गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

नसीबबाले ने नक्सली-उपद्रवी को चाय पर बुलाया ! न सिर्फ बुलाया बल्कि चाय भी पी !

 

   दिल्ली में भाजपा की हार और 'आप' की जीत  के बारे में  सारे संसार में चर्चा है। अमेरिका ,इंग्लैंड ,पाकिस्तान , चीन ,जापान ,आस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, श्रीलंका समेत दुनिया भर  के अखवारों  के  प्रथम पृष्ठ पर दिल्ली के चुनाव  चर्चित  हैं। दुनिया भर के सोशल साइट्स पर ,डिजिटल  और इलक्ट्रॉनिक  मीडिया पर 'दिल्ली राज्य ' चुनाव के विश्लेषणों   की विगत दो दिनों खूब धूम  मची हुई  है।सबके अपने-अपने कयास हैं। सबके अपने-अपने विमर्श और विश्लेषण हैं।  भारतीय और  अंतर्राष्ट्रीय  विश्लेषणों में - कुछ वास्तविक ,कुछ  काल्पनिक ,कुछ अर्धसत्य ,कुछ  वास्तविकता  से दूर और कुछ अतिरंजित व्यंग मात्र हैं। इनमें सबसे खतरनाक टिप्पणी   सुब्रमण्यम स्वामी की है। उसका कथन  है की " दिल्ली में देश द्रोहियों की सरकार आ गयी है ''[नई  दुनिया - इंदौर संस्करण ,पेज नंबर -१२  कलम ७-८ , -दिनांक १२-० २- १५ ] आशा की जाती  है की  दिल्ली की प्रबुद्ध   जनता  ,देश की जनता ,  सभी राजनैतिक पार्टियां और दिल्ली के वे  वकील  जिन्होंने किरण वेदी को हरवाया  और 'आप' को जिताया है।  वे  सुब्रमण्यम स्वामी के इस वयान का संज्ञान अवश्य लेंंगे।
                                                     दिल्ली राज्य चुनाव विषयक  प्राप्त  सूचनाओं और अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप मेरा  व्यक्तिगत विश्लेषण  निम्नानुसार है। दिल्ली राज्य  विधान सभा की ७० में ६७ सींटें प्राप्त कर   'आप' ने जो बुलंदी हासिल की है  उस के कारकों को उजागर करने से पहले 'आप' को नेक  सलाह दी  जाती  है कि 'आप' इस गुमान में न रहे कि  दिल्ली की तरह शेष  भारत की  जनता भी  'आप ' पर लट्टू है। देश की जनता न तो मोदी पर लट्टू है न 'आप' पर।   वह तो वर्तमान व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन चाहती है।  चूँकि मोदी जी ९-१० माह में कुछ भी नहीं कर सके तो दिल्ली की जनता ने 'विकल्प'  उपलब्ध होंने  पर दिल्ली में   बहरहाल  'आप' को पसंद कर लिया है ।  यदि 'आप' ५ साल में कुछ नहीं कर सके तो  कांग्रेस और भाजपा की तरह 'आप' को भी ठिकाने लगा दिया जाएगा ।
      दिल्ली में मिली सफलता का  यह मतलब  भी नहीं  है कि  'आप' की नीतियाँ  और कार्यक्रम पूरे देश को पसंद हैं ! यदि 'आप' की सोच यह है की दिल्ली की जनता  और  शेष भारत की जनता  की मनः स्थति एक सी है तो 'आप' गलतफहमी में हैं ! 'आप' को स्मरण रखना होगा कि  भारत का हर प्रांत या   हर क्षेत्र अपनी   विशिष्ट   भौगोलिक,सांस्कृतिक, सामाजिक ,और राजनैतिक विविधता के   बरक्स  अपनी राजनैतिक चेतना और राजनैतिक  बुनावट को अभिव्यक्त करता है।याद रखें कि  'आप' आज लोकप्रियता की बुलंदियों पर होने के वावजूद मध्यप्रदेश में एक विधान सभा सदस्य तो क्या एक पार्षद भी नहीं  जिता पाये।   जबकि मध्यप्रदेश में ठीक  दिल्ली चुनाव से पूर्व स्थानीय निकायों में भाजपा की इकतरफा जीत हुई है।  जबकि भाजपा यहां आकंठ भृष्टाचार में डूबी हुई है।   यदि 'आप' इतने बलशाली हैं तो मध्यप्रदेश ,गुजरात ,राजस्थान या छग में कहीं तो उपस्थ्ति दर्ज कराइये। सबको मालूम है कि  इन दिनों  भाजपा शाषित राज्यों में भृष्टाचार चरम पर है।  'आप' के नेता दिल्ली की जीत को ''बिल्ली के भाग से छींका टूटा"ही माने ! इससे ज्यादा सोचने में कोई हर्ज नहीं है।  किन्तु सोच का दायरा तर्कपूर्ण और विज्ञानसम्मत होना चाहिए। बहरहाल दिल्ली  में 'आप' की बम्फर जीत एवं  जागरूक  जनता द्वारा  कांग्रेस और  'भाजपा ' की बेरहम पिटाई  पर  कुछ खास निष्कर्ष  इस प्रकार हैं !
  

[१]  दिल्ली के अधिकांस  मतदाताओं को  पीएम  मोदी जी का स्वर्ण खचित -जड़ाऊँ -नौलखिया शूट पसंद नहीं आया !  भले ही वह गिफ्ट में  ही क्यों न  मिला हो  !  देश  के गरीब  मजदूर जब ठंड में ठठुर रहे हों  और ओला  पीड़ित किसान आत्महत्या  कर  रहे हों, तब प्रधानमंत्री का इस तरह  बार-बार  कीमती वस्त्र बदल -  बदलकर  , हवाई  मार्ग से हवाई  बातें करना  दिल्ली के मतदाताओं को पसंद नहीं आया।

[२]    संसद  सत्र  के  फौरन वाद कुटिल अध्यादेश जारी करना -भारतीय संविधान पर  परोक्ष हमला करना या   धर्मनिरपेक्षता पर हमला करना  , समर्थक  'भगवा मण्डली' द्वारा चार -चार-बच्चे पैदा करने का फतवा  जारी करना  ,घर वापिसी  का आक्रामक अभियान चलाना  यह सब   भी  शायद दिल्ली की जनता को  पसंद नहीं आया।

[३]  भूमिअधिग्रहण  अध्यादेश ,बीमा बिल अध्यादेश ,  एफडीआई -पूंजीपतियों के पक्ष में श्रम  कानूनों का शिथली  करण, सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण तथा   गणतंत्र दिवस पर ओबामाजी को अपने हाथ से चाय  पिलाना -दिल्ली के मतदातों को   संभवतः पसंद नहीं आया।

[४]    डेरा सच्चा सौदा -गुरमित  राम रहीम का  भाजपा के पक्ष में फतवा जारी हुआ  तो उसे भाजपा नेताओं  ने  सर-माथे लिया।  जबकि  इमाम बुखारी द्वारा जारी किया गया  'आप' के पक्ष में फतवा -  केजरीवाल द्वारा तत्काल रिजेक्ट कर दिया गया। दिल्ली के मतदाताओं को 'आप' की  यह अदा  खूब पसंद आयी  ! जबकि  भाजपा के नेता अपने हिन्दुत्ववादी ध्रवीकरण के  घमंड में चूर   होकर  इस  जन-मानसिकता को समझने में  नितांत  असमर्थ रहे कि बहुमत हिन्दू समाज को  किसी भी तरह की  साम्प्रदायिक कट्टरता कतई  पसंद नहीं।

[५] किरण वेदी , कृष्णा तीरथ ,इल्मी ,बिन्नी ,अमुक- धिमुक  जैसे दल बदलू -दलबदलिनियों  में उमड़े अचानक  भाजपाई  - सत्ता प्रेम को  बड़े भाजपाई नेता गफलत में  'मोदी प्रेम ' समझ बैठे।  इस रौ में वे अपने हर्षवर्धनों ,उपाध्यायों, जगदीश मुखियों  जैसे खाँटी  - खानदानियों की उपेक्षा  कर बैठे !  और चुके हुए कारतूसों को लेकर 'लाम' पर चल दिए।  दिल्ली के मतदाताअों ने इस  आयातित तलछट के कारण भाजपा  को  ही  नकार दिया !

 [६]  विगत २०१३  की विधान सभा  के त्रिशंकु होने  और  कांग्रेस की बैशाखी से  परेशान केजरीवाल ने  जो ४९ दिनों में त्याग पत्र दिया था। वेशक वो न केवल नाटक  नौटंकी था बल्कि केजरीवाल का उथलापन  भी था। किन्तु जब केजरीवाल  ने इस कृत्य के लिए  माफ़ी मांगी तो दिल्ली के मतदाताओं ने खुले दिल से माफ़ कर दिया ।  न केवल माफ़ किया अपितु वम्फर जीत देकर  दुनिया में मशहूर कर दिया।

[७]  वेशक 'आप' के कुछ कार्यकर्ता लगातार जुटे रहे। 'आप'  रुपी हिरण ने  भाजपा रुपी बाघ के सामने हिम्मत  नहीं हारी।  'आप' का हौसला भी इस जीत में बहुत महत्वपूर्ण है।

 [८]    'आप'    ने  जाति  -मजहब ,और खोखले वादों की राजनीति  नहीं की।   कांग्रेस और  भाजपा को नागनाथ -सांपनाथ समझा।  दिल्ली के मतदाताओं को 'आप'  का यह आचरण पसंद आया।


                    'आप' दिल्ली की जनता से   किये गए  वादे पूरें कर पाएंगे इसमें मुझे संदेह है।  दिल्ली राज्य का पुलिस पर कोई कंट्रोल नहीं।  वित्तीय स्थति  किसी नगर निगम से भी बदतर  है। 'आप' के कुछ नए -नए चेहरे उत्साहीलाल  भी हो सकते हैं।  किरण वेदी ,शाजिया इल्मी आपके दुश्मन बन चुके हैं। चूँकि 'आप' का जन्म  अन्ना  के आंदोलन से हुआ है इसलिए  अन्ना भी 'आप' को  ऐंसे ही छोड़ने वाला नहीं। केंद्र में मोदी  जी की  सरकार है। 'आप' के पास केवल नैतिक ताकत ही  है।  किन्तु यह नैतिकता इसलिए नहीं है कि 'आप' के नेता ' बड़े आदर्शवादी और संयमी' हैं।  बल्कि इसलिए हैं कि  मौका ही नहीं मिला। अब मौका मिला  है तो देश की और   दिल्ली की जनता  देखेगी की 'आप' अपने कौल के कितने पक्के हैं ?'आप' की आर्थिक नीतियाँ  क्या हैं ? 'आप' आसमान से कितने तारे कब तक तोड़ कर लाते हैं ?'आप'  का एजेंडा कैसे पूरा होगा  ? 'आप'  कांग्रेस ,भाजपा ,कम्युनिस्ट और  अन्य विपक्षी पार्टियों से  कैसा व्यवहार  करेंगे  ? ये सवाल 'आप' की आयु तय करेंगे।
बहरहाल अभी तो 'आप'  नसीबबालों  के साथ चाय पीजिये। जिन्होंने आपको  नक्सली-उपद्रवी  की पदवी से विभूषित किया  !

                               श्रीराम तिवारी  

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

 

   कवि - नाटककार और महान विचारक बर्तोल्त ब्रेख्त का आज ११७ वां जन्म दिन है।



   इनके पिता कटटर कैथोलिक और माँ प्रोस्टेंट थी। जबकि  ब्रेख्त को जर्मन, फ्रांसीसी ,चीनी और भारतीय

  दर्शन शाश्त्र में विशेष रूचि थी। उनकी  निजी अनुभवजन्य कुछ  स्थापनाएँ इस प्रकार हैं   :-


[१]  गरीबी उदास जरूर  करती है  किन्तु  बुद्धिमान भी  तो  बनाती है !

[२]  लोग वहीँ के वहीं बने रहते हैं जबकि उनके मुखोटे निकल चुके होते हैं  !

[३]  कानून बनाने का एकमात्र उद्देश्य उन लोगों को ठगना है जो उसके बारे में नहीं जानते !

[४]  अपनी आकांक्षा की पूर्ती से बेहतर है एक अच्छा इंसान बनने का जज्बा !

[५]  भूँखा इंसान  यदि  पुस्तकों से  नजदीकियाँ  बना ले तो  पुस्तकें भी  हथियार बन सकतीं हैं !

[६]  बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह नहीं कि कोई  ही  गलती  न की जाए ,बल्कि आप कितनी जल्दी अपनी गलती

         को सुधारते हैं ,यह बुद्धिमत्ता है !

[७]    हर कोई हर पल किसी की मदद का अभिलाषी है !

[८]  जिन लोगों को सच का पता होता है फिर भी झूंठ बोलते हैं वे दुनिया में सबसे बड़े अपराधी हैं ,  जो सच से

    बाक़िफ़ नहीं होते वे बेईमानों के  कठपुतली मात्र हैं !

[९]  ज्ञान की दुनिया भी अजब है ,यहाँ दूसरों को सिखाने वाले खुद ही ज्ञान के मुँहताज  हैं !

[१०]   मौत से डरो मत ,यह आधे -अधूरे जीवन की तुलना में कम भयावह है !


                                         संकलन -श्रीराम तिवारी  [अनुवाद -दैनिक भास्कर ]

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

दिल्ली की महान जनता झूंठे ढ़पोरशंखियों और हवाई नेताओं को 'जुतयाना ' जानती है।


   भृष्ट जनों को खूब दी  ,लूट-घसोट की छूट।

   झाड़ू  जीती शान से , हारा दशलखिया शूट।।



   दिल्ली राज्य विधान सभा के चुनाव परिणाम  से भाजपा और उसके समर्थक सदमें  में हैं ।  पूरे देश में 'संघ परिवार' में शोक की लहर है। वे सभी भूलुंठित हैं  जिन्होंने अपने भषणों में उगला जहर है।  जबकि गैर भाजपाई विपक्ष में हर्ष की लहर है। भाजपा कार्यालयों में कौवे उड़ रहे हैं।  'वारांगनाओं 'ने भाजपा  की लुटिया डूबा दी है। किरण वेदी जैसी ओछी मानसिकता की ओरतों को दिल्ली की आवाम ने ओकात दिखा दी है। सोशल मीडिया पर जो लोग और लुगाइयाँ  इल्मी-किरण -नूपुर को भाजपा का  'तारणहार  ' सिद्ध करने को तुले थे।  ये  वेशर्म  छिछोरे और छिछोरियाँ अब भी  खीसें निपोरने से बाज नहीं आएंगे। दिल्ली में 'आप' की जीत से देश भर में भाजपा के विरोधी गदगदायमान  हैं।   'नमो ' के  दिग्विजयी अश्वमेध का घोडा 'आप' की  घुड़सार में हिनहिना रहा है। जगदीश मुखी , हर्षवर्धन, सतीश उपाध्याय ,राजनाथसिंग को किनारे  कर 'नमो' ने किरण को अपने रथ के आगे बिठाकर 'शिखंडी' बनाया  जिसने पूरे 'भगवा' दल और उसके  तपोनिष्ठों को श्रीहीन कर दिया। यदि यह  मेनकाओं  की हार  है तो  'विश्वामित्र' बैचेन   क्यों ?  भाजपा की हार से ,किरण वेदी की हार से दिल्ली की महान  जनता झूंठे ढ़पोरशंखियों और हवाई नेताओं को 'जुतयाना ' जानती है।  वह दुनिया में  सर्वश्रेष्ठ है ! 'आप' से और केजरीवाल से उम्मीद है कि  'मैदान न छोड़े' !

        'आप' को बधाई ! दिल्ली के जागरूक मतदाताओं को लाल सलाम !

                 भाजपा को शोक संवेदना !

                            श्रीराम तिवारी      

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

देश को या दिल्ली को लोकतंत्र की गाड़ी खींचने वाला बैल चाहिए साँड़ या बछड़ा नहीं।



     आम आदमी पार्टी  पर यह आरोप  है कि उसमें  आंतरिक  लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभाव  है। 'आप' के स्वयंभू नेता अरविन्द केजरीवाल कभी आला  अफसर हुआ करते थे। वे नौकरी में असफल रहे। बाद में नौकरी छोड़ अण्णा  की  नौटंकी में शामिल हुए।  चूँकि अण्णा  का  भृष्टाचार उन्मूलन या लोकपाल आंदोलन असफल रहा। इसलिए केजरीवाल भी वहाँ असफल रहे।  चूँकि वे अस्थिर चित्त के   भावुक -अधकचरे -अराजक प्राणी हैं। इसीलिये जब कांग्रेस ने उन्हें चिडाया की दम  है तो खुद राजनीति  में आकर 'भृष्टाचार' खत्म करो न !  तो केजरीवाल राजनीति  में कूंद  गए। विगत चुनाव में दिल्ली की जनता ने बेहतर समर्थन भी दिया था ,किन्तु वे ४९ दिन में ही  'रणछोड़दास' हो गए। मुख्य मंत्री तो क्या वे राजनीति  के भी काबिल नहीं हैं। अण्णा  हजारे खुद दिग्भर्मित और अपरिपक्व  किस्म  का 'एनजीओ' संचालक रहा है। उसके अखाड़े में किरण वेदी ने भी खूब 'माटी गोड़ी ' है।  अण्णा के अखाड़े से निकले नाकारा चेहरे ही दिल्ली चुनाव में इतने अहम हो गए, लोकतंत्र के लिए यह बहुत शर्मिंदगी की बात है। बक्त की आंधी ने क्या गुल खिलाये कि दिल्ली विधान सभा चुनाव में  स्थापित राजनीती से  परे , दो  महाबिकट  नकारत्मकताओं  को प्रतिदव्न्दी बनाकर पेश कर दिया  गया है।
                दिल्ली विधान सभा चुनाव में  इस दफा भी  'आप' का मुकाबला फिर से मुख्यतः भाजपा से ही है। यह मुकाबला  सांड और बछड़े  जैसा   है।  जिसे डेरा सच्चा सौदा -गुरमीत राम रहीम जैसा ऐयास बाबा  समर्थन दे रहा है वह सांड  जैसा है।  जिसे इमाम बुखारी  बिन  माँगे समर्थन देने का फ़तवा जारी कर रहे हैं ,  वो   अप्रशिक्षित, अर्धविकसित-बछडे  जैसा है।  इनमें से कोई भी  जीते किन्तु हारना तो लोकतंत्र को ही है। क्योंकि जनता  के समक्ष 'देश -काल- परिस्थिति ' ने एक तरफ  'कुआँ  दूसरी तफ खाई '  पैदा कर दी है। इसलिए राष्ट्र' रुपी कृषक  की स्थति दयनीय  हो रही है  । देश  को या  दिल्ली  को  लोकतंत्र की  गाड़ी खींचने वाला बैल   चाहिए  साँड़  या  बछड़ा नहीं।  उसे  पक्ष -विपक्ष के  मजबूत  बैल चाहिए।  वेशक -बैल के कुछ तो गुण  कांग्रेस में हैं। चूँकि कांग्रेस या यूपीए  ने अपने कार्यकाल में भृष्टाचार ,महँगाई  और बेरोजगारी पर कोई  नियंत्रण नहीं किया  इसलिए  उसे 'काँजीहौस ' में  डाल  दिया गया है। आज जो देश की दुर्दशा हो रही है उसके लिए कांग्रेस ही   सबसे अधिक जिम्मेदार है। किन्तु  पैर गंदे हो जाएँ तो काट कर फेंके नहीं जाते। कांग्रेस  भी कोई काठ की हांडी नहीं है कि  दोबारा चूल्हे पर न चढ़ सके !  पहले भी आपातकाल लगाने के बावजूद ,जयप्रकाश नारायण और जनता सरकार के प्रभाव के वाबजूद ढाई साल में कांग्रेस फिर से सत्ता में वापिस आ गई थी। कांग्रेस तो उस केंचुए की तरह ही जिसे मसल भी दो तो अषाढ़  में फिर से कई पैदा हो जाते हैं।अभी  कांग्रेसियों  का पेट वैसे भी खूब  भरा  है।  कुछ  दिनों बाद जब उनकी राजनितिक जठराग्नि तेज  होगी तो वे फिर से दिल्ली की और देश की सत्ता में होंगे। उससे फासिस्ज्म और साम्प्रदायिकता का कोई खतरा  भी नहीं। उसका उदारीकरण भी  सिर्फ दुनिया को दिखाने भर का है। जबकि भाजपा और 'आप'  का उफान केवल मौसमी है।
                         इसीलिये  भाजपा और 'आप' से तो  घिसी-पिटी बदनाम कांग्रेस  ही ठीक ठाक है।  कम से कम उससे 'बैल' का काम तो लिया ही जा सकता है।  किसान  को साँड या बछड़ा नहीं बैल  की जरुरत है। केजरीवाल को  भी अब  भाजपाइयों की तरह भगवान  याद आ रहे हैं। हालांकि केजरीवाल ने इमाम बुखारी के समर्थन  को या ममता के समर्थन को ठुकराकर जो  जीवटता  दिखाई उससे उनके  वैचारिक परिष्करण की आशा बलवती हुई है।  किन्तु  उनके पास कोई नीति ही नहीं है इसलिए उनका  राजनैतिक भविष्य  उज्जवल  नहीं है। वे अभी इस दौर में भले ही दिल्ली में सरकार  बना लें । किन्तु देश के युवाओं और मध्यम  वर्गीय बुर्जुआ राजनीति  में  वे  कांग्रेस  या भाजपा का विकल्प  होकर  उभरेंगे, इसमें संदेह है।दरसल कांग्रेस और भाजपा का असली  विकल्प केवल वामपंथ ही दे सकता है।  वेशक  अभी तो केजरीवाल और 'आप' ही  नामी-गिरामी 'कद्दावर ' साम्प्रदायिक पूंजीवादी -'भगवा 'नेतत्व की चुनौती दे रहे  है। अभी तो  साम्प्रदायिकता और कट्टर पूंजीवादी    विचाधारा के अच्छे दिन आये हैं। लेकिन दिल्ली में 'आप' जीत भी गए तो कुछ नहीं कर पाएंगे। क्योंकि   विपरीत  ध्रुब वाली केंद्र सरकार 'आप'  को कुछ करने  ही नहीं देगी। 'आप'  की झाड़ू  के तिनके -तिनके  उड़ जाएंगे।  
                                          वैसे भी  केंद्र में सत्तासीन  वर्तमान सर्वोच्च  नेतत्व तो  'भाग्यवान' [नसीब वाला ]  है।  मुसीबत की मारी  कांग्रेस या विचारधारा के धनी वामपंथ को किनारे लगा कर देश की जनता ने अभी तो   भाग्यवानों को या 'आप'  को  चुनने का तय किया है। खुद भेड चाल  ही  ने इस  भयानक   अराजकता और अस्थिरता के दौर  को न्यौता  दिया  है।जनता को और 'आप' को  शिकायत करने या  निराश होने  का तब कोई हक  नहीं  जब की उसे मालूम है कि  फिजाओं में साम्प्रदायिकता और पूँजीवाद का ' धीमाजहर '  घोला  जा रहा है। एकमात्र आशाजनक  तथ्य  यही है कि  अंततोगत्वा जीत सत्य की होती है। यह सार्वभौम सूत्र ही आवाम को पुनः सत्य के पक्ष में पुनः  खड़ा करेगा। 'आप ' के या उसके नेता अरविन्द केजरीवाल  की व्र्तमान जीत हार से देश को कुछ खास फर्क नहीं पड़ता।  भाजपा तो केंद्र सत्तारूढ़ है ही। उसके काम  को भी सभी दख रहे हैं। 
  केजरीवाल ,किरण जैसे उथले नेता -कम अफसर ज्यादा ,  मुख्य मंत्री तो क्या राजनीति में प्रवेश  के भी काबिल नहीं हैं। अण्णा  हजारे खुद दिग्भर्मित और अपरिपक्व किस का 'एनजीओ' संचालक रहा है। उसके अखाड़े में किरण वेदी ने भी खूब 'माटी गोड़ी ' है। बक्त की आंधी ने दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा और 'आप' को प्रतिदव्न्दी बनाकर पेश किया है। जिसमें अन्ना के पूर्व चेला - चेली   मुँह  चला रहे हैं।

                            श्रीराम तिवारी 

हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो !




      पुरवा हुम -हुम  करे ,पछुआ गुन -गुन करे ,

      ढलती   जाए शिशिर  की  जवानी  हो !


      आया पतझड़ का दौर ,झूमें आमों में बौर ,

       कूंके  कुंजन में कोयलिया कारी हो !


       वन महकने लगे ,मन मचलने लगे ,

       ऋतू फागुन की आयी सुहानी हो !


      करे धरती श्रृंगार , दिन वासंती चार ,

      'अलि ' करने लगे मनमानी हो !

   
     फलें फूलें दिगंत ,गाता  आये वसंत ,

    हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो !

                         नोट :- प्रस्तुत पंक्तियाँ  मेरे प्रथम काव्य संग्रह 'अनामिका ' [१९९८] में प्रकाशित  ''अमर शहीदों के सपनो का भारत'' नामक रचना  से उद्धृत कीं  गईं  हैं। कुछ साल पहले नई  दुनिया के प्रथम पृष्ठ 'सकारात्मक सोमवार' में  भी यह रचना प्रकाशित हो चुकी है।  
                                                                                                  श्रीराम तिवारी 

                                                                       www.janwadi .blogspot.com

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

इस दौर में तो 'बाजार ही समाज का दर्पण है ' !



   ज्ञात विश्व  के सभ्य समाजों और उदार राष्ट्रों के विकास क्रम में एक अद्भुत समानता रही है। कुछ कटटरपंथी 'बंद' समाजों और 'सुल्तानी -आसमानी राष्ट्रों' को  यदि अपवाद मान  भी लिया जाए तो भी विश्व के अधिकांस  समाजों और राष्ट्रों  की सतत विकास यात्रा  में सार्वभौम सत्य की साख सूक्तिबद्द  होने के वाबजूद भी नित्य परिवर्तनीय  रही है। प्रत्येक दौर में  नए -पुराने की द्वन्दात्मक्ता के फलस्वरूप मानवीय मूल्यों  का सतत  अविराम प्रवाह एवं  एकसार [यूनिफॉर्म ] परिष्करण एवं भूमंडलीकरण होता रहां  है।जीवंत और विकाश् मान समाजों और राष्ट्रों ने इन्हीं अवदानों से दुनिया में बढ़त हासिल की है।
                         मध्ययुग के  बर्बर सामंतयुगीन समाज  और उससे पूर्व के प्रचलित कबीलाई -समाजों -राष्र्टों में , न केवल भारतीय उपमहाद्वीप  के तत्कालीन जनपदों में  बल्कि  ततकालीन ज्ञात विश्व*   के  प्रायः सभी देशों और समाजों में प्रकारांतर से  मान्यता प्रचलित  थी कि  'यथा राजा तथा प्रजा'। आम आदमी का तब कोई स्वतंत्र  वजूद  या इतिहास नहीं होता था।  केवल राजाओं ,रानियों ,सम्भ्राटो ,साम्राज्ञीओं ,सामंतों ,क्षत्रपों ,सेनापतियों ,योद्धाओं और अप्रतिक  सुंदरी ललनाओं का इतिहास ही जनश्रुत हुआ करता था। धर्मगुरु ,पुरोहित वर्ग या कोई  शिक्षक भी कभी कभार किसी आख्यान का हिस्सा हो जाया करता था। अभिप्राय यह है कि यही वर्ग तब 'समाज का दर्पण' हुआ करता था।
                      सामंतवाद के साम्राज्यवादी रुझानों और  कतिपय प्रगतिशील प्रयोजनों से  उपनिवेशवाद का सिलसिला चल पड़ा। यूरोपियन समाजों और राष्ट्रों को अज्ञात  'नयी दुनिया' की खोज  की उद्दाम बढ़त हासिल हुई। १७ वीं -१८ वीं सदी  के मध्य  तक इंग्लैंड -फ़्रांस -जर्मनी सहित सम्पूर्ण  यूरोप  में वैज्ञानिक अनुसन्धान एवं मानव बुद्धि की  चमत्कारी शक्ति  का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन  होने लगा। सामंतों के प्रसाद पर्यन्त -अधिकांस  लेखक ,कवि ,नाटककार और कलाकार अपने आप को 'नाइट ' या कुलीन समझने लगे। सामंतों और कुलीनों के आपसी संघर्ष ने 'उदारवादी सामंतवाद' को पैदा किया।  आगे चलकर  इसी  की कोख से ततकालीन  'नरम पूंजीवाद' का जन्म हुआ  जिसने - भद्र और कुलीन  यूरोपियन समाज  को भी शासक वर्ग की क़तार में शामिलकर लिया।पूंजीपति ,साहूकार और जमींदार  भी तब  उस तत्कालीन शासन व्यवस्था में अपना अहम हिस्सा हासिल करने में सफल रहे।  सामंतवाद पर पूंजीवाद के इस वर्चस्व ने  चूँकि  'रेनेशा' या पुनर्जागरण  की  भी  पूर्व पीठिका लिख  डाली थी ।  इसीलिये  सामंतों पर दवाव बनाया गया कि धनाढ्य और कुलीन वर्ग को भी अब शासन तंत्र में मुक्मबिल जगह दी जाए।  उन्हें 'मैग्नाकार्टा' से भी आगे विशेषाधिकार प्रदत्त किये जाएँ। इस परिघटना को लोकतंत्र और  समाजवाद के जन्म की पूर्व पीठिका कह सकते  हैं । पूंजीवादी उदयकाल के   दौर में   शिक्षा साहित्य ,कला और विज्ञान में  पारंगत कुलीन समाज ने  तत्कालीन शासक वर्ग  से लोहा लोया। अपना सम्मान और स्वाभिमान हासिल किया। जिस  दौर  में  साहित्य  ने पोप  की  प्रभुसत्ता को ललकारा ।  दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ,समानता,बंधुत्व और लोकतंत्र के झंडे बुलंद किये हैं।दरसल  उसी दौर का 'साहित्य ही  समाज का दर्पण' है।
                        वेशक कभी यूनान और भारत  भी आध्यत्म ,गणित  या दर्शनशात्र में  निष्णांत रहे हैं । किन्तु आधुनिक  भौतिकी , रसायन ,मेडिकल साइंस,जीव विज्ञान ,अंतरिक्ष विज्ञान ,आणविक भौतिकी -रेल ,मोटर, पावरलूम से लेकर कम्प्यूटर  या मोबाईल तक - जितनी भी खोजें और उसके अवदान आज हम प्रयोग  कर रहे हैं वे सभी उसी यूरोप ,अमेरिका और पश्चिम की देंन  हैं।  जिसने दुनिया को लोकतंत्र ,धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के सिद्धांत सूत्र दिए हैं।  इन्ही पश्चिमी  समाजों और राष्ट्रों की  वैज्ञानिक खोजों तथा अनुसंधानों से आज धरती पर 'भूमंडलीकरण' दमक रहा है।  उन्ही के  आधुनिक आविष्कार  अब सर चढ़कर बोल रहे हैं। यह शोध का विषय है कि  जो कभी  संसार में 'जगद्गुरु'  हुआ करता था। वही महान देश - भारत -गाय,गंगा ,गौमूत्र ,तुलसी , पीपल और 'अहिंसा परमोधर्मः' से  आगे नहीं बढ़  पाया। सदियों की गुलामी  के कारक  भी इन्हीं तत्वों  में विद्यमान हैं।
                                 पश्चिमी  साम्राज्य्वादी  और उपनिवेशवादी  राष्ट्रों में  साइंस की  उन्नत तकनीकी  का  धमाल  ,एटम  बम, ,पेट्रोलियम उत्पाद  तथा सूचना संचार क्रांति के आविष्कारों  के चक्रवात  अब आक्रामक पूंजीवाद प्रचंड  को हवा दे  रहा है। यह  न केवल वस्तुओं के ,न केवल जमीनों के ,न केवल मानवीय या नैसर्गिक  उत्पादनों  के , न केवल  वैश्विक बाजारीकरण के  अपितु इस युग के  मनुष्य मात्र की आत्मा के वैचैनीकरण का दौर  है।  इसलिए  इस दौर में तो 'बाजार ही समाज का दर्पण है '।
                     इस दौर में  किस देश की सत्ता में कौन रहेगा यह बाजार ही तय करेगा। तहरीर  चौक पर कौन कितना हंगामा  खड़ा करेगा  यह 'विश्व बाजार के नियंता  ही तय करेंगे। इराक ,अफगानिस्तान ,सीरिया ,फलिस्तीन और नाइजीरिया में कौन आग लगाएगा यह 'हथियारों के सौदागर याने बाजार की शक्तियां निर्धारित करेंगी।  किस देश में लोकतंत्र का  खात्मा करना है ,किस्में तानाशाही लाना है ,किस में गृह युद्ध भड़काना है यह सब ' अंतर्राष्ट्रीय बाजार  की शक्तियाँ ' तय कर रहीं  हैं।  भारत के  राम लीला मैदान में या जंतर-मंतर पर कब  किसके खिलाफ  कितनी नौटंकी  करना है  यह भी  लोकल नेतत्व  ही नहीं  -मीडिया ,कार्पोरेट घराने  ही नहीं , नवधनाढ्य  फुर्सतिये  ही नहीं बल्कि  'विश्व  बाजार की आर्थिक शक्तियाँ ' तय करेंगी । बाजार में उपलब्ध उत्पादनों , मांग और आपूर्ति के अनुसार यह पुनीत कार्य  सम्पन्न  होता है।

         अब तो   होली , दीवाली ,ईद ,क्रिसमश  ही नहीं बल्कि  बेलेन्टाइन डे  की भव्यता  भी बाजार ही तय करता है।  विश्व  बाजार ही तय करेगा  कि किस देश की किससे  दोस्ती और किससे  दुश्मनी रहेगी? भारत का  विदेशों   में जमा कालाधन  वापस मिलेगा कि  नहीं ? यह  भी 'विश्व बाजार की शक्तियाँ ' ही  तय करेंगी। देश में  विकास  -सुशासन -कब कितना आएगा ? लोकतंत्र रहेगा या तानशाही आएगी ? कौन सत्ता में रहेगा और कौन नहीं रहेगा ?  'बाजार की ताकतें ' ही  यह तय करने में जुटीं  हैं। इसीलिये मैं  भुजा  उठाकर घोषणा करता हूँ कि  'इस दौर में तो बाजार ही समाज का दर्पण है '

                                  श्रीराम तिवारी - Email-shriramtiwaribsnl@gamil.com
                                                           web site  -www.janwadi.blospot.in

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

त्यागो सामंती युग का ,नायिका -नख -शिख वर्णन।




   बहुत बदगुमानी महक रही है इन दिनों  राजनीति  की वासंती फिजाओं में । सीमाओं पर बारूदी गंध  भी बढ़ रही है। फासिज्म का  उदार चेहरा अब बिकराल होने लगा है। समस्त  राष्ट्र एक ही  मुठ्ठी  में  समा गया है।  यह किसी से छिपा नहीं है। राजनीतिक खुरचन याने दिल्ली राज्य की मामूली सी  सत्ता के लिए  बिकट बेहयाई का दौर है।
             चाल -चरित्र - चेहरा जैसें आकर्षक शब्द  अब  शब्दकोश में भी   पनाह मांग रहे हैं। जिन्हे अपनी नीति -सिद्धांत या पुरषार्थ  पर भरोसा नहीं वे अब सुन्दर किन्तु खिलंदड़  सबलाओं को जरा ज्यादा ही अपने  विजय रथ पर  शिखंडी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। नाकारा  और दलबदलुओं को गले लगाया जा रहा है . अतीत में जिन्होंने सत्तू बांधकर कांग्रेस मुक्त भारत का या किसी खास मकसद का अभियान चला रखा था वे किसी अज्ञात कोप भवन में उसाँसे भर रहे हैं।  टीवी ,फिल्म ,व्यापार ,व्यवसाय , विज्ञापन ,मॉडलिंग चिकित्सा या एयर होस्टेस ही नहीं  अब तो खास तौर  से  राजनीति  के मंच पर प्रमुखता से  नारी सौंदर्य  के बलबूते सत्ता हथियाने का चलन हो चला  है।  वेशक  साहित्य में भी सत्ता पुरुष्कृत निरीह  प्राणी अब 'नारीवादी  विमर्श' से हटकर  उसकी देहयष्टि के बरक्स रीतिकालीन  हो रहे   है।
             शासक वर्ग जब नीतियों या कार्यक्रमों से जन  समर्थन नहीं जुटा पाता  तो वह फ्यूहरर की भाँति  'प्रहसन' अभिनीत कर अपना लक्ष्य  साधने  लगता है। चूँकि   नारी पात्र  तो इस काम में  नैसर्गिक रूप से निष्णांत  है।  इसलिए शासक वर्ग  इन दिनों  पूँजी की ताकत से  बाजारीकरण  वाले समाज की  हर बिकाऊ चीज की तरह नारी पात्रों को  भी  प्रमुखता से  रंगमंच पर  पेश  कर रहा  है। साहित्य,कला और संगीत  जब 'आम आदमी'  के लिए न होकर खास  लोगों के लिए होने लग जाए ,नारी सौंदर्य जब सत्ता की क्रीत दासी बन जाए तो राष्ट्र की  धमनियों में लोकतंत्र ,धर्मनिरपेक्षता और  समाजवाद की त्रिवेणी नहीं बहती।  राष्ट्र के भृष्ट अवयवों में  फासिज्म का कीड़ा कुलबुलाने लगता है।
             यदि किसी लेखक ,साहित्यकार ,कवि या कलाकार को  देश या दुनिया में यह परिदृश्य  नहीं  दिखता  तो वह 'स्वान्तःसुखाय'  के स्वप्नलोक में सद्गति के लिए अभिशप्त  है। क्रांतिकारियों की नजर में तो वह नितांत  दया का पात्र है। जो पतनशील अधोगामी  व्यवस्था को सुधारने की या उसमें पैबंद लगाने की  बात करता है वह साहित्यकार नहीं  बल्कि भड़भूँजा है। उसे तो साइकल पंचर की दूकान ,कपडे रफू करने की दूकान  खोल लेना चाहिए । बकौल गुलजार ' पिलंबर हो जाना चाहिए ! दरसल जो शाब्दिक - अभिव्यंजना साहित्य  या कला के तूणीर से व्यवस्था के मर्म को भेद डाले उसे ही वास्तविक जनोन्मुखी या  क्रांतिकारी सृजन कहा जा सकता है। वही राष्ट्र का नवनिर्माण करेगा। वही प्रगतिशील -जनवादी  साहित्य  ही  राष्ट्र के  भूत -भविष्य  और वर्तमान का साक्षी बन सकता है।
                      सृजनात्मक विचलन को लेकर मैंने आपातकाल में भी एक कविता लिखी थी। जो ९० के दशक में   प्रकाशित  मेरे प्रथम काव्य संग्रह -अनामिका में भी प्रकाशित हुई थी। लगभग बीस साल पहले  मेरा यह  पहला   काव्य संग्रह  प्रकाशित हुआ था। उसमें सन्निहित एक 'लम्बी कविता'  की कुछ  पंक्तियाँ  यहाँ प्रस्तुत हैं ।

          मौसम मस्ती चाँद सितारे ,कनक कामिनी कंगना। 

         प्यार -मोहब्बत  दगा -बफा , या सुरा - सुंदरी  ललना।। 

         कुंठित कवि को बहुत सहज है , इन विषयों पर लिखना।  

          देश समाज की कातर करुणा ,जिन अंधों को नहीं देखना।। 

          कर सकते हो  करो  कलम से , कवि -दुराचार का मर्दन। 
        
          नहीं चलेगा  नव युग में ये  ,नायिका -नख -शिख वर्णन। । 

                            श्रीराम तिवारी 
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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

देश पर मंडरा रहे आसन्न खतरे की तरफ बहुत कम भारतीयों का ध्यान है !



अमेरिकी राष्ट्रपति को यदि भारतीय प्रधान मंत्री 'बराक भाई ' कहकर सम्बोधित करते हैं ,अपनापन दिखाते हैं तो इसमें  क्या  बुराई है ?अपने हाथ से चाय बनाकर पिलाने में क्या अनर्थ हो गया ?ओबामाजी ने  भारत  को सुरक्षा परिषद   का स्थायी सदस्य बनवाने का समर्थन किया है । इसीलिये उनकी चारण - वंदना में में क्या बुराई है  ?ये सभी वाकये यदि किसी 'निरीह' भारतीय नागरिक को फीलगुड मेहसूस  कराते हैं तो इसमें  किसी का क्या  जाता है ?   राष्ट्रीय सरोकारों और जन- प्रश्नों का सीधा सरल समवेत उत्तर  है कि किसी भी घटनाक्रम या द्विपक्षीय संवाद में कहीं कोई बुराई नहीं है।
                              किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि 'सफलता की संजीविनी बूटी ' तो कहीं भी किसी को भी नजर नहीं आ रही है।  कुछ शुतुरमुर्ग जरूर आत्म मुग्ध हैं।  वे एक ही रट  लगाये हुए हैं।  अभी तो ८ माह ही हुए हैं।  यानी कि  अगले -नौवें महीने में 'विकास ' नामक अजूबा  पैदा होने वाला है। 'मेक इन इण्डिया' होने वाला है।  कालाधन-  वापिसी होने  वाली है। भृष्टाचार विमुक्ति भारत होने वाला है। पाकिस्तान जमींदोज  होने जा रहा है।  चीन  का  चक्का जाम होने जा रहा है। आतंकियों , मुनाफाखोरों,मिलाबटियों ,रिश्वतखोरों का पराभव सुनिश्चित है।  जिस के अभाव  में भारत रुपी लक्ष्मण अभी भी मूर्छित पड़ा हुआ है।वह संजीवनी  बूटी  अगले बजट सत्र तक 'इस जम्बूदीप में  प्रकट होने वाली है।
                    वर्तमान नेतत्व द्वारा विगत  चुनावों में बार-बार कहा गया है कि  विगत  ६० साल में  किसी  भी नेता या या राजनैतिक पार्टी ने अभी तक कुछ नहीं किया।  पाकिस्तान के दो टुकड़े किसने  कराये क्या यह भी बताना होगा ?  साम्प्रदायिकता ,जातीयता और असमानता  के अविराम द्वंद  में जूझती आवाम ,भाषा -क्षेत्र - सांस्कृतिक संघर्ष में निरंतर संघर्षरत जनता  और अपने स्वार्थों के लिए विदेश भाग  रहीं प्रतिभाएं क्या  इन्होने  ही अभी तक  भारत  राष्ट्र की एकता को अक्षुण रखा है ? क्या भारत की संप्रभुता को अक्षुण रखने में  उनका रंचमात्र योगदान है जो आज सत्ता के शिखर पर विराजमान हैं ?यदि  आपस में  मरती -कटती  कांग्रेस ,नेहरू जी , इंदिरा जी ,मोरारजी ,चरणसिंह ,राजीव गांधी ,विश्वनाथ प्रतापसिंह, चंद्रशेखर ,गुजराल ,देवेगौड़ा ,नरसिम्हाराव, अटल बिहारी ,मनमोहनसिंह इत्यादि  सभी  अकर्मण्य और नाकारा थे। तो वह लोकतंत्र अभी तक कैसे सलामत रहा जिसके माध्यम से वर्तमान नेतत्व सत्तारूढ़ है।हर बार के  चुनावों में आपका दावा रहा है  कि  एकमात्र हम  ही हैं हिन्दू पद पादशाही के प्रतिस्थापन्न [आइसोटोप्स] । हम  कर देंगें। 'Yes We Can' ! !ओ. के। अब करो न !  आप  अमेरिका ,चीन पाकिस्तान को ठीक कर  दीजिये !  जनता से किये गए वादे पूरे कीजिये ! अपने ही असंतुष्टों को संतुष्ट  कीजिये ! आप दाऊद  इब्राहीम को  सजा दिलाईये !आप विकास की गंगा बहाइये  हम भी तहेदिल से आपके साथ है !  वेशक हम असमानता और अन्याय का प्रतिकार करेंगे।  वेशक हम  झूंठ -कपट-छल  की राजनीति  का विरोध करेंगे।  वेशक हम  पूँजीपतियों  की हितसाधक नीतियों का प्रबल  विरोध करते रहेंगे ! किन्तु यदि आप देश के गरीबों के पक्ष में ,मजदूरों के पक्ष में ,किसानों के पक्ष में और देश के पक्ष में कोई नीति या कार्यक्रम पेश करते हैं तो हम दिलोजान से आपके साथ है। किन्तु आपकी अभी तक की भाव भंगिमा से हमे संदेह है कि  आपका विजन दुरुस्त है।
                                    चुनाव जीतने के १० मिनिट वाद ही  वर्तमान भारतीय नेतत्व ने  नवाज शरीफ को  फौरन याद कर लिया।  शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया।   शरीफ साहब की  माताजी को शाल श्रीफल भेजा। नवाज ने, पाकिस्तान के आतंकियों ने और पाकिस्तान की फौज ने भारतीय नेतत्व को  एक इंच भी कहीं छोट नहीं दी। उन्होंने एक क्षण के लिए भीआपको  किंचित  रंचमात्र  सम्मान नहीं दिया।  पाकिस्तान की [अ] मित्रता पूर्ण   बेरुखी से आजिज आकर  भारतीय प्रधानमंत्री ने  शायद 'अबोला' ठान लिया है । हालाँकि गृहमंत्री  राजनाथसिंह  और रक्षा मंत्री  पर्रिकर ने भारतीय फौजों को आदेश दिया है  कि  'तीव्रता से जबाब दो ' ! परिणामस्वरूप अब भारतीय  जवान रोज -रोज  पहले से ज्यादा  शहीद होने  लगे हैं।  बड़ी-बड़ी डींगें हाँकने  वाले   भारतीय प्रधानमंत्री अब तक  न तो  'नवाज शरीफ'  को 'नाथ '  पाये हैं  और न  ही वे चीन  को 'साध' पाये हैं।   उलटे आनन फानन में अमेरिकी  धन -कुबेरों के मोहपाश में , हड़बड़ी में पाकिस्तान और चीन की  सामरिक साझेदारी को बुलंद कर बैठे हैं ।  यह सत्य है कि  वर्तमान नेतत्व के  सत्ता में  आने के बाद  भारत  विरोधी ताकतों के  हमले तेज हो गए हैं। न केवल पाकिस्तान के हमले और तेज हो गए हैं , बल्कि उसने युद्धक  सैन्य  सामग्री का आधुनिकीकरण भी तेज कर दिया है। नमो  के 'नए मित्र बराक ओबामाजी '   एक तरफ तो भारत को सहिष्णुता ,धर्मनिरपेक्षता का ज्ञान बाँट रहे हैं  दूसरी ओर  पाकिस्तान की भरपूर मदद कर रहे हैं।  हमारे   यशश्वी  और तथाकथित डायनामिक  नेता 'नमो 'शायद भूल रहे  हैं कि -

        कुत्ते की दुम  बारह साल पुंगेरी में फसाए जाने पर भले ही सीधी  हो जाए किन्तु धंधेबाज ,मुनाफाखोर,   'हथियारों के सौदागर'  कभी  किसी के दोस्त नहीं हो सकते। अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत से लौटे अभी एक सप्ताह ही हुआ है। किन्तु  कल सीनेट में फिर  भारत को चिढ़ाने का प्रस्ताव लाया गया है।  इस प्रस्ताव में   पाकिस्तान को जारी सतत  आर्थिक सहायता की मद में एक अरब डॉलर  की [६१ करोड़ रूपये]  अतिरिक्त सहायता को मंजूरी दी  जानी है  ! इनसे जो हथियार खरीदे जाएंगे वे भारतीय निर्दोषों का खून बहाने के काम आएंगे। ऊपर  से तुर्रा ये कि चीन भी पाकिस्तान को अत्याधुनिक युद्धक सजी सामान सप्लाई करने की घर पहुँच सेवा  के लिए तैयार है। 
               अमेरिकी विदेश सचिव का ताजा  वयान  है "पाकिस्तान हमारे दिल में रहता है ".!

                           उधर भारतीय विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज जब बीजिंग पहुंची तो उनकी आवभगत में  चीनी नेताओं ने पलक पांवड़े विछाये।  खबर है कि  चीन के राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोड़कर भारतीय विदेश मंत्री की आवभगत की ,उनसे मुलाकत की। सुषमाजी भी गदगद हैं। इधर  भाजपाई भी स्थानीय  चुनावों में धनबल-बाहुबल,सम्प्रदायबल  और जातिबल  की सफल राजनीति  से गदगद हैं।  इस गद्गद अवस्था में वे भारत पर आसन्न संकट  को नहीं देख पा रहे हैं। 
                                                            सत्ता के मद चूर नेताओं  की अविवेकी नीतियों  और प्रशासनिक असफलता के कारण  सीमाओं  पर  भारतीय जवानों  लहू अविरल प्रवाहमान है। इधर  महाराष्ट्र ,आंध्र और मध्यप्रदेश में  किसानों की आत्महत्याके आंकड़े बढ़ते ही जा रहेहैं।  वेरोजगार युवाओं  का मजबूरन या शौकिया  ही  अपराधीकरण की ओर रुझान बढ़ चला  है। प्रशासनिक  व्यवस्था का भृष्टाचारीकरण चरम पर है। अंधेर नगरी -चोपट राजा है। लगातार ढपोरशंख बजाने का नतीजा है कि  भारत अंदर से खोखला और बाहर से असुरक्षित होता जा रहा है।  देश  पर मंडरा रहे  आसन्न खतरे  की तरफ बहुत कम भारतीयों का ध्यान है। 
                                         भारत की वर्तमान राजनीति 'मदारी के खेल'  जैसी हो चुकी है। तभी तो दिल्ली राज्य विधान सभा चुनाव के दौरान भारतीय राजनीती का वीभत्स रूप प्रकट हुआ। अण्णा आंदोलन के कुछ अर्धकुशल   अराजक  और लम्पट समर्थक 'आप' की नाव में  तालियाँ  बजा रहे हैं। कुछ  प्रगतिशील -वामपंथी और ममता समर्थक भी केजरीवाल को 'गंभीर' नेता मान बैठे हैं। उधर अण्णा की कुछ निठ्ठली ,दलबदलू , चेलियाँ ,इल्मी-फ़िल्मी टाइप की रूपसी वरांगनाएँ  भी  वर्तमान सत्तारूढ़  केंद्रीय नेतत्व पर  जरा ज्यादा ही फ़िदा हैं।वे इस वर्तमान  असफल नेतत्व पर क्यों  आसक्त हैं ? यह  विचारणीय प्रश्न है ! उन्हें तो शायद  भृष्ट और  पूंजीवादी  राजनैतिक व्यवस्था की  'अपान वायु ' में  भी मजा आ रहा है। उन्हें भरम  है कि  ढपोरशंखी  बड़बोले   नेताओं  ओर  नेत्रियों को भारत  की जनता सदैव सर -माथे रखेगी। जनता के एक बहुत बड़े समूह को भी ग़लतफ़हमी है कि   किरण -केजरीवाल ही विकल्प हैं।
                            दरसल कांग्रेस एक महा भृष्ट और बदनाम पार्टी होने के वावजूद ,अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली से संगठन चलाने के वावजूद दिल्ली में तो सबसे  बेहतर नेतत्व देने की क्षमता रखती है। अजय माकन ,शीला दीक्षित , अमरिंदरसिंह लवली  जैसे दर्जनों बेहतरीन नेता कांग्रेस में हैं जो  किरण वेदी और अरविन्द केजरीवाल से बेहतर शासन चला सकते हैं।  किन्तु  'कांग्रेस  ही कांग्रेस की दुश्मन हो ' तो यह दिल्ली वालों का दुर्भग्य है कि  उन्हें  फासिस्ट भाजपा और अगम्भीर 'आप' में से किसी एक को  चुनने का ऐलान 'मीडिया ' ने या 'वक्त' ने कर दिया है। आखिरकार जनता को भी तो अपने  प्राण ,व्यान ,समान ,उदान की चिंता  स्वयं करनी चाहिए ! क्या सारा ठेका नेताओं ने ले रखा है ?  

                                    श्रीराम तिवारी 
                                

चाल चरित्र को बेच , खरीदते चेहरे चिकने !




       नहीं  विकास  नहीं   नीतियाँ , नहीं  वसंती रंग।

       दिल्ली  राज्य  चुनाव की , हुई तश्वीर  बदरंग।।

        हुई  तश्वीर बदरंग ,  संग दिग्भर्मित नर मेदिनी।

       फागुन के दिन चार, ज्यों अवसरवाद  की चांदनी।।

       कहें कवि 'श्रीराम' ,  क्या यही सुहाने सपने ?

        चाल चरित्र को  बेच  , खरीदते  चेहरे चिकने ।।


                                  श्रीराम तिवारी

     

 
        

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

लफ्फाजी और झूंठ में , नव नेतत्व निष्णांत ।।


         राजनीति  में चल रहे ,शब्दं बाण सब  ओर।

         बिन प्रयास मुर्दे  बहें , गटर  गॅंग  की ओर।।


          बलिहारी नेतत्व की ,डाल रखे जिन फन्द।

          पूंजीवादी जलजले , उड़ा  रहे  दुर्गन्ध ।।


          नहीं  राष्ट्र प्रतिबध्दता , नहीं  विचार सिद्धांत।

         लफ्फाजी और झूंठ  में ,  नव  नेतत्व निष्णांत ।।

                             श्रीराम  तिवारी