शनिवार, 4 अक्टूबर 2014



   सूर -सूर तुलसी शशि ,उडगन केशवदास।

  अबके कवि खद्दोत सम ,जहँ-तहँ करहिं प्रकाश।।


                   
 हिंदी आलोचना साहित्य के  शिखर पुरुष;- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल   की जयंती पर कोटिशः नमन !

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

जो कभी 'संघम शरणम गच्छामि हुआ करते थे वे अब सभी मोदी शरणम गच्छामि हो रहे हैं !



 संसार की सभी सभ्यताओं में -धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों में अंतर्निहित कुछ ऐंसे तत्व भी है जो देश और दुनिया   में अमन -भाईचारा  और  मानवीय  चारित्रिक उत्कृष्टता  की  बेहतरीन परम्पराएँ  पेश करते हैं।  भारत  तो चूँकि  त्यौहारों का  ही देश है , इसलिए यहां की सभी  सामाजिक ,सांस्कृतिक और लौकिक धाराओं  के संगम पर अनेकता में एकता   ही भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषता है।  इन त्यौहारों के बरक्स - समाज और राष्ट्र की कोशिश रहती है कि देश के विधान और परम्पराओं में  कदाचित  टकराव न हो ! इस बार  चूँकि  विजयादशमी याने दशहरे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 'सर संघ चालक ' श्री मोहनराव जी भागवत ने  नागपुर  से  जो  'बौद्धिक' दिया -उस का  डी डी  -वन पर  प्रसारण विवाद का विषय बन चूका है। इस संदर्भ में आलोचना के स्वर  सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं कर दिए जाने चाहिए कि  ये तो गैर  भाजपाई या 'संघ' विरोधियों की पुरानी आदत है। बल्कि इस संदर्भ में आलोचना इसलिए तर्कसंगत नहीं है  कि 'संघ' तो सत्ता का  ही  प्रमुख  केंद्र  है।  सत्ता में उसकी अनुषंगी भाजपा ही विराजमान है।  चूँकि जनता  ने यह सब समझते हुए ही भाजपा  और मोदीजी को भारी बहुमत से केंद्र सरकार में बिठाया है कि'संघ' की यही इच्छा है।  जनता से कुछ भी तो छिपा नहीं है। इसलिए जनता को  ही यह तय करने दिया जाए कि संवैधानिक सत्ता केन्द्रों को या साम्प्रदायिक   सांस्कृतिक संगठनों को आइन्दा सत्ता में  कितना भाव दिया जाए।  यदि अल्पसंख्यक वर्ग  को राजनीति  का निरंतर एक महत्वपूर्ण सोपान  बनाये रखा जा सकता है ,तो बहुसंख्यक वर्ग के राजनीतिकरण पर प्रश्न चिन्ह लगाने का हमें हक कैसे मिल सकता है ? इसी  तरह जब यूपीए के शासनकाल में सोनियाजी बाज  मर्तवा न केवल  सरकारी माध्यमों पर बल्कि सरकारी कामकाज पर भी अपनी पकड़ रखतीं थी।  कुछ  महत्वपूर्ण फाइलों पर  तो रावर्ट वाड्रा की  भी भूमिका  संदिघ्ध  हुआ करती थी, आपातकाल में -संजय गांधी के तो क्या कहने बेताज बादशाह वही कहे जा  सकते थे। इन सबकी तुलना में वर्तमान सत्तारूढ़  भाजपा के एक अदद साधू स्वभाव वाले निस्वार्थ  सहयोगी और हितेषी 'मोहन भागवत '  की क्या विसात ?  केवल सरकारी मीडिया पर   सम्बोधन मात्र से , केवल नमोगान या मोदी जी की तारीफ़  मात्र से ही बेचारे  मुफ्त में बदनाम हो रहे हैं।
                       दरसल  संघ या संघ  परिवार के बारे में  अभी तलक  आम धारणा यही रही है कि  'संघ' एक  ऐसा  साम्प्रदायिक - सांस्कृतिक - सामाजिक संगठन है जो परदे के पीछे से 'शुध्दतम'राजनीति करने में निष्णांत है। संघ एक ऐंसा  महासूर्य है  जिसके चारों-ओर या  इर्द-गिर्द- भाजपा, वी एच पी ,बजरंग दल ,हिन्दू मुन्नानी , अखिल भारतीय  विद्द्यार्थी परिषद ,भारतीय मजदूर संघ , भारतीय जनता युवा मोर्चा ,भारत  स्वाभिमान , स्वामी बाबा - रामदेव  , अन्ना हजारे ,लता मंगेशकर , श्री श्री रविशंकर ,प्रमोद मुतालिक  , शिवसेना तथा  तमाम भगवा ब्रिगेड  वाले -भ्रमण किया करते हैं। मेरा ख्याल था  कि 'संघ' के प्रमुख को पोप  के जैसा न सही ,किसी इस्लामिक खलीफा जैसा न सही किन्तु किसी भारतीय 'खाप'  पंचायत के मुखिया  जैसा  याने - स्वर्गीय महेन्द्रसिंह टिकेत  के जैसा तो आदर -सम्मान या रुतवा हासिल होता ही  होगा !  जिस तरह गांधी जी कांग्रेस के चवन्नी मेंबर न होते हुए भी ,सत्ता में न होते हुए भी कांग्रेस  के लिए बहुत कुछ थे  या  पंडित नेहरू  के लिए और तत्कालीन सरकार के लिए सब कुछ थे,  उसी तरह की कुछ  मुझे  यह  गलतफहमी थी कि  भाजपा के लिए ,मोदी जीके लिए  ,और मोदी सरकार  के लिए 'संघ प्रमुख' - मोहनराव  भागवत  परम आदरणीय  हैं और वंदनीय  तो अवश्य  ही  होंगे। किन्तु आज जब भागवत जी ने डी  डी  वन पर मोदी चालीसा पढ़ा तो मुझे न केवल भागवत  जी पर दया आई  बल्कि उन पर भी दया आई जो संघ को  एक बहुत  खूंखार - बिकट दुर्दांत दैत्य  जैसा सिद्ध करने में लगे रहते हैं।  भागवत जी  के मुखारविंद से  अतिशय  मोदी गुणगान  सुनकर  ही पता चला कि  नाहक ही संघ को बदनाम किया जाता  रहा है।  खोदा पहाड़ निकले मोदी !आलोचकों को   ग्लानि हुई  कि  कहाँ संघ जैसा शुद्ध शाकाहारी हिरण  और कहाँ सिमी,आईएसएस ,अलकायदा  जैसे खूंखार आतंकी संगठन ?इनकी क्या तुलना ? आज  विजयादशमी के पावन पर्व पर  ही  मालूम पड़ा कि हिंदी- हिन्दू-हिंदुत्व - और हिन्दुस्तान  के साक्षात अवतार तो  केवल मोदी जी हैं।  मोदी जी ही अब 'महासूर्य' हैं। संघ तो महज  उनको सत्ता में पहुंचाने का एक  साधन मात्र  ही  है। माना की संघ भी खूखार ही है और मुझे गलतफहमी   हुई है तब तो मुझे मोदी जी का मुरीद हो जाना चाहिए। क्योंकि यदि  मोदी जी ने संघ रुपी 'बाघ'  को नाथ लिया है तो इसमें बुरा क्या है ? आलोचकों को  भी थोड़ी संजीदगी और थोड़ा धैर्य से सोचना चाहिए कि 'संघ' जैसे  गैरसंवैधानिक  सत्ता केन्द्रों को यदि मोदी जी  भाव  नहीं दे रहे हैं।  तभी तो 'संघ परिवार ' में भी बैचेनी है। तभी तो   जो कभी 'संघम शरणम गच्छामि हुआ करते थे वे अब सभी मोदी शरणम गच्छामि हो  रहे हैं। किन्तु  इसमें अलोकतांत्रिक क्या है ?शायद ऐंसा इसलिए  संभव हो रहा है कि  मोदी जी  वरिष्ठों को  काबू में करना जानते हैं। यही वजह है की न केवल भाजपा ,न केवल  संघ परिवार ,न केवल एनडीए ,न केवल  अमेरिका के अप्रवासी भारतीय ,न केवल मोहनराव भागवत बल्कि अब तो दिग्गी राजा ,शशि थरूर और  मुलायमसिंह की बहु के भी विचार बदल रहे हैं।    फिल्बक्त तो लोग मोदी का  अंध विरोध करने वालों को  ही  पसंद नहीं करते। वेशक राज्यों के चुनावों में उनका उतना असर नहीं हो।इसीलिये  शायद किसी अन्य विकल्प के आभाव में भागवत जी भी 'नमोगान' में ही  कुशलता का अनुभव कर रहे  हैं।  मोदी जी ने जिस तरह अटलजी ,आडवाणी जी ,मुरली मनोहर जी ,सिन्हाजी  और कई अन्य वरिष्ठों को  'नाथ' लिया  है ।   शायद  उसी तरह  भागवत जी को भी  उन्होंने  साध लिया है। इसीलिये बहुत संभव है कि किसी  वैयक्तिक  मजबूरी में  ही सही भागवत जी को अपने शिष्य तुल्य 'नमो' की भूरि-भूरि  प्रशंसा करने में कोई संकोच नहीं   हो !  वेशक   यह कोई बहुत अक्षम्य अपराध तो नहीं है ! जहाँ तक प्रसार भारती  से प्रसारण का सवाल है तो इस आरोप में कोई   दम  नहीं। कांग्रेस के  लम्बे शासनकाल में  भी  बार-बार  और अन्य  मोर्चों  के दौर में  भी  कई बार  सरकारी तंत्र  का  बेजा  दुरूपयोग किया जाता रहा  है। विगत सरकारों के दौरान -तमाम घोटालेबाज नेता रात -दिन   सरकारी चेनल्स और प्रसार भारती  की ऐंसी - तंइसी  करते रहे हैं। जब डी -डी  भारती  या सरकारी  माध्यमों पर रेपिस्ट , हत्यारे और आतंकवादी -अलगाववादी  भी  अपनी बात रख सकते हैं।  तो  'संघ' प्रमुख के सम्बोधन पर इतना ववाल क्यों ? यदि संघ वास्तव में केवल सांस्कृतिक संगठन ही है  तब तो  और भी कोई हर्ज नहीं। यदि संघ परदे के पीछे से सत्ता की राजनीति  करता है तो वह उसका ही हिस्सा हुआ तब उसका उपभोग करने में  उसके लिए बुरा क्या है।  क्या राजनीति  से परे  होने का ठेका केवल संघ ने  ही ले रखा है।  भारत में  वामपंथ के अलावा देश में कोई भी सच्चा धर्मनिरपेक्ष या  लोकतांत्रिक नहीं  है। बाकी के काग्रेस और अन्य जातिवादी -सम्प्रदायवादी पार्टियों की  चूंको के सामने  मोहन भागवत  जी  की तुलना की जाए तो उनका  विजयदशमी का  डी -डी  वन पर सम्बोधन और प्रसारण कोई  भारी अनर्थ तो अवश्य ही नहीं है।
                         श्रीराम तिवारी
                   

दुर्गा - अर्थात शक्ति का अभिप्राय -जनता जनार्दन की सकारात्मक एकता !



   यह सर्वमान्य तथ्य है कि सभ्यताओं के उदयकाल से ही पूर्वी यूरोप , मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिम एशिया  से  भारतीय उपमहाद्वीप पर अबाधित आक्रमण होते रहे हैं।मानव इतिहास में  इस भूभाग पर  तीन बड़े आक्रमणों या 'यायावर समूहों'  के आगमन के अनेक प्रमाण मौजूद  हैं। पहला आक्रमण या लम्बा और श्रंखलाबद्ध आगमन जिनका रहा होगा  शायद वे ही कालांतर में  'आर्य' कहलाये । सिंधु घाटी सभ्यता  , हड़प्पा  ,मोहन-जोदड़ो ,सुमेर, द्रविड़  तथा मय सभ्यता के पराभव उपरान्त, उन्ही के ध्वंशवसेषों पर जिस  अति-उन्नत सभ्यता ने साम गीत गया।  उसी पुरातन आर्य  सभ्यता का कार्यक्षेत्र अर्थात  भूभाग आर्यावर्त कहलाया।   कालान्तर में  गंगा,यमुना, सरस्वती,  चर्मण्यवती[चम्बल], वेत्रवती[बेतवा], दशार्ण [धसान] इत्यादि  सरिताओं से आप्लावित  यह   भूभाग - हस्तिनापुर ,इंद्रप्रस्थ  ,काशी ,कौशल ,अबध ,कैकेय ,चेदि , मगध  ,लिच्छवी  - वैशाली, मल्ल्य , कान्यकुब्ज ,जेजाकभुक्ति तथा सूरसेन  इत्यादि जनपदों - गणतंत्रों में  विभक्त  होकर आपस में निरंतर संघर्ष करता  रहा। शनेः-शनेः  सांस्कृतिक और भौगोलिक वैषम्यता के वावजूद भी   भारतीय उपमहादीप  का  अधिकांस  भूभाग [सुदूर दक्षिण भारत को छोड़कर]  एक दमनकारी और शोषण  की कुटिल  सभ्यता  में रूपांतरित होता चला  गया।  विश्व की दीगर सभ्यताओं ने जहां  भू स्वामी-और दास वर्ग के आपसी  संघर्ष को सामंती व्यवस्था के खिलाफ - प्रभु  के खिलाफ- एकजुट किया  वहीँ भारत में  चातुर्वर्ण्य समाज की मजबूत पकड़ के कारण  शक्तिशाली वर्ग-शोषणकारी ताकतों - के खिलाफ एकजुट आंदोलन नहीं पनप  सके। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के चतुर संचालकों [मनु ,वशिष्ठ,शंकराचार्य -जैसे महान ऋषियों ]ने  चारों वर्णों को एक-एक त्यौहार पकड़ा दिया। आवाम से  कहा  जाता रहा कि  "ब्रह्म सत्यम जगन्मिथ्या " ! आपस में पैर,जंघा ,भुजा और मुख की मानिंद एकसूत्र में बांधकर "जीवेत  शरद शतम " ! ब्राह्मणों को रक्षाबंधन ,क्षत्रियों को दशहरा या विजयदशमी ,वैश्यों को दीवाली और शूद्रों को होली का त्यौहार थमाकर  कहा  गया कि "राजा के खिलाफ मत  बोलो क्योंकि वो  तो साक्षात विष्णु का अवतार है। धनाढ्य वर्ग के खिलाफ मत बोलो क्योंकि वे तो 'श्रीमतां गेहे योगभृष्टोभिजायते 'है।  हानि-लाभ ,जीवन-,मरण ,सुख-दुःख  जय-पराजय ,मान-अपमान ,आजादी और गुलामी सब कुछ  ईश्वर की इक्षा पर छोड़ दो।  साल में एक दिन -विजयादशमी मना लो -शक्ति की पूजा -आराधना कर लो मुक्ति मिल जायेगी। विश्वामित्र ,परशुराम और चाणक्य जैसे  कुछ प्रगतिशील विद्द्वानों ने   आसुरी प्रवृत्तियों  अर्थात शोषण की ताकतों  से संघर्ष करने  के लिए 'नव -दुर्गा' की आराधना  का  अभिप्राय यह सुनिश्चित किया कि' ईश्वर उसकी रक्षा करते हैं जो खुद पर भरोसा करते हैं "  वेदों ,पुराणों तथा तमाम हिन्दू धर्म ग्रंथों का सार है कि  दुर्गा  अर्थात शक्ति का अभिप्राय  -जनता जनार्दन की  सकारात्मक  एकता  हो। जो शोषण - गरीबी,लूट, व्यभिचार,हिंसा ,आतंक,दुर्भिक्ष्य महँगाई  तथा गुलामी  इत्यादि के खिलाफ - आसुरी प्रवृत्तियों  वाले शोषक शासक वर्ग  के खिलाफ जन-आकांक्षाओं के पक्ष  की पक्षधर हो।  विजयदशमी के पावन पर्व  पर  जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए ,मानवता की बेहतरी  के लिए - विराट जन -नर्मेदिनी की हुंकार का  आह्वान  किया जाना चाहिए !

                            श्रीराम तिवारी 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

जय -जय -अम्बे ! जय -जगदम्बे ! !


          महँगाई   में   दुर्गा   माता ।

         दीन  -दुखी  कुछ  समझ न पाता ।।

         चेहरे  बुझे -बुझे  हों  जिनके  ।

          गरवा  रास उन्हें  क्या  भाता  ?

          दुर्लभ  ईंधन  महँगा  राशन ।

         मेहनतकश क्या   सहज  ये पाता  ?

         शुम्भ निशुम्भ अब  शासक  हो गए ।

         रक्तबीज अब  रिश्वत  खाता ।।

         भूंख कुपोषण  लाचारी में।

         निर्धन जन के दिन भये  लम्बे।।

          गाँव गली दंगा  फैलाते ।

          जाति - धरम के नित नए पंगे ।।

        लक्ष्मीपति  अब  भये  मधु कैटभ ।

       जय -जय -अम्बे  ! जय -जगदम्बे।। !

        मंत्री  नेता अफसर  बाबू।

      इनपर नहीं किसी का काबू।।

     भले -बुढ़ापा आ जाए पर।

    पदलिप्सा  पर नहीं  न काबू ।।

     झूंठे  नारे   झूंठे    वादे।

     झंडे -डंडे  भीड़ -लबादे।।

    सत्ता  के पलड़े पर भारी।

 जाति -धर्म के नित नए -दंगे।

 अंधे पीसें कुत्ते खाएं - माँ !

जय-जय अम्बे -जय जगदम्बे।।

     श्रीराम तिवारी


 





    

       
     
    

   

     

    

         

        

     

सोमवार, 29 सितंबर 2014

अब तो केवल विश्व नेता बनने की तमन्ना ही मोदी जी के दिल में है।

    न्यूयार्क में  संयुक्त राष्ट्र महा सभा  को  सम्बोधित करते  हुए  भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से जो  हिमालयी चुकें हुई हैं -उनकी भरपाई उन्होंने 'मेडिसन इस्कवॉयर ' के अपने अगले - सम्बोधन में दुरुस्त करने की पुरजोर कोशिश  की है।लेकिन  मेडिसन स्क्वॉयर  के सम्बोधन में उनसे  जो गंभीर  भूल-चूक हुई  है उसे वे   कहाँ -कब दुरस्त करेंगे ? यदि अपनी -ओबामा मुलाकत में भी कुछ खास करते तो उनकी अमेरिका  यह यात्रा  किंचित  ऐतिहासिक रूप से सार्थक  होती।

         वैसे तो कोई भी वतन परस्त नहीं चाहेगा कि  उसके देश की या  प्रधानमंत्री की खिल्ली उड़े। कोई भी देश भक्त  नहीं चाहेगा कि  उसके देश को दुनिया में रुसवा  होना पड़े।  किन्तु  हतभाग्य !मोदी जी ने तो  अपने देश की कमजोरियाँ का - निर्धनता का-  गंदगी का ढिंढोरा - शुद्ध हिंदी में वहां जमकर परोसा। जब देश का प्रधान- मंत्री ही  सारे संसार के सामने बार-बार अपनी दयनीयता का डंका पीट रहा हो और उनके अंध समर्थक भी   तालियाँ  पीट रहे हों तो जग हँसाई  को  कौन रोक सकता है ? नितांत अनभव- हीनता या  अज्ञानतावश- मोदी जी ने  अमेरिका यात्रा के दौरान अति उत्साह में  अपने ही  देश की जमकर  बारह बजाई  है। मानो उन्होंने   आत्मघाती गोल ही  कर डाला हो ! उन पर कम-से -कम   निम्नांकित  पांच गंभीर आरोप  लगना  तो  स्वाभाविक है।

 आरोप -एक; - भारत को - उसकी गंगा को,उसकी अन्य  नदियों को  और उसके सम्पूर्ण विस्तार को - गंदगी  में आकंठ डूबा मक्कारों से  भरा   हुआ  देश  बताकर अच्छा नहीं किया  मोदी जी ने । जिसके निमित्त वे अमेरिकी प्रवासियों और निवेशकों का- भारत की सफाई  के लिए आह्वान करते हैं। उसके लिए यदि जापान,चीन या किसी भी अन्य मुल्क का राष्ट्राध्यक्ष होता तो कदापि यह नहीं करता । मोदी के दींन  बचन सुनकर- स्वामी विवेकानद  की आत्मा  भी न्यूयार्क में नहीं तो स्वर्ग में जरूर  सोचती  होगी कि  मैंने ऐसा तो नहीं कहा था ! स्वामीजी कहते होंगे कि बच्चा  -क्यों अपने वतन की 'जांघ उघार रहा है '? क्यों दुनिया  में ढिंढोरा पीट रहा है कि  हमसे [भारतीयों से ] तो कुछ  होता-जाता नहीं - अब आप ही आ जाइए और संभालिये मेरे उस  मुल्क को  जिसे पहले भी आप विलायतियों  के पूर्वजों ने सदियों तक  गुलाम बनाकर लूटा है !

आरोप -दो ;-  मेडिसन स्क्वायर में मोदी जी बार -बार दुहरा रहे थे कि  'गांधी जी ने हमे आजादी दिलाई हमने गांधी जी को क्या दिया ? उन्होंने  खुद ही पूंछा -कभी स्वर्ग में मुलाकात  होगी तो क्या जबाब  दोगे ? गांधी जी तो सफाई पसंद थे -खुद झाड़ू लगाते थे। हमने भारत को कितना गंदा कर दिया ?"  गांधी जी को हमने क्या दिया ? इसका जबाब तो मोदी जी के आराध्य प्रातःस्मरणीय नाथूराम गोडसे ही दे  सकते हैं !  वेशक भारत में गंदगी है ! गंगा -जमुना ,गोदावरी इत्यादि सभी नदियां दूषित हो चुकीं हैं।जल-जंगल -जमीन सब पर ताकतवर लोगों का कब्ज़ा है। इसलिए गंदगी के लिए जिम्मेदार भी वे ही हैं। उस से भी ज्यादा  गंदगी  सत्ता के गलियारों में भी  है ,ठेकेदारों के नजरानों में है  ,र्रिश्वत  के ठिकानों में है और बाजारीकरण के बियावानों में खदबदा रही है।  आप इसे ही तो बढ़ावा दे रहे हैं  न मोदी जी !  सर्वाधिक सड़ांध  तो  जब -तब सत्ता में रहे -कांग्रेस -भाजपा जैसे पूँजीवादी  राजनैतिक दलों में  ही  व्याप्त हो रही  है न!  इसमें अमेरिका या वहाँ के प्रवासी  भारतीय आपकी क्या मदद कर सकते हैं ?

आरोप -तीन ;-मोदी जी ने अपने भाषण  के रौ में बहकर यह जता  दिया  है कि  वे क़ानून का राज कतई  पसंद नहीं करते ! उन्ही के शब्दों में "मेरे से पहले वाले नेता - सरकारें चुनाव के दरम्यान  केवल क़ानून बंनाने की दुहाई दिया करते थे  मैं तो  कानून खत्म करने में विश्वाश रखता हूँ। एक एक्पर्ट कमिटी बनाई है जो रोज  क़ानून खत्म करने की सिफारिश करती है। और  मैं- [मोदी जी] धड़ाधड़  क़ानून खत्म करने में  जुटा हूँ "  वाह क्या अदा है ? क्या यह  फासिज्म  के तेवर नहीं हैं ? वेशक इन अल्फाजों पर दो  राय हो सकती है। किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि  सारे क़ानून जो भी भारतीय संविधान में निहित हैं वे या तो संविधान सभा द्वारा आहूत हैं ,या डॉ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा सम्पादित हैं ,या फिर भारतीय संसद  के  मार्फ़त अपने ६७ साल के कार्यकाल में पारित  किये  गए हैं. यह एक लोकतांत्रिक परम्परा और राजनैतिक विकाश का अनवरत सिलसिला है।   कुछ शानदार  क़ानून तो देश की जनता ने ,मजदूरों-किसानों ने  अपने हितों की रक्षा के लिए  - अनवरत संघर्ष  और बलिदान की कीमत पर -  पारित कराये हैं।यह बहुत कष्टदायक है कि  विदेशी धरती पर   भारतीय प्रधानमंत्री श्री  मोदी जी ने अनजाने में  सही भारतीय संसद का बार - बार अपमान किया है। संसद  के  द्वारा पारित कानूनों को पुराना या  बकवास  बताना क्या साबित करता है ? क्या यह भारतीय आवाम का अपमान नहीं है ? क्या यह एकचालुकानुवर्तित्त्व वाला आचरण नहीं है ?

आरोप-चार ;- मोदी जी का आह्वान है कि "दुनिया के  सेठ साहूकारों सुनों ! अप्रवासी भारतीयों सुनों -भारत में लेबर सस्ता ,जमीन सस्ती ,खदाने सस्तीं ,क़ानून सस्ता, खून सस्ता ! सब कुछ सस्ता है  ! आइये - एफडीआई  कीजिये  ! हमने लाल कालीन बिछा रखी  है। आप तशरीफ़  लाइए  ! विकाश  कीजिये ! [किसका  विकाश ?]आइये  -आपके पूर्वज भी  पहले आये थे।बहुत कुछ लूटकर ले गए ! आप भी कुछ तो लीजिये !

आरोप -पांच ;- मोदी जी ने अमेरिका में फरमाया कि  जितना खर्च अहमदाबाद में एक ऑटो सवारी वाला महज  एक  किलोमीटर  के लिए  खर्च करता है -याने [१० रूपये] लगभग ।  उतने  से कम खर्च  में याने ७ रूपये  प्रति  किलोमीटर से - भारत ने बहुत  ही कम खर्च में- 'मार्श आर्बिटर यान ' को  मंगल की कक्षा में स्थापित कर दिखाया है। मोदी जी के अनुसार हम भारतीय  कितने  मितव्ययी और अक्लमंद हैं ?सम्भव है कि  यही सच हो !सवाल यह है कि  इस  मितव्ययता  के वावजूद देश को घाटे का बजट क्यों बनाना पड़  रहा है ?   क्या यह  सफल 'मंगल अभियान ' मोदीजी की देंन  है ? क्या इसरो को जो विगत ४० सालों में सीमित बजट आवंटित  होता रहा है  -  इसमें  मोदी जी का भी कुछ  योगदान  है ?  मोदीजी  जिनको  रात दिन कोसते रहते हैं  उन नेहरूजी , इंदिराजी , राजीव जी  ,मनमोहनसिंह जी या उन्ही के परम आदर्श -अटलजी का कोई योगदान नहीं है क्या ? अपने पूर्ववर्तियों का अवदान या उनकी नीति को  अपनी जुबान पर  क्यों नहीं लाना चाहते  मोदी जी ? यदि इतनी उदारता और दिखा देते तो क्या घट जाता ? जिनकी नेतत्व क्षमता से भारत  ने- न केवल हरित क्रांति, न केवल श्वेत क्रांति बल्कि संचार क्रांति के  भी विश्व कीर्तिमान बना  डाले -उन महान नीति निर्माताओं -मंत्रियों ,नेताओं, वैज्ञानिकों और अमूल्य तकनीकी देने वाले देशी - विदेशी -मित्रों के नाम भी मोदी जी की जुबाँ  पर नहीं आये। क्या यह राष्ट्रीय कृतघ्नता नहीं है ? एलीट क्लाश के जो  लोग ,मेडिसन स्क्वायर पर 'मोदी-मोदी'कर रहे थे , क्या वे जानते हैं कि इसरो की स्थापना,संचार उपग्रह  या  मंगल मिशन की शुरुआत और सफलता के पीछे   किस -किस के सपनों का सफर है ?

जब सत्यजित रे की फिल्मे दुनिया को भारत की केवल दुर्दशा ही  दिखातीं हैं ,जब 'स्लिम डॉग मिलयेनर' जैसी फिल्मे दुनिया में भारत  की बदतर तस्वीर  दिखातीं  हैं ,जब अरुंधति राय , प्रभा खेतान  पी साईराम या कोई प्रगतिशील लेखक -भारतीय समाज को उधेड़ता  हैं ,जब वामपंथी आंदोलन देश में मेहनतकशों की -किसानों की - नारकीय जिंदगी पर संघर्ष का ऐलान करता है ,तो भारत का   सारा मध्य-दक्षिणपंथी मीडिया और राजनीतिक समूह आरोप लगाने लगता है कि  देश को नाहक  ही  बढ़ा -चढ़ाकर बदनाम किया जा  है।  इतनी बुरी हालत तो नहीं है देश की ? अब यही काम जब मोदी जी  बहुत शिद्द्त से कर रहे हैं तो सबकी बोलती क्यों बंद है ?
      मोदीजी की  जापान ,चीन,अमेरिका से हुई तमाम वार्ताओं और बक्तब्यों का  सार  यही है कि भारत के    अभी तक के सारे नेता और प्रधानमंत्री तो  निठल्ले थे।  मूर्ख और निकम्मे थे ! पूर्वर्ती प्रधानमंत्रियों ने भारत को  बर्बाद कर दिया । जिसे मोदी जी ठीक करना चाहते हैं ! क्या  मेंहगाई ,आतंकवाद ,पाकिस्तान से कश्मीर पर वैमनस्य  ,चीन से सीमा विवाद  इत्यादि के  लिए  उन्हें देशी-विदेशी पूँजीपतियों के सहयोग की दरकार है ? फिर तो उनका कथन  सही है जो कहते हैं  कि  मोदी एक-  चुनौतियाँ अनेक ! क्या यह अवतारवाद की मानसिकता नहीं है ? क्या फ्यूहरर  ऐंसे ही  निर्मित नहीं  होते ?

                        राजनीति  के अद्ध्येताओं के एक  खास वर्ग  को भी  भरम होने लगा है कि शायद  नरेंद्र  भाई मोदी  भी जाने-अनजाने   नेहरूवाद की ओर  ही अग्रसर हो रहे हैं। दूसरा वर्ग है  जो  मोदी जी के उत्साह और सक्रियता में पूर्ववर्ती सभी प्रधानमंत्रियों से बेहतरी की उम्मीद रखता है। हालाँकि हर जिम्मेदार भारतीय चाहता है कि  भारत में सुशासन आये,विकाश हो और विश्व के सभी राष्ट्रों से सौहाद्रपूर्ण संबंध हों ! यह काम कांग्रेस तो  निश्चय ही नहीं कर पाई अब यदि भाजपा की मोदी सरकार यह महानतम कार्य  करती है, तो खुशामदीद !इंदिरा जी ने यदि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए या खालिस्तान आंदोलन को अपनी शाहदत देकर ठंडा किया तो यह मोदी जी  की नजर में  कोई  सम्मान  या गर्व की बात नहीं ! चुनाव में तो सुशासन,विकाश ,विदेशी धन का खूब बखान हुआ अब उसकी चर्चा से भी तोबा  क्यों ?अब तो केवल विश्व नेता बनने की तमन्ना ही मोदी जी के  दिल में है।

          लेकिन जिस रास्ते पर मोदी जी चल रहे हैं, वो केवल यश कामना से प्रेरित 'अधिनायकवाद की ओर  ही जा सकता है।  वैदेशिक मामलों में  भले ही वे  नेहरूवादी  जैसे  ही हो ,किन्तु आर्थिक मामलों वे रीगन वादी या थैचरवादी  जैसे होने को उतावले हो रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि  अमरीका का उत्खनन एवं कृषि इतिहास केवल ५०० साल पुराना है जबकि भारत का यही इतिहास १० हजार साल  पुराना है। ब्रिटेन ने  भारत समेत सारी  दुनिया  पर  राज किया है जबकि भारत ने केवल हजारों साल की गुलामी ही भुगती है। इसलिए मोदी न तो रीगन हो सकते हैं न थेचर। इसी तरह भारत न तो अमेरिका हो सकता है और ने इंग्लैंड। शायद  इंदिराजी यह जान चुकी थीं। इसलिए उन्होंने अपनी एक  अमेरिकी यात्रा  के दौरान  कहा था कि "  हम न तो दक्षिण पंथी हैं और न वामपंथी  ,हम तो  सीधे खड़े  होना चाहते  हैं  अपने बलबूते पर "व्यवहार में उन्होंने जहां देश में निजी क्षेत्र को पनपने का पर्याप्त अवसर दिया वहीं देश के सार्वजनिक उपक्रमों को भी पर्याप्त तरर्जीह दी। उनके उत्तराधिकारियों -नरसिम्हाराव ,मनमोहन सिंह ने विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुसरण कर देश में निवेश और  विकाश के नाम पर  असमानता  की खाईंयां उतपन्न  करने का जो इंतजाम किया था -मोदीजी उसी डरावनी नीतियों को तेजी से अमली जामा  पहना  रहे हैं। वे श्रम  कानूनों  को मालिकों का पक्षधर बना  रहे है मोदी सरकार  ने अपने चार   माह के प्रारंभिक कार्यकाल में एक भी ऐंसा काम  नहीं किया जो गरीबों,मजूरों या आत्महत्या की नौबत झेलने वाले निर्धनतम   किसानों  को  जीने की कोई आशा  नजर आई हो !
                   एक तरफ  देश के करोड़ों अभावग्रस्त वतनपरस्तों की बदहाली है , और दूसरी ओर  सम्पन्नता के हिमालयी टापू हैं।  इनके बीच जो खाई है उसे पाटने की कोई  नीति तो क्या उस संदर्भ में मोदी सरकार या 'नमो' के पास एक अल्फाज भी नहीं है। इस संदर्भ में वे  अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डॉ मनमोहनसिंग से भी गए गुजरे हैं। मनमोहनसिंह ने  वामपंथ के दवाव में ही सही मनरेगा ,खाद्य सुरक्षा और आरटीआई क़ानून  जैसे लोकहितकारी कुछ काम तो अवश्य ही किये हैं। उनकी 'आधार'  योजना चल ही रही थी की सत्ता का पाटिया उलाल हो गया और अब 'सब कुछ बदल डालूँगा 'की तर्ज पर योजना आयोग ,ज्ञान आयोग ,श्रम  कानून और नंदन  नीलेकणि का ' आधार' वगेरह सब कूड़े दान में समाते जा रहे हैं। लगता है केवल वैश्विक ख्याति की कामना से प्रेरित होकर ही मोदी जी हर कदम बढ़ा रहे हैं।आनन फानन -भूटान,नेपाल,जापान,की यात्राओं के बाद शी -जिन-पिंग  से पयार की पेगें  और अब अमेरिका  से यारी- यह सब केवल अपने आपको अंतर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करवाने की जद्दोजहद है।  लेकिन उन्हें यह याद रखना होगा की  ये इश्क नहीं आसान इतना तो समझ लीजे  -मोदी जी !

    भारतीय  दार्शनिक परम्परा में ईषना का सर्वत्र निषेध है।  मनुष्य को अपने लोकोत्तर निर्वाण पद की  प्राप्ति  में -वित्तैषणा ,कामेषणा और यशेषणा को  सबसे बड़ी बाधाएं माना  गया है। न केवल योगियों बल्कि राजर्षियों और बेहतरीन शासकों को भी इन  अपमूल्यों से बचने की सलाह दी गई है।  दुनिया में - व्यक्तिगत जीवन में लाखों -करोड़ों  श्रेष्ठतम मनुष्य होंगे जो "प्रभुता पाहि काहि  मद नाहीं "  के अपवाद होंगे ,लेकिन  दुर्भाग्य से  सार्वजनिक जीवन में जहां  इन मूल्यों की अत्यंत शख्त आवश्यक्यता है वहां यशेषणा सर चढ़कर बोलने लगती है। नेता का विराट व्यक्तित्व और अपने साथियों के आवाज को अनसुना करने की प्रवृत्ति केवल ऑटोक्रेसी  या तानाशाही में ही अभिव्यक्त नहीं होती। वह डेमोक्रेटिक अधिनायकवाद में भी परिलक्षित हुआ करती है। जिस तरह वैयक्तिक आत्म मुग्धता में पंडित  नेहरू  देश के गरीबों लिए कुछ  खास नहीं कर पाये और पाकिस्तान ,चीन या अमेरिका को नहीं साध पाये ,कश्मीर तथा मैकमोहन समेत अनेक सुलगते सवाल छोड़ गए उसी तरह श्री नरेंद्र भाई मोदी  भी यशेषणा  के वशीभूत होकर  देश के मेहनतकशों या गरीब वर्ग  की  तो कुछ खास  मदद नहीं कर पाएंगे।   उधर विदेश नीति पर भी वे नेहरू की राह  चलकर इतिहास की भूलों को भी  ठीक  नहीं कर पाएंगे।
                      पंडित जवाहरलाल  नेहरू  की उनके  आरम्भिक जीवन में कोई भी अपनी पृथक पहचान नहीं थी सिवाय इसके  कि  वे  कांग्रेस के हमदर्द  और एक विख्यात  कद्दावर वकील  पंडित मोतीलाल नेहरू के बेटे थे।  दक्षिण  अफ्रीका से  महिमा मंडित होकर  लौटे  मोहनदास करमचंद गांधी  को भारतीय  स्वाधीनता संग्राम के नेतत्व के लिए ऊर्जावान   युवाओं की शख्त जरुरत थी। ऐंसे जुझारू निष्ठावान युवा  उन्हें हजारों -लाखों की तादाद में मिले भी। नेहरू,सुभाष ,पटेल ,बिनोबा,सरोजनी ,मौलाना आजाद,लाल बहादुर शाश्त्री ,जयप्रकाश नारायण ,लोहिया ,नम्बूदिरीपाद ,राजगोपालचारि और अब्दुल गफ्फार खान जैसे सैकड़ों -हजारों युवाओं  ने गांधी को अपना हीरों माना और गांधी ने  सभी को  बखूबी  निखारा और उनसे स्वाधीनता संग्राम में काम लया। किन्तु  उन्होंने नेहरू  को  ही  आजादी  की घोषणा के दरम्यान अहम जिम्मेदारी  क्यों सौंपी यह कुछ लोगों को अभी तक  समझ नहीं आया है। शायद उनके पिता  मोतीलाल जी का वर्चस रहा हो !शायद जवाहरलाल चूँकि विलायत में पढ़े लिखे थे और भारतीय इतिहास ,दर्शन तथा  राजनीति  का उन्हें बहुत कुछ ज्ञान था इसलिए उन्हें शीर्ष नेतत्व मिला। हालाँकि  वे  बेहतरीन अंग्रेजी के अलावा उर्दू ,फ़ारसी और काम चलाऊ  हिंदी में भी  सिद्धहस्त थे। उनकी सबसे  बड़ी  खासियत यह भी थी की वे कांग्रेस के गरम दल  तथा नरम दल की विभाजन रेखा पर खड़े थे.गरम  और नरम को नियंत्रित करने के लिए  शायद  तत्कालीन भारतीय इतिहास के पास  नेहरू से बेहतर कोई विकल्प नहीं था इसलिए वे  आजाद  भारत के प्रधानमंत्री बनाये गए।  घरेलू मोर्चे पर उन्होंने पूँजीवादी  और समाजवादी दोनों ही नीतियों का समिश्रण तैयार किया और उन्हें लागू करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।  चूँकि उन्होंने भृष्टाचार से कोई संघर्ष नहीं किया और पूंजीपतियों  को लूट की खुली छूट दी इसलिए वे घरेलू  असफल रहे।
   विदेश  नीति  तो उनकी संतुलित थी किन्तु चीन अमेरिका इंग्लैंड फ़्रांस और जर्मनी के साम्राज्य्वादी और प्रतिश्पर्धी चक्रव्यूह में फंसकर  पूँजी निवेश की ललक में देश  को भूस्वामियों -सामंतों -जमींदारों और देशी पूँजीपतियों  के रहमो करम  पर छोड़ दिया। नेहरू जी की पंच  वर्षीय योजनाएं तो फिर भी ठीक थीं ,सार्वजनिक क्षेत्र ,बैंक ,बीमा और  टेलीकॉम का तना -बाना  भी उन्होंने  ठीक ही बुना।  किन्तु मुनाफाखोरों पर कोई लगाम उन्होंने नहीं लगाईं ,भृष्ट अफसरों और बेईमान नेताओं पर उनका कोई जोर नहीं था। इसलिए वे हले वे कांग्रेस के नेता  हुआ करते थे  देश आजाद हुआ तो वे देश के नेता बन गए.  वे जल्दी ही इंग्लैंड ,सोवियत संघ ,चीन,जापान  और अमेरिका के नेताओं की बराबरी करने लगे।  जब शीतयुद्ध चरम पर था और दुनिया साम्यवादी या पूँजीवादी  दो खेमों में बट चुकी थी,तब डोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति -सुकर्णो ,चेकोस्लोवाकिया  के मार्शल टीटो, मिश्र के  … क्यूबा के फीदेल  कास्टों और भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने  ' गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का संघ' बनाया था। नेहरू इस सूची में अव्वल थे। उन्होंने चीन के साथ पंचशील और अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी के साथ ततकालीन महत्वपूर्ण राजनयिक और व्यापारिक सन्धियां कीं थीं। इस रास्ते पर  निशन्देह नेहरू जी को असफलता ही हाथ लगी। १९६४ की चीन से झड़प के बाद तो वे इतने मायूस हुए की संभल भी न सके।
                             नरेंद्र भाई मोदी को भी 'संघ' ने उनके अनेक सीनियर समकालिकों  से अधिक वरीयता देकर  पहले गुजरात का नेता बनाया ,फिर भाजपा का राष्ट्रीय नेता बनाया ,फिर देश का परधान मंत्री बनाया। अब वे सयम वैश्विक  फिराक में हैं। चूँकि उनकी घरेलु नीतियां वही हैं जो मनमोहनसिंह की हैं अर्थात कांग्रेस की हैं।  याने नेहरू की हैं इसलिए नमो का इस राह पर असफल होना तय है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चाहे पाकिस्तान हो ,नेपाल हो या चीन कोई भी  'नमो' की विनम्र प्रार्थना सुनने को तैयार नहीं है।चाहे कश्मीर समस्या हो ,चाहे चीन -भारत सीमा समस्या हो , चाहे बांग्ला देश -नेपाल या श्री लंका से सीमा विवाद हो और चाहे अमेरिका के साथ  व्यापार  घाटा हो - हर जगह मोदी को मात दी जा रही है। चीन ,जापान , इंग्लैंड ,अमेरिक ,यूरोप तथा दक्षेश  के लिए तो भारत एक चरागाह   ही है  खुद मोदी जी के शब्दों में एक बिग बाजार ही है. तब नमो'  की  इस नीति से  भारत को कोई उम्मीद  क्यों रखनी चाहिए ?

                       श्रीराम तिवारी 

रविवार, 28 सितंबर 2014

'सामना ' ने लिखा है की भाजपा तो श्राद्ध का कौवा है।



    महाराष्ट्र में  भाजपा -शिवसेना का गठबंधन टूट गया।

   खबर है कि  कांग्रेस राकांपा का भी गठबंधन टूट गया।।

   हरियाणा में भी मच रही है  दल-दल में  सत्ता की  तकरार।

   यह  विचारों का संघर्ष  नहीं केवल चुनावी  खुन्नस बरकरार।। 

   'सामना ' ने लिखा है की  भाजपा तो  केवल  श्राद्ध  का कौवा है।

   चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि  किसका - कितना  पौवा है।।

    चौतरफा मुश्किलों के दौर में जनता भी  तो दिग्भर्मित ही  है।

     इसीलिये अभी तो वही जीतेगा  जो सबसे बड़ा कौआ है।।

                        श्रीराम  तिवारी   

बुधवार, 24 सितंबर 2014

क्या मंगल अभियान की सफलता का श्रेय इन्हे है जो आज अपनी पीठ ठोक रहे हैं ?



   भारतीय वैज्ञानिकों  के अथक परिश्रम से -इसरो की अद्व्तीय सक्रियता से ,गरीबों  का पेट काटकर खर्च किये गए ४५० करोड़ रुपयों  की बदौलत  और  भारत के पूर्व प्रधान मंत्रियों  - इंदिरा गांधी  एवं राजीव गांधी  की भारत को महाशक्ति बनाने की चाहत के दूरदर्शी -महत योजनाओं  के  साकर होने पर निसंदेह भारत को गर्व है। बड़े दुःख की बात है कि इस  मंगल अभियान की सफलता  में  जिनका रत्ती  भर योगदान  नहीं  रहा ,  जिन्होंने अपने विगत ४ माह के कार्यकाल में इसरो की  ओर  नजर उठाने की जहमत  भी नहीं उठाई -वे  महान नेता जी -न केवल इसरो में जाकर  फोटो खिचवा रहे हैं ।  न केवल अपनी पीठ  ठोक रहे हैं  बल्कि वे एक और काम कर रहे हैं  कि अपनी अज्ञानता और प्रमादवश उन लोगों का नाम भी जुवां  पर नहीं ला रहे हैं जिन्होंने  देश को  इस मुकाम पर पहुँचने के लिए बहुत कुछ किया है।  प्रचार के बेहद भूंखे और खुद को हमेशा फोकश  में रखने के जिद्दी  नेता  जी  जैसा शायद ही दुनिया में और  कहीं  कोई मिलेगा ।  मीडिया के भोंपुओं उसके घोंचू विश्लेषकों और ऐंचकताने सम्पदकों  को  तो  मानों पीलिया रोग हो  चुका  है। कोई चैनल या समाचार  पत्र ,मंत्री या नेता यह नहीं बता रहा कि अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र-इसरो  ,भाभा रिसर्च एटोमिक सेंटर या अटॉमिक पावर प्लांट्स के लिए कौन  भारतीय नेता या वैज्ञानिक -सारे संसार में वेइज्जत होता रहा।इस महान   इसरो की  स्थापना किसने  की थी ?  क्या भाजपा ने ?  क्या मोदी जी ने ? क्या  मंगल अभियान की सफलता का श्रेय  इन्हे है जो  आज अपनी पीठ  ठोक रहे हैं ? क्या   इसरो के  'मार्श आर्बिटर ' अभियान  की कल्पना उनके  दिमाग की उपज  थी जोअपने पूर्ववर्तियों की निंदा , गरवा ,गोधरा,लव जेहाद  या वोटों के जातीय  व् साम्प्रदायिक  ध्रवीकरण से आगे नहीं सोच सकते  ?
             कौन प्रधानमंत्री था  जिसने   स्पेश प्रोजेक्ट को कामयाब बनाने के लिए न केवल सुपर कम्प्यूटर हासिल किये ,बल्कि  क्रायोजनिक इंजन के शुष्क ईधन के लिए  भी वह कभी अमेरिका तो कभी रूस  भटकता  रहा? इसरो की वर्तमान   वैज्ञानिक  टीम  को सिलेक्ट करने वाले कौन थे ?फंड आवंटन किस मंत्री या प्रधानमंत्री ने किया ?भारत की नयी पीढ़ी को यह सच जरूर जानना चाहिए। इसरो को भी चाहिए कि सब नहीं तो कुछ नीति संबंधी जानकारी तो देश के नौजवानों को अवश्य ही उपलब्ध कराये।
                      शुक्र  है  की मार्श आर्बिटर' या इसरो के किसी भी प्लान के लिए विगत १६ मई से २२ सितम्बर तक राजनीति या नेताओं का तो कोई भी योगदान नहीं रहा। माना कि  ये विभाग डायरेक्ट पीएम के अण्डर  में है किन्तु सवाल यह है कि  इस 'मंगल अभियान की अद्व्तीय सफलता' में  उनका योगदान क्या है?मीडिया का एक हिस्सा और सत्तारूढ़  पार्टी के  नेताओं का इस संदर्भ में स्वयंभू यशोगान बेहद भौंडा और हास्यापद  है। उनके वयानों से तो यही लगता है कि  ये नेता सत्ता में आये और मंगल रवाना कर दिया होगा। चार महीनों में वह मंगल की कक्षा  में पहुंचकर  वहाँ  से कह रहा है की सारे जहाँ  से अच्छा  हिन्दोस्ताँ  हमारा ! हालाँकि  मैं तो  यही कहूँगा कि  हिन्दोस्ताँ  तो बहुत संकट में है।  हाँ वेशक ! सारे जहाँ  से  अच्छा इसरो  है हमारा !
  
                      श्रीराम तिवारी 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

    
     प्रचार के विभिन्न  माद्ध्यमों  में कभी बड़ा हो-हल्ला  हुआ करता था ,कि 'संघ परिवार' वाले  तो  बड़े ही परोपकारी हैं  -कर्तव्यपरायण हैं ,राष्ट्रीय आपदाओं के वक्त जनता की मदद के लिए तैयार रहते हैं ।  इत्यादि-इत्यादि। सम्भवतः इसमें आंशिक सचाई भी हो , लेकिन  फिल्बक्त तो उनका यह परम   परहितकारी  - जन - कल्याणकारी रूप सिरे से ही  गायब है। चाहे मध्यप्रदेश में पहले ओला-पाला  और अब  सूखा पीड़ितों का सवाल हो ,चाहे देश भर में बढ़ रही महँगाई ,बेरोजगारी,हत्या-बलात्कार  और रिश्वतखोरी का सवाल हो,चाहे विदेशी बनाम स्वदेशी का सवाल हो ,चाहे राष्ट्रीयकरण बनाम निजीकरण का सवाल हो ! इन सवालों  पर तो संघ परिवार ने पहले से ही 'मुशीका' लगा रखा है, किन्तु जम्मू कश्मीर में हुए महाजलप्लावन के  दौरान 'संघ परिवार'  का औदार्य नदारद  क्यों रहा ?  यह समझ से पर है  ! जब मैंने  उत्सुकतावश एक  बुजुर्ग संघी  कार्यकर्ता'भाई जी ' से इस बाबत पूँछा  तो पहले तो वे  इस प्रश्न को टालते रहे। वे बार-बार मोदी सरकार द्वारा  जम्मू-कश्मीर के ततसंबंधी कार्यान्वन का गुणगान करने लगे , भूटान-नेपाल और जापान की यात्राओं का बखान करने लगे. किन्तु जब  बाढ़ पीड़ित जम्मू-कश्मीर में  संघ की  निष्क्रियता संबंधी यही प्रश्न बार-बार दूसरों ने भी दुहराया तो वे आक्रोशित होकर अपने असली रूप में आ गए।  उनका जबाब था कि  इन दिनों हम  दूसरे  अति महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त हैं। हम  'लव-जेहाद'  के खिलाफ लड़ रहे हैं। हम उज्जैन के विक्रम विश्वविद्द्यालय में  सेकुलर प्रोफेसरों  की ठुकाई कर रहे हैं।  मध्यप्रदेश या देश के किसी भी हिस्से में मौजूद कश्मीरी छात्रों को खोज-खोजकर आतंकी  सिद्ध करने में जुटे हैं।  हम देवी अहिल्या विश्व विद्द्यालय में ए बी वी पी बनाम भा ज यु मो के द्वन्द का हिंसक   ट्रायल करने में जुटे हैं। हम 'हिंदुत्व की गरवा संस्कृति' से मुसलमानों को दूर रखने के राष्ट्र व्यापी अभियान में  जुटे  हैं। उनके इस प्रशश्ति गान  का कारवाँ और  आगे   बढ़ता, इससे पहले ही एक दूसरे  बुजुर्ग श्रोता ने चुटकी ली और कहा-शायद यही वजह है कि विधान सभा के  मौजूदा  उपचुनावों में 'मोदी लहर' विश्रांति की ओर  अग्रसर है।इन चुनावों में  अधिकांस जगहों पर मृतप्राय विपक्ष 'फीनिक्स' पक्षी की मानिंद फिर से उठ खड़ो हो गया है ।   कांग्रेस ,सपा,टीआरएस ,और अन्य  'सेकुलर'  पार्टियां बिना कुछ किये धरे  ही या बदनाम होते हुए भी पुनः  उठ  खड़ी  हो रही हैं। उधर कश्मीर में भी जनता को  बचाने के लिए  संघ नहीं सेना नजर आ रही है.इस धत्ताविधान  से  रुष्ट होकर  ' भाई  जी 'इस अनौपचारिक चलित गोष्ठी से 'वाक आउट ' कर गए !
    
                                               श्रीराम तिवारी 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

[कुण्डलियाँ ] डूब रहे नवरत्न, देखते शी जिनपिंग संग मोदी !


     लहर  सदा  स्थिर नहीं  , यह जानत सब कोय ।

      जहाँ   पै  हो  धुर्वीकरण ,जीत उधर ही  होय ।।


    जीत  उधर ही  होय , जहाँ है धनबल -भुजबल।

    कैसे  होय विकाश  , वतन जब लुटता  पल-पल ।।


     जनमत  करे निदान  ,नीति-नियत  खोटी जब होई।

     चहुँ दिश  भृष्टाचार ,    सुशासन   कैसे    होई।।



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     भारत  नीति  नियत यह ,  हो भय भूँख  निदान  ।

    किन्तु  निवेश की ललक लखि  ,लपका सकल जहान।।

     लपका सकल जहांन ,जो  भूंखे हैं दौलत  के ।

     करें तिजारत मुल्क , वैश्वीकरण के  झटके ।।

    एफ  डी आई  निर्बाध , बैंक  बीमा  या  गोदी।

     डूब रहे नवरत्न,  देखते शी  जिनपिंग  संग मोदी।।

  

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    साम्प्रदायिकता  बढ़ी ,जात -पाँत  की बात।

    पाकिस्तान  का भी नहीं , रोक सके प्रतिघात।।

    रोक सके प्रतिघात ,  जटिल सीमा  का  मसला।

     हाफिज सईद  दाऊद ,   करें भारत पर हमला।।

    सिस्टम है खूंखार ,बढ़ाता  घोर  विषमता।

     व्यापा   जातिवाद ,   फैलती  साम्प्रदायिकता।

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  श्रीराम तिवारी



 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

ईमान दार और मेहनती इंसान के बजाय जेल का अपराधी बेहतर जिन्दगी क्यों जी रहा है ?


खबर -एक

      मध्यप्रदेश की जेलों में कैदियों के लिए अब  आइन्दा  कठोर -सूखी  रोटियाँ  खाकर दाँत  टूटने का खतरा नहीं रहा।पनीली कंकड़ युक्त दाल में  सूखे टिक्क्ड़ डुबोकर पेट नहीं भरना पडेगा। प्रदेश की भाजपा -शिवराज   सरकार -बिजली , पानी, बेकारी ,सूखा -बाढ़ , ओला -व्यापम ,महँगाई ,रेप ,हिंसा ,चेन-स्नेचिंग  और   इंफ्रास्टक्चरल डवलपमेंट  पर भले ही  कुछ न कर  सकी हो ,किन्तु -हत्या,रेप के मुलजिम ,सिमी के उग्रवादी ,व्यापम घोटाले के अपराधी  , चोर -उचक्के -डाकू , लोकायुक्त द्वारा लपेटे में लिए गए भृष्ट -रिश्वतखोर अफसर-बाबू-पटवारी तथा सजायफ्ता नेताओं को  अब जेल में गरमागरम  रोटियां  खिलाने का इंतजाम अवश्य कर दिया गया है।
                 
                 विगत सप्ताह भोपाल से  जेल  मुख्यालय   ने प्रदेश के सभी जेलरों-अधीक्षकों को निर्देशित किया है कि इस  संदभ में ततकाल कायवाही  करें। लकड़ी और थर्माकोल से बने नवीन आधुनिक डिब्बों  के प्रयोग या अन्य साधनों से कैदियों को बढियां ताजा  रोटियाँ  खिुलायें।  याने मुफ्तखोर अपराधियों  की शासन-प्रशासन को बड़ी -चिंता है  इसलिए उनके वास्ते - नास्ते के अलावा लंच  और  डिनर  में कम से कम -६-६ बढियां-बढियाँ  तंदूरी या मोटी -मोटी ,  गरम-गरम रोटियां  मुफ्त !

   खबर -दो
                  देश के -  प्रदेश  के  हजारों रोजनदारी मजदूर,ठेका मजदूर ,खेतिहर मजदूर ,खदान मजदूर ,मनरेगा मजदूर और यत्र-तत्र बाल मजदूर भी   महज १०० रोज  ही कमा पाते हैं। कभी-कभी तो इतने का भी काम नहीं मिल पाता।  १२-१२ घंटे काम करने के वावजूद  बिना आंदोलन या हड़ताल के समय पर उन्हें यह  मजदूरी भी नहीं मिलती।  प्रदेश में सीटू के नेतत्व में उनके आन्दोलनों की अनुगूँज सभी जगह सुनी जा सकती है। भयानक बीमारियों से घिरे -  महंगाई -ओला-सूखा-पाला की मार से पीड़ित  मध्य  प्रदेश  के लाखों छोटे -किसानों   की हालात सबसे अधिक चिंता जनक है। प्रदेश और देश की सरकार को  तो जापान-अमेरिका-इंग्लैंड  के निवेशकों की चिंता है  .इधर  मुनाफाखोर  पूँजीपतियों   और भृष्ट ठेकेदारों  की पौबारह है। उधर प्रदेश के करोड़ों  निर्धनों के यहाँ दो बक्त की सूखी रोटियाँ  का भी कोई स्थाई इंतजाम नहीं है।रोटी तो दूर की बात स्वच्छ पीने का पानी भी  गाँव के गरीबों को -प्रदेश के हजारों  गाँवों  में  आज भी नहीं है। जिस  दौर में अपराधी होना निरपराध से बेहतर हो  चुका हो उस दौर में अध्यात्म-धर्म-मजहब तथा सांस्कृतिक उत्थान की बातें करना  केवल मानसिक अय्यासी है।  चरित्रहीन लोग ही इन हवाई और धर्मान्धता की बातों को हवा देते हैं।  वे रोटी पर बात नहीं करते। क्योंकि इनके पेट भरे हैं। जबकि इनके हाथ पाप-पंक से सने हैं।  यह एक  अहम सवाल है कि -ईमान दार और मेहनती इंसान  के बजाय  जेल का अपराधी बेहतर जिन्दगी  क्यों जी रहा है ?

                       श्रीराम तिवारी