शनिवार, 11 अगस्त 2018

धार्मिक व्यथा एक साथ वास्तविक दुखों की अभिव्यक्ति और उनका प्रतिवाद दोनों है!धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है!धर्म आत्मा- हीन परिस्थितियों कीआत्मा है!धर्म ह्रद़यहीन विश्व का ह्रदय है!निर्दयी संसार का मर्म है तथा साथ ही निरुत्साही परिस्थितियों का उत्साह और उमंग भी है!धर्म एक अफीम है!
-कार्ल मार्क्स

पिकनिक सावन स्पॉट पै मनावै है।

गांव की गरीबनी का चूल्हा नहीं सुलगत,
घन गहर-गहर बरसात गहरावै है !
एलपीजी चूल्हा भी जले कैसे गैस बिन,
बी पी एल गैस का न पैसा जुट पावै है!!
गरीबी में गीला आटा,सुरसा सी महँगाई ,
गुजारे लायक श्रमिक मजूरी न पावै है!
बाढ़ में बहर गए टूटे-फूटे ठीकरे ,
डूब रही झोपड़ी पै मौत मँडरावै है!!
नगरीय अभिजात्य कोठियों की कामिनी,
पिकनिक सावन स्पॉट पै मनावै है।
सत्ताधारी नेता किये लंबे -चौड़े वादे.
भ्रस्टों की क्रपा से नया पुल बह जावै है!!

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

सिर्फ ईश्वर,गॉड,अल्लाह,अहूरमज्द में आस्था नही होने मात्र से कोई नास्तिक नही हो जाता!यदि आप किसी से सच्चा और निस्वार्थ प्रेम करते हैं,किसी भी प्राणी की हिंसा नही करते और किसी से बैर नही रखते तब भी आप सच्चे आस्तिक हैं!

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

विभिन्न सूत्रों की सूचनाएं हैं कि आवारा ढोरों से भरे ट्रक को कांजी हॉउस ले जाने या कसाई खाने ले जानेवालों से 'संस्कृति रक्षक' संगठित गिरोह जबरिया 'बंदी'लेतेहैं जिसका एक हिस्सा पुलिस को भी जाता है। जो ट्रक वाला या ड्रायवर यह 'शुल्क नहीं दे पाता या जो अपनी 'पहुँच ' का प्रमाण नहीं दे पाता, उसको 'गौहत्यारा' बीफ भक्षक घोषित कर वहीँ 'लुढ़का 'दिया जाता है। ऐंसा नहीं है कि मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री यह नहीं जानते लेकिन लोकतंत्र और देश के दुर्भाग्य से ये हत्यारे ही उनके पोलिंग बूथ एजेंट भी हुआ करते हैं।इसीलिये इस प्रकार के दमन-उत्पीड़न को रोक पाने में वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था [NDA Govt]असफल हो रही है। इसके लिए कुछ हद तक दलित -शोषित समाज के लोग भी इस अपराध के भागीदार हैं। बेकारी की हालत में वे दवंग नेताओं और अपराधियों के हाथों 'कुल्हाड़ी का बेंट' बन कर अपने ही सजातीय बंधुओं की हत्या के गुनहगार होते हैं। किसे नही मालूमकि यूपी, बिहार और हरियाणा में जातीय आधार पर राजनैतिक आतंक किन जातियों का है?

'कुल्हाड़ी का बेंट

विभिन्न सूत्रों की सूचनाएं हैं कि आवारा ढोरों से भरे ट्रक को कांजी हॉउस ले जाने या कसाई खाने ले जानेवालों से 'संस्कृति रक्षक' संगठित गिरोह जबरिया 'बंदी'लेतेहैं जिसका एक हिस्सा पुलिस को भी जाता है। जो ट्रक वाला या ड्रायवर यह 'शुल्क नहीं दे पाता या जो अपनी 'पहुँच ' का प्रमाण नहीं दे पाता, उसको 'गौहत्यारा' बीफ भक्षक घोषित कर वहीँ 'लुढ़का 'दिया जाता है। ऐंसा नहीं है कि मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री यह नहीं जानते लेकिन लोकतंत्र और देश के दुर्भाग्य से ये हत्यारे ही उनके पोलिंग बूथ एजेंट भी हुआ करते हैं।इसीलिये इस प्रकार के दमन-उत्पीड़न को रोक पाने में वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था [NDA Govt]असफल हो रही है। इसके लिए कुछ हद तक दलित -शोषित समाज के लोग भी इस अपराध के भागीदार हैं। बेकारी की हालत में वे दवंग नेताओं और अपराधियों के हाथों 'कुल्हाड़ी का बेंट' बन कर अपने ही सजातीय बंधुओं की हत्या के गुनहगार होते हैं। किसे नही मालूमकि यूपी, बिहार और हरियाणा में जातीय आधार पर राजनैतिक आतंक किन जातियों का है?

कांग्रेस और भाजपा का वर्ग चरित्र!

चुनाव के दौरान उन मतदाताओं की बड़ी फजीहत हुआ करती है,जो भाजपा और कांग्रेस की नीतियों से सहमत नही हैं!और जिनके सामने-भाजपा,कांग्रेस या कोई अन्य दल का उम्मीदवार तो है,किंतु वर्ग चेतना से लैस वामपंथी उम्मीदवार नही है!इन हालात में मतदाता यदि परिपक्व है तो वह कांग्रेस को चुनेगा !क्योंकि कांग्रेस की आर्थिक नीति काविरोध करते हुये भी अपने वर्गीय हितों के लिये संघर्ष किया जा सकता है,किंतु भाजपा या संघ के सत्ता में रहते हुये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-लोकतंत्र अक्षुण नही रह सकते! यद्दपि कांग्रेस और भाजपा का वर्ग चरित्र एक जैसा ही है,किंतु संसदीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बरक्स दोनों में बहुत फर्क है!वैसे तो अक्सर कांग्रेस और भाजपा को एक ही पायदान पर खड़ा किया जाता रहा है। किन्तु बजाय भाजपा के सर्वसत्तावाद और आक्रामक पूँजीवाद के कांग्रेस का उदारवादी जनवाद और लोकतांत्रिक चेहरा स्वीकार्य किया जाना चाहिये !कांग्रेस में राहुल गांधी हों या कोई और नेतागण हों उन्हें कांग्रेस के वेशिक सिद्धांतों के अलावा अपनी विनाशकारी आर्थिक नीतियों- मनमोहनी अर्थशाश्त्र की खामियों की भी जानकारी होनी चाहिए। उन्हें बहुत सोच समझकर संयम के साथआगामी संसदीय चुनावोंसे पूर्व न केवल जनवादी आर्थिक नीति का खुलासा करना चाहिये बल्कि ठोस'कामन मिनिमम प्रोग्राम', धर्मान्धता,साम्प्रदायिक दंगे,कुशासन,भीड़- हिंसा,महँगाई,बेकारी,निजीकरण ठेकाकरण और माफिया राजके खिलाफ अपनी ओरसे कठोर कार्यवाहीकाअनुमोदन करना चाहिये!कांग्रेसको या उसके नेतत्व को हताश निराश होने की जरुरत नहीं है। उन्हें अपनी पार्टी से वंशवाद और चमचावाद को खत्म करने की ओर भी कुछ तो कदम आगे बढ़ाने चाहिए। कांग्रेसियों को थोड़ा सा सांगठनिक संयम, सब्र और थोड़ा सी नीतिगत आत्मालोचना भी करनी चाहिये!यदि इतनाही कर लियातो बाकी का काम जनता कर देगी !क्योंकि किसीभी सत्तारूढ़ सरकार से नाराज जनता उसे अपदस्थ करने के लिये हमेशा तैयार रहती है !शर्त सिर्फ यह है कि मतदाता के समक्ष विश्वसनीय विकल्प हो!श्रीराम तिवारी
कुछ अपवादों को छोड़कर,आमतौर पर भारत के सभी राज्यों के पुलिसवाले या तो अपराधियों से मिले होते हैं या आसाराम,राम रहीम और ब्रजेषसिंह जैसे बलात्कारी गुंडों और बदनाम नेताओं के डर से चुपचाप अपनी 'ड्युटी' करते रहते हैं!इसीलिये न केवल आश्रमों में ,मठों में,मंदिरों में,मदरसों मे,चर्च में,बल्कि यूपी बिहार के एनजीओ द्वारा संचालित बालिका संरक्षण केंद्रों में भी सैकड़ों बालिग- नाबालिग लड़कियों पर जुल्म ज्यादती होती रहती है! पुलिस के आकंठ भ्रस्टाचार ने भारत की बेटियों की जिंदगी को असुरक्षित किया और पूरे भारत का अपराधीकरण कर डाला है!

शनिवार, 4 अगस्त 2018

डिजिटल,इलेक्ट्रॉनिक ,प्रिंट,श्रव्य और तमाम सोसल मीडिया में दलित सांसदों के असंतोष की प्रतिध्वनि से घबराकर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को निरस्त करने की ठान ली है,जो एस सी /एस टी एक्ट के बरक्स सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों पारित किया था! मोदी सरकार की इस हड़बड़ी से ऐंसा लगता है कि मानों सारे 'सवर्ण' पैदायसी बदमाश हैं और सारे दलित मानों पैदायशी ईमानदार और शांति प्रिय हैं! भारतीय समाज और राजनीति में ऐंसा कोई उदाहरण नहीं जहाँ दलितों को जिम्मेदारी नहीं दी गयी हो। अतीत में 40 साल केंद्रिय मंत्री रहे बाबू जगजीवनराम,उनकी सुपुत्री लोकसभा स्पीकर -मीराकुमार,भूतपूर्व ग्रह मंत्री सुशील शिंदे से लेकर एनडीए के राम विलास पासवान,करिया मुण्डा,मरांडी,माझी कुलस्ते,उदितराज और अठावले जैसे हजारों दलित नेता और वरिष्ठ अधिकारी-सभी यह जानते हैं कि सत्तासुख किस चिड़िया का नाम है?जबकि लाखों-करोड़ों सवर्ण मजदूरों और किसानोंका भी राष्ट्र के निर्माण में उतना ही योगदान है जितना कि दलित-आदिवासी भाइयों का! दरसल समस्या सवर्ण बनाम दलित की नही है!बल्कि समस्या राष्ट्रीय सर्व संपदा के बटवारे की है, रोजगार के अवसरों की है। जनसंख्या विस्फोट और पूंजीवादी व्यवस्था के चलते सरकारी क्षेत्र में नौकरी के अवसर बहुत कम हो गये हैं,ऐंसे में गरीब दलितवर्ग के पास आजीविका के जो पुराने परम्परागत साधन हैं,यदि वह उन्हें छोड़ देगा तो उनके लिये आजीविका के विकल्प क्या होंगे?इधर आरक्षण के नाम पर जाट,पटेल-पाटीदार और गूजर जैसे समाज भी सवर्ण समाज से दूर हो कर आरक्षण की मांग पर अड़े हुये हैं। चूँकि धनवान जाटों-पटेलों जैसे बड़े किसानों ने भी पिछड़ापन माँग लिया है। इसलिए अब बचा खुचा सवर्ण समाज अपने आप हासिये पर जा चुका है।अब तो भारत में कोई जाट है ,कोई पटेल है ,कोई पिछड़ा है और कोई अगड़ा है। कोई जैन है,कोई मराठा है,कोई सिंधी है,कोई -पँजाबी है,कोई तमिल-तेलगु-मलयाली है,कोई दलित,महादलित पिछड़ा,अतिपिछड़ा है! कोई आदिवासी-अल्पसंख्यक है। ऐंसा लगता है कि मानों असल भारतीय सिर्फ सवर्ण ही हैं! क्योंकि बाकी सब तो केवल अधिकारों की ही बात करते हैं। ऐसे लोग बहुत कम हैं जो देश के प्रति अपने कर्तव्य की भी बात करते हैं,और अपने आपको सिर्फ भारतीय समझते हैं!
श्रीराम तिवारी
राजनीति के मार्ग में,निहित स्वार्थकी भीड़।
पूंजीवाद के पूत हैं, भ्रस्टाचार के नीड़ ।।
जातपाँत की बोलियां,भाषण बोल कबोल ।
वोट जुगाडू खेल के ,बजते नीरस ढोल ।।
लोकतंत्र की मांद में,कोई नहीं गम्भीर।
भाषणबाज नेता बड़े,बातों के शमशीर।।
भारत के जनतंत्र को,लगा भयानक रोग।
सत्तापक्षमेंजा घुसे ,घटिया शातिर लोग।।
नयी आर्थिक नीति ने, किया देश कंगाल।
काजू-किशमिश हो गयी ,देशीअरहर दाल।।
रुपया खाकर बैंक का,माल्या हुआ फरार।
पक्ष विपक्ष में हो रही,फोकट की तकरार।।
भारत के बाजार में,अटा विदेशी माल!
डालर ही मदमस्त है,रुपया हुआ हलाल!!
अच्छे दिन उनके हुए,जो मंत्री और दलाल।
मुठ्ठी भर धनवान भये ,बाकी सब कंगाल।।
जात-वर्ण आधार पर,आरक्षण की नीति।
बिकट बढ़ीअसमानता,निर्धनजनभयभीत!!
आवारा पूँजी कुटिल,नाच रही चहुं ओर।
मल्टीनेशनल लूटते,दुष्ट मुनाफाखोर।।
बढ़ते व्ययके बजटकी,कुविचारित यहनीति!
ऋण पर ऋण लेते रहो,गाओ ख़ुशीके गीत !!
धीरे धीरे सब हुये,राष्ट्र रत्न नीलाम।
औने -पौने बिक गए ,बीमा -टेलीकॉम।।
लोकतंत्र की पीठ पर,लदा माफिया राज।
ऊपर से नीचे तलक,बंधा कमीशन आज।।
वित्त निवेशकों के लिए ,तोड़े गये तटबंध।
आनन-फानन कर दिये,जनविरुद्ध अनुबंध !!
ऊंचे महलों के लिये,उजरत निर्धन नीड़!
यत्र तत्र धर्माधता, भावुक हिंसक भीड़!
श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

अतिरिक्त मूल्य के रहस्य

  • पूंजीवादी व्यवस्था में मात्र सर्वहारा अर्थात शारीरिक बौद्धिक मेहनत करने वाले औद्योगिक मजदूरों का ही नहीं बल्कि किसानों,खेतिहर मजदूरों,कर्मचारियों और छोटे दुकानदारों का अर्थात हर तरह की मेहनतकश जनता का भी शोषण होता है।किसान की तो लागत ही नहीं निकल पाती।वह कर्ज दर कर्ज का शिकार होता रहता है।
    यह जनता दो तरह से शोषित होती है।एक तो उत्पादक के रूप में ,दूसरे उपभोक्ता के रूप में शोषण के ये दोनों रूप अतिरिक्त मूल्य से जुड़े हुए हैं।मालिक मजदूर को जो मजदूरी देता है,वह पहले से चली आ रही कीमत पर उसे जीवन के लिए आवश्यक न्यूनतम उपभोग सामग्री खरीदने के लिए दी जाती है।किन्तु उतने ही रुपए में जो सामग्री उसे पहले मिल जाती थी अब उसे नहीं मिलती।उसे प्रायः बढ़ी हुई कीमत चुकानी पड़ती है।आज के वैश्वीकरण के युग में तो यह रोज रोज की बात हो गई है।पहले यदि आज कीमत बढ़ी है तो कल उसके कम हो जाने की भी आशा रहती थी।किन्तु आज नहीं।तेल की कीमत घटने के बाद भी आम आदमी को कोई राहत नहीं मिलती।इसका विरोध करने की अगुआई सर्वहारा ही करता है।मिलो कारखानों,बैंकों,बीमा कंपनी के लोग आगे आते हैं।
    शिक्षक,वकील जो कभी अगुआई करते थे अब उनका समर्थन करते हैं।राज्य जो हमारा राज्य,जनता का राज्य कहा जाता है,उसका विरोध करता है।हमारी न्यायपालिका में अनपढ़ लोग नहीं है।वह अतिरिक्त मूल्य के रहस्य से अच्छी तरह परिचित हैं।वह जानते हैं कि मालिक के स्वामित्व में जो कुछ भी है वह सर्वहारा और आम जनता के शोषण का प्रतिफल है।किन्तु वह भी सर्वहारा के हड़ताल और दूसरे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर न्यायिक रोक लगाती है।काम नहीं तो वेतन नहीं का फरमान सरकार और न्याय के मंदिर द्वारा जारी होता है।वह ,,संविधान,शांति और कानून,,की रक्षा के नाम पर।इस तरह राज्य का भी पूंजीवादी चरित्र खुल कर सामने आ जाता है।