,प्राकृतिक और ईश्वर का पृथ्वी पर अवतरण मानती मनवाती है।और यह सिद्धांत देती है कि,,राज्य एक अनिवार्य अच्छाई है।,,
मार्क्सवादी दृष्टि के लिए रास्ता पूंजीवादी दार्शनिकों ने भी बनाया था जिन्होंने निरंकुश राजाओं को चेतावनी देते हुए यह कहा कि राज्य प्राकृतिक नहीं कृत्रिम संस्था है और ,,,राज्य एक आवश्यक बुराई है।,, इसलिए राज्य को वाह्य प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा के अतिरिक्त समाज के किसी दूसरे काम में कोई दखल नहीं देना चाहिए।
शुक्रवार, 15 जून 2018
- स्वतंत्रता के भीषण रण में,आशाओं के दीप जले ।
धर्मनिपेक्ष-समाजवाद के ,लोकतंत्र के नीड पले ।।
जाति पाँति भाषा-मजहब के,जब शैतानी तीर पगे!
राजनीति की क्यारी में तब ,खरपतवार बबूल उगे।।
गिद्धबाज चमगादड़ डोलें,बोलें चमन हमारा है । ...
इसीलिये तो आधा भारत,भूँख प्यास का मारा है ।।
निर्धन युवकों का यौवन,अब खटता मारा मारा है ।
अमर शहीदों ने जो चाहा,क्या वह वतन हमारा है।।
श्रीराम तिवारी
- नास्तिकों की भावनाएं भी आहत होती है।
- (1) आस्तिक लोग बात बात में कहते रहते हैं कि हमारी भावना आहत हुई। कोई फिल्म बनी तो भावना आहत हुई। किसीने किताब लिखी तो भावना आहत हुई। किसी का नाम पार्वती खान है तो भावना आहत हुई। ऐसी कैसी है आपकी भावना जो बात बात में आहत होती रहती है !!!
(2) भावनाएं तो नास्तिक की भी होती हैं भावनाएं उनकी भी आहत होती हैं! जब किसी मंदिर में किसी नारी को देवदासी बनाकर उसका आजीवन शोषण किया जाता है,तब भावनाएं नास्तिक की भी आहत होती है।
(3) आस्था के नाम पर दूध ...और घी जैसे कीमती द्रव्यों का अपव्यय होता है और मंदिर के बाहर भूखे बच्चें भीख मांग रहे होते हैं और भगवान को 56 भोग लगाएं जाते हैं तब भावनाएं किसी नास्तिक की भी आहत होती हैं!
(4) संविधान में बताये गये सिद्धांतों के विरुद्ध आप अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं और सांसद की उम्मीदवारी का फॉर्म भरते वक्त घड़ी में 12.39 का समय का मुहूर्त देखते हैं तब भावनाएं विज्ञानवादियों कीभी आहत होती हैं!
(5) रथयात्रा हो या ताजिया जुलूस हो, आप रोड पर चक्काजाम कर देते हैं, तब किसकी भावनाएं आहत नही होती ? माईक पर धार्मिक ध्वनि प्रदूषण से लोग परेशान हैं लेकिन आपको किसी की फिक्र नहीं , भावनाएं औरों की भी हैं और आहत भी होती हैं।
(6) जब आप कलेक्टर, डॉक्टर या इन्जीनीयर बनकर अनपढ़ पंडित से पूछते हैं कि शादी का सही समय (मुहूर्त) क्या है ?तब भावनाएं ज्ञानियों की भी आहत होती हैं।
(7) शहर में हजारों लोग फुटपाथ पर सोते हैं और आप नये मंदिर के लिए जमीन का दुरूपयोग करते हैं। स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए जमीन और पैसा नहीं है, लेकिन मंदिर पर मंदिर आप बनाते जाते हैं, तब भावनाएं गरीबों मजूरों की आहत होती हैं।
(8) अच्छी पुस्तक,अच्छे विचार पढने के लिए आपके पास समय नहीं है,लेकिन अनपढ़ नेताओं के भाषण सुनने के लिए आपके पास समय है। माइक, टीवी,रेडियो, मोबाइल, कम्प्यूटर, इन्टरनेट का इस्तेमाल आप अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए करते हैं, तब भावनाएँ भगवान की भी आहत होती हैं। आस्तिकों की तरह नास्तिकों की भी भावनाएं होती है। आहत भी होती हैं। इसीलिये बिना पक्षपात सभी की भावनाओं की कद्र कीजिये!
- मोदी सरकार के पास अपने सैकड़ों वादे और हजारों जुमले पूरे करने के लिये अब सिर्फ एक साल बचा है! चूँकि उन्हेंअपने क्रतित्व पर भरोसा नही, इसलिये सरकारी खजाने का अरबों रुपये खर्च कर अनकिये को किया हुआ बताया जा रहा है! किसीभी जन निर्वाचित लोकप्रिय सरकार के लिए यदि संवैधानिक रूप से पांच साल का कार्यकाल उपलब्ध है,तो उसे अपना 'राज धर्म' भूलकर,अनावश्यक वितण्डावाद में नहीं पड़ना चाहिए ! उसे अपनी नीति -रीति और उपलब्धियों का रोज-रोज बखान करने की क्या जरूरत है ? किसी भी बेहतरीनऔर लोकप्रि...य सरकार के लिए,उसके द्वारा पांच साल काम कर चुकने के बाद, अपना कार्य दिखाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी! जनता के बीच अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने में अपना कीमती वक्त और जनता का अरबों रुपया बर्बाद करना देशभक्ति नही बल्कि देश द्रोह है! ये भारत की 'पब्लिक है सब जानती है'!अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा तो वे ही पीटते हैं ,जिन्हे खुद पर भरोसा नहीं !और अपने साथियों के सत्ता संचालन पर शक -सुबहा हो । जन असंतोष की आशंका उन्ही को हुआ करती है ,जिन्हे अपने राजनैतिक द 'रणकौशल ' पर भरोसा नहीं। प्रचार की जरुरत उन्ही को है जो सत्ता मिल जाने के बाद केवल जुमलों के ढपोरशंख ही बजाते रहे हैं। जो जनता को झूंठे चुनावी - वादों भाषणों,जुमलों तथा शिलान्यासों में भरमाते रहे हैं । जब कोई राजनेता या पार्टी आम जनता को बार-बार अपनी उपलब्धियां गिनाए, प्रिंट,इलेक्ट्रॉनिक तथा सोशल मीडिया पर धुआँधार प्रचार करे कि -जो कुछ किया हमने किया ,जो नहीं हो सका उसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है। और सारे गुनाहों के लिए पूर्ववर्ती सरकारें जिम्मेदार हैं। हमें तो अभी 5 साल ही हुए हैं ,अतः हे मूढ़मति मतदाताओं ! हमें सत्ता से मत उखाड़ फेंकना। क्योंकि 'हमसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं '! इस तरह की सोच वाले अहंकारी -पाखंडी नेता और पूँजीवादी दल अपराध बोध से पीड़ित हुआ करते हैं !इस तरह की आत्मभक्ति जैसी हरकतों पर 'चोर की दाड़ी में तिनका' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। सत्तापक्ष का यह आचरण निंदनीय है!
- सुबह हो या शाम हो जिंदगी पलपल बदलती जाती है।
रूहानी ताकत इस देह की माँग पूर्ति में गुजर जाती है।।
होगा सर्वशक्तिमान कोई और सर्वत्र भी होगा लेकिन,
न्यायिककी तुला उसकी ताकतके पक्षमें झुक जाती है।
अनंत ब्रह्माण्ड की शक्तियां कोटिक नक्षत्र चंद तारे,...
निहारती नीहारिकायें तटस्थ कोई काम नही आती है।
अब क्यों नही सुनाई देती आकाशवाणी कोई -हे मानव!
एक ही नूर से जग उपजाया,तत्त्वमसि-वयम रक्षाम:
ख्वाबों में कहा होगा -'सब मम क्रत सब मम उपजाये'
हकीकत में उसे सिर्फ बर्बर लुटेरोंकी दुआ ही सुहाती है।
गाज गिरतीहै सिर्फ कमजोर दरख्तों खंडहरों पर,
और सुनामी भी निर्बलों पर मुसीबत बनकर आती है! - *श्रीराम तिवारी
जातीय आधार पर आरक्षण-एक नजर !
कभी कभी कुछ लोगों का किसी कालगत सिद्धांत विशेष पर जबरन चिपके रहने का कोई औचित्य स्पष्ट नही हो पाता! भाजपा ने जब दलित राष्ट्रपति बनाया,दो दर्जन दलित कैबिनेट मंत्री बनाये,और जब सैकड़ों दलित पार्टी पदाधिकारी बना डाले!तब जातीयता आधारित विपक्ष के समक्ष भारी संकट आन पड़ा! लालू,माया,मुलायम,अखिलेश और अन्य दलित नेताओं को सोचना पड़ाकि उस तथाकथित शोषित समाज को जातीय आधार पर हमेशा के लिए अपना पिछलग्गू कैसे बनाये रखा जाये? भारत में शोषण उत्पीडन की असल तस्वीर सिर्फ वह नही जो तमाम हरल्ले दल चीख चीख कर बताते रहे हैं,अथवा संविधान निर्माता बता गये हैं! बल्कि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है! इसीलिये गौर से देखा जाये तो रामदास अठावले,रामविलास पासवान,उदितराज जैसे दलित नेता औरों की अपेक्षा ज्यादा ईमानदार और प्रगतिशील दिखाई देते हैं!आज भले ही वे पदलोलुप या मौकापरस्त समझे जाते हैं, किंतु एक वक्त के बाद वे इतिहास के हीरो भी माने जा सकते हैं!
इन पंक्तियों के लिखे जाने से पचास -साठ साल पहले के ठेठ ग्रामीण उत्तर भारत की व्यवस्था कुछ वैसी ही थी जैसी कि मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में और कहानियों में वर्णित है ! शेष कुछ वैसी थी जैसी कि 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल ने चित्रित किया है! तब भारत के कुछ बडे किसानों और भूतपूर्व जमींदारों के यहां ट्रेक्टर का आना, शहर से गांव की तरफ कच्ची सड़कों पर धक्कामार बसों का चलना,गांव के संपन्न आदिवासी हीरालाल सौंर (रावत) के घर 'कंडी घासन' बंदूक का आना,वैसे ही था जैसे तीर तलवार के जबाब में बाबर मंगोल का पानीपत के मैदान में तोपें लाना! हीरालाल को बंदूक में छर्रे,बारूद और कंडे के टुकड़े ठूंसते देख मैने उस बंदूकका नाम रखा था-कंडीधासन!उस जमाने में बंदूक की नली को लोहे की राड से धांसा जाता था! हीरालाल जी (आदिवासी) अपने सौंरयानै के प्रमुख थे और गांव की पंचायत के पंच भी थे! वैसै तो हीरालाल मेरे बड़े भाई की उम्रके थे,और मैं उन्हें दाऊ ही कहता था! उनके आदिवासी समाज में शादी जल्दी हो जानेसे बच्चे भी जल्दी हो जाते थे! उनका बड़ा लडका 'मुखल' मेरा हमउम्र था!आदिवासी होने के बावजूद उसका लालन पालन राजकुमारों की तरह होता था!जबकि कुलीन और ब्राम्हण पुत्र होने के बावजूद मैं पांच साल की उम्र में नंगे पैर खेतों पर जाने को मजबूर था! विद्वान होने के बावजूद यह स्थिति 'बाबा साहिब' क्यों नही देख पाये? ताजुब्ब है!कहने मात्र को हम सवर्ण ब्राह्मण थे किंतु किसीभी द्रष्टि से सिवाय पूजा पाठ के,वाकी सभी मामलों में हम गांव के पटैलौं (पिछडों)से और आदिवासी सोरों (रावत) से पीछे थे! हमारा संयुक्त परिवार बहुत बड़ा था और माली हालत ठीक नहीं थी!इसलिये हमें स्कूल से गैरहाजिर रहकर खेती किसानी के अलावा ढोर ,डंगर,जंगल और खलिहान के भी काम करने होते थे!जबकि हीरालाल आदिलीसी अपने कंधे पर कंडी धासन बंदूक टांगकर,घोड़े पर सवार होकर,शिकार खेलने जाते थे!कभी कभी वे अपने बेटे मुखल को भी बंदूक पकड़ा देते थे! जबकि हम सभी भाइयों को खेलने की तो क्या रोटी खाने की फुर्सत नही मिलती थी! सुबह शाम खेत और दिन में स्कूल और स्कूल से आकर हमें रोज गाय, बैल, भैंसों को चारा सानी देना होता था! इसके बाद रामायण गीता भी पढ़ना आवश्यक था! इसी दरम्यान जब कभी मेरा आदिवासी दोस्त 'मुखल' हमारे घर हम भाइयों को अंडाडावरी या कबड्डी खेलने का आमंत्रण देने आता तो वह पिताजी के कोप का भाजन बनता!पिताजी उसे डांटकर भगा देते कि 'तूं तो हिरण,तीतर,बटेर मार खायेगा, मेरे बच्चे क्या घास खायेगें !तब हीरालाल आदिवासी के पास खुद का कुआं भी था! जबकि हमारे पिताजी की खेती वाली जमीन असिंचित थी!ऐंसा नही था कि हर दलित आदिवासी हीरालाल जैसा संपन्न था,और ऐंसाभी नही था कि हर सवर्ण परिवार हमारे समकक्ष आर्थिक रूप से कमजोर था!वेशक असमानता तब भी थी और अभी भी है,किंतु उसका आधार जात पांत और धरम मजहब नही है! अपितु यह व्यवस्थागत दोष और वंशानुगत आर्थिक असमानता की वजह से ही विद्यमान है!
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