भारत में इस बार की दीपावली -५-६ -नवम्बर २०१० जरा ज्यादा ही धूम -धाम से मनाई गई .गाँव देहात की तो दीवाली अब बड़े किसानों तक ही सीमित रह गई है .खेतिहर मजदूर और सीमान्त किसान इस दौर में बेहद क्लांत है इस वर्ग के पास न तो भर पेट भोजन और न ही शिक्षा और स्वास्थ की कोई व्यवस्था है उनको सभी दिन समान हैं .शहरों में सर्वहारा वर्ग को छोड़ शेष सभी वर्गों ने -अफसर ,नेता .सरकारी कर्मचारी ,छोटा -बड़ा व्यापारी और भृष्ट जगत सहित तमाम असमाजिक तत्वों की पौ बारह रही . बैंक डाकेतियों चेन स्नेचिं और चोरी चकारी का मामूली चोट्टे से लेकर वाया थाना होते हुए सराफा के व्यापार में अप्रत्यक्ष सयहोग भी अविस्मरनीय रहा .
भारत का वर्तमान राजनेतिक ,आर्थिक और व्यवस्था सम्बन्धी परिदृश्य मीडिया ने इस तरह निरुपित किया है की .केंद्र में यु पि ये सरकार का काम काज कोई क्रांतीकारी नहीं तो एकदम निराशा जनक भी नहीं दीखता .कभी- कभी लगता है की भारत का मीडिया सत्ता में जो स्थापित हैं सिर्फ उन्ही के प्रति उत्तरदायी है .आम जन -सरोकारों को वह सब्जी में चटनी की तरह पेश करता है .किसान आत्महत्या ,गाँव -देहातों में स्वाश्थ शिक्षा की दुरवाश्था या शहरों में निजी क्षेत्र के शिक्षित -अशिक्षित कामगारों की जवानी को -लीलता हुआ एक सर्वव्यापी अस्थिरता के भय का संचरण करता हुआ -उन्मुक्त बाजार का निर्माण कराने में सहभागी है .इस दौरान भयादोहन के निमित्त अंतरराष्ट्रीय राजनीती के खिलाडी भी पीछे नहीं रहे -श्री बराक हुसेन ओबामा की भारत यात्रा के विमर्श में अनेक प्रकार की टीका टिप्पणी की गईं और आने वाले दिनों में की जाते रहेंगी .
भारत -पाकिस्तान ,भारत -चीन और भारत -अमेरिका के अंतर्संबंधों की केमिस्ट्री में बराक ओबामा का भारत आना नितांत अर्थपूर्ण है .अमेरिका को अपने आर्थिक संकट से निजात पाने की छटपटाहट है ,पाकिस्तान को अमेरिका की छत्रछाया के छूटने का भय है .चीन को अपने चारों ओर पूंजीवादी राष्ट्रों की एकता से भय है ओर भारत को आतंकवाद तथा पाकिस्तान की कुटिल चालों का भय है .ओबामा के भारत में दीवाली मनाने .स्कूली छात्रों से मिलने ,संसद को सम्बोधित करने .धन्यवाद और जय -हिंद कहने के साथ -स्वामी विवेकानंद .महात्मा गाँधी .रवीन्द्रनाथ टेगोर और बाबा साहिब को स्मरण करने की भावौद्दीपक शैली से अमेरिका के १३० पूंजीपतियों समेत भारत के पूंजीवादी खेमें की बाछें खिल गई हैं .कहाँ -कहाँ ,किस -किस व्यापार पर संधियाँ हुईं ये अभी खुलासा होना बाकि है ,किन्तु यह तय है की अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा एक अच्छे सेल्स मेन सावित हुए .अब यह देखना बाकि है की भारत के सत्ता पक्ष और विपक्ष ने देश के लिए क्या हासिल किया ?केवल यह की भारत ने शून्य की खोज की .भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है ,जय हिंद ..धन्यवाद ...गाँधी न होते तो मैं न होता -भारत के ३३ करोड़ नंगे -भून्खों क औदार भरण सम्भव नहीं ....भारतीय नेतृत्व को अभी और मशक्कत करने है .जन आंदोलनों की अनदेखी महेंगी पड़ेगी .
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
शनिवार, 6 नवंबर 2010
जो हमने दास्तान अपनी सुनाई ... तो आप क्यों रोए ?
द्वतीय महायुध्य के बाद दुनिया दो खेमों में बट गई थी .एक का नेत्रत्व अमेरिका के पास था .दूसरे का सोविएत संघ पैरोकार था .दोनों का अपना विशिष्ठ दर्शन था .अमेरिका को उसके पूंजीवादी अर्थतंत्र में विकाश कि सफलताएं मिलती जा रहीं थीं .उधर सोवियत रूस ,चीन , क्यूबा ,वियेतनाम ,कोरिया . जर्मनी ,पोलैंड और युगोस्लाविया जैसे कई देश समाजवादी विचारधारा को अपनाते हुए तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे .रूस तो अमेरिका से पहले अन्तरिक्ष में जा पहुंचा .धरती से ..चाँद पर पहला कदम रखने वाले युरी गागरिन और नील आर्मस्ट्रोंग सोवियत क्रांती को चमत्कृत करने वाले हीरो बन चुके थे .अमरीका और उसके पूंजीवादी दोस्तों कि नाक नीची होने से सारी दुनिया के अन्य तठस्थ देश भी लाल झंडे के नीचे आने को आतुर हो गए .इनमें भारत जैसे नव स्वाधीन देश भी थे . आजादी के पूर्व से ही भारत कि जनता का झुकाव समाजवाद कि ओर था .स्वाधीनता के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व ने गुट निरपेक्षता और प्रजातंत्र कि ,पूंजीवाद +समाजवाद कि खिचड़ी =मिश्रित अर्थ व्यवस्था को भारत के लिए उत्तम माडल मानकर ,दोनों खेमों से अलग तीसरा मोर्चा अर्थात गुट निरपेक्ष आन्दोलन खड़ा करने में जुगत भिडाई.-नेहरु -टीटो नासिर कि त्रयी को राजनेतिक इतिहास में महानायकों जैसा सम्मान देख अमेरिकी खुफिया एजेंसी कि त्योरियां चढ़ी और इस आन्दोलन को ख़त्म करने के लिए भारत के अन्दर से विभीषण खोजे गए .
हालाँकि यह काम पहले से ही जारी था ..किन्तु मध्य पूर्व में हस्तक्षेप और ओपेक कि दादागिरी को नकेल कसने के बहाने अमेरिका ने शीत युद्ध कि आड़ में एक तीर से कई निशाने साधे .पहले तो दुनिया के अधिकांस देशों में जैचंद तैयार किये ,फिर कल्याणकारी -सोसल वेल्फैर स्टेट के नाम पर सर्वहारा में फूट डाली ,उन्हें वर्गों -जातियों और साम्प्रदायिकता के द्वन्द में बड़ी चालाकी से उलझा दिया .ऐसे घृणित कार्यों के लिए बाकायदा अमेरिकी सीनेट से बजट मंजूर किये जाते रहे हैं .उन्ही को आधुनिक वनाकर अब अद्द्य्तन रूप में सक्रीय किया जा रहा है .
यह आम धारणा है कि किसी संप्रभु स्वतंत्र राष्ट्र कि विदेश नीति -उस राष्ट्र के बहुमत जन -गणों ,शक्तिशाली सामाजिक समूहों के दवाव और प्रभाव से परिचालित होती है .किन्तु अमेरिकी नीति के विशेषज्ञ अब एक्सपोज होते जा रहे हैं .अब यह कोई रहस्य नहीं रह गया कि पेंटागन ,वाल स्ट्रीट और व्हाईट हाउस को निर्देशित करने वाली लोबी ,दुनिया भर में विभिन्न राष्ट्रों के आपसी संबंधों में अपने आर्थिक साम्राज्वाद के हितों को शिद्दत से प्राथमिकता देती है .इनके सलाहकार समूहों में पूर्व राजनयिक और खुर्राट सी आई ये अफसरों कि युति हुआ करती है .अभी अमेरिकी राष्ट्रपति श्रीमान ओबामा भारत पधारे हैं .उनके आगमन कि पूर्व वेला में भारत और चीन से सम्बंधित एक बयान श्री ब्लैक बिल का आया है .उनके बयान से उक्त तथ्यों कि पुष्टि स्वतः हो जाती है .
अमेरिका में "कोंसिल आन फारेन रिलसंस"जैसी कुख्यात संस्था के एक सदस्य श्री -ब्लैक बिल ऐसे अकेले भारत मित्र {?] नहीं हैं .एक ढूढ़ो सेकड़ों मिल जायेंगे .अमेरिका के भारत में पूर्व राजदूत रावर्ट ब्लैक बिल ने फ़रमाया है कि मैं भारत के सामरिक चिंतकों से सहमत हूँ कि चीन भारत के उदय को रोकने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है .उन्होंने ये भी कहा कि इन घटनाओं का ताल्लुक कश्मीर पर चीन कि नीति और पुरातन भारत -चीन सीमा विवाद है .उनका यह अन्वेषण कि चीन पकिस्तान के कंधे पर बन्दुक रखकर दोनों पड़ोसियों को उलझाये रखना चाहता है .सही भी है किन्तु प्रश्न ये है कि फिर ओबामा जी भारत आकर इसमें हमारी मदद कर रहें है या अपने आर्थिक संकट का ठीकरा हमारे सर फोड़ने कि जुगत भिड़ा रहे हैं .चीन का भारत से आगे निकल जाने का हौआ कौन खड़ा कर रहा है ?किसका स्वार्थ सध रहा है ? ब्लैक बिल कि मीठी -मीठी बातों में हमें नहीं आना चाहिए .हमारे प्रधान मंत्री जी ने विगत मुलाकात में चीन के प्रधान मंत्री वैन च्या पाओ से मुलाकात कर आपसी मसलों पर चर्चा की है .भारत का नेतृत्व हर मामले में स्वयम सक्षम है जरुरत पड़ी तो चीन से सख्ती के साथ भी पेश आ सकते हैं . .भारत को ओबामा से चीन के बारे में नहीं .बल्कि अमेरिका द्वारा भारत के खिलाफ किये जा रहे अन्याय पर चर्चा केन्द्रित करनी चाहिए और हेडली जैसे गद्दारों को भारत की अदालत के समक्ष पेश करना चाहिए . सम्भव हो तो पकिस्तान और भारत के बीच संघर्ष टालने की कोशिस करने के लिए कम से कम पकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविर बंद होने चाहिए .
हालाँकि यह काम पहले से ही जारी था ..किन्तु मध्य पूर्व में हस्तक्षेप और ओपेक कि दादागिरी को नकेल कसने के बहाने अमेरिका ने शीत युद्ध कि आड़ में एक तीर से कई निशाने साधे .पहले तो दुनिया के अधिकांस देशों में जैचंद तैयार किये ,फिर कल्याणकारी -सोसल वेल्फैर स्टेट के नाम पर सर्वहारा में फूट डाली ,उन्हें वर्गों -जातियों और साम्प्रदायिकता के द्वन्द में बड़ी चालाकी से उलझा दिया .ऐसे घृणित कार्यों के लिए बाकायदा अमेरिकी सीनेट से बजट मंजूर किये जाते रहे हैं .उन्ही को आधुनिक वनाकर अब अद्द्य्तन रूप में सक्रीय किया जा रहा है .
यह आम धारणा है कि किसी संप्रभु स्वतंत्र राष्ट्र कि विदेश नीति -उस राष्ट्र के बहुमत जन -गणों ,शक्तिशाली सामाजिक समूहों के दवाव और प्रभाव से परिचालित होती है .किन्तु अमेरिकी नीति के विशेषज्ञ अब एक्सपोज होते जा रहे हैं .अब यह कोई रहस्य नहीं रह गया कि पेंटागन ,वाल स्ट्रीट और व्हाईट हाउस को निर्देशित करने वाली लोबी ,दुनिया भर में विभिन्न राष्ट्रों के आपसी संबंधों में अपने आर्थिक साम्राज्वाद के हितों को शिद्दत से प्राथमिकता देती है .इनके सलाहकार समूहों में पूर्व राजनयिक और खुर्राट सी आई ये अफसरों कि युति हुआ करती है .अभी अमेरिकी राष्ट्रपति श्रीमान ओबामा भारत पधारे हैं .उनके आगमन कि पूर्व वेला में भारत और चीन से सम्बंधित एक बयान श्री ब्लैक बिल का आया है .उनके बयान से उक्त तथ्यों कि पुष्टि स्वतः हो जाती है .
अमेरिका में "कोंसिल आन फारेन रिलसंस"जैसी कुख्यात संस्था के एक सदस्य श्री -ब्लैक बिल ऐसे अकेले भारत मित्र {?] नहीं हैं .एक ढूढ़ो सेकड़ों मिल जायेंगे .अमेरिका के भारत में पूर्व राजदूत रावर्ट ब्लैक बिल ने फ़रमाया है कि मैं भारत के सामरिक चिंतकों से सहमत हूँ कि चीन भारत के उदय को रोकने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है .उन्होंने ये भी कहा कि इन घटनाओं का ताल्लुक कश्मीर पर चीन कि नीति और पुरातन भारत -चीन सीमा विवाद है .उनका यह अन्वेषण कि चीन पकिस्तान के कंधे पर बन्दुक रखकर दोनों पड़ोसियों को उलझाये रखना चाहता है .सही भी है किन्तु प्रश्न ये है कि फिर ओबामा जी भारत आकर इसमें हमारी मदद कर रहें है या अपने आर्थिक संकट का ठीकरा हमारे सर फोड़ने कि जुगत भिड़ा रहे हैं .चीन का भारत से आगे निकल जाने का हौआ कौन खड़ा कर रहा है ?किसका स्वार्थ सध रहा है ? ब्लैक बिल कि मीठी -मीठी बातों में हमें नहीं आना चाहिए .हमारे प्रधान मंत्री जी ने विगत मुलाकात में चीन के प्रधान मंत्री वैन च्या पाओ से मुलाकात कर आपसी मसलों पर चर्चा की है .भारत का नेतृत्व हर मामले में स्वयम सक्षम है जरुरत पड़ी तो चीन से सख्ती के साथ भी पेश आ सकते हैं . .भारत को ओबामा से चीन के बारे में नहीं .बल्कि अमेरिका द्वारा भारत के खिलाफ किये जा रहे अन्याय पर चर्चा केन्द्रित करनी चाहिए और हेडली जैसे गद्दारों को भारत की अदालत के समक्ष पेश करना चाहिए . सम्भव हो तो पकिस्तान और भारत के बीच संघर्ष टालने की कोशिस करने के लिए कम से कम पकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविर बंद होने चाहिए .
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
हेप्पी-दीपावली मिस्टर बराक़ ओबामा.
श्रीमान .बराक हुसेन ओबामा साहिब -भारत तशरीफ़ ला रहे हैं . ६ -नवम्बर २०१० को वे मुंबई प्रवास करेंगे .वे ५ वें अमेरिकी राष्ट्रपति है जो भारत कि सरजमीं पर अपने अ -पावन चरण रखेंगे . मीडिया में उनकी इस यात्रा के बारे में काफी कुछ कहा -सुना ,लिखा -पढ़ा जा रहा है .उनके पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों कि बड़ी चर्चा है .कि वे ताज में ठहरेंगे ,भारत में दीवाली मनाएंगे और भारत कि संसद को संबोधित करेंगे .इत्यादि ..इत्यादि ..
श्री ओबामा का यह भारत आगमन ठीक ऐसे समय में हो रहा है जबकि अमेरिकी पूंजीवादीअर्थ तन्त्र के शिल्पकार न केवल अपनी अस्मत अपितु रोजी रोटी कि चिंता में यूरोप को भी शामिल करते हुए उस सर्वग्रासी आर्थिक संकट के जुए का अतिरिक्त भार भारत जैसे विकाशशील देशों के कन्धों पर डालने कि प्लानिंग में रात -दिन जुटे हुए हैं . इससे पूर्व जनाब बुश साहब कि जागतिक -आक्रामक साम्र्ज्वादी नीति से लहू लुहान अमेरिकी जनता ने देमोक्रट्स प्रत्यासी मिस्टर ओबामा को इस आशा से चुना था कि वे अमेरिकी छतरी के नीचे तात्कालिक वित्तीय अमन कायम करें .सो वे यही प्रयास सफल बनाने के लिए अपने साथ १५० टॉप पूंजीपतियों का विशाल काफिला लेकर भारत पधार रहें
भारत के खिलाफ अमेरिकी कूट षड्यंत्रों कि कलुषित स्याही से अतीत का हिस्सा बेहद बदरंग हो चुका है .अब इस काली कंबली पर दूजा रंग चढ़ाये जाने के असफल प्रयाश किये जा रहे हैं .श्री ओबामा क़ी नीति शुरू से ही भारत विरोधी रही है .सूचना प्रोद्दोगिकी क्षेत्र में उन्होंने अमेरिकी नौजवानों को नौकरियां देने के बहाने भारत जैसे देशों क़ी आउट सोर्सिंग बंद करदेने का आह्वान कई दफे किया है .अब वे वीजा क़ी फीस बढाने क़ी बात करने लगे हैं .उधर G -७ओर जी २० के मध्य हुए पर्यवार्नीय करारों और आयात शुल्क में क़ी जा रही एकतरफा बढ़ोत्तरी को अनुपात मुक्त किये जाने को लेकर चीनऔर ओपेक देशों द्वारा किये जा रहे एकतरफा अवरोधों पर अमेरिका का कोई वश नहीं चल पा रहा है . लगता है क़ी जमाने भर क़ी वैश्विक इमानदारी का ठेका हमने {भारत}ही ले रखा है
कोई अदना सा साक्षर व्यक्ति भी इन मंतव्यों के निहितार्थ समझ सकता है .जैसे क़ी इन क़दमों से भारत में वेरोजगारी बढ़ेगी ,भारतीय सूचना एवं तकनीकी कम्पनियों से बाज़ार जाता रहेगा ,उनके राजस्व में गिरावट का परिणाम होगा छटनी और बेकारी .श्री ओबामा के साथ जो १५० कम्नियों के C E O आ रहे हैं वे सभी बहुरास्ट्रीय कम्पनियों के मालिक में से ही हैं .वे सभी मिलकर भारत सरकार पर दवाव बनायेंगे क़ी आर्थिक सुधार ?{विनाश }क़ी प्रक्रिया तेज करो ताकि अमेरिकी शेष सब प्राइम संकट का कुछ हिस्सा भारत भी वहन करे .भारत को ऐसा क्यों करना चाहिए ? वैसे भारत में धन धान्य क़ी प्रचुरता के वावजूद ६० करोड़ नंगे भून्खों क़ी विशाल मर्मान्तक भीड़ मौजूद है .ऐसा क्यों ?यह प्रश्न करना भी अब दूभर बना दिया गया है .पीड़ित जनता चुप रहे ,रूखी सूखी खाय कें खुश रहे ,"संतोषम परम सुखं "का शंखनाद करे सो सारे देश में मक्कार -मसखरे -निठ्ल्ल्ये बाबाओं को खाद पानी दिया जा रहा है .कोई मंदिर बाला बाबा है ,कोई मस्जिद बाला कोई जड़ी वूटी बाला और कोई योगासन वाला .सारा निम्न माध्यम वर्ग अपनी चिंताओं का निदान प्राण -अपान-व्यान -उदानऔर सामान में देखने लगा है ...
सरकारी सार्वजानिक उपक्रमों को खरीदने आ रहे विदेशी मुनाफाखोर भारत क़ी धरती पर दीवाली मनाएंगे .हम और हमारे तमाम सूचना माध्यम सिर्फ उन्हें देखेंगे -पढेंगे -सुनेंगे और अच्छे अनुशाषित छात्र क़ी तरह यस सर बोलेंगे .
इकवाल ने ७० साल पहले ही चेता दिया था ...
वतन क़ी फ़िक्र कर नादाँ मुसीवत आने वाली है ....
तेरी बर्वादियों के मशविरे हैं आसमानों में .....
न संभलोगे तो मिट जाओगे ,हिन्दोस्तान वालो ...
तुम्हारी दास्तान तक भी न होगी दस्तानो में ......
सभी मित्रों ,सपरिजनों ,ब्लोगरों पाठकों तथा साहित्यकारों को दीपावली -प्रकाश पर्व क़ी शुभकामनायें .....श्रीराम तिवारी
श्री ओबामा का यह भारत आगमन ठीक ऐसे समय में हो रहा है जबकि अमेरिकी पूंजीवादीअर्थ तन्त्र के शिल्पकार न केवल अपनी अस्मत अपितु रोजी रोटी कि चिंता में यूरोप को भी शामिल करते हुए उस सर्वग्रासी आर्थिक संकट के जुए का अतिरिक्त भार भारत जैसे विकाशशील देशों के कन्धों पर डालने कि प्लानिंग में रात -दिन जुटे हुए हैं . इससे पूर्व जनाब बुश साहब कि जागतिक -आक्रामक साम्र्ज्वादी नीति से लहू लुहान अमेरिकी जनता ने देमोक्रट्स प्रत्यासी मिस्टर ओबामा को इस आशा से चुना था कि वे अमेरिकी छतरी के नीचे तात्कालिक वित्तीय अमन कायम करें .सो वे यही प्रयास सफल बनाने के लिए अपने साथ १५० टॉप पूंजीपतियों का विशाल काफिला लेकर भारत पधार रहें
भारत के खिलाफ अमेरिकी कूट षड्यंत्रों कि कलुषित स्याही से अतीत का हिस्सा बेहद बदरंग हो चुका है .अब इस काली कंबली पर दूजा रंग चढ़ाये जाने के असफल प्रयाश किये जा रहे हैं .श्री ओबामा क़ी नीति शुरू से ही भारत विरोधी रही है .सूचना प्रोद्दोगिकी क्षेत्र में उन्होंने अमेरिकी नौजवानों को नौकरियां देने के बहाने भारत जैसे देशों क़ी आउट सोर्सिंग बंद करदेने का आह्वान कई दफे किया है .अब वे वीजा क़ी फीस बढाने क़ी बात करने लगे हैं .उधर G -७ओर जी २० के मध्य हुए पर्यवार्नीय करारों और आयात शुल्क में क़ी जा रही एकतरफा बढ़ोत्तरी को अनुपात मुक्त किये जाने को लेकर चीनऔर ओपेक देशों द्वारा किये जा रहे एकतरफा अवरोधों पर अमेरिका का कोई वश नहीं चल पा रहा है . लगता है क़ी जमाने भर क़ी वैश्विक इमानदारी का ठेका हमने {भारत}ही ले रखा है
कोई अदना सा साक्षर व्यक्ति भी इन मंतव्यों के निहितार्थ समझ सकता है .जैसे क़ी इन क़दमों से भारत में वेरोजगारी बढ़ेगी ,भारतीय सूचना एवं तकनीकी कम्पनियों से बाज़ार जाता रहेगा ,उनके राजस्व में गिरावट का परिणाम होगा छटनी और बेकारी .श्री ओबामा के साथ जो १५० कम्नियों के C E O आ रहे हैं वे सभी बहुरास्ट्रीय कम्पनियों के मालिक में से ही हैं .वे सभी मिलकर भारत सरकार पर दवाव बनायेंगे क़ी आर्थिक सुधार ?{विनाश }क़ी प्रक्रिया तेज करो ताकि अमेरिकी शेष सब प्राइम संकट का कुछ हिस्सा भारत भी वहन करे .भारत को ऐसा क्यों करना चाहिए ? वैसे भारत में धन धान्य क़ी प्रचुरता के वावजूद ६० करोड़ नंगे भून्खों क़ी विशाल मर्मान्तक भीड़ मौजूद है .ऐसा क्यों ?यह प्रश्न करना भी अब दूभर बना दिया गया है .पीड़ित जनता चुप रहे ,रूखी सूखी खाय कें खुश रहे ,"संतोषम परम सुखं "का शंखनाद करे सो सारे देश में मक्कार -मसखरे -निठ्ल्ल्ये बाबाओं को खाद पानी दिया जा रहा है .कोई मंदिर बाला बाबा है ,कोई मस्जिद बाला कोई जड़ी वूटी बाला और कोई योगासन वाला .सारा निम्न माध्यम वर्ग अपनी चिंताओं का निदान प्राण -अपान-व्यान -उदानऔर सामान में देखने लगा है ...
सरकारी सार्वजानिक उपक्रमों को खरीदने आ रहे विदेशी मुनाफाखोर भारत क़ी धरती पर दीवाली मनाएंगे .हम और हमारे तमाम सूचना माध्यम सिर्फ उन्हें देखेंगे -पढेंगे -सुनेंगे और अच्छे अनुशाषित छात्र क़ी तरह यस सर बोलेंगे .
इकवाल ने ७० साल पहले ही चेता दिया था ...
वतन क़ी फ़िक्र कर नादाँ मुसीवत आने वाली है ....
तेरी बर्वादियों के मशविरे हैं आसमानों में .....
न संभलोगे तो मिट जाओगे ,हिन्दोस्तान वालो ...
तुम्हारी दास्तान तक भी न होगी दस्तानो में ......
सभी मित्रों ,सपरिजनों ,ब्लोगरों पाठकों तथा साहित्यकारों को दीपावली -प्रकाश पर्व क़ी शुभकामनायें .....श्रीराम तिवारी
सोमवार, 1 नवंबर 2010
साम्यवाद का सूर्यास्त कभी नहीं होगा...
विगत २००७ के दरम्यान जब अमेरिकी पूँजी वादी साम्राज चरमराकर -भरभराकर ,भू लुंठित हो रहा था और एक के बाद एक कार्पोरेट कम्पनी -बैंक बीमा दिवालिया घोषित किये जा रहे थे ,तब लातीनी अमेरिका में समानांतर वित्तीय व्यवस्था के प्रयोजनार्थ न केवल प्रयाश तेज किये जा रहे थे बल्कि "बैंको देल -ओ -सूर "नामक विश्व स्तरीय बैंक कि स्थापना भी कि जा रही थी . विशेष तौर पर वेनेजुएला ,अलसल्वाडोर ,वोलिविया ,चिली तथा ब्राजील कि वाम -जनवादी -कतारों ने इसमें बेहतर योगदान दिया .विश्व राजनीती के विश्लेषक -वुद्धिजीवी ,एवं पूंजीवादी अर्थशाष्त्री ........
हैरान हैं कि सोवियत संघ में प्रतिक्रांति के वावजूद ,चीन में पूंजीवादी सुधारों के बरक्स्स दक्षिण अमेरिकी देशों में वामपंथ या साम्यवाद कि बयार क्यों बह रही है ? वेनेजुएला के राष्ट्रपति कॉम .ह्यूगो चवेज ,क्यूबा के महानायक कॉम .फिदेल कास्त्रो तो अमेरिका कि नाक में दाम कर ही रहे थे अब ब्राजील में भी एतिहासिक राजनेतिक परिवर्तन कि संभावनाएं तेज होती जा रहीं हैं .
ब्राजील में -एक पूर्व मार्क्सवादी गैरिल्ला एक्टिविस्ट सुश्री दीलिमा रूसेफ़ को वहां के राष्ट्रपति के चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल हुयी है .वे ब्राजील कि पहली महिला राष्ट्रपति होंगीं .ब्राजील के सुप्रीम एल्क्ट्रोरल कोर्ट ने इस आशय कि अधिसूचना कल १ नवम्बर २०१० को जारी कर दी है . वे १ जनवरी से देश का शाशन संभालेंगी .सुश्री रुसेफ़ को ५७ %मत प्राप्त हुए हैं .
भारत और विश्व सर्वहारा के लिए यह एक आशाजनक स्फूर्तिदायक सन्देश होगा .जो क्रांती कि ताकतों को एकजुट संघर्ष के लिए प्रेनास्पद होगा ....साम्यवाद एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो न केवल महनत करने वालों का अपितु सारी मानवता का सर्वांग सार्वदेशिक हितेषी है ,जिसका अस्तित्व कभी ख़त्म नहीं होगा .इसका सूरज कभी नहीं डूबता ....श्रीराम तिवारी ....
हैरान हैं कि सोवियत संघ में प्रतिक्रांति के वावजूद ,चीन में पूंजीवादी सुधारों के बरक्स्स दक्षिण अमेरिकी देशों में वामपंथ या साम्यवाद कि बयार क्यों बह रही है ? वेनेजुएला के राष्ट्रपति कॉम .ह्यूगो चवेज ,क्यूबा के महानायक कॉम .फिदेल कास्त्रो तो अमेरिका कि नाक में दाम कर ही रहे थे अब ब्राजील में भी एतिहासिक राजनेतिक परिवर्तन कि संभावनाएं तेज होती जा रहीं हैं .
ब्राजील में -एक पूर्व मार्क्सवादी गैरिल्ला एक्टिविस्ट सुश्री दीलिमा रूसेफ़ को वहां के राष्ट्रपति के चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल हुयी है .वे ब्राजील कि पहली महिला राष्ट्रपति होंगीं .ब्राजील के सुप्रीम एल्क्ट्रोरल कोर्ट ने इस आशय कि अधिसूचना कल १ नवम्बर २०१० को जारी कर दी है . वे १ जनवरी से देश का शाशन संभालेंगी .सुश्री रुसेफ़ को ५७ %मत प्राप्त हुए हैं .
भारत और विश्व सर्वहारा के लिए यह एक आशाजनक स्फूर्तिदायक सन्देश होगा .जो क्रांती कि ताकतों को एकजुट संघर्ष के लिए प्रेनास्पद होगा ....साम्यवाद एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो न केवल महनत करने वालों का अपितु सारी मानवता का सर्वांग सार्वदेशिक हितेषी है ,जिसका अस्तित्व कभी ख़त्म नहीं होगा .इसका सूरज कभी नहीं डूबता ....श्रीराम तिवारी ....
भारत और इंडिया मे दूरी बढ़ती जा रही है-कब वापिस आओगे मास्टर बाबूलाल...
बात उन दिनों की है जब हम मिडिल स्कूल में पड़ा करते थे तब भारत और इंडिया का एक ही मतलब हुआ करता था .यही सीखा था हमने डॉ बाबूलाल से ...उस जमाने में दुनिया भर की ख़बरें बाबूलाल मास्टर के द्वारा हमें ताजातरीन मिल जाया करतीं थींचीन पकिस्तान अमेरिका और सोवियत संघ के बारे में ,कश्मीर के बारे में ,जनसंघ ,कांग्रेस और साम्यवादियों के बारे में .मास्टर बाबूलाल को उस ठेठ देहात में इतना ज्ञान था कि आज के विनोद दुआ और योगेश यादव भी शर्मा जाएँ .वाल तेर . गेरिबल्दी से लेकर सुमित्रानंदन पन्त पर रास्ते में खड़े खड़े अच्छी खासी गोष्ठी हो जाया करते थी वन मेन आर्मी जैसे थे हमारे मास्टर बाबूलाल ..वे जाति के कहार या रेकुवार थे किन्तु पता नहीं कब -किसने -कहाँ प्रभावित किया सो -केश ,कंघा ,कड़ा,कच्छ और कटार धारण कर पता नहीं कहाँ-कहाँ क्या -क्या करते फिरते थे अलवत्ता वे विना डिग्री के इलाकाई एलोपेथिक डाक्टर हुआ करते थे .उन्होंने तीन शादियाँ की थीं .पहली खांटी देहातिन होने से कुछ दुराव हुआ सो दूसरी थोड़ी मोर्डन याने छुत्कौवल साड़ी पहिनने वाली सुन्दरी ले आये .इसके अलावा एक और चीज थी जो उन्हें इस धरती पर सबसे अधिक प्रिय थी -वो थी उनकी १२ बोर की बन्दूक -जिसे वे मजाक में तीसरी बेगम कहा करते थे .उनका व्यक्तित्व बब्बर शेर जैसा था .आसपास के १०० कोस के दायरे में वे एकमात्र चिकित्सक ,एकमात्र सरदार .एकमात्र भगोड़े मास्टर थे .
भगोड़े इसलिए की सरकारी टीचेरशिप से उन्हें वर्खास्त किया गया था .यह किसी को नहीं मालूम की क्यों ? उनके लड़के भी उनसे ज्यादा लम्बे तड़ंगे और महा पातकी निकले .एक सरदार बनकर डाक्टरी करते करते कई बार जेल हो आया .एक ने कई महिलाओं का जीवन बर्बाद किया ,एक ने मानसिक संत्राश से प्रेरित होकर आत्महत्या कर ली .एक दो ने झोला छाप डाक्टरी या कस्बाई पत्रकार बनकर इलाके में अपने बाप का नाम रोशन किया .इस प्रकार डाक्टर बाबूलाल की लगभग आधा दर्जन ओलादें होते हुए भी वे बुढ़ापे में दर- दर की ठोकरें खाने को अभिशप्त थे -सो वे स्वयम डाक्टर होते हुए भी इन महा ब्याधियों के शिकार होकर परमात्मा को प्यारे हो गए ..
डाक्टर बाबूलाल का सामान्य ज्ञान उत्क्रष्ट था भले ही उनका रहन सहन निकृष्ट था . गाँव में उस समय दूरदर्शन ,अखवार का नामोनिशान नहीं था सिर्फ दो रेडियो थे एक -सिघई गुलाबचंद {सरपंच एवं जैन मंदिर त्र्श्ती ]
दूसरा डॉ बाबूलाल जी के यहाँ .में जिस रास्ते से स्कूल जाता था उस रास्ते पर इन दोनों के मकान पड़ते थे .अतः जब हम तीन -चार भाई एक टोली के रूप में घर से निकलते तो पहले डॉ बाबूलाल जी को भाई साब जैरामजी करते और बदले में वे एक दो ताज़ा समाचार हम लोगों की और हवा में यों उछालते मानों मंदिर में प्रसाद बाँट रहे हों .इस तरह कक्षा ५ वीं से लेकर ८ वीं तक के सफ़र में डॉ बाबूलाल ने हम सभी को तत्कालीन सामान्य ज्ञान में इतना आप्लावित कर दिया कि जो ६ वीं में पढता था वो ८ वीं से ज्यादा जानने लगता था .स्कूल का अनुशाशन काबिले तारीफ था .यह अलहदा बात है कि डॉ बाबूलाल सरकारी शिक्षक नहीं थे किन्तु जब कभी उन्हें अपने चिकित्सीय पेशे से फुर्सत मिलती वे गाँव के अपढ़ लोगों को भी शिक्षित करते .भारत में आजादी के बाद नेहरु युग में जो भी घटा वो सब हमें आज भी अक्षरश ;याद हैक्योंकि यह उसी दौर का आख्यान है .जो स्कूली ज्ञानहुआ करता था वो तो डंडे के डर पर हमें याद करना ही होता था किन्तु साहित्य क्या है ,कला क्या है राजनीत क्या है ये भी हमें जानना चाहिए .जब हम पूंछते थे कि क्यों ?तो जबाब होता था कि इसलिए कि यदि कभी मेरी तरह एक जगह से बर्खास्त कर दिए जाओ तो दूसरी जगहआसानी से फिट हो जाओ ..आज के शिक्षक गाँव में रहना पसंद नहीं करते ,स्कूलों में गाय ढ़ोरों जैसे स्थिति है ,छात्र और शिक्षक एक दुसरे से तिकड़में भिडाकर टूशन और पास होने कि गारंटी में लिप्त हैं यही वजह है कि आज गाँव का छात्र बेहद पिछड़ गया है जबकि शहरों में बुर्जुआ वर्ग के पास भ्रष्टाचार से प्राप्त आकूत आमदनी है अतह जबकि आज के शिक्षकों को मोटी पगार और बेहतर भत्ते के अलावा पेंशन इत्यादि कि गारंटी है किन्तु वहां न तो पुस्तकालय हैं न प्रयोगशालाएं हैं और न ही आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के संसाधन . यह देश कि ७० प्रतिशत ग्रामीण जनता के प्रति वर्तमान दौर कि पतनशील पूंजीवादी छल्नात्म्क व्यवस्था का ही दोष है कि सरकारी -गैरसरकारी क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों का और खास तौर से हिदी भाषी भारत में भय भूंख और भृष्टाचार से पीड़ित युवाओं का प्रतिशत नगण्य है .
जिन गाँवों में आजादी के ६० साल बाद भी पीने योग्य पानी उपलब्ध नहीं .एक प्रशिक्षित डॉ नहीं, पोलिस नहीं ,डाकखाना नहीं, मोटर या ट्रेन का साधन नहीं ,वहां का युवा छात्र या नौजवान ,यदि किसी तरह कोई योग्यता परीक्षा पास कर भी ले या कोई इंटरव्यू में निकल भी जाए तो वह या तो गाँव में तारीख पर पत्र नहीं मिलपाने से या शहर पहुँचने कि असुविधा के कारण इंडिया के साथ नहीं चाल पा रहा है अब तो गाँवों में चौतरफा गृह युद्ध छिड़े हुए हैं ..जात -पांत में तो पहले भी ग्रामीण समाज अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था अब तो घर घर में राजनीती .साम्प्रदायिकता और जर -जोरू -जमीन के झगडे बेतहाशा बढ़ते जा रहे हैं .अधिकांश राजनेतिक दलों ने गाँव कि गरीव जनता को केवल वोट बैंक समझ कर भू स्वामियों और वैश्वीकरण के लुटेरे हाथों में पिसने के लिए मजबूर कर दिया है ...गाँव के किसानो .खेतिहर मजदूरों और कारीगरों को एकजुट कर बंगाल और केरल तथा त्रिपुरा कि वाम पंथी सरकारों ने पूरे भारत को नई राह दिखाई है .वाम शाशित तीनों राज्यों में भले ही और कोई शिकायत हो किन्तु साक्षरता और कन्या संरक्षण में इनका काम काबिले तारीफ है .
भगोड़े इसलिए की सरकारी टीचेरशिप से उन्हें वर्खास्त किया गया था .यह किसी को नहीं मालूम की क्यों ? उनके लड़के भी उनसे ज्यादा लम्बे तड़ंगे और महा पातकी निकले .एक सरदार बनकर डाक्टरी करते करते कई बार जेल हो आया .एक ने कई महिलाओं का जीवन बर्बाद किया ,एक ने मानसिक संत्राश से प्रेरित होकर आत्महत्या कर ली .एक दो ने झोला छाप डाक्टरी या कस्बाई पत्रकार बनकर इलाके में अपने बाप का नाम रोशन किया .इस प्रकार डाक्टर बाबूलाल की लगभग आधा दर्जन ओलादें होते हुए भी वे बुढ़ापे में दर- दर की ठोकरें खाने को अभिशप्त थे -सो वे स्वयम डाक्टर होते हुए भी इन महा ब्याधियों के शिकार होकर परमात्मा को प्यारे हो गए ..
डाक्टर बाबूलाल का सामान्य ज्ञान उत्क्रष्ट था भले ही उनका रहन सहन निकृष्ट था . गाँव में उस समय दूरदर्शन ,अखवार का नामोनिशान नहीं था सिर्फ दो रेडियो थे एक -सिघई गुलाबचंद {सरपंच एवं जैन मंदिर त्र्श्ती ]
दूसरा डॉ बाबूलाल जी के यहाँ .में जिस रास्ते से स्कूल जाता था उस रास्ते पर इन दोनों के मकान पड़ते थे .अतः जब हम तीन -चार भाई एक टोली के रूप में घर से निकलते तो पहले डॉ बाबूलाल जी को भाई साब जैरामजी करते और बदले में वे एक दो ताज़ा समाचार हम लोगों की और हवा में यों उछालते मानों मंदिर में प्रसाद बाँट रहे हों .इस तरह कक्षा ५ वीं से लेकर ८ वीं तक के सफ़र में डॉ बाबूलाल ने हम सभी को तत्कालीन सामान्य ज्ञान में इतना आप्लावित कर दिया कि जो ६ वीं में पढता था वो ८ वीं से ज्यादा जानने लगता था .स्कूल का अनुशाशन काबिले तारीफ था .यह अलहदा बात है कि डॉ बाबूलाल सरकारी शिक्षक नहीं थे किन्तु जब कभी उन्हें अपने चिकित्सीय पेशे से फुर्सत मिलती वे गाँव के अपढ़ लोगों को भी शिक्षित करते .भारत में आजादी के बाद नेहरु युग में जो भी घटा वो सब हमें आज भी अक्षरश ;याद हैक्योंकि यह उसी दौर का आख्यान है .जो स्कूली ज्ञानहुआ करता था वो तो डंडे के डर पर हमें याद करना ही होता था किन्तु साहित्य क्या है ,कला क्या है राजनीत क्या है ये भी हमें जानना चाहिए .जब हम पूंछते थे कि क्यों ?तो जबाब होता था कि इसलिए कि यदि कभी मेरी तरह एक जगह से बर्खास्त कर दिए जाओ तो दूसरी जगहआसानी से फिट हो जाओ ..आज के शिक्षक गाँव में रहना पसंद नहीं करते ,स्कूलों में गाय ढ़ोरों जैसे स्थिति है ,छात्र और शिक्षक एक दुसरे से तिकड़में भिडाकर टूशन और पास होने कि गारंटी में लिप्त हैं यही वजह है कि आज गाँव का छात्र बेहद पिछड़ गया है जबकि शहरों में बुर्जुआ वर्ग के पास भ्रष्टाचार से प्राप्त आकूत आमदनी है अतह जबकि आज के शिक्षकों को मोटी पगार और बेहतर भत्ते के अलावा पेंशन इत्यादि कि गारंटी है किन्तु वहां न तो पुस्तकालय हैं न प्रयोगशालाएं हैं और न ही आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के संसाधन . यह देश कि ७० प्रतिशत ग्रामीण जनता के प्रति वर्तमान दौर कि पतनशील पूंजीवादी छल्नात्म्क व्यवस्था का ही दोष है कि सरकारी -गैरसरकारी क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों का और खास तौर से हिदी भाषी भारत में भय भूंख और भृष्टाचार से पीड़ित युवाओं का प्रतिशत नगण्य है .
जिन गाँवों में आजादी के ६० साल बाद भी पीने योग्य पानी उपलब्ध नहीं .एक प्रशिक्षित डॉ नहीं, पोलिस नहीं ,डाकखाना नहीं, मोटर या ट्रेन का साधन नहीं ,वहां का युवा छात्र या नौजवान ,यदि किसी तरह कोई योग्यता परीक्षा पास कर भी ले या कोई इंटरव्यू में निकल भी जाए तो वह या तो गाँव में तारीख पर पत्र नहीं मिलपाने से या शहर पहुँचने कि असुविधा के कारण इंडिया के साथ नहीं चाल पा रहा है अब तो गाँवों में चौतरफा गृह युद्ध छिड़े हुए हैं ..जात -पांत में तो पहले भी ग्रामीण समाज अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था अब तो घर घर में राजनीती .साम्प्रदायिकता और जर -जोरू -जमीन के झगडे बेतहाशा बढ़ते जा रहे हैं .अधिकांश राजनेतिक दलों ने गाँव कि गरीव जनता को केवल वोट बैंक समझ कर भू स्वामियों और वैश्वीकरण के लुटेरे हाथों में पिसने के लिए मजबूर कर दिया है ...गाँव के किसानो .खेतिहर मजदूरों और कारीगरों को एकजुट कर बंगाल और केरल तथा त्रिपुरा कि वाम पंथी सरकारों ने पूरे भारत को नई राह दिखाई है .वाम शाशित तीनों राज्यों में भले ही और कोई शिकायत हो किन्तु साक्षरता और कन्या संरक्षण में इनका काम काबिले तारीफ है .
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
हिंदू धर्म को अपडेट या पुनर्भाषित किए जाने की आवश्यकता...
विगत ३० सतम्बर २०१० के बाद देश में आसन्न चुनौतियों की सूची में -जो विषय अभी तक बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समाजों के द्वंदात्मक विमर्श का कारण था -वो वरीयता में अब नहीं रहा .मंदिर -मस्जिद विवाद वैसे भी आस्था के दो नामों ,दो पूजा पद्धतियों ,दो बिरादर्यों और दो दुर्घटनाओं की एतिहासिक द्वंदात्मक संघर्स यात्रा का नामकरण मात्र है .दो भिन्न पूजा पद्धतियों में से एक है इस्लाम ...दूसरी है भारतीय सनातन धर्म याने भारत की सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक ,धार्मिक परंपराजिसे वर्तमान में हिदुत्वा के नाम से पुकारा जाता है और यह नया नामकरण भारत पर बाहरी आक्रान्ताओं ने थोपा था जिसका श्रीमद भगवद्गीता ,बाल्मीकी रामायण वैद उपनिषद तो बड़ी चीजें हैं किन्तु मुगलकाल में सृजित लोकभाषा के महान ग्रुन्थ रामचरित मानस में भी हिन्दू शब्द का रंचमात्र जिक्र नहीं है .इस्लाम के बारे मेंयदि हिन्दुओं कोसही -सही जानकारी होती और भारतीय पुरातन -सनातन पूजा पद्धति के बारे में मुसलमानों को सही जानकारी होती तो भारत में भी -महास्थिवर मोहम्मद हुए होते और इंडोनेसिया जैसी एक वास्तविक गंगा -जमुनी तहजीव का भारत में भी सकारात्मक आविर्भाव सम्भव हो गया होता .विगत शताब्दी तो दुनिया ने दो महान क्रांतियों को समर्पित कर दी थी .एक -उपनिवेशवाद का खत्म .दो -सर्वहारा क्रांति .वर्तमान २१ वीं शताब्दी में दो चीजें एक साथ जारी है , एक -सभ्यताओं का संघर्ष ,दो -नव उपनिवेशवाद अर्थात पूँजी का वैश्वीकरण ...ये दोनों ही अवतार शैतानियत के गुणों से सान्निध हैं .दोनों ही मानवता की दो अनमोल शक्तियों का बेहद शोषण करते हुए हैवानियेत की शक्ल में इस वसुंधरा का सर्वस्व नष्ट करते हुए अब 'सितारों से आगे जहान और भी हैं'उन्हें विजित करने चाल पड़े हैं .भारत को इन दोनों से एक साथ संघर्ष करना पढ़ रहा है ..एक तरफ वैश्वीकरण की चुनोती और दूसरी ओर साम्प्रदायिकता के जूनून से निरंतर जूझता भारत इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर आ खड़ा है .देशभक्ति का असली मतलब है की दुनिया की तमाम सभ्यताओं में जो सत्व तत्व है उसका नवनीत बनाया जाए और आसन्न विभीषिका को रोका जाए .
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
10-10-10 की कविता---- मंदिर-मस्जिद का फंडा

माथे पर त्रिपुंड विराजत ,हाथ कमंडल गले में गण्डा.
जिनकी मर्जी राम ने सिरजी ,वे थामें हैं भगवा झंडा ..
असमंजस अंसारी हामिद, मांग रहे हैं न्याय का डंडा.
सुन्नी कहें आस्था जीती, संघी कहें न्याय तो फंडा .
कुछ कहते की अर्थहीन है, फ़ोकट का प्रतिवाद वितंडा .
यक्ष प्रश्न पहले भी था वो, पहले मुर्गी हुई या अंडा ..
आज प्रश्न प्रासंगिक क्या है? क्या है मंदिर -मस्जिद फंडा .
३० सितम्बर के दिन ही ये, हो जाना था प्रकरण ठंडा ..
बिना आस्था मुल्क बने न, जाने ज्ञानी -ध्यानी -पंडा .
बिन क़ानून देश चलिबे न, जबरन गले न डालो फंदा.
लखनऊ पीठ ने दिखा दिया, क्या है राजनीति का फंडा.
संस्कृति अपनी गंगा -जमुनी, यही बताये तिरंगा झंडा ..
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
बापू को FEEL GOOD की बधाई ..

आदरणीय बापू सादर प्रणाम .....
जैसा की आपको सुविदित है की कुछ लोग वर्षों से आपकी समाधी पर जाकर मगरमच्छ के आंसू बहाया करते हैं, कुछ लोग़ जिन्होंने आपको जीते जी तो परेशान किया ही और अंत में आपको मौत के घाट उतार दिया -अब आपके सिद्धांतो में आस्था प्रकट करने लगे हैं। अदालतें भी अब बहुत जिम्मेदार और परिपक्व हो गईं हैं, वो जो अयोध्या वाला विबाद था न :अरे वही -मंदिर -मस्जिद वाला ...हाँ ..हाँ ..वही -उसके तीनों पक्षकार बहुत खुश हैं ...क्योंकि इलाहबाद उच्च न्यायलय की लखनऊ खंडपीठ ने २:१से ऐसा फैसला सुनाया है की सारा भारत विगत ३० सितम्बर -२०१० से आज आपके जन्म की १४१ वीं जयंती की पुण्य वेला तक तो फील गुड में है ही... बाकी आगे की आप जाने ..क्योंकि आपकी तो सभी तक पहुँच है, सो जानवी, आप हिन्दू -मुस्लिम -सिख -ईसाई -सभी के भगवानों के प्रिय हैं इसलिए इन सबसे आपकी अच्छी पकड़ है।
आप से निवेदन है की भारत जैसे गरीब देश में अंध धार्मिक आस्था और इतिहास की भूलों के नाम पर कोई फसाद न हो इसके लिए ऊपर तक हमारी अर्जी पहुंचा दें ।
पूज्य बापू आपको यहाँ के संक्षेप समाचार सही -सही जानना हो तो लाइव इंडिया चैनल जरूर देखें। मैं मज़ाक नहीं करता ...आपको तो दिव्य दृष्टी प्राप्त है ..पूरा देश ३० सितम्बर को सहमा -सहमा था की -राम जाने ,अल्लाह जाने क्या होगा ?अयोध्या पर संभावित निर्णय के उपरांत की काल्पनिक विभीषिका ने हम सत्य -अहिंसा वादियों की नींद उड़ा दी थी। कुछ स्वयम्भू धर्म रक्षक हिदुत्व की आस्था के नाम पर जहर उगलते हुए तमाम -दृश्य --श्रव्य- छाप्य-पाठ्य मीडिया पर पसर चुका था किन्तु कुछ अभी भी आपके अहिंसा सिध्दांत पर अडिग थे -उनमें लाइव इंडिया, नई दुनिया, लोक लहर -देशाभिमानी और पीपुल्स डेक्रेसी जैसे सूचना स्त्रोत थे।
सभी धर्म निरपेक्ष जनता -किसान -मजदूर खुश हैं की उन्हें नाहक ही साम्प्रदायिक दंगों का शिकार नहीं होना पड़ा। हमें चिंता थी बापू की यदि किसी ने अफवाह फैला दी या फैसला एकदम एकपक्षीय हुआ तो क्या होगा, इस देश का और बापू परसों ३० सितम्बर से आज तक यदि ये देश उस शैतानी हिंसक ताकतों के हाथ होता तो आज आपको जन्म दिन पर क्या मुहं दिखाता ..अब सब ठीक है ..आपकी नई पीढी बहुत काबिल है -फासिस्टों और पाखंडियों को पहचानने की ओर अग्रसर है। आपका सपना पूरा होगा बापू ...देश में सभी धरम जात और नस्ल के लोग आपसी सौहार्द्र से रहने का अर्थ समझने लगे हैं ... वैसे आपसे एक शिकायत है की आपने जिन्दगी भर यही सपना क्यों देखा ? यह देश दुनिया के सबसे गरीब मुल्कों में अभी भी शुमार है ३० करोड़ जनता कुपोषण और लाचारियों की शिकार है ..व्यवस्था के नियंता पूँजी के तरफदार हैं ...मानवीय मूल्यों से वंचित बाज़ार है ...बापू इस दिशा में हम अब तक लाचार हैं ॥
आपका भजन ...ईश्वर -अल्लाह ..तेरे नाम ...और वैष्णव जन ...गाते हुए आज २ अक्तूबर -२०१० को FEEL GOOD हो रहा है।
आपके एक अहिंसावादी -धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण का सच्चा अनुयायी ...
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
मज़हब और मीडिया (साभार:drpraveentiwari.blogspot.com)

इसे माननीय कोर्ट और एनबीए की गाइड लाईन्स का असर कहें या मीडिया की सूझबूझ अयोध्या के संवेदनशील ज़मीन विवाद पर आए ऐतिहासिक अमन के फ़ैसले पर मीडिया की भूमिका सराहनीय रही। चंद चैनल्स की शाम की चर्चाएं और कुछ राजनैतिक प्रतिक्रियाओं को छोड़ दिया जाए तो ज़्यादातर चैनल्स ने सधी हुई ख़बर और प्रतिक्रियाएं दर्शकों तक पहुंचाई। इस पूरे मामले में चैनल्स के साथ-साथ पक्षकारों की भूमिका भी शानदार रही, हांलाकि यहां भी राजनीति चमकाने की नाकाम कोशिश हुई लेकिन मीडिया ने ऐसे लोगों और उनकी प्रतिक्रियाओं को भाव नहीं दिया। पूरे मामले को शिद्दत से लड़ने वाले और मामले के सबसे बुज़ुर्ग पक्षकार हाशिम अंसारी साहब की प्रतिक्रिया और भूमिका सबसे शानदार रही। उन्होंने इसे अमन का फ़ैसला और सभी पक्षों के लिए संतोषजनक बताते हुए मुस्लिम भाईयों से भी घर में ख़ुशियां मनाने के लिए कहा। घर में ख़ुशियां मनाने की बात ख़ासतौर पर इसीलिए क्योंकि कोई भी पक्ष सड़क पर आकर ख़ुशियां नहीं मनाएगा ये भी कोर्ट की गाइड लाइन्स में शामिल था।
इस मसले पर मैं आपका ध्यान एक बहुत दिलचस्प पहलू पर ले जाना चाहता हूं जो शायद किसी और दिन इतना दिलचस्प मालूम नहीं पड़ता। किस तरह की दरार डालने की कोशिश नापाक तत्व करते हैं इसका एहसास भी इस पहलू से होता है। मीडिया में अगर हम अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाते हैं तो कभी हिन्दू-मुसलमान का भेद नहीं कर सकते और मुझे लगता है ये स्थिति सिर्फ मीडिया में नहीं बल्कि हर क्षेत्र में हैं। काम करते वक्त क्या हिन्दू क्या मुसलमान मिलजुलकर साथ होते हैं। ईद और दीवाली पर एक दूसरे की खुशियों को बांटते हैं। इस फैसले के दिन भी इस शानदार पहलू पर एक दर्शक की प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। दरअसल मैं और मेरी सहयोगी आरफ़ा ख़ानम शेरवानी फैसले पर लगातार दर्शकों को अपडेट्स पहुंचा रहे थे और ये एक ऐसा काम था जो बड़ी ख़बरों के दौरान अमूमन होता है। एक हिन्दू और एक मुसलमान एंकर बैठकर इस फैसले को पहुंचा रहे थे इस बात का एहसास मुझे एक दर्शक की प्रतिक्रिया के बाद हुआ जो एक सुखद संयोग भी था। लेकिन सिर्फ ये ही संयोग नहीं था, प्रोड्यूसर्स के तौर पर सईद, सिद्धार्थ, इलमान, आलोक और अन्य साथी इस ख़बर के अपडे़ट्स हम तक पहुंचा रहे थे। वही रिपोर्टर को कोऑर्डिनेट करने वाले इनपुट पर इस्माइल भाई और चरन जी मुस्तैद थे। इस बात का एहसास पहले कभी नहीं हुआ लेकिन हिन्दू-मुसलमान के कॉम्बिनेशन वाली प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान इस ओर खींचा।
अब बात सिर्फ मेरे चैनल की नहीं मैंने जब नज़र दौड़ायी दूसरे चैनल्स पर तो ये कॉम्बिनेशन कई जगहों पर मौजूद था। जहां एक ओर एनडीटीवी पर पंकज पचौरी के साथ नग़मा बैठी थी वहीं न्यूज़ 24 पर हमेशा की तरह सईद अंसारी, अंजना कश्यप और अन्य साथी ये ख़बरें दर्शकों तक पहुंचा रहे थे, आज तक पर भी शम्स और अन्य साथी थे और ऐसा हर चैनल के साथ था।
ये बात तो साफ है की ये रोज़मर्रा की चीज़ है और ये कॉम्बिनेशन्स हमेशा चैनल्स पर होते है चाहे हिन्दू पत्रकार हो या मुस्लिम पत्रकार वो तमाम ख़बरे दर्शको तक पहुंचाते हैं। चाहे एंकर्स हों, रिपोर्टर्स हों या पर्दे के पीछे काम करने वाले दूसरे अहम साथी कभी कोई इस कॉम्बिनेशन के बारे में ध्यान नहीं देता और न इसकी जरूरत पड़ती है क्योंकि ये इस देश की ख़ूबसूरती है की हम भले ही हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन या कुछ और हों लेकिन हिन्दुस्तानी होने का एहसास सबसे पहले होता है।
ये मेरे 11 साल के पत्रकारिता जीवन में पहला मौक़ा था जो मैं इन सब बातों पर गौर कर रहा हूं या मेरे प्रिय दर्शक जिन्होंने ये एहसास मुझे कराया उन्होंने भी कभी इस बात पर गौर नहीं किया होगा। मंदिर-मस्जिद के ये मसले जिन्हे ये सियासतदां अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए पैदा करते हैं वो हमारे अंदर इन एहसासों को पैदा करते हैं। मैंने अपने आसपास तो कोई फर्क नहीं देखा और मुझे उम्मीद है ऐसे राजनैतिक विवादों के बात कहीं और भी कोई फर्क नहीं पड़ा होगा और न पड़ना चाहिए क्योंकि हम एक ही माला के मोती हैं जो इस तरह गुंथे है जिनमें फ़र्क नहीं किया जा सकता। मैं साथ ही ये उम्मीद भी करता हूं की आगे कोई ऐसे मसला न आए जो मुझ तक इस एहसास को पहुंचाए की हिन्दू और मुसलमान का कॉम्बिनेशन यहां काम करता है बल्कि हिन्दुस्तानी यहां काम करते हैं का एहसास कायम रहे जो हमेशा से हैं।
डॉ प्रवीण तिवारी
लाइव इंडिया के लिए कार्यरत हैं।
मंगलवार, 28 सितंबर 2010
भगत सिंह के जन्मदिन पर विशेष

शहीद भगत सिंह की विचारधारा वैसे तो सर्वकालिक है; किन्तु वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में साम्राज्यवादी मुल्कों ने आज जिस तरह से समस्त भूमंडल को अपने बहुराष्ट्रीय निगमों का चारागाह बनाकर रखा है ऐसी अवस्था में नवस्वाधीन या विकासशील देशों और खास तौर से भारत के शुभचिंतकों को यह उचित होगा की भगतसिंह की विचारधारा का अनुशीलन करें। शहीद भगतसिंह और उनके साथी सिर्फ सत्ता हस्तांतरण हेतु संघर्षरत नहीं थे; अपितु शोषणकारी व्यवस्था को बदलने की स्पष्ट सोच रखते थे। बीसवी शताब्दी के तीसरे दशक की अनेक घटनाएं यह साबित करने को पर्याप्त हैं। तत्कालीन बॉम्बे की मजदूर हड़तालें; देश के अनेक हिस्सों में किसान विद्रोह न केवल ब्रिटिश साम्रज्य से मुक्ति की चाहत बल्कि देशी सामंतों के चंगुल से आज़ादी की तमन्ना रखते थे। इस क्रांतिकारी प्रवाह को रोकने में अंग्रेजों का साथ देने वाले वे सभी थे जो जाती धरम और पूंजीवादी व्यवस्था के पालतू थे। किन्तु क्रांतिकारियों का मनोबल कम नहीं हुआ उन्होंने जनांदोलनों को कुचलने के प्रयासों के विरोधस्वरूप असेम्बली में बम फेंक कर भारतीय जन मानस को झंझोड़ा। तत्कालीन स्थापित बुर्जुवा नेत्रत्व जिन्हें स्वाधीनता आन्दोलन का पुरोधा माना जाता है; सदैव मजदूर किसान आंदोलनों एवं उनकी अगुवाई करने वाले जन -नायकों को दबाये जाने के पक्षधर हुआ करते थे । सारा संसार जानता है की शहीदों को फांसी दिए जाने के खिलाफ कोई भी कारगर कदम नहीं उठाया गया, यही वजह है की देश की वर्तमान पीढ़ी को आज़ादी के संघर्षों का अधुरा इतिहास पढाया जा रहा है। १८५७ का प्रथम स्वाधीनता संग्राम तथा साम्राज्यवाद -पूंजीवाद से आम जनता के सतत संघर्षों के परिणामस्वरूप आधी अधूरी आज़ादी; आधा अधुरा वतन तो मिला किन्तु भारतीय जन मानस की एकता को तार तार करने वाले तत्वों ने शहीद भगत सिंह के उन विचारों को विस्मृत करने में प्रत्गामी ताकतों का साथ दिया, जिन विचारों के बलबूते एकता के मूलभूत सिद्धांत स्थापित किये गए थे । भारतीय जन-गन -मन की वैचारिक एकता के सूत्र समझे बिना न तो साम्प्रदायिकता की वीभत्सता को समझा जा सकता है; और न ही अंतर राष्ट्रीय साम्राज्यवाद के नव उपनिवेशवाद को समझा जा सकता है। शहीद भगतसिंह ने जलियावाला बाग़ नर संहार; ग़दर पार्टी का चिंतन और संघर्ष विरासत में पाया था। सोवियत क्रांति की आंच ने गर्माहट दी थी; उन्होंने गाँधीवादी आंदोलनों को व्यवस्था परिवर्तन का कारक नहीं माना .देश विभाजन हेतु उत्तरदायी हर किस्म के साम्प्रदायिक संगठनो उनकी नीतियों और वक्तव्यों का पुरजोर विरोध उनके विचारों में स्पष्ट झलकता है, ट्रेड दिस्पुत एक्ट के खिलाफ संघर्षरत लाला लाजपतराय पर निर्मम लाठी चार्ज और परिणामस्वरूप लालाजी समेत अनेकों निहत्थी जनता की अकाल मौत ने हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के पुराधाओं; चंद्रशेखर आज़ाद, बटुकेश्वर दत्त, असफाक उल्लाह खान तथा भगतसिंह को असेम्बली में बम फेंकने के लिए मजबूर किया। इससे पहले कामागातामारु नामक जहाज पर सवार सैकड़ों भारतीयों जिनमें अधिकांश तो सिख ही थे; को अमेरिका ने अपने अन्दर उतरने नहीं दिया जिसके कारण सभी महासागर में काल कवलित हो गए थे, अतः साम्राज्यवाद के बारे में क्रांतिकारियों की समझ और पुख्ता होती चली गई । शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा स्थापित हिदुस्तान सोस्लित रेपब्लिकन आर्मी में सोशलिस्ट शब्द भगतसिंह ने ही जुड़वाया था। भगतसिंह ने कहा था " _पूंजीवादी साम्राज्यवाद नए नए रूप धारण कर निर्बल राष्ट्रों का शोषण करता है। सम्राज्यवादी युद्धों का समापन ही हमारा अंतिम लक्ष्य है। जब तलक दुनिया में सबल राष्ट्रों द्वारा निर्बल देशों का शोषण होता रहेगा 'जब तलक सबल समाजों द्वारा निर्बल समाजों का शोषण होता रहेगा। सबल व्यक्ति द्वारा निर्बल और लाचारों का शोषण होता रहेगा; क्रांति के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा" आज भी जो मजदूर, किसान, छात्र, नौजवान तथा धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक शक्तियां भगतसिंह के विचारों को अमली जामा पहनने हेतु कृत संकल्पित हैं ;वे ही सच्चे देशभक्त हैं .
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

