शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

UGC बिल के संदर्भ में

 मानाकि मोदीजी भाजपा और संघ सभी सवर्ण विरोधी हैं।किंतु कांग्रेस सपा और अन्य विपक्षी दल कबसे सवर्ण समर्थक हो गये?#UGC roll backआरक्षण और UGC बिल के संदर्भ में,यद्यपि आनंद रंगनाथन का यह आब्जरवेशन पूर्णतः सही है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही एक दूसरे से बढ़ चढ़कर आरक्षण समर्थक हैं।किंतु फिर भी भाजपा और कांग्रेस में बहुत बड़ा फर्क़ है। आमतौर पर कांग्रेस के नेता भृष्ट चरित्रहीन और देश के गद्दार हैं। वे सनातन धर्म विरोधी हैं,मुस्लिम -परस्त हैं। कांग्रेस का नेतृत्व पीढ़ियों से एक ही विशेष परिवार के कब्जे में है। वे मौकापरस्त हैं और कश्मीर को तो कांग्रेस ने लगभग बर्बाद ही कर डाला था। कांग्रेस इस्लामिक आतंकवाद और लव जिहाद का मुकाबला नही कर सकती।

जबकि भाजपा पर हिंदू सनातन समाज का परोक्ष नियंत्रण है। उसका नेतृत्व श्रेष्ठ राष्ट्रवादी कर्मठ और हिंदुत्ववादी ईमानदार नेताओं के हाथों में है। मोदी अमित शाह और योगी जैसे महापुरुषों पर जनता को पूरा विश्वास है। जय हिंद🙏 जय श्रीराम🙏 जय सनातन🙏

ब्राह्मण शक्ति एवं ब्राह्मणत्व को जगाने के लिए -त्याग तपस्या और बलिदान के नये कीर्तिमान स्थापित करें, अपनी वैश्विक श्रेष्ठता सिद्ध करें।

 यदि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम (क्षत्रिय), सोलह कलाओं के धारक भगवान् श्रीकृष्ण ( यादव), महर्षि बाल्मीकि ( दलित) चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त (दासी पुत्र) चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, समुद्रगुप्त (सभी वैश्य), संत सिरोमणी श्री रविदास जी ( मोची) गुरु गोविन्दसिंह जी (जाट सिख) स्वामी विवेकानंद ( कायस्थ ),स्वामी रामदेव (यादव),सम्मानित करणी सेना के पदाधिकारी (राजपूत),सोशल मीडिया एक्टिविस्ट सनातनी अंजलि यादव, सामाजिक एक्टीविष्ट -बंटी बादल ( चमार ), इत्यादि सभी समाजों के जाज्वल्यमान हिन्दू नर रत्न ब्राह्मणों का भरपूर सम्मान करते देखे गये।

अब ब्राह्मणों की भी जिम्मेदारी बनती है कि आरक्षण विवाद से दूर रहैं और देश दुनिया में अपनी ब्राह्मण शक्ति एवं ब्राह्मणत्व को जगाने के लिए -त्याग तपस्या और बलिदान के नये कीर्तिमान स्थापित करें, अपनी वैश्विक श्रेष्ठता सिद्ध करें।
जय श्री महाकाल🙏 जय माँ भवानी 🙏 जय भारत🙏 जय शिवाजी 🙏 जय महाराणा प्रताप 🙏जय भगवान् परशुराम 🙏जय सनातन 🙏
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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योग-योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण की बेढंगी तुलनात्मक व्याख्या और विवेचना अपराध है

 आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी #बागेश्वर_बाबा धन दौलत के लिहाज़ से देश में सबसे बड़े प्रवचनकर्ता हैं... लेकिन विद्याध्ययन और शास्त्रीय ज्ञान के लिहाज़ से सामान्य पुजारी से भी कम है... उनके आपत्तिजनक लहज़े और व्यासपीठ की गरिमा के विपरित अशोभनीय व्यक्तिकरण के कारण मेरी ये धारणा बहुत पहले से उनके लिए रही है...ये पुष्ट हो गई, जब उन्होंने पिछले दिनों शिवपुरी (करेरा) में किसी ऊल-जलूल बकर बोली करने वाले मसखरे (स्टेंडअप कॉमेडियन) की तरह व्यासपीठ से भगवान् श्री कृष्ण का मज़ाक उड़ाया..."हमारे वाले" यानी भगवान् श्री राम और तुम्हारे वाले श्रीकृष्ण!

श्रीराम की तुलना में श्रीकृष्ण कितने कमतर हैं, इसे स्थापित करने के लिए उन्होंने अपनी म्यूजिक टीम के बांसुरी वादक से बांसुरी बजवाकर ये जताने का प्रयास किया कि "बांसुरी तो कोई भी अच्छी बजा सकता है"..धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी श्रीहरि के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योग-योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण की बेढंगी तुलनात्मक व्याख्या और विवेचना करके आपने धार्मिक और सामाजिक अपराध किया है... महोदय आप चमत्कार दिखाते रहिए भोले भाले धर्म अनुयायियों से लेकर बड़े उद्योग घरानों और बड़े राजनेताओं तक को अपना अनुयाई बनाते रहिए... दक्षिणा भर-भर के पाते रहिए... और उसे "आत्म कल्याण" के लिए देश दुनिया में निवेश करते रहिए... लेकिन कुछ समय थोड़ा धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी कर लिया करिए..
श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध, तीसरे अध्याय का 22वाँ श्लोक (1.3.22) है..👇
नरदेवत्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया ।
समुद्रनिग्रहादीनि चक्रेवीर्याण्यतःपरम्।।
अर्थात "देवताओं का कार्य सिद्ध करने (और लोक कल्याण) की इच्छा से श्रीहरि ने अठारहवें अवतार के रूप में राजा (नरदेव) श्रीराम का रूप धारण किया। इसके बाद उन्होंने समुद्र को नियंत्रण में करने (सेतु बांधने) और रावण वध जैसे पराक्रम से भरे अनेक अत्यंत दिव्य व वीरतापूर्ण कार्य किए...
एक और पढ़िए...श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के तीसरे अध्याय (श्लोक 23) में ये भी लिखा है 👇
एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी।
रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम्।। अर्थात अपने उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में, श्रीहरि ने वृष्णि वंश (यदुवंश) में बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया और ऐसा करके पृथ्वी (संसार) के भार (अधर्मी और अत्याचारी राजाओं के बोझ) को दूर किया...मतलब श्री राम ही श्री कृष्ण हैं और श्री कृष्ण ही श्री राम हैं...वो दो हैं ही नहीं... हमारे वाले..तुम्हारे वाले कहने की हैसियत भी इस सृष्टि में कुछ दो तीन लोगों को ही प्राप्त है..प्रभु ने ऐसा कहने की योग्यता निषाद राज, केवट या सुदामा व अर्जुन को ही प्रदान की है...कई हज़ार योनियों में जन्म लेने के बाद भी कोई उनकी तरह हमारे वाले-तुम्हारे वाले कहने लायक़ नहीं हो सकता.. आप नीचे (धरती) वालों के लिए तो राजनैतिक सुफल प्राप्ति का लक्ष्य संधान करने हेतु हिन्दू एकता यात्रा निकालते रहते हो.. लेकिन मंच से भगवान् बांटो जैसा प्रयास मत करो...। धरती के स्वयंभू संत.... हे स्वनामधन्य देवता... अभी आप सूर,रसखान के दाहिने पैर की सबसे छोटी अंगुली के नाखून बराबर भी नहीं हो.. गोस्वामी तुलसीदास जी की बराबरी तो खैर स्वप्न में भी संभव नहीं...! अलबत्ता आपकी तुलना रणबीर इलाहाबादीया जैसे स्टेंडअप कॉमेडियन से जो अपने माता-पिता को संभोग करते हुए देखता था और स्टेज पर उनके इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बड़े भद्दे अंदाज में सुनाता है! और सुहानी शाह से ज़रूर हो सकती है.. आप में और सुहानी शाह में चमत्कार दिखाने के मामले में फ़र्क सिर्फ इतना है कि सुहानी तम्बू पंडाल नहीं लगाती और सनातन की जय जयकार नहीं करवाती...चमत्कारों के मामले में वो आपसे कहीं अधिक आगे नज़र आती है... हे चमत्कारों के स्वघोषित स्वामी.. हमारा विनम्र अनुरोध है...कि आपका काम धर्म प्रवर्तन का नहीं है..उसके लिए वर्षों का अध्ययन और तपस्या चाहिए होती है...उसके लिए प्रकांड पंडित्य अर्जित करना पड़ता है।
जाति से ब्राम्हण होना पर्याप्त नहीं...!

यदि भारत में 'ब्राह्मण' ना होते तो हम पूरी जनता को इसाई बना देते-सेंट फ्रांसिस जेवियर

 वह कौन सा लेखक था जिसने लिखा कि यदि भारत में 'ब्राह्मण' ना होते तो हम पूरी जनता को इसाई बना देते

यह कथन 16वीं शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध स्पेनिश जेसुइट मिशनरी सेंट फ्रांसिस जेवियर (St. Francis Xavier) का है।
उन्होंने रोम और सोसाइटी ऑफ जीसस (Jesuits) को लिखे अपने पत्रों में भारतीय समाज, विशेषकर ब्राह्मणों के प्रति अपनी हताशा व्यक्त करते हुए यह बात कही थी।
उनके वास्तविक पत्रों (जैसे 31 दिसंबर 1543 के पत्र) के आधार पर उनके विचार इस प्रकार थे:
कथन: उन्होंने लिखा था, "अगर यहाँ ब्राह्मणों का विरोध न होता, तो हम सभी मूर्तिपूजकों (हिंदुओं) को ईसा मसीह के धर्म में शामिल कर लेते।"
चुनौती: उन्होंने अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए यह भी लिखा था कि भारत में अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वह केवल एक ही ब्राह्मण का धर्म परिवर्तन कर पाए थे, क्योंकि ब्राह्मण अपनी परंपराओं और वेदों के प्रति अत्यधिक दृढ़ थे और समाज पर उनका गहरा प्रभाव था।
इंटरनेट और सोशल मीडिया पर इसी ऐतिहासिक संदर्भ को अक्सर इस रूप में उद्धृत किया जाता है: "यदि भारत में ब्राह्मण न होते, तो हम पूरी जनता को ईसाई बना देते।"
यदि आप इस इतिहास से संबंधित कुछ और जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएं:
क्या आप गोवा इनक्विजिशन (Goa Inquisition) में उनकी भूमिका के बारे में जानना चाहते हैं?
क्या आप जानना चाहते हैं कि स्टीफन नील या सीता राम गोयल जैसी किताबों में इस पत्र का क्या संदर्भ दिया गया है?
Exposed जर्मनी की लेखिका हैं मारिया विर्थ, जिन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से पश्चिम और भारत ...
#Exposed जर्मनी की लेखिका हैं मारिया विर्थ, जिन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से पश्चिम और ...
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“यदि भारत में ब्राह्मण नहीं होते, तो मैं सभी हिंदुओं को ईसाई बना देता।” — सेंट फ्रांसिस ...
संत फ्रांसिस जेवियर ने एक बार खुलकर कहा था — "अगर इस देश में ब्राह्मण न होते, तो ...
Missing: Angrej ‎lekhak ‎Puri
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ब्राह्मणों पर जजिया किसने लगाया था?
आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों का क्या योगदान था?
जजिया कर ब्राह्मणों पर क्यों नहीं लगा?
दिल्ली के किस सुल्तान ने ब्राह्मणों पर जजिया लगाया था?
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सेंट फ्रांसिस जेवियर ने कहा था कि यदि भारत में ब्राह्मण नहीं होते, तो मैं सभी हिंदुओं को ...
सेंट फ्रांसिस जेवियर एक स्पेनिश जेसुइट मिशनरी था जो 1542 में भारत आया था । सेंट ...
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यदि भारत मे #ब्राह्मण न होते हम पूरे देश को #ईसाई बना देते----- #सेंट_फ्रांसिस गजवा ए ...
यदि भारत मे #ब्राह्मण न होते हम पूरे देश को #ईसाई बना देते-----#सेंट_फ्रांसिस गजवा ए हिंद ...
यदि ब्राह्मण बीच में न होते तो हम पूरे भारत को ईसाई बनाने में सफल हो जाते ...
... (जिसे आज पूरी दुनिया पढ़ रही है) वो *कौटिल्य* ब्राह्मण थे !! आदि शंकराचार्य ...ब्राह्मण थे।
“यदि भारत में ब्राह्मण नहीं होते, तो मैं सभी हिंदुओं को ईसाई बना देता।” — सेंट फ्रांसिस ...
लोकमंच के संस्थापक आशीष कुमार बब्बू जी ने इस रील के माध्यम से राष्ट्र निर्माण ...
Missing: lekhak ‎Ham ‎Puri ‎Janata
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एक पुस्तक है जो कि एक अंग्रेज J. Z. HOLWELL द्वारा 18 वी सदी में लिखी गयी थी , ...
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एक पुस्तक है जो कि एक अंग्रेज J. Z. HOLWELL द्वारा 18 वी सदी में लिखी गयी थी ,जो कि ...
“यदि भारत में ब्राह्मण नहीं होते, तो मैं सभी हिंदुओं को ईसाई बना देता।” — सेंट फ्रांसिस ...
दिनांक 1 जुलाई 1927 को डॉ.बाबासाहब आंबेडकर ने कहा था कि "मैं ब्राह्मणों के खिलाफ ...नहीं हूँ।
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अर्नेस्ट रेनन और राष्ट्र का विचार - भारत के लिए एक संदे

जोसेफ अर्नेस्ट रेनन (1823-1892) - फ्रांस का दार्शनिक, इतिहासकार, और भाषाविद। बचपन में कैथोलिक पादरी बनने गया, हिब्रू सीखा तो बाइबिल पर सवाल उठे और चर्च छोड़ दिया। उसकी किताब _Life of Jesus (1863)_ ने पूरे यूरोप में तूफान ला दिया - उसने कहा यीशु भगवान नहीं, एक ऐतिहासिक मनुष्य था।

रेनन अपने समय का सबसे बड़ा नस्लवाद-विरोधी विचारक था, जबकि उसी समय यूरोप में जर्मनी कह रहा था - राष्ट्र का आधार खून और भाषा है।
*11 मार्च 1882 को Sorbonne में दिया गया उसका लेक्चर - "राष्ट्र क्या है?" - आज भी राष्ट्रवाद पर दुनिया की सबसे जरूरी टेक्स्ट है।*
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*रेनन की विचारधारा - राष्ट्र खून से नहीं, संकल्प से बनता है*
रेनन ने 5 झूठ तोड़े:
1. *राष्ट्र नस्ल नहीं है* - फ्रांस में सेल्ट, जर्मन, रोमन सबका खून मिला है।
2. *राष्ट्र भाषा नहीं है* - इंग्लैंड और अमेरिका एक भाषा बोलते हैं पर एक राष्ट्र नहीं।
3. *राष्ट्र धर्म नहीं है* - आज तुम फ्रांसीसी होते हुए कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, यहूदी या नास्तिक कुछ भी हो सकते हो।
4. *राष्ट्र भूगोल नहीं है* - नदी-पहाड़ राष्ट्र नहीं बनाते।
5. *राष्ट्र हित नहीं है* - हित से व्यापार होता है, वतन नहीं।
तो फिर राष्ट्र क्या है? रेनन कहता है - राष्ट्र एक आत्मा है, दो चीजों से बनी:
*पहली आत्मा - पीछे की ओर: साझा विरासत*
हमने साथ में गौरव देखा है, साथ में दुख झेला है।
*दूसरी आत्मा - आगे की ओर: साथ रहने की रोज़ की इच्छा*
उसका प्रसिद्ध वाक्य - *"राष्ट्र एक रोज़ का जनमत संग्रह है।"* रोज़ सुबह हम तय करते हैं कि हम साथ रहेंगे।
*पर इस आत्मा के लिए एक शर्त है - "एक साथ भूलना।"*
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*"एक साथ भूलना" क्या है? - सेंट बार्थोलोम्यू हत्याकांड से समझें*
24 अगस्त 1572 - फ्रांस।
देश दो हिस्सों में बंटा था - बहुसंख्यक कैथोलिक और अल्पसंख्यक प्रोटेस्टेंट (Huguenots)। 10 साल से गृहयुद्ध। सुलह के लिए राजा ने अपनी कैथोलिक बेटी की शादी प्रोटेस्टेंट नेता Henry से करा दी। शादी देखने हजारों प्रोटेस्टेंट पेरिस आए।
चार दिन बाद कैथोलिक गुट ने प्रोटेस्टेंट नेता Admiral Coligny पर हमला किया। रानी Catherine de Medici डर गई कि विद्रोह होगा। राजा Charles IX ने आदेश दिया - "सबको मार दो।"
सेंट बार्थोलोम्यू के दिन सुबह चर्च की घंटी बजी - संकेत था कत्लेआम का। पहले Coligny को बेडरूम में मारा, खिड़की से फेंका, भीड़ ने लाश को तीन दिन तक घसीटा। फिर 72 घंटे तक पेरिस में घर-घर घुसकर प्रोटेस्टेंटों को काटा गया। लाशें Seine नदी में फेंकी गईं - नदी खून से लाल हो गई। पेरिस में 3,000 और पूरे फ्रांस में 20,000 लोग मारे गए।
*रेनन इसी हत्याकांड पर कहता है - हर फ्रांसीसी को इसे भूला होना चाहिए।*
भूलना मतलब किताब से पन्ना फाड़ना नहीं। इतिहासकार को तो याद रखना ही है।
भूलना मतलब - नागरिक के तौर पर, हर रोज़ उस खून को याद करके अपने पड़ोसी से बदला लेने की आग में न जलना।
अगर फ्रांस का हर कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आज भी 1572 का बदला याद रखता, तो क्या फ्रांस एक राष्ट्र बन पाता? कभी नहीं।
राष्ट्र तभी बना जब दोनों ने कहा - हाँ, हमारे पूर्वजों ने एक-दूसरे को मारा, बहुत बुरा हुआ। पर अब हमें उस घाव को कुरेदकर नहीं, उसे भरकर साथ चलना है।
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*भारत के लिए संदेश*
रेनन का विचार भारत के लिए जर्मनी के खून वाले राष्ट्रवाद से ज्यादा जरूरी है।
भारत नस्ल से नहीं बना - यहाँ द्रविड़, आर्य, मंगोल, शक सबका खून मिला है।
भाषा से नहीं बना - 22 भाषाएँ, 19,500 बोलियाँ।
धर्म से नहीं बना - यहाँ 9 बड़े धर्म रहते हैं।
भूगोल से नहीं बना - हिमालय से कन्याकुमारी तक भूगोल एक जैसा नहीं।
भारत रेनन के अनुसार राष्ट्र है क्योंकि:
*1. हमारे पास साझा विरासत है - और साझा भूलने की हिम्मत भी चाहिए।*
1947 का बंटवारा, दंगे, 1984, 1992, 2002, कश्मीर का दर्द - अगर हम रोज़ सुबह उठकर अपने पड़ोसी में अपने दादा के हत्यारे को देखेंगे, तो राष्ट्र रोज़ मरेगा।
*2. हमारा रोज़ का जनमत संग्रह है।*
जब एक तमिल और एक कश्मीरी एक ही क्रिकेट टीम के लिए चिल्लाता है, जब केरल का डॉक्टर असम में बाढ़ में मदद करता है, जब तुम टैक्स भरते हो, वोट डालते हो - तुम रोज़ तय कर रहे हो कि तुम्हें साथ रहना है।
रेनन कहता है - राष्ट्र अमर नहीं है। वो बनता है और बिगड़ता भी है।
भारत का राष्ट्र होना इस बात पर टिका है कि हम "एक साथ याद रखना" और "एक साथ भूलना" - दोनों कर पाते हैं या नहीं।
याद रखना - ताकि अन्याय दोबारा न हो।
भूल जाना - ताकि साथ रहना संभव हो सके।