गुरुवार, 31 मार्च 2011

क्रिकेट उन्माद राष्ट्रवाद का निम्नतर सत्य है.

   महाभारत  के १८ दिवसीय युद्ध में शकुनि मामा की जो भूमिका थी और कृष्ण ने जो अरणि मन्थक का रोल अदा किया था इतिहास में कल ३० मार्च -२०११ को मोहाली भारत पाक क्रिकेट द्वन्द में क्रमशः इलेक्ट्रोनिक मीडिया और पोलिटिशियन ने अदा की है.फर्क सिर्फ इतना था कि शकुनि के हाथ में पांसे थे तो मीडिया के हाथ में माइक था.उधर कृष्ण के हाथ में रथ के घोड़ों कि रास थी तो हमारे मनमोहन के हाथ में द्विपक्षीय वार्ता कि डोर.
             बहर हाल 'खेल'याने क्रिकेट में भारत जीत गया और पाकिस्तान कि बडबोली टीम हारकर पाकिस्तान लौट गई.अब इतिहास ही तय करेगा कि द्विपक्षीय संबंधों को मित्रवत बनाने में इस क्रिकेट कूटनीति का कितना असर पड़ा.मीडिया ने जो पासे फैंके उसमें वास्तविक राष्ट्रवाद कितना था और भारतीय प्रधान मंत्री ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी को आमंत्रित कर कितना देश भक्तिपूर्ण कार्य किया?ये तमाम उदेश्य आगामी पीढ़ियों कि गवेषणा के हेतु सुरक्षित करते हुए मैं सिर्फ अपने नजरिये कि बात रखूँगा.
                                मैंने  स्वयं  भारत -पाकिस्तान मोहाली सेमीफ़ाइनल क्रिकेट मैच कि पूर्व संध्या पर अपने ब्लॉग पर क्रिकेटीय उन्माद को अंध राष्ट्रवाद से आप्लावित निरुपित किया था. जब भारतीय क्रिकेट टीम ने पाकिस्तानी टीम को २९ रनों से पराजित कर दिया और सचिन रमेश तेंदुलकर को 'मेन आफ मैच'दिया गया तो अपनी ख़ुशी को मैंने  भी सारे भारतीय जन-मानस से एकाकार किया.अब प्रश्न यह है कि यदि यह सिर्फ खेल भर था तो पाकिस्तानियों द्वारा सचिन को शतक न बनाने देने पर मैं नाखुश क्यों हुआ? और यदि यह राष्ट्रीय चेतना जैसा कुछ था तो भारतीय टीम के हार जाने कि स्थिति में मेरा राष्ट्रीय गौरव किस स्थिति में होता?और यह सवाल भारत बनाम श्रीलंका के बीच होने वाले फ़ाइनल मैच के लिए भी प्रासंगिक क्यों नहीं हो सकता?
        कुछ लोग कहा करते हैं कि ये क्रिकेट का खेल तो समय कि बर्बादी है.गुलामी कि निशानी है.सटोरियों ,बाजारियों द्वारा खाते पीते शहरियों को लूटने का सभ्रान्त स्तरीय खेल है. इन लोगों को मालूम हो कि आज़ाद हिन्दुस्तान में कभी कभार ही ऐंसा हुआ होगा कि पूरे  वतन -हर  जाति,हर मज़हब,हर प्रान्त और हर भाषा -भाषी- ने एक साथ ऐंसी ख़ुशी मनाई होगी जैसी कि ३० मार्च -२०११ कि  आधी रात को मनाई.शायद १५ अगस्त -१९४७ कि आधी रात को  भी इतनी एकता से हिंदुस्तान -जिन्दावाद के नारे नहीं लगे होंगे! क्योंकि यह सर्वविदित है कि तब तो भारतीय उपमहाद्वीप में कौमी वैमनस्यता और अविश्वाश का ज़हर फिजाओं में फैला हुआ था.आज़ादी के बाद जब -जब भी सड़कों पर जश्न मना है 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद'के नारे तो निश्चय ही तब ही सुनाई देते हैं जब भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान क्रिकेट टीम का मान मर्दन करती है.भारतीय सेनाओं ने और देशभक्त जनता ने अतीत में कई बार दुश्मनों से लोहा लिया है और जीते भी हैं,किन्तु १९७१ के बांगला देश उदय और पाकिस्तान पर मुक्तिवाह्नी कि फ़तेह के अलावा और कोई अवसर उल्लेखनीय नहीं कि जिसमें भारत कि जनता ने वैसा कोई "सम्पूर्ण जश्न"मनाया हो जैसा कि मोहाली में पाकिस्तान क्रिकेट टीम को परास्त करने पर भारत कि जनता ने मनाया.
        इस विजयोल्लास में कोई रंग ,रूप,आकार,समय,परिस्थति या शख़सियत आवश्यक नहीं.सबके मन में एक विचार,सबकी आस्था सबकी  तमन्ना ,सबकी मनोकामना "कमेव  द्वीतीयू नास्ति "जैसी हो जाती   है. ऐसा लगता है मनो देश-भक्ति का ठेका  सिर्फ क्रिकेट ने ही ले रखा है .स्वाधीनता दिवस  और गणतंत्र दिवस  पर अवकाश होने के बावजूद लोग तिरंगा फहराने  के लिए नियत सार्वजानिक स्थलों तक जाने से बचते  हैं. लेकिन क्रिकेट के उन्माद ने राष्ट्रवाद कि महीन  डोर को थाम रखा  है.यदि लोग भारत पाकिस्तान मैत्री के प्रतीक चिन्ह  भारत के मोहाली में मित्र  का आव्हान  करते हैं तो पाकिस्तान कि अमन पसंद अवाम  को भी चाहिए  कि भारत कि जनता को अपना सहोदर मानकर  न केवल क्रिकेट का बल्कि ज़िन्दगी  के हर खुशनुमा लम्हे  का आनंद लेकर जिए.
       भारत कि आवाम भी यह स्मरण रखे कि क्रिकेट में जीत ही राष्ट्रवाद कि चेतना का करक नहीं. वह  सिर्फ उत्प्रेरक  भर हो सकती  है.                                      _श्रीराम तिवारी       
             

मंगलवार, 29 मार्च 2011

क्रिकेट के बहाने भारत पाकिस्तान में अंध-राष्ट्रवाद परवान चढ़ रहा है,,,,,,,,

      कल ३० मार्च को  भारत और पकिस्तान का सेमीफ़ाइनल क्रिकेट मैच  मोहाली में खेला जाने वाला है. दोनों देशों की सरकारें,आम-जनता,क्रिकेट टीमें,समग्र मीडिया,सटोरिये और क्रिकेट से बावस्ता तमाम स्टेक-होल्डर्स की आज की रात बड़ी बेचेनी से गुजरने वाली है.हालाँकि यह कोई नया वाकया नहीं है,यह कोई अनहोनी भी नहीं है.पहले भी भारत-पकिस्तान कई बार इस दौर से गुजर चुके हैं.
         दोनों मुल्कों के क्रिकेट प्रेमी अपने -अपने{यदि इश्वर एक नहीं है तो} उपास्य देवताओं से मिन्नतें और प्रार्थना कर रहें हैं, मैं  भी तहे दिल से चाहता हूँ की इंडिया ही जीते.यह न केवल मेरी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए बल्कि दोनों मुल्कों की आवाम के हित में और क्रिकेट के हित होगा.
          कल भारतीय क्रिकेट टीम जीती तो क्या होगा?और यदि पाकिस्तान टीम जीती तो क्या होगा?
मैं  क्यों चाहता हूँ की भारत ही जीते? क्योंकि फ़ाइनल मुंबई में होने जा रहा है.मुंबई में विगत ४५ साल से वही होता है जो ठाकरे परिवार और शिवसेना चाहती है.यदि बाई चांस पाकिस्तान जीतता है तो भारत फ़ाइनल खेलने से तो वंचित  होगा ही बल्कि पाकिस्तानी टीम मुंबई में फ़ाइनल के लिए अस्वीकार्य जैसी होकर रह जाएगी. उस सूरत में गेंती-फावड़े लेकर शिव सैनिक  तैयार खड़े हैं.हर किस्म की विकेट मिनटों में खोदने की प्रेक्टिस उन्हें है.मुंबई को ठुप्प करना उनका बाएं हाथ का खेल है ही. पाकिस्तानी क्रिकेट टीम यदि फ़ाइनल में पहुँचती है तो यह भारतीय क्रिकेट टीम की हार होगी न की भारत की. किन्तु शिवसेना ने और अंध-राष्ट्रवादी मीडिया ने क्रिकेट के खेल को राष्ट्रों की जंग बना डाला है ,अतएव वे क्रिकेट टीम की हार को देश की हार निरुपित करते हैं.हालाँकि यह शुरुआत पाकिस्तान से ही हुई थी ,किन्तु अब ये हालत है की पाकिस्तान की कबड्डी टीम भी मातोश्री के अगल-बगल जीत कर चली जाये तो फर्क पड़ता है.अतः पाकिस्तान  की हार में ही सबकी भलाई है.यदि विश्वकप  आयोजन शांतिपूर्वक और ससम्मान होते देखने की तमन्ना है तो आइये दुआ करें की भारतीय क्रिकेट टीम को मोहाली के मैदान मैं विजय श्री अवश्य मिले.
     भारतीय और पाकिस्तानी  खिलाड़ी बेहद दबाव  में यह रात गुजारेंगे.कल दोनों टीमें अपने सर्वोच्च शक्ति और कौशल का प्रदर्शन करेंगे ही,जो क्रिकेट में वास्तविक दिलचस्पी रखते हैं उनसे निवेदन है कि क्रिकेट कि हार-जीत पर देश कि आन-बान-शान को दाव पर न लगाकर केवल और केवल विशुद्ध क्रिकेट का आनंद लें. पाकिस्तान  कि आवाम को भी यही पैगाम हमारा है कि जीतें तो इतरायें न और हारें तो खाजवायें न. खेल को दोनों देशों के बीच मैत्री और भाईचारे का माध्यम बनाकर दोनों टीमों को क्रिकेट खेलने दें उनसे जंग कि आरजू न करें.                                       _ श्रीराम तिवारी

सोमवार, 28 मार्च 2011

दक्षिण में हिन्दी अब पराई नहीं...

     जिस दिन उत्तर-भारत में रंगपंचमी का धूम धड़ाका हो रहा था  उसी दिन मैं चेन्नई के प्रख्यात आर जी एम् सांस्कृतिक सभागार में शाम को एक अत्यंत गरिमामय सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहा था. अधिकांश  कार्यक्रम टीन एजर्स लड़कियों ने प्रस्तुत किये .संचालन प्रोफ़ेसर मिस चंद्रा ने किया सभी टोलियाँ बारी-बारी से अपने नृत्य ,संगीत ,शस्त्र- कौशल तथा गायन वादन कार्यक्रम प्रस्तुत कर प्रशंसा बटोरते जा रहे थे. जहां तक भाषा और माध्यम का प्रश्न है तो यह स्वाभाविक ही था कि ९९%तमिल और १%इंग्लिश का प्रयोग हो रहा था. मुझे और मेरे अलावा उत्तर भारत के विभिन्न शहरों से पहुंचे हिंदी भाषी श्रोता और दर्शकों को सिर्फ दृश्य और पश्य का सहारा था. कार्यक्रम के अंत में संचालिका ने पहले तमिल में और बाद में इंग्लिश में दर्शकों से कोई कविता सुनाने का आग्रह किया. मुझसे रहा न गया और झपटकर माइक लपका और दनादन अपनी सद्यप्रकाशित 'वसंत ऋतू ' कविता कि चार पंक्तियाँ सस्वर सुना डालीं. जब मैं कविता सुना चूका तो मानों सुई पटक सन्नाटा छा गया. कुछ क्षणों बाद सामूहिक करतल ध्वनि से मुझे सम्मान नवाजा गया.
       इसके बाद संचालिका ने एक  अपनी टीम को वापिस मंच पर बुलाया और जब संगीत कि स्वर लहरियों ने उस  सुहानी शाम को गुंजायमान  किया तो कई लोग मंच पर थिरकने लगे -गीत के बोल थे ...केशरिया बालम पधारो जी म्हारे देश ...इसके बाद तो जैसे झिझक टूटी और फिर पंजाबी वैशाखी का नृत्य, असमी बिहू नृत्य और ब्रिज बरसाने के होली नृत्य गीत ने मुझे अचम्भे में डाल दिया .इसमें कोई शक नहीं कि गीत आडिओ केसेट के माध्यम से ध्वनित हो रहे थे किन्तु बॉडी लेंगुवज और अंग-सञ्चालन से बेहतर ताल मिलकर प्रस्तुती देने वाली लड़कियां ने बाद में समवेत स्वर में- होली आई रे कन्हाई .....गा कर सुखद विस्मय में डाल दिया.
  बाद में जिज्ञाषा-वश जब आयोजकों से भाषा के बारे में और खासतौर से तमिल और हिंदी के रिश्तों के बारे में पूँछतांछ कि तो मुझे जो बताया गया उससे अभिभूत हुए बिना नहीं रहा. बजाय मेरे सवालों के जबाब देने के एक कन्नड़ मूल के तमिलभाषी ने मुझसे पूंछा कि मुझे कितनी भाषाएँ आतीं हैं? मैंने   कहा कि आधी हिंदी ,आधी संस्कृत और आधी इंग्लिश कुल जमा डेड  भाषा का माद्दा,प्रतिप्र्श्नकर्ता  महोदय ने बताया कि वे एल आई सी के सेवानिवृत डायरक्टर  हैं और हिंदी ,इंग्लिश ,फ्रेंच, बंगला, मराठी ,तमिल,मलयालम तो भरपूर आती है और कन्नड़ उनकी मातृभाषा है .उन्होंने ये भी बताया कि हिंदी का विरोध एक राजनैतिक चालबाजी मात्र थी.
मैंने  पुनः जिज्ञाषा व्यक्त की-  १९९१ में तत्कालीन मद्रास और पूरे तमिलनाडु में जहाँ कहीं भी मैं गया, हर केन्द्रीय कार्यालय और रेलवे स्टेशन पर हिंदी के शब्दों पर कालिख पुती रहती थी अब तो हर जगह -सरकारी बैंक ,बीमा ,बी एस एन एल ,केन्द्रीय और सार्वजानिक उपक्रमों के बाहर तीन भाषाओँ-तमिल ,हिंदी, इंग्लिश  में नाम पट्टिका चमक रही है. यह कैसे सम्भव हुआ?
      मुझे बताया गया कि वक्त कि मांग, ज़माने कि रफ़्तार और गठबंधन कि राजनीत ने सभी को लचीला बना दिया है. अब कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय-दल भाषा और धरम के नाम पर जनता को मूर्ख बनाकर शासन  नहीं कर सकता. अब संभल कर चलना पड़ता है ,पता नहीं किस मोड़ पर किसकी जरुरत आन पड़े. इसीलिये कट्टर तमिल या द्रविण-वादी आजकल अपने बच्चों को चोरी छिपे हिंदी सिखा रहे हैं कि कल को यदि अखिल-भारतीय सेवाओं में जाना हो,गठ्बंधानीय राजनीती करनी  पड़े या बोलीवुड में कोई चांस मिले तो बिना हिंदी कोई किनारा नहीं,अतः न  केवल चेन्नई ,न केवल तमिलनाडु बल्कि समूचे दक्षिण भारत में स्वतःस्फूर्त रूप से हिंदी सीखी जा रही है. सरकार के हिंदी अधिकारी और राजभाषा समितियां इत्यादि सब चोंचले भर रह गए हैं.अत्यंत सोचनीय तो यह है कि उत्तर-भारतीय जनता को दक्षिण कि भाषाओँ तक ले जाने का कोई उपक्रम न तो सरकार का है और न एन जी ओ का है. देश कि एकता और अखंडता के लिए सामाजिक -सांस्कृतिक समन्वय के लिए उत्तर-भारतीयों को दक्षिण  कि भाषाओँ में भी दिलचस्पी लेनी चाहिए.
          श्रीराम तिवारी

चेन्नई केंद्रीय कार्यसमिति ने केरल सरकार को बधाई दी....

   दिनांक २२ मार्च से २५ मार्च तक चेन्नई के राजीव गाँधी मेमोरिअल सी टी टी सी में संपन्न मान्यता प्राप्त संघ की केन्द्रीय कार्य समिति बैठक में निम्नांकित प्रस्ताव पारित किये गए ...
       एक- तमाम पूंजीवादी आक्रमणों के वावजूद पी एसयु  को बचाया जा सकता है.इसके लिए दो ही रास्ते हैं  अ-प्रतिगामी नीतियों के खिलाफ जनांदोलन खड़ा किया जाये जिसका नेत्रत्व कर्मचारियों को करना चाहिए . बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के मद्देनज़र उसकी मांग के अनुसार उत्पादनों का और मानव संसाधनों का युक्तियुक्तकरण किया जाये.
दो- केन्द्रीय सार्वजनिक उद्द्य्मों में जो बीमार या घाटे में हैं वे यह आशा नहीं करते की जो सरकार अकेले टेलीकाम सेक्टर में ही एकअदद टू-जी स्पेक्ट्रम के लिए १  लाख ७६ हजार करोड़ का घपला चुप चाप पचा सकने की क्षमता के वावजूद निजी  कारपोरेट क्षेत्र को स्वान टेलिकॉम या कलिग्नार टी वी की तर्ज पर वेळआउट पैकेज दे सकती है, यह सब चलता  रहता  यदि बड़ी अदालत  ने करारी  चोट  न  की होती  , वो विश्व बैंक या इंटर नेशनल मोनिटरी फंड के  घोषित दिशा निर्देशों की अवग्याँ कैसे कर सकती है? अर्थात अपने ही सार्वजनिक उपक्रमों को लूटने की खुली छूट देंने से इनकार कैसे कर सकती है? चूँकि यहाँ संगठित कर्मचारी अधिकारी संघर्ष के लिएमैदान में  हैं सो इन सार्वजनिक उपक्रमों को ओउने -पोने दाम पर बाजार में ठीकरे के भाव बेचने और निजी क्षेत्र को अबाध मुनाफा कमाने की छूट देने के वावजूद सरकार की किरकिरी हो रही है.की अब तक २५० पी एस यूज भारत की जनता के कल्याण हेतु न केवल जिन्दा हैं बल्कि -एल आई सी ,एस बी आई बी एस एन एल एवं ओ एन जी सी जैसे महारत्न तो अभी भी शक्तिशाली मुद्रा में निजी क्षेत्र को चुनौती बने हुए हैं.कर्मचारियों को सी ई सी चेन्नई का सन्देश है ' करो या मरो' का नारा नहीं चलेगा अब तो 'हर हल में सिर्फ जीतना ही अंतिम विकल्प बचा है.
    हालांकि मजदूर वर्ग कि कतारों में भी 'सरेंडर करो ...मैदान छोडो ...जो मिले सो ले लो ...या न मिले तो किस्मत को..कोसो .जैसे विचार तेजी से संक्रमित हो रहे हैं......किन्तु ये  विचार सिर्फ एग्जीक्यूटिव  तक   ही  सीमित नहीं बल्कि ग्रुप सी और डी में भी इसकी धमक पहुँच चुकी है.
    चेन्नई सी ई सी का आह्वान है कि 'हम लड़ेंगे ...जब लड़ेंगे तो जीतने कि भी सम्भावनाएं रहेंगी . नहीं लड़ने और सरेंडर होना श्रमिक वर्ग के खाते में नहीं लिखा .
तीन- अब आर्थिक मांगो-पेंशन,वेतन पुनरीक्षण,मेडिकल या एल टी टी सी को बढवाने कि मांग उठा पाना संभव नहीं,क्योकि यह एक वास्तविकता है कि देश का निजी क्षेत्र ,आउट सोर्सिंग और ठेका सिस्टम बेहद कम मूल्य पर श्रम  को बाज़ार में खरीदकर सरकार का तथाकथित सर दर्द कम कर रहा है कि पेंशन ,भत्ते या बोनस कि देनदारियों से मुक्ति  दिलाने में निजी क्षेत्र के सहयोग का सरकार कि ओर से शुक्रिया.
    चेन्नई सी ई सी ने निजी क्षेत्र के  और ठेका मजदूरों को लामबंद कर उनके बाजिब हितों कि लड़ाई के लिए अपनी ओर से मुक्म्म्बिल सहयोग का आह्वान किया है. वास्तव में यह कोई यह्सान नहीं है यह तो संगठित क्षेत्र पर आने वाली सुनामी से बचाव कि महज एक मशक्कत भर है.
यह थोड़े से साहस और संघर्ष कि बात नहीं बल्कि चट्टानी एकता और अनवरत संघर्ष से ही संभव है कि संगठित क्षेत्र के मजदूर -कर्मचारी और एग्जिक्यूटिव अपने वेतन भत्ते और पेंशनरी वेनिफिट्स सुरक्षित रखने में तभी कामयाब हो सकते हैं जबकि वे निजी क्षेत्र में हो रही श्रम कि लूट का जनता के बीच खुलासा करें और निजी क्षेत्र के कामगारों को एकजुट संघर्ष के लिए प्रेरित करें. .
 चार- एन ऍफ़ टी ई,  एस एन टी टी ऐ ,ऍफ़ एन टी ओ और मेनेजमेंट कि मिलीभगत ने यु पि ऐ सरकार की टेलिकाम पालिसी का समर्थन किया था और बी एस एन एल ई यु ,जो कि प्रतिगामी नीतियों कि घोर मुखालफत करती रही ,उसे मान्यता से महरूम किये जाने कि भरपूर कोशिश कि किन्तु सभी को मुंह कि खनी पडी .सी ई सी का आह्वान है कि आगामी संघर्षों में हमारा साथ देवें.
  पांच- सभी पी एस यूज में और खास तौर से सिक इंडस्ट्रीज में न केवल श्रमिक वर्ग का अपितु स्टेक होल्डर्स कि भी भागीदारी हो वैचारिक आधार पर मजदूर कर्मचारी संगठनों से जुड़ें  ताकि उनप्रतिगामीनीतियोंको बदलाजा सके जिनसे राष्ट्र के आधुनिक मंदिरों के ध्वंस का खतरा है. भारत संचार निगम में इसकी पहल हो चुकी है. 
     छे- वी आर एस और आउट सोर्सिंग कि नीति का पुरजोर विरोध किया जायेगा. जनता के उपक्रमों को मेनेजमेंट और राजनीतिज्ञों का चारागाह मात्र नहीं बनाए दिया जायेगा. जन भागीदारी और उत्तरदायित्व का अनुशासन  कायम किया जायेगा.
      
                         इसके अलावा वित्तीय जीवन्तता के लिए पी एस यूज को बचाने में स्टील इंडिया ,कोल इंडिया ,सीटू तथा केरल सरकार ने जो राह दिखाई है उससे से सबक सीखने का संकल्प लिया गया.यह सुखद अनुभूति है कि जिन राजकीय सार्वजनिक उपक्रमों को पहले कि एन डी ऐ ,यु पीए और केरल कि यु डी ऍफ़ सरकारें लगभग मृत घोषित कर चुकीं थीं,केरल के  वे अधिकांश {लगभग ४२]पी एस यूज आज मुनाफे में चलने लगे हैं,निस्संदेह  इसका श्रेय सीटू और केरल कि वाम मोर्चा सरकार को जाता है.
           बी एस एन एल ई यु के महासचिव  काम. पी अभिमन्यु ,ए आई आई इ ऐ के महासचिव काम .अमानुल्लाह खान जे ऐ सी कन्वीनर वी ऐ एन नम्बूदिरी तथा टॉप लेवल अधिकारियों/सी ई ई सी मेम्बरों की उपस्थिति में गगनभेदी नारों के साथ यह केन्द्रीय कार्य कारिणी बैठक सम्पन्न हुई.
 यूनियन सत्यापन पर चर्चा हुई कहा गया- विजय का जश्न मनाइए.आपको जो कम वोटों से जीत हुई वो चिंता का कारन नहीं है.लगातार चौथी बार जीतना फक्र की बात है ,जीत -जीत है चाहे कम वोट हों या ज्यादा.हमने बैंक एल आई सी से और अन्य पी एस यूज से ज्यादा वेतन बढ़वाया,हमने प्रमोसन पालिसी लागु कराया,इसी आधार पर जब हमने चुनाव पूर्व के आकलन में सभी सर्कल सेक्रेटरी से जानकारी ली तो १३६०००वोट मिलने की उम्मीद बताई गई थी.किन्तु कुछ परिस्थितियों के कारण -जिन पर  हमारा कोई जोर नहीं था कोई गलती भी हमारी नहीं थी -फिर भी हमें कम वोटों से जीत मिली और १०६००० वोट पाकर हम प्रथम रहे.
   एस एन टी टी ऐ ने अपने आपको जिन्दा रखने के लिए यह बचकाना कदम उठाया और एन ऍफ़ टी ई को सपोर्ट किया. उनका कहना है की मेनेजमेंट ने अंदाज लगाया था की यदि स न टी टी ए ने एन ऍफ़ टी ई को वोट किया तो बी एस एन एल ई यु हार जायेगी. किन्तु मजदूरों के भाग्य से और दलालों के दुर्भाग्य से एन ऍफ़ टी ई हार गई ,जबकि एस एन टी टी ऐ ने जी जान से ताकत लगाईं थी क्योंकि वे यह सावित करना चाहते थे की एस एन टी टी ऐ जहां होगा विजय श्री वहां होगी .ऍफ़ एन टी ओ की तरह इनका भी भ्रम टूट गया और लगातार अकेले दम पर बी एस एन एल ई यु जीत गया.
        कुछ नकारात्मक बिन्दुओं की ओर भी ध्यानाकर्षण किया गया.इसमें सबसे बड़ी बात थी मेनेजमेंट का आशीर्वाद प्राप्त करने वाले तत्वं द्वारा दुष्प्रचार.हमारे कुछ साथी भी सजग नहीं रहे या अपनी बात ठीक से नहीं रख पाए.लगातार दो दो हड़तालों का पैसा कटना और यूनियन फंड में ६०० रुपया लेना भी निम्न सोच के कर्मचारियों को हमसे दूर रखने में काम आया.इस मानसिकता को दुष्प्रचार की आग ने हवा दी और हम १०६००० पर आ गिरे. फिर भी जीत तो जीत है.
      चर्चिल से तो ठीक ही रहे.द्वितीय विश्व युद्ध में स्टालिन और चर्चिल दोनों ने शानदार काम किया ,दोनों ने हिटलर को और फासिस्टों को हराया किन्तु इतिहास ने क्या न्याय किया?पूरे विश्व
 युद्ध के दौरान न केवल ब्रिटेन को बचाया बल्कि सारी दुनिया में फेले ब्रिटिश साम्राज्य को जिन्दा रखा.किन्तु १९४५ में विश्व युद्ध की समाप्ति पर जब ब्रिटेन में आम चुनाव हुए तो जनता ने चर्चिल को नकार दिया और उनकी कंजर्वेटिव टोरियन पार्टी सत्ता से पहली बार विमुख हुई.लेबर पार्टी के एटली जीत गए.इसी तरह जिस स्टालिन ने सोवियत यूनियन का शानदार नेत्रत्व करते हुए हिटलर को पराजित करने में योगदान किया उसे न केवल सोवियत संघ की भावी पीढीयों ने बल्कि विश्व के माध्यम मार्गी वामपंथियों ने भी विस्मृत कर दिया.
   अतः बी एस एन एल ई यु की लगातार चौथी जीत को हम बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.हम जीते हैं ,हमारी जीत शानदार है या नहीं यह उनसे पूंछो जो हारे हैं.
     यदि हम बी एस एन एल को बचाना चाहें तो अवश्य बचा पाएंगे ,यदि हमारी आत्मा मर चुकी है या हम कायर हैं तो ही बी एस एन एल ख़त्म हो सकता है. जनता के बीच जाकर एल आई सी जैसा प्रोपेगंडा करना होगा कि सरकारी क्षेत्र कि दूर संचार कम्पनी के बेहतरीन उत्पाद और टेरिफ्स क्या हैं?बिना जन समर्थन के बी एस एन एल तो क्या कोई भी शाशक वर्ग  भी सत्ता में नहीं रह सकता.इस महीने कि २९ तारिख को जे ऐ सी में कोई आये तो ठीक वर्ना बी एस एन एल ई यु अकेले दम पर ही बी एस एन एल को बचने कि लड़ाई छेड़ देगी.
      इस चेन्नई केन्द्रीय कार्य कारिणी समिति ने निर्णय लिया है कि एल आई सी कि तरह हम भी बिना मान्यता के कैसे लड़ें इस हेतु कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना होगा.इसके लिए ट्रेड यूनियन क्लास का भी निर्णय लिया गया.सी डी आर सिस्टम एक बहुत जरुरी और गतिशील आवश्यक सिस्टम है.आगामी तकनीकी बदलावों के लिए इसकी उपयोगिता असंदिग्ध है.सी एम् डी साब ने भी माना है कि प्रचालन और संधारण के कार्यों में वित्तीय कठिनाई आड़े नहीं आयेगी.
      श्रीराम तिवारी ..आल इंडिया संगठन सचिव -बी एस एन एल ई यु
        

रविवार, 27 मार्च 2011

पेंशन फंड संशोधन विधेयक पर यू पीए ओर भाजपा की नूरा कुश्ती ...

 विगत २४-२५ मार्च को लोकसभा में यु पी ए सरकर की ओर से पेंशन-संशोधन बिल   प्रस्तुत किया गया, इस बिल के विरोध में कुल ४६ मत पड़े और भाजपा ने बहिर्गमन किया ,इस प्रकार भाजपा ने २८-जुलाई २००८ वाला  रास्ता ही अपनाया याने कांग्रेस यदि आर्थिक नीतियों को अमेरिकी जामा पहनाने में नौ कदम चलती है तो भाजपा दस कदम चलकर न केवल अमेरिकी पूंजीपतियों बल्कि भारतीय नव-धनाड्यों को पुरजोर अपील करती है की ...'में हूँ ना' ....
       यह सब इस आलेख में दुहराना जरुरी नहीं की पेंशन संशोधन विधेयक के निहतार्थ क्या हैं? सरकार इस भारी-भरकम रकम को जो की देश के मेहनतकशों की गाढे पसीने की कमाई है ; को म्युचुअल फंड में लगाने को यु पी ऐ प्रथम के दौर से ही लालायित है किन्तु तब वामपंथ के बाहरी समर्थन को पाने के लिए' 'कामन मिनिमम प्रोग्राम' के तहत ही यह मजबूरी रही थी की पेंशन फंड से छेड़-छाड़ नहीं की जाये, जब सारे  जहां ने इस अनैतिक  कर्म को जान ही लिया है तो अब लाज के घूंघट की जरुरत कहाँ? जिन ४६ सांसदों [वामपंथी]ने पेंशन फंड बचाने के लिए जबरदस्त पहल की और सरकार के सामने घुटने टेकने या बिकने से इनकार किया उन क्रांतिकारियों को लाल सलाम ..
     जिस यु पी ऐ सरकार ने इस फंड को दांव पर लगाया है और जिन भाजपाइयों ने नूरा कुश्ती  की तर्ज पर यु पी ऐ द्वितीय को बार-बार बचाया है उन्हें भी देश का सचेत मजदूर और कर्मचारी आसानी से माफ़ नहीं करेगा.
      यह पहला प्रतिगामी कदम नहीं है. इससे से पहले भी अनेकों मौकों पर भारतीय मीडिया ने  चाहे भृष्टाचार का सवाल हो,२-जी स्पेक्ट्रम या कामनवेल्थ -आदर्श सोसिअटी,या विदेशी बेंकों में जमा काले धन का सवाल हो,हर बार भाजपा को घोर विरोधी  और नैतिकतावादी दिखाया  है किन्तु स्वयम भाजपा के अन्दर जो ७० %कांग्रेसवाद घुसा हुआ है वो मूल कांग्रेस को बचाने के लिए सामने आ जाता है. यह सिर्फ आनुषांगिक भाजपा में ही नहीं बल्कि संघ-परिवार के शीर्षस्थ पांच-पांडवों में भी जी एम् वैद्य जैसों की वैचारिक आस्था के केंद्र में मौजूद है.
           श्रीराम तिवारी

शनिवार, 19 मार्च 2011

फागुन के दिन चार होली खेल मणा रे .......

     ब्लोगिंग  की दुनिया के तमाम सुधिजनो को होलिकोत्सव  की शुभकामनायें...

     मित्रो ,मैं होली नहीं खेलता ,बचपन  से ही पढ़ाकू ,एकांगी ,लजालू और दुनिया भर की चिंताओं का भार- वहन करने वाला 
मैं अकिंचन बहुधा भरी पूरी भीड़ में सदा अकेला ही रहा हूँ. होली खेलने और मनाने में आनंदित होने वालों  की ओर देखता हूँ तो सदा ही मुंह  बिचका कर अपने कमरे में कैद  होकर होली के त्यौहार मनाने और उसको ईजाद करने वालों को मन ही मन कोसता हूँ .होली में आनंदित होने वाले कहते हैं कि इसका श्री गणेश बरसाने या मथुरा से हुआ था .कृष्ण ने गोपियों {बहुवचन}के साथ खूब रास रचाया और खूब होली खेली . हिन्दू समाज में जितने लुच्चे-लफंगे हैं, अमर्यादित आचरण की जानिब के शख्स हैं वे अपने कदाचरण को जस्टीफाई करने के लिए कृष्ण, राधा और ब्रिज की सनातन परम्पराओं  की आड़ लेते रहे  हैं .
           आज घर गली  में दो-दो होलिकाएं जल रहीं  हैं लाखों वृक्ष कटे जाते हैं ,चारों और असमान  में धुल-धुआं  और केमिकल रंगों  की जहरीली घटाएँ छायीं  हैं. यह किस ख़ुशी  में किया जा  रहा है.  क्या जापान  में हो रहे जलजलों  से हम जरा भी आहत नहीं? क्या भारत  में इस साल सूखा  ,पाला और भुखमरी  से आत्महत्या  करने वाले किसानों की मौत  पर हम रंग  गुलाल अबीर  का छिडकाव नहीं कर रहे ?
          वैसे  तो सभी त्यौहार विकृत हो चुके  हैं किन्तु होलिका दहन  या होलिकोत्सव तो नितांत अमानवीय और धरा-द्रोही  हो चुका है. कोई किसी के चेहरे को कला कर दे  या लाल, उतना तो फिर भी  ठीक किन्तु  करोड़ों गैलन  पानी सड़कों  पर, नालियों में बहा देना  कौनसी सभ्यता है. जंगल, जमीन, पेड़ और असमान सब  चीख रहे  हैं की हे मानवों  {दानवों}दया करो अब तो, धरती  को बक्श दो. इससे अछि तो मीराबाई थी की अपने प्रियतम  {कृष्ण} से सूफिया प्रेम की फाग  खेलने को  भक्तिराग   के रंग में गति है-
    फागुन के दिन चार  ...होली  ..खेल मना  रे....
                                                                              -श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

यूरोपियन रेनेसां और फ्रांसीसी क्रांति से भारत ने क्या सीखा !

यूरोपियन रेनेसां और फ्रांसीसी क्रांति की मध्यावधि में यूरोपियन दर्शन-शास्त्रियों  द्वारा   एक सर्वमान्य, सर्वव्यापी सिद्धांत स्थापित किया जा चुका था कि "सामंतवाद के गर्भ से पूंजीवाद का जन्म होता है., और पूंजीवाद के गर्भ से साम्यवाद का उदय होगा" इसी दरम्यान भारतीय उपमहाद्वीप में भी प्रतिगामी एवं अधोगामी दोनों ही प्रकार के मिले-जुले सामाजिक- राजनैतिक -आर्थिक बदलावों का यूरोपियन रेनेसां जैसा ही कुछ कुछ  दृष्टिगोचर हुआ था.
                जहां फ्रांसीसी क्रांति और सोवियत अक्टूबर क्रांति  की लहरों  ने और उसकी  समस्थानिक आनुषांगिक तरंगों ने सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका ,अफ्रीका और अधिकांश  एशिया महाद्वीप की सनातन से दलित -शोषित -गुलाम रही आवाम को बन्धन-मुक्ति की राह दिखाई ,वहीं दूसरी ओर उसी दौरान अंग्रेज कौम और उसकी समर्थक भारतीय सामंतशाही ने  भारत की शोषित -पीड़ित   आवाम को दोहरी -तिहरी गुलामी की घातक बेड़ियों में जकड़ने का एतिहासिक घृणित  कुकृत्य किया है.
        दुनिया भर के आधुनिक पाश्चात्य दार्शनिकों कि आमराय है कि पूंजीवादी समाज व्यवस्था को सामंती -  राजसी पतनशील व्यवस्था   से बेहतर  होना, मानव समाज कि एतिहासिक मानवीय सकारात्मक छलांग  का आवश्यक परिणाम है. उनका यह निष्कर्ष भी है कि पूंजीवादी निजाम अपने तमाम भयावह विनाशकारी विकृत रूपों के बरक्स एक शानदार भूमिका में प्रगतशील हुआ करता है. कबीलाई समाज से सामंतशाही  संमाज में  स्थापित होने कि लम्बी प्रक्रिया का उल्लेख मैं नहीं करूंगा, क्योंकि एक तो यह दीर्घ कालीन सामाजिक -एतिहासिक संक्रमण कि विपथ गाथा है,दूसरी बात ये है कि यह परिवर्तन हर मुल्क में अपने -अपने मिज़ाज में दरपेश हुआ है. सेकड़ों पुस्तकों में यह विषय समेत पाना दुरूह लगता है.
                          यूरोपियन समाजों को वैज्ञानिक भौतिकवादी विकास  धारा ने जिस भी रूप में ढाला वह अपने पूर्ववर्ती अधम व्यवस्थाओं से बेहतरथा. भारत या पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अखंड हिन्दोस्तान  कि आवाम का वर्गीय स्वरूप बेहद जटिल और रूढ़ होने से यहाँ पूंजीवाद का जन्म भी 'उत्तरा के गर्भस्थ शिशु' परीक्षित जैसा ही हो पाया. भारत के समकालीन सामंतों कि अय्याशियों  ,बदमाशियों और निरंकुश्ताओं कि वजह से भारत का "जागृत" जन-गन तीन हिस्सों में विभाजित था. एक- जो सामंती दमन के प्रतिकार को भाग्य या किस्मत का या कर्मफल  का परिणाम मानकर "हरी इच्छा भावी बलवाना." से बंधे थे. दो-अपने आपको तत्कालीन व्यवस्था के अनुकूल बनाकर उस शोषण और दमन कि व्यवस्था के अंग बनकर उसी में नष्ट होने को अभिशप्त थे.तीन-राज्य सत्ता से बड़ी ईश्वरीय सत्ता कि परिकल्पना  कर ,अतीत कि पुरातन   गाथाओं के उदात्त चरित्रों को महाकाव्यों के मार्फ़त आम जनता कि भाषा प्रस्तुत करने वाले -महाकवि और भक्तिमार्गी संतजन.
    अतीत के काल्पनिक उज्जवल -धवल चरित्रों को अपने समकालिक बदमिजाज़ शासकों  के सामने  आदर्शरूप में प्रस्तुत करने कि एतिहासिक, साहित्यिक सृजनशीलताको किसी भी रूप में रूढ़ या पुरोगामी नहीं कहा जा सकता.कबीर  तुलसी ,सूरदास ,चेतन्य , केशव रहीम रैदास और मीरा इत्यादी के भक्ति साहित्य में मानवीय मूल्यों को पाने कि ललक साबित  करती है कि अधिकांश भक्तिकालीन साहित्य सृजन प्रगतिशील और मानवतावादी था. कुछ इनसे अलग किस्म के तत्व भी इस दौर में हुए जो अपने समकालिक सामंतों कि ठकुर सुहाती या  भडेती करने में लगे रहे. चंदवर दाई,विद्द्यापति ,कल्हण,जयदेव,जगनिक और बिहारी जैसे  भी थे जो स्वामीनिष्ठ भाव से काव्य सृजन में-कनक ,कामिनी और कंचन कि तलाश में लगे रहे.
                हालाँकि इस भक्ति का इश्वर ,अध्यात्म या दर्शन से कोई सरोकार नहीं था.यह प्रारंभ में दासत्व का कातरभाव मात्र था. यह दक्षिण भारत में जागृत महामानवों की जन-मानस को अनुपम देन थी कि वे अपने आपको सनातन दासत्व से मुक्त करें किन्तु परिवर्ती काल में कुछ धूर्तों ने इस भक्तिरूपी वेदनामूलक मलहम को मंदिरों में सीमिति कर दिया और वहां अकिंचनों ,अनिकेतों ,दासों तथा तथाकथित शूद्रों का प्रवेश निषेध कर दिया.इस प्रकार जो भक्तिमार्ग प्रारंभ में मानव कि चतुर्दिक मुक्ति का साधन था वो उत्तरकाल में शासक  वर्गों के खुशामदियों द्वारा शोषण का साधन बना दिया गया. यही वजह है कि रेनेसां और पुनर्जागरण जैसी सामाजिक क्रांतियों के बावजूद  भारत और दुनिया भर में पूंजीवादी क्रांतियों के उभार के बावजूद  भारत में ,पाकिस्तान में ,बंगला देश में और अफगानिस्तान तक में अधिकांश  समाज'खाप पंचायतों' जैसाहीहै. इसके खिलाफ कोईबाबा ,कोईसामाजिक कार्यकर्त्ता या स्वनामधन्य वुद्धिजीवी जुबान नहीं खोल रहा, सिर्फ भृष्टाचार कि दुग्दुगी बजाकर पूंजीवादी जामात कि लूट को बरकरार रखने में यथेष्ठ सहयोग किया जा रहा है.  यही काम आज के नवउदारवादी वैश्विक व्यापारिक दौर में भारत के  कुछ चतुर चालक 'बाबा'  लोग कर रहे हैं या  करने वाले हैं. 
                  जैसा कि  इस आलेख के प्रारंभ में भी मैंने  लिखा है कि पूंजीवाद कि एक मात्र अच्छाई है कि वह जातीयता के संकीर्ण बन्धनों को काट फैंकता है. भले ही वह विश्व युद्धों का जन्मदाता भी है ,किन्तु सामाजिक क्रांतियों का वह एतिहासिक अलमबरदार है. पूंजीवादी और उसके बाद साम्यवादी क्रांतियों ने पूर्वी यूरोप,सोवियत यूनियन  चीन,क्यूबा इत्यादि में तो जातिवाद  कभी का समाप्त हो चुका है ,यहाँ तक कि जो  साम्यवाद से  परहेज करनेवाले घोर पूंजीवादी राष्ट्र हैं उनमें भी जातीयता  का इतना वीभत्स रूप नहीं है ,जितना कि भारत में. भारत में अर्ध-पूंजीवादी एवं अर्ध-सामंती मिलावट ने अजीबोगरीब स्थिति निर्मित कर डाली है. यहाँ पूंजीवाद ने आर्थिक मोर्चे पर तो  गरीबों को और ज्यादा गरीब बनाकर रख छोड़ा है और पूंजीपतियों को करोड़ पति से अरब पति ,खरबपति बना दिया है .इतना ही नहीं इस अर्ध-पूंजीवादी निजाम ने एक और कमाल कर दिखाया कि जहां पहले  लगभग १०-१५ पूंजीपति थे इस देश में ,वहीं अब ६७  'त्रिलियानार्स' भारत को दुनिया भर में सुशोभित कर रहे हैं.शायद यह इसकी इन्तहा ही है कि भारत का एक पूंजीपति 'बैंक ऑफ़ अमेरिका ' के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर  में नामजद किया जा चुका है.हम मुकेश धीरुभाई अम्बानी को बधाई देते हैं किन्तु भारत के आमजनों कि आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर जो दुर्गति हो रही है उसमें इस उद्दाम पूंजीवाद ने भी बजाय सामाजिक बन्धनों को ढीला करने के, सारे देश {केरल बंगाल त्रिपुरा को छोड़कर} का 'खापीकरण' कर के रख दिया है.प्रश्न यह है कि जिस पूंजीवाद ने भारत जैसे गरीब मुल्क को इतनी इज्जत बक्शी  कि एक भारतीय को अमेरिकी बैंक में सर्वेसर्वा बनवा दिया वहीं ७७ करोड़ भारतीयों को एक वक्त  भरपेट भोजन जुटाने कि असफलता के साथ यह तमगा सा माथे पर ज्यों का त्यों बरकरार क्यों  है ?अक्सर कहा जाता है कि 'हम सब भारतीय एक नहीं बल्कि अनेक हैं .हम ब्राम्हण ,बनिया ,ठाकूर,जाट,गूजर,आर्य द्रविण दलित ,महादलित ,पिछड़ा महापिछ्डा और हिन्दू -मुस्लिम -सिख ईसाई बगेरह मात्र हैं.इस सामंत्कालीन सोच और पतनशील व्यवस्था को पूंजीवाद भारत में एक इंच भी इधर से उधर खिसकाने में असमर्थ रहा है?भले ही इस लफंगे पूंजीवाद ने यूरोप और अमेरिका या दुनिया भर में जीत के झंडे गाड़े हों किन्तु भारत को तो दोनों ओर से बुरी तरह रोंदा है .एक तरफ सामंती जातीय जकड़न ,साम्प्रदायिक घृणा और दूसरी ओर कृतिम उत्पीडन ,हत्या ,बलात्कार ,भय -भूंख ,और भृष्टाचार इत्यादि ने दो पाटों के बीच में भारत कि जनता को दबोचकर रखा है. इस व्यवस्था के खिलाफ जब तक आवाम का सामूहिक अवज्ञा आन्दोलन जैसा कदम नहीं उठता तब तक कांग्रेस ,भाजपा या वामपंथ भी इस कि चूल भी नहीं हिला सकते.
        जो काम भारत के मध्ययुग में श्रृंगार-वादियों या पोंगा-पंडितों ,कठमुल्लों ने सामंतवाद को खुश रखने के लिए किया था वही काम बाबा रामदेव या उनसे हित-संबल पाने वाले अब पूंजीवादी पतनोमुखी  व्यवस्था के लिए कर रहे हैं. उनके पास कोरी शाब्दिक लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं है.
      श्रीराम तिवारी

रविवार, 13 मार्च 2011

मध्यप्रदेश भाजपा कार्य समिति उवाच -सिंहासन खाली करो ,सुषमा आती है...

  मध्यप्रदेश  भाजपा की  दो दिवसीय कार्य समिति बैठक उज्जेन में संपन्न हुई.इस बैठक के मुख्य सूत्रधार व् शिल्पकार रहे भाजपा के राष्ट्रीय महा सचिव और मध्यप्रदेश प्रभारी श्री अनंतकुमार ने प्रेस को जो बताया उससे से न केवल आम भाजपाई बल्कि नेत्रत्वकारीभूमिका अदा करने वाले भी चिंतनीय मुद्रा धारण किये हुए हैं.
                                                     उज्जैन में संपन्न प्रादेशिक कार्यसमिति के कुछ निष्कर्ष इस प्रकार हैं. "केंद्र सरकार का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन टूट की कगार पर है, तमिलनाडु ,केरल ,बंगाल ,असम और पांडिचेरी के चुनावो में कांग्रेस और उसके साथियों की पराजय होने जा रही है,देश को शीघ्र ही मध्यावधि चुनाव का सामना करना होगा,भाजपा ने तय किया है कि अगला आम चुनाव सुषमा जी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा.मध्यप्रदेश से २९ सीटें जीतना जरुरी है.'
    श्री अनंत कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि भाजपा कि ताकत देश भर में तेजी से बढ़ रही है ,मध्यप्रदेश में कांग्रेस लगभग खत्म हो चुकी है बिहार में हमने शानदार प्रदर्शन किया.मध्यप्रदेश में सुष्माजी के नेत्रत्व में हम २९ सीटों पर विजयी होंगे.
        अनंतकुमार के उदगार जिनको बैचेन कर रहे थे वे तमाम मंत्री और संगठन पदाधिकरी उस मंच पर इस परिद्रश्य के
 साक्षी हैं. किसी भी नेता या वक्ता ने श्री लाल कृष्ण आडवानी ,अटलजी ,मुरलीमनोहर जोशी या जेटली का नाम नहीं लिया .क्या इन सभी दिग्गजों
को चूका हुआकारतूस  ,जनाधारविहीन और सत्ता प्राप्ति हेतु अशक्य मानकर यों दुसरे विकल्प गढ़े जा रहे हैं मानों - 
 "देखहिं चराचर नारिमय जे राम मय देखत रहे" रामचरित मानस के इस उद्धरण में राम का प्रयोग मेने ब्रह्म कि जगह किया है क्योंकि भाजपा ही नहीं पूरा हिन्दू समाज राम को ब्रह्म के रूप में देखता है ,अब कांग्रेसी हिन्दू ,वाम हिन्दू ,समाजवादी हिन्दू ,पिछड़ा हिन्दू ,दलित हिन्दू और प्रच्छन्न हिन्दू तो फिर भी अपने -अपने नेत्रत्व में आश्था लिए अडिग है ,सवाल तो सत्ता प्राप्ति कि सम्भावनाओं के मद्देनजर भाजपा में शीर्शष्ठ नेत्रत्व में मन मुटाव का है?जो लोग  श्रीराम को छोड़ ,उनके परम अनुयायिओं-आडवानी ,उमा ,मुरली मनोहर और संघ प्रमुख को छोड़ सुषमाजी का स्तुति गान कर आगामी  केन्द्रीय मंत्री  परिषद् में एडवांस बुकिंग कराना चाहते हैं वे  चीख -चीख कर कह रहे हैं कि '"दिल्ली कि सत्ता का रास्ता भोपाल से होकर जाता है" ,चूँकि सुषमाजी मध्यप्रदेश से सांसद हैं ,विपक्ष कि नेता हैं,उद्भट बकता हैं,दूसरे भाजपाइयों कि तरह भृष्ट अरब पति {पत्नी} नहीं हैं ,अभी -अभी सी वी सी मामले में सरकार और प्रधान मंत्री का फलूदा बनाने में उनकी भी भूमिका रही है ,वे समाजवादी पृष्ठभूमि से भाजपा में आयीं हैं उनके व्यक्तित्व और नेत्रत्व से भाजपा और भारत दोनों को फायदा होगा.किन्तु सवाल तो अब भी अपनी जगह स्टैंड कर रहा है कि यदि ये ही करना था-यानि विकाश वादी सोच और धर्मनिरपेक्षता की राह ही चलाना था और  सुषमा जैसे उदार हिदुत्व वादियों  को  ही यदि आगे बढ़ाना था -जो की भाजपा में व्यक्तिगत तौर से ;पहले से ही बहुतायत में मौजूद थे,  तो ये  -रथयात्राएं ,त्रिशूल बांटना,मस्जिद बनाम मंदिर ढहाना,गोधरा कराना,गुजरात में हिंसा और मुंबई दिल्ली समेत सारे देश में कट्टरवादी हमलों का उत्प्रेरक बनना क्या जरुरी था? कहा जा सकता है कि इसका भाजपा ,संघ परिवार और हिन्दुओं से कोई लेना देना नहीं. ये तो सब पाकिस्तान परस्तों और भारत के दुश्मनों की काली करतूतें हैं.तब भी प्रश्न और उलझता जायेगा कि कुछ खास नेताओं और नेत्रियों को साम्प्रदायिकता के मोर्चे पर भेजकर बलि का बकरा क्यों  बनाया जाता रहा ? और अब सत्ता प्राप्ति में उनको बाधा मान  कर किनारे क्यों  किया जा रहा है?  श्रीराम तिवारी ..... 

शनिवार, 12 मार्च 2011

विनाशकारी भूकम्प ओर विध्वंशक सूनामी में जापान -जर्जर


    जापान में कल आये महा विनाशकारी भूकंप और सुनामी लहरों की  भयानक विभीषिका ने न केवल सैदाई ,याकोहामा बल्कि टोकियो तक को हिला कर रख दिया है. जापान में हजारों जाने चली गईं है. 
 लगभग एक तिहाई जापान तहस नहस होचूका  है,सारी दुनिया से और भारतसे भीमदद के हाथ बढे हैं .इंसानी  
जज्वे ने अतीत में भी ऐसीं अनेक आपदाओं का सामना किया है.जापानी जनता तो प्राकृतिक झंझावातों को झेलने की आदी सी हो चुकी है.इस अवसर पर जबकि जापान में रेलों  सड़कों  टेलिफोन
तथा अस्पतालों की स्थिति ही संकटापन्न है तब दुनिया के तमाम जन-गणों की यह नैतिक और मानवीय जिमेदारी है की जापानी जनता का होसला बढ़ाएं और हर संभव मदद करें.
         इस प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए दिवंगतों को विनम्र श्रधांजलि अर्पित करता हूँ.
        श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

गेंदवाज को मजदूर और बल्लेबाज को अफ़सर मानना सरासर अन्याय है....

  इन दिनों भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट की चर्चा सबसे ऊपर और सबसे ज्यादा रुचिकर बनी हुई है.
क्या खिलाडी? क्या छात्र? क्या मजदूर? क्या किसान?क्या व्यापारी?क्या अफसर?क्या बाबु?आवाल वृद्ध नर-नारी क्रिकेटमय हो रहे हैं. शादी हो या तलाक ,जन्म हो मृत्यु  ,शहर हो या गाँव ,खेत हो या कारखाना कहीं ज्यादा -कहीं कम, कहीं ख़ुशी -कहीं गम ...जो  जहां है क्रिकेट की प्रतिध्वनी चाहे -अनचाहे सुनने को मजबूर है. विश्वकप की संयुक मेजवानी में भारत अर्थात बी सी सी आई की भूमिका  बिग-ब्रदर जैसी है
                                                     मुझे क्रिकेट का ककहरा भी नहीं मालूम.बचपन में जहां -पला बढ़ा वहां क्रिकेट की नहीं मल-खम्ब,कबड्डी, अखाड़ेवाजी,लठ्ठ-वाजी और मुगदर -वाजी जैसे खेल अवश्य थे . गिल्ली डंडा और डंडा-डाल जैसे खेलों में कुछ -कुछ क्रिकेटी रंग हुआ करता था . अक्सर दवंग किस्म का लड़का मनमानी करता और वही  खेलता {बेटिंग करता}था. उम्र में छोटे या दव्वु किस्म के बच्चे गेंद उठा लाने {फील्डिंग या गेंदवाजी करते  } या तीमारदारी का काम करते थे.  याने यदि भाई -भाई भी थे तो भी ताकत ने वर्गभेद खड़ा कर रखा था .कमजोर के हिस्से में ज्यादा परिश्रम और कम खुशियाँ आतीं और जिसके कल्ले में जोर होता तो परिश्रम और खुशियों का चयन  स्वयम कर सकने में समर्थ होता. पूर्व भारतीय दिग्गज हर- फन-मौला क्रिकेट खिलाड़ी और विश्वविजयी कप्तान कपिलदेव निखंज के एक बयान ने मुझे इतना प्रभावित किया कि उस पर प्रस्तुत संक्षिप्त  आलेख लिखने का लोभ संवरण न कर सका. उन्होंने हाल ही में इस दौर के विश्वकप में बल्लेबाजों कि मददगार पिचों के निर्माण पर सख्त आपत्ति लेते हुए निम्नांकित उदगार व्यक्त किये.
              कपिलदेवने कहा "  क्रिकेटमें गेंदबाजको तो मात्र एक मजदूर समझा जाता  है. इसीलिये इस टूर्नामेंट में 
       में भी बल्लेबाजों को मदद करने बाली पिचें बनाई गईं है. यही वजह है कि अधिकांस टीमें  धड़ा-धड ३०० के  स्कोर  पर  पहुँच रहीं हैं ."  
                 कपिलदेव ने खेल जगत की यादों से जुडी पुस्तक 'वर्ल्ड कप' के विमोचन कार्यक्रम में कहा-"विश्व कप जीतने के लिए टीम के पास अच्छा गेंदवाजी आक्रमण होना जरुरी है ,लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि क्रिकेट कि दुनिया में गेंदवाज को बल्लेबाज से कमतर आंका जाता है .एक विकेट गिराने पर दर्शक दीर्घा से उतनी शाबाशी भी नहीं मिलती जितनी बल्लेबाज को एक चौका मार देने  पर मिल जाया करती है. क्रिकेट के मैंदान में बल्लेबाज मानों आफीसर है और गेंदवाज महज मजदूर "
           अपनी कप्तानी में १९८३ में भारत को अब तक का एकमात्र वन डे विश्वकप दिलाने वाले कपिल ने कहा- "इस मर्तवा विश्वकप के लिए ऐंसी पिचें तैयार कीं गईं हैं जो बल्लेबाजों कि तो मददगार हैं किन्तु गेंदबाजों को विकेट लेने में पसीना बहाना पड़ रहा है. इन पिचों को पूर्णरूप से आदर्श तभी माना जा सकेगा जब गेंदबाजों  को भी थोड़ी सी मदद मिले सके. क्रिकेट में जितने भी नए नियम बन रहे हैं वे सिर्फ बल्लेबाजों को ध्यान में रखकर बनाये जा रहे हैं,गेंदवाजों कि उपेक्षा से क्रिकेट का वजूद संकट में है" 
                                   जैसा कि मैनें इस आलेख के प्रारंभ में ही निवेदन किया है कि मैं क्रिकेट का बल्ला भी ठीक से नहीं पकड़ सकता किन्तु कपिलदेव के वयान से  मेरे जैसे आम आदमी या सर्वहारा के लिए एक शानदार  रूपक तो क्रिकेट के बहाने मिल ही गया. और वो रूपक क्या है?
   प्रस्तुत आलेख में कुछ शब्द बदल दीजिये ,जैसे कि गेंदवाज को मजदूर तो कपिल ने ही नाम दिया है अतः यह नाम करण मेहनतकशों के इतिहास में कपिल के नाम से ही जाना जाएगा.अब बल्लेबाज को पूंजीपति या भूस्वामी नाम देवें.पिच याने [शासन) पूंजीवादी भृष्ट व्यवस्था. क्रिकेट याने उत्पादन के साधन विश्वकप याने पूंजीवादी आर्थिक सुधारवाद.
                     कपिल का यह कहना कि गेंदवाज पसीना बहाकर भी विकेट को तरसता है तो इसमें जो पिचों का कमाल है वो बल्लेवाजों का पक्षधर है यही इस दौर के नव्य आर्थिक उदारीकरण -भूमंडलीकरण -सर्वसत्तावादिकरण के निहितार्थ हैं.कपिल को धन्यवाद और आभार कि क्रिकेट का रूपांकन इस ढंग से किया कि मालिक -मजदूर ,अफसर-क्लर्क और बल्लेबाज-गेंदबाज के साथ -साथ पिच और ये संपूर्ण व्यवस्था बेनकाब हो रही है....                                                      श्रीराम तिवारी