सोमवार, 8 सितंबर 2014

'कश्मीरियत' के दुश्मन मौत के सौदागर इस बक्त कहाँ हैं ?


  दो दिन  पहले  ही मैंने निम्नांकित  पंक्तियाँ 'पोस्ट' की थीं ……!



      'कश्मीरियत'  के दुश्मन  मौत के सौदागर इस बक्त  कहाँ हैं ?

      जेकेएलएफ -गिलानी -हाफिज सईद - जमात-उद  दावा - अब कहाँ हैं ?

      केशर की क्यारियों में वैमनस्य -अलगाव  के  बीज बोने  वाले-

     आई एसआई - प्रशिक्षित कश्मीरी बच्चों  के हाथों में बन्दूक थमाने  वाले  -

     जल मग्न कश्मीरी आवाम  को  बचाने में जी जान से  जुटे हैं जो आज -

     उन  भारत के जवानों के शीश काटने वाले  इंसानियत के दुश्मन  कहाँ हैं ?



 आज की  खबर  है कि जम्मू -  कश्मीर  के लोगों  की जान  बचाने में  जुटे 'भारतीय बचाव दल ' पर कुछ

   अलगाववादियों -उग्रवादियों ने - जलमग्न श्रीनगर  के  ही कुछ ठिकानों से  पत्थरबाजी की  है।


  इस ओछी हरकत  से   मेरी  उपरोक्त पंक्तियों का जबाब भी  मिल गया  है -

अब इसमें कोई संदेह नहीं की  इस वक्त ये   ' इंसानियत के दुश्मन कहाँ हैं ' ?  जिनकी  नापाक  हरकतों और

एहसानफ़रामोशी  का खामियाजा  न केवल सारे कश्मीर को बल्कि पूरे भारत को  भुगतना  पड़  रहा है।


   श्रीराम तिवारी


                                         

रविवार, 7 सितंबर 2014

हर नारी ऐंसी बने ,जैसी है ऐनूर !



    'माँ  ने अपने दुष्कर्मी 'कपूत' को कराया गिरफ्तार '


पश्चिम बंगाल के २४ परगना अंतर्गत डायमंड हार्वर में एक माँ [ ऐनूर]ने इंसानियत  को तरजीह देकर , पुत्र मोह त्यागकर 'नारीत्व' के उच्चतर मूल्यों का उदाहरण पेश किया  है ।सात साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले अपने  'कपूत' [नजीर शेख] की काली करतूत की शिकायत- इस महानतम  माँ ने  खुद ही थाने में  जाकर  पुलिस को की है । पीड़ित बच्ची  -जो कि दूर कहीं जंगल में वेहोश पड़ी थी -को  भी वे स्वयं ही अस्पताल ले गई.  नारी उत्पीड़न और कुकृत्य  से सराबोर  इस भयानक  दौर में नारीत्व की गरिमा मय  यह मिशाल -  अतुलनीय  और वंदनीय है। इस माँ [ऐ नूर बीबी ]का यह बेहतरीन त्याग - सतकर्म-कर्तव्यपरायणता -भारत ही नहीं दुनिया की सभी माताओं-बहिनों और नारियों  के लिए अनुकरणीय है। उनके इस महान गौरवपूर्ण सुकृत्य के लिए  यह  दोहा  समर्पित  है। 

   पतनशील इस दौर में ,मूल्य हुए बेनूर। 
   हर नारी ऐंसी बने ,जैसी है ऐनूर।। 

        श्रीराम तिवारी 

     

शनिवार, 6 सितंबर 2014

हिंदी में अब वंचित वर्गों की मांग के अनुकूल नहीं लिखा जा रहा है !




  हिंदी में पढ़ने -लिखने वाले , हिंदी को राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक  मानने वाले,हिंदी के वक्ता-श्रोता  - ज्ञाननिधि और  हिंदी के शुभ -चिंतक,  सरकारी और गैर सरकारी तौर पर हर साल हिंदी पखवाड़ा या हिंदी दिवस मनाते वक्त बार-बार यही रोना  रोते रहते हैं कि हिंदी को देश और दुनिया में उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। आम  तौर पर  उनको  यह  शिकायत  भी हुआ करती है कि हिंदी में सृजित ,प्रकशित या छपा हुआ साहित्य खरीदकर पढ़ने वालों  की तादाद  में तेजी से कम हो  रही है। वे आसमान की ओर देखकर  पता नहीं किस से सवाल किया  करते  हैं कि- हिंदी -जो कि सारे विश्व में दूसरे नम्बर पर  बोली जाने वाली भाषा है - इसके वावजूद हम उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा सूची में  अभी तक शामिल क्यों  नहीं करा पाये?
                                  विगत शताब्दी के अंतिम दशक में  सोवियत  क्रांति पराभव उपरान्त दुनिया के एक ध्रवीय[अमेरिकन ] हो जाने  से  भारत सहित सभी पूर्ववर्ती  गुलाम राष्ट्रों  को  मजबूरी में न केवल अपनी आर्थिक नीतियां बदलनी पड़ीं ,न केवल नव्य -उदारवादी वैश्वीकरण की -खुलेपन की  नीतियां अपनानी पड़ीं बल्कि देश में प्रगतिशील आंदोलन और तदनुसार सामाजिक -सांस्कृतिक और साहित्यिक चिन्तन पर भी नव्य -उदारवाद की छाप  पडी। नए जमाने के उन्नत आधुनिक तकनीकी संसाधनों  को आयात करते समय  इस नए -भूमंडलीकरण का प्रभाव भी  परिलक्षित हुआ ।जीवन संसाधनों में क्रांतिकारी परिवर्तनों ने, न केवल भारत ,न केवल हिंदी जगत बल्कि विश्व की अधिकांस नामचीन्ह भाषाओँ-उनके साहित्य -उनके पाठकों को घेर-घार कर कंप्यूटर रुपी  उन्नत तकनीकी  रुपी  जादुई डिब्बे   के सम्मुख  सम्मोहित  सा  कर दिया है । प्रिंट ही नहीं श्रव्य साधन भी अब कालातीत होने लगे हैं। अब तो केवल स्पर्श और आँखों के इशारों से  भी सब कुछ वैश्विक स्तर पर - मनो-मष्तिष्क तक पहुंचाने वाले -सूचना संचार  सिस्टमईजाद हो चुके हैं। इतने सुगम और तात्कालिक संसाधनों  के  होते हुए अब  किस को फुरसत है कि कोई बृहद ग्रन्थ या  पुस्तक पढ़ने का दुस्साहस करे ? फिर चाहे वो गीता ,रामायण  कुरआन या बाइबिल  ही क्यों न हों ? चाहे वो हिंदी,इंग्लिश  की हो या संस्कृत की ही क्यों न हो ?चाहे वो सरलतम सर्वसुगम हिंदी में हो या किसी अन्य भाषा में आज किसको फुर्सत  है  कि  अधुनातन संचार साधन छोड़कर किताब  पढ़ने बैठे ? रोजमर्रा  की भागम-भाग और तेज रफ़्तार वाली  वर्तमान   तनावग्रस्त  दूषित जीवन शैली  में बहुत कम सौभागयशाली हैं- जो बंकिमचंद की 'आनंदमठ ' शरतचंद की 'साहब बीबी और गुलाम ' , रांगेय राघव की 'राई  और पर्वत', श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' , मेक्सिम  गोर्की  की  'माँ  ', प्रेमचंद की 'गोदान', निकोलाई आश्त्रोवस्की   की 'अग्नि दीक्षा' , रवींद्र नाथ टेगोर की 'गोरा' , महात्मा गांधी की 'मेरे सत्य के प्रति प्रयोग ', पंडित जवाहरलाल नेहरू की 'भारत एक खोज'  तथा  डॉ बाबा साहिब आंबेडकर की 'बुद्ध और उनका धम्म' पढ़ने सके  !  जबकि ये सभी कालातीत पुस्तकें आज भी भारत की  हर लाइब्रेरी में  उपलब्ध हैं।  इन सभी महापुरुषों की कालजयी रचनाएँ -खास  तौर से   हिंदी में  भी   बहुतायत  से  उपलब्ध हैं। अधिकांस आधुनिक युवाओं को तो इन पुस्तकों के नाम भी याद नहीं , कदाचित  वे   विजयदान  देथा  , सलमान रश्दी ,खुशवंतसिंघ ,राजेन्द्र यादव या अरुंधति रे को जानते भी होंगे तो इसलिए नहीं कि इन लेखकों  का साहित्य  उन्होंने पढ़ा है ,बल्कि इसलिए जानते  होंगे  कि ये लेखक कभी -न कभी किसी विवाद -विमर्श   का हिस्सा जरुर रहे होंगे !गूगल सर्च पर या  किसी तरह के  केरियर कोचिंग में  इनकी आंशिक   जानकरी उन्हें  मिली होगी।  यह सर्वमान्य सत्य है कि  गूगल या अन्य माध्यम से आप अधकचरी  सूचनाएँ तो  पा  सकते हैं, किन्तु ज्ञान तो अच्छी पुस्तकों से ही पाया जा  सकता है।
                 आज के आधुनिक युवाओं  को पाठ्यक्रम से बाहर की  पुस्तकें पढ़ पाना  इस दौर में किसी तेरहवें  अजूबे से कम नहीं है।  उन्हें लगता है कि साहित्य  ,विचारधाराएं ,दर्शन  या  कविता -कहानी का  दौर अब नहीं रहा। उनके लिए तो समूचा प्रिंट माध्यम  ही अब  गुजरे  जमाने की चीज हो गया है। यह कटु  सत्य है कि चंद रिटायर्ड -टायर्ड और पेंसनशुदा - फुरसतियों के दम पर  ही अब सारा छपित साहित्य  टिका हुआ है।  ऐंसा प्रतीत होता है कि अब  हिंदी  का पाठक भी इन्ही में कहीं समाया हुआ है।  भाषा -साहित्य के इस युगीन धत्ताविधान  में यह पीढ़ीयों  के बीच मूल्यों का भी  क्षेपक है।  जो कमोवेश राजनैतिक इच्छाशक्ति से भी  इरादतन स्थापित है। इस संदर्भ में यह  वैश्विक  स्थिति है। भारत में और खास तौर  से हिंदी जगत में यह बेहद चिंतनीय अवश्था में है। दुनिया में शायद ही कोई मुल्क होगा जो अपनी राष्ट्र भाषा को उचित सम्मान दिलाने या उसे राष्ट्र भाषा के रूप में व्यवहृत करने के लिए इतना मजबूर या  अभिशप्त होगा  ,जितना कि  हिंदी  के लिए भारत  असहाय है ! दुनिया में शायद ही   कोई  और राष्ट्र होगा जो अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान के लिए इतना पैसा पानी की तरह  बहाता  होगा जितना की भारत। भारत में लाखों राजभाषा अधिकारी हैं ,जो राज्य सरकारों के ,केंद्र सरकार   के सभी  विभागों  में ,सार्वजनिक उपक्रमों में  अंगद के पाँव की तरह जमे हुए हैं। इनसे राजभाषा को या देश को एक धेले  का सहयोग नहीं है। ये केवल दफ्तर में  बैठे -बैठे ताजिंदगी  भारी -भरकम वेतन-भत्ते पाते हैं ,कभी-कभार एक -आध अंग्रेजी  सर्कुलर  का घटिया हिंदी अनुवाद करते हैं। साल भर में एक बार सितंबर  माह में 'हिंदी पखवाड़ा'या 'हिंदी सप्ताह' मनाते हैं। अपने बॉस को पुष्प गुच्छ भेंट करते हैं ,कुछ ऊपरी  खर्चा -पानी भी हासिल कर लेते हैं। रिटायरमेंट के बाद पेंसन इनका जन्म सिद्ध अधिकार है ही।  स्कूल ,कालेज ,विश्विद्द्यालयों के हिंदी शिक्षक -प्रोफेसर और  कुछ  नामजद एनजीओ भी राष्ट्र भाषा -प्रचार -प्रसार के बहाने  केवल अपनी आजीविका  के  लिए ही  समर्पित हैं ।  हिंदी को देश में उचित सम्मान दिलाने या उसे संयुक राष्ट्र में सूचीबद्ध कराने के किसी आंदोलन में उनकी कोई सार्थक भूमिका  नहीं है। अपनी खुद की  पुस्तकों के प्रकाशन में   ही इनकी ज्यादा रूचि हुआ करती है ।
          सोशल मीडिया -डिजिटल -साइबर -संचार क्रांति -फेस बुक और गूगल सर्च इंजन ने  न केवल दुनिया छोटी  बना दी है  बल्कि सूचना -संचार क्रांति ने  प्रिंट संसाधनों को -साहित्यिक विमर्श को  भी हासिये पर धकेल दिया है। और छपी हुई बेहतरीन पुस्तकों को भी गुजरे जमाने का ' सामंती'शगल बना डाला है.अब यदि एसएमएस है तो टेलीग्राम  भेजने की जिद  तो केवल पुरातन यादगारों का व्यामोह मात्र  ही हुआ न  ! वरना दुनिया  में जो भी है ,जिसका भी है,जहाँ  भी है , सब कुछ अब सभी को सहज ही उपलब्ध है.हाँ शर्त केवल यह  है कि एक अदद इंटरनेट कनेक्शन  और लेपटाप,एंड्रायड -वॉट्सऐप  या ३-जी मोबाइल अवश्य  होना चाहिए   !  इधर  किताब छपने ,उसके लिखने के  लिए महीनों  की मशक्कत ,सर खपाने और प्रकाशन की मशक्क़त !   यदि  साहित्य्कार -लेखक नया- नया  हुआ  तो प्रकाशक नहीं मिलने की सूरत में  अपनी जेब ढीली करने के बाद  ही पुस्तक को आकार  दे पायेगा। यदि  उसे  खरीददार नहीं मिल रहे हैं तो  मुफ्त में या गिफ्ट में देने की मशक्क़त !  इस दयनीय दुर्दशा के लिए न तो लेखक  जिम्मेदार  है,न प्रकाशकों का दोष है ,न तो  पाठकों या क्रेताओं  का अक्षम्य अपराध  है , यह न तो  हिंदी भाषा का  संकट हैऔर न ही साहित्यिक संकट है ! बल्कि ये तो  आधुनिक युग की  नए ज़माने की ऐतिहासिक आवश्यकता और कारुणिक सच्चाई है।  चूँकि समस्त वैज्ञानिक आविष्कारों और  सूचना एवं संचार क्रांति का उद्भव गैर हिंदी भाषी  देशों में हुआ है तथा   हिंदी  में अभी इन उपदानों के संसधानों  का सही -निर्णायक मॉडल उपलब्ध नहीं है इसलिए किताबें अभी भी प्रासंगिक है बनी  हुई हैं।
                 हिंदी का प्रचार -प्रसार ,हिंदी साहित्य  में विचारधारात्मक लेखन ,हिंदी साहित्य सम्मेलनों की धूम-धाम  ,पत्र  - पत्रिकाओं के प्रकाशनों का दौर अब थमने लगा  है। हिंदी इस देश के आम आदमी की भाषा है। हिंदी 'स्लैम डॉग  मिलयेनर्स ' जैसी फिल्मों के मार्फ़त पैसा कमाने की भाषा है.हिंदी गरीबों -मजदूरों और शोषित-पीड़ित जनों की भाषा है। चूँकि हिंदी में अब इन वंचित वर्गों और सर्वहाराओं  की उनकी मांग के अनुकूल नहीं   लिखा जा रहा है , बल्कि बाजार की ताकतों के अनुकूल,मलाईदार क्रीमी लेयर के अनुकूल महज तकनीकी,उबाऊ  और कामकाजी साहित्य का  तैसे सृजन- प्रकाशन  हो रहा है । इसीलिये हिंदी जगत में वांछित पाठकों की संख्या न  केवल तेजी से गिरी है अपितु  शौकिया किस्म के फ़ालतू लोगों  तक  ही सीमित रह गई है।
        आजादी के बाद संस्कृतनिष्ठ हिंदी की ततसम  शब्दावली के चलन पर जोर देने ,अन्य भारतीय  भाषाओँ के  आवश्यक और वांछित शब्दों से परहेज करने , अनुवाद  की काम चलाऊ  मशीनी आदत से चिपके रहने , अधुनातन सूचना एवं संचार क्रांति के साधनों के प्रयोग में अंग्रेजी भाषा का  सर्व सुलभ होने,हिंदी भाषा के फॉन्ट ,अप्लिकेशन  तथा वर्णों  का तकनीकी  अनुप्रयोग   सहज ही उपलब्ध न होने या कठिन होने  से  न केवल पाठकों की संख्या  घटी बल्कि हिंदी में लिखने वालों का सम्मान और  स्तर  भी घटा है । न केवल तकनीकी कठनाइयों  हिंदी में मुँह  बाए खड़ी हैं  बल्कि  आधुनिक युवाओं को आजीविका के संसाधन और अवसर  भी  हिंदी में उतने  सहज  नहीं जितने आंग्ल भाषा में उपलब्ध हैं। इसीलिये भी देश में ही नहीं विश्व में भी हिंदी के पाठक कम होते जा रहे हैं।   देश में हिंदी को सरल बोधगम्य आजीविका-  परक  और जन-भाषा बनाने की  राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव  में और हिंदी की  वैश्विक  मार्केटिंग नहीं हो पाने से राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  मेगा -साय-साय या बुकर पुरस्कार भी उन्हें  ही  मिला करते हैं  जो हिंदी को हेय  दृष्टि  से देखते  रहे हैं। अंततोगत्वा फिर भी हिंदी ही देश  की राजरानी  रहेगी । चाहे वालीवुड हो ,चाहे  खुदरा व्यापार हो ,चाहे बाबाओं-स्वामियों का  भक्ति और साधना  का  केंद्र हो  ,चाहे रामदेव हों ,नरेंद्र मोदी हों ,राहुल गांधी  हों ,केजरीवाल हों ,चाहे अण्णा  हजारे हों चाहे  मुख्य धारा का मीडिया हो ,सभी ने हिंदी के  माध्यम से ही  भारी सफलताएं अर्जित कीं हैं। सभी के प्राण पखेरू हिंदी में  ही  वसते  हैं।  इसलिए यह कोई  खास  विषय नहीं की हिंदी साहित्य   के  पाठकों की संख्या घट  रही है या बढ़ रही है।
                                     अन्य  भाषाओँ  के बारे  में तो कुछ नहीं  कह सकता किन्तु हिंदी भाषा और उसके समग्र साहित्य़ संसार के बारे में यकीन से कह  सकता हूँ कि उत्तर-आधुनिक सृजन के उपरान्त -अब  यहाँ पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स नाम  का जंतु वैसे भी  इफ़रात  में नहीं  पाया जाता। वास्तव में हिंदी जगत में कहानी,कविता ,भक्ति काव्य  ,रीतिकाव्य  , सौन्दर्यकाव्य  ,रस सिंगार ,अश्लीलता  के नए - अवतार फ़िल्मी साहित्य और कला  का  तो  बोलबाला   है  , कहीं -कहीं जनवादी - राष्ट्रवादी -प्रगतिशील और जनोन्मुखी साहित्यिक सृजन  की  अनुगूंज भी सुनाई   देती है किन्तु  समष्टिगत रूप में तात्कालिक दौर  की   समस्याओं  और जीवन मूल्यों  के  वौद्धिक विमर्श पर हिंदी बेल्ट में  सुई पटक  सन्नाटा ही है. इस साहित्यिक  सूखे में  जिज्ञासु या ज्ञान-पिपासु  पाठकों  की कमी होना स्वाभाविक है।मांग और पूर्ती का सिद्धांत केवल अर्थशाश्त्र का विषय नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में भी  यह सिद्धांत सर्वकालिक ,सार्वभौमिक और समीचीन है।
                       लेखकों और जनता के बीच संवादहीनता का दौर है ,अभिव्यक्ति के खतरे उठाकर देश और समाज की वास्तविक आकांक्षाओं के  अनुरूप  क्रांतिकारी  साहित्य अर्थात व्यवस्था परिवर्तन के निमित्त रेडिकल - सृजन  शायद आवाम की या सुधी पाठकों की माँग  भले ही न   हो किन्तु देश और कौम के  लिए यह साहित्यिक कड़वी दवा नितांत आवश्यक है.    हिंदी के पाठकों की संख्या  बढे इस बाबत  पठनीय साहित्य की थोड़ी सी  जिम्मेदारी  यदि  साहित्य्कारों की है तो कुछ थोड़ी सी हिंदी के जानकारों याने -सुधी पाठकों की भी है।
                                            
       
            राष्ट्रभाषा -हिंदी  दिवस पर अनन्य शुभकामनाओं के साथ ,

  
               क्रांतिकारी   अभिवादन सहित ,

                    श्रीराम तिवारी  

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

मुनाफाखोर और सरमायेदार देशों के सामने झोली फैलाना गरिमामय नहीं कहा जा सकता।

  संघ परिवार को उम्मीद थी कि  केंद्र में अपनी  सरकार आएगी  तो धारा -३७० , यूनिफार्म  सिविल कोड,राम -  लला मंदिर , स्वदेशी -स्वाभिमान संधारण तथा काला  धन वापिसी   इत्यादि के संदर्भ में कुछ नया  काम  होगा। चूँकि मोदी सरकार अपने प्रथम  चार महीनों में तो  इन मुद्दों पर कुछ खास प्रगति  निसंदेह  नहीं कर पाई है,  जिसका असर विधान सभाई  उपचुनावों में भी दिखाई दे गया  है ।  इसलिए 'संघ परिवार'  के बौद्धिक चिंतकों  में अब  बेचैनी   व्याप्त होने लगी  है। स्वयं संघ प्रमुख मोहनराव  भागवत  को भी कहना पड़ा है  कि सरकार का कामकाज संतोषजनक तो  नहीं है. किन्तु  वे चाहते हैं कि  'मोदी सरकार ' को एक साल तक न 'छेड़ा'  जाए ।  मोदी सरकार के  आलोचकों[ जिसमे सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है ] का कहना है कि  महज गंगा सफाई अभियान का नारा लगाने,काशी  का कायाकल्प करने तथा  विदेशी सैर-सपाटों से सारा सिस्टम बदल जाएगा  यह बात  लोगों के  गले नहीं उतर  रहीं ।  चाहे धड़ाधड़   खाते खुलवाने की बात हो  या आधार को सर्व समावेशी बंनाने की बात हो  यह कोई नयी  योजना नहीं है।  मनमोहन के राज में  नंदन निलेकणि जैसे विद्वान  भी यही सब करने जा  रहे थे । जापान से बुलेट रेल लाने  की बात  हो  या अमेरिका से सामरिक भागीदारी  की बात हो  सभी मुद्दे पूर्ववर्ती सरकारों ने पहले ही अंजाम तक पहुंचा दिए थे। जो  अंधाधुंध विदेशी पूँजी  निवेश  और विदेशी पूँजी की निर्भरता  की बात मोदी जी  अमेरिका और जापान में जाकर कर आये हैं  वो  तो नरसिम्हाराव के जमाने  से ही  चल रही है। अब यदि  ऍफ़ डी आई  को  १००% बढ़ाया जा रहा  है तो  यह तो अधोगामी कदम है। इसमें गर्व या उपलब्धि की बात क्या है ? क्या इससे  देश का विकाश  हो  जाएगा  ? क्या मँहगाई ,अशिक्षा,हिंसा -आतंक का तांडव रुक जाएगा?
                               जहाँ तक 'गुड-गवर्नेस ' की बात है तो अभी तो न केवल यूपी-बिहार -एमपी बल्कि सारा देश ही  हत्या ,रेप,साम्प्रदायिक उन्माद और भृष्टाचार से  खदबदा रहा है। उधर सीमाओं पर पाकिस्तानी फौजें पहले से ज्यादा आग उगल  रहीं हैं । कश्मीर अशांत है। महँगाई  की चर्चा  करना तो अब बेमानी है। केवल कुछ राजपालों को बदलने , सार्वजनिक उपक्रमों में१००% ऍफ़  डी  आई  बढ़ाने,लव-जेहाद पर सामजिक सौहाद्र मिटाने तथा  पडोसी राष्ट्रों  की चिरौरी करने से राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्र - स्वाभिमान कहाँ प्रदर्शित होता है।  देश में मोदी सरकार के आगमन उपरान्त तो  महिलाओं ,दलितों, कमजोरों ,अल्पसंख्यकों और  मजदूरों पर अत्याचार तेजी से बढे हैं। सरकार के रिपोर्ट कार्ड में ये सब तो  कोई बताने वाला नहीं है। क्या अमेरिका में प्रायोजित तालियों और भारत में मीडिया को साध लेने मात्र से सुशासन या गुड गवर्नेस  आ सकता  है ?
                   प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र भाई मोदी  द्वारा सम्पन्न   भूटान ,नेपाल , जापान और अमेरिका की   यात्राओं  से देश का कितना कल्याण  होगा ? कब होगा  ?  इसकी भविश्यवाणी  अभी से करना  तो मुनासिब नहीं। किन्तु यदि उनके  प्रारम्भिक   चार माह के  कार्यकाल में इन्हे समाहित करने की चेष्टा करें तो  सार्थक कार्यों में इन यात्राओं  को शुमार  किये जाने लायक तो कदापि कुछ भी नहीं है । क्या लुटेरे राष्ट्रों से निवेश रुपी भीख माँगना कोई राष्ट्र गौरव की बात है ?  इधर ये दक्षेश के  निर्धन पड़ोसी  मुल्क - भारत को कुछ देने के बजाय  ज्यादा  खींचने की फिराक में  रहते हैं। भूटान और नेपाल से  भारत को कब क्या मिला ? नेपाल से बाढ़ , तस्करी मिला करती है।  चीन -पाकिस्तान  का परोक्ष आक्रमण ही भारत को मिलता रहा है।  ये छुद्र पडोसी  ब्लेकमेलिंग भी करते रहते हैं।  जापान -अमेरिका को पटाकर -चीन को  चमकाने के फेर में हमें इन नंगे-भूंखे  पड़ोसियों  को देना  ही ज्यादा पड़ता है। जहाँ तक जापान का प्रश्न है तो उसका  भारी  भरकम  निवेश  पहले से ही भारत में दशकों से जारी है। मारुती -सुजुकी से भी दशकों -पहले जापान की पूँजी ने भारतीय बाजार को केप्चर कर लिया था। अब यदि  अगस्त -२०१४  में मोदी जी ने जापान  अमेरिका जाकर निवेश के लिए   पुनः  लाल-कारपेट  बिछाने की  दुहाई दी है  तो इसमें   गौरवान्वित होने जैसा  क्या है ?
          वेशक उन्होंने २१ वीं सदी के असल  नायक 'भारत -जापान'  बताये हैं. वो सब तो फिर भी ठीक है ,किन्तु  इन यात्राओं में वे  भारत को जरा ज्यादा ही कंगाल  निरूपित कर  आये हैं।  उन्होंने  भूटान,नेपाल ,जापान और  अमेरिका में  बार-बार  कपडे बदल कर- वैयक्तिक  तेवर बदलकर -भारत को 'कमतर' दिखाकर  तथा  सम्पन्न राष्ट्रों को 'माई-बाप' बताकर - याचक वाला  अंदाज  दिखाकर -देश को रुसवा ही किया है। यह आचरण कदापि   स्वीकार्य नहीं  किया जा सकता। नमो की  यह सांस्कृतिक,कूटनीतिक और राजनैतिक - चूक  समझ से परे   है।  भारत जैसे महान और विराट -शक्तिशाली लोकतान्त्रिक राष्ट्र के प्रधानमंत्री का - जापान और अमेरिका -जैसे मुनाफाखोर और सरमायेदार  देशों  के सामने झोली फैलाना गरिमामय नहीं कहा जा  सकता।  इससे हमे क्या फायदा  होगा ? केवल यही की दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त कहने मात्र को हो जाएगा ! ये नकारात्मक विदेश नीति का  तुच्छ विचार  है। यह भारत के  गौरव पूर्ण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

         जापान ,अमेरिका या चीन  यदि  भारत में  आगामी ५ सालों में १०  लाख  करोड़ का निवेश करते हैं  तो इसमें गर्व की क्या बात है ? इससे किसका भला होने जा रहा है ?  अतीत में  भी दान खाता लेकर  न  तो जापान  भारत   आया , न अमेरिका आया , न ही इंग्लैंड ।  ये सूदखोर पूँजीवादी  सरमायेदार राष्ट्र -केवल  उदारीकरण - भूमंडलीकरण   के बहाने,  अपनी पुरानी हो चुकी टेक्नॉलॉजी को भारत में खपाने,उनके घरेलू आर्थिक संकट को भारत जैसे विकाशशील राष्ट्र के कन्धों पर लादने तथा पुनः कुछ कमाने   - धमाने  ही भारत या  विश्व के किसी अन्य विकाशशील देश में डेरा डालने पहुँच जाते हैं।जबकि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर सम्पन्न  भारत को - वैश्विक  आवारा पूँजी  के निवेश की कोई जरुरत ही  नहीं है।
                                       अभी कुछ दिनों पहले ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की मैनेजिंग डायरेक्टर ने  भी  अपनी  सालाना  रिपोर्ट में  भी यही दर्शाया था कि 'भारत  दुनिया का वह अमीर मुल्क है जहाँ संसार के सर्वाधिक गरीब रहते हैं ।  आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के कारण  ही भारत में अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं , गरीब और ज्यादा गरीब हो रहे हैं। भारत के तमाम खरबपति -अरबपति - पूँजीपति  चाहें तो अपने देश के गऱीबों की गरीबी दर्जनों  बार दूर कर सकते हैं।  "इसे न तो मनमोहनसिंह ने समझा और न मोदीजी समझना चाहते हैं ,वे तो अडानी,अम्बानी , भारती ,बिड़ला और टाटा के मुरीद हैं ,वे जापान के मुरीद हैं ,वे पैसे वालों के मुरीद हैं। गरीब को  वे  मात्र वोटर समझते हैं.इसमें किस उपलब्धि का बखान किया जा सकता है ?
                हालाँकि मनमोहन सिंह की  नीतियों के मद्देनजर  मोदीजी की नीतियों का आकलन किया जाए तो   दोनों का  डीएनए  भी एक ही है। यूपीए -२  के सापेक्ष -'मोदी सरकार'  प्रत्येक  क्षेत्र में  भले ही  आक्रामक  दिख   रही  है , किन्तु फिर भी वह यूपीए-१ से बेहतर परफार्मेंस  नहीं दे पा रही है ।  यूपीए-१ के दौर में  देश की जनता को जो राहत दी  गई  उस मनरेगा ,आरटीआई , आंशिक खाद्द्य सुरक्षा तथा संचार क्रांति के लिए कौन भुला सकता है ?  तब जो   इन्फर्स्ट्र्क्चरल डवलपमेन्ट  शुरू हुआथा  उसी की बदौलत तो  यूपीए को २००९ में  भी  दुवारा मौका मिला ! यूपीए-२ फिसड्डी रही इसलिए २०१४ के चुनाव में कांग्रेस और उनके गठबंधन साथियों की दुर्गति हुई। मोदी सरकार अपने प्रथम सौ दिनीं- कार्यकाल में 'यूपीए-३  जैसा आचरण करती रही  है। अभी तक वह किसी भी क्षेत्र में  मनमोहनी नीतियों से अलग नहीं हो पाई है।मात्र  मोदी जी के  मुखर होने  या हिंदी में बतियाने के अलावा और कोई फर्क इन दोनों में कहाँ है ?
                        वित्त मंत्री श्री जेटली जी के अनुसार  आर्थिक बृद्धि दर  विगत तिमाही में ५.७ की  दर्ज हुई है। जबकि  मई-२०१४ में यह ५ के आसपास थी।  पूर्व वित्त मंत्री  चिदंबरम जी का कहना है  की हमने जो बोया वही तो  'मोदी सरकार' के दौर में काटा जा रहा है।  ये तो हमारी उपलब्धियां है। मोदी सरकार  को तो अभी बक्त चाहिए। उनकी बात में कुछ वजन तो जरूर है। क्योंकि कुछ अन्य मुद्दों पर  खुद भाजपा प्रवक्ता भी  कहते  आ रहे हैं कि  'इतनी जल्दी आउट -पुट  नहीं आ सकता। परिणाम आने में बक्त लगता है। अभी तो हनीमून भी शुरू नहीं हुआ !  बच्चा  पैदा होने में समय लगता है। बगैरह बगैरह  …!
                          फिर भी माना जा सकता है कि - भारत  की जनता के लिए न सही किन्तु सत्ता रूढ़ राजनैतिक परिवार  के लिए  और खास तौर  से देश के उद्द्यमी वर्ग के लिए तो  यह एक शुभ और सुखद अनुभूति  ही  है कि प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र भाई  मोदी जी की चीन से वार्ता ठीक- ठाक रही  है। वाणिज्यिक दॄष्टि  से तो  जापान,अमेरिका  यात्रायें भी कमोवेश   सफल रही है । चूँकि विश्व आतंकवाद या भारतीय  उपमहादीप के हिंसक मजहबी उन्माद के लिए स्वयं अमेरिका ही जिम्मेदार है।  अमरीका या चीन से ये उम्मीद करना कि  वो पाकिस्तान  को आर्थिक मदद बंद कर देगा  पूर्णतः खंख़्याली  ही है।
             ठीक उस बक्त जब 'मोदी सरकार ' के १०० दिन पूरे  भी हुए। जब   श्री नरेंद्र भाई मोदी जापान स्थित ' तोजी  मंदिर ' में भगवान बुद्ध को प्रणाम कर रहे थे। 'वन्दे  मातरम' और 'भारत माता की जय  के  नारों के बीच जापान के प्रधानमंत्री श्री आबे के सानिध्य में - यूनेस्को द्वारा संरक्षित इस 'तोजी  मंदिर'  प्रांगण में श्री नरेंद्र  मोदी ने तभी  अपने प्रधानमंत्रित्व  कार्यकाल का सिंहावलोकन  भी  किया  हो तो अति उत्तम ।  उन्होंने  जापान की  जनता,वहाँ के नेता और मीडिया  को  तो अवश्य ही  प्रभावित किया है। शायद  मोदी सरकार  अपने  सौ दिवसीय कार्यकाल का लेखा -जोखा तैयार कर जनता के बीच लाने की मशक्क़त कर रही है।  किन्तु जहाँ तक देश की जनता -जनार्दन  की ओर  से  रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किये जाने  का सवाल है तो अभी-अभी सम्पन्न विधान सभा उपचुनावों में वह उजागर हो चुका  है।  क्या  भाजपा नेतत्व इन हालात से परिचित है?
           भले ही प्रधानमंत्री ने अपने सांसदों, मंत्रियों और पार्टी पदाधिकारियों को हिदायत दे  रखी  है  कि "वे महत्वपूर्ण और नीतिगत मामलों में प्रेस से बातचीत न करें , यदि जरूरी हो तो होमवर्क कर लें ,मीडिया वालों से  हलकी-फुलकी बातचीत से बचें,अपने नाते-रिश्ते वालों को उपकृत करने या लाभ के पद पर बिठाने से बचें ". लेकिन फिर भी अधिकांस उसका पालन नहीं कर रहे हैं। पीएमओ को बार-बार फटकार लगाने की नौबत आ रही है। स्वयं प्रधानमंत्री जी  भी अपने सहयात्रियों को संदेह की नजर से देखते हैं  य़े सभी तथ्य बता रहे हैं कि  'मोदी सरकार' के   अंदर भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। जहाँ तक बाहर की बात है तो  इन १००  दिनों के कामकाज पर जनता और मीडिया  की मिश्रित प्रतिक्रिया  की बात है तो वह  बहुत  स्पष्ट  जाहिर हो  चुकी  है। इन ताजा विधान सभा के उपचुनावों  और उनके  परिणामों  से  सब को सब कुछ साफ़ -साफ दिख रहा है। बिहार में लालू नीतिश  गठबंधन पुनः हरा-भरा होने लगा है। उत्तराखंड  , कर्नाटक  , पंजाब , मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र छग  -  इत्यादि  प्रांतों में कांग्रेस को आशातीत सफलता मिली है। ऐंसा कोई राज्य नहीं  बचा जहाँ पर   कांग्रेस को  पुनः  विजय -संजीवनी  न मिली  हो ।
                  जनता के अच्छे दिन आये हैं  या नहीं ये  तय होना  तो अभी बाकी है.लेकिन  मोदी  सरकार के प्रथम १०० दिनों का देश की जनता पर असर परिलक्षित  होने लगा  है। कांग्रेस सहित सम्पूर्ण विपक्ष ,मय  -तीसरा मोर्चा -वाकई फीलगुड महसूस कर  रहे हैं । लोक सभा  की तीन सीटों में  से एक - टीआरएस ,एक भाजपा और एक सपा को मिली है। क्या बाकई  यह किसी तरह  के  'संघनिष्ठ प्रभाव' या 'मोदी लहर ' का असर है ? कांग्रेस को तो नेतत्व विहीन होने ,आपस में लड़ने -भिड़ने  के वावजूद ,इतनी  ज्यादा  बदनामी  होने के वावजूद,  बिना कुछ किये धरे ही प्रत्येक  राज्य में अप्रत्याशित समर्थन मिल रहा है। गुजरात  राजस्थान के  विधान सभा उपचुनाव में कांग्रेस को बिन मांगे ही जनता ने  तीन  सीटें जिताकर  लोकतंत्र में  उसके प्रति  अपनी आस्था  दुहराई  है।  यहाँ तक की कुछ जगह तो कांग्रेस  ने भाजपा की ही सीट  छीन ली है। हालाँकि जब तक कोई अन्य सार्थक  विकल्प नहीं मिलता -जनता  भी कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा  को ही  बारी  बारी से चुनने को अभिसप्त  है।  यूपी में सपा की बम्फर जीत और बंगाल में भाजपा का खाता  खुलना -एक ध्रुवीकृत  राजनैतिक रुझान का प्रमाण है। यूपी में  मायावती  की वसपा का मैदान से हटना और मुस्लिम +पिछड़ा +दलित का एकजुट होकर सपा को वोट करना। बिहार  के लालू-नीतीश  सिद्धांत का ही सफल  संस्करण है।  
 निसंदेह -भूटान ,नेपाल ,जापान यात्राओं में  मोदी जी ने वैश्विक मीडिया का ध्यान -आकर्षण   किया है किन्तु घरेलु मोर्चे पर हर  चीज जस की तस है.पूर्ववर्ती यूपीए और वर्तमान मोदी सरकार के क्रिया-कलापों में  केवल वित्तण्डावाद  और अम्लीकरण की तीव्रता  का फर्क है। कश्मीर में  बाढ़ प्रभावितों के प्रति मोदी जी ने सही संवेग और राजधर्म का परिचय दिया है। शायद इसीलिये उनके कटु आलोचक भी बहरहाल तो प्रशंसा ही कर रहे हैं। किन्तु जनता का रुझान  अब तेजी से भाजपा और मोदी सरकार के प्रति कम होने लगा है।
                         विगत लोक सभा चुनाव में  कांग्रेस नीत यूपीए के १० वर्षीय कुशासन से तंग आकर ही  देश की आवाम ने भाजपा या 'नमो' के नेतत्व में एनडीए को प्रचंड बहुमत  प्रदान किया था। लेकिन १०० दिनों में ही 'संघ' का और जनता का  भी  मोह भंग   होने लगा  है।  मोदी सरकार के लिए  यह खतरे की घंटी हो सकती है। अब  'मोदी सरकार ' का तलवार की धार पर चलने का वक्त आ  चुका है। आम तौर  पर  विश्लेषकों की राय है कि चूँकि   'नमो' रुपी बरगद के पेड़ के नीचे  अन्य  नेता -कार्यकर्ता रुपी पेड़- पौधों को अपना रूप -आकार विकसित करने का वांछित अवसर ही नहीं मिला तो परिणाम आशाजनक कैसे सम्भव हैं। अभी तो  हर चीज  'नमो' के कब्जे में है, यहाँ तक कि  कोई  केंद्रीय  मंत्री  तो क्या भारत का गृह मंत्री  भी  'नमो' की इच्छा के बिना अपना मनपसंद  पीए भी   नहीं  रख  सकता।  अतः यह सम्भव हो सकता है की व्यक्तिगत रूप से  तो 'नमो' अपना 'आउट- पुट ' देने में सफल रहे हैं , किन्तु विभिन्न राज्यों के भाजपाई नेता  , केंद्रीय  मंत्री  तथा पार्टी के नए पदाधिकारी - समष्टिगत रूप से  अपने रण - कौशल का इजहार करने में  अभी असमर्थ  हो  रहे  हैं। इसी लिए मोदी सरकार के १०० दिन सफल  होने में सभी को संदेह है । भारत  के कार्पोरेट घरानों  ,  पूँजीपतियों   ,मंदिरों  ,मठों, गिरजों, गुरुद्वारों  और वक्फ बोर्डों के पास इतना धन है कि  जापान को १० बार  खरीदा  जा सकता है। अमेरिका को  बाजार में  टक्कर दी जा सकती है।  भारत   के मध्यम  वर्ग के पास इतना सोना है कि  अमेरिका का स्वर्ण भण्डार भी शर्मा जाए !  चीन ,जापान ,अमेरिका और यूरोप  के आगे सर झुकाने से कुछ नहीं होगा प्रधान मंत्री  जी !  देश के अंदर  झाँक  कर  देखिये नरेंद्र भाई मोदी  जी   । कस्तूरी कुण्डल  वसे… याद  कीजिये मान्यवर  !   विनाशकारी पूँजीवादी  नीतियाँ   बदलिए   श्रीमान  ! यदि उठा सको तो - दुनिया के सामने भारत का  'सर उठा कर अपना  '५६' इंच का सीना  तानकर  दिखाओ ! तब शायद   कोई  बात बने' !

                                            -; श्रीराम तिवारी ;- 

रविवार, 31 अगस्त 2014

अभी तो उनका 'हनीमून पीरियड शुरू ही हुआ है। ;- श्रीराम तिवारी ;-

   मार्फ़त श्री जेटली जी -केंद्रीय मंत्री ,भारत सरकार ,नई  दिल्ली ,

  देश की आवाम  को -एक अच्छी खबर है कि -देश के अनाज गोदाम अन्न से  भरे पड़े हैं।

  देश की आवाम को  मानसून की बेरुखी से चिंता करने की  या महँगाई  से डरने  की कोई बात नहीं  है।

  चलो भाई   हमारी चिंता  दूर हुई  आवाम को ये भी याद रखना चाहिए   कि  ये  चमत्कार  -महज तीन

 महीनों  में संभव नहीं हुआ !तीन महीने पहले सत्ता में आई एनडीए सरकार- बनाम मोदी सरकार- बनाम 'संघ

सरकार' -के  सत्ता में आने और कुछ कर  दिखाने  में कुछ बक्त लगेगा , उन्ही  के किसी नेता का तर्क है की

 अभी -अभी तो शादी ही  हुई है,अभी तो हनीमून भी नहीं सम्पन्न हुआ।  क्या  इतने जल्दी बच्चा संभव है ?

 वेशक समझदार लोग भी मानते हैं कि  इस सरकार के एक साल होने के बाद ही पता लगेगा कि  अन्न भंडारण

की क्षमता  और महँगाई  की स्थति क्या है ? यह \बात   जुदा  है कि  इस सरकार के आते  ही मानसून  भी  दगा

 दे गया  ! न केवल मानसून  दागा दे गया बल्कि पाकिस्तान का शरीफ  भी कौल का कच्चा निकला और  गच्चा

 दे गया।  अभी -अभी २-४ दिन पहले ही   प्रधानमंत्री जी ने  एक  विशालकाय नवीनीकृत  युद्धपोत नौसेना को

 समर्पित किया।  चारणों ने  शौर्य ,यश ,सुशासन और विकाश  के मंगल  गीत गाये।  चापलूसों ने  नेतत्व

की चरण वंदना की। पता लगा कि  इसे  भारत -रूस सहयोग से बनाया गया है [वास्तव में यह  सेकिण्ड हेंड-

पुराना रुसी युद्धपोत है जिसे साज-संवार कर नया भारतीय  रूप दिया गया है  और इसे बनाने में पूरे १० साल

लगे हैं[यूपीए -१ और यूपीए-२ का १० बर्षीय कार्यकाल ] यह  भी इंदिरा गांधी के नेतत्व में सम्पन्न -

 'भारत -सोवियत' मैत्री  की शायद  यह अंतिम  सामरिक निशानी है।  वर्तमान  सरकार  आइन्दा  इसे और

 बेहतर तो बना सकती है किन्तु इसका पूरा श्रेय नहीं ले सकती। अब यदि   आवाम सवाल करे  कि  इसका श्रेय

  किसे जाता है ? तो सही जबाब  क्या है? कांग्रेसी कह सकते हैं कि  ये तो  हमारी  नीतियों -कार्यक्रमों का

परिणाम  है। लेकिन  यूपीए केअलायन्स पार्टनर  भी कह  सकते हैं कि यदि   हम समर्थन नहीं देते तो यूपीए की

 सरकार ही नहीं बनती औरतब  कांग्रेस सत्ता में कैसे आती ?  जब  कांग्रेस को सत्ता में बिठाने का श्रेय उसके

 अलायन्स पार्टनर्स को है तोउपलब्धियों का क्यों नहीं ? अकेले -अकेले किसी  को भी उपलब्धि का श्रेय लेने का

सवाल ही नहीं उठता । एनडीए  सरकार  बनाम  भाजपा  सरकार बनाम मोदी सरकार को फिल्बक्त तो  किसी

भी इस या  उस उपलब्धि या निर्माण का श्रेय  कदापि नहीं  मिल सकता ,जिसके सृजन या निर्माण में ३ माह से

 ज्यादा  का वक्त लगा हो  !  क्योंकि  बकौल उन्ही के किसी प्रवक्ता के - बच्चा पैदा होने में  भी ९ माह तो

 अवश्य ही लगते हैं। जबकि अभी तो उनका 'हनीमून पीरियड  शुरू ही हुआ  है।             श्रीराम तिवारी

                   






  किसानों के अथक परिश्रम की मेहरवानी से ,

  अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं।

    चूँकि दो महीनों में तो यह सम्भव नहीं ,

  

   

      एक बहुत  बुरी खबर है की,

       गोदामों में अनाज सड़  रहा है -

        फिर  क्यों  निर्धन जनता पर भूंख की  परछाई है?

         एक अच्छी खबर है  कि ,

        अब अलायन्स  के सामने झुकने की बाध्यता नहीं -

        फिर क्यों स्पष्ट बहुमत की सरकार रोकती नहीं महँगाई  है ?

         एक अप्रिय खबर है कि ,

        वर्तमान सरकार कहने को तो है 'मोदी सरकार ',

        किन्तु नीति -नियत और कार्यक्रमों से लगती  यह यूपीए-३  यही सच्चाई है।

      
               श्रीराम तिवारी


    

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

अब चेते का होत है ,काँटन लीनी घेर।



       आदरणीय आडवाणी जी ,मुरली मनोहर जोशी जी ,राजनाथ जी,सीपी ठाकुर जी ,सदानंद  गौड़ा   जी ,रामलाल  जी    और तमाम उन  भाजपा -नेता /नेत्रियों को - जिनके सितारे  भाजपा की प्रचंड जीत के वावजूद गर्दिश में हैं -उन सभी को  एक दोहा सादर समर्पित ;-

                केरा तबहुँ  न चेतिया ,जब ढिग जामी बेर। 

              अब चेते का  होत  है ,काँटन  लीनी घेर। । [अज्ञात]


        एक था केला। बड़ा प्यारा सुकुमार।  उसके बड़े-बड़े चिकने और साफ़-सुथरे  पत्ते।  केले के मीठे -मीठे फल  उसमे लगते । कालान्तर  में उसकी छाँव में किसी ने बेरी की झूंठी गुठली फेंक दी। बेर का पौधा परवान चढ़ने लगा.हवा चलने पर बेर के काँटों से केले के नाजुक पत्ते फटने लगे । केला  छत-विक्षत होकर उदास होकर  रोने जैसा दिखने लगा। एक  कवि वहाँ से गुजरा। केले की मर्मान्तक पीड़ा  और बेर के पेड़  का खुंखार रौद्र रूपदेखा।  केले  के पत्तों पर बेर  का  निरंतर घातक  प्रहार का  मार्मिक दृश्य देखकर संभवतः  उस कवि ने  उक्त दोहे की   रचना की होगी।    इस दोहे का अर्थ बिलकुल सीधा सा है कि " हे केला तूँ  तब क्यों   नहीं चेता जब यह बेर तेरी छाँव में  ही पनप  रहा था। अब तेरे चेतने से या समझदार होने से कुछ नहीं हो सकता क्योंकि अब  इस बेर  ने  भयानक रूप धारण कर लिया है। तूँ  अब काँटों से घिर  चुका  है। "

          श्रीराम तिवारी 

बुधवार, 27 अगस्त 2014

आइन्दा यह सोचने की बात ये हैं कि पुरानी[!] संसद और पुराना[!] लोकतंत्र कब तक खैर मनाता है ?



  किसी भी  सिस्टम ,संस्थान  या  राष्ट्र- राज्य के संचालकों   द्वारा  समय की मांग के अनुसार उपलब्ध  -  संसाधनों , व्यक्तियों ,संस्थाओं और कार्य संस्कृति में सप्रयास बदलाव से मौजूदा  व्यवस्था में  बदलाव की संभावनाएं अवश्य ही मौजूद रहतीं  हैं । किन्तु यह बदलाव किसके  हित  में होगा? कितना होगा ? कैसे होगा ?  यह साधनों की शुचिता , नीति-नियत और नेतत्व के साहस  पर भी  निर्भर  है ।
        देश पर आंतरिक बाह्य चुनौतियों के बरक्स - वर्तमान में- केंद्र की 'मोदी  सरकार' की तमाम तात्कालिक  सफलताओं के  निहतार्थ समझने के लिए बहुत ज्यादा प-रामदेव ढ़ा -लिखा होना जरुरी नहीं है। राजनीति  शास्त्र  का अद्ध्येता  होना  भी जरुरी नहीं है ।एक बहुत पुरानी कहावत है कि " यदि किसी मनुष्य का चाल-चलन जानना समझना है  या उसकी रीति और नियत समझना है तो उसके इर्द-गिर्द के लोगों को जानो" अब यदि  मोदी जी के सलाहकार अडानी,अम्बानी, सुनील मित्तल  भारती होंगे  या अन्य  मुनाफाखोर -अवसरवादी नव-धनाढ्य  होंगे  जब यही कार्पोरेट सेक्टर के काइयाँ लुटेरे देश के नीति निर्माता होंगे तो  समझा जा सकता है कि  किसके अच्छे दिन आने वाले हैं ?कथनी करनी का फर्क तो इसी से समझा जा सकता  है कि  दागी सांसद और दागी मंत्री तो  मजा मौज कर रहे हैं जबकि  ईमानदार -देशभक्त जनगण  कुशासन और मँहगाई  की मार झेलने को अभिशप्त हैं।  जनता पूंछ रही है कि क्या  कालाधन वापिस लाओ - आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन  का अण्णा -रामदेव अभिनीत पाखण्डप्रेरित नाटक मात्र था ? क्या 'आप'का संघर्ष केवल भाजपा और पूँजीपतियों के हितों का पोषक मात्र था ? क्या संघ परिवार और गैर कांग्रेसी विपक्ष का  संघर्ष  केवल अमीरों के मुनाफों की  अबाध बढ़त के लिए ही समर्पित था ?
       आगामी दिनों में प्रधानमंत्री जी का विदेशों का सैर-सपाटा जिनके साथ होगा- उनकी नीति और नियत जग जाहिर है। उनके साथ इंफ्रास्ट्रक्टचर या वित्तीय प्रयोजनों में रणनीतिक साझेदारी का  जब जाहिराना  तौर पर शंखनाद किया जा  रहा हो तो  समझा जा सकता है कि  नीति  क्या है ? नियत  क्या है ? सवाल सिर्फ योजना आयोग को ध्वस्त करने का ही नहीं है ,नव-धनाढ्यों की टोली को अपना हमराह -हमसफ़र बनानें का  का ही  नहीं है,बल्कि सवाल ये भी है कि  इन तमाम कार्य -निष्पादनों की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है ? जनता के अच्छे दिनों को लाने के लिए  कार्यक्रमों का  रूप  और आकार क्या है ? अभी तो पार्टी स्तर पर और कैविनेट स्तर पर भी'एकचालुकानुवर्तित्व' का ही बोलबाला है। याने की 'नमो नाम केवलम्' !
             दिल्ली में अमित शाह की  भाजपा अध्यक्ष पद पर ताजपोशी  जिनकी  असीम अनुकम्पा से हुई  उन परमश्रेष्ठ सहित जब  सभी ने  एक  दूसरे  के चारण  गीत गाये  तो 'संघ' भी  दंग रह गया। कुछ ने जो  अमित शाह की तारीफ़ की इसमें कोई बुराई नहीं। किन्तु  उनकी नजर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इतना वेचारा हो गया कि उसका परोक्ष जिक्र तो दूर की बात किसीने -न केवल मंदिर निर्माण , न केवल यूनिफार्म  सिविल कोड, न केवल धारा  ३७०, न केवल  स्वदेशी आंदोलन , बल्कि संघ का  'त्याग-तपस्या - बलिदान'  भी  भुला दिया।सत्ता मद में चूर नेताओं की इस उपेक्षा से  संघ इतना गर्म  हो गया  कि  स्वयं  संघ प्रमुख मोहन राव  भागवत को  भी भोपाल प्रवास के दौरान कहना पड़ा कि  "भाजपा को  यह संसदीय महाविजय न तो किसी नेता की 'महानता' से  मिली और न  ही  पार्टी की रीति-नीति   से यह विजय हासिल हुई।  बदलाव या सुशासन के नारों से  भी विजय नहीं मिली ,बल्कि इस विजय का श्रेय तो देश की  उस जनता को जाता है जिसने 'कांग्रेस के कुशासन से आजिज आकर  मजबूरी में भाजपा को सत्ता में बिठाया है" वेशक यह बयान बेहद तार्किक और सटीक है  उनके इस बयान के मार्फत सन्देश  भी उन्ही के लिए  है  जो   गुजरात मॉडल,सुशासन और पश्चिमी जगत की चकाचौंध से  भिंदरयाये हुए है या रतौंध्याये हुए हैं।
                  विगत १०० दिनों में इस सरकार ने जो भी किया है  उसका थोड़ा सा आकलन  राज्यों में सम्पन्न  अभी हाल के उपचुनावों में  - उसके परिणामों में भी झलक रहा है। विपक्ष को तो मानों संजीविनी ही मिल गई है। भाजपा के नेता अपनी आधी-अधूरी हार-जीत को  हँसी  में उड़ाने का प्रयास कर रहे हैं।  जब देश का मीडिया  इन चुनावों में भाजपा की दयनीय स्थति पर चर्चा कर रहा था,ठीक तभी पार्टी के खुर्राट नेताओं ने जानबूझकर  देश का और मीडिया का ध्यान उधर से  हटाकर अपने संसदीय  बोर्ड  के नवीनीकरण और 'मार्गदर्शक मंडल'जैसे बृद्धाश्रम का निर्माण कर  सभी को  चौंका दिया।   भाजपा नेतत्व ने सफलतापूर्वक न केवल मीडिया में  बल्कि राष्ट्रीय फलक पर अपनी पार्टी को पुनः केंद्र में खड़ा कर दिया। संसदीय बोर्ड में किन- किन - को हटाया गया ? नवगठित बोर्ड में किन-किन को  उपकृत किया गया ? किन-किन  बुजुर्ग नेताओं को 'बृद्धाश्रम ' में  भेजा गया ? यह चर्चा मीडिया में प्रमुखता से जानबूझकर चली गई।  वैसे तो मोदी सरकार  के लिए  इन उपचुनावों से कोई खास लेना देना नहीं था। क्योंकि इन  परिणामों का केंद्र सरकार के  क्रिया -कलापों से या उसकी नीतियों  से कोई खास सावका  नहीं था।  किन्तु केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी केअलावा विपक्ष के  स्थानीय नेताओं की वैयक्तिक '  पकड़'तथा विभिन्न राज्यों में  भाजपा की  राजनैतिक -समाजिक स्थिति का  पता तो चल ही गया।  फिर  यदि इन परिणामों से भाजपाई सबक नहीं लेते तो यह तो वर्तमान विपक्ष की सेहत के लिए  और भी अच्छा है । देश के लिए भी कुछ तो अच्छा  सगुन है।  क्योंकि इन परिणामों से  उत्साहित -भारत का विपक्ष  यदि एकजुट हो जाए तो कोई अचरज की बात नहीं। यदि आगामी ५ साल बाद  केंद्र में किसी और पार्टी या गठबंधन की सरकार बन जाए तो भी कोई अचरज नहीं। यदि  मोदी सरकार इन अद्द्यतन परिणामों  का मंथन कर जनकल्याणकारी नीतियों और  जनहितैषी कार्यक्रमों को तबज्जो देती है तो  ही वह दुबारा सत्ता में आ पाएगी। इस तरह दोनों ही सूरत में ये उपचुनाव देश की जनता को आशा का सन्देश देने के लिए  सराहनीय हैं।
               लकिन  नमो अभी तक [१०० दिनों] में जो करते आये हैं यदि आइन्दा भी  वही करने जा रहे हैं  तो 'संघ' या  भागवत जी भले ही  उन्हें माँफ कर दें ,किन्तु  'राम लला ' के नाम पर जिनको ठगा जा रहा  है वे  करोड़ों मतदाता  तो कदापि बख्सने वाले नहीं हैं।अभी तक कार्यान्वन में प्रयुक्त ,मोदी सरकार की कोई भी तजबीज ,योजना कार्यक्रम या नीति भारत  के'आम आदमी' के अनुकूल  तो कदापि प्रदर्शित नहीं  हुई है। जिस कार्पोरेट लाबी को वे सर-आँखों पर बिठाये जा रहे हैं ,जिस तेजी से वे देश की सम्पदा को विदेशी हाथों में सौंपने को बैचेन हैं वो  मोदी सरकार की अवैज्ञानिक चेष्टाओं का नग्न प्रदर्शन ही कहा  जा सकता है।  इसी तरह  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और अभी-अभी भाजपा संसदीय बोर्ड के सदस्य बने श्री  शिवराजसिंह  चौहान ने  भीं दुबई  तथा यूएई में  जो एजेंडा प्रस्तुत किया  है।  निकट भविष्य में जापान -कोरिया की यात्राओं में पीएम महोदय भी वही करने जा रहे हैं। इस प्रयोजन का  महँगाई की मार से पीड़ित असहाय  गरीब जनता के विकाश से  कोई लेना-देना नहीं है। सर्वविदित है कि  पूँजीपतियों  के दवाव में तमाम श्रम  क़ानून आनन-फानन  भोंथरे किये जा रहे  हैं। सार्वजनिक उपक्रमों को आईसीयू में भर्ती किया जा रहा है । लाख टके  का सवाल है कि  मोदी जी और उनकी सरकार  किसके  पक्ष में खड़े हैं ? 
                      जब सरकार  का मतलब -नमो-नमो ! भाजपा का मतलब-नमो-नमो ! संसदीय बोर्ड का मतलब नमो-नमो !नीतियों का मतलब -नमो-नमो ! सिद्धांतों का मतलब - नमो -नमो और विकाश -सुशासन का  मतलब 'नमो-नमो'  है तो फिर चुनाव में जीत-हार का मतलब  'नमो-नमो' क्यों नहीं होना चाहिए ?जब कभी  मोदी जी को इल्हाम  हुआ  होगा कि 'पुराना सब कुछ बदल  देने से नया अपने आप आ जाएगा तब शायद उनके जेहन में  निजी तौर पर  पुराने पितृगण  ,पुराना स्वाधीनता संग्राम ,पुराने महापुरुष और पुराना त्याग-बलिदान, पुराना  हिमालय ,पुरानी गंगा और पुरातन भारतवर्ष तो अवश्य  ही रहा होगा।  तभी तो उन्होंने पुराना संसदीय बोर्ड ,पुराना  योजना आयोग,पुराने  राज्यपाल ,पुराना अध्यक्ष [राजनाथसिंह] और पुराने नेता [आडवाणी-जोशी -अटल और सभी]  ही नहीं बल्कि१९२५ से  संघ का , १९५२ से जनसंघ का और  १९८० से भाजपा का वह एजंडा भी कूड़ेदान में फेंक दिया गया है  जो  राष्ट्रवाद ,हिंदुत्व और स्वदेशी पर आधारित था।  चूँकि वह भी   बहुत पुराना हो गया था इसलिए उसे भी वरिष्ठ नेताओं की मानिंद हासिये पर हाँक दिया गया।  अब नया तो बस  'नमो नाम केवलम' है।  इसलिए आइन्दा देखने की बात ये हैं कि  पुरानी संसद और पुराना लोकतंत्र कब तक खैर मनाता  है ?की मनसा है कि न केवल  कांग्रेस,कम्युनिस्ट  और अन्य धर्मनिरपेक्ष दल बल्कि  देश को भी ठिकाने लगाना है क्योंकि वो भी बहुत पुराना हो  चुका है।  यह सब करने के लिए सत्ता में रहना जरुरी है  ,सत्ता में रहने के लिए चुनाव जीतना जरुरी है ,चुनाव जीतने के लिए पैसा जरुरी है ,पैसे के लिए भृष्ट बेईमान  पूँजीपतियों  का सानिध्य जरुरी है। इसीलिए  तोअब  नीतियों और सिद्धांतों में कट्टर 'पूंजीवाद  नाम केवलम ' का जाप चल  रहा है।


                      - ; श्रीराम तिवारी ;-
       

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

जब संसद में विपक्ष है ,तो नेता विपक्ष क्यों नहीं होना चाहिए ?

    
  भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार और लोक सभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन  से पूंछा है कि जब  कोई विपक्ष का नेता ही नहीं   है तो  लोकपाल  कैसे चुना जाएगा।क्योंकि लोकपाल के चयन की प्रक्रिया में तो 'नेता  विपक्ष' एक अति आवश्यक फेक्टर है।  वास्तव में सुप्रीम कोर्ट को तो  पूंछना चाहिए  था  कि न केवल लोकपाल अपितु -न्यायिक कॉलेजियम  पार्लियामेंट्री स्टेंडिंग कमिटी,लोक लेखा  समिति,तथा तीनों सेनाओं के प्रमुखों   के अलावा अन्य अतिमहत्वपूर्ण संवैधानिक पदों की  स्थापनाओं के  चयन की प्रक्रिया में जहाँ- जहाँ   नेता विपक्ष की राय  बहुत जरुरी है वहां का निर्णय कैसे होगा ? चूँकिअब तो   परम्परा और सिद्धांत  दोनों ही  इसके पक्षधर हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष की सहमति [मार्फत विपक्ष  नेता ]  से ही सर्वश्रेष्ठ फैसले  लिए जाने चाहिए ।  लेकिन जब विपक्ष का नेता ही  नहीं होगा तो राय  किसकी ली जाएगी ?  ऐंसा लगता है कि  सत्तारूढ़ पार्टी को मिले प्रचंड बहुमत के वावजूद  उसे अपनी संसदीय रणकौशल पर भरोसा  अभी भी नहीं है। वरना  भाजपा के इस नए  नेतत्व को  मात्र एक 'नेता  विपक्ष' से इतना भय  क्यों है?  कहीं उनका इरादा यह तो नहीं कि  वे इस पद को किसी भी तरह से ज़िंदा  ही नहीं रखना चाहते ? यदि वे वास्तव में  सच्चे राष्ट्रवादी  हैं और भारत के लोकतंत्र को बुलंदियों पर  देखना चाहते हैं तो  उन्हें  चाहिए कि  फ़ौरन से पेश्तर सुप्रीम कोर्ट के  समक्ष -अटार्नी जनरल की  नकारात्मक राय नहीं बल्कि  भारत के सम्पूर्ण विपक्ष  की   [लगभग ६९% की ]  राय  को   तत्काल पेश करें।
                                 भाजपा नेतत्व को  नहीं भूलना चाहिए  कि  उनकी पार्टी  को   १६ वीं  संसद में ३३२ सीटें तो अवश्य मिली  हैं  किन्तु  वोट तो ३१ % ही मिले हैं।  इस स्पष्ट किन्तु  आभासी जनादेश का तात्पर्य यह नहीं कि  विपक्ष के रूप में देश की ६९ % जनता की आवाज को नजर अंदाज  कर दिया जाए ?  यह न तो मौजूदा सरकार के लिए उचित होगा और  संसदीय लोकतंत्र के हित में  तो कदापि नहीं होगा।  
                            वैसे तो  किसी पार्टी विशेष  के  एक खास व्यक्ति को  नेता प्रतिपक्ष  का दर्जा  मिल जाने से  उसकी संसदीय क्षमता पर या उसके  जनतांत्रिक जनाधार पर कोई खास असर नहीं पड़ता किन्तु फिर भी नेता प्रतिपक्ष  के होने से  सत्ता पक्ष के लिए भी गाहे-बगाहे , शासन-प्रशासन चलाने में काफी सहूलियतें  हुआ  करतीं   हैं ।  इससे भी अधिक सकारात्मक और सार्थक तथ्य यह भी  है कि  देश को एक बेहतर लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का गौरव भी  प्राप्त  होगा । नेता प्रतिपक्ष के बहाने   संसद में   बिखरे  हुए  विपक्ष को महत्व  मिलने से  फासिज्म  और तानशाही की  संभावनायें  भी  नहीं रहेगी ।  भारत में अभी तक चली आ रही परम्परा  के अनुसार  कुछ अपवादों को छोड़कर लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष - विभिन्न महत्वपूर्ण सांविधानिक पदों के चयन-मनोनयन  वाली -अधिकांस  महत्वपूर्ण समितियों का सम्मानित सदस्य  होता है । वर्तमान सत्ताधारी नेतत्व ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती के लिए यदि  नेता  प्रतिपक्ष के पद  को विलोपित करने का दुस्साहस किया तो  यह वास्तव में  'बनाना लोकतंत्र' बनकर रह जाएगा।  यदि सत्ता पक्ष ने -लोक सभा अध्यक्ष  श्रीमती सुमित्रा महाजन  के कंधे पर बन्दूक   रखकर विपक्ष पर निशाना  साधा तो इससे मृतप्राय कांग्रेस और गैर  कांग्रेसी विपक्ष  को पुनः  संजीवनी मिलने  की पूरी संभावनाएं हैं।  पराजित कांग्रेस  तो   अपना दामन बचाने  के लिए  ठीक ऐंसे ही मौकों की तलाश में है। वैसे भी लगता है कि  राहुल  गांधी को  तो 'नेता विपक्ष' जैसे पद की कोई तमन्ना नहीं है। जहाँ तक सोनिया गांधी का सवाल है ,वे तो प्रधानमंत्री भी नहीं बनना चाहतीं तो नेता विपक्ष का उन्हें कोई   मोह होगा  इसमें संदेह है  ! रही बात मल्लिकार्जुन खड़गे या कांग्रेस पार्टी की तो यह केवल उनकी एक  संवैधनिक विवशता मात्र है कि  'नेता  विपक्ष' की मांग करें ।उन्हें सुप्रीम कोर्ट का  यह  फरमान एक अवसर  बनकर आया है कि  -सत्ता पक्ष को  सुप्रीम कोर्ट से  जारी सम्मन का जबाब दो हफ़्तों में  देना है। यदि  भाजपा नेतत्व  ने -नेता विपक्ष पर अड़ियल रुख अपनाया तो  उन्हें याद रखना चाहिए कि भविष्य में  सत्ता पक्ष को भी संसद में और खास   तौर  से राज्य सभा  में  कोई भी कामकाज या विधेयक पास करवाना  मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी भारतीय  संसद  में होती  रहतीं  अप्रिय कार्यवाहियों  पर देश की आवाम को कई वजहों से नाराजी है। नेता विपक्ष के  अभाव में कई काम पेंचीदे हो जाएंगे।   
                                  
                                          नियमानुसार भारत की  संसदीय  परम्परा में  'नेता विपक्ष' की हैसियत पाने के लिए लोक सभा  चुनाव में संसदीय संख्या के अनुसार दूसरे नंबर पर आने वाली  किसी भी पार्टी के  कम -से-कम १०%  सांसद अथवा न्यनतम  ५५ [कुल संसदीय संख्या ५४३ का दशमांश]  होने चाहिए। १६ वीं लोक सभा में कांग्रेस दूसरे  नंबर पर तो है किन्तु उसकी सीट संख्या मात्र ४४ है।  वेशक अतीत में जब कांग्रेस सत्ता में रही तब उसने भी विपक्ष को कोई खास तबज्जो नहीं दी। लेकिन १९७७ में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद लोक सभा ने यह सुनिश्चित किया कि  बहुमत दल  की सरकार  कोई भी हो ,किन्तु लोक सभा की सर्वोच्चता  और  वास्तविक  डेमोक्रेसी के बरक्स विपक्ष की शक्ति  को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए ।उसके बाद नेता विपक्ष  के मनोनयन का सिलसिला चला पड़ा। बाद में फिर ऐंसे  कई मौके आये जब किसी भी विपक्षी पार्टी को उचित या वांछित संसदीय बल प्राप्त नहीं हो  सका और  किसी को भी  नेता विपक्ष का पद नहीं मिल पाया ।  १९८४ में कांग्रेस को ४१२ और भाजपा को मात्र दो सीट मिली थी तब  माकपा के नेतत्व में वाम मोर्चा[सदस्य संख्या[ ४९] दूसरे नंबर पर थी।   किन्तु उनकी अलग-अलग संसदीय  गणना के कारण नेता विपक्ष का पद उन्हें भी  नहीं दिया गया। इसी तरह तत्कालीन  तेलगु देशम [सदस्य संख्य -२९]को   भी 'नेता विपक्ष' का पद नहीं  दिया गया। लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं की जो गलती अतीत में की जाती रही  हो ,उसे फिर से वापिस दुहराया  जाए !  यदि भारत को मजबूत बनाना  है तो  भारतीय संसद को तथा भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाना होगा।  इसके लिए सतत  सकारात्मक और क्रांतिकारी कीर्तिमान स्थापित  करने होंगे। ऐंसा नहीं कि  जो सकारात्मक अवयव हैं उन्हें ही नष्ट कर दिया जाए। जब संसद में विपक्ष है तो नेता विपक्ष  क्यों  नहीं  होना  चाहिए ? क्या यह उस महानतम  जनादेश का अपमान नहीं  होगा  जो  कि लोकशाही  का मूल आधार है? 

                     पूर्व वर्ती परम्पराओं और अटार्नी जनरल की राय के आधार पर वर्तमान  स्पीकर महोदया ने भले ही  कांग्रेस द्वारा की जा रही  नेता प्रतिपक्ष की माँग   को ठुकरा दिया  हो , किन्तु यहां कांग्रेस या भाजपा  के  चाहने या नहीं चाहने का प्रश्न नहीं  है।  स्पीकर का यह  कहना है कि  वे नियमों और परमपराओं से बंधी हुईं हैं ,यह   एक चलताऊ सा  जबाब है। जबकि उनके समक्ष  तो अपने संसदीय जीवन का श्रेष्ठतम कीर्तिमान  बनाने का सुअवसर मौजूद है ।  इस   संबंध में  वे दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर  उठकर न केवल विपक्ष को बल्कि वर्तमान सत्ता पक्ष की भूमिका  को भी राष्ट्रहित कारी बना सकती हैं। दलगत प्रतिबद्धताओं के कारण  कुछ इस तरह मंसा  जाहिर हो रही  है किमानों  सर्वोच्च नेताओं के  अपने  निजी   हित  या उनकी अपनी  पार्टी भाजपा  के हित  ही , उनकी तात्कालिक  प्राथमिकता में हैं। यह आभाषित होता है कि राष्ट्रहित  तो केवल भाषणबाजी में या नारों में  ही उद्घोषित होते रहते हैं। पार्टी प्रतिबद्धता को  इससे कोई सरोकार नहीं कि  भारतीय संसदीय प्रजातंत्र के हित  में क्या है ?भारतीय  संसद की  प्राथमिकता में क्या है?भारत के लिए उसकी बहुलवादी -बहुभाषी-बहुसंस्कृतिवादी तथा बहुधर्मी अनेकता में एकता के लिए  उचित  क्या है ? यदि इन सवालों के मद्देनजर वर्तमान शासक वर्ग खुद आगे होकर नेता विपक्ष की वकालत करता  है तो  न केवल यह भारतीय लोकतंत्र के लिए महानतम होगा  बल्कि भाजपा के लिए भी आशातीत वरदान बन सकता है । आशा की जा सकती है कि  न्याय पालिका और जनता के हस्तक्षेप से 'नेता   विपक्ष' का पद कायम रहेगा और भारतीय लोकतंत्र और  अधिक  समृद्ध होगा। कांग्रेस और सम्पूर्ण विपक्ष को चाहिए कि  लोकतंत्र के हित  में   संसद के अंदर व्यापक   एकता कायम करें। संसद में एक मत होकर सत्ता पक्ष  को बाध्य करें  कि  संसद में कभी भी   'एकचालुकानुवर्तित्व' नहीं चलेगा। 'नेता विपक्ष ' तो होना  ही चाहिए ! यह लोकतंत्र के  हित में है।

        १५ अगस्त को  लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रथम भाषण में एक बहुत सार्थक और सटीक बात कही है की" हम अपने प्रचंड बहुमत के मद में चूर होकर नहीं बल्कि  'सबको साथ लेकर 'चलेंगे ! हम 'सबका साथ -सबका विकाश 'के साथ देश को समृद्ध बनायेंगे" सभी को मालूम है कि  श्री नरेंद्र  मोदी जी  इस समय जब अपने ही सांसदों और मंत्रियों पर पैनी निगाह रख सकते हैं , वे जब आडवाणी  , मुरली मनोहर जोशी  ,यशवंत सिन्हा और जशवन्तसिंह को घर बिठा सकते हैं,वे जब अमित शाह को शिखर पर बिठा सकते हैं ,वे जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजेंडे  को -धारा ३७०,राम-लला मंदिर निर्माण  तथा एक समान क़ानून सहित सभी पुरोगामी आकांक्षाओं को तिलांजलि दे सकते हैं , वे जब   सुशासन और विकाश के बलबूते इतना प्रचंड बहुमत हासिल  कर सकते हैं तो फिर एक अदने  से  'नेता विपक्ष'  के पद से उन्हें इतना डर  क्यों  है ?  विपक्ष की  कम सीटों   का  बहाना क्यों बनाया जा रहा है  ?वास्तविक जनादेश का सम्मान क्यों नहीं  किया जा रहा है ?
                                    
                    - ; श्रीराम तिवारी  ;-

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से बात नहीं करना कहाँ तक उचित है ?



    भारत और पाकिस्तान के बीच  प्रस्तावित  सचिव  स्तर की  द्विपक्षीय वार्ता अर्थात  'फ्लेग मीटिंग'से  पूर्व भारत  स्थित  पाकिस्तान  उच्चायोग  द्वारा कश्मीरी-अलगाववादियों और उग्रवादियों से चर्चा करने  की हिमाकत से  नाराज भारत सरकार ने पाकिस्तान से आइन्दा  कोई  बातचीत  नहीं करने का ऐलान किया है। भारत में कुछ लोग इस नीति का समर्थन कर रहे हैं। उधर  भारत - सरकार के इस कदम को पाकिस्तान  की   नवाज शरीफ  सरकार ने भी  निराशजनक बताकर अपना पल्ला  झाड़ लिया  है। चूँकि मियाँ नवाज शरीफ इस समय इमरान खान और जनाब कादरी साहिब के आंदोलनों के बीच सेंडबीच' जैसे बन चुके हैं।  इसलिए उनकी हालत तो  सांप छछूंदर की हो गई है। पाकिस्तान  स्थित भारत  के सनातन   दुश्मनों - आतंकियों और कश्मीरी अलगाववादियों को ,आईएसआई और आदमखोर सेना को -नवाज  शरीफ और उनकीब लोकतांत्रिक सरकार का भारत से बातचीत करना बिलकुल  पसंद नहीं है।शरीफ का  भारत से दोस्ती की चर्चा  करना और खास  तौर  से भारत के वर्तमान  बड़बोले शासकों से कश्मीर पर बात करना  पाकिस्तान की फौज को  कतई  पसंद नहीं है। यही वजह है कि  खुद पाकिस्तान का मौजूदा निजाम अर्थात 'हुकूमत-ए -पाकिस्तान '  ही नहीं चाहता कि  कश्मीर पर  भारत के साथ  कोई सार्थक बातचीत हो। इस बातचीत में तीसरे पक्ष के रूप में अलगाववादियों को लेना उसकी  साम्प्रदायिक मजबूरी हो सकती  है।एक रणनीति के तहत ही पाकिस्तान ने वर्तमान दौर की बातचीत को उसी पुराने ढर्रे पर आरम्भ किया कि वार्ता  ही न हो और  यदि हो तो पाकिस्तान की आवाम  के सामने शेर बनकर जाएँ  ताकि  इमरान खान या मुल्ला कादरी के आन्दोलनों से आवाम को दूर कर सकें।

    यही तजवीज आजमाने के लिए  नवाज सरकार ने  कश्मीरी अलगाववादियों और तमाम आतंकवादियों को निमंत्रण दे दिया। नतीजा सामने है।   इसी तरह भारत में भी कुछ 'स्वयंभू देशभक्त'  विद्वानों का   ,मीडिया - मुगलों का  और साम्प्रदायिकता का चस्मा लगाए बैठे  महानुभावों  का  पाकिस्तान  के नेताओं और  वहाँ की हुकूमत पर रंचमात्र भरोसा नहीं रहा । इसीलिये वे मौजूदा सरकार के इस कदम को कि पाकिस्तान से  'कोई बातचीत नहीं ' को   सही ठहरा रहे हैं।  बेशक जो लोग भारत -पाकिस्तान के बीच शान्ति-मैत्री और भाईचारे के हिमायती है वे मायूश हैं।पाकिस्तान में  करोड़ों मेहनतकश  -मजदूर -किसान हैं जो भारत पाकिस्तान के बीच अम्न शान्ति और मैत्री चाहते हैं। इसी तरह  भारत  की अधिसंख्य आवाम और  करोड़ों मेहनतकश मजदूर  - किसान भी इन दोनों मुल्कों के बीच स्थाई शांति और अमन चाहते हैं। इस लक्ष्य को पाने के  लिए बहुतही गंभीर, संजीदगी  औरखुले दिमाग के  कूटनीतिक प्रयाशों  की सख्त आवश्यकता है। बिना बातचीत,बिना संवाद  और  बिना  संपर्कों   के यह संभव नहीं।जब वर्तमान भारत सरकार के एक प्रशंशक और हिमायती स्वयंभू  कूटनीतिज्ञ कम-पत्रकार पाकिस्तान में दुर्दांत हत्यारे हाफिज सईद से बातचीत करने जा सकते हैं तो एक चुनी हुई सरकार से बात  नहीं करना कहाँ तक उचित है ?
                  केवल इस बिना पर कि  पाक उच्चायोग ने कश्मीरी  आतंकियों से बातचीत का प्रोग्राम क्यों बनाया तो यह   बहाना बेहद बचकाना है। दरसल विगत ६८  साल से भारत की लोकतांत्रिक  सरकारें   बड़ी  संजीदगी से  जिस हुकमत-ए -पाकिस्तान से  लगातार द्विपक्षीय चर्चा करती रही हैं। वो पाकिस्तान सरकार तो  खुद ही दुनिया में आतंकवाद और साम्प्रदायिकता की सबसे खतरनाक निशानी है।  भारत ने  बड़ी से बड़ी   मुश्किल के दौर  में  भी बातचीत का  अर्थात 'अम्न और  शांति ' का दामन नहीं छोड़ा। इसीलिये हर बार पाकिस्तानी पाखंडी सरकारों, नेताओं  और पाकिस्तानी फौज को मुँह  की  खानी पड़ी है।  आज सारे संसार में भारतीय लोकतंत्र को सम्मान से देखा जाता है जबकि  पाकिस्तानी लोकतंत्र और वहाँ  के  चुनाव का आलम तो  ये है कि इमरान खान और कादरी जी के लाखों समर्थक आज इस्लामावाद  को घेरे बैठे हैं। नवाज शरीफ  तो खुद ही सऊदी- अरब  , अमेरिका और पाकिस्तानी  फौज के रहमो करम से  अपनी जान बचा पाये थे। वे  तो कठपुतली हैं  जिसकी डोर सेना के हाथ में है। यह दुनिया जानती है कि  पाकिस्तानी फौज क्या  चाहती  है ? पाकिस्तान के कटटरपंथी और कश्मीरी अलगाववादी क्या चाहते हैं ? वे भारत -पाक वार्ता के पक्षधर नहीं हैं। वे चाहते हैं कि  भारत को बाहर से और भीतर से  कमजोर कर परमाणुविक  युद्ध की आग में धकेल दिया जाए। लेकिन हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है की हम क्या चाहते हैं ?  पाकिस्तान की आवाम क्या चाहती है ? दरसल भारत -पाकिस्तान के बहुसंख्य जन-गण युद्ध और आतंक से घृणा करते हैं। वे अमन और विकाश के लिए लालायित हैं। इसके लिए हरकिस्म  की फितरत  उन्हें मंजूर  होगी।  जो पाकिस्तान के दो टुकड़े कर  यदि अयूब खान जैसे  खूखार पाकिस्तानी जनरल  की युद्ध पिपासा शांत कर सकते हैं , जो परवेज  मुसर्रफ को आगरा बुलाकर बिरयानी खिला कर कारगिल के बहाने पाकिस्तान में  सत्ताच्युत करवा  सकते हैं, जो  बेनजीर  भुट्टो  के बाप को  भी  भारत से एक  हजार साल तक लड़ने  की तमन्ना से वंचित कर सकते हैं , वो  धीर-वीर- गंभीर -जिम्मेदार भारत की जनता और फौज क्या पाकिस्तान की  इस  वर्तमान हुकूमत , उसके  उच्चायोग और  मुठ्ठी भर  बिगड़ैल - कश्मीरी उग्रवादियों  -  अलगाववादियों की मीटिंग  मात्र से छुइ-मुई हो जाएगी? बल्कि  इस तरह के प्रयोजनों से भारत की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। भारत  जैसे दुनिया के महानतम  लोकतांत्रिक राष्ट्र  के लिए  तो  यही ठीक होगा कि  वो पाकिस्तान के उकसावे में न आये।  सीना ठोककर बातचीत  के 'एरिना ' में जोहर दिखाए।   दुनिया को  जताए कि   भारत  तो  हर हाल में बातचीत  को  ही प्रमुखता  देता है। किन्तु उसकी विफलता के लिए पाकिस्तान पहले से ही मंसूबे बांधकर चल रहा है।  भारत को  अपनी असल इमेज  दुनिया को बार-बार बताना  चाहिए कि  वह पाकिस्तान की तरह जंगखोर ,रक्तपिपासु और दोगला नहीं है।  बल्कि भारत  तो अहिंसा , न्याय और बंधुत्व का अलम्बरदार है। युद्ध  तो   भारत  के लिए  अंतिम  विकल्प  है।  वह पाकिस्तान की जनता से आह्वान  करे  कि  वो अपनी फौज की युद्ध पिपासा का साधन न बने।  भारत की आवाम को  भी शिद्द्त से   यह सुनिश्चित करना चाहिए कि  अपने नेताओं को  पड़ोसियों से विद्वेश के लिए  प्रेरित न करें।  दुनिया के  किसी  भी मुल्क से बातचीत के दरवाजे बंद  न किये जाएँ।  'वसुधैव कुटुंबकम' का नारा  जिस  भारत ने  विश्व  को दिया  हो उसे अपने सनातन पड़ोसी और  घर के ही बिग्ड़ेलों की वजह से 'पथ विचलित' होने की जरुरत नहीं है।
                                    
                                    श्रीराम तिवारी           

रविवार, 17 अगस्त 2014

 दैवीय अंधश्रद्धा  बनाम  तार्किक आस्तिकता का सिंहावलोकन !

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    सरसरी  तौर पर आस्तिकता और अनीश्वरवाद दोनों ही एक जैसे लगते हैं  किन्तु  वास्तव में वे विपरीत ध्रुव  ही हैं। सभ्य मानव समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका अदा की है।अनीश्वरवाद तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से सदैव प्रकृति प्रदत्त रहा  है । वेशक  'मानव' मष्तिष्क  ने ही  अन्य प्राणियों  के सापेक्ष  वैचारिक और उद्द्यमशीलता  के  क्रांतिकारी झंडे गाड़े हैं. उसके मूल में भी  वैज्ञानिक युग की  इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की  तथाकथित 'अनास्था'  ही विद्द्य्मान रही  है ।  इस अनीश्वरवादी अर्थात भौतिकतावादी  वैज्ञानिक विचारधारा ने  ही संसार को अनेकों वैज्ञानिक वरदान  दिए हैं। आज का भूमण्डल  जैसा भी वह  मनुष्य की  नास्तिक बुद्धि की  प्रकृति पर विजय का जज्वा जाता रहा है। यदि इस भौतिकतावाद का आविर्भाव नहीं हुआ होता और मनुष्य मात्र केवल;-इस भारतीय चिंतन पर  कि ;-

 "अजगर करे न  चाकरी ,पंछी करे न काम "

 टिका रहता तो वह  भले ही आज बंदरों के साथ  भयानक जंगलों में उछल कूंद ही  कर रहा होता। तब उसका पाषाणयुग कभी खत्म नहीं होता और  गुफाओं में उसका अनंतकाल तक  डेरा होता। इसमें कोई शक नहीं कि  न केवल धरती का पर्यावरण अपितु सौरमंडल सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी  तब और ज्यादा सुरक्षित होता।  चूँकि वैज्ञानिक  उथ्थान-पतन का कारक तो भौतिकतावाद ही है,अर्थात प्रकांरातर से तो यही आभासित होता है कि भौतिकतावाद से आस्थावाद याने भाववाद  ही श्रेष्ठ  है। सोचिये कि  मध्ययुग की अर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सभ्य संसार में रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले तथा पोप  या खलीफा जैसे  अधिनायकवादी ईश्वरीय ठेकेदारों  की  प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाले- साहित्यकार-कवि,लेखक या नाटककार कौन थे ? जिन्होंने प्रकृति का अध्यन  किया ,उसके नियमों का अनुशंधान कर  प्राणिमात्र से संबंध उजागर किया वे प्रतिभाशाली  वैज्ञानिक  जो आज की इस दुनिया के सर्जनहार माने जाते  हैं ,वे कौन थे ? दोनों सवालों का एक ही उत्तर है वे 'नास्तिक' थे ! वे अनीश्ववादी याने भौतिकतावादी थे !अब  एक सवाल और उठता है कि  नास्तिकता  या अनीश्वरवाद जब इतना सृजनशील और समाज हितकारी है तो वह 'हेय' क्यों है ?जो  आस्तिकता या ईश्वरवाद -तमाम पाखंडों,साम्प्रदायिक -आतंकी खुरपातों के लिए कुख्यात है वह  इस महा वैज्ञानिक युग में -अभी भी इस धरती पर 'प्रेय' क्यों है ? 
                  आम तौर पर आस्तिकता और अनीश्वरवाद दोनों ही एक जैसे लगते हैं  किन्तु  वास्तव में वे एक दूसरे  के पूरका  ही हैं। सभ्य मानव समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को  अधुनातन रूप में ढाला है। उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका अदा की है।अनीश्वरवाद  या नास्तिकता के अस्तित्व  से कोई इंकार कर ही नहीं सकता। वह तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से सदैव प्रकृति प्रदत्त है । वेशक  'मानव' ने  ही अन्य प्राणियों  के सापेक्ष आस्तिकता या भाववादी  वैचारिक  उद्द्यमशीलता  के   बिजूके गाड़े हैं।  आज का वैज्ञानिक युग इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की खुरापात का परिणाम है ।  मध्ययुग की अर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सभ्य संसार में  जब यह आस्तिकता 'धर्मोन्माद' में बदल गई तो इन्ही नासिक्तवादियों-वैज्ञानिकों और साहित्यकारों को कुर्वानी देकर मानवता को बचाना पड़ा। धार्मिक और मजहबी पाखंडवाद  के खिलाफ -रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले तथा पोप -खलीफा -मठाधीश जैसे ईश्वरीय ठेकेदारों  से जूझने वाले नास्तिक लोग ही वास्तव में 'ईश्वर के असली पुत्र' हैं। महान साहित्यकार जब  तत्कालीन निरकुंश शासकों को 'मानवीय मूल्यों' का आइना दिखा रहे थे तब धर्मांध लोग सामंतवाद की चरण वंदना में लगे  हुए थे।  जो प्रजातंत्र,समाजवाद  या साम्यवाद के लिए -बराबरी ,स्वतंत्रता ,समानता और बंधुता के लिए संघर्ष कर रहे थे ,उनमे  से अधिकांस नास्तिक या बुद्धिवादी  ही थे।
           न केवल  प्लेटो ,सुकरात ,अरस्तु ,इलियट ,गेटे ,वाल्तेयर ,रूसो, गैरी बाल्डी  ,मार्क्स -एंगेल्स ,ओवन या मैक्सिम गोर्की  जैसे अनीश्वरवादी , बल्कि आर्कमिडीज ,पाइथागोरस , कोपरनिकस,पियरे ,थॉमस अल्वा एडिसन,जार्ज स्टीवेन्सन ,रदरफोर्ड,फ्लेमिंग,राइट बंधू  तथा  न्यूटन  इत्यादि यूरोपियन यूनानी-अमेरिकी   नास्तिकों ने  बल्कि  भारतीय उपमहादीप में भी  कपिल , कणाद , अश्वघोष, ,भवभूति,चरक चार्वाक करहपा  जैसे नास्तिक वैज्ञानिकों ने  मानव  को प्रकृति पर विजय दिलाई है । इन अनीश्वरवादियों ने   ही महासागरों का घनत्व - धरती का वजन -लम्बाई-चौड़ाई  तथा सूरज का गुरुत्व नाप डाला है। शून्य की खोज करने  वाला  , धरती   को  गोलाकर बताने वाला  , सूरज को  स्थिर और धरती को गतिमान बताने वाला हर   शख्स नास्तिक और भौतिवादी था। वराहमिहिर , आर्यभट्ट, नागार्जुन तथा  आचार्य चाणक्य  जैसे अनीश्वरवादी  ही प्रकृति के अन्वेषक हुआ करते थे। आज का अधिकांस उन्नत भौतिक संसार इन्ही तथाकथित 'नास्तिकों' की  देंन  है। अधिकांश  इस  नास्तिक विचारधारा   में  ही मनुष्य का अहोभाव  और उसकी महानता का  प्रशश्ति गान  होता रहा है। इसी ने  मनुष्य  मात्र  के भौतिक सुख संसाधन बढाए  हैं और इसी ने इस भूमण्डल को विनाशकारी परमाण्विक विध्वंश के कगार पर ला  खड़ा किया है।  इसी ने  मनुष्य को महायुद्ध सिखाये ,इसी ने धरती  को  पर्यावरण विनाश के मुँह  में धकेलने का दुष्कर्म किया है।यदि  मनुष्य की इस नास्तिक और वैज्ञानिक  मानसिक फितरत  को नैतिकता या आस्तिकता के अंकुश सेनियंत्रित नहीं किया गया होता तो अब तक धरती  भी  ब्रह्माण्ड का एक मृत्पिंड बन  चुकी होती। यदि मनुष्य की भौतिक लालसा को आस्तिक बुद्धि से  शासित किया जाता रहा  है तो उस सार्थक 'आस्तिकता' को सम्मानित किया जाना चाहिए।  शायद  इसी सार्थकता के कारण संसार में वैज्ञानिकों और आविष्कारकों से भी ज्यादा  सम्मान 'आस्तिक'जगत के  'अवतारवाद'  को मिलता रहा है।मानवीय मूल्यों को  सर्वश्रेष्ठ मानने  वालों का इसमें सदैव सम्मान होता रहा है।

   जहां तक 'आस्तिकता'  के पाखंडवाद  बन जाने का या शोषण का शस्त्र बन जाने का प्रश्न है तो वेशक  यह भी  मानव  की  वैज्ञानिक  फितरत  ही कही  जा सकती है। इस आस्तिकता के 'दर्शन'  को  मानव   मष्तिष्क  ने  सतत -एकल  या संगठित रूप से प्रकृति पर विजय पाने में असमर्थता की स्थति में आविष्कृत किया होगा  !   व्यक्तिशः या  सामूहिक  रूप से जीवन की चुनौतियों का सामना करने में  हुई विफलता या  संकटापन्न स्थति में 'ईश्वर' तत्व का  अनुसंधान किया होगा। कब ,कहाँ और कैसे किया  ये तो धरती की सृष्टि की तरह और डायनासोर जैसी प्रजातियों के विनाश की तरह  अभी तक अबूझ ही है ।  अन्य  क्रांतिकारी खोजों  की तरह इस ओर  भी अनुसंधान होना चाहिए कि मानवता के लिए  दैवीय अंधश्रद्धा खतरनाक है या कि  भयानक वैज्ञानिक  भौतिकवादी  संहारक अनुसन्धान।  दुनिया में मच रही विनाशकारी संहारक  हथियारों की होड़ और धर्मान्धता  - साम्प्रदायिकता की धधकती ज्वाला को देखकर मुझे यकीन है कि  इस धरती को  आइन्दा   आस्तिकता याने धर्म-मजहब के पाखंडवाद और नास्तिकता याने  वैज्ञानिक भौतिकवादी अनुसंधान दोनों से ही समान रूप से खतरा है। क्या कोई और रास्ता है ?
                                                        
                                                                       श्रीराम तिवारी