जल से कमल की ,कमल से जल की ,
जल और कमल से सरोवर की शोभा है ।
मणि से कंकन की, कंकन से मणि की ,
मणि और कंकन से हाथों की शोभा है ॥
चंदा से रजनी की ,रजनी से चंदा की ,
चंदा और रजनी से तारों की शोभा है .
फूल से भंवरों की भंवरों से फूलों की ,
फूल और भंवरों से उपवन की शोभा है ॥
गीता की कुरान से ,कुरान की गीता से ,
कुरान और गीता से मानव की शोभा है ।
ईद से दिवाली की ,दिवाली से ईद की ,
ईद और दिवाली से पर्वों की शोभा है ॥
गंगा से यमुना की ,यमुना से गंगा की ,
गंगा और यमुना से संगम की शोभा है ।
त्याग से शान्ति की ,शांति से त्याग की ,
शान्ति और त्याग से भारत की शोभा है ॥
-- श्रीराम तिवारी --
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
प्यार करुना की पुकार ...
खार खुश हाल हों ,गुल्म रोते रहें ,
हमको रोता हुआ न चमन चाहिए ।
प्यार करुना की क्यारी बना बागवां,
बम बारूद का घर नहीं चाहिए ॥
सब्ज पत्तीं भी हों ,लाली पे हो ,
जर्रे -जर्रे शहादत असर चाहिए ।
प्यार करुना की क्यारी बना बागवा ,
बम बारूद का घर नहीं चाहिए ॥
हमको रोता हुआ न चमन चाहिए ।
प्यार करुना की क्यारी बना बागवां,
बम बारूद का घर नहीं चाहिए ॥
सब्ज पत्तीं भी हों ,लाली पे हो ,
जर्रे -जर्रे शहादत असर चाहिए ।
प्यार करुना की क्यारी बना बागवा ,
बम बारूद का घर नहीं चाहिए ॥
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम....सब को सन्मति दे भगवान...
इनका लहू उनका लहू सबका लहू लाल ,
सबका लहू -लहू ,न किसी का लहू पानी है ।
न बिदारो रक्त अपना और अपनों का व्यर्थ ,
सबका लहू -लहू ,न किसी का लहू पानी है ।
न बिदारो रक्त अपना और अपनों का व्यर्थ ,
जिओ और जीने दो यही वेद वाणी है ।।
हिन्दू हो या मुस्लिम -सिख -ईसाई कोई ,
बैर करे आपस में पाप की निशानी है ।
जो करे सियासत मंदिर -मस्जिद के नाम ,
धिक्कार वो जवानी है ॥
मत जगाओ धर्मांध भूतों -गड़े मुर्दों को ,
न छेड़ो उस जगह को जो फसाद की निशानी है ।
न बहाओ रक्त अपना और अपनों का व्यर्थ ,
जिओ और जीने दो यही वेद वाणी है ॥
==========\\\===========
मैली हो चुकीं चादरें सभ्यताओं की जहाँ ,
मजहब के नाम बहे खून ज्यों पानी है ।
दांव पर लगाएं क्यों भारत की आन को ,
जहाँ हर मजहब की जिन्दा जवानी है ॥
न लड़ाओ मजूरों -किसानो को आपस में ,
मजहबी अफीम न खानी या खिलानी है ।
गरीबों को मिटाकर न इतरायें अमीर लोग ,
विगरी है अब तक वो बात फिर बनानी है ॥
==========८८८===========
जात -धर्म -भाषा का जहर न मिलाओ ,
ये तो नीर छीर निर्मल गंगा का पानी है ।
मजहबों के ठेकेदार स्वप्न में भूलें नहीं ,
जाना खाली हाथ चार दिन की जवानी है ॥
न बहाओ रक्त अपना और अपनों का व्यर्थ ,
जिओ और जीने दो यही वेद वाणी है ।
इनका लहू -उनका लहू सबका लहू लाल ,
सबका लहू -लहू न किसी का लहू पानी है ॥
===========****=========
गुरुवार, 9 सितंबर 2010
चैतन्य परिचय
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा ; गुड़ी पड़वा त्यौहार ।
जन्मे तब चैतन्य जी ; शुभ दिन शुक्रवार ॥
दो सहस्त्र अष्ट ईसवीं ; मार्च सत्ताईस की शाम ।
प्रकट भये चैतन्य जी ; सकल कला गुण धाम ॥
धन्य हुई जब अर्चना ; पा मातृत्व महान ।
हर्षित हिय प्रमुदित मनः ; पिता प्रवीण समान ॥
दादी बन गई उर्मिला ; दादा श्री श्रीराम ।
अग्रज अक्षत जी कहें ; अक्की मेरा नाम ॥
राजमती देवी जहाँ ; परदादी जब होय ।
तुलसी के प्रपौत्र की ; धवल कीर्ती होय ॥
सदा सहाय साईं रहें ; ठाकुर जी प्रसन्न ।
देव पितृ सबसे विनय ; रहें सदा प्रसन्न ॥
जन्मे तब चैतन्य जी ; शुभ दिन शुक्रवार ॥
दो सहस्त्र अष्ट ईसवीं ; मार्च सत्ताईस की शाम ।
प्रकट भये चैतन्य जी ; सकल कला गुण धाम ॥
धन्य हुई जब अर्चना ; पा मातृत्व महान ।
हर्षित हिय प्रमुदित मनः ; पिता प्रवीण समान ॥
दादी बन गई उर्मिला ; दादा श्री श्रीराम ।
अग्रज अक्षत जी कहें ; अक्की मेरा नाम ॥
राजमती देवी जहाँ ; परदादी जब होय ।
तुलसी के प्रपौत्र की ; धवल कीर्ती होय ॥
सदा सहाय साईं रहें ; ठाकुर जी प्रसन्न ।
देव पितृ सबसे विनय ; रहें सदा प्रसन्न ॥
बुधवार, 8 सितंबर 2010
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
शान्ति एवं एकजुटता का संकल्प.
एक -सितम्बर १९३९को द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हुआ तब से लेकर हिरोशिमा -नागासाकी पर हुए बम -जनित विभीषिका {६अगस्त-९अगस्त -१९४५} तक जितना नरसंहार हुआ वह "भूतो न भविष्यति" माना गया है ।
तत्कालीन जान -माल के नुकसान का असर आज भी दुनिया पर देखा जा सकता है .बिध्वंशकअणुबमों के दुष्प्रभाव को कुछ लोग आज भी भुगत रहे हैं ।
विश्व शान्ति आन्दोलन तथा आम जनता के दवाव के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तीसरा महायुद्ध अभी तक तो नहीं हो सका लेकिन छोटे -मोटे विवाद 'आतंकी हमलों एवं पृथक सभ्यताओं के संघर्षों के कारण कुल मिलाकरकिसी विश्वयुद्ध से भी ज्यादा मानव हानि तथा संपत्ति का नुक्सान हुआ है ।
अधिकांश वीभत्स घटनाओं के पीछे साम्राज्यवादी नीतियों तथा नाटो देशों को आपूर्ति करने वाले घातक हथियार निर्माता कारपोरेट लाबी का हाथ रहा है .आज दुनिया भर में हथियारों के अम्बार लगते जारहे हैं ;जिसमें पारंपरिक ;आणविक रासायनिक एवं नाभकीय हथियार भी शामिल हैं .दुनिया का स्वयम्भू नम्बरदार तो नाभकीय हथियारों के माध्यम से तीनो लोकों अर्थात धरती -आकाश और महासागरों पर कब्ज़ा कर चूका है .अमेरिका रूस चीन में से हरेक के पास इतने हथियार हैं की इस धरती को कई बार नष्ट करने में सक्षम हैं .ऐसे हथियारों का उत्पादन घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है .अब इस संहारक क्षमता की रेंज में छोटे -मोटे गरीब गुरवे और भिखमंगे देश भी शामिल होते जा रहे हैं .इस घृणास्पद मुक्त होड़ के कारण कई देश तो भारी कर्ज के बोझ से पिस
रहे हैं .एक तरफ हथियारों पर अंधाधुन्द खर्च बढ़ता जा रहा है .दूसरी ओर भुखमरी ;गरीबी ;बेरोजगारी ;बीमारी और अशांति बढ़ रही है .आर्थिक असमानता बढ़ रही है .एक तरफ तो दौलत के अम्बार लग रहे हैं दूसरी ओर देश और दुनिया में गरीबों की संख्या बेतहासा बढ़ रही है .आतंकवाद ;अलगाववाद ;जातिवाद और बाजारवाद का बोलवाला है .कई निर्दोषों की जाने तो सिर्फ किसी एक व्यक्ति की चूक या व्यवस्था की गफलत से ही चली गई .
हमारा देश भी इन समस्याओं से दो-चार हो रहा है । विगत दो दशकों में देश की अपार संपत्ति को नुकसान हुआ और लाखों जाने गईं .अखिल भारतीय शान्ति एवं एकजुटता संघठन .के तत्वाधान में विगत कुछ सालों से एक सितम्बर को मानव श्रंखला के तहत युध्य विरोधी दिवस मनाया जाता है ।
इस अवसर पर पोस्टर पम्फलेट वाल पेंटिग्स तथा स्लोगन्स के माध्यम से संकल्प व्यक्त किया जाता है की सभी प्रकार के हथियारों पर रोक लगाईं जावे ;जो परमाणविक हथियार तैयार हैं उन्हें नष्ट किया जाए .सैन्य खर्चों में कटौती की जाए ;मानव संसाधन एवं जन- कल्याण के बजट में पर्याप्त बृद्धि की जाए ;रोजगार के अवसरों को युवाओं के लिए तस्दीक किया जाए .भुखमरी दूर हो -आर्थिक असमानता मिटे -सबको विकाश के सामान अवसर उपलब्ध होवें एवं धरती पर मानव सभ्यता शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के साथ सभी भेदभाव दूर करे ।
तत्कालीन जान -माल के नुकसान का असर आज भी दुनिया पर देखा जा सकता है .बिध्वंशकअणुबमों के दुष्प्रभाव को कुछ लोग आज भी भुगत रहे हैं ।
विश्व शान्ति आन्दोलन तथा आम जनता के दवाव के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तीसरा महायुद्ध अभी तक तो नहीं हो सका लेकिन छोटे -मोटे विवाद 'आतंकी हमलों एवं पृथक सभ्यताओं के संघर्षों के कारण कुल मिलाकरकिसी विश्वयुद्ध से भी ज्यादा मानव हानि तथा संपत्ति का नुक्सान हुआ है ।
अधिकांश वीभत्स घटनाओं के पीछे साम्राज्यवादी नीतियों तथा नाटो देशों को आपूर्ति करने वाले घातक हथियार निर्माता कारपोरेट लाबी का हाथ रहा है .आज दुनिया भर में हथियारों के अम्बार लगते जारहे हैं ;जिसमें पारंपरिक ;आणविक रासायनिक एवं नाभकीय हथियार भी शामिल हैं .दुनिया का स्वयम्भू नम्बरदार तो नाभकीय हथियारों के माध्यम से तीनो लोकों अर्थात धरती -आकाश और महासागरों पर कब्ज़ा कर चूका है .अमेरिका रूस चीन में से हरेक के पास इतने हथियार हैं की इस धरती को कई बार नष्ट करने में सक्षम हैं .ऐसे हथियारों का उत्पादन घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है .अब इस संहारक क्षमता की रेंज में छोटे -मोटे गरीब गुरवे और भिखमंगे देश भी शामिल होते जा रहे हैं .इस घृणास्पद मुक्त होड़ के कारण कई देश तो भारी कर्ज के बोझ से पिस
रहे हैं .एक तरफ हथियारों पर अंधाधुन्द खर्च बढ़ता जा रहा है .दूसरी ओर भुखमरी ;गरीबी ;बेरोजगारी ;बीमारी और अशांति बढ़ रही है .आर्थिक असमानता बढ़ रही है .एक तरफ तो दौलत के अम्बार लग रहे हैं दूसरी ओर देश और दुनिया में गरीबों की संख्या बेतहासा बढ़ रही है .आतंकवाद ;अलगाववाद ;जातिवाद और बाजारवाद का बोलवाला है .कई निर्दोषों की जाने तो सिर्फ किसी एक व्यक्ति की चूक या व्यवस्था की गफलत से ही चली गई .
हमारा देश भी इन समस्याओं से दो-चार हो रहा है । विगत दो दशकों में देश की अपार संपत्ति को नुकसान हुआ और लाखों जाने गईं .अखिल भारतीय शान्ति एवं एकजुटता संघठन .के तत्वाधान में विगत कुछ सालों से एक सितम्बर को मानव श्रंखला के तहत युध्य विरोधी दिवस मनाया जाता है ।
इस अवसर पर पोस्टर पम्फलेट वाल पेंटिग्स तथा स्लोगन्स के माध्यम से संकल्प व्यक्त किया जाता है की सभी प्रकार के हथियारों पर रोक लगाईं जावे ;जो परमाणविक हथियार तैयार हैं उन्हें नष्ट किया जाए .सैन्य खर्चों में कटौती की जाए ;मानव संसाधन एवं जन- कल्याण के बजट में पर्याप्त बृद्धि की जाए ;रोजगार के अवसरों को युवाओं के लिए तस्दीक किया जाए .भुखमरी दूर हो -आर्थिक असमानता मिटे -सबको विकाश के सामान अवसर उपलब्ध होवें एवं धरती पर मानव सभ्यता शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के साथ सभी भेदभाव दूर करे ।
शनिवार, 28 अगस्त 2010
लोक ही तंत्र का विधाता महान है .
लग रहा बुझा -बुझा वर्तमान काल क्यों
प्रखर तप्त सूर्यक्यों धुंध आसमान है ।
लोक ही तंत्र का विधाता महान है .
सत्य को नकारतीं तमस को पुकारतीं ;
शक्तियां बाज़ारकी;पैर यों पसारतीं।
की धधकता जहान है ।
लोक ही तंत्र का विधातामहान है .
आतंक -अलगाव -धर्मान्धता बेधड़क ;
बहुमत को भूंख -भय करे परेशान है ।
लोक ही तंत्र का विधाता महान है
छत्तीस गढ़ मचल रहा -कश्मीर सब जल रहा ;
हम चले थे किधर -किधर का प्रस्थान है ॥
खोखला गरूर है की आन -बान -शान में ;
सभ्यता औ संस्कृति में हम ही महान हैं ।
चिताएं सुलग रहीं आस्था विश्वाश की अब ;
आस्तीन के साँपों से देश ये हैरान है ॥
प्रखर तप्त सूर्यक्यों धुंध आसमान है ।
लोक ही तंत्र का विधाता महान है .
सत्य को नकारतीं तमस को पुकारतीं ;
शक्तियां बाज़ारकी;पैर यों पसारतीं।
की धधकता जहान है ।
लोक ही तंत्र का विधातामहान है .
आतंक -अलगाव -धर्मान्धता बेधड़क ;
बहुमत को भूंख -भय करे परेशान है ।
लोक ही तंत्र का विधाता महान है
गाँव -गाँव गली शहर सज रहीं दूकान है ।
छत्तीस गढ़ मचल रहा -कश्मीर सब जल रहा ;
हम चले थे किधर -किधर का प्रस्थान है ॥
खोखला गरूर है की आन -बान -शान में ;
सभ्यता औ संस्कृति में हम ही महान हैं ।
चिताएं सुलग रहीं आस्था विश्वाश की अब ;
आस्तीन के साँपों से देश ये हैरान है ॥
शनिवार, 21 अगस्त 2010
०७-०९-२०१० आम हड़ताल
बेतहासा बढ़ती हुई महंगाई के खिलाफ ;केंद्र सरकार की श्रमिक और सर्वहारा वर्ग विरोधी तथा पूंजीपति परस्त नीतियों के खिलाफ .सार्वजनिक वितरण व्यवस्था दुरुस्त कराने ;सट्टे बाजारी रोकने .नए उद्द्योग धंदे प्रारंभ करानेऔर देश को भृष्टाचार से मुक्ति के लिए अनवरत एकजुट संघर्ष की दरकार है .७ सितम्बर की ओद्दोगिक हड़ताल तो इस दिशा में एक क्रन्तिकारी कदम है .इन्कलाब -जिंदाबाद .दुनिया के मेहनतकश एक हो -एक हो .
बुधवार, 18 अगस्त 2010
कम्युनिस्ट ही सच्चे आस्तिक हुआ करते हैं

यदा-कदा साम्यवादी और बर-हमेशा गैर साम्यवादी उस कथन को -जो कार्ल मार्क्स ने प्रतिपादित किया था -की "धर्म एक अफीम है "को सरसरी तौर से इस्तेमाल किया करते हैं .जहाँ तक इस ऐतिहासिक सैद्धांतिक युक्ति के
प्रयोजन का प्रश्न है -अक्सर अति उत्साही कम्युनिस्ट तो धर्म के मूल पर ही कुठाराघात कर बैठता है .कुछ चतुर चालाक लोग इन अर्ध-परिपक्व साम्यवादियों व्याख्या को आधार बनाकर ;वर्ग संघर्ष में प्रतिगामी बढ़त हासिल कर लेते हैं .इन में दोनों बुर्जुआ धड़े शामिल हैं .एक धडा पूंजीवादी -सामंती शोषण के करता -धर्ताओं का है .दूसरा धडा धरम मजहब -के माध्यम से आजीविका चलाने वाले अनुत्पादक वर्ग का है .ये दोनों वर्ग श्रम शोषण के लिए कभी -कभी नीर -क्षीर हो जाते है .दोनों का साझा शत्रु है -साम्यवाद .इसलिए ये दोनों आक्रान्ता के रूप में आधुनिक सुशिक्षित .वैज्ञानिक ;प्रगतिशील शक्तियों को सर्वहारा से अलग -थलग करने और शोषित वर्ग की संघर्ष शक्ति को
भोंथरा बनाने के लिए पुराणी परम्परा को देवीय रूप प्रदान करने का प्रयास करते है .जब कभी इस पाखंडपूर्ण
इस दुष्कृत्य का कोई ईमानदार -न्यायप्रिय व्यक्ति या संस्था विरोध करता है तो उस नास्तिक करार दे दिया जाता है। अंध धार्मिकता की लहर को रोक पाना मुश्किल हो जाता है .धर्म के उस रूप को जो शोषण की ताकतों का दुर्दमनीय हथियार बन जाये ;समाज में विग्रह पैदा करे ;क्रांति के मार्ग में बाधा कड़ी करे -साम्प्रदायिकता कहते हैं दरसल उस धर्म या मजहब से जो अपने मूल स्वरूप में -मानव मात्र का न्यायपूर्ण जीवन जीने का अधिकार स्वीकार करता हो उससे मार्क्सवाद का कोई विरोध नहीं है विरोध उससे हो सकता है जो साम्प्रदायिकता ;पाखण्ड तथा शोषण की यथा स्थिति का समर्थन करता है ।
कोई भी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित धर्म /मजहब यदि वह सत्ता के स्वार्थ से दूर रहकर व्यक्ति .परिवार ;समाज या दुनिया को सुसभ्य बनाए तो वह स्वयमेव क्रांतिकारी पथ का अनुगामी हो जाएगा ।
अक्सर धार्मिकता और साम्यवाद के बीच अनुपयोगी कुतर्कों का समावेश हुआ करता है .यह बिडम्बना ही है की जो अपने आप को धार्मिक कहता है; वह बुरी तरह पाखंडपूर्ण जीवन जीता हुआ देखा जा सकता है ।
उधर दूसरी और ऐसे अनेक साम्यवादी दुनिया में हो चुके हैं ;आज भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जो की तथाकथित "नास्तिक "होते हुए भी किसी महान अवतार या पीर पैगम्बर से कम त्यागी व बलिदानी नहीं थे .मानवता के महान साम्यवादी कर्म्योद्धाओं ने जो अनगिनत कष्ट झेले उनके प्रमाण साइबेरिया ;वियेतनाम ;चीन क्यूबा तथा यूरोप के संग्रहालयों में अब भी उपलब्ध हैं ।
उधर प्रत्येक वह व्यक्ति जो मंदिर ;मस्जिद ;गिरजा या गुरुद्वारे में जाता है .वह जरुरी नहीं की सत्य निष्ठ ही हो -वह महा मक्कार ; झूंठा ;चरित्रहीन ;मुनाफाखोर ;कालाबाजारी ;रिश्वतखोर नही होगा ;इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता । इसी तरह जो अपने आपको धार्मिक नज़रिए से प्रस्तुत नहीं करता उसमें उदात्त ; उज्जवल चरित्र
मानवीयता ; ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा कूट-कूट कर भरी हो तो उस नास्तिक को किस कोटि में स्थान दिया जाये ।
प्रयोजन का प्रश्न है -अक्सर अति उत्साही कम्युनिस्ट तो धर्म के मूल पर ही कुठाराघात कर बैठता है .कुछ चतुर चालाक लोग इन अर्ध-परिपक्व साम्यवादियों व्याख्या को आधार बनाकर ;वर्ग संघर्ष में प्रतिगामी बढ़त हासिल कर लेते हैं .इन में दोनों बुर्जुआ धड़े शामिल हैं .एक धडा पूंजीवादी -सामंती शोषण के करता -धर्ताओं का है .दूसरा धडा धरम मजहब -के माध्यम से आजीविका चलाने वाले अनुत्पादक वर्ग का है .ये दोनों वर्ग श्रम शोषण के लिए कभी -कभी नीर -क्षीर हो जाते है .दोनों का साझा शत्रु है -साम्यवाद .इसलिए ये दोनों आक्रान्ता के रूप में आधुनिक सुशिक्षित .वैज्ञानिक ;प्रगतिशील शक्तियों को सर्वहारा से अलग -थलग करने और शोषित वर्ग की संघर्ष शक्ति को
भोंथरा बनाने के लिए पुराणी परम्परा को देवीय रूप प्रदान करने का प्रयास करते है .जब कभी इस पाखंडपूर्ण
इस दुष्कृत्य का कोई ईमानदार -न्यायप्रिय व्यक्ति या संस्था विरोध करता है तो उस नास्तिक करार दे दिया जाता है। अंध धार्मिकता की लहर को रोक पाना मुश्किल हो जाता है .धर्म के उस रूप को जो शोषण की ताकतों का दुर्दमनीय हथियार बन जाये ;समाज में विग्रह पैदा करे ;क्रांति के मार्ग में बाधा कड़ी करे -साम्प्रदायिकता कहते हैं दरसल उस धर्म या मजहब से जो अपने मूल स्वरूप में -मानव मात्र का न्यायपूर्ण जीवन जीने का अधिकार स्वीकार करता हो उससे मार्क्सवाद का कोई विरोध नहीं है विरोध उससे हो सकता है जो साम्प्रदायिकता ;पाखण्ड तथा शोषण की यथा स्थिति का समर्थन करता है ।
कोई भी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित धर्म /मजहब यदि वह सत्ता के स्वार्थ से दूर रहकर व्यक्ति .परिवार ;समाज या दुनिया को सुसभ्य बनाए तो वह स्वयमेव क्रांतिकारी पथ का अनुगामी हो जाएगा ।
अक्सर धार्मिकता और साम्यवाद के बीच अनुपयोगी कुतर्कों का समावेश हुआ करता है .यह बिडम्बना ही है की जो अपने आप को धार्मिक कहता है; वह बुरी तरह पाखंडपूर्ण जीवन जीता हुआ देखा जा सकता है ।
उधर दूसरी और ऐसे अनेक साम्यवादी दुनिया में हो चुके हैं ;आज भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जो की तथाकथित "नास्तिक "होते हुए भी किसी महान अवतार या पीर पैगम्बर से कम त्यागी व बलिदानी नहीं थे .मानवता के महान साम्यवादी कर्म्योद्धाओं ने जो अनगिनत कष्ट झेले उनके प्रमाण साइबेरिया ;वियेतनाम ;चीन क्यूबा तथा यूरोप के संग्रहालयों में अब भी उपलब्ध हैं ।
उधर प्रत्येक वह व्यक्ति जो मंदिर ;मस्जिद ;गिरजा या गुरुद्वारे में जाता है .वह जरुरी नहीं की सत्य निष्ठ ही हो -वह महा मक्कार ; झूंठा ;चरित्रहीन ;मुनाफाखोर ;कालाबाजारी ;रिश्वतखोर नही होगा ;इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता । इसी तरह जो अपने आपको धार्मिक नज़रिए से प्रस्तुत नहीं करता उसमें उदात्त ; उज्जवल चरित्र
मानवीयता ; ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा कूट-कूट कर भरी हो तो उस नास्तिक को किस कोटि में स्थान दिया जाये ।
शनिवार, 14 अगस्त 2010
स्वाधीनता की ६३ वीं वर्षगाँठ पर . . .

अपनी आज़ादी को हम, हरगिज़ मिटा सकते नहीं । सर कटा सकते हैं लेकिन, सर झुका सकते नहीं ।।
किसी क्रांतिकारी की इस रचना के अनुसार तो विगत तिरेसठ वर्ष में भारतीय आज़ादी का परिपक्वाकरण नहीं हो पाया। किन्तु तटस्थ समालोचना में कई विचारणीय बिन्दु हैं जो आशान्वित करते हैं की हम किसी से कम नहीं। निसंदेह हम अमर शहीदों के सपनों का-पूर्ण रूपेण धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, प्रजातंत्र खुशहाल भारत अभी तक नहीं बना पाए; हम अपने समकालीन नव-स्वाधीन राष्ट्रों-चीन ,कोरिया ;जापान से बहुत पीछे चल रहे हैं। यूरोप, अमरीका, रूस तथा अरेबियन देशों से न केवल आर्थिक अपितु सामाजिक समरसता में भी हम पीछे एक सौ अठासी वें नंबर पर चल रहें हैं।
स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की जनता और उसके तत्कालीन अमर शहीदों ने न केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद बल्कि पूंजीवादी सामंती शोषण से मुक्त समाजवादी गणतंत्र की स्थापना का संकल्प लिया था। हम उस दिशा में कितना कुछ कर पाए ?कितना किया जाना बाकी है? गतिरोध कहाँ और कौन खड़े कर रहा है? इसकी विवेचना के उपरान्त ही अगला कदम उठाया जाना चाहिए। देश में कौन -कौन से वर्ग हैं? किसे आज़ादी का मज़ा मिला? कौन ठगा हुआ महसूस कर रहा है? किसने देश को लूटा और किन-किन ने कुर्बानियां दी?
विकास का कौनसा माडल हमें अनुकूल है? किस नीति और कार्यक्रम से हमें हानि हुई या होगी? इन तमाम सवालों के जबाब मांग रहा है-आज़ादी ६४ वां पर्व । आज़ादी मिलने के साथ-साथ गुलामी की नाभिनाल को पूर्ण रूप से नहीं काटा जा सका । भाषावार राज्य स्थापना; जातीय आरक्षण; साम्प्रदायिकता; पूंजीवादी-सामंती शोषण; गरीबी और भृष्टाचार के मुद्दों पर हमें कोई खास कामयाबी नहीं मिल सकी है। वर्तमान दौर में तो लोकतंत्र पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े किये जाने लगे हैं। ये आवाजें सिस्टम के दो विपरीत ध्रुवों से आ रहीं हैं। एक ओर धुर वामपंथ के रूप में नक्सलवाद ने देश के अंदरूनी हिस्सों में कोहराम मचा रखा है, दूसरी ओर धुर दक्षिण पंथी साम्प्रदायिक ताकतों ने देश को लहू -लुहान कर रखा है। साम्प्रदायिक ताकतों में हिन्दू -मुस्लिम -सिख -इसाई -जैन -बौद्ध सभी धर्मों में आज़ादी के बाद कट्टरता बढ़ी है । इसमें कोई शक नहीं की स्वाधीनता संग्राम में कुछ वर्गों ने अंग्रेजों का छुप -छुप कर साथ दिया था। वे इस गद्दारी के एवज में -राजा -महाराजा ;रायबहादुर ;सर सेठ ;और न जाने क्या -क्या कूड़ा करकट कबाड़ते रहे और समस्त भारतीय जनता -जनार्दन को पददलित करते हुए हाराकिरी को प्राप्त हुए । इन्ही नकारात्मक तत्वों के विषाणु अभी भी भारत देश के नव -निर्माण में नित नयी बाधाएं खडी कर रहे हैं। ये तत्व समाज को खंड खंड करके लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का साधन मात्र मानते हैं। दूसरी ओर शिक्षित -अशिक्षित आम जनता अपने आपको वोटर भर मानती है। इसीलिये पांच साल में या कभी कभी मध्यावधि में वोट डालकर अपने काम धंधे {यदि यह नहीं तो चोरी -हत्या -बलात्कार}से लग जाती है।
इन सभी विडम्बनाओं का मिला जुला रूप है हमारा वर्तमान आधा अधुरा लोकतंत्र .इस शाशन -प्रबंधन की नजीर भी वर्तमान यू पी ए सरकार में हम स्पष्ट देख सकते हैं। पूरा देश आज आसमान छूती महंगाई से त्राहि- त्राहि कर रहा है। रसोई के सामान के दामों की दर भारत को दुनिया में सबसे ऊँचे शिखर पर पहुंचा चुकी है। उपर से तुर्रा ये की पेट्रोल; डीजल; रसोई गैस; केरोसिन तथा बिजली के दामों ने आम आदमी का जीवन दूभर बना दिया है । देश के कर्ण धार अमेरिका से बेहतर जी डी पी का सर्टिफिकेट लाये हैं प्रेस और मीडिया के सामने गाहे -बगाहे उसे दिखाकर महंगाई से इनकार कर रहे हैं ।
जनता को इस जी डी पी की असलियत मालूम होती जा रही है सो वह केन्द्रीय श्रम संगठनों के निरंतर जुझारू संघर्षों में हिस्सेदारी करने को मजबूर हो गई है। जनता को मालूम है की इस जी डी पी और उसके नाम पर बड़े अमीरों; कार्पोरेट घरानों; के उपर मुनाफाखोरी का जो स्वर्ण कलश चमचमा रहा है ;वह जनता के खून -पसीने के क्षरण का परिणाम है। देश भर के असंगठित मजदूरों की दुरावस्था का लोकतंत्र के किसी भी खम्बे ने ध्यान नहीं दिया। यह नितांत आर्थिक तानाशाही है। इसका प्रवाल प्रतिरोध होना ही चाहिए। आगामी ७ सितम्बर को देश का सर्वहारा इस आज़ाद भारत की एक और शल्य क्रिया करने को बाध्य है ।
इंकलाब जिंदाबाद ...स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को नमन ...जय भारत ..जय भारती ...
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