सामान्य वर्ग की इस शिकायत में दम है कि उनके साथ कोई भी पार्टी नहीं है!सभी पार्टियां दलितों के साथ हैं! लेकिन इस भयानक स्थिति के लिये खुद सामान्य वर्ग के लोग ही जिम्मेदार हैं!उनसे किसने कहा था कि पूंजीवादी पार्टियों के झंडे डंडे उठायें?उनसे किसने कहा था कि आडवानी की रथयात्रा में शामिल हों,मंदिर के बहाने अयोध्या जाकर ढांचा गिरायें? किसने कहा है कि 'मोदी मोदी' के नारे लगायें?मोदीजी तो सामान्य वर्ग की ऐंसी तैंसी करने के लिये सुप्रीम कोर्ट का न्यायिक फैसला भी बदल देते हैं!सामान्य वर्ग के शोषित पीड़ित जन खुदऐंसी पार्टी क्यों नही बना लेते जो सभी जाति,सभी धर्म मजहब के लोगों के साथ समान न्याय करने की घोषणा करती हो!
बुधवार, 5 सितंबर 2018
मानव श्रम अंतर्संबंध और उत्पादन के साधनों का विकास:
हमने देखा कि आदिम साम्यवादी युग की आर्थिक सामाजिक प्रणाली ,जो मानव समाज के इतिहास की वह प्रणाली थी जिसमे आज तक की सभी आर्थिक सामाजिक प्रणालियों के मूल लक्षण दिखाई पड़ जाते हैं।उन बातों को आज की पूंजीवादी प्रणाली में भी देख सकते है।
उपभोग इंसान की मूल आवश्यकता है।
उपभोग के लिए आदमी श्रम करता है।
उपभोग के लिए आदमी श्रम करता है।
कोई भी वस्तु इसलिए मूल्यवान होती है कि वह आदमी की जरूरतों को पूरा करने के काम आती है।यदि वह यह काम न कर सके तो उसके लिए श्रम में खर्च की गई ऊर्जा निरर्थक हो जाती है।
सार्थक श्रम के लिए पहली चीज आदमी का हुनर होता है।दूसरी चीज है श्रम का औजार और तीसरी चीज प्रकृति।श्रम के औजारों में युग के अनुसार परिवर्तन और वृद्धि होती रहती है।
औजार और प्रकृति श्रम या उत्पादन के साधन कहे जाते है।
आदमी अर्थात श्रमिक और उत्पादन मिलकर उत्पादन शक्तियां कहलाते हैं।
उत्पादन और उपभोग के बीच में आवश्य क रूप से एक चीज और आती है ,वह है वितरण।
इन तीन आर्थिक क्रियाओं में जब एक चौथी क्रिया जिसे विनिमय कहते हैं,का प्रवेश हुआ आदिम साम्यवादी व्यवस्था के आगे के युग में इतिहास प्रवेश कर गया।
इन तीन आर्थिक क्रियाओं में जब एक चौथी क्रिया जिसे विनिमय कहते हैं,का प्रवेश हुआ आदिम साम्यवादी व्यवस्था के आगे के युग में इतिहास प्रवेश कर गया।
आदिम साम्यवादी युग के आखिरी चरण में चार आर्थिक क्रियाएं आवश्यक बन गईं,उत्पादन,वितरण,विनिमय और उपभोग ।इन क्रियाओं के दौरान लोगों के बीच जो संबंध बनते हैं उसे उत्पादन संबंध कहते हैं।
उत्पादन शक्तिओ और उत्पादन संबंध के संयुक्त रूप को उत्पादन प्रणाली कहते हैं।
उत्पादन प्रणाली का प्रधान निर्णायक तत्व स्वामित्व का रूप होता है।
आदिम साम्यवादी युग में स्वामित्व सामूहिक था ,वितरण और उपभोग लगभग बराबरी का,अर्थात क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार उपभोग।
इसलिए आगे के युगों में जो असंतोष और संघर्ष आदमी आदमी के बीच दिखाई पड़ता है ,वह उस युग में नहीं था।
'नोटा'
करे विकास जो सब वर्गों का,
शासन उसको ही करने दो!
जो आरक्षण से बने डाक्टर,
मंत्री का इलाज उसे करने दो!
जात धरम की बात करे जो,
उसको चुनाव मत जीतने दो!
जो समाज को बांट रहा हो,
उुसका नेत्रत्व न चलने दो!
जो 'नोटा' का करे समर्थन,
उसका खटराग न बजने दो!
शासन उसको ही करने दो!
जो आरक्षण से बने डाक्टर,
मंत्री का इलाज उसे करने दो!
जात धरम की बात करे जो,
उसको चुनाव मत जीतने दो!
जो समाज को बांट रहा हो,
उुसका नेत्रत्व न चलने दो!
जो 'नोटा' का करे समर्थन,
उसका खटराग न बजने दो!
सवर्ण कौन हैं? सामान्य कौन हैं ?
....
जिस व्यक्ति पर एट्रोसिटी_एक्ट के तहत बिना इन्क्वारी के भी कार्यवाई की जा सकती है,वो सवर्ण है!
जिसको जाति सूचक शब्द इस्तेमाल करके बे खौफ गाली दी जा सकती है, वो सवर्ण है!
देश में आरक्षित 131 लोकसभा सीटों और 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव नही लड़ सकता है, लेकिन वोट दे सकता है,वो सवर्ण है!
जिसके हित के लिए आज तक कोई आयोग नही बना,वो सवर्ण है!
जिसके लिए,कोई सरकारी,योजना नही बनी हो, वो सवर्ण है!
जिसके साथ देश का संविधान भेदभाव करता है,वो सवर्ण है!
मात्र जिसको सजा देने के लिए NCSC और NCST का गठन किया गया वो सवर्ण है!
मात्र जिसे सजा देने के लिए हर जिले में विशेष SC/ST न्यायालय खोले गए हैं, वो अभागा सवर्ण है!
जो स्कूल में अन्य वर्गों के मुकाबले चार गुनी फीस दे कर अपने बच्चों के अच्छे भविष्य को देखते हुए उन्हें पढ़ाता है, भलेही उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो, वो बेसहारा सवर्ण है!
नौकरी, प्रमोशन, घर allotment आदि में जिसके साथ कानूनन भेदभाव किया जाना वैध है, वो बेचारा सवर्ण ही है!
ब्राह्मण, क्षत्रिय, जैन, अग्रवाल इत्यादि समुदाय से होकर हमेशा भाजपा का बंधुआ मजदूर रहकर काम करने वाला सवर्ण है!
सरकारों व संविधान द्वारा सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया जाने वाला सवर्ण है!
सबसे ज्यादा वोट देकर भी खुद को लुटापिटा ठगा सा महसूस करने वाला सवर्ण है!
सभाओं में फर्श तक बिछा कर एक अच्छी सरकार की चाह में आपको सत्ता सौंपने वाला सवर्ण है!
देश हित मे आपका तन मन धन से साथ देने वाला सवर्ण है!
इतने भेदभाव के बावजूद भी, "धर्म की जय हो,अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो,विश्व का कल्याण हो" की भावना जो रखता है,वही सवर्ण है!
सवर्णों को कुचलने व तहस नहस करने पर आदरणीय मोदी सरकार को करबद्ध नमन!
हम हैं ही इसी लायक...क्योंकि 'सबका साथ सबका विकास'..इसीलिये सवर्णो का करो सर्वनाश ...!
असली लोकतंत्र कोसों दूर.
वेशक पूंजीवाद का विकल्प 'समाजवाद' ही हो सकता है!किन्तु संविधान और सुप्रीम कोर्ट को ताक पर रखकर,एससी/एसटी के वोट पाने के लिये सभी प्रमुख राष्ट्रीय दल जब नवतुष्टिकरण के नामपर समाजवाद या साम्यवाद का मुखौटा लगाकर उसे बदनाम कर चुके हों,तो जाति निरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष सर्वहारा के समक्ष भयानक वैचारिक संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है!
जनांदोलनों और मेहनतकशों के अनवरत संघर्षों में तप चुके 'वामपंथ' को क्यों नहीं एम.पी.,यूपी,बिहार में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए ? भले ही सब हर जाएँ ! वेशक आगामी लोकसभा चुनाव में नागनाथ या सांपनाथ में से ही कोई जीतेगा ! जोघाघ पूंजीपति और काकस आज भाजपा और मोदी जाप कर रहे हैं कल वे किसी और सत्तारूढ़ वर्ग के साथ होंगे!जब तक यह भारत में यह प्रवृत्ति रहेगी तब तक असली लोकतंत्र कोसों दूर होगा!
भारत के तमाम प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी अभी तक ये नही बता पाये कि यहां समाजवाद के असली अवरोधक तत्व कौन हैं ? क्या कांग्रेस या भाजपा ? कदापि नहीं ! ये तो घोषित वर्ग शत्रू हैं!इनके बजाय तीसरे मोर्चे वाले,जनता परिवार वाले और जात धर्म की राजनैतिक रोटी खाने वाले ही देश की आवाम को बुरी तरह विभाजित किये हुये हैं! समाजवाद और साम्यवाद के असली दुश्मन यही हैं। जनता के असली दुश्मन भी यही जात धर्म की राजनीति करने वाले ही हैं !
वास्तव में कांग्रेस का विकल्प न तो भाजपा है और न यह जातीय कूड़ा कचरा!बल्कि वर्गविहीन जातिविहीन समतामूलक समाज की अवधारणा वाला वामपंथ ही सही विकल्प है !और यही भारतीय अस्मिता -अखंडता की रक्षा कर सकता है !और यही नवनिर्माण कर सकता है,चीन से भी बेहतर!
वास्तव में कांग्रेस का विकल्प न तो भाजपा है और न यह जातीय कूड़ा कचरा!बल्कि वर्गविहीन जातिविहीन समतामूलक समाज की अवधारणा वाला वामपंथ ही सही विकल्प है !और यही भारतीय अस्मिता -अखंडता की रक्षा कर सकता है !और यही नवनिर्माण कर सकता है,चीन से भी बेहतर!
रविवार, 2 सितंबर 2018
सुर्खरू होता है इंसान,
गोली असर करती है ,
बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है,
जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है ,
पत्थर पै पिस जाने के बाद।
चंदन खुशबू देता है ,
सिलवट पै घिस जाने के बाद।।
पतित होता है इंसान,
भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।
छाछ भी फूँककर पीते हैं,
गर्म दूध से जिव्हा जल जानेके बाद !!
मूर्ख जन सबक नहीं सीखते,
बार बार ठगे जाने के बाद।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं ,
जो लगाते हैं चूना,चुने जाने के बाद!!
सुर्खरू होता है इंसान,
सैकड़ों ठोकरें खाने के बाद।।
बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है,
जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है ,
पत्थर पै पिस जाने के बाद।
चंदन खुशबू देता है ,
सिलवट पै घिस जाने के बाद।।
पतित होता है इंसान,
भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।
छाछ भी फूँककर पीते हैं,
गर्म दूध से जिव्हा जल जानेके बाद !!
मूर्ख जन सबक नहीं सीखते,
बार बार ठगे जाने के बाद।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं ,
जो लगाते हैं चूना,चुने जाने के बाद!!
सुर्खरू होता है इंसान,
सैकड़ों ठोकरें खाने के बाद।।
श्रीराम तिवारी
सार्वजनिक उपक्रमों को मौजूदा सरकार ठिकाने लगा रही है
नीति आयोग की अनुशंसाओं के तहत भारत सरकार अपने प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमोंकी उपेक्षा कर रही है!एक तरफ तो वह अपने ही केंद्रीय कर्मचारियोंको सातवें वेतनआयोगकी सिफारिशें विगत जनवरी 2017 से ही लागू करचुकी है,दूसरीओर अधिकांस सा्र्वजनिक उपक्रमों को घाटे में धकेलकर कर्मचारियों के लिये पी आर सी में इंटरेस्ट नही ले रही है!ऊपर से तुर्रा यह कि 'हायर एंड फायर'नीति के तहत पुरानै ठेका मजदूरों को यह सरकार बाहर निकाल रही है!ऐंसा प्रतीत होता है कि अंबानियों और अडानियों से चुनावी फंडलेने की एवज में सत्ता के दलालों ने सार्वजनिक उपक्रमोंकी हत्या की सुपारी ले रखी है!जिन नवरत्नों ने अतीत में भारत का हर संकट में साथ दिया,युद्ध के समय शानदार भूमिका निभायी,विदेशी कर्ज चुकाया और कभी भी आर्थिक मंदी में फिसलने नहीं दिया,जिनकी बदौलत हमारे नेता इतराते हुये देश विदेश में घूमते फिरते रहे हैं ,उन सार्वजनिक उपक्रमों को अब यह मौजूदा सरकार ठिकाने लगा रही है।
इतिहास के पन्नों में मेरा नाम नहीं कोई!!
मुठ्ठीभर चने और जमना जल पी-पीकर !
रात दिन एक करके हाड़-मांस पीसकर !!
कारिंदों से पिटकर चोबदारों से लुटकर !
छैनी-हथौड़ी चलाकर बनाई बेमिसाल इमारत,
लिख डाली दो प्रेमियों की कालजयी इबारत,
हम ख़ुश हुए अद्वितीय प्रेम का स्मारक बनाकर!!
तभी हाथी पर स्वर्णिम हौदे में होकर सवार !
आया शंहशाह और बोला सैनिकों से ललकार !!
मेरी मरहूम बीवी के मकबरे का न बने तोड़ कोई !
काटदो सृजनकर्ताओं के हाथ,भाग न पाए कोई !!
मेरा गुनाह क्या था ? यह तो बताए कोई !
इतिहास के पन्नों में मेरा नाम नहीं कोई!!
मिश्र के पिरामिड पीसा की झुकी-मीनार,
पेरिस का एफिल टॉवर, चीन की दीवार।
पत्थरों को काटकर अपने हाथों से सिरजे,
सम्राटों के आदेश पर मंदिर-मस्जिद-गिरजे।।
चीर डाला धरती को,बनाई पनामा-स्वेज नहरें,
मिला दी मैंने सागरों की सागरों से लहरें।
अजंता, कोणार्क, देवगिरि, मदुराई, खजुराहो,
एलोरा, आबू, देवगढ़ तंजाबूर कामाख्या हो।।
चीख-चीखकर बोल रही हैं पाषाण प्रतिमाऐं,
मेरे श्रम धैर्य चिंतन कला की सीमाऐं।
मेरे लहू का मोल न कभी कूत सका कोई,
इतिहास के पन्नों मे मेरा नाम नहीं कोई।।
महासागरों के अतल जल में गोते लगातीं पनडुब्बियां,
गगनभेदी रॉकेट चन्द्र मंगल पर मानवी अठखेलियां।
वैज्ञानिक अनवरत अविष्कार रेल दूरसंचार,
विधाता की रचना को दिया मैंने नूतन आकार,
मैं ही जग का सृष्टा, सेवक, श्रमिक, तारनहार।
खेत में, खदान में, सीमाओं पर जंग के मैदान में,
सेवा, सुरक्षा सकल तंत्र के नित्य निर्माण में।।
मेरा ही श्रम स्वेद प्रतिपल लेता रहा आकार,
मेरी ही दमित आत्मा होती रही स्थूल में साकार।
पीरों, पैगम्बरों, अवतारों में न मिला अपना कोई,
इतिहास के पन्नों में मेरा नाम नहीं कोई।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 1 सितंबर 2018
मनुष्य औजार बनाने वाला प्राणी है।'
मार्क्स के 'वर्ग संघर्ष' के सिद्धांत का संबंध उनके ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांत से है।ऐतिहासिक भौतिकवाद का मुख्य विषय समाज संबंधी है।समाज का मूल मनुष्य है।मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठ रचना है।लेकिन यह 'समाज' मनुष्य का योग मात्र नहीं है।दर्शल समाज एक विशिष्ठ प्रणाली है।इस प्रणाली में उसके विविध क्रिया कलाप द्रष्टव्य हैं!
समाज की प्रणाली में दो मुख्य चीजें है।
पहली है सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक सत्ता और दूसरी है सामाजिक चेतना।यह
सामजिक सत्ता ही सदैव सामाजिक चेतना का निर्धारण करती है।
पहली है सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक सत्ता और दूसरी है सामाजिक चेतना।यह
सामजिक सत्ता ही सदैव सामाजिक चेतना का निर्धारण करती है।
मनुष्य के राजनीतिक,शैक्षणिक,दार्शनिक, सांस्कृतिक क्रिया कलापों से पहले उसकी वह जरूरतें होती हैं जिसकी पूर्ति के बिना वह और कुछ भी नहीं हो सकता।भोजन, वस्त्र,आवास,स्वास्थ्य और सुरक्षा मनुष्य की ऐसी ही अनिवार्य आवश्यकताएं हैं।इन सभी आवश्यकताओं का जन्म मनुष्य की चेतना या उसके चिंतन से नहीं हुआ। बल्किइनका अस्तित्व ही वस्तुगत है।
मनुष्य अपनी इन आवश्यकताओं को पूरा करने की मूल सामग्री प्रकृति से प्राप्त करता है।किन्तु प्रकृति उसे अपने आप नहीं दे देती।जमीन पर गिरे पके फलों को पाने के लिए भी उसे श्रम करना पड़ता है।जीवकोपार्जन
श्रम के दौरान मनुष्य प्रकृति को बदलने के साथ ही स्वयं को भी बदलता है।
श्रम के दौरान मनुष्य प्रकृति को बदलने के साथ ही स्वयं को भी बदलता है।
श्रम को आसान बनाने के लिए वह औजार बनाता और उसको चलाता है।औजार बनाने वाला प्राणी बनते ही वह अपने अन्य जीवन धारी प्राकृतिक सहजीवियों से कुछअलग हो जाता है।उसकी परिभाषा बदल जाती है कि
'मनुष्य औजार बनाने वाला प्राणी है।'
'मनुष्य औजार बनाने वाला प्राणी है।'
अपनी विशेष बुद्धि और औजार बनाने की कला से मनुष्य अपने से कई गुना अधिक बलशाली जीवधारियों को नियंत्रित करने में सफल हो जाता है।किंतु ताकतवर मनुष्य जब निर्बल का श्रम हरण करने लगता है,प्राक्रतिक संसाधनों पर एकाधिकार करने लगता है तब वर्ग विभाजन होने लगता है और वर्ग संघर्ष भी!
सदस्यता लें
संदेश (Atom)