शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मज़हब और मीडिया (साभार:drpraveentiwari.blogspot.com)


इसे माननीय कोर्ट और एनबीए की गाइड लाईन्स का असर कहें या मीडिया की सूझबूझ अयोध्या के संवेदनशील ज़मीन विवाद पर आए ऐतिहासिक अमन के फ़ैसले पर मीडिया की भूमिका सराहनीय रही। चंद चैनल्स की शाम की चर्चाएं और कुछ राजनैतिक प्रतिक्रियाओं को छोड़ दिया जाए तो ज़्यादातर चैनल्स ने सधी हुई ख़बर और प्रतिक्रियाएं दर्शकों तक पहुंचाई। इस पूरे मामले में चैनल्स के साथ-साथ पक्षकारों की भूमिका भी शानदार रही, हांलाकि यहां भी राजनीति चमकाने की नाकाम कोशिश हुई लेकिन मीडिया ने ऐसे लोगों और उनकी प्रतिक्रियाओं को भाव नहीं दिया। पूरे मामले को शिद्दत से लड़ने वाले और मामले के सबसे बुज़ुर्ग पक्षकार हाशिम अंसारी साहब की प्रतिक्रिया और भूमिका सबसे शानदार रही। उन्होंने इसे अमन का फ़ैसला और सभी पक्षों के लिए संतोषजनक बताते हुए मुस्लिम भाईयों से भी घर में ख़ुशियां मनाने के लिए कहा। घर में ख़ुशियां मनाने की बात ख़ासतौर पर इसीलिए क्योंकि कोई भी पक्ष सड़क पर आकर ख़ुशियां नहीं मनाएगा ये भी कोर्ट की गाइड लाइन्स में शामिल था।

इस मसले पर मैं आपका ध्यान एक बहुत दिलचस्प पहलू पर ले जाना चाहता हूं जो शायद किसी और दिन इतना दिलचस्प मालूम नहीं पड़ता। किस तरह की दरार डालने की कोशिश नापाक तत्व करते हैं इसका एहसास भी इस पहलू से होता है। मीडिया में अगर हम अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाते हैं तो कभी हिन्दू-मुसलमान का भेद नहीं कर सकते और मुझे लगता है ये स्थिति सिर्फ मीडिया में नहीं बल्कि हर क्षेत्र में हैं। काम करते वक्त क्या हिन्दू क्या मुसलमान मिलजुलकर साथ होते हैं। ईद और दीवाली पर एक दूसरे की खुशियों को बांटते हैं। इस फैसले के दिन भी इस शानदार पहलू पर एक दर्शक की प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। दरअसल मैं और मेरी सहयोगी आरफ़ा ख़ानम शेरवानी फैसले पर लगातार दर्शकों को अपडेट्स पहुंचा रहे थे और ये एक ऐसा काम था जो बड़ी ख़बरों के दौरान अमूमन होता है। एक हिन्दू और एक मुसलमान एंकर बैठकर इस फैसले को पहुंचा रहे थे इस बात का एहसास मुझे एक दर्शक की प्रतिक्रिया के बाद हुआ जो एक सुखद संयोग भी था। लेकिन सिर्फ ये ही संयोग नहीं था, प्रोड्यूसर्स के तौर पर सईद, सिद्धार्थ, इलमान, आलोक और अन्य साथी इस ख़बर के अपडे़ट्स हम तक पहुंचा रहे थे। वही रिपोर्टर को कोऑर्डिनेट करने वाले इनपुट पर इस्माइल भाई और चरन जी मुस्तैद थे। इस बात का एहसास पहले कभी नहीं हुआ लेकिन हिन्दू-मुसलमान के कॉम्बिनेशन वाली प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान इस ओर खींचा।
अब बात सिर्फ मेरे चैनल की नहीं मैंने जब नज़र दौड़ायी दूसरे चैनल्स पर तो ये कॉम्बिनेशन कई जगहों पर मौजूद था। जहां एक ओर एनडीटीवी पर पंकज पचौरी के साथ नग़मा बैठी थी वहीं न्यूज़ 24 पर हमेशा की तरह सईद अंसारी, अंजना कश्यप और अन्य साथी ये ख़बरें दर्शकों तक पहुंचा रहे थे, आज तक पर भी शम्स और अन्य साथी थे और ऐसा हर चैनल के साथ था।

ये बात तो साफ है की ये रोज़मर्रा की चीज़ है और ये कॉम्बिनेशन्स हमेशा चैनल्स पर होते है चाहे हिन्दू पत्रकार हो या मुस्लिम पत्रकार वो तमाम ख़बरे दर्शको तक पहुंचाते हैं। चाहे एंकर्स हों, रिपोर्टर्स हों या पर्दे के पीछे काम करने वाले दूसरे अहम साथी कभी कोई इस कॉम्बिनेशन के बारे में ध्यान नहीं देता और न इसकी जरूरत पड़ती है क्योंकि ये इस देश की ख़ूबसूरती है की हम भले ही हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन या कुछ और हों लेकिन हिन्दुस्तानी होने का एहसास सबसे पहले होता है।

ये मेरे 11 साल के पत्रकारिता जीवन में पहला मौक़ा था जो मैं इन सब बातों पर गौर कर रहा हूं या मेरे प्रिय दर्शक जिन्होंने ये एहसास मुझे कराया उन्होंने भी कभी इस बात पर गौर नहीं किया होगा। मंदिर-मस्जिद के ये मसले जिन्हे ये सियासतदां अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए पैदा करते हैं वो हमारे अंदर इन एहसासों को पैदा करते हैं। मैंने अपने आसपास तो कोई फर्क नहीं देखा और मुझे उम्मीद है ऐसे राजनैतिक विवादों के बात कहीं और भी कोई फर्क नहीं पड़ा होगा और न पड़ना चाहिए क्योंकि हम एक ही माला के मोती हैं जो इस तरह गुंथे है जिनमें फ़र्क नहीं किया जा सकता। मैं साथ ही ये उम्मीद भी करता हूं की आगे कोई ऐसे मसला न आए जो मुझ तक इस एहसास को पहुंचाए की हिन्दू और मुसलमान का कॉम्बिनेशन यहां काम करता है बल्कि हिन्दुस्तानी यहां काम करते हैं का एहसास कायम रहे जो हमेशा से हैं।

डॉ प्रवीण तिवारी
लाइव इंडिया के लिए कार्यरत हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. vaakai live india ne bahut soojh boojh se dharmnirpekshta ka vatavaran banaya or isi vajh se anya chenals ko bhi apna sur badalne ke liye majboor hona pada .halanki bharat sarkaar or rajyon ki sarkaron ne ateet se sbk lekar behtar kam kiya sabhi ko badhai .dhanywad .

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'Live India' tatha aur bhi electronic media ke sath sath print media ne bhi rashtriya ekta ke maddenajar jo kadam uthae, mai unka vandan karta hoo. Samay-samay par lagne wale ye aarop ki media hi logo ko bhadkata hai, media ne is aarop ko dho diya hai... Yeshwant Kaushik

    उत्तर देंहटाएं
  3. congratulations to shri praveen tiwari to highlight interesting point that we do not have the religion of a media person in mind when we look at him.when we go crazy over KHAN'S of bollewood and cricket,it made us to think whether its name,fame,money or education of person which force us to look at him withoutthe barriers of religion,colour,caste etc?perhaps NO.Unless we stop poisioning our own childrens with the ideas& thoughts of discrimination we will not be able to achiveve the success in this direction.we must understand that the God has decorated this garden (world)with the diffrent colours of flower so that it look beautiful.

    उत्तर देंहटाएं