शुक्रवार, 16 मई 2014

भारत के 'मजदूर नंबर-वन ' श्री नरेंद्र भाई मोदी को 'लाल सलाम ' !



   मैं  जानता हूँ की  उक्त शीर्षक  के माध्यम से , मैंने 'नमो' को जो 'लाल सलाम ' किया है, वो शायद ही किसी को रास आये। मोदी जी के अंध भक्तों को तो इस तरह  के क्रांतिकारी अभिवादन में भी  किसी कपट-छल की बू आयगी  ही , क्योंकि  उनकी  पाँचों भौतिक इन्द्रियाँ  और पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ नितांत  'नमोमय'  ही नहीं बल्कि  तात्कालिक 'फीलगुड' के इस दौर में  तो पूर्णतः 'संघमय' ही हो रहीं  हैं।  वर्तमान नकारात्मक और  दिग्भ्र्म के   राजनैतिक  परिदृश्य में  वे भी मुझसे कदापि सहमत नहीं होंगे जो मेरे  हमराह -हम सोच हैं। वे शायद  इस समय ततकाल ही इस  तरह की सात्विक सहिष्णुता के लिए तैयार नहीं होंगे।  चूँकि इन सब  चीजों से बड़ा देश है इसलिए देश को मद्देनजर रखते हुए मैं श्री नरेंद्र भाई मोदी के वैयक्तिक अवदान को रेखांकित करते हुए 'लाल सलाम' पेश करता   हूँ।
                  अभी-अभी   ऐतिहासिक चुनावी जीत के तत्काल बाद  वड़ोदरा [वड़ोदा ]  और अहमदावाद  की   'आभार' सभाओं को सम्बोधित करते हुए 'अति-विनम्र' श्री नरेंद्र भाई मोदी ने जो  कुछ भी फरमाया वो सब अक्षरशः कबूल करने योग्य  भले ही ना हो किन्तु असहमति के लिए भी उसमें कुछ भी नहीं है। उन्होंने  इस  अवसर पर दो बहुत  उल्लेखनीय वाक्य  विशेष रूप से इस्तेमाल किये हैं । एक तो उन्होंने बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का पुण्य स्मरण किया है  और भारत के  सामाजिक उत्थान में उनकी महती भूमिका को सराहा है. इसका तात्पर्य यह है कि  बहिन मायावती   जी अब 'दलित' राजनीती से  अपना बोरिया बिस्तर बाँध लें। 'नमो'  ही बाबा साहेब के सच्चे उत्तराधिकारी हैं। इसके अलावा उनके सम्बोधन में  एक वाक्य विशेष और विशेष  रूप से प्रतिध्वनित हुआ  उन्होंने कहा है  - "मैं भारत का मजदूर नंबर-वन ' हूँ। याने पूँजीपति  भीं अपना बोरिया बिस्तर बाँध  लें। यदि ये संभव नहीं तो पांच साल बाद भाजपा और 'नमो' भी अपना बोरिया बिस्तर बाँदते नजर आयंगे। राजनीती संभावनाओं का नाम है। जो अभी-अभी घटित हुआ है वो आइन्दा भी घटित हो सकता है। जब अच्छे दिन आने वाले हों तो स्वागत क्यों न करें ?
         चूँकि मैं एक मजदूर -किसान और सर्वहारा परास्त भारतीय नागरिक हूँ इसलिए श्री नरेंद्र भाई मोदी को 'साथी -मोदी ' 'कामरेड मोदी'  कहते हुए लाल सलाम पेश करता  हूँ। उन्हें जीत की मुबारकवाद देता  हूँ। आशा करता हूँ की  चुनाव के दौरान उन्होंने जो-जो वादे किये हैं -याने महँगाई ख़त्म हो जायेगी ,भृष्टाचार  समाप्त हो जाएगा ,सारा भारत 'गुजरात जैसा' हो जाएगा ,पाकिस्तान घुघु बनकर दड़वे  में दम दवाकर छुप जाएगा,चीन डरकर सीमाओं से भाग जाएगा ,भारत के मजदूर-किसान -नौजवान सभी को समान रूप से गरिमामय मानवीय  जीवन के अनुरूप  सामाजिक ,आर्थिक और राजनैतिकअवसर प्राप्त होंगे।  हमारी हार्दिक -हार्दिक   शुभकामनाएं हैं कि  श्री नरेंद्र भाई मोदी 'बिना राग -द्धेष ' के बिना पक्षपात के  सफलतापूर्वक  अपने 'राजधर्म' का पालन करेगे। चूँकि वे  प्रचंड बहुमत पाने  वाले भारत के पहले गैर कांग्रेसी  प्रधानमंत्री  होंगे इसलिए उनसे देश के १२५ करोड़ लोगों को ढेरों आशाएँ  होना स्वाभाविक है.
                               यह जग जाहिर है कि भारत में अभी तो एकमात्र  'नमो'  ही हैं जो कार्पोरेट लाबी के  परमप्रिय हैं। आरोप है लगाया   जा रहा है कि  इस कार्पोरेट  -सरमायेदार  लाबी के १० हजार करोड़ विजयी पार्टी के  चुनाव प्रचार में खर्च हुए हैं। इस पूँजी की बदौलत  ही  'नमो' ने राष्ट्रव्यापी प्रचंड आक्रामक  धुंआधार  चुनाव प्रचार  किया।सबको विदित है कि  इस अकूत धन और डॉ मनमोहनसिंह सरकार के बदनाम कार्यकाल  की बदौलत  ही  भाजपा को-मोदीजी को  बम्फर जीत हासिल हुई है।  अब  यदि  यह कार्पोरेट लाबी कल से ही अपनी बेजा मांगे 'नमो ' के समक्ष रखने लगे तो कोई अचरज की बात नहीं !  मुझे ख़ुशी है  कि इस महती चुनावी  विजय के उपरान्त मोदी जी ने  भारत के  मेहनतकशों के बीच अपने आप को 'एक मजदूर ' के  रूप में खड़ा करने  का जज़बा पेश किया है। यदि वे वाकई सर्वहारा परस्त  कोई सोच रखते हैं या गरीब   किसानों -मजदूरों  के  हित  की कोई नीति बनाते हैं तो उन्हें सबसे पहले निजीकरण,ठेकाकरण,बाजारीकरण और मुनफाखोरी पर आक्रमण करना होगा। चूँकि ये सारे तत्व उस कार्पोरेट लाबी रुपी तोते में वास्ते हैं जो मोदी भाई के खैरख्वाह हैं। क्या 'नमो' में हिम्मत है कि इन लालची अडानियों-अम्बानियों की 'धनलिप्सा' पर लगाम लगा सकें?  वे ऐसा नहीं कर पाएंगे बल्कि   डॉ मनमोहनसिंह की विनाशकारी नीतियों को 'दवँगता' से लागू  करेंगे। ताकि  उन पूंजीपतियों को संतुष्ट कर  सकें जिन्होंने सत्ता के शिखर पर बिठाया है।  भारत के जिन  करोड़ों मजदूर-किसान ,बेरोजगार और परेशान  युवाओं ने मोदी जी को और उनकी पार्टी -भाजपा को  प्रचंड समर्थन दिया है वो सिर्फ इतने में ही खुश हो लें कि 'नमो' ने माना है कि 'मैं मजदूर नंबर -वन हूँ'  !  वे कैसे जीते ?उनकी नीतियां क्या  हैं?'संघ परिवार' ने हिंदुत्व का ध्रुवीकरण कैसे किया ?अल्प्संखयक और खास  तौर  से मुस्लिम वोटों का बटवारा कैसे हुआ ? राजस्थान ,मध्यप्रदेश तथा उत्तर भारत  के बदनाम  कांग्रेसियों ने हाराकिरी  कैसे की ?  'आप' ने  , ममता ने ,जय ललिता ने, आंध्र के विभाजन ने, कांग्रेस की क्या-क्या  दुर्गति की  इन मुद्दों पर तो कांग्रेस ही जवाव दे सकती है. किन्तु यह परम सत्य है की नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश  और बिहार को जीतकर अपना 'राजसूय' यज्ञ दिल्ली में सम्पन्न कर  लिया  है।  इस यज्ञ में कार्पोरेट लाबी के अकूत धन  के अलावा ,अमित शाह  जैसे नेताओं की बुद्धिमत्ता -कार्यकुशलता  और संघ परिवार के साथ-साथ दक्षिणपंथी मीडिया  का भी बेहतरीन योगदान रहा है।  जो भी हो भारत की जनता  के बहुमत ने एनडीए ,भाजपा और 'नमो' को भारत का शासन बड़ी  भारी जीत के रूप में  सौंपा है इसमें कोई शक नहीं है ।उम्मीद है  कि इस सरकार के बेहतर मंसूबों के लिए , जन -कल्याण के लिए   , राष्ट्र -निर्माण क लिए  तथा भारत निर्माण के लिए  पूरा देश इस 'मोदी  सरकार' के साथ कदम से कदम मिलकर  चलेगा. ताकि  भारत को  न केवल विश्व  शक्ति बनाने में  बल्कि गरीबी -भुखमरी से निजात दिलाने में  भी हम कामयाब  हो सकें।  वेशक मैं 'संघ परिवार', भाजपा  , एनडीए या 'नमो '  की साम्प्रदायिक विचारधारा का कभी समर्थक नहीं रहा। किन्तु यदि वे महँगाई  पर अंकुश लगाने में ,भृष्टाचार रोकने में और मेहनतकशों पर  हो रहे पूँजीवादी  जुल्म को रोकने में कामयाब होते हैं तो वे न केवल एनडीए ,न केवल भाजपा ,न केवल संघ परिवार बल्कि देश के वास्तविक बहुमत -जन के  'राष्ट्र नायक' भी बन सकते हैं।अभी जो कयाश लगाए जा रहे हैं कि  पेट्रोलियम उत्पाद और बिजली के दामों को  बढाए जाने की पूरी तैयारी है ,तो मैं उम्मीद करूंगा कि  मोदीजी इन कयासों को झुठलाने में कामयाब हों।  
        इस अवसर पर पुनः   भारत के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र भाई मोदी को उनकी प्रचंड जीत की  बधाई देते हुए  'लाल सलाम' करता  हूँ  !

   श्रीराम तिवारी
                 
               

बुधवार, 14 मई 2014



       इस तरह   मेरे देश के  अब अच्छे दिन आने वाले हैं।
   
        उत्साही नेता जी आसमान से तारे तोड़कर लाने वाले हैं।


     छल -कपट से चुनाव में जीतने वाले ढ़पोरशंखी ,
  
    सात-रेस कोर्स रोड से जादुई छड़ी घुमाने वाले हैं

   
    उनके समर्थक खुश हैं कि होंगे  खुशहाल मालामाल ,

   नंगे-भूंखे -निर्धन आबाल -बृद्ध  सब 'अडानी' होने  वाले हैं।


    अब नहीं   कर सकता  कोई शिकायत भृष्टाचार  की ,
   
    क्योंकि रिश्वतखोर -मुनाफाखोर   खुद सत्ता में आने  वाले हैं।


    अब  डर  नहीं  कोई महिलाओं -छात्राओं -अबलाओं को ,

   क्योंकि शासक  ही  खुद अब उनका पीछा करने वाले हैं।


  अब झंझट नहीं महंगाई- बेकारी और जीवन रक्षा की , 

क्योंकि अब  तो साक्षात् जमदूत   सत्ता में आने वाले हैं।


जिन्होंने  जगाई थी आशा मुल्क में 'इंकलाब' की  बरसों से ,

 उनके सिद्धांत और नीतियां  हम लोग  कहाँ समझने  वाले हैं।


  जो थे  सनातन से जन्मना  सर्व समर्थ -सत्ताधिपति कल तक ,

  वे  अब विपक्ष में बैठकर अपने  अतीत  का  गुणगान  करने वाले हैं।


 लाख जतन करे कोई कि  वे राजनीति  छोड़ दें ,शादी  कर लें,

  लेकिन वे  शहजादे ठहरे ,इसलिए नानी के घर  नहीं जाने वाले हैं।


  जिन्होंने  मचाया था शोर कल तक   भृष्टाचार उन्मूलन का ,

बुरी तरह हारने के बाद अब  वे लोकपाल का झुनझुना  बजाने वाले हैं।


जो हैं क्षेत्रीय क्षत्रप  स्वयंभू  सत्ता लोलुप सभी एन-केन -प्रकारेण ,

 वे अब 'नमोराग' की धुन पर मोदी का चँवर  डुलाने  वाले हैं


 इस तरह मेरे देश के अब अच्छे दिन आने वाले हैं !!


  श्रीराम तिवारी





   


 

मंगलवार, 13 मई 2014



    हवा निकल गई थी कभी  स्थापित दलों की ,'आप' के  आने के बाद।

   अब  हवा निकल  रही है 'आप' की  आम चुनाव  में पिट जाने  के बाद।।

            :-श्रीराम तिवारी 

जिन्हे बम्फर जीत का 'फील-गुड' हो रहा हो वे जरा पीछे मुड़कर २००४ का 'इंडिया शाइनिंग ' भी याद रखें !




   चुनाव परिणाम आने से पूर्व ही  देशी-विदेशी निवेशक  बाजार [सेंसेक्स]को  'तेजी'दे रहे हैं। महँगाई  बढ़ाकर  'नमो' को नमस्कार कर रहे हैं। एग्जिट पोल के प्रायोजक  जो पहले  भी  २००४, २००९ में जूते खा चुके हैं, वे  भी  समवेत स्वरों में बड़ी ही वेशर्मी से  'नमो' का प्रसस्तिगान कर रहे हैं। इस विजयगान किंबहुना  'नमोगान' का दक्षिण पंथी मीडिया घराने निरन्तर  बखान  कर रहे हैं। कांग्रेस यूपीए ओर डॉ मनमोहनसिंह  के १० सालाना कार्यकाल से निराश-  भारत के न केवल  मध्य्मवर्गीय दिग्भर्मित युवाओं ने, बल्कि जातियों-खापों और धार्मिक  उन्मादियों  की भीड़ ने  भाजपा और 'संघ'  परिवार के प्रतिनिधि श्री नरेन्द्र मोदी पर 'दाँव ' लगा  रखा  था।
                        वेशक यूपीए -२ का कार्यकाल उसकी नीतियां ओर राष्ट्रव्यापी भृष्टाचार  ने  भी जबर्दस्त एंटी-इन्कम्बेंसी  फेक्टर का  निर्माण किया है।  चूँकि निराश -दिग्भ्रमित अल्प्संखयक वर्ग  ने माया  , ममता  , मुलायम , नीतीश  और  कांग्रेस  के अलावा भाजपा को भी वोट किया है।उधर  दलित-पिछड़ा ओर अल्पसंख्यक वोट इस बार  बिखर    चुका है ,वहीँ 'नमो' के इर्द-गिर्द न केवल सवर्ण समाज बल्कि अधिसंख्य बहुजन समाज और अल्पसंख्यक  भी  एकजुट होते चले गए  हैं. इसलिए   स्पष्ट है की  कांग्रेस और यूपीए का अभी२०१४ के लोक सभा चुनाव में तो कोई  'चांस' नहीं है। यह देश का बच्चा -बच्चा जानता है।  इसमें किसी एग्जिट पोल की महारत का कोई  सवाल  नहीं।  इस संदर्भ में मीडिया की 'अतिशय' प्रस्तुति  भी  महज उबाऊ और  निरर्थक  ही है। सही तस्वीर वोटिंग पर्सेंटेज से आंकी जाएगी। केवल कुछ मतों से किसी की जीत ओर कुछ मतों से किसी की हार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा हो सकता  है. किन्तु किसी की' बम्फर जीत ओर किसी का सूपड़ा साफ़ ' ये शब्दावली लोकतंत्रात्मक नहीं कही जा सकती। इस तरह की   हिंसक शब्दावली  वो भी परिणाम आने से पूर्व ही प्रस्तुत करना एक तरह की मानसिक अय्याशी ही  है। सबको दिख रहा है कि  कुछ  मौकापरस्त राजनैतिक पार्टियाँ  अलायन्स पार्टनर्स के रूप में , भाजपा के नेतत्व  में  एनडीए  की ओर मुखातिब   हो चली हैं।  इसलिए 'संघ परिवार'को  उत्तर  भारत में  कांग्रेस को निपटाने में कुछ  सफलता अवश्य मिलेगी। मोदी के नेतत्व में  सरकार बनाने की संभावनाएं भी फिलवक्त सबसे ज्यादा हैं। क्योंकि अभी तो कोई और विकल्प ही  मैदान में  ही  नहीं है। फिर भी  नरेन्द्र   मोदी को या भाजपा को  उतनी  सफलता नहीं मिलने जा रही है जितनी  की एग्जिट पोल में बताई जा रही  है.यदि एग्जिट पोल इस बार मानलो सही साबित हो भी गए तो उसे  देखने-दिखाने में जिन्हे बम्फर जीत का 'फील-गुड' हो रहा  हो  वे जरा पीछे मुड़कर २००४ का 'इंडिया  शाइनिंग ' भी याद रखें !

                       :-श्रीराम तिवारी  

रविवार, 11 मई 2014

दिग्भर्मित भीड़ का जनादेश बाकी है।



        लोक सभा के चुनाव तो  फ़क़त लोकतंत्र की झाँकी  है।

      लहरों ,आँधियों,सुनामियों  का परिणाम अभी  बाकी है।।

       कुछ  वोटों से  होगी जब किसी की जीत, किसी की हार ,
     
      तब क्यों न कहें कि  दिग्भर्मित  भीड़  का  जनादेश बाकी है।

     मानवीय मूल्यों का घोर पतन, जाति -धर्म की पूँछ -परख,

    कुछ फासिज्म की सिहरन भी  इस  मुल्क ने आंकी है।

     हो सकता है  विचारक इसे  मात्र परिकल्पना  ही  कहते रहें  ,

     और कहते रहें कि अभी तो इसका  अनुप्रयोग भी  बाकी है ।

     मानवीय संवेदनाओं के बरक्स जो खास  बात  है इस मुल्क में

    गंगा -जमुनी तहजीव और  सहिष्णुता ,वो  बात मैने आंकी है।

   आने वाली  आँधियाँ वेशक मगरूर दरख्तों को गिरा देंगी ,

   लेकिन  उन शाखों का कुछ न बिगड़ेगा ,जिनमें लचक बाकी है।

                  श्रीराम तिवारी

  

   

  

   

     

सोलहवीं संसद के चुनाव कुछ अजीब है।


            धर्मनिरपेक्षता का स्वांग  भी अजीब है ,

          धर्मभीरु जनता पाखंडियों के करीब है।



       हिन्दू -राष्ट्रवाद का  सिद्धान्त  भी अजीब  है ,

      पिछडा -दलित   'मनुवाद'  के करीब हैं ।


  
     मुसीबतों से घिरा मुल्क लोकतंत्र पस्त है ,

      जनता  ही मांगे  तानाशाही की सलीब है।

  

      भारतीय  लोकतंत्र  कुटा -पिटा -धनतंत्र ,

      दलाल  जो अमीरों  के वो सत्ता के करीब हैं।


    गणतंत्र गुम  हुआ  हुड़दंगियों की भीड़ में ,

   जात -पाँत -मजहब  जिनको  मुफीद है।


 नहीं कोई नीतियां न ही  कोइ कार्यक्रम ,

 सोलहवीं संसद   के चुनाव  कुछ  अजीब है।


   श्रीराम तिवारी



  

 

शनिवार, 10 मई 2014

क्रांतिकारी अभिवादन! लाल सलाम !! श्रद्धाँजलि !!!



 आज [१० -मई]को  भारत  का  प्रथम स्वाधीनता संग्राम  दिवस है। आज ही के दिन  गुलाम  भारत में पहली बार  लोक बिख्यात  महान  बलिदानी 'मंगल पाण्डेय' ने '१८५७'की इस क्रांति का बिगुल मेरठ छावनी में बजाया    था। तमाम शहीदों  को सादर श्रद्धांजलि।


आज १० मई को महान  क्रांतिकारी शायर  ,  'प्रोलेटेरियत ' कैफ़ी आजमी साहब की बारहवीं पुण्य तिथि है ! क्रांतिकारी अभिवादन! लाल सलाम !! श्रद्धाँजलि !!!

                                  श्रीराम तिवारी 

शुक्रवार, 9 मई 2014

मीठा-मीठा गप ,कड़वा-कड़वा थू क्या यही 'नमो' का सिद्धांत और यही विचाधारा है ?



      वर्तमान आम  चुनाव के दौरान  हुये निराशाजनक  राजनैतिक  कुकरहाव के लिए सिर्फ राजनैतिक नेता  , राजनैतिक पार्टियाँ  और बाजारू मीडिया  ही  जिम्मेदार नहीं है।  इनके अलावा  बाबाओं   , गुरु  - घंटालों  , मुल्लाओं -मौलवीयों ,स्वामियों,सन्यासियों तथा  शंकराचार्यों से लेकर विवादास्पद -सेवानिवृत्त - स्वार्थी नौकरशाहों ने भी इस 'चुनावी -गटरगंगा' में स्नान किया है। विश्व के  इस  तथाकथित लोकतंत्र के इस महायज्ञ की चुनावी  आहुति  में  जो योगदान संघ परिवार और नरेंद्र मोदी का रहा है वो बेमिशाल है।
       भृष्टाचार ,पक्षपात,वंशवाद,जातीयतावाद,सम्प्रदायवाद ,क्षेत्रवाद ,भाषावाद ,पूंजीवाद ,पिछड़ापन ,गरीबी,
बेकारी ,अशिक्षा ,बाजारीकरण ,निजीकरण ,ठेकाकरण ,लूट,ह्त्या ,बलात्कार तथा  सम्पूर्ण  व्यवस्था में पतन के गंभीर सिम्टम्स मौजूद होने के बावजूद मेरे जैसे 'आशावादियो' को न केवल बड़ा अभिमान हो चला था बल्कि यह  गुमान भी  हो चला था कि  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र  भारत में  'स्वतंत्र ,निष्पक्ष,निर्भीक ' मतदान कराये जाने के लिए भारतीय चुनाव आयोग तो कम से कम कटिबद्ध है ही ! अधिकांस  भारतीयों को टी एन शेषन  युग से लेकर वी एस संपत तक की निष्ठा -योग्यता  पर जरा ज्यादा ही  भरोसा  हो चला था।  भारतीय लोकतंत्र की तमाम खामियों के वाबजूद कम से कम  भारतीय चुनाव आयोग  की  उज्ज्वल -धवल छवि  दिनों-दिन निखार पर  दिखने लगी थी !कुछ-कुछ   भारतीय उच्चतम  न्यायलय   जैसी हो चली थी। भारतीय सर्वोच्च न्यायलय ने और  भारतीय चुनाव आयोग ने अपनी  विश्वश्नीयता , न्यायप्रियता और  उत्कृष्टता  के   झंडे न केवल भारत में बल्कि  सारे संसार में  गाड़ दिये थे। अचानक नरेंद्र मोदी जी ने हम सभी  मूर्ख भारतीयों को बताया कि भारतीय चुनाव आयोग वैसा नहीं है जैसा कि हम समझ रहे थे बल्कि वो तो बड़ा  बईमान,पक्षपाती तथा गैरजिम्मेदार है।याने मोदी जी सत्ता में आएंगे तो चुनाव आयोग को ठीक {?} कर देंगे !
                             चूँकि  इस दौर में तो 'संघ परिवार'और भारतीय जनता पार्टी की नजर में  मोदी से ज्यादा योग्य ,ईमानदार, देशभक्त  तथा कद्दावर कोइ ओर नेता नहीं है.होगा तो भी उसे खंडित और  दण्डित किया जा सकता है।  इसलिए  कोई कारण नहीं की ये लोग 'नमो'  द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए  इन आरोपों पर यकीन  नहीं   करेंगे ! चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले  'नमो' के इस  बयान  से दुनिया में भारतीय लोकतंत्र का जो  आघात पहुंचा है वो तो अपनी जगह घोर त्राषद है ही किन्तु  इसके अलावा  एक अप्रिय प्रश्न  ओर भी उठता है कि संघ परिवार और भाजपा   ने   इसी  तथाकथित नाकाबिल  ,पक्षपाती  और गैरजिम्मेदार चुनाव आयोग  की बदौलत  ही विगत ६-७ माह पहले चार राज्यों में  जो सरकारें  बनाईं  हैं , क्या   भाजपा की ये उपलब्धियां  भी इसी पक्षपाती ओर नाकाबिल चुनाव आयोग की  या षड्यंत्रपूर्ण चुनाव प्रणाली का  ही परिणाम हैं ?
                       सभी दूर  चर्चा है कि  'अबकी बार -मोदी सरकार ' सर्वे - मर्बे  को मारो गोली। डंके की चोट  उसके विरोधी भी कह रहे हैं कि  १६ मई को  आने वाले रिजल्ट में यूपीए का तो  सूपड़ा साफ़ होने जा रहा है ,कांग्रेसी तो क्या बेचारे प्रधानमंत्री डॉ मनमोहनसिंह भी ७-रेस कोर्स रोड त्यागने की जल्दी में हैं।  हो सकता है की एनडीए की सरकार बने न बने किन्तु भाजपा को तो  २०० से ज्यादा  सांसदों की सीटें  जीतने का  अवश्य ही  अनुमान है । इन विरोधाभाषी हालातों मे  मोदी जी से  देश की जनता को पूंछना चाहिये कि क्या यह संभावित ऐतिहासिक उपलब्धि  इसी  तथाकथित -पक्षपाती ,पूर्वाग्रही ओर निकम्मे  चुनाव आयोग की  बदौलत मानी जाएंगी ? यह कौन नहीं जानता  क़ि न केवल गुजरात ,मध्यप्रदेश में तीन -चौथाई से ज्यादा सांसद भाजपा  के ही जीतकर आने वाले हैं। बल्कि दक्षिण भारत में भी  इस बार उसका खाता खुलने वाला है।  क्या  भाजपा को मिलने वाले ये सुखद परिणाम भारतीय चुनाव आयोग का षडयंत्र मानकर नकार दिये जायेंगे ?क्या मध्यप्रदेश की २९ में से २९ सीटों पर जीत  का दावा करने वाले शिवराजसिंह चौहान  भी 'नमो' से सहमत  होंगे ? यदि मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग कांग्रेस के साथ मिला  हुआ होता तो  क्या कांग्रेस का इतना बुरा हाल होता ? कहीं ऐंसा तो नहीं कि  मोदीजी  ही सही  फ़रमा  रहे हो और गुजरात का अपना निजी अनुभव बाँट रहे हों ?कहीं ऐंसा तो नहीं कि मध्यप्रदेश में भी शिवराज को  चुनाव आयोग की  इसी तथाकथित  पक्षपाती नीति से ही न केवल  विधान सभा चुनाव में  बल्कि अब लोक सभा चुनाव में भी विराट सफलता मिलने जा रही हो ? भाजपा के हिसाब से  चुनाव आयोग मध्यप्रेदश ,गुजरात और  राजस्थान में तो निष्पक्ष ओर स्वतन्त्र  है  किन्तु बनारस ,बंगाल या वहाँ  जहाँ भाजपा को जीत की सम्भावना नहीं वहां पक्षपाती ओर अयोग्य है।  हमारा  सवाल है मोदी जी से की चुनाव आयोग जब भाजपा  शाषित राज्योँ मे निष्पक्ष चुनाव  करा सकता है तो सम्पूर्ण भारत में क्यों नहीं ? भाजपा के वे नेता जो जानते हैं कि  मोदी के आरोप  ना केवल सतही  बल्कि निराधार,मनघड़ंत और असत्य हैं   उन्हें 'नमो' की इस  गलत बयानी   पर  शर्म नहीं है। यदि उनमें लोकतंत्र के  प्रति जरा भी आस्था है तो वे इस तरह के राष्ट्रविरोधी वयानों  का मुखर विरोध क्यों नहीं करते ?राजनाथसिंह ,जेटली ,सुषमा ,शिवराजसिंह ,वसुंधरा राजे , रमनसिंह ,प्रकाशसिह  बादल  या मोहन भागवत  क्यों नहीं कहते कि मोदी  भाई बस करो -चुनाव आयोग  पर तोहमत लगाने से पहले  वहाँ भी तो नजर दौड़ाओ  जिधर से हम बम्फर  जीत हासिल  करने जा रहे हैं!  क्या यह भी चुनाव आयोग की अयोग्यता ओर पक्षपात का परिणाम है ?मीठा-मीठा गप ,कड़वा-कड़वा  थू क्या यही 'नमो' का सिद्धांत और  यही विचाधारा है ?
                   
       श्रीराम तिवारी
  
  

मंगलवार, 6 मई 2014

मोदी ऐसे 'रत्नाकर' नहीं हैं जो बाल्मीकि हो जाए ।




   ज्यों -ज्यों १६ मई  नजदीक आती जा  रही है , त्यों-त्यों नरेंद्र  मोदी  तेजी से बदलते जा  रहे हैं। यूपीए,कांग्रेस  या गैर भाजपाई गैर एनडीए वाले ही नहीं खुद उनके ही 'रामा दल'  वाले भी यत्किंचित आश्चर्यचकित हैं कि ये   'नमो' को क्या हो गया  है ? सब कुछ  उगल देने-बक देने  के बाद ,भरपूर विषवमन  कर चुकने के बाद, वे अब ऐंसे पेश आ रहे हैं मानो साक्षात देवदूत धरती पर उतर आया हो ! उनके टीवी इंटरव्यू  और  चुनाव के उत्तरार्ध्र  की तकरीरें  बहुत 'संशयपूर्ण ओर छद्मवाग्मिता से भरपूर हैं। जब  वे फरमाते हैं कि मै तो  जनता का  सेवक हूँ , सेवा का एक मौका मुझे  देकर देखो , मैं  भारत की तस्वीर ही नहीं तकदीर  भी बदल  डालूँगा, यदि मैं हार गया तो सब कुछ छोड़कर पुनः 'चाय बेचने' लग जाऊंगा! तो  मोदी जी  की इस एक्टिंग पर मर-मिटने को जी चाहता है।  लेकिन  जब वे कहते हैं कि  मैं तो मजदूर का  बेटा हूँ ,एक कम्बल मैं  भी  गुजारा कर्ता  हूँ! तो  उनकी यह मासूम अदा ओर  यह पाखंडी स्वरूप देखकर मतली आने लगती है।
               नरेंद्र मोदी जी की मेराथॉन आम सभाओं में , राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापनों में , मीडिया को खरीदने में ,भाजपा के खजाने को  भरने  में,ऐयाश बाबाओं -ढोंगी साधुओं को खरीदने में , बिकराल परजीवी 'संघ परिवार ' को पालने में  और स्वयं 'नमो' के शाही-  हवाई खर्चों में  जिन अम्बानी-अडानी ,बजाज या बिड़लाओं का सफ़ेद  -  'कालाधन'  पानी की तरह बहाया जा रहा है ,वे भी शायद  मोदी जी की इस मासूम  अदा पर [कि मैं एक मजदूर हूँ ]  शरमा  गये  होंगे। [यदि शर्म बाकि होगी तो!] उनकी  असली  और  बिकराल सूरत देख-समझकर  तो यह किसी को भी नहीं लगता   कि यह कायाकल्प वास्तविक है।  यह बहुत सम्भव  है कि शायद मोदीजी अभी भी  भारत की जनता को-मतदाताओं को  उल्लू   ही  समझते हैं।  यदि  'नमो' का कायाकल्प हो  जाएगा,उनमें इंसानियत जाग जाएंगी  तो १६ मई के बाद  उनके नाम का जाप करने वाले कट्टरपंथी  'वेसहारा ' हो जाएंगे.   इसीलिये एन चुनाव के अंतिम चरण में  वे भले ही परम-पवित्र और  पाक-साफ़  योगीश्वर हो चले  हों किन्तु ' इतिहास' उनका पीछा नहीं छोड़ने वाला।  मोदी  ऐसे 'रत्नाकर' नहीं हैं  जो बाल्मीकि हो जाए । वे जाहिल  अंगुलिमाल  भी नहीं हैं जो कहे कि 'धम्मं शरणम् गच्छामि' . वे एक  ऐंसे बेहतरीन इंसान  जो  किसी से बैर नहीं रखता ! किसी से घृणा नहीं करता !कोई कामना नहीं रखता ! बदले की भावना नहीं रखता ,सबको  समान  [हिन्दू-मुस्लिम,ऊंचनीच] समझता है! तब तक नहीं बन सकते जब तक राजनीति से संन्यास नहीं ले लेते।

      श्रीराम तिवारी 

रविवार, 4 मई 2014

बहुसंख्यक साम्प्रदायिक तत्ववादियों के प्रसाद पर्यन्त - कुख्यात क्रोनी कैपिटलिज्म जीत गया !

  यह केवल एग्जिट पोल  या प्रीपोल के आंकड़ों पर विश्वाश -अविश्वाश करने  की बात नहीं है बल्कि  अधिकांस तठस्थ राजनैतिक विश्लेषकों का भी यही  अभिमत है की  १६ मई को जो परिणाम आयंगे उसमें भाजपा का १६ वीं संसद में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उपस्थित  होना तय है।लेकिन  भगवा प्रकोष्ठ के  अति उत्साहीलालों की आकाशवाणी कि अकेले भाजपा  ही  २७६  सीटे   जीतकर आ रही है ,मुंगेरीलाल के हसीन सपनो से ज्यादा कुछ नहीं है।  वेशक  भाजपा को २००  से २२० तक  सांसदों की  सीटें मिल गई  तब  भी  वह रिकार्ड   ही  तो तोड़ेगी !   इसके उपरान्त भी एनडीए की सरकार बनाने के लिये  'संघ परिवार' को आधा सैकड़ा सांसदों की सख्त दरकार है। संभावित  अलायन्स को लेकर और अपने ही 'वरिष्ठों' के मिजाज को लेकर  'संघपरिवार' में इस समय यही माथा पच्ची  चल रही है। उधर  बाह्य समर्थन के सवाल पर -ममता ,मायावती,जया ,नवीन ओर चंद्रशेखरराव  जुबान पर दही जमाये हुये हैं। इधर अपने ही धुरंधर - आडवाणी,सुषमा ,मुरली मनोहर और उमा  भारती जैसे अनेक  भाजपाई  'कोप भवन '  की ओर अग्रसर हैं। तमाम संभावनाओं के बावजूद  संघ के सुरेश सोनी,रामलाल, होस्बोले और राम माधव ही नहीं बल्कि स्वयं मोहनराव भागवत  भी दिल्ली के केशव कुञ्ज में इस 'महाचुनौती' से जूझने में जुट गए हैं।  वे खुद ही  आश्वत नहीं हैं कि राज्य सत्ता का यह 'महागरल'  मोदी सहज ही  पचा पाएंगे।  वे जान गए हैं कि उनके शागिर्द के राज्यारोहण का  पथ उतना  निरापद नहीं  है जितना की जेटली,  राजनाथसिंग और  स्वयं नरेन्द्र मोदी बता रहे है।
                     यह तो उचित ही है कि कांग्रेस  का पाटिया उलाल तय है। कांग्रेस का  १००  सीटों के आसपास  सिमिट  जाना   तय है। ये भी अनुमान है कि  बाकी  लगभग २००  सीटें गैर एनडीए -गैर यूपीए याने - सपा,बसपा जदयू ,राजद,झमो,आप , तृणमूल ,नवीन जया ललिता  तथा वाम दलों की होंगी। एनडीए और  यूपीए से अलहदा  यदि तीसरे मोर्चे की संयुक्त ताकत को तितर-वितर  होने से बचाए जाये। राष्ट्र के आम आदमी के हितों के लिए यह अति आवश्यक है कि केंद्रीय  सत्ता  को  पूँजीवादी  दलालों के हाथों  खरीद-फरोख्त से रोका जाये। गैर कांग्रेस ,गैर भाजपा और क्षेत्रीय दलों की एकता से निर्मित  यह तीसरा मोर्चा लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकता है। तब  देश को यूपीए से निजात तो मिलेगी  ही ,साथ ही भाजपा के व्यक्तिवादी- अहमन्यवादी-साम्प्रदायिक  - बेलगाम निर्मम पूँजीवाद पर अब  भी अंकुश लगाया जा  सकता है. 
                              मोदी  जी का गुजरात विकाश मॉडल ओर 'गुड गवर्नेश ' केवल एक ऐसा अर्ध सत्य है जो कांग्रेस और यूपीए के प्रति  आवाम के चिर असंतोष को भाजपा की 'संसदीय' ताकत में इजाफा  करने के काम  तो आ सकता है।  लेकिन भारत का उद्धार नहीं कर सकता। वेशक इस हो-हल्ले में भाजपा बाजी मार ले जाए। किन्तु  तब भी  उनसे ज्यादा सीटें तो  गैर भाजपा और गैर कांग्रेस की  ही होंगी। चूँकि जनादेश यूपीए के   खिलाफ  आने वाला है। चूँकि  भाजपा नीत एनडीए  बेसब्री से सत्ता की प्रतीक्षा में हैं ,उसके'  नेता नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत परफार्मेंस  भी अन्य दलों ओर नेताओं से  कुछ ज्यादा ही रेखांकित किया गया है। इसलिए १७ मई  को भाजपा संसदीय बोर्ड द्वारा श्री नरेन्द्र भाई मोदी को  विधिवत अपना नेता [प्रधानमंत्री प्रत्याशी]  घोषित कर दिया जाएगा.
                                                 जिन्होंने 'नमो' के नाम पर बड़ा दाँव लगाया है ,चुनाव प्रचार में अरबों फूंके हैं, वे एग्जिट पोल के फ़ौरन बाद 'वसूली' में जुट गए हैं।विगत ४८ घंटे में अडानी  के खातों में  ४९५९ करोड़ और अम्बानी-रिलायंस के खातों में  २१०० करोड़  की बेतहसा बृद्धि हुई है।यह  पैसा कहाँ से आया ? जाहिर है कि  मध्यम  वर्गीय निवेशकों  के खातों में घटत  हुई होगी,जिसे वे देश की आवाम को लूटकर ,जिंसों के दाम बढ़ाकर या सट्टा बाजारी के मार्फ़त पूरा करेंगे। यह  विचारधारा है  उस पूंजीवाद की  जिसे 'नमो' ने गुजरात -कच्छ -केरन में आजमाकर  कुछ मुठ्ठी भर गुजरातियों को मालामाल कर दिया गया  है. भले ही  हजारों गाँवों को उजाड़कर दो -चार शहर 'जगमगा' दिए गए हों  मगर  इस चकाचौंध में यह  देखने की फुर्सत किसी को नहीं  कि  बाकी  कितनों  को भूंखो मरने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया  गया है।  
                                            हालाँकि श्री मोदी  पर लगे  अनेक आरोपों का जबाब  अभी तक देश और दुनिया को  नहीं मिला है। वेशक  बहुसंख्यक साम्प्रदायिक तत्ववादियों के  प्रसाद पर्यन्त  और कुख्यातनिर्मम  क्रोनी कैपिटलिज्म जीत गया है।  इन्ही काली ताकतों के वरद्हस्त से  इस बार के आम चुनाव मजाक बन कर रह गए है। लोकतंत्र को धनतंत्र -प्रचारतंत्र ओर व्यक्तिगत ग्लैमर के  वशीभूत कर  ये  चुनाव लड़े गए। सब कुछ इन ताकतों के अनुकूल  है. इस तरह  बहाव के अनुकूल तैरना  इन हालात में  मोदी जी के लिए बहुत आसान है।   बहुत सम्भव है की२७२ सीटें  वे  अवश्य ही जुगाड़ लेंगे। तब  तीसरा मोर्चा बन पाने  के चांस क्या खाक  होंगे ?  केबल वाम मोर्चा ही  है  जिसने  न केवल अपने सीमित साधनों ओर  सीमित संसदीय ताकत के बिना पर यूपीए और  एनडीए की विनाशकारी आर्थिक नीतियों पर अंकुश लगाने  के लिए निरतंर संघर्ष किये हैं। केवल वामपंथ ही है जिसने  कभी भी ,कहीं भी, मोदी और संघ परिवार को घास नहीं डाली। वामपंथ के साथ कुछ तो होंगे जिन्हे धर्मनिर्पक्षता, समता ,न्याय  के मूल्यों सहित   राष्ट्र के मजदूर -किसानों की वास्तविक फ़िक्र होगी ! ये तो हो नहीं सकता कि सारे के सारे दल  ही  तो  यूपीए  के साथ या  एनडीए के साथ सदा सर्वदा  सत्ता  सुख भोगेंगे ।  कुछ तो अवश्य होंगे जो  फासीवाद  , पूँजीवाद  और  साम्प्रदायिकता से लड़ने  के अपने सिद्धान्त पर अडिग रहेंगे। यदि कोई नहीं  तो  वामपंथ  अकेले  ही  संघर्ष के मैदान में फासिज्म का ,क्रोनी पूंजीवाद का और इस अधोगामी निजाम का डटकर मुकाबला करेगा। 

       श्रीराम तिवारी
 
                  स्वाभाविक है कि  एनडीए या मोदी को  वामपंथ का सहयोग  तो कतई   नहीं मिलेगा। लेकिन   मोदी यदि   ममता का समर्थन नहीं लेते और  फिर भी सत्ता सीन हो जाते हैं तब 'वामपंथ' को क्या स्टेण्ड  लेना चाहिए ? क्या  एनडीए के साथ किसी तरह के पुनर्विचार या कामन मिनिमम प्रोग्राम की  फिर भी  कोई गुंजाइश नहीं है ? क्या यह सच नहीं की भाजपा के  भीतर अभी तक नरेन्द्र मोदी एकमात्र नेता हैं  जिन्होंने  देश के तमाम उन दलों और  नेताओं को धो डाला है जिन्होंने एनडीए या मोदी का बहिष्कार कर रखा  है। मोदी ने केवल  वामपंथ  के  खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने त्रिपुरा में भी सीपीएम की  सरकार के खिलाफ कुछ नहीं कहा। वे कुछ कुछ अटल जी की तरह ही  वामपंथ का  लिहाज करते प्रतीत हो रहे हैं। इसके उलट वामपंथ की कतारों में 'नमो' हमेशा सर्वथा त्याज्य ओर निंदनीय रहे हैं।   वैसे भी  वामपंथ के द्वारा काग्रेस और भाजपा को एक समान निशाने पर लेने की नीति के वाबजूद कांग्रेस और यूपीए को वाम की ओर  से सदाशयता मिलती ही रही है। जबकि एनडीए ,भाजपा और मोदी केवल ' महाछूत' ही रहे हैं। इन्ही कारणों  से  देश में कई जगहों पर वाम कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हो चले हैं या 'आप' के साथ हो लिये हैं।
                       इन हालात में जबकि माया ,ममता ,जय ललिता जैसी स्वयंभू नेत्रियां देश  की नहीं अपने अहम  की चिंता में 'दुबली' हो रही हों  , देवेगौड़ा  , नीतीश  , मुलायम  कालातीत होने जा  रहे हों ,नवीन पटनायक  चन्द्र बाबु नायडू ओर अगप ने एनडीए का हाथ थाम लिया हो तब 'वाम पंथ ' को क्या स्टेण्ड लेना चाहिए ?  वाम मोर्चे के द्वारा २००४ में  जब यूपीए - प्रथम को बाहर से 'मुद्दों पर आधारित' समर्थन दिया जा सकता है और वक्त  आने पर २००८ में [1.२ ,३ एटमी करार पर असहमति स्वरूप]वापिश भी लिया  जा सकता है तो२०१४ में  एनडीए को बाहर से समर्थन क्यों नहीं दिया  सकता ? यदि भाजपा २०० सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आती है तो स्वाभाविक है कि अन्य क्षेत्रीय दल भी उसके साथ जुड़ेंगे ही। तब तीसरे मोर्चे की  सरकार बनाने  का प्रयास  केवल एक औपचारिक राजनैतिक रस्म अदायगी  ही रह जायेगी।  वेशक  भारत में केवल वाम  पंथ ही है जो जनआकांक्षी , न्याय आधारित , शोषण मुक्त समजा व्यवस्था के लिए सर्वजनहितकरी नीतियों पर अडिग रहा है,उसके संसदीय प्रजातंत्र के हस्तेक्ष  की डगर में कुछ खुशनुमा दौर आये हैं तो मैदानी जन संघर्षों में  भी मेहनत कशों  ने खून पसीना एक किया है।  वाम पंथ कोइ छुइ -मुई नहीं कि  कोई मोदी छु ले ,कोइ भाजपा छु ले ,या 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' पर आधारित एनडीए छु ले तो वो कुम्हला जायेगा। वेशक जब एक बार यूपीए -प्रथम को समर्थन देकर वामपंथ ने  डॉ मनमोहन सिंह के उदार पूंजीवाद से 'मनरेगा ,आर टी आई और  कमजोरों -दलितों आदिवासियों के हितार्थ अनेक सार्थक  फैसले लागु करवाये हैं तो एनडीए के उग्र  पूँजीवाद  से  नाउम्मीद क्यों ?जहां तक संघ पोषित बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का सवाल है वो तो देश  की जनता  के जनादेश से ही परिभाषित हो जाएगा।  यदि यूपीए के कुकर्मो से एनडीए की साम्प्रदायिकता बड़ी है तो  उस पर देश  को समवेत फैसला लेना चाहिए। कुर्बानी का ,देशभक्ति का और धर्मनिरपेक्षता  का  ठेका क्या अकेले वामपंथ  ने ले रखा  है ? क्या वाम पंथ ने  ओमान चांडी या ममता  से कुछ कम धर्मनिरपेक्षता का आचरण किया था ?जो  केरल और  बंगाल में हार का मुँह  देखना पड़ा ? क्या संसदीय प्रजातंत्र में आदर्शों  की बलिबेदी केवल भारत के उस संगठित पक्ष  के लिए ही बनी है? मेहनतकश जनता  के  हरावल  दस्तों का यूं  ही  चूक  पर  चूक करते  हुए  अप्रसांगिक  होते जाना क्या साबित करता है? कौनसा वर्ग संघर्ष होने जा  रहा है?
                     किसी भी पक्ष की ओर  से  मोदी का  व्यक्तिगत अंध विरोध उन पर अनैतिक आचरण के आरोप  किसी भी तरह से जायज नहीं  है। उनकी नीतियों पर असहमति  हो सकती है ,उनसे बेहतर नेता भी भारत में ढेरों हो सकते हैं ,  यह भी जाहिर है कि मोदी की नीतियां- कार्यक्रम  व सोच भी उतनी वैज्ञानिक और प्रेक्टिकल नहीं है जितनी की वे बताते हुये नहीं थक रहे हैं। वेशक जिस तरह मुंबई कोलकता नहीं हो सकता ,जिस तरह जयपुर झुमरी तलैया नहीं हो सकता  और जिस तरह  जापान फिलिस्तीन नहीं हो सकता उसी तरह समग्र भारत गुजरात नहीं हो सकता।लेकिन  सकारात्मक सोच और तरक्की के सपने देखने वाले मोदी  कम से कम  उस धूर्त -स्वार्थी ,लालची  मजदूर विरोधी ममता से तो बेहतर ही  हैं जो सत्ता लिप्सा के लिए नक्सलवादियों ,माओवादियों से लेकर बांग्लादेशी  घुसपैठियों ओर घोर वाम विरोधी कठमुल्लाओं की गोद में जा बैठी है।
               जो लोग कांग्रेस और भाजपा को भारत के विकाश ,सुरक्षा और समृद्धि के लिए रोड़ा मानते हैं ,मैं उनसे सहमत हूँ।  जो लोग भाजपा और संघ परिवार में 'फासिज्म' के बीज देखते हैं  मैं उनसे भी सहमत हूँ। जो लोग कांग्रेस को राजनीति की भृष्ट  'गन्दलाई ' हुई असहनीय  गटर गंगा  समझते हैं ,मैं उनसे भी कुछ-कुछ सहमत  हूँ। लेकिन जो लोग पूरी की पूरी कांग्रेस और पूरी की पूरी भाजपा को 'अधम-अपावन' समझते हैं मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। मेरा मन्तब्य यह हैं की जब  कांग्रेस में ,भाजपा में वामपंथ  या अन्य राजनैतिक दलों  में कोई व्यक्ति गलत बात कहता है तो उसका विरोध स्वाभाविक और  जायज है किन्तु जब वह व्यक्ति राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सही और देश हित की बात करता है तो उसका स्वागत  भी  किया जाना चाहिए।
                       गुजरात  के मुख्य मंत्री और भाजपा के 'पी एम् इन वेटिंग' नरेंद्र मोदी बंगाल में जाकर ममता की वास्तविकता जनता के सामने रखते हैं ,उसकी पोल' खोलते हैं , सत्ता में आने पर बँगला   देश के घुसपैठियों को भारत से निकाल बाहर करने की बात करते हैंऔर ममता को  कठघरे में खड़ा करते हैं तो वे केवल भाजपा का  ही हित देखते हुए नहीं लगते। बल्कि वे भारत की सुरक्षा और ममता की  राष्ट्र विरोधी -असल तस्वीर भी पेश कर रहे होते हैं। ममता ओर मोदी दोनों  मेरे  पसंदीदा नेता नहीं हैं। किन्तु इस प्रसंग में मोदी को मैं ममता से बेहतर मानने को बाध्य हुँ । क्योंकि ममता ने केवल वोट की गन्दी राजनीती के लिए और वामपंथ   की वापिसी रोकने के लिए बंगाल में तो मोदी का विरोध कर   रखा है जबकि राजनीतिक क्षितिज पर उसकी नजरें एनडीए और  भाजपा से  मिली हुई हैं। उसके प्रवक्ता 'डेरेक ओ ब्राइन  का बयान उसी  गुप्त कड़ी का  एक हिस्सा है। श्री रामपुर [बंगाल] की आम सभा  भाजपा अध्यक्ष  राजनाथ सिंह ममता को सराहते हैं ,उन्हें वामपंथ ओर कांग्रेस से लड़ने और  भाजपा से प्यार की पैगे  बढ़ाने को फुसलाते हैं तो मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं की राजनाथसिंह  झूंठे ओर कपटी  हैं। जबकि नरेंद्र मोदी  उनसे कहीं  ज्यादा  साफ़ गोई  के प्रतीक हैं। उन्हें वाम की ओर  से  समर्थन न सही  लेकिन जनता का बहुमत यदि मिलतता है तो कम से कम  यूपीए ओर कांग्रेस से तो  देश को मुक्त होने ही दिया जाये !

        श्रीराम तिवारी