मंगलवार, 17 मार्च 2015

जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था के कारण ही भारत में जातीयतावाद परवान चढ़ रहा है।


        देश भर में  मोदी सरकार की किसान विरोधी नीति के खिलाफ आंदोलन  जारी है । देश में  संसद में 'रेप' और धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ जनाक्रोश झलक रहा है। आर्थिक मोर्चे पर देश में बदहाली है। बीमा बिल के मार्फत सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर करने की बदनीयत साफ़ दिख रही है। सब्जियों के भाव आसमान पर हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मोदी जी अपने ही 'कौरव दल' में किला लड़ा रहे  हैं। राहुल जी लापता हैं। इन तमाम नकारात्मक खबरों के बीच तीन खबरें भारत के लिए शुभसूचक हैं।

[१]   कांग्रेस, बसपा ,जदयू ,वामपंथ सहित देश की १४ पार्टियों ने  किसान विरोधी 'भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ शानदार एकजुटता का इजहार किया। संसद मार्च करते हुए राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा। देश भर में किसानों पर होने वाले हमले के खिलाफ विपक्ष की यह एकता काबिले तारीफ़ है।

[ २ ] मुंबई उच्च न्यायालय का ताजा फैसला है कि  " सरकार  की नीति-रीति के विरोध में  लिखने,बोलने या  कार्टून बिधा के  मार्फत अपनी असहमति वयक्त करने मात्र से कोई नागरिक 'देशद्रोही' नहीं हो जाता। सरकार को निशाने पर रखकर तीखे और मजाकिया कार्टून या केरीकेचर बनाने वाले लेखक,कलाकार या कार्टूनिस्ट पर देशद्रोह का मुकदद्मा नहीं चलाया जा सकता। " ज्ञातव्य है कि कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर राष्ट्रीय चिन्हों का और संसद का  अपमान करने  का आरोप लगाकर सितमबर -२०१२ में गिरफ्तार किया गया था। जनता के भारी विरोध और न्यायपालिका की सूझबूझ से देश में अभिव्यक्ति की आजादी  को जीवनदान मिला। संघर्ष शील जागरूक वकीलों को धन्यवाद।

[२] सुप्रीम कोर्ट ने जाट जाति को केंद्र सरकार द्वारा नौकरियों व् शिक्षण संस्थानों में दिया गया आरक्षण रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट  का आशय है ''जाति  एक महत्वपूर्ण घटक है,लेकिन यह किसी जाति  के पिछड़ेपन को निर्धारित  करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। अतीत में किसी खास जाति  को गलत ढंग से दिया गया  आरक्षण आगे भी इसी गलत ढंग से अन्य जाति  को यह अधिकार देने का वैधानिक आधार नहीं हो सकता" 

      राजनीति  के दल-दल में कमल खिलने से सिर्फ सत्ता के दल्लाओं के ही अच्छे  आये हैं। लेकिन किसानों ,मजदूरों ,युवाओं और वेरोजगारों के बुरे दिन आये हैं।  मध्यमवर्ग तो कोई न कोई रास्ता अपनी  जिजीविषा का खोज ही लेगा किन्तु ओला-पाला ,वेमौसम वारिश से पीड़ित किसान और भूमि अधिग्रहण  क़ानून की  मारक क्षमता से भयग्रस्त किसान के  लिए जीवन बहुत दुराधरष  हो चुका  है।एकमात्र आशा की किरण  सरकार की किसान विरोधी नीतियों  के खिलाफ जन संघर्ष ही है. जिसका श्रीगणेश दिल्ली में  सम्पूर्ण विपक्ष द्वारा हो चुका  है। 
                                         सरकार के फैसले भले ही देश की आवाम को  अंधकूप में धकेल रहे हों, किन्तु  भारतीय न्यायपालिका के  कुछ ताजातरीन फैसलों से  देश को कुछ शकुन हासिल हुआ है। भारतीय न्यायपालिका के इन फैसलों से समाज के जातीय  और धार्मिक संगठित गिरोहों की दादागिरी पर कुछ तो अंकुश जरूर लगेगा। इसके लिए उन वकीलों ,जजौं  और  संस्थाओं को  धन्यवाद दिया जाना चाहिए , जो न्याय के पक्षधर हैं। जो  सत्य के लिए संघर्षरत  है उनका अभिवादन किया जाना चाहिए ।यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि  आरक्षण केवल उन्हें ही दिया जाए  जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। जो  शरीरिक और मानसिक रूप से अपंग हैं। जिसके पास हजारों एकड़ जमीन है ,जो सांसद हैं , मिनिस्टर है, उच्चधिकारी है ,यदि वह अपनी जाति  को पिछड़ा ,दलित या महादलित बताकर अपने ही स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं तो उसे  और ज्यादा  लूट का  आरक्षण क्यों  मिलना चाहिए ?
                            जिसे ५० साल पहले आरक्षण मिल चूका  ,जिसके बच्चे अमेरिका -यूरोप  में  पड़ रहे हों या सेटिल  हो गए हों उन्हें आरक्षण सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा सकता कि  पचास साल पहले की सरकार ने उन्हें वह हक दिया था। जो आरक्षित प्राणी  आस्ट्रलिया  न्यूजीलैंड में वर्ल्ड  क्रिकेट मैच देखने के लिए हवाई यात्राओं का खर्चा सरकार के मथ्थे  मढ़  रहा हो उसे आरक्षण की दरकार क्यों है ? जो  भीख का कटोरा लेकर चौराहे पर खड़ा है ,जो धुप में सड़क किनारे  पंचर सुधर रहा है. जो  खेत में- खदान में -ईंट  भट्ठों  पर रोजनदारी मजदूरी कर रहा  है,जो   भवन निर्माण में  उजरती  मजदूर है  उसे आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए ? रोटी-कपडा -मकान के लिए संघर्ष कर रहे करोड़ों लोग आरक्षण के हकदार हैं। भले ही वे  किसी भी जाति  के हों । जाति आधारित आरक्षण  व्यवस्था  के कारण  ही भारत में जातीयतावाद का जहर और ज्यादा बढ़ रहा  है। यदि भारत को मजबूत करना है तो जातीयतावाद  को कमजोर करना होगा। जातीयतावाद को कमजोर करना  है तो आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये  जाने का प्रावधान  संविधान में होना  चाहिए।    

  
                       श्रीराम तिवारी
    

                        

शनिवार, 14 मार्च 2015

आप जिस विदेशी एफडीआई पर फ़िदा हो रहे हैं वो ऋग्वेद के किस मंत्र का भाष्य है श्रीमान ?

 भारत का यह  दुर्भाग्य ही है कि जब-कभी दक्ष्णिपंथी मानसिकता के लोगों को सत्ता सुख नसीब हुआ तो उनकी किस्मत  भले ही चमक  गयी किन्तु उनकी सोच  दिग्भर्मित -खंडित मानसिकता  की  'शौचालय सोच ' से आगे कभी नहीं बढ़ पायी। वे यह भूल जाते हैं कि भारत में हमेशा ही  अनेक धर्म -मजहब और मत-मतांतरों की  भारी भीड़ रही  है। आम तौर  पर यह मान्यता है कि  ईसाई,इस्लाम ,पारसी,यहूदी  भारत  में जब  कभी बाहर से आये होंगे तो  भारतीय  'आर्यों' एवं द्रविड़ों   ने उनके  कुछ  अच्छे सिद्धांत और कायदे -क़ानून भी अपने अंदर समाहित कर लिए होंगे ! आगंतुकों  विदेशियों - फ़िलिपस, हेलेना , अश्वघोष , मिलिंद  [मिनांडर]  , फाह्यान  ,ह्वेनशांग ,अलबरूनी ,वर्नी 'अकबर ,बाज - बहादुर ,दारा- शिकोह , वाजिद अलीशाह, बहादुर शाह  'जफर', एनी  वेसेन्ट , कामिल बुल्के  जैसे विदेशियों ने  भी  भारतीय परम्पराओं से बहुत कुछ सीखा होगा !उन्होंने जरूर  बहुत कुछ भारतीय  समाज का चलन  और दार्शनिक दृष्टिकोण भी  अपनाया  ही  होगा। इन सकारात्मक तथ्यों के वावजूद भारत में   सभी मजहबों  के कटटरपंथी बैचेन हैं कि धर्मनिरपेक्ष  भारत की मिली जुली 'गंगा -जमुनी' सांस्कृतिक विरासत अभी तक जिन्दा क्यों है  ?

             इतिहासकारों और समाजविज्ञानियों  की  आम  धारणा है  कि  जो मत- पंथ ,दर्शन  भारत में ही पैदा हुए हैं वे निरंतर गतिशील और प्रवाहमान रहे हैं।  प्रत्येक  बदलते दौर में नए -पुराने के दवंद की स्वाभाविक परणिति  ही समाज के चलन में रही है। प्रकारांतर से  सभी भारतीय मत-मतान्तर और पूजा-पद्धतियों का  जैविक  डीएनए उसी सनातन 'इंडो-यूरोपियन ' परम्परा से मैच करता है।जिसे दुनिया में धर्मनिरपेक्षता का जन्मदाता भी कहा जा सकता है। जिससे भारत -पाकिस्तान ,बांग्लादेश सहित सम्पूर्ण भारतीय उपमहादीप  की सभ्यता का निर्माण हुआ है।  भारत कोई नवजात मुल्क नहीं है। उसकी सभ्यता -संस्कृति और आध्यत्मिक मूलयवत्ता विश्व में  अवश्य बेजोड़ है। किन्तु  भारत की पुरातन सभ्यता संस्कृति के आलोचकों  को यह नहीं भूलना  चाहिए कि  भारत के अलावा अन्य पडोसी मुल्क भी उसी साझी परम्परा के हमसफ़र रहे हैं।  वैज्ञानिक सोच के अध्ध्येताओं की  यह आपत्ति दुरस्त है कि भारतीय  वाङ्गमय  और उसका अतीत में लिखा गया-इतिहास ,धर्म ,दर्शन और अध्यात्म का  हर शब्द केवल शासकों-राजाओं ,श्रेष्ठियों और पुरोहित वर्ग तक ही सीमित रहा है !
                  जिस  नकारात्मक ट्रेंड  के कारण भारत को सदियों की गुलामी भी झेलनी पडी। उसी की  वजह से भारत  को एक अजीब अवदान भी मिला। शायद यही कारण है कि भारत  आज  दुनिया के अन्य एकल धर्मी राष्ट्रों की तरह -धर्मांध राष्ट्र बनने से बचा रहा। उसी वजह से वह विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र भी  कहा  जाता है। वेशक  हजारों साल की दासता का ही यह  परिणाम है  कि भौतिकतावादी सोच  और विकास में  भारत लगभग फिसड्डी रहा है। यही वजह है कि  वह  किसी उन्नत  और वैज्ञानिक रूप से अति  विकसित  राष्ट्र के समक्ष पासंग भी नहीं  हो पाया है। यह  यक्ष प्रश्न जिस दिन हल कर लिया जाएगा कि  अतीत का तथाकथित स्वर्णिम और  विशुध्द  'मनुवादी'  भारत सदियों  तक गुलाम क्यों रहा ?उसी दिन भारत में महान सर्वहारा क्रांति का बिगुल बज उठेगा।  मजदूर वर्ग को और शोषित आवाम को समझना ही पडेगा कि किसी भी तरह के  धर्मांतरण से- इस्लाम -ईसाई-बौद्ध या अन्य  धर्मों के प्रचार-प्रसार के  बह्काबे  में आने के वावजूद भी उनका  शोषण -उत्पीड़न  कहीं भी कम नहीं हुआ है। जनता की  खोज का यह  विषय भी  है कि इतने तमाम धर्म -मजहब  तो भारत में खूब फले -फूले किन्तु  आज भी भारत का चिंतन  'शौचालय सोच ' से आगे क्यों  नहीं बढ़ पाया  है ?

                       मोहनराव  भागवत या 'संघ' वाले  ही क्यों पूरा भारत एक स्वर में कहने को तैयार है कि  भारत को या भारत के अधिसंख्य 'हिन्दू' समुदाय को किसी खास पाश्चात्य  मिशनरीज की या किसी खास  'अफीम' साम्प्रदायिक संगठन  की  आवश्यकता नहीं है। हिन्दुओं को तो 'संघ' की भी आवश्यकता नहीं है।यदि 'संघ' याने  आरएसएस विसर्जित कर दिया जाए तो  भारत को किसी से धर्मनिरपेक्षता सीखने की भी जरुरत नहीं है।  ओबामा से भी नहीं। तब पाकिस्तान ,तालिवान ,अलकायदा और आईएसएस से भी भारत को कोई खतरा नहीं।  जैसे कि  चीन को पाकिस्तान से या आईएसएस से कोई खतरा नहीं।

           भारत के ये तीन शब्द -हिंदी -हिन्दू -हिन्दुस्तान तो वैसे भी सहज धर्मनिरपेक्ष शब्द ही हैं। मोहन राव  भागवत जी की 'हिन्दू' शब्द  व्याख्या और वामपंथी बुद्धिजीवियों की 'हिंदुत्व' शब्द व्याख्या में  मूलतः कोई विरोधाभाष नहीं है। चूँकि 'संघ' की हिन्दुत्ववादी राजनैतिक आकांक्षाओं का अल्पसंख्यकों और  धर्मनिर्पेक्ष   वर्गों के प्रति असहिष्णुता से प्रेरित है । चूँकि संघ की आधारभूत सोच में  उसका  'अल्पसंख्यकवादी 'व्यामोह से सनातन टकराव परिलक्षित  है। इसलिए 'संघ ' की कार्यप्रणाली के कारण  'हिन्दू-हिंदी -हिन्दुस्तान जैसे धर्मनिरपेक्ष शब्द भी अब 'अपावन'- दक्षिणपंथी  -कटटरवादी बना दिए गए हैं। इसलिए भारत को अल्पसंख्यक अलगाववादियों और उनकी 'सेवायोजना'  से लेस विभिन्न  मिशनरीज  को  भारत में गड़बड़ी करने का बहाना मिल जाता  है। गजब तो तब हो जाता है जब कोई वेटिकन समर्थक और  भारत विरोधी  हस्ती नोबल पुरूस्कार भी पा जातीं हैं  !  संघ की बदनाम छवि का  ही यह दुष्परिणाम  है कि  मोहनराव भागवत जैसे 'संत' देशभक्त  'हिन्दू' की सर्वथा 'सत्य' टिप्पणी को  कोई भी स्वीकार करने  को तैयार नहीं  है कि ' मदर टेरेसा की सेवा  भावना निष्काम नहीं थी ' !
                                  जनवादी विद्द्वतजनों और धर्मनिरपेक्ष  साहित्यकारों का यह उत्तर  - दायित्व  है कि भारतीय बहुसंख्यक वर्ग  की स्वाभाविक  धर्मनिरपेक्ष छवि  को विश्वमंच पर प्रस्तुत  करें। दुनिया   मुल्कों की गैर हिन्दू आवाम को  भी चाहिए कि भारतीय बहुसंख्यक समाज [हिन्दुओं] की सहिष्णुता को 'संघ'की अनुदार  कटटरता से न तौलें। अधिसंख्य 'हिन्दू' सहिष्णुता -उदारता -सौजन्यता और बलिदान जनित मूल्यों का उपासक है।  उसकी यह  वास्तविक और  असल तस्वीर  दुनिया के समक्ष  प्रस्तुत  की जानी चाहिए । वैसे भी  विदेशी हमलावरों और यायावर साहित्यकारों द्वारा सिंधु दरिया के इस पार वालों को दिया गया सम्बोधन  याने   'हिन्दू ' शब्द की व्युत्पत्ति का इतिहास भी यही सिद्ध करता  है। उन् विदेशियों ने  ही यहां के मूल  निवासियों को  'हिंदुस्तानी' कहा। अब जो भारत में पैदा हुआ है और आइन्दा  होगा उसे 'हिंदुस्तानी' नहीं तो क्या 'सुल्तानी ' कहा जाएगा।  भारतीय  उपमहादीप के तमाम मुसलमानों को  सउदी लोग तब भी 'हिंदुस्तानीमुस्लिम' कहा करते थे। अब पाकिस्तान बांगला देश बन जाने पर  भारत के मुसलमान ' इंडियन मुस्लिम ' कहलाने लगे।यदि    हिन्दुस्तान का विभाजन नहीं हुआ होता तो  भारत के मुसलमान आज भी 'हिंदुस्तानी मुसलमान' ही के जाते। जब इंडिया के नागरिक  को 'इंडियन' कहा जा सकता है. तो हिंदुस्तान में रहने वाले को  'हिन्दू' क्यों नहीं  कहा  जा सकता ? याने झगड़ा हिन्दू-मस्लिम का नहीं  बल्कि ' हिन्दुस्तान' के भारत हो जाने का या  उसके  सहोदर पाकिस्तान  हो जाने का है। इसके लिएअतीत की  जो भी  विचारधारा जिम्मेदार  हो  उसका खुलासा जरूर होना चाहिए।  यदि भारतीय दर्शन और  विचार उसे गुलामी में धकेलता है तो उसका भी पर्दाफास होना चाहिए।  यदि कोई पाश्चत्य  दर्शन  भारत को आजादी का मंत्र देता है।  उसे लोकतंत्र ,धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद देता है।  तो उसका स्वागत वैसे ही करना चाहिए जैसे कि  दुनिया के ताकतवर  राष्ट्रों और कौमों ने किया है। भारत का जो-जो अतीत में सुंदर हो ,सत्य हो ,शिव हो उसे  अवश्य सहेजा जाना चाहिए किन्तु जो  - जो  निकृष्ट और शोषणकारी -दमनकारी है, उसका निष्क्रमण होना चाहिए।

                    मान लें कि ब्राह्मणों या ऋषियों ने चारों वेद लिखे होंगे !  उन्होंने ही  आयुर्वेद ,धनुर्वेद का भी संधान  भी किया होगा ! तब हो सकता है कि भारतीय उपमहादीप के ये 'सभ्य' लोग  अपने आपको विश्व गुरु मानने लगे हों ! किन्तु राष्ट्र तो तब भी नहीं था। जब राष्ट्र ही नहीं था तो राष्ट्रीयता या कोमियत का तो सवाल ही नहीं उठता।  भारत में संविधान , स्वतंत्रता ,समानता ,लोकतंत्र ,धर्मनिरपेक्षता की ही तरह ' राष्ट्रवाद' भी विदेशों से ही आया है। ठीक  आज के -टेलीफ़ोन ,मोबाईल,कम्प्यूटर,बन्दुक ,बम , बिजली और अति उन्नत  टेक्नोलॉजी की तरह।  जो कुछ भी आज भारत के  पास है, उसका पूरा- पूरा श्रेय 'विदेशी' तकनीकी और आयातित 'विचार '  को ही जाता है। भारत का उसका खुद का अतीत का जो दर्शन है वो अब सिर्फ मंदिरों में पूजा के काम आता है। कुछ तो  बाजारों में उत्पाद के रूप में खरीद-फरोख्त के काम भी आता है।भारत के अति-पुरातन  तीन शब्द  असि -मसि -कृषि ये तीन शब्द  ही ऐंसे हैं जो भारतीय अतीत  को उज्जवल-धवल बनाते है.  ये तीन शब्द आज भी  भारत  को  ज़िंदा रखे हुए हैं।  इनमें  विदेशी निवेश की जरुरत तो भगवान आदिनाथ  [ऋषभदेव]  को भी नहीं रही।  आज सत्ता सीन हिंदुत्व वादी  नेताओं  से पूंछा जाए कि आप  किसानों  को बर्बाद करने के लिए 'भूमि अधुग्रहं बिल ' संसद में पेश कर गीता के किस श्लोक का अनुशरण कर रहे हैं ? आप  जिस विदेशी एफडीआई पर फ़िदा हो रहे हैं  वो ऋग्वेद के किस मंत्र का भाष्य है  श्रीमान ? 


    श्रीराम तिवारी


                

नकारात्मक संघर्ष पर टिकी बिहार की डर्टी पॉलिटिक्स का यही असली रूप रंग है।


        अभीअभी निवृत्त  हुए याने भूतपूर्व हुए  बिहार के  मुख्यमंत्री  जीतनराम माझी का पटना में धरना- ड्रामा खत्म  भी नहीं हुआ कि चौथी बार पुनः तख्तनशीन हुए वर्तमान मुख्यमंत्री  नीतीश भी उपवास पर बैठ गए। माना कि  जीतनराम तो महज 'उतारा' कर रहे हैं।  किन्तु नीतीश को क्या हो गया ? क्या  अरुण जेटली  द्वारा प्रस्तुत  केंद्रीय बजट में बिहार को मिले काल्पनिक बम्फर  वित्तीय सहयोग में  भी कुचक्र की  आशंका नजर आ रही है ?  कहीं  वे  बिहार में जारी जातीय -धुर्वीकरण याने सत्ता  के  'तरलीकरण' हेतु  एक दिन के  उपवास  पर  तो नहीं जा बैठे ?  बिहार की  राजनीति  बाकई  बड़ी क्रूर और  भयानक है। मुंबई में मराठा अस्मिता वाले कटटरपंथी यदि 'बिहारियों'  से चढ़ते हैं , तो इसमें आपत्ति की क्या बात है ?
                   दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ अक्सर मजाक में कहते रहते हैं कि बिहारी नेता अपना बिहार तो क्या घर भी  ठीक से नहीं  संभाल  पाते । उन्हें देश और दुनिया की जातीयतावादी शोसल इंजीनियरिंग की राजनीती  की   फ़िक्र में दुबले  होने की  परम्परागत आदत है। इस  कुनवा  परस्ती और निज समाज  दुःख -कातर नामक बीमारी के लिए बिहार समेत सम्पूर्ण भारत  की 'जातीयतावादी' राजनीति  प्रमुख रूप से  जिम्मेदार  है। इस जातीयतावादी राजनीति  ने बिहार के दस-बीस परिवारों का भले ही भला कर दिया हो  किन्तु आर्थिक विकाश की सूची में तो  बिहार आज भी नंबर वन  'बीमारू' प्रदेश ही है।
                        बिहार  का उद्धार करने के लिए  लालू यादव, राबड़ी यादव ,पप्पू यादव ,साधु यादव ,रामप्रकाश यादव , मीसा यादव ,  असली यादव  ,नकली यादव  ,पासवान ,जीतनराम ,रमईराम और नीतीश ही  काफी नहीं थे  इसीलिये मध्यप्रदेश  ने अपने युवा तुर्क  शरद यादव  को  भी बिहार की  पिछड़े वर्ग की जातीय  राजनीति  में धकेल दिया। हो सकता है कि मंडल कमीशन की कृपा प्राप्त कुछ मुठ्ठी भर बिहारी अपनी वैयक्तिक   तरक्की कर चुके किन्तु इन सबने निर्धन -दमित  बिहार को और ज्यादा   बद  से बदतर हालत में  पहुंचा दियाहै । कभी-कभी लगता है कि शरद यादव को बिहार की और देश की नहीं सिर्फ अपने कैरियर की चिंता है।  इसीलिये चर्चा में बने रहने के लिए वे संसद में अश्लील  भाषण देते रहते हैं । जब बजट  पर  चर्चा  करनी हो तब वे महिलाओं के सौंदर्य और 'रेप' विमर्श पर प्रबचन देने लगते हैं। जब सत्ता पक्ष की नीतियों और कार्यक्रमों की यथार्थ के धरातल पर समीक्षा करनी हो तो वे संसद में 'मसखरी' करते हुए नजर आते हैं।  
 
            वैसे तो बिहार तभी से अशांत है जब उसने  कांग्रेस ,जनसंघ ,कम्युनिस्ट और असली समाजवादियों -राष्ट्रीय पार्टियों  की पटरी को  छोड़ कर क्षेत्रीय और जातीयतावादी दलों का  दामन  थाम लिया था। भाजपा और 'नमो' आजकल जिस 'कांग्रेसमुक्त' भारत का सपना देख रहे हैं , वह सपना तो विश्वनाथप्रतापसिंह की असीम अनुकम्पा से   बिहार और यूपी में मंडल कमीशन वालों का विगत शताब्दी के उत्तरार्ध में ही पूरा हो  चुका  था। 'संघियों' की दोहरी सदस्यता   के मुद्दे पर राजनारायण   ने जो  विद्रोह  का बिगुल  बजाया था  उसी से तो  जनता पार्टी ढाई साल में ही बिखर गयी।  उसी  जनता पार्टी के अवशेषों से ही १९८० में भाजपा  बनी।  अटल -आडवाणी -मुरली मनोहर जोशी  और विजयाराजे सिंधिया ने   ही तो मुंबई में भाजपा की स्थपान की थी।  जनता पार्टी के बिहारी अवशेषों से ही राष्ट्रीय जनता दल,जदयू  बने। ओड़िया अवशेषों से 'बीजद' बना।  कन्नड़ अवशेषों से 'जदएस' बना।  उसी  से यूपी में सपा बनी। उसी से 'जनता परिवार' के अन्य' दलदल ' और    कुकुर्मुत्ते पैदा हुए। जिन्होंने भारत की राजनीति  को नकारात्मक संघर्ष में धकेल दिया। बिहार उस डर्टी पॉलिटक्स का जीवंत उदाहरण है।
             १९७७  से अब तक  बिहार की राजनीति  पर जिन-जिन  का भी  कब्ज़ा रहा है , वही अबतक  आपस में  मिल बाँट  कर सत्ता सुख भोगते  रहे हैं।  वे ही  तत्व अब  कौरव पांडवों की तरह 'महाभारत' के लिए गुथ्थम -गुत्था हो रहे  हैं। दलगत कुकरहाव  के लिए अतीत में किये गए विश्वाश्घात जैसा ही ये 'माझी विद्रोह'  भी  था ! जातीयता के दल-दल में दल-बदल की घटनाओं  के लिए बदनाम ये नकारत्मक दल - कभी कांग्रेस का ,कभी भाजपा का  हाथ बताकर अपनी जग हंसाई कराते रहते हैं।

                              इन दिनों बिहार की  राजनीतिक  हांडी में  वासी कड़ी का उबाल जरा ज्यादा ही आया हुआ है।सत्ता संघर्ष  भले ही शांत  दिख रहा  है। विश्वाश मत हासिल कर नीतीश ने भले ही अपनी और जदयू की गिरती साख को बचा लिया है।  किन्तु जातीय ध्रुवीकरण का आंतरिक  संकट  और ज्यादा  गहरा गया  है। विगत दिनों नीतीश और माझी  के नेतत्व के सवाल पर जदयू में  हुए पिछड़ा वनाम महादलित  के सिन्धुमंथन  का  गरल माझी अकेले ही नहीं पिएंगे। पिछड़ा वर्ग को और खास तौर  से कुर्मी -यादव -मुस्लिम गठजोड़ कोसंघ परिवार से और महादलित परिवार से एक साथ जूझना होगा।  
                   जातीयता की राजनीति को धर्मनिरपेक्षता के आवरण में प्रस्तुत करना या   भारतीय राजनीति में  'बिहारी संस्करण '  का स्थाई चरित्र है। कहा जा सकता है की यह लड़ाई पिछड़ा वनाम महादलित की है।  किन्तु  वास्तव में यह  जातीयता  के नकारात्मक संघर्ष  पर टिकी  बिहारी - डर्टी पॉलिटिक्स का यही  असली  रूप रंग है। यह सामाजिक न्याय संघर्ष  के इतिहास  का सबसे   स्याह पन्ना है। अतीत में  निहित स्वार्थ  के द्वारा  अवैज्ञानिक सोच  के वशीभूत होकर सामाजिक विद्रूपता की  जो राजनैतिक बोनी की गई है । बिहार में अब  उसकी फसल काटने के दिन आये  हैं। बिहार की सनातन  -  सामाजिक ,राजनैतिक संरचना और लोकतांत्रिक आचरण की  तस्वीर  भविष्य में भले ही  कुछ  चमकदार हो।  किन्तु अभी फिलहाल तो अविश्वाश के कुहांसे और घात-प्रतिघात की गर्द  ने  पिछड़ा -दलित  वाली   सोशल इंजीनियरिंग की  छवि बदरंग कर रखी   है।
                                     अंग्रेजों की  'फूट  डालो राज करो' की नीति से देश पहले ही  सामंतयुगीन भारत में   हिन्दू -मुस्लिम  ही नहीं , हिन्दू -सिख या हिन्दू बनाम  ईसाई  ही नहीं  बल्कि वैष्णव ,जैन,बौद्ध , शाक्त ,शैव और अनेक मत-पंथ वाले आपस में संघर्षरत रहते थे । देश पहले से ही  दलित  वनाम सवर्ण के द्व्न्द का  'दंश' को झेल रहा था।चूँकि सत्ता पिपासा के निमित्त  सुलगते - झुलसते भारत में मंडल कमीशन का अवतार हुआ। यह राम मनोहर  लोहिया , जयप्रकाश नारायण  जैसों  की असीम अनुकम्पा से बिहार में परवान चढ़ा। ,विश्वनाथ प्रताप सिंह की  सत्ता पिपासा से  ,कर्पूरी ठाकुर  ,भोला पासवान ,लालू यादव - मुलायम   यादव -पासवान -नीतीश कुमार -शरद यादव की राजनैतिक अभिलाषा से  , इस 'मंडल कमीशन'   की अवैज्ञानिकता  ने भारत के  वास्तविक पिछड़ों या  गरीबों को तो कुछ खास मदद नहीं की। किन्तु जातीयता के नाम पर अमीरों -जागीरदारों -जमीनदारों -व्यापारियों  को पिछड़ा  घोषित कर सनातन सत्ता का दावेदार बना  दिया।  नीतीश -मांझी संघर्ष इसी कुत्सित राजनीति का घ्रणित प्रमाण है।
                 शायद  मंडल कमीशन  को सपना आया  होगा  की किसी भी  लँगोटीधारी -कमण्डलधारी को या उनके आधुनिक वंशजों को  किसी भौतिक हित  साधन की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि वे  तो जन्मना ही 'स्वर्ण' हैं ।  आजाद भारत के इतिहास में विगत ५०  सालों से लगातार , यूपी -बिहार की सत्ता दलित या पिछड़ों के हाथ में ही रही  है। यदि इन  पचास  सालों में यूपी बिहार का सत्यानाश  हुआ है। यदि  वर्णभेद में इजाफा हुआ है , यदि वर्ण संघर्ष में इजाफा हुआ है और यदि आज बिहार में पिछड़े -दलित ही आपस में कुकरहाव कर रहे हैं तो  इसकी जिम्मेदारी  क्सिकी है ? यह तय होना अभी बाकी है।  अनवरत जातीय  आरक्षण  मिलते रहने के वावजूद यदि बिहार में अत्यधिक गरीबी है ,यदि बिहार में जातीयता का  शत्रुतापूर्ण दमनचक्र जारी है यदि   जातीयता की  घटिया राजनीति  बिहार को निगल  रही है तो '' जिन्दा  कौम  पांच साल का  इन्तजार क्यों कर रहीं है? दिल्ली में सम्पन्न विधान सभा चुनावों से सबक क्यों नहीं सीखते ? कांग्रेस ,भाजपा ही क्यों त्याज्य हों ? क्या नीतीश ,शरद ,लालू ,पासवान या मांझी की कोई आर्थिक सोच भी है ? क्या वे पूँजी निवेश ,उदारीकरण ,कार्पोरेटाइजेसन  और भृष्टाचार  के खिलाफ हैं ? यदि हाँ तो वे इन सवालों पर वामपंथ के साथ जनांदोलन में क्यों नहीं उतरते ? वाम पंथ  के साथ  न सही  अण्णा  जैसे या केजरीवाल जैसे व्यक्तिनिष्ठ किन्तु 'सदाचरण' के आकांक्षी आन्दोलनों  से क्यों नहीं सीखते ? केवल लोहिया -लोहिया जपने से ,धर्मनिरपेक्षता का जाप करने से  सामाजिक  असमानता मिट जाएगी क्या ? सामाजिक असमानता तो तभी मिटेगी न  ! जब कि  आर्थिक असमानता को मिटा दिया जाए !
                                                            यदि लाखों  को अगड़ा बताकर -भारतीय समाज  के एक बड़े हिस्से को निरंतर गरियाते रहोगे और जातिगत आरक्षण का लाभ केवल मलाईदार लोगों तक पहुँचते रहोगे तो मलाई का चस्का लग जाने  और सत्ता मिल जाने के बाद कोई जीतनराम सत्ता क्यों छोड़ेगा ? लोकतंत्र  का अभीष्ट है कि आर्थिक -सामाजिक और राजनैतिक  समानता  सभी को सामान रूप से मिले। सत्ता  प्रतिष्ठान पर पकड़ बनाने के लिए  वोट बैंक चाहिए। यदि  वोट  कबाड़ने के लिए यदि आरक्षण  का झुनझुना बजाते रहोगे।  सोसल इंजीनियरिंग का राग छेड़ते रहोगे तो  बिहार में आज  जिनके हित  असुरक्षित हैं  वे इस अवसर  का लाभ क्यों नहीं  उठाएँगे ?  जो  तत्व विहार को बर्बाद करने के जिम्मेदार हैं यदि वे आपस में लड़ रहे हैं तो  सत्ता से  वंचित वर्गों को शोषित पीड़ित वर्गों को एकजुट होकर इस अवसर  का लाभ उठाना चाहिए। बिहार में कांग्रेस को खत्म हुए ४० साल हो चुके हैं।  जनसंघ या भाजपा को कभी एक दिन के लिए भी   बिहार में  स्वतंत्र सत्ता नहीं मिली।  आजादी के बाद जब शुरुआती दौर में बिहारकी राजनीति  पर कांग्रेस का कब्जा था तब विपक्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  ही हुआ करती  थी। उसके सांसद  और विधायक  दर्जनों हुआ करते थे। बिहार के कम्युनिस्टों को  पूँजीपतियों  ने या कांग्रेसियों ने नहीं बल्कि सामाजिक इंजीनियरिंग के  लुच्चे -लफंगों और हत्यारे पप्पू यादवों ने  ही  मारा  है।  चूँकि कम्युनिस्ट सभी  जातियों ,सभी मजहबों के मजदूर -किसानों   को एकजुट कर एक वर्गविहीन -जाती  विहीन  अर्थात अगड़ा -पिछड़ा विहीन समाज बनाना चाहते थे। इसलिए उत्पादन के साधनों पर काबिज बलवान गैर  सवर्ण जातियों के नेताओं  मंडल  आयोग का जमकर दुरूपयोग किया। चूँकि यूपी में कासीराम ने कुछ सफलता पाई  और मायावती  भी २-३ बार सरकार बनाने के स्तर तक पहुँच गयी।  तो बिहारी  दलित भी अब पिछड़ों को धक्का देकर सत्ता में  बने रहना चाहते हैं। जीतनराम  को उकसाने वाले केवल नरेंद्र मोदी या सुशील मोदी ही नहीं हैं।  केवल भाजपा को ही अपना भविष्य उज्जवल नहीं दिख रहा बल्कि दलित राजनीति के स्तम्भ पासवान ,रमईराम और  अन्य मौकापरस्त भी इस खेल में शामिल हैं।
                                  वेशक लोकतंत्र में सभी को  अपनी स्थिति मजबूत करने का अधिकार है। अतीत में  यदि   कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए  वी पी सिंह ने  एक तरफ  भाजपा  दूसरी तरफ  कम्युनिस्ट पार्टियों का  सहयोग लिया था।  तो अब जीतनराम माझी भी भाजपा या राजद के विद्रोहियों का समर्थन क्यों नहीं ले सकते। यदि  मंडल का सहारा लेकर  कर्पूरी ठाकुर ,  लालू यादव,नीतीश , रामविलास   पासवान सत्ता सुख  भोग सकते हैं तो माझी भी  पिछड़ा बनाम  अति दलित -महादलित का टंटा  पैदा  क्यों नहीं करेगा ?  जो ताकतें पिछड़ा बनाम दलित के संघर्ष को ' हवा' दे  रही  हैं  वे नया क्या कर रहीं हैं  ? वैसे भी यह   महज  पिछड़े बनाम दलित या महादलित का संघर्ष नहीं है। यह  संकट केवल नीतीशकुमार  बनाम जीतनराम  माझी  का भी नहीं है। यह संकट सिर्फ बिहार विधान सभा बनाम राज्यपाल का  भी नहीं है।  बिहार के  इस वर्तमान   राजनैतिक संकट में  लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के असली पहरुए भी अवश्य  प्रभावित  होंगे।  उनका सकारात्मक हस्तक्षेप  अपेक्षित है।
                                       नीतीश और जदयू को समझना होगा कि  भाजपा  या नरेंद्र मोदी को दोष देने लायक इस घटनाक्रम में कुछ नहीं है। राज्यपाल ,सभापति या  राष्टपति के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा प्रहसन मांझी की सत्ता लिप्सा और  उसकी वैचारिक [अ] प्रतिबध्दता का निरूपण मात्र है।  नीतीश शरद को कोई ढंग का  विश्वाश पात्र 'मोहरा'  ढूंढ़ना चाहिए था।  लेकिन अब पछताए होत  क्या चिड़िया चुग गई खेत। नीतीश -शरद को  सत्ता की दुबारा जुगाड़ के  बजाय आगामी विधान सभा की तैयारी करने चाहिए।  उधर जीतनराम  को मालूम हो कि  बकरे की माँ ईद तक भी खेर नहीं मनाती ! वो चाहे तो  भाजपा प्रसाद पर्यन्त '  कुछ दिन और सत्ता  सुख उठा ले।  किन्तु भाजपा की समस्या जीतनराम नहीं हैं।  भाजपा  के अश्वमेध का घोड़ा पाटलिपुत्र की ओर  बढ़  रहा है।
                              वर्गीय समाज में  शोषित-पीड़ित -दलित मनुष्य के  मानवीय सरोकारों  व ततसम्बन्धी संघर्ष या   द्वंद  की अवस्था में समाजशास्त्रियों की भिन्न -भिन्न स्थापनाएँ मौजूद   हैं। हालांकि इन सभी स्थापनाओं और सिद्धांतों का  प्रेरक   वह प्राकृतिक न्याय  का सिद्धांत  है- कि अंततोगत्वा  'न्याय  शकिशाली का  ही  पक्षधर होगा' । यह  प्रमेय  उस सिद्धांत से प्रेरित नहीं है कि  'जिसकी लाठी उसकी भेंस'  !  बल्कि वह तो  जंगल के वातावरण में शेर और बकरी के रूपक से रूपायित किया जाना शक्य है। चूँकि  कुदरत ने शेर को वो सब दिया  है जिससे वह बकरी तो क्या  हाथी  को भी चीर सकता है। बकरी लाख मिमयाये किन्तु बिना नख दंत के वह शेर के सामने असहाय ही है।  सामान्य  तर्क बुद्धि  का सूक्त वाक्य  है - 'बकरियों के सामने एक ही रास्ता है कि वे शेर के खिलाफ एकजुट हो  जाएँ' !  क्रांतिकारी  तार्किकता कहती है  कि केवल  शेर से आक्रान्त  बकरियां  ही नहीं ,  केवल शेर  से आक्रांत वन्य प्राणी ही नहीं ,बल्कि  हर किस्म के अमानवीय  अत्याचार , आतंक  और अन्याय से पीड़ित  मनुष्यों को भी  एकजुट होकर  उस दरपेश  असभ्य - नृशंसता का  मुकाबला  करने के अलावा कोई चारा नहीं !

               राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के  दौरान  जब क्रान्तिकारी  जन नायकों को आजादी की उम्मीद जागने लगी तो वे  देशी -सत्ता संचालन की  खुदमुख्तारी के लिए भी सोचने लगे।  मुख्यधारा के नेताओं -पंडित मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी और राजेन्द्रप्रसाद    जैसे धर्मनिरपेक्ष  अहिंसावादी वरिष्ठ  वकीलों ने  राजनैतिक स्वाधीनता ,लोकतंत्र , धर्मनिरपेक्षता पर जोर दिया। बाबा  साहिब आंबेडकर  और लोहिया जी ने  इन मूल्यों के  अलावा आर्थिक -सामाजिक और राजनैतिक  असमानता  के  विमर्श  पर भी  खाका खींचा ।मुस्लिम लीगी  और हिन्दूमहासभाई अपनी ढपली अलग बजा रहे थे। सभी के  खांचे  समीचीन थे।
पुनर्जागरण कालीन दयानद सरस्वती , विवेकानंद  ,  राम मोहनराय ,ज्योतिबा फुले ,पेरियार  ही नहीं बल्कि उनके उत्तरधिकारी - गांधी ,  और सुब्रमण्यम भारती इत्यादि भी  आजीवन  न केवल राष्ट्रीय एकीकरण की समस्यायों से  बल्कि भारतीय समाज की जड़ता और उसकी कुरीतियों से  जूझते रहे।ये महापुरुष 'वर्ग सहयोग' के अनुशरण में यकीन रखते थे। गांधी जी तो इसके सबसे बेहतरीन सिद्धांतकार माने गए हैं।

                     इनके अलावा वे लोग भी इस दिशा में प्रयासरत थे जो  न केवल  भारतीय पृष्ठभूमि के संघर्षों और द्वन्दों की समझ रखते थे बल्कि यूरोपियन रेनेसां को  भी समझते थे। उन्हें  फ्रांसीसी क्रांति, महानतम  सोवियत  अक्टूबर क्रांति और  दो -दो विश्व युद्धों के कारकों की बेहतर समझ  भी थी ।  इन्ही लोगों में से एक  राम मनोहर लोहिया  थे। दूसरे  थे बाबा साहिब आंबेडकर।  बाद में  जय प्रकाश नारायण  भी कांग्रेस छोड़ लोहिया  खेमे  में आ गए । ये लोग मार्क्सवाद से प्रभावित थे।  इसलिए वे सामाजिक शोषण -उत्पीड़न को आर्थिक असमानता जनित   अन्याय  से भी  बदतर समझते थे।   सामाजिक  बिडम्ब्नाओं के बरक्स  साम्यवाद  से या मार्क्सवाद  इतर  'वर्ग संघर्ष' की जगह 'वर्ण संघर्ष' पर ही उनका जोर था।  अगड़ा-पिछड़ा -दलित -महादलित का  जातीय संघर्ष  भारतीय लोकतंत्र और भारत राष्ट्र का कोढ़ बन   चुका  है।
                                  यदि देश में वर्ग संघर्ष की संभावनाएं क्षीण हो रहीं हैं ,यदि नीतीश ,पासवान, जीतराम लालू और  मायावती आपस में उलझ रहें तो यह उस बिल्ली को तो उचित लगेगा जो छींका टूटने का इंतजार कर रही है किन्तु जो सामाजिक ,आर्थिक असमानता को खत्म कर न्याय ,बराबरी और लोकतंत्र -धर्मनिरपेक्षता का शासन चाहते हैं वे मायूस हैं।  बिहार में नीतीश ने मांझी पर यकीन किया वो गलत फैसला था।  माझी 'प्यादे से फर्जी भये और टेड़े टेड़े चलने लगे तो यह बुरा हुआ।   चूँकि  यूपी बिहार में सामाजिक  शक्तियाँ  बदनाम हो चुकीं हैं।  चूँकि  पिछड़ा,अति पिछड़ा ,दलित -महादलित का तो कोई भला नहीं हुआ लेकिन  दस बीस बिहारी पिछड़े दवंग  हो गए हैं दस बीस यूपी वाले पिछड़े और दो-चार दलित नेता और नेत्रियां  मालामाल  हो चुके हैं इसलिए  यह दौर सामाजिक  और जातीयता के अवसान का है। अब माझी को यदि मोदी प्रिय हैं या नीतीश को लालू प्रिय हैं तो ये सभी विवशताएँ मात्र हैं।  केंद्र में मोदी सरकार की समग्र  प्र स्तुति और भारतीय हिन्दू समाज में 'संघ' के एकीकरण  प्रयास    यदि आज इतने उद्दाम और  सर्वस्वीकृत  हो रहे हैं तो इसकी वजह लोहिया की विचाधारा का भग्नावशेषीं करण  ही  है।  जिन-जिन ने जातीयताबाद के नाम पर देश को लूटा और जो साम्प्रदायिकता के नाम पर अभी मजे कर आरहे हैं वे  सभी इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने  को अभिशप्त
 हैं।
                                 श्रीराम तिवारी 

गुरुवार, 12 मार्च 2015

हम डंके की चोट कहते हैं कि 'आप' पूँजीवादी दलों की तलछट मात्र हैं !


 भारतीय 'मीडिया' -डिजिटल ,इलेक्ट्रॉनिक और अखवारों की बलिहारी है। 'हिंदी चेनल्स की महिमामयी  परंपरा है कि  पहले तो  ये  खुद ही भीड़  की ओर  पत्थर उछालेंगे , 'तीर में तुक्का 'मारेंगे  फिर उसी के ऑडिओ-वीडिओ  दिन-दिन  भर अपने 'सुदर्शन' चैनल पर दिखाएंगे। ये खबरची चैनल  वे  खबरें चलाते हैं जो किसी ने नहीं कहा हो !   ये वो वयान जारी  करेंगे जो किसी ने या तो कहा ही नहीं होगा या कुछ और ही  कहा होगा। इन्हे  मालूम  रहता है कि असल में  क्या कहा गया है ?  किन्तु ये वही सुनवाते हैं जो सच नहीं होता बल्कि उत्तेजक और कीचड़ उछाल होता है। इसमें मुँह  देखी  का सरोकार भी छिपा हुआ होता है।  जिस -किसी के मुँह  से  अनकहा  कहलवाने का माद्दा  होता है वही टीआरपी का सरताज होता है। जिस में  यह असत्य आचरण का गुर न हो वो क्या खाक 'मीडिया' में सुर्खरू  होगा ! कुछ चेनल्स पर एंकर  बार -बार चीख-चीख कर कहता है  कि देखो -रे देखो ! गजब हो गया  ! जब  कोई पूंछता है कि  क्या हुआ भाई  ?तो कहता है रुको  ! एक  ब्रेक के बाद बताएँगे ! कल -परसो  सीडी का खुलासा करेंगे। शानदार 'धमाका' होगा। इनकी नजर में भयानक दुर्घटना या बुरी खबर भी 'शानदार' ही होती है। भले ही बाद में खोदा पहाड़ और निकली चुहिया !
                               एक नयी- नयी  मामूली सी  राजनैतिक पार्टी है  'आप'  जिस की निहायत मामूली  सी बात को लेकर भारत का समग्र मीडिया हलकान हो रहा है।बहरहाल 'आप' में कोई ख़ास समस्या नहीं है। 'आप' ने अभी  तक ऐंसा कोई काम नहीं किया कि  उसे मुँह  छिपाना पड़े या गर्व से सीना तान सके।मीडिया की खबरों से आहत होकर दिल्ली की जनता को भी  शर्मिंदा होने की जल्दी नहीं मचानी  चाहिए।  जिन्हे 'आप' से कोई लेना-देना नहीं उनके पेट में  मरोड़  उठती है तो उठा करे । जिनके  जुमले कुछ इस तरह हैं ! 'आप' से यह उम्मीद तो न थी ! 'आप' का सर्कस कब तक जारी रहेगा ?  क्या अपनी खांसी के बहाने दोस्तों का  ही स्ट्रिंग करवा रहे हैं केजरीवाल ?  हालाँकि  इस बहाने एक सकारात्मक सन्देश भी जनता को गया। आंतरिक लोकपाल  ,डेमोक्रसी , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , वैचारिक मतभेद और पार्टी अनुशासन इत्यादि शब्दों को देश के सामने कुछ चेनल्स ने बार-बार दुहराकर बड़ा उपकार किया है। लेकिन कुछ चेनल्स की महिमा  बड़ी न्यारी है। अपनी टीआरपी के  चक्कर में वे कुछ इस तरह आपाधापी कर बैठते हैं कि उनके मुख पर  वयान तो  सपा नेता रामगोपाल यादव का  होता है किन्तु  टीवी स्क्रीन पर चेहरा फिल्म निर्देशक रामगोपाल वर्मा का दिखाया जाता है  !

             'आप' के आंतरिक बिखराव और उसकी अपेक्षित  दुर्गति के  बहाने  भारतीय मीडिया ने सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को ,उनके विश्व विख्यात नेता और हमारे प्रधानमंत्री श्री  नरेंद्र मोदी को भी कुछ घंटों के लिए  भुला ही दिया। नसीबवालों को भी पीछे  छोड़ दिया। दिल्ली में तो मीडिया की भेड़चाल ने  'आप' को   क्रिकेट वर्ल्ड कप की चर्चा पर  भी बढ़त प्रदान कर दी। वेशक इन दिनों कुछ  भोले  -भाले लोग और  राजनीति  में नए-नए दीक्षित नेता -कार्यकर्ता  बड़े बैचेन  हैं। वे   इस 'आम आदमी पार्टी '  के मामूली आंतरिक कुकरहाव से इसलिए  विचलित हैं । कदाचित  यह स्वाभाविक भी  है ! भगवद्गीता के अनुसार  जब व्यक्तिगत  कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उतपन्न हो सकता है, तो सर्व समावेशी 'सामूहिक हितों ' की कामना  रुपी खीर में मख्खी गिरने का दुःख किसे न होगा ? 'आप'  से उम्मीद रखने वालों को ठेस न पहुंचे यह कैसे हो सकता है ?  'आप' के चिर आलोचकों  की बात  जुदा  है।  मैं तो डंके की चोट कहता  है  कि  'आप'  पूँजीवादी  दलों की तलछट मात्र  हैं। हालाँकि  'आप' के  हाथों पराजित दोनों बड़े दल भाजपा और कांग्रेस 'आप' की अंतर्कलह  से गदगद हैं। उनकी ख़ुशी छिपाए नहीं छिप रही है।
                        भारत की सबसे ताजातरीन राजनैतिक पार्टी 'आप' जो कुछ भी प्रस्तुत कर रही है, जो कुछ भी आउट पुट दे पा   रही है, उसका वास्तविक - सर्वश्रेष्ठ  स्वरूप सिर्फ और सिर्फ  यही है। 'आप' के  वर्तमान तथा - कथित  स्खलन या 'प्रहसन' को जो लोग पसंद नहीं करते , जो  मन ही मन दुखी  हो रहे है वे  या तो बड़े ही  भोले हैं। जो लोग  बछिया के ताऊ हैं या शुद्धतम  अराजक प्राणी हैं वे यह भूल जाते हैं कि  'आप' का राजनैतिक  दर्शन वही है जो कांग्रेस का है। प्रकारांतर से जो भाजपा का भी  है। डॉ मनमोहनसिंह का अर्थशाश्त्र ही अरुण जेटली का अर्थशास्त्र है। केजरीवाल का तो कोई अर्थशास्त्र ही नहीं है। वे उत्पादन या निर्माण बाबत एक शब्द नहीं जानते।  केवल  बिजली-पानी फ्री में देने का वादा कर देने या किसी का स्ट्रिंग  आपरेशन करके ब्लेकमिलिंग करने से वे भाजपा और कांग्रेस जैसी भृष्ट पार्टियों पर दिल्ली में हावी हो सकते हैं। किन्तु इस विशेष गुण मात्र से  वे उन पूंजीवादी दलों से पृथक  कैसे हो सकते हैं ? जब तक पूंजीवादी राजनीति का विकल्प सामने नहीं आता तब तक इसी  व्यवस्था  का  नग्न दर्शन इसी तरह  होता रहेगा।  केवल स्ट्रिंग  आपरेशन करने -करवाने से  या मीडिया में वयानबाजी करते रहने से 'आप' कोई क्रांतिकारी नहीं हो जाते !  महंगाई ,बलात्कार ,भृष्टाचार ,दल-बदल  , वेरोजगारी ,किसान -आत्महत्या और श्रम  की  लूट-खसोट के विहंगम दृश्य 'आप' का भी पीछा नहीं छोड़ने वाले। इन मुद्दों से ध्यान हटाकर भारत का मीडिया  १० माह पुराने एक   काल्पनिक स्ट्रिंग आपरेशन पर जनता को बरगला रहा है। सबको मालूम है कि एक साल पहले हुए दिल्ली राज्य चुनाव में भाजपा को ३२ ,'आप' को २८ और कांग्रेस को ८ सीट मिलीं थीं।  जब भाजपा  बहुमत नहीं जुगाड़  सकी तो उपराजयपाल ने   'आप' को बहुमत  जुगाड़ने का अवसर दिया। उसमे यदि 'आप' नेताओं ने कांग्रेस या किसी अन्य विधायक से समर्थन माँगा  तो इसमें क्या अनर्थ हो गया ? आजकल मुख्य धारा के  मीडिया का इसी को  लेकर  भारी वितंडावाद चल रहा है ।   यह देशभक्तिपूर्ण कार्य नहीं कहा जा सकता !
                       ' आप'से ज्यादा झगड़े कंग्रेस में हैं।  जो लगातार हाराकिरी की ओर  अग्रसर है। उसके शीर्षस्थ नेतत्व में इतना बिखराव है कि  भूतपूर्व प्रधानमंत्री भी आरोपी बनाया जा चूका है। उधर राहुल का अवकाशकाल भी कमरहस्य्मय और  रोचक नहीं है। भाजपा की और एनडीए की अंदरूनी हालत  का आलम ये है कि मोदी जी और शाह जी की जोड़ी ने तो मुफ्ती को मुफ्त में  कश्मीर का मुख्यमंत्री ही बनाया। जिसने मुसर्रत आलम जैसे दस लखिया इनामी आतंकी को तत्काल छोड़ दिया। भाजपा की मातृसंस्था   'संघ '  ने  तो गजब ही  कर दिया । संघ के मुख पत्र 'ओागेनाइजर' को शिवसेना के चीफ उद्धव ठाकरे  ने 'मूर्खपत्र' ऐसे ही नहीं कहा। पक्की खबर है कि 'ओर्गेनिजर' के मार्फ़त 'संघ' ने  कश्मीर ही पाकिस्तान को दे दिया।  ये बात अलग है कि  पाकिस्तान के आतंकी अब हिन्दुस्तान को ही निगल जाने को बेताब हो रहे होंगे। भारत के मीडिया को ये सब नहीं दीखता । उसने तो केवल पहले  'आप' -'आप' की धूम मचा रखी है। 
                                 वेशक 'राजनीति'  न तो स्वच्छ होती है और न ही गन्दी। वह तो  सिर्फ 'राजनीति ' ही होती है।  जैसे की चाकू न तो 'असुंदर'  होता है और न  ही सुंदर।  वह तो महज चाकू ही होता है। जब उसे किसी निरीह  - निर्दोष की हत्या के निमित्त  प्रयुक्त किया जाता है तो वह 'वीभत्स'  दिखता  है। जब वह  आपरेशन थिएटर  में डॉ के हाथों में होता है तो वैल्यूएडेड दिखता है। रसोई  घर में तो  सब्जी काटते समय यदि भोंथरा चाकू भी मिल जाए तो बड़ा 'प्रिय ' हो जाता है। राजनीति  और चाकू दोनों मानवता के लिए हैं।  लेकिन जब राजनीति  या चाकू के हाथों इंसान ही खिलौना  बन जाये तो उसे पूंजीवादी -अर्धसामन्ती व्यवस्था का नासूर कहते हैं। कांग्रेस ,भाजपा और 'आप' इस  नासूर को आपरेशन नहीं कर सकते। सिर्फ मार्क्सवाद  -लेनिनवाद  - सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद ही उसकी शल्य क्रिया कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महान  अक्टूबर  क्रांति के कृतघ्न  कौन हैं ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया में उद्दाम पूँजीवाद  के लिए 'वासंती' मौसम है।  भारत के   केरल ,बंगाल  में वामपंथ  को जन समर्थन में कमी  आने मात्र से वह महान  विचारधारा ख़ारिज  या अर्थातीत नहीं हो जाती। क्रांति के लिए आज भी  यही एक  वैज्ञानिक और क्रांतिकारी दर्शन मुफीद है। उसके लिए असल चीज  है वर्गीय चेतना ।जिस तरह   बादलों की आवाजाही से सूरज का उगना बंद नहीं हो जाता।  जिस तरह बादलों में सूरज छिपने का मतलब रात्रि नहीं  हो जाता । इसी तरह इस दौर में पूँजी के खेल के कारण परिश्रम और सत्य की महत्ता खत्म नहीं हो जाती।  यदि रात्रि  हो गयी तो कौन गजब हो गया ?सुहानी सुबह  के आगमन को कौन रोक सकता है?

                            महात्मा गांधी , पंडित नेहरू , बिनोबा भावे , लाल  बहादुर शास्त्री ,जयप्रकाशनारायण  जैसे  उटोपियाई  'महापुरुषों' को यकीन रहा है कि यदि आदमखोर शेर के सामने  अहिंसक ' सत्याग्रह ' किया जाए  तो  बियावान  जंगल में वह दरिंदा  तम्हारे प्राण  बख्स देगा ! अण्णा  हजारे जैसे 'भोले'  सामाजिक कार्यकर्ता भी वही ढपली बजाते रहते हैं।  उनकी कीर्तन मण्डली के आधा दर्जन चेले -चपाटे जब 'सत्याग्रह और जन संघर्ष से उक्त गए तो वे पूंजीवादी संसदीय राजनीति  के अखाड़े में 'लतखौआ'  बन बैठे।  जहाँ जनता के दुर्भाग्य से   ये  नौसिखिये प्रशिक्षु - नामी पहलवानों  को पछाड़कर  दिल्ली राज्य की कुर्सी हथियाने में सफल हो गए।
                          
                             यदि दिल्ली राज्य विधान सभा चुनाव में 'आप' बीच में नहीं आते तो क्या होता ?  तो दिल्ली में कांग्रेस शून्य पर आउट नहीं होती। तब शीला दीक्षित गुमनामी के अँधेरे में नहीं धकेली जातीं।  तब  भाजपा  दिल्ली राज्य की सत्ता में भी होती। तब मोदी जी और भाजपा का अहंकार  अपने चरम पर होता ! तब बिहार में नीतीश नहीं माझी ही सत्ता   के मजे ले रहे होते ! तब  दिल्ली में भाजपा के एक दर्जन नेता मीडिया की आँखों के तारे होते ! तब किरण बेदी को 'उधार का सिन्दुर ' नहीं लगाना पड़ता। तब अन्ना के पेट में मरोड़ नहों उठती।  तब योगेन्द्र ,प्रशांत और अन्यों को इस तरह रुस्वा नहीं होना पड़ता। तब अरविन्द केजरीवाल को न तो  दिल्ली का मुख्यमंत्री  बनने का सौभाग्य मिलता न बेंगलुरु में 'नेचरोपैथी'से इलाज कराने की  नौबत आती। अभी तो मैं यही कहूँगा कि 'आप' की  राजनैतिक यात्रा मंगलमय हो !
                                   
                             श्रीराम तिवारी 

मंगलवार, 10 मार्च 2015

अमर शहीद-भगतसिंह -राजगुरु -सुखदेव की शहादत को चिरस्मरणीय बनाते हुए- काव्यात्मक श्रद्धाँजलि !







         मुक्ति  संग्राम में मेरा ,अपने  इष्ट से मिलन  हो गया।।

         पग शहीदों ने आगे धरा  ,वो युग का चलन हो गया।


          गुलामी के फंद  काटने , जब  जवानियाँ  मचलने  लगीं ,

         तब  क्रांति यज्ञ वेदी  पर , शहादत  का  हवन   हो गया।,,,,,[मुक्ति संग्राम में मेरा ……… ]


         कालकोठरी में एक-एक क्षण , विप्लव के संग हम जिए,

          जन -जन हुंकार जब उठी ,अरुण  तब लाल  हो गया।।


         मानव   इतिहास ने  सभी ,ग्रन्थ रचे  दासता भरे ,

        स्वतंत्रता अहम  हो चली , संघर्ष जब  वयम  हो गया।,,,,,,,,,[मुक्ति संग्राम में मेरा ,,,,,,,,,]


         धुंध भरे  व्योम में  हम , धूमकेतु  जब बन  गए ,

         गुलामी  को चीरकर तब , राष्ट्र  कुंद इंदु हो गया।।


         कालजयी क्रांतियों के ,पृष्ठ  कुछ हम भी लिख चले ,

         विचारों के नीड में परम ,सत्य से  मिलन हो गया।,,,,,,,,,,,,,[मुक्ति संग्राम में मेरा ……]


         अंजुली में अर्ध्य को  लिए, 'इंकलाब ' गुनगुना चले ,

         छंदों के क्षीर सिंधु में , श्रेष्ठ  महा मंत्र  हो गया।।


        जुल्म की सुनामियों के , क्रूर दिन जब  लद चले ,

         मुल्क  की आजादी का , हमको  इल्हाम हो गया।,,,,,[मुक्ति संग्राम में मेरा ....]


        संघर्ष सिंधु मंथन का ,गरल  कंठ हमने धरा  ,

        चूमा फांसी के फंदे को , मानों मीत से मिलन हो गया।।


      सींच अपने लहू से हम ,नए वतन का सृजन  कर चले ,

      क्रांति का परचम लिए , धन्य अपना गमन हो  गया।


     मुक्ति संग्राम में मेरा , अपने इष्ट से मिलन हो गया।।



                                                : -श्रीराम तिवारी:-

  

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

"हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखि न जाये '' का मंजर क्यों नजर आ रहा है ?

 इससे पहले कि  भारत के प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र मोदी जी अपनी  राजकीय यात्रा पर श्रीलंका पहुंचें  वहां  के नवनिर्वाचित  राष्ट्रपति श्री विक्रम सिंघे ने भारतीय मछुआरों को चेतावनी दी है कि  'अंतर्राष्ट्रीय  समुद्री सीमा  का उलंघन  किया तो गोली  मार दी जाएगी '। किसी  काल्पनिक  अनुलंघनीय अपराध के लिए  कोई छटाक भर का 'टापू-देश ' भारत   जैसे महानतम लोकतान्त्रिक राष्ट्र की जनता को इस तरह की धमकी देता रहे  और सत्तारूढ़ नेता बगलें झांकते रहें तो  धिक्कार है ऐसी घटिया राजनीति  को और सत्ता पर काबिज नेतत्व को !  परोक्ष रूप से श्रीलंका के राष्ट्रपति ने   मछुआरों को नहीं बल्कि  भारत के बड़बोले - सत्तासीन नेताओं को  ही  'हवाई थप्पड़ मारा  है " !  नसीबवालों की असीम अनुकम्पा से अभी तक तो अमेरिका , पाकिस्तान  ,नेपाल ,बांग्ला देश और  चीन  ही  भारत को पीसने में जुटे थे किन्तु   अब ये श्रीलंका रुपी बिलोंटा   भी  'मियाऊं -मियायुँ  करके  वर्तमान 'लोह पुरुष' को  बिल्ली सावित  कर रहा है ! पता नहीं  क्या बेबसी है इन नसीब वालों की ? कहीं भी  तो अच्छे दिन उनकी पकड़ में  नहीं आ रहे हैं !  स्वनामधन्य राष्ट्रवादियों  परम  - राष्ट्रभक्तों  की सरकार के होते  हुए  भी -"हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखि न जाये '' का मंजर क्यों नजर आ रहा है ?

   यूपीए के विगत  दस सालाना कार्यकाल को भारत की जनता ने एक अपरोधबोध की तरह भुगता है । गठबंधन धर्म निभाते-निभाते डॉ मनमोहन जी  'सिंह' से 'मेमना' हो गए थे। अपनी कार्पोरेटपरस्त अर्थनीति के अनुग्रह  से  गृह,विदेश, वित्त, टेलीकॉम ,रक्षा , रेल ,खेल ,तेल  और  पेट्रोलियम या खनिज समेत कोई भी मंत्रालय या सेक्टर नहीं  बचा था, जहाँ तत्कालीन प्रधान मंत्री को  'बेबसी' का सामना  न करना पड़ा हो ! उनकी  इस बेबसी ने मई-२०१४ मेंअपना  असर दिखाया। देश की जनता ने, यूपीए और कांग्रेस को , न केवल सत्ता से बल्कि सत्ता की  राजनीति  से ही 'तड़ीपार' कर दिया। बेशक वह स्याह कालखण्ड - डॉ मनमोहनसिंह का नहींथा  ,यूपीए का नहीं था  ,कांग्रेस का  भी नहींथा  ,सोनिया गांधी का नहींथा  ,राहुल बाबा का भी  नहीं था  बल्कि वह तो  भारत की 'बेबसी' का दौर था। बड़े अफ़सोस की बात है कि  नसीबवालों का दौर तो  उस दौर से भी  बदतर है।
                         
                   मनमोहनसिंह की बेबसी  की वजह तो सत्ता के दो केंद्र होने में निहित थी।  इसके अलावा  आर्थिक घोटाले होना  , अटॉमिक करार की व्यग्रता  , महँगाई और भृष्टाचार  और अन्ना-रामदेव  आंदोलन भी  उनके सामने मुँह  बाए खड़े थे।  मनमोहनसिंह  की 'बेबसी' का  एक अन्य कारण यह भी हो सकता है  कि वे ढ़पोरशंखी और बड़बोले नहीं हैं । वे   अति विनम्र स्वभाव और लचर व्यक्तित्व  के धारक हैं ।भाववादी या  भाग्यवादी लोग  उसमें एक और कारण जोड़ सकते हैं , कि  तत्कालीन  प्रधानमंत्री डॉ मनमोहनसिंह  बदनसीब थे !  लेकिन  अब  केंद्र की  सत्ता के निजाम बदल  चुके हैं ।  चूँकि अब नसीब वालों का राज  है।  चूँकि अब गठबंधन धर्म की  नाजायज मजबूरियाँ नहीं हैं। चूँकि अब प्रचंड बहुमत वालों का शासन है।  अतः  सवाल उठना स्वाभाविक है कि   अब  भारत  को   रोज-रोज शर्मनाक बदनसीबी  या बेबसी का मुँह  क्यों देखना पड  रहा है ?

                    यूपीए वाली  'बदनसीबों' की सरकार  ने  शायद भारत की इतनी थू-थू नहीं कराई जितनी यह 'नसीब वालों' की  सरकार  आये दिन करवा रही  है  ! आजादी के ६८ सालों में देश ने इतनी 'बेबस' सरकार कभी नहीं देखी!पहले तो नसीब वालों  को दिल्ली की जनता ने 'आप' जैसे 'अराजक ' 'उपद्रवियों' को जिताकर  नसीब वालों को  शर्मशार  किया ।  नसीबवालों ने  बिहार में जब  जीतनराम  पर दाँव   लगाया  तो पाँसे  ही पलट गए।  वहां अब नीतीश जैसा 'बदनसीब' फिर मुख्यमंत्री बन गया। कश्मीर में  नसीबवालों के अनुकूल हवा  चली । वहाँ  की जनता ने कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस का पाटिया उलाल किया। भाजपाईयों और संघियों ने सत्ता प्राप्ति के निमित्त  अच्छी खासी  मशक्कत   की ।  किन्तु सत्ता के कंगूरे पर बदनसीबी ने फिर बीट कर दी। चुनावी प्रचार में 'नसीबवालों' ने  'बाप-बेटी' को खलनायक माना, उन्ही बाप बेटी  को उन्होंने 'रातो-रात 'संत' बना दिया।    ऐसी भी क्या बेबसी थी  'नसीबवालों'  की  ?  अब क्यों देश विरोधी  नापाक तत्वों को  गले  लगा लिया । भाजपा  ने किस बेबसी में  धारा  ३७० छोड़ी ?   कांग्रेस और मनमोहन सरकार को धिक्कारने वाले जावांज  नसीबवाले' अब अपनी बेबसी पर अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहे हैं ? संघी ' जिन्हे शहीद कहते हैं, उन  श्यामाप्रसाद मुखर्जी  के  बलिदान  को  किस बेबसी में  विसार दिया गया ?  क्यों नहीं धिक्कृत् गया उस बेबसी को जिसने मुफ्ती जैसे  'हलकट' व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया। मुफ्ती सुखुरु हो गए  होते तो भी गनीमत थी ,लेकिन वे तो अंगारे उगलने अलगे हैं।

                मुफ्ती ने न केवल पाकिस्तान की ,न केवल  पाक प्रशिक्षित आतंकियों की ,बल्कि  कश्मीरी अलगाववादियों  की  भी मुक्त कंठ से प्रशंशा की है। ये कोई अचरज की बात नहीं ! किस मूर्ख को नहीं मालूम कि पीडीपी  या  मुफ्ती के मन में क्या है ? लेकिन अचरज तो इसपर होना चाहिए कि नसीबवालों की क्या बेबसी थी कि  कश्मीरी आवाम  का नसीब  ऐसे हाथों  में सौंप दिया जिनकी डोर हाफिज सईद के हाथों में  है ? इसीलिये तो अब अफजल गुरु भी ' शहीद' फ़रमाया जा रहा है। उसके पार्थिव शरीर की मांग उठने लगी है।  कुछ दिनों बाद उसे और कसाव को भी 'शेरे कश्मीर' अवार्ड से नवाजा जा सकता है।  इन भारत विरोधी आतंकियों को अशोक चक्र या भारत  रत्न  दिए जाने की भी की भी मांग उठ सकती है !  नसीबवालों की  बेबसी है  भाई  ! क्या  कहें ? कुछ भी हो सकता है !

                     कालेधन को वापिस लाने में 'मोदी सरकार' की जो बेबसी झलक रही है उसका जीवंत प्रमाण तो इसी सत्र  में देश की राज्य सभा ने ही दे दिया। कामरेड सीताराम येचुरी द्वारा रखे गए 'संशोधन' प्रस्ताव को  संयुक्त  विपक्ष ने भारी बहुमत से पारित किया गया।  जबकि  सत्ता पक्ष को याने नसीब बालों को बड़े बेआबरू होकर खीसें निपोरनी पडी।
                                      निर्भया गैंग रेप पर बनी  डॉक्यूमेंट्री पर भारत सरकार का तथाकथित प्रतिबंध पूरी तरह फ्लॉप हो चूका है।  भारत सरकार के तमाम निर्देशों की अनदेखी कसरते हुए बीबीसी ने इंग्लैंड और यूरोप के अनेक देशों में 'इंडियाज डॉटर' डाक्यूमेंट्री का धड़ल्ले से प्रदर्शन किया। बेबस  मोदी सरकार  की  कोई भी  रत्ती भर  भी इज्जत नहीं कर रहा है। बीबीसी ने भारत सरकार को धता बताकर कह दिया कि   ठीक है हम तुम्हारे देश में प्रसारण नहीं करेंगे. जबकि यू -ट्यूब पर यह 'भारतीय चरित्र हनन' की कहानी पहले ही वायरल हो चुकी है।  अब हटाने का मतलब क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत ? बेबस सरकार बीबीसी को कोस रही है। देश की जनता अपने आप को कोस रही है कि  मनमोहन सरकार  के आकाश से गिरे तो मोदी सरकार की खजूर में अटके ! इस महा विकट स्थति में  सुब्रमण्यम  स्वामी और बाबा  रामदेव  के ओपिनियन  नहीं आ रहे हैं क्या बात है ?

                                श्रीराम तिवारी
                                    

सोमवार, 2 मार्च 2015



बैरी बदरवा रूठे रहे अबके बरस  सखी सावन में।

खड़ी फसल बर्बाद करने को अब बरस रहे फागुन में।।


                                              श्रीराम तिवारी 

भाजपा को सत्ता मिल जाने पर पार्टी का घोषणा पत्र पढ़ा जाता है या नहीं ?



भारतीय जनता पार्टी की असीम अनुकम्पा से ,मोदी जी  के राजनैतिक रणकौशल से और 'संघ' के आशीर्वाद से नए-नए मुख्यमंत्री बने -जून-पुराने बदनाम पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद का आकलन है कि:-

  " कश्मीरी अलगाववादियों  के , पाक प्रशिक्षित  आतंकियों  के और पाकिस्तानी सरकार  के रहमोकरम से  ही जम्मू और कश्मीर के चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए हैं।"

      यदि मैं सांसद होता तो प्रश्न करता "  [अ] क्या भारतीय चुनाव आयोग ने कश्मीर में चुनाव कराने  के लिए अपना  सर्वश्रेष्ठ योगदान किया है ? यदि हाँ तो मुफ्ती की बकवास  पर क्या कार्यवाही की गयी ?  यदि मुफ्ती महाशय  का कथन सही है तो  केंद्र की  मोदी सरकार अब  कश्मीर घाटी से भारतीय  सेनाओं को  कब वापिस बुलाने जा रही है ?  [ब] यदि नहीं तो मुफ्ती साहब  की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए क्या किया जा रहा है ?[स  ] भाजपा मेनिफेस्टो में उल्लेखित  धारा  ३७०  का क्या हुआ  ? [द ] झूंठे  और पाखंडपूर्ण प्रचार से केंद्र में या किसी राज्य विशेष में भाजपा को  सत्ता मिल जाने पर पार्टी का घोषणा पत्र पढ़ा जाता है या नहीं ?

                                         श्रीराम तिवारी   
    
 

     पूँजीवादी  दलों  का  ,  उजबक   तलछट 'आप'!

     आम आदमी ने  चुना ,दिल्ली   में   अभिशाप ! !


                                   श्रीराम तिवारी

 

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

मुफ़्ती और भाजपा की दोस्ती ने कश्मीर के पंडितों को और पूरे भारत को रुसवा किया है !


                               वेशक  डॉ मनमोहन सिंह  के राज में  भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही थी , अंदरुनी हालत  भी ठीक नहीं थे।  भृष्टाचार चरम पर था। किन्तु  अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की धर्मनिरपेक्ष  छवि पर तब भी किसी ने अंगुली नहीं उठाई। भारत  की धर्मनिरपेक्षता और लोकशाही पर प्रश्न चिन्ह  लगने  की नौबत कभी नहीं आयी । विगत यूपीए सरकार की गठबंधनात्मक कमजोरियों ,प्रशासनिक नाकामियों, व्यवस्थाजन्य   भृष्टाचार  , महँगाई  और उसके खिलाफ उतपन्न  जनाक्रोश को भाजपाई  बड़बोले नेता अपनी सत्ताप्राप्ति  का साधन बनाने मेंविभिन्न कारणों से  सफल रहे।  किन्तु  सत्ता का   प्रचंड बहुमत मिलने सेएक ओर उन्हें  अहंकार हो चला  है, तो दूसरी ओर हर मोर्चे पर असफलता के कारण उनके  हाथों से  तोते उड़ने लगे हैं।

                जब भूमिअधिग्रहण कानून में  कार्पोरेट की चाकरी में व्यस्त हों  ,जब कालेधन की वापिसी में असफल रहे हों ,जब कश्मीर में मुफ्ती जैसे दोगले  और ग़ैरजिम्मेदार  साम्प्रदायिक नेता को मुख्यमंत्री बनाकर उलझ गए हों  , जब मुसरत के पथ्थरबाजों को बिरयानी खिलाई जा रही हो  ,जब संयुक्त विपक्ष ने राज्य सभा में 'लौह  नेतत्व' को बार-बार  पटकनी दी हो ,जब  इनकी नादानी  के कारण देश   आर्थिक,सामाजिक ,वैदेशिक  नीति में   चौतरफा विफल हो रहा हो ,जब राष्ट्र चौतरफा  संकट से घिर  चुका हो , तब न केवल  सत्तारूढ़ पार्टी में , न केवल  देश  के आमजन में , न केवल भारतीय  वुद्धिजीवी  वर्ग में   ,न  केवल कांग्रेस या  सम्पूर्ण गैर भाजपाई- विपक्ष   के मन में बल्कि  भारत के  प्रगतिशील तबकों  में  भी बैचेनी स्वाभाविक है।  बहरहाल तमाम सुधीजनों को   'मोदी मान मर्दन' की चिंता  छोड़कर  अपने वतन की चिंता करनी चाहिए ।
                                                   मौजूदा दौर में कश्मीर  सहित देश की सीमाओं पर राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र और उसके बरक्स बदतरीन   हालात पर सियासत मौजू नहीं है।  महाप्रलयकारी  वैश्विक आतंकवाद की  स्याह काली परछाई  की  झलक स्पष्ट परिलक्षित हो रही है। जब  अमेरिका  ,यूरोप  ,इजरायल  ,इंग्लैंड  ,फ़्रांस ,चीन ,रूस सऊदी अरब ,यमन और ईरान  जैसे  देश भी आईएस का कुछ नहीं उखाड़ पा रहे हैं। तो अफगानिस्तान  ,भारत  या पाकिस्तान के अमनपसंद लोग  इस चुनौती से निपटने में कितना  कुछ प्रतिरोध कर पाएंग
                                       हालाँकि  दूनिया के इस खतरनाक  खूनी  मंजर  की तुलना में भारतीय समाज का सामाजिक  - साम्प्रदायिक   सौहाद्र कहीं ज्यादा काबिले तारीफ़ है। भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को  बनाने में किसी  ओबामा का या ओसामा का कोई रोल नहीं। वर्तमान  सत्तारूढ़ नेतत्व  का भीइसमें  कोई रोल नहीं है ।   भारत की गंगा जमुनी तहजीब के परिष्करण में  उन ताकतों का  भी कोई हाथ नहीं जो दुनिया में अपने पेशाब से चिराग जलाने की असफल  कोशिश कर  रहे हैं।  आज  भारत को  न केवल  अमेरिका नसीहत दे रहा है , न केवल मुफ्ती  और मुसर्रत आलम  भारत को धोखा दे रहे हैं ,बल्कि अब तो  श्रीलंका का  नवनिर्वाचित राष्ट्रपति विक्रमसिंघे  भी तमिल अस्मिता को दवाने के नाम पर भारत को आँखें दिखा रहा है। नेपाल में लगातार भारत के खिलाफ  विष वेलि  बोई जा रही है। भारत की धर्मनिरपेक्षता , भारत का लोकतंत्र और भारत की उत्कृष्ट सांस्कृतिक  सभ्यता का निर्माण- साम्राज्य्वादी श्वेत प्रभुओं के द्वारा नहीं  हुआ है। कश्मीर के पथ्थरबाज युवा  शायद नहीं जानते कि भारतीय लोकतंत्र और पाकिस्तानी 'रोगतंत्र' में क्या फर्क है ? उन्हें तो  स्वाधीनता संग्राम के महान अमर शहीदों के बलिदानों  की भी कोई जानकारी नहीं है। यदि वे शहीद भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारों को जा पाते तो  वे भारत विरोधी नारे नहीं लगाते। यदि किसी को संघ परिवार या भाजपा की नीतियों से परहेज है तो  वेशक वो उनके खिलाफ नारे  लगाए। लेकिन यह कदापि असहनीय है कि मोदी सरकार या मुफ्ती सरकार की असफलताओं का ठीकरा 'भारत राष्ट्र' के सर पर फोडा जाए !यह कतई  बर्दास्त नहीं किया जा सकता कि  भारत की सरजमीं पर पाकिस्तान का झंडा लहराए जाए ।  यह सौ फीसदी   सच है कि  भारत में  हिन्दुओं,मुसलमानों या किसी भी  अन्य धर्म -मजहब के लिए कोई खतरा नहीं है।यहाँ  दरसल किसी भी दर्शन या विचार को कहीं कोई खतरा नहीं है ।
                                    आम धारणा है कि  इस दौर में  वे ही ज्यादा  असुरक्षित है जो किसी धर्म मजहब  केगृह-उपग्रह हैं। इसीलिये वे कुछ साम्प्रदायिक किस्म के  नेताओं की वोट कबाडु  घटिया राजनीति  का चारा बनने को तैयार हो जाते हैं। कोई जातिवाद के कारण ,कोई  मजहब के कारण ,कोई  राजनीति   में धर्म को घुसेड़ने के कारण तो  कोई  अपनी  भाषाई -क्षेत्रीय अहमन्यता के कारण  अपने ही  देश को तोड़ने पर आमादा है।  कोई घोर पूँजीवादी  आर्थिक नीतियों के कारण  उपेक्षित  है। वर्तमान  आर्थिक नीतियों की कुदृष्टि से सर्वहारा वर्ग तो मरने की कगार पर है ही, किन्तु  भारत का मध्यम वर्ग भी अब   खतरे  की जद में  ही आ  चुका  है।  इस तरह देखा  जाए तो  मोदी राज में केवल कश्मीर ही नहीं बल्कि  पूरा देश ही असुरक्षित है।
                   यह जग  जाहिर है कि   'मोदी सरकार'  को केवल कार्पोरेट जगत की  ही चिंता  है ? उन्हें अब मंदिर की  चिंता नहीं , हिंदुत्व की चिंता नहीं  , धारा -३७० की चिंता नहीं ।   फिर कश्मीरी पथ्थरवाजों की समस्या क्या है ?एक  समान  कानून की भी अब कोई बात नहीं करता। खुद मंदिर वाले और कमंडल वाले ही अब  सब कुछ भूलकर  'हर-हर मोदी' 'के नमोगान' में निरंतर लीन  रहता है। फिर आईएस और इस्लामिक कटट्रपंथ की प्राब्लम क्या है ? जब भारत के अधिकांस हिन्दू और मुसलमान आपस में एकजुट हैं तो बेगानी शादी में अलकयदा  वालों को रूचि क्यों है ?
                      वैसे भी भारत की केवल वामपंथी पार्टियाँ  ही नहीं बल्कि भाजपा और कांग्रेस समेत तमाम  अर्धसामंती ,अर्धपूँजीवादी  और क्षेत्रीय  राजनैतिक पार्टियाँ भी धर्मनिरपेक्षता , लोकतंत्र , समाजवाद का गुणगान सनातन से करती आ रही हैं।  फिर इसमें पाकिस्तानी  फौज और उसकी नाजायज ओलाद हाफिज सईद  के  कश्मीरी पिठ्ठुओं की समस्या क्या है ? वे क्यों भारत विरोधी  नारे लगा रहे  हैं। क्या 'वैश्विक खूखार आतंक' और भारत विरोधी ताकतों का सही आकलन करने की फुर्सत  वर्तमान  भारतीय नेतत्व को है ? इस  देश की जनता को  महँगाई  ने मारा।  भृष्टाचार ने मारा।  'मंदिर-मस्जिद' विवाद ने मारा । गठबंधन धर्म ने मारा। झंडे -झाड़ू ने  मारा।   कभी कही  ' शायनिंग  इण्डिया'  ने मारा ।  किन्तु ऐंसा किसी  ने  कभी नहीं मारा जैसा अब मुफ़्ती और भाजपा की दोस्ती ने  कश्मीर के पंडितों को और पूरे भारत को रुसवा किया  है !
                       हमारे कुछ प्रगतिशील मित्र भी सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए दुबले हुए जा रहे हैं। इन सूमड़ों को याद रखना चाहिए कि   जब अधिकांस भारतीय असुरक्षित हैं , जब अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं ,जब  देश का मजदूर  और किसान असुरक्षित है  तो हिन्दू कैसे सुरक्षित रह सकते हैं ? जब दुनिया भर में ईसाई ,मुस्लिम मारे जा रहे हैं तो भारत के  अधिसंख्य हिन्दू नागरिक सुरक्षित कैसे हो सकते हैं  ? ऊपर  से तुर्रा ये कि  जो लोग हिंदुत्व का वोट  बैंक बनाकर सत्ता का खजाना  खाली करने में जुटे हैं, वे हिन्दुओं के लिए  तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं। उलटे शेखी बघारकर इस्लामिक आतंकवादियों को हिन्दुओं  के खिलाफ आक्रामक बना रहे हैं। वे हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों पर ,बाबाओं की यौन लिप्सा पर या मंदिरों में एकत्रित अपार धन राशि के उचित  एवं  युक्तियुक्तकरण  पर  मौन हैं। वे केवल सत्ता सुख लूट रहे हैं।  वे  'मुफ्तियों' के आगे  शरणम गच्छामि हो रहे हैं। वे उस  मुसर्रत आलम से गलबहिंयां  डाल रहे हैं। जो नामी पथ्थरबाज था है और रहेगा। वो हाफिज सईद को सलाम करता है।  वो दाऊद के साथ डिनर करेंगा ।  हमारे नेता उचित कार्यवाही के वयानों में व्यस्त हैं।
                         बड़े  दुःख की बात ये हैं कि  संसदीय राजनीति  की इस दुरवस्था को देश की जनता अभी भी समझ नहीं पायी है !संतोष की बात है कि  -समझदार सचेतन  वामपंथी बुद्धिजीवी -प्रगतिशील तबकों  द्वारा अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की पूरी-पूरी वकालत मौजूद है।  किन्तु उनके द्वारा  भी  जाने-अनजाने अधिकांशतः     हिन्दुओं को ही टारगेट किया जा रह है। इससे अल्पसंख्यक वर्ग में एक काल्पनिक असुरक्षा का  भाव  पैदा हो रहा है।   शायद   भी - नाहक ही  आक्रामक और उग्र हो उठते हैं। देश  में वाम पंथ की हिन्दू विरोधी छवि बन चुकी  है। अल्पसंख्यक वर्ग भी टैक्टिकल वोटिंग के कारण एकमुश्त उसे वोट करने लगा है जो भाजपा को हरा सके।  संसदीय लोकतंत्र में वाम की ताकत का कम होना  भी देश के लिए अशुभ  है। टैक्टिकल वोटिंग के कारण  आमतौर पर  देश में और खास तौर  से  बंगाल  के अल्पसंख्यक ममता के साथ हो लिए हैं ।
 हिन्दू   मतदाताओं ने  भी बंगाल में ममता और  लेफ्ट से  ऊपर  भाजपा को  तरजीह देना शुरू आकर दिया  है  ! यह कटु सत्य है कि इसीलिये भारत में लेफ्ट की राजनीति अब केवल 'संघर्ष' तक ही सिमिटती  जा रही  है।
                              कोई 'आरएसएस ' का विरोध करे  ,  मोहन भागवत का विरोध करे ,मोदी जी का तर्कसंगत विरोध करे तो यह उसका अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है । मैं भी संघ परिवार का धुर विरोधी हूँ।  किन्तु जब कोई 'मुफ्ती'  आतंकियों  का कृपापात्र हो जाए या कोई ओबामा  जैसा बड़ा नेता सम्पूर्ण हिन्दू  मानस को ही  धर्मनिरपेक्षता की नसीहत दे तो  हमें अपनी सोच को अपडेट करना पडेगा।  हम केवल मोहन भागवत  जी  या मोदी जी या हिन्दू नेताओं   के उग्र वयानों  के निषेध तक ही सीमित क्यों रहें ?  हम  भगोड़े  दाऊद के बारे में ,हाफिज सईद के बारे में ,अफजल गुरु के बारे में या अब्दुलगनी लोन के बारे में चुप क्यों रहें ?वेशक हर धर्म-मजहब का  कोई भी  पढ़ा -लिखा  वेरोजगार  युवा भले ही भूँखों मर रहा हो, किन्तु   अब  वह  'गरीब' 'सर्वहारा'  कहलाना पसंद नहीं करता।  वह ज़िंदा रहने के लिए किसी भी नैतिक  -अनैतिक  'साधन' को अपना सकता है।  उसे किसी धर्म-मजहब के उसूलों की  या  सर्वहारा क्रांति की कोई दरकार नहीं ! दरसल भारत को खतरा  इसी अधकचरी  मानसिकता  से है। यह वही युवा  वर्ग है जो भटका हुआ है।  यह वर्ग  कभी  भारत के सुरक्षा बालों पर पत्थर फ़ेंकत है। कभी लव-जेहाद का नाटक  करता है।  कभी साम्प्रदायिकता की 'हुड़दंगलीला' में शामिल हो जाया करता है।  इस दौर में  कुछ मुठ्ठी भर युवा ही वैज्ञानिक,धर्मनिरपेक्ष  और क्रांतिकारी सोच की समझ  रखते हैं। बाकी अधिकांस तो मजहबी नेताओं द्वारा ऊगले जा रहे लावे में जलने-मरने को फुदकते रहते हैं। कुछ   आधुनिक  मध्यम  वर्गीय उच्च शिक्षित युवा  भी  कार्पोरेट जगत की असुरक्षित  चाकरी के निमित्त ,  कोल्हू के बैल की मानिंद जीने के लिए अभिशप्त हैं। वे नहीं जानते कि  'आजादी' किस चिड़िया का नाम है ?
        जिनसे अमेरिका को खतरा है ,जिनसे पाकिस्तान को खतरा है ,जिनसे शार्ली  एब्दो   को खतरा है। जिनसे सारी  सभ्य दुनिया को खतरा है।  उन्ही से भारत को भी खतरा है। किन्तु बड़ी विचित्र और मानसिक दुरवस्था है कि दवे कुचले  उन निर्धन  भारतीयों को ही दोनों ओर  के कटट्रपंथ की ओर से  टारगेट किया जा रहा है जो  दुंर्भाग्य से ' हिन्दू ' कहलाते हैं ,जिन्हे अतीत में भी सैकड़ों सालों से  चुन-चुन कर  मारा  जाता रहा है । दरसल हिन्दू  निर्धन युवक  आज भी दुनिया में हासिये पर ही है।  उसके लिए कहने को आरएसएस है।उनके वोट बटोरने को  भाजपा है।  धर्म रक्षा के लिए वीएचपी है।  जय-जयकार के लिए अटल-आडवाणी और मोदी हैं। किन्तु इन वेरोजगार या  अपढ़ हिन्दू युवाओं  के लिए ,हिन्दू मजदूरों के लिए ,गरीब हिन्दू किसानों  के लिए  रोटी-कपड़ा -मकान जुगाड़ने के लिए मुस्लमान युवाओं की ही तरह खुद ही संघर्ष करना होगा।
                       वर्तमान  सरकार की हैसियत तो  एक मामूली 'मुफ्ती' के सामने  अब भटे  के  बराबर भी नहीं रही ।  भाजपा विधायकों के समर्थन से मुख्य मंत्री बना व्यक्ति देश विरोधी कामों में   जुट गया और ये सिर्फ संसद में स्यापा कर रहे हैं। क्या इनके भरोसे हिंदुत्व की रक्षा  सम्भव है ?इससे बेहतर तो  'बाप-बेटे' की ही सरकार थी।  वो देश के ख़िलाफ़ तो  कभी नहीं गए।   मुफ्ती साहब  ने खूब  सबक सिखाया  दिया है कि  धारा  ३७०  हटाने की बात तो भूल ही जाओ। एक झंडा ,एक संविधान और एक क़ानून तो छोड़िये  'मुफ्तीजी' को तो कश्मीर के चुनाव में पाकिस्तान की 'कृपा ' ही सर्वत्र नजर आ रही है।  भारतीय फौजियों के सर काटने वाले आतंकी तो 'मुफ्ती' को क्रांतिकारी नजर आ रहे हैं।  इस अंधेरगर्दी के खिलाफ एक शब्द नहीं है मोहन भागवत जी के पास।  केवल मोदी जी की क्लाश लेने से 'देशभक्ति' पूरी नहीं हो जाती।  सत्ता की मिठास में  तो  पूरा 'संघ परिवार' शामिल  ,किन्तु जब 'मुफ़्ती' का कड़वा 'सच' सामने आया तो  अब 'अमित शाह और मोदीजी  पर  आँखें तरेर रहे हैं। इधर पूरा विपक्ष भी सरकार को सांस नहीं लेने दे रहा।   वेशक मोदीजी ही इन घटनाओं के लिए प्रारंभिक तौर  पर जिम्मेदार हैं। किन्तु कश्मीर में यदि भाजपा को बहुमत नहीं मिला  तो इसमें भी क्या मोदी जी की ही जिम्मेदारी   है ? यदि पीडीपी के साथ गठबंधन नहीं बनाते तो भी आरोप तो लग ही रहे थे कि  राष्ट्रपति शासन की जुगाड़ चल  रही है !अब  वक्त का तकाजा है कि पूरा देश मोदी को बाद में घेरे-कभी किसी चुनाव में।  अभी तो ततकाल  कश्मीर को बचाने की बात करे। पूरी संसद और पूरा देश एकजुट हो जाए तो न केवल गिलानी 'साहब'को ,न केवल मुसरत आलम को , न केवल यासीन मलिक को , न केवल उनके नापाक  पाकिस्तानी आकाओं को  बल्कि मुफ्ती साहब को  भी भारतीय लोकतंत्र के  जन-गण -मन का और भारतीय तिरंगे का सम्मान करना  सिखाया जा सकता है।


                          श्रीराम तिवारी