रविवार, 6 नवंबर 2016


 सत्ता की चाटुकारी करने वालों के लिए खुशखबरी - सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से एक नया आदेश आने वाला है। आप चाहें या न चाहें ,किन्तु आप कुछ और देख सकें इसकी सम्भावना ही बहुत कम है। लेकिन इसकी गारन्टी जरूर है कि आप आठों पहर चौबीस घंटे ,३६५ दिन -  ZEE News जरूर देख सकेंगे । यह चैनल आपको जो दिखाएगा उसे ही सरकारी सूचना मानकर चलें ,क्योंकि प्रसार भारती भी इतनी नंगई या बेहयाई पर नहीं उतर  सकता   !



बुधवार, 2 नवंबर 2016

यदि भोपाल जेल से भागे आतंकी निर्दोष थे तो वे जेल तोड़कर भागे क्यों ?


 पूँजीवादी  व्यवस्था से लड़ना क्रांतिकारी कर्तव्य है, साम्प्रदायिकता एवम तानाशाही से लड़ना लोकतंत्र के हित में है और शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाना  देशभक्तिपूर्ण दायित्व है। केंद्र सरकार या राज्य सरकार के गलत कामकाज की आलोचना पूर्णतः जायज है ,और इसलिए मैं स्वयम  मजदूर विरोधी नीतियों की हमेशा निंदा करता हूँ। देश विरोधी नीतियों के खिलाफ जायज संघर्ष हर देशवासीका संवैधानिक अधिकार भी है। किन्तु जिन आतंकियों ने दर्जनों हत्याएं कीं हों,जिन दुर्दान्त आतंकियों ने 'भारत राष्ट्र'के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा हो ,जिन खूनी आतंकियों ने भारतीय संविधान को गालियाँ  दीं  हों ,जिन आतंकियों ने जजों को गालियाँ दीं हों ,जिन आतंकियों ने जेल में ऐयाशी का सामान जुटाया हो और कैमरे के माध्यम से डीआईजी समेत तमाम पुलिस वालों और वकीलों पर थूंकने का दुष्कर्म किया हो ,उन दुष्ट - बदमाशों के खिलाफ तो देश की अमनपसन्द आवाम को एकजुट होना चाहिए। किन्तु बड़े दुर्भाग्य की बात है कि कुछ लोग 'आतंकवादियों' के हश्र पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। यदि भोपाल जेल से भागे आतंकी निर्दोष थे  तो वे जेल तोड़कर भागे क्यों ?  यदि किसी को लगता है कि वे आतंकी नहीं थे ,बल्कि निर्दोष नागरिक थे तो  कोर्ट में तत्सम्बन्धी मुकद्दमा दायर किया जाना चाहिए और संसद में उनकी बेगुनाही के सबूत पेश किये जाना चाहिए । और यदि वे बाकई  देश के दुश्मन थे ,आतंकी थे तो उनके मारे जाने पर मध्यप्रदेश पुलिस को  तहेदिल से शाबासी मिलनी चाहिए ! श्रीराम तिवारी !

प्रति मेरे मन में कोई शृद्धा उनका  ?

 यह बहुश्रुत लघुकथा है कि  एक 'विद्वान' व्यक्ति नाव में बैठकर बरसात में उफनती  हुई नदी पार कर रहा था। चूँकि नदी का 'पाट ' काफी चौड़ा था इसलिए बोरियत दूर करने के लिए 'विद्वान' यात्री ने नाविक अर्थात मांझी याने केवट को  प्रबचन देना शुरू कर दिया। लेकिन मांझी चुपचाप नाव खैने में व्यस्त रहा। उनके प्रबचन का माँझी पर  कोई असर नहीं हुआ। 'विद्वान' व्यक्ति ने केवट की चुप्पी को उसकी निरक्षरता और अज्ञानता से नत्थी करते हुए यह  जताया  कि तुम कितने गंवार हो ?कि तुम्हें आत्मा,परमात्मा और इस जगत के बारे में कोई ज्ञान नहीं है।  तुम महा मूर्ख और काहिल हो ! लेकिन नाविक ने  उस 'विद्वान' के अहंकार जनित दार्शनिक दम्भ  को नजर अंदाज करते हुए केवल नाव के चप्पुओं को चलाने पर  ही ध्यान दिया। नाव जब बीच मझधार में पहुंची तभी जोरदार तूफ़ान उठा और  विकराल भवँर में नाव हिचकोले खाने लगी। केवट ने 'विद्वान' से कहा -तैरना आता है ? और खुद  पानी में कूंदकर तैरते हुए किनारे जा पहुंचा। मांझी ने  पीछे पलटकर देखा कि नाव उल्ट -पुलट कर बही जा रही है और 'विद्वान'  प्रबचनकार सज्जन लहरों में जाने कहाँ बिल गए हैं ।  श्रीराम ! 

लोग अपने देश के सैनिकों की शहादत के लिए इतने लालायित क्यों हैं ?


 भारत में सत्ता के तमाशबीनों को जबसे 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक' का झुनझुना मिला है, तभी से यह बुन्देली कहावत चरितार्थ हो रही है कि ''नंगू  कैं गड़ई  भई - बेर-बेर हगन गई ''! हमारे तमाम महापराक्रमी , महातेजस्वी अमित -बलशाली  स्वयम्भू 'राष्ट्रनायक'  भारतीय सेना की शहादत के यशोगान में जुट गए। इस बार की दीपावली पर  सैनिकों के सम्मान में एक अतिरिक्त दिया जलाने का प्रतीकात्मक आह्वान भी किया गया। सैन्य शौर्य गाथाओं का जितना प्रचण्ड कोलाहल भारत में हो रहा है, उतना तो दुनिया के किसी 'सैन्यवादी' मुल्क में भी देखने को नहीं मिलेगा। कभी-कभी यह सवाल भी उठता है कि अंधराष्ट्रवादी लोग अपने ही देश के सैनिकों की शहादत के लिए इतने लालायित क्यों हैं ?

खबर है कि  हरियाणा के एक भूतपूर्व  फौजी ने आत्महत्या कर ली है। अपने मृत्यपूर्व लिखे गए सुसाइड नोट में मृतक फौजी ने भारत सरकार पर  अपने सैनिकों की अवहेलना का आरोप लगाया है। मरने वाले पूर्व सैनिक का नाम रामकिशन ग्रेवाल है। वे हरियाणा के भिवानी जिले अंतर्गत 'बामला'गाँव के रहने वाले थे। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि 'वन रेंक वन पेंशन मामले में उनके साथ न्याय नहीं हुआ है ''! उन्होंने आत्म -हत्या से पूर्व दिल्ली में अपनी मांग के लिए धरना भी दिया था ,किन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई। क्योंकि देश के वर्तमान शासक वर्ग को केवल 'शहादत' चाहिए ,उससे कम  कुछ नहीं ! जहाँ तक वन रेंक वन पेंशन के लिए की गयीं घोषणाओं का सवाल है ,तो उसका जबाब केंद्र सरकार ही दे सकती है ,क्योंकि उस प्रकरण को लेकर भी अण्णा हजारे से लेकर जनरल बीके सिंह तक और मनोहर पर्रिकर से लेकर खुद पीएम मोदी ने सफलता के दावे पेश किए हैं। यदि कोई फौजी आत्महत्या करके मर गया है तो सवालों  का उठना लाजमी है। श्रीराम तिवारी !  

देशकी जनता गरीबी-भुखमरी और असमानता के खिलाफ खुद उठ खड़ी होगी।


भारत में  जो लोग अपने आपको प्रगतिशील और क्रांतिकारी समझते हैं,जिन्हें यह गुमान है कि वे धर्मनिरपेक्षता   समाजवाद ,लोकतंत्र के तरफदार हैं और जिन्हें अपनी वैज्ञानिक सोच पर नाज है, वे यदि पाकपरस्त आतंकवाद  की निंदा में एक शब्द नहीं कहेंगे ,वे यदि सिमी जैसे खतरनाक अलगाववादी संगठनों की तरफ से आँख मूंदकर केवल सरकार ,सेना या पुलिस पर ही सन्देह करते रहेंगे तो देश -प्रदेश की जनता उनका साथ कभी नहीं देगी।
क्योंकि ये पब्लिक है जो नेताओं से भी ज्यादा कुछ जानती है ! इसीलिये  सजग और बौद्धिक व्यक्ति को 'सापेक्ष सत्य' का सिद्धांत कभी नहीं भूलना चाहिए। और अपनी वैचारिक विश्वशनीयता के लिए उसे 'सत्य के साथ' खड़े  दिखना भी जरुरी  !

सभी देशवासियों को यह याद रखना होगा कि  भारतीय सेना और भारतीय पुलिस की कमजोरियों पर तो हमारी संसद का काबू है। किन्तु सिमी ,अलकायदा ,जैश ऐ मुहम्मद ,आईएसआईएस और कष्मीरी पत्थरबाजों को खाद  पानी कौन दे रहा है? और उनपर काबू  कौन करेगा ? प्रत्येक  प्रगतिशील भारतीय को सोचना होगा कि जब तक भारत पर मजहबी आतंकवाद का खतरा  कायम रहेगा तब तक 'वर्ग संघर्ष' की सम्भावनाएं  भी बहुत क्षीण होंगीं। यदि आतंकवाद और अलगाववाद का खतरा न हो तो देशकी जनता गरीबी-भुखमरी और असमानता के खिलाफ खुद उठ खड़ी होगी। लेकिन अभीतो सारा भारत और समस्त सन्सार इस मजहबी आतंकवाद की गिरफ्त में है। यह भी काबिले गौर है कि भारतमें जबसे मोदी सरकार सत्तामें आई है तबसे मजहबी आतकंवाद का खतरा कुछ ज्यादा  बढ़ गया है। भारत के प्रगतिशील और प्रबुद्ध लोगों को मोदी सरकार की खामियों के खिलाफ जनता को लामबन्द करने का हक है किन्तु उन्हें मजहबी आतंकवाद पर भी हल्ला बोलते रहना चाहिए ! श्रीराम तिवारी !

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

उनका एनकाउंटर में मारा जाना देशहित में जरुरी है।

यद्द्यपि भोपाल जेल से फरार 'सिमी' आतंकवादियों के साथ मध्यप्रदेश पुलिस ने जो कुछ किया वह बिलकुल सही है। निसंदेह सिमी के लोग समाजद्रोही -देशद्रोही हैं ,लेकिन बाकीके सभी सामजिक-आर्थिक-राजनैतिक अपराधी क्या देशभक्त हैं ? राह चलते स्कूल -कालेज की छात्राओं,कामकाजी महिलाओं का आयेदिन अपहरण करने वाले गुंडे ,चेन स्नेचिंग करनेवाले लफंगे ,कन्या भ्रूणहत्या करने वाले राक्षस ,नकली दवाइयाँ बनाने-बेचनेवाले,मिलावटी खाद्यान्न बेचने वाले  ,मजूरों की मंजूरी डकारने वाले ,व्यापम कुकर्म करनेवाले ,सीबीआई और सीआईडी को धता बताने वाले ,इनकम टेक्स , सेल टेक्स ,आरटीओ ,पीडब्लूडी के अधिकारियों की जेबें भरने वाले औरहरकिस्म के राजनैतिक भृष्टाचार में लिप्त लोग क्या देशभक्त हैं ? मध्यप्रदेश सरकार और एमपी की बहादुर पुलिस जब सिमी आतंकियों को गोलियों से भून सकती है ,तो उनसे ज्यादा खतरनाक अपराधियों पर कृपादृष्टि क्यों ? उन्हें चाहिए कि इन घातक अपराधियों को भी मुठभेड़ में मार दे ! क्योंकि न्यायपालिका और लोकतंत्र तो शायद इसकी कभी इजाजत नहीं देते !

वेशक भृष्टाचार ,भाई -भतीजावाद और राजनैतिक दबाव में कामकरने के लिए एमपी पुलिस भी हमेशा बदनाम रही है। किन्तु कई मामलों में वह दिल्ली ,पंजाब ,हरियाणा और कश्मीर पुलिस से तो बेहतर ही है। भगोड़े सिमी आतंकियों को मार गिराने का एमपी पुलिस का यह शानदार और बहादुरी का काम  काबिले तारीफ़ है। यह काम बहुत पहले शुरूं हो जाना चाहिए था।यदि मुख्यमंत्री शिवराज जी या उनके गृह मंत्री उसका श्रेय लेते हैं तो यह एमपी पुलिस के साथ अन्याय है,क्योंकि वे यह काम करने में यदि सक्षम थे तो १० साल का इन्तजार क्यों किया ? सिमी आतंकी तो शिवराज के सत्ता में आने से पूर्व ही कुख्यात हो चुके थे। वास्तव में कथित मुठभेड़- एनकाउंटर की घटना का श्रेय उन सूचना देने वाले सजग ग्रामीणों को भी जाता है। भलेही विभिन्न कारणों से उनका नाम अभी गोपनीय  रखा गया  हो !क्योंकि मध्यप्रदेश में सिमी आतंकवादियों का नेटवर्क अभी भी बहुत मजबूत है । उनके तार खण्डवा,बुरहानपुर ,भोपाल ,नागदा, महिदपुर, सनावद ,खरगोन से लेकर बेंगलोर ,भटकल ,अहमदाबाद और हैदराबाद तक जुड़े होने की संभावना हो सकती है। वे तालिवान ,अलकायदा ,आईएसआईएस, पाकिस्तानी फ़ौज और जैश ए मुहम्मद से भी वास्ता रखते हैं। इसलिए उनका एनकाउंटर में मारा जाना देशहित में जरुरी है।

वे  कहीं पर नकली नोट खपा रहे होते हैं ,वे कहीं पत्थर पर पत्थर फैंक रहे होते हैं ,वे कहीं पर जेल फांदकर फरार हो रहे होते हैं , वे कहीं पर भारतीय निर्दोष नागरिकों और पुलिस पर फायर कर रहे होते हैं। यदि मध्य प्रदेश के ग्रह मंत्री कह रहे हैं कि हमने कारनामा कर दिखाया तो यह बड़बोलापन है।  पुलिस का मानो कोई रौल नहीं। इसके अलावा किसी एक भी आतंकी को जिन्दा न पकड़ पाना और जेल से भाग जाने देना भी सन्देह को जन्म देता है। लेकिन फिर भी आतंकियों को खत्म करने में ही देश की भलाई है , बहादुरी है और देशभक्ति भी।
 श्रीराम तिवारी !

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

''तमसो मा ज्योतिर्गमय ! ''


इस बार दीपावली के शुभ अवसर पर 'संयुक्त राष्ट्र संघ' मुख्यालय में भी  दिए जलाये गए ! मुझे नहीं मालूम कि ऐंसा पहली बार ही हुआ है या अन्य इवेंटस की तरह इस घटना को भी पहली बार खास 'खबर' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।  हकीकत जो भी हो,किन्तु यह सुखद और सर्वजनहिताय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में न केवल दीपक जलाये गए बल्कि भारतीय  संस्कृत वाङ्ग्मय के सुप्रसिद्ध सूक्त वाक्य :-''तमसो मा ज्योतिर्गमय ! असतो मा  सदगमय ! मर्त्योर्माम अमृतगमय ! ''-का अंग्रेजी सहित तमाम प्रमुख भाषाओँ में अनुवाद भी प्रस्तुत किया गया है !

प्रस्तुत मन्त्र की सर्वकालिकता और सार्वभौमिकता तो सर्वज्ञात है। और इस वैदिक मन्त्र का संसार की किसी भी विचारधारा या दर्शन से कोई टकराव नहीं है। इसके पहले और दूसरे 'पद' के निहितार्थ भी लगभग सर्वमान्य हैं। किन्तु अंतिम पद की जितनी दुर्दशा भारत में की जा रही है उतनी शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिलेगी !यों   दीपावली के पावन पर्व  पर और  सब ठीकठाक है किन्तु बारूदी  दुर्गन्ध,विषैला धुँआ और दूषित - वातावरण देखकर कोई भी कहेगा कि यह 'म्रत्योर्माम अमृतगमय' का अनुकरण नहीं है। बल्कि यह तो अमरत्व से मृत्यु की ओर तेजी से ले जाने का [अ ] मानवीय उपक्रम  है ! श्रीराम तिवारी।

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

यूपी की जनता शायद ही इस बार सपा या मुलायम परिवार पर मेहरवान होगी !


मुलायमसिंह यादव न तो समाजवादी हैं और न ही लोहियावादी हैं, वे पिछड़ावर्ग के हितेषी भी नहीं हैं, और उन्हें किंचित  'परिवारवादी' भी नहीं कहा जा सकता । दसरल वे उत्तरप्रदेश में  क्षेत्रीयतावादी 'नकारात्मक राजनीति' की खुरचन मात्र  हैं। उन्हें सत्ता में लाने का श्रेय विश्वनाथ प्रतापसिंह , लालकृष्ण आडवाणी और नरसिम्हाराव को जाता है। वीपीसिंह ने नेता बनाया , आडवाणी  की रथयात्रा ने मुलायम को हीरो बनाया और नरसिम्हाराव ने उन्हें परवान चढ़ाया। भाई-भतीजावाद,परिवारवाद,भृष्टाचार , सैफई वाली गुंडई , जातिवाद और सम्प्रदायवाद उनके चुनाव जिताऊ अश्त्र-शस्त्र रहे हैं।
          भाई शिवपालयादव ,जिगरी दोस्त अमरसिंह और मुख्तार अंसारी जैसे लोग उनके पुराने राजदार रहे हैं। अब जबकि यूपी में विधान सभा चुनाव सिर पर  हैं,तब मुलायम कुनबा आपसी जूतम पैजार में व्यस्त है।यक्ष प्रश्न यह है कि मुलायम सिंह यादव की भृष्ट विरासत पर उनका पुत्र अखिलेश यादव क्या ईमानदारी की बुलन्द और भव्य ईमारत खड़ी कर सकता है ? मेरा ख्याल है -नहीं ! क्योंकि अखिलेश यादव को कदाचित राजनैतिक पार्टी निर्माण और  संगठन खड़ा करने का अनुभव नहीं है। जिस पार्टीके कारण वे यूपी के सीएम हैं उस सपाके निर्माण में भी अखिलेश का कोई योगदान नहीं है। वेशक  वे यदि अपने पिता के संजाल से मुक्त होकर चन्द्र बाबु नायडू या जय ललिता की राह पकडते हैं ,तो उनके लिए संभावनाओं के द्वार खुल सकते  हैं। लेकिन इसमें वक्त लगेगा।

बहरहाल यूपी की जनता शायद ही इस बार के चुनावों में सपा या मुलायम परिवार पर मेहरवान होगी !वेशक मुलायमसिंह का वंशज होना अखिलेश के लिए जितना लाभप्रद रहा है किन्तु उतना ही नुकसानदेह और कष्टप्रद भी है। यदि वे  चाहें तो भी अपनी बल्दियत बदल भी नहीं सकते ! वे यह तो समझ  गए होंगे कि  'नेताजी' का पुत्र होना किसी मुगल बादशाह के 'बलीअहद' [युवराज] से कम नहीं है। लेकिन इसमें  गर्व की कोई बात भी नहीं है, क्योंकि मुगल खानदानके अधिकांस 'बलीअहद' अपने 'बाप' को 'निपटाकर' ही गद्दीनसीन  होते रहे हैं।यह विचित्र संयोग है कि मुगल राजकुमार भी अपने सारे षड्यन्त्र इसी उत्तरप्रदेश याने तत्कालीन 'अबध '- लखनऊ, प्रयाग और आगरा में ही रचते रहे हैं। मुलायम परिवार का अंतरकलह हमें द्वापर युग की उस मिथकीय घटनापर यकीन कराता है ,जिसे 'यादवी महासंग्राम' भी कहा जाता है और जिसमें द्वारका के यादव आपस में लड़-मर गए थे।
भारतीय  काल गणना अनुसार द्वापर युग के  'महाभारत' की गाथा और 'भागवद पुराण 'में वर्णित द्वारका-विनाश , के तथाकथित 'यादवी महासंग्राम' को मैं अब तक 'मिथ' इतिहास ही समझता रहा हूँ। किन्तु बिहारमें लालू परिवार और उत्तरप्रदेश में 'मुलायम-परिवार' का उत्थान -पतन  देखकर यकीन होने लगाहै कि द्वापरयुग जरूर रहा होगा और 'यादवी महासंग्राम' भी अवश्य हुआ होगा।

सारा देश जानता है कि मुलायम परिवार की पार्टी 'सपा' का समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें भारत राष्ट्र की भी कोई  चिंता नहीं। खुद मुलायमसिंह यादव और उनके अनुज शिवपाल यादव -कहीं से भी समाजवादी नहीं हैं। मुलायम के सुपुत्र अखिलेश यादव अवश्य पढ़े-लिखे हैं और सुलझे हुए युवा नेता भी लगते हैं.यदि वे अपने पिताकी कलंकित राजनीति त्यागकर अलग पार्टी बनालें या किसी से गठबंधन कर लें और यूपी की जनता उन्हें एक बार फिर से भरपूर समर्थन  दे ,तो शायद  अखिलेश यादव यूपी का और बेहतर नेतत्व कर सकते हैं और विकास भी कर सकते हैं। शायद तब वे 'समाजवाद' की ओर भी आगे बढ़ सकते हैं। श्रीराम तिवारी !

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

अमेरिका में शाखा मृगों वाला छुई मुई राष्ट्रवाद नहीं है।


हिंदी भाषा जगत की कुछ लोकोक्तियाँ एवम मुहावरे यद्द्पि सदाबहार और सर्वकालिक हैं ,किन्तु आधुनिकतम तकनीक और सूचना संचार संसाधनों ने हिंदी की इस भदेस भाषाई विशेषता को गर्त में धकेल दिया है। अधजल गगरी झलकत जाए  ,थोथा चना बाजे घना, चूहे को चिन्दी  मिली बजाजी खोलने चला , घर में नहीं दाने - अम्मा चली चुगाने ' बगैरह बगैरह ,,,! भारतीय उपमहाद्वीप में, खास तौर से हिंदी -उर्दू क्षेत्र में इन कहावतों के चलन से ही समझा जा सकता है कि इतिहास के हरेक दौर में इस क्षेत्र की आवामका सामाजिक ,आर्थिक ,राजनैतिक और 'राष्ट्रवाद' का स्तर कैसा और कितना रहा है ?

सदियोंकी गुलामीके उपरान्त  भारतीय उपमहाद्वीप के सभी नवोदित खंडित राष्ट्रोंकी आवामके मनोमस्तिष्क में पष्चिमी राष्ट्रोंकी तरह का सहज लोकतान्त्रिक धर्मनिरपेक्ष 'राष्ट्रवाद'कभी नहीं रहा। बल्कि अरब -इजरायल और मध्यएशियाई देशोंकी तरह सांप्रदयिकता आधारित 'अंधराष्ट्रवाद'ज्यादा पनपता रहा है।भारत,नेपाल,श्रीलंका और पाकिस्तान इत्यादि देशों की आर्थिक,सामाजिक ,राजनैतिक बदहाली जगजाहिर है,किन्तु इन देशों के शासकगण बड़ी चालाकी से आवाम का ध्यान ज्वलन्त मुद्दों से हटाकर -राष्ट्रवाद ,जेहाद, धर्मांतरण , आतंकवाद  जैसे मुद्दोंकी ओर मोड़ दिया करते हैं।भारत और पाकिस्तान में यह भ्रामक प्रहसन कुछ ज्यादा ही अभिनीत हो रहाहै।सदियों की गुलामी का एहसास जिसके मन में जितना ज्यादा होता है ,'राष्ट्रवाद' का बोध भी उस शख्समें उतना ही उद्दाम होता है । किन्तु यह राष्ट्रवाद निरपेक्ष नहीं होता ,बल्कि  पड़ोसी मुल्कों की और 'अमित्र' राष्ट्रों की 'क्रिया-प्रतिक्रिया के सापेक्ष नित्य परिवर्तनशील हुआ करता है। भारतीय मानस में चीन और पाकिस्तान इसके स्थाई उद्दीपन हैं ।

जैसे कोई कृपण व्यक्ति अपनी छुद्र उपलब्धि पर इतराने लगता है ,जैसे कि आषाढ़ में बरसाती मेंढक टर्राने लगते हैं ,जैसे कि 'छुद्र नदी भर चली तोराई ',ऐसे ही भारत-पाकिस्तान के लोग बात-बात में एक दूसरे को आंखे तरेरने लगते हैं। सीमाओं के झगड़े ,आतंकवाद और कश्मीर के झगड़े तो बहुत पेंचीदे हैं ,किन्तु हॉकी- क्रिकेटके खेलमें और फिल्म और कलाके क्ष्रेत्रमें भी इन देशोंका राष्ट्रवाद उबलता हुआ दिखाई देने लगता  है। जबकि अमेरिका  , रूस ,जापान ,इंग्लैंड ,जर्मनी और फ़्रांस जैसे पूर्व सामराजी मुल्कोंकी आवाम अपने -अपने देशोंके प्रति भारतीयों से या पाकिस्तानियों से ज्यादा बफादार होते हुए भी किसी दूसरे देश के कलाकारों,कवियों,लेखकों और महानतम नेताओं की तारीफ करने में कोई शर्म महसूस नहीं करती । हम भारत के लोग भले ही गाँधी को गोली मार दें या नेहरूको गालियाँ दें किन्तु अमेरिका -अफ्रीका और  तीसरी दुनियाके लोग  गाँधी ,नेहरू,सुभाष का बहुत सम्मान करते हैं। कुछ तो इंदिराजी,अटलजी और ज्योति वसु का भी सम्मान करते हैं।और अब तो प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी भी सम्मान पा रहे हैं।  

विगत शनिवार को अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार श्रीमान डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतियों की खूब तारीफ़ की है,उन्होंने भारत की जमकर तारीफ़ की है,उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की भूरि -भूरि प्रशंसा की है और खास तौर पर उन्होंने पाकिस्तान की जमकर निंदा की है। अब भले ही हम डोनाल्ड ट्रम्प या अमेरिका के प्रशंसक नहीं हैं ,भले ही हम मोदीजी या 'संघ' की राजनैतिक विचारधारा से सहमत नहीं हैं ,किन्तु देशभक्ति में हम भी किसी से कम नहीं ! हमें मालूम है कि चौतरफा संकटग्रस्त भारत को विश्व विरादरी के समर्थन की बहुत जरूरत है। अब यदि अमेरिकन प्रसिडेंट उम्मीदवार 'डोनाल्ड ट्रम्प' वोट के लिए ही सही यदि भारत की तारीफ करता है ,भारत के प्रधान मंत्री की तारीफ करता है तो उसके कथन का प्रतिवाद हम नहीं कर सकते !

इस घटना से हमें दो बातों पर गौर करने की प्रेरणा मिलती है। एक तो यह कि मिस्टर डोनाल्ड ट्रम्प जो कि रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं और  भले ही  वे भारतीयों के वोट हासिल करने के लिए यह सब कर रहे हैं, किन्तु अमेरिका की धरती से भारत के प्रधानमंत्री की  और भारत की जनता की तारीफ कर रहें। इसके वावजूद एक भी अमेरिकी ने उनसे नहीं कहा कि - ''मिस्टर ट्रम्प आप अमेरिका की खाते हो और मोदी के गुण गाते हो'' ! दूसरी बात यह कि यदि भारत के किसी उम्मीदवार ने  या किसी नेता नई गलती से भी किसी गैर मुल्क के नेता का नाम ले लिया होता या उसके प्रधान मंत्री -राष्ट्रपति की तारीफ की होती तो भारत के मंदबुद्धि नकली राष्ट्रवादी लोग उसे 'देशद्रोही'बना देते। उसे कन्हैयाकुमार ,रोहित वेमुला या केजरीवाल ही बना देते।  संघ समर्थक बयान देने लग जाते कि ''भारत की खाते हो और फलाँ के गुण  गाते हो '' ! तुम देशद्रोही हो !,,,,तुम पाकिस्तान चले जाओ ! बगैरह बगैरह ,,,! श्रीमान डोनाल्ड ट्रम्प किस्मत वाले हैं , क्योंकि अमेरिका में शाखा मृगों वाला छुई मुई राष्ट्रवाद नहीं है।   

भारत के खिलाडी ,फ़िल्मी हीरो,कलाकार ,साहित्यकार ,लेखक और इंटेलेक्चुवलस जब कभी अमेरिका इंग्लैंड -यूरोप या मारीशस जाते हैं या जब कभी मोदी जी जैसे बड़े नेता वहाँ जाते हैं तो  प्रवासी भारतीय जन जो कि सदियों से भारत छोड़ चुके हैं और वहाँ जाकर बस गए हैं , वे  ''भारत माता की जय'' और वन्दे मातरम '' अवश्य बोलते हैं। इतना ही नहीं बल्कि वे  खुलकर 'हर-हर मोदी' भी बोलते हैं। लेकिन कभी ब्रिटेन वालों ने ,कभी फ़्रांस वालों ने ,कभी अमेरिका वालों ने या यूरोप वालों ने ये नहीं कहा ''यहाँ की खाते हो और भारत के गुण गाते हो !''

  भारत के आधुनिक युवाओं को यदि राजनीति में रूचि नही है तो वे किसी खास राजनेता का अंध समर्थन क्यों करते हैं ? और यदि किसी को राजनीति में रूचि है तो अच्छी बात है वह दुनिया के विकसित देशों से यह भी सीखें की असली राष्ट्रवाद क्या होता है ? जो कोई शख्स अमेरिका विरोधी है ,जो कोई शख्स मोदी विरोधी है ,वेशक वह अपनी जगह सही हो सकता है, किन्तु यदि दुनिया के सापेक्ष भारत राष्ट्र का गौरव और सम्मान बढ़ता है तो उसे खुशी होनी चाहिए। और यदि भारत की अखण्डता  पर कोई आंच आती है तो अपने वतन के साथ उसे मुस्तेद खड़ा दिखना भी जरुरी है।  वैचारिक संघर्ष और राजनैतिक मतभेद तो अमेरिका में भी हैं लेकिन जब डोनाल्ड ट्रम्प जैसे शख्स को भारत की तारीफ़ करने पर 'देशद्रोह' काआरोप नहीं लगता तो हम भारत के लोग भी दुनिया के किसी भी मुल्क की या नेता की तारीफ के लिए स्वतंत्र हैं। अंधराष्ट्रवादियों को यह हमेशा याद रखना चाहिए। श्रीराम तिवारी

''पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है '' -अरुण जेटली !



  यदि कोई गौर से और गंभीरता से सुब्रमण्यम स्वामी की बात पर ध्यान दे, तो उनकी बात में कुछ खास बात अवश्य होती है। वेशक सुब्रमण्यम स्वामीकी अधिकांस बातोंमें नकारात्मकता का बोलवाला हुआ करता है।किन्तु जब कभी वे बिगड़ैल हाथी की तरह 'अपने ही दल'पर टूट पड़ते हैं तब उनकी सही और सकारात्मक बातों पर भी विपक्ष के लोग चुप्पी लगा लेते हैं ,यह सरासर बेईमानी है।अभी-अभी सुब्रमण्यम स्वामी जी बोले हैं कि '' वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली  फेल हैं और उनकी की आर्थिक नीतियाँ  विनाशकारी हैं ,जबकि मोदीजी बहुत मेहनती हैं और एक अच्छे प्रधान मंत्री सावित हुए हैं'' !

सवाल उठता है कि जब अरुण जेटली की आर्थिक नीतियाँ ही एनडीए की आर्थिक नीतियाँ हैं याने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ हैं, तो फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि केवल जेटलीजी ही गलत बताये जा रहे हैं और मोदी जी की तारीफ की जा रहीहै ?वेशक एनडीए याने मोदी सरकार याने अरुण जेटली की आर्थिक नीतियोँ से देश के निजी क्षेत्रों को खूब फायदा हुआ है। किन्तु गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। मनरेगा और गरीबों को सस्ते अनाज की नीति जैसे कुछ कल्याणकारी तदर्थ उपायों को यूपीए की लोकलुभावन नीति कहा जा सकता है ,लेकिन मोदी सरकार ने तो  'एनएसजी' में शामिल होने की आशा में विदेशियों को १००%एफडीआई ही खोल दिया। शर्मनाक यह है कि वह 'एनएसजी'की सदस्यता भी भारत को नहीं दी गयी।

 चूँकि वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटलीजी देश की अर्थ व्यवस्था को सही दिशा नहीं दे पाए , शायद मोदी जी भी उनसे नाखुश हैं ,इसलिए जेटलीजी ने अब अपने वकील होने का एहसास देश को कराया है। उन्होंने बयांन दिया है कि ''पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है '' ! चूँकि सामाजिक और राजनीतिक रूपसे जेटलीजी का यह बयान अपने आप में सर्वकालिक और सार्वभौम है।इसलिए संविधान का सम्मान करने वाले हरेक भारतीय का दायित्व है कि जेटलीजी के इस वयानका समर्थन करे। जिन्हें जेटलीजी से नफरत है ,जिन्हें भाजपासे परहेज है ,जिन्हें  संघ परिवार या  मोदी सरकार की नीति-रीति से परेशानी है ,वे यद्द्पि इसके लिए स्वतंत्र हैं ,किन्तु हरेक को अपने देश के संविधान का सम्मान करना ही होगा।

जेटलीजी ने कहा ही  कि ''पर्सनल लॉ  सम्विधान से ऊपर नहीं '' !वेशक संविधान से ऊपर तो  प्रधानमंत्री भी नहीं ,संविधान से ऊपर राष्ट्रपति भी नहीं और स्पष्ट समझ लिया जाए कि यद्द्पि लोकतंत्रमें संसद सर्वोच्च है ,किन्तु यह संसद भी संविधान से ऊपर नहीं । अतः  जो लोग पर्सनल लॉ को संसद से ऊपर मानते हैं ,या जेटली जी से असहमत हैं वे गलत हैं। सभी राजनैतिक दलों को चाहिये कि भारतीय संविधान की हिफाजत करें ,जो कि बाबा साहब अम्बेडकर के कर कमलों द्वारा इस देश की आवाम को प्रदान किया गया है। श्रीराम तिवारी !