- सच्चाई तो अब शायद सच में बेअसर हो गई!
इसीलिये शैतानियत कुछ ज्यादा ही ज़बर हो गई।।
बानगी पेश की जमाने ने अपनी कुछ इस तरह ,
कि जो पोशीदा भी न थी बात उसकी खबर हो गई।
किस्ती के डूबने का अनुमान तो था सभी को मगर ,...
माझी की गफलत से तूफ़ान को पहले खबर हो गई।
दिखाई दिये दूर से ही साहिल वे हमराह हम सफर ,
मझधार में उनकी मगर इक जान लेवा लहर हो गई।
बिजली गिरी कमबख्त उसी मासूम से दरख्त पर ,
था परिंदों का वसेरा जहाँ पहले एक कहर हो गई।
सच्चाई तो अब शायद सच में बेअसर हो गई।।
श्रीराम तिवारी
रविवार, 10 जून 2018
शुक्रवार, 8 जून 2018
बदमाश विजय माल्या 9900 करोड रुपए लूटकर लन्दन भाग गया!अम्बानी ,भारती, वोडाफोन तथा अन्य प्राइवेट टेलिकाम आपरेटर्स ने सरकारी BSNL कंपनी का यूएसओ फंड ,एडीसी ,सब्सिडी सब रुकवाया!निजी संचार कंपनियों की सम्रद्धि के लिए,चंदाखोर सत्ताधारी नेताओं ने सरकारी कंपनी को चूना लगाया! अंबानी ने गोदावरी वेसिंन से 50000 करोड की एक्ट्रा गेस निकाल ली, अपनी रिलायंस पेट्रोलियम कं के वास्ते ! अढानी ने झारखंड् में अवैध खनिज उत्पादन के लिये सार्वजनिक भूमि दबाकर देश को 80000 करोड् का चुना लगाया ! पढ़े लिखे होने के बावजूद जो लोग इन आदमखोर बहशी बुलडागों के खिलाफ नही बोलते,वे देश के गद्दार हैं! जिन्हें सिर्फ अपने धर्म,जाति और मजहब की फिक्र है, वे या तो सत्ता के दलाल हैं या नितांत औंधी खोपड़ी के हैं !
नूतन युग का उदयगान by shriram tiwari
- बुद्धि बल पौरुष और सत्ता यदि,
किसी कमजोर के काम आ जाये । - स्वस्थ्य जवानी यदि किसी देश की ,
सीमाओं पर बल-पौरुष दिखलाये ।। - हो सत्य-न्याय का सिंहनाद -मानव,
सर्वहारा क्रांति के गीत गाता जाये! - कृषकाय युवा खेतों को देकर अपना,
तन मन यौवन और श्रम स्वेद बहाए ।। - जीवन यापन संघर्षों में अडिग रहे,
और न कोई पथ विचलन हो पाए । - लोभ-लालच की भृष्ट व्यवस्था का,
जनकवि लेखक पुर्जा न बन जाए ।। - इतिहास पुरुष कहते इसको क्रांति
और नूतन युग का उदयगान गाते हैं । - त्रिकालज्ञ योगीजन शायद इसको,
परमात्मा का अनुशासन कहते हैं।।
भारत के लोगों ने चीन से कुछ नही सीखा
- पी एम मोदीजी चार साल में चार बार चीन हो आये! उनकी इन यात्राओं से किसी एक भी भारतीय युवा को रोजगार नही मिला! वेशक दो तीन भारतीय पूँजीपतियों के चीन से संबंधित व्यापारिक रिस्ते मजबूत हुये हैं! आज चीन की तारीफ दुनिया करती है और भारतको अभी भी मध्ययुग का बर्बर पिछड़ा देश ही समझती है! विदित हो कि भारत को चींन से पहले आजादी मिल गई थी !क्यों भारत हर चीज में चींन से पिछडता चला गया ?क्योंकि चींन ने मार्क्सवादी दर्शन से जो सीखा वह हम भारतीय लोग गांधी दर्शन में,गोडसे दर्शन में खोजते रहे... !भारतीय नेता साहित्यकार,बुद्धिजीवी और चिंतक केवल अंतरराष्ट्रीयतावाद या अंधराष्ट्रवाद ही परोस्ते रहे !जबकी चीन की विशाल साम्यवादी पार्टी वैज्ञानिक भौतिकवाद के साथ साथ राष्ट्रवाद भी परोसती रही ! भारत के लोगों ने चीन से कुछ नही सीखा !इसीलिये कुछ लोग कश्मीर मसले पर या सींमाओं पर हो रही हिंसाके बरक्स,हिंसक पाकिस्तानी आतंकियों की निन्दा करने से भी डरते हैं! कुछ लोग तो पाकिस्तानी दलालों बदमाश जनरलो की आलोचना करने के बजाय अपनी ही सेना और अपने ही जनरलों को भी कोसते रहते हैं !ऐंसा व्यक्ति कदापी देशभक्त या वामपंथी नही हो सकता ! वह बुद्धिजीवी भी नही हो सकता,वह उत्क्रिष्ट अंतरराष्ट्रीयतावादी भी नही हो सकता !वह किसी भी नजर से इंटेलेक्चुअल नही हो सकता,जो चींन की कम्युनिस्ट पार्टी से कोई सार्थक सबक नही सीखता !
सृजन के ठाँव by Shriram tiwari
- सिंहनाद हो धीरोदात्त चरित्र का
तो सारे जग के अन्यायी थर्राते हैं। - समरसता भ्रातृत्व भाव के नूतन,
शब्द संघर्षों के क्रांतिदूत बन जाते हैं ।। - म्रत्युंजयी नरमेदिनी के युग युग में,
मानव उत्क्रिष्ट अवतारी हो जाते हैं । - जन महानाद संगीत कला साहित्य
सृजन के ठाँव और नये बसते जाते हैं!! - 'सत्यमेव जयते' जैसे शाश्वत मंत्र सदा,
उनसे इंकलाब के नारे प्रेरक बन जाते हैं । - हम एक देश नही एक खेत नही मांगते,
मांगते सारी दुनिया गीत निरंतर गाते हैं।।
शनिवार, 2 जून 2018
बड़ी कोफ्त होती है,जब कोई ऐंसा शख्स फेसबुक पर कम्युनिज्म की आलोचना करने लगता है,जिसने कम्युनिज्म का ककहरा भी नही पढ़ा!जो कभी किसी मजदूर संघर्ष में शामिल नही हुआ !जिसने दास कैपिटल' तो दूर 'कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो' के भी दीदार नहीं किये !इसी तरह बहुत भौंडा लगता है जब कोई स्वयंभू प्रगतिशील या तोतारटंत समाजवादी - साम्यवादी बिना किसी अध्यात्म दर्शन के अध्यन अथवा पुरातन वांग्मय का अध्यन किये बिना उन पर लठ्ठ लेकर टूट पड़ताहै!
सभ्यताओं के विकास क्रम में आदिमानव युगसे लेकर ऋग्वेदकाल तक की यात्रा में, और उसके तदनंतर मध्ययुग के युरोपियन रेनेंसा तथा भारतीय उपमहाद्वीप के करुण भक्तिकाल एवं पुनर्जागरण कालतक जितने भी जागतिक अनसंधान या अन्वेषण हुए हैं, उनमें मनुष्य द्वारा 'ईश्वर की खोज' सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है ! इस विषय पर विश्व की तमाम सभ्यताओं ने देश,काल,परिस्थिति अनुसार अपनी-अपनी परम्पराओं और तत्सम्बंधी तत्व दर्शन का प्रतिपादन किया है! इस संबंध में यदि कोई धर्मान्ध-धर्मभीरु मठाधीशों की बातों को न भी माने तो भी यह स्वयंसिद्ध है कि मानव सभ्यताओं के उत्थान-पतन,भौतिक विकास और 'धर्म' मजहब का उदय इत्यादि उपादान 'ईश्वर', GOD,अल्लाह की परिकल्पना से बहुत पूर्व के हैं।
जिस तरह भारतीय वैदिक और परिवर्ती संस्कृत वांग्मय में भ्रगु,शांडिल्य,अष्टाबक्र जनक,कपिल,कणाद,सुश्रत,चरक और अन्य मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के'तत्वदर्शन' में अद्भुत वैज्ञानिक चिंतन का समावेश है।उसी तरह अमेरिकी माया सभ्यता,मध्यएसिया की सुमेरु सभ्यता,नील नदी की इजिप्षियनऔर फैरोन सभ्यता से लेकर रोमन कैथोलिक युग के ओल्ड टेस्टामेंट और अरबी कबीलों के मानवीकरण की प्रक्रिया में भी साइंटिफिक मानव जीवन जीने की कला द्रष्टव्य है।चूंकि कालांतर में अरब-मध्य एशियाई सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों ने लूट,युद्धपिपासा और साम्राज्य्वादी म्रगतृष्णा के लिए मजहब को हथियार बनाया और आरंभिक सफलता के बलबूते उन्होंने सारे एशिया और आधे यूरोप को अपना चरागाह बना लिया। जो लोग उनके आचार विचार से सहमत नही हुये,वे मार दिये गये! जबकि भारतीय उपमहाद्वीप के प्रगत मनुष्य ने सांसारिक, लौकिक ही नहीं और सिर्फ आत्मा,परमात्मा,माया ही नही बल्कि करुणा,उदारता,सत्य,अहिंसा और समस्त प्राणीमात्र को अपना सर्वश्व होम कर दिया। इसी को आर्यों ने यज्ञ कहा है! उन्होंने जब इन मूल्यों से लैस सारे विश्व का एक सृष्टा पालनहार और संहारक मान लिया तो फिर कोई पराया भी नहीं रहा। इसीलिये जब शकों, हूणों,कुषाणों ,तुर्को ,खिलजियों सैयदों ,मुगलों ,अंग्रेजों ने भारत को चरागाह मानकर यहाँ मुँह मारा तो इन बर्बर कबीलाई समाजों को भारत की सनातन परम्परा ने ईश्वरपुत्र मानकर 'बसुधैव कुटुंबकम' धर्म का पालन किया !
कालांतर में मिश्रित मानवीय जीवन संस्कृति की विविधतापूर्ण यात्रा में व्यक्ति,परिवार और समाज को संचालित करने के लिए इस भारतीय भूभाग में सभी समाजों ने अपने धर्मग्रंथ ,और अपने अपने रीति रिवाज सहेज लिए। किन्तु चाणक्य के सिवाय अन्य किसी ने 'राष्ट्र' शब्द का उल्लेख भी नही किया! यूरोपियन उपनिवेशवाद,आधुनिक पूँजीवाद और लोकतान्त्रिक राजनीतीने तमाम पुरातन मूल्यों,धर्म,श्रद्धा और रीति रिवाजों को कुछ हद तक अप्रासंगिक बना दिया। हिन्दुओं में जिस तरह सती प्रथा,बालविवाह अप्रासंगिक हो गये!उसी तरह अन्य धर्म मजहब में भी उन कुरीतियों से तौबा किया जाता रहा है, जिनकी इस आधुनिक वैज्ञानिक युग में कोई अर्थवत्ता नहीं रही।
वेशक आज की दुनिया चांद सितारों के पार सोचने की क्षमता से लैस है! किंतु अशिक्षा और अज्ञान ने मानव मेदिनी को लोकतंत्र का चारा बना कर रख छोड़ा है! धर्म,मजहब,खुद, ईश्वर संबंधी आस्था और साम्प्रदायिकता के पुरातन खंडहर अब वोट की राजनीति के काम आ रहे हैं! जब तलक मजहबी और जातीय उन्माद की राजनैतिक खेती की जाती रहेगी,तब तलक लोकतंत्र अधूरा रहेगा !चूँकि सर्वहारा क्राति ही तमाम बीमारियों का इलाज है! जब तक क्रांति सफल नही हो जाती,तब तलक आम आदमी की आस्था -धर्म मजहब को वर्ग शत्रुओं का अस्त्र नही बनने देना चाहिए! श्रीराम तिवारी!
जिस तरह भारतीय वैदिक और परिवर्ती संस्कृत वांग्मय में भ्रगु,शांडिल्य,अष्टाबक्र जनक,कपिल,कणाद,सुश्रत,चरक और अन्य मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के'तत्वदर्शन' में अद्भुत वैज्ञानिक चिंतन का समावेश है।उसी तरह अमेरिकी माया सभ्यता,मध्यएसिया की सुमेरु सभ्यता,नील नदी की इजिप्षियनऔर फैरोन सभ्यता से लेकर रोमन कैथोलिक युग के ओल्ड टेस्टामेंट और अरबी कबीलों के मानवीकरण की प्रक्रिया में भी साइंटिफिक मानव जीवन जीने की कला द्रष्टव्य है।चूंकि कालांतर में अरब-मध्य एशियाई सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों ने लूट,युद्धपिपासा और साम्राज्य्वादी म्रगतृष्णा के लिए मजहब को हथियार बनाया और आरंभिक सफलता के बलबूते उन्होंने सारे एशिया और आधे यूरोप को अपना चरागाह बना लिया। जो लोग उनके आचार विचार से सहमत नही हुये,वे मार दिये गये! जबकि भारतीय उपमहाद्वीप के प्रगत मनुष्य ने सांसारिक, लौकिक ही नहीं और सिर्फ आत्मा,परमात्मा,माया ही नही बल्कि करुणा,उदारता,सत्य,अहिंसा और समस्त प्राणीमात्र को अपना सर्वश्व होम कर दिया। इसी को आर्यों ने यज्ञ कहा है! उन्होंने जब इन मूल्यों से लैस सारे विश्व का एक सृष्टा पालनहार और संहारक मान लिया तो फिर कोई पराया भी नहीं रहा। इसीलिये जब शकों, हूणों,कुषाणों ,तुर्को ,खिलजियों सैयदों ,मुगलों ,अंग्रेजों ने भारत को चरागाह मानकर यहाँ मुँह मारा तो इन बर्बर कबीलाई समाजों को भारत की सनातन परम्परा ने ईश्वरपुत्र मानकर 'बसुधैव कुटुंबकम' धर्म का पालन किया !
कालांतर में मिश्रित मानवीय जीवन संस्कृति की विविधतापूर्ण यात्रा में व्यक्ति,परिवार और समाज को संचालित करने के लिए इस भारतीय भूभाग में सभी समाजों ने अपने धर्मग्रंथ ,और अपने अपने रीति रिवाज सहेज लिए। किन्तु चाणक्य के सिवाय अन्य किसी ने 'राष्ट्र' शब्द का उल्लेख भी नही किया! यूरोपियन उपनिवेशवाद,आधुनिक पूँजीवाद और लोकतान्त्रिक राजनीतीने तमाम पुरातन मूल्यों,धर्म,श्रद्धा और रीति रिवाजों को कुछ हद तक अप्रासंगिक बना दिया। हिन्दुओं में जिस तरह सती प्रथा,बालविवाह अप्रासंगिक हो गये!उसी तरह अन्य धर्म मजहब में भी उन कुरीतियों से तौबा किया जाता रहा है, जिनकी इस आधुनिक वैज्ञानिक युग में कोई अर्थवत्ता नहीं रही।
वेशक आज की दुनिया चांद सितारों के पार सोचने की क्षमता से लैस है! किंतु अशिक्षा और अज्ञान ने मानव मेदिनी को लोकतंत्र का चारा बना कर रख छोड़ा है! धर्म,मजहब,खुद, ईश्वर संबंधी आस्था और साम्प्रदायिकता के पुरातन खंडहर अब वोट की राजनीति के काम आ रहे हैं! जब तलक मजहबी और जातीय उन्माद की राजनैतिक खेती की जाती रहेगी,तब तलक लोकतंत्र अधूरा रहेगा !चूँकि सर्वहारा क्राति ही तमाम बीमारियों का इलाज है! जब तक क्रांति सफल नही हो जाती,तब तलक आम आदमी की आस्था -धर्म मजहब को वर्ग शत्रुओं का अस्त्र नही बनने देना चाहिए! श्रीराम तिवारी!
- धर्मांध दक्षिणपंथियों की मुँहजोरी से निपटने के लिये कुछ प्रगतिशील वामपंथी मित्र आपा खो देते हैं! वे धर्म-मजहब के मामलों में हद दर्जे की नकारात्मकता पर उतर जाते हैं! वे धर्मांधता पर खूब बहस करते हैं, किन्तु धार्मिक पुस्तकों को पढ़े बिना ही तत्संबंधी तकरीरें झाड़ने लगते हैं। कुछ अति उत्साही प्रगतिशील चिंतक एक ही ढर्रे पर लगातार लिखते-बोलते चले जा रहे हैं ,कि शंबूक के साथ अन्याय हुआ,कि एकलव्य के साथ बुरा हुआ,कि महिलाओं के साथ ऐंसा हुआ और दलितों के साथ वैंसा हुआ! जब आपने मान लिय...ा कि रामायण,गीता ,महाभारत,वेद और पुराण सब मिथ हैं या काल्पनिक हैं,तो उसी मिथ को आधार बनाकर अब विधवा विलाप क्यों?
यदि हरिष्चंद्र और दधिचि के त्याग बलिदान की कथा मिथ है,तो शंबूक बध या धोबी की कथा का महिमा मंडन क्यों? जो जो बेहतर है उसकी चर्चा न कर केवल जो प्रतिकूल नजर आया,उसीको आधार मानकर अपनी पुरातन मूल्यनिधि की धज्जियाँ उड़ाना कौन सी प्रगति शीलता है? प्राय : आरोप लगाया जाता है कि सवर्ण हिंदु या आर्य लोग अपनी महिलाओं को और शूद्रों को उनके हकों से बंचित रखते थे! वेशक सामंतयुग में शोषण बहुत था,किंतु तब तो सभी कमजोर बेहाल थे ! यह पूरा सच नही कि सिर्फ दलित या दास या स्त्री जाति ही पीड़ित हुआ करते थे! - बाल्मीकि रामायण के अध्याय चार श्लोक १,२,३,को पढ़ने पर मालूम हुआ कि हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था कैसी थी! ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ,शूद्र और स्त्रियों को सामान अधिकार मिले हुए थे-
''अन्यमासम् प्रवक्ष्यामि शृणुध्वम सुसमहिता ,
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ब्राह्मण क्षत्रिय विशां शूद्राणां चैव योषितां '' [वाल्मीकि रामायण अध्याय -४ श्लोक १,२,३,]
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ब्राह्मण क्षत्रिय विशां शूद्राणां चैव योषितां '' [वाल्मीकि रामायण अध्याय -४ श्लोक १,२,३,]
- अर्थात :- बाल्मीकी रामायण सहित सभी धर्मशास्त्रों को ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ,शूद्र एवं स्त्रियां जो भी पढ़ेगा ,उसे ज्ञान और पूण्य का लाभ होगा !
- यह अच्छी बात है कि वामपंथी -प्रगतिशील साहित्यकारों को विश्वकाआर्थिक,सामाजिक ऐतिहासिक दार्शनिक और साइंटफिक ज्ञान है!किन्तु यदि वे भारतीय वांग्मय सहित संसार के सभी धर्म-दर्शनों का भी उचित अध्यन कर लेंगे तो साम्प्रदायिकता और फासिज्म का मुकाबला करने में सफलता अवश्य मिलेगी !भारतीय वामपंथियों और प्रगतिशील साहित्यकारों को चाहिए कि वे भी चीनियों की तरह अपनी राष्ट्रीय अस्मिता और अतीत की धरोहरों की रक्षा करते हुए पाखंडवाद से मुकाबला करें। अभी भारत में जो जेहादी-अल्पसंख्य्कवादी- हिन्दुत्ववादी ताकतें हैं वे भारत को रौंद रहीं हैं ,इसका मुकाबला केवल 'नकारात्मक' तरीकों से नहीं किया जा सकता!क्योंकि अतीत की हर चीज बुरी नही हो सकती! और यदि अतीत का सब कुछ गलत है तो उसकी पैदावार याने वर्तमान पीढ़ी सही कैसे हो सकती है?
शनिवार, 7 अप्रैल 2018
आरक्षण से बेहतर व्यवस्था परिवर्तन !
दो सौ साल तक भारतीय उपमहाद्वीप पर काबिज रहे अंग्रेजों ने,द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले शायद यह उम्मीद नहीं की थी कि उनके 'ब्रिटिश क्राउन' का सूर्यास्त शीघ्र अस्त होने वाला है !यदि उन्हें इसका जरा भी अंदाजा होता तो वे भारत समेत तमाम विश्व में 'फूट डालो राज करो' की दुर्नीति क्यों अपनाते ?खैर द्वितीय विश्वयुद्ध में हुये महाविनाश और मित्र राष्ट्रों की विजय के उपरान्त, अंग्रेजों को भारी मन से भारत छोड़ना पड़ा। विभाजन की कीमत पर भारत आजाद तो हो गया,किन्तु जाते जाते अंग्रेज ,राजकाज चलाने के लिए उनके द्वारा आविष्कृत कानूनी पुलिंदा कांग्रेस के हाथ थमा गए! वायसराय लार्ड माउन्टवेटन की देखरेख में तत्कालीन कांग्रेस ने संविधान सभाका निर्माण किया। दरसल वही ब्रिटिश कानून का ऐतिहासिक पुलिंदा बाद में भारतीय संविधान बना।यह पूरा सच नही है कि संविधान किसी एक व्यक्ति ने लिखा। अपितु यह अंग्रेजों के वीं सदी के मैग्नाकार्टा से लेकर २६ जनवरी १९५० तक जन अनुमोदित कानूनी धाराओं का संकलन है। डा.राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा ने उसमें जातीय आरक्षण और धर्म- मजहब के उपनियम जोड़कर भारतीय संविधान का निर्माण किया !जिसका कुशल संपादन डॉ भीमराव आंबेडकर ने किया है ! यह सुविदित है कि इस संविधान में जातीय आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ १० वर्ष के लिए थी !अब यदि ७० साल बाद भी अधिकांश दलित और आदिवासी गरीब हैं ,दमित हैं ,शोषित हैं तो इसका सीधा मतलब है कि आर्थिक आरक्षण से कुछ मुठ्ठी भर लोगों का ही भला हुआ है,किन्तु समग्र दलित,शोषित समाज, पिछड़ी जाति के गरीबों और सवर्ण निर्धनों को आरक्षण की नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की मांग करनी चाहिए !
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