सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

सियासत बनाम विरासत


मानव -सभ्यताओं के इतिहास में ,मानव जीवन के अतीत में,जो-जो गरिमामय -जीवनदायक तत्व खोजे गये,जिन मानवीय धीरोदात्त चरित्रों ,आदर्शों ,मूल्यों सिद्धान्तों और वैज्ञानिक आविष्कारों से यह धरती शस्य श्यामला बनी, जिन उपादानों से ,उत्पादन के साधनों के अन्वेषण से  जीवमात्र को शुकुन और शांति मिली,जिन सिद्धांतों -मूल्यों में स्वतंत्रता ,समानता ,भ्रातत्व और सुख समृद्धि का भाव निहित हो ,उन्हें हमें 'अतीत की विरासत' कहते हैं।

जिन कारणों से मनुष्य स्वार्थी और हैवान बना,  जिन आविष्कारों से धरती की जीवन्तता को खतरा बढ़ा ,जिन-जिन कारणों से जल-जंगल -जमीन का क्षरण हुआ ,जिन रीति रिवाजों से सामाजिक विषमता और निर्धनता बढ़ी, जिन कारणों से एक ताकतवर-बदमाश व्यक्ति दूसरे कमजोर और सचरित्र मनुष्य का शोषण-उत्पीड़न करता है ,जिन कारणों से इस दुनिया  में  युद्ध ,महायुद्ध और तथाकथित धर्मयुध्द लड़े जाते रहे  ,जिस वजह से भाई-भाई में भी बैरभाव उत्पन्न हो जाता है ,उसे हम राजनीति याने सियासत कहते हैं।   

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

राष्ट्रवाद का गुणानुवाद एक नैतिक बाध्यता है।

जिस परिवार का कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त हो ,प्रतिहिंसा की मनोदशा से जिसका चित्त अशांत रहता हो, जो हर किसीसे अकारण बैरभाव रखनेका आदि हो ऐसे व्यक्तिसे न केवल उसके परिवार को खतरा है बल्कि उस देश-समाज को, गाँव -नगर को और गली-मोहल्ले को भी खतरा है।  इसी तरह जिन लोगोंके मनमें अन्य धर्म-मजहब वालों के प्रति ,पडोसी मुल्कों के प्रति स्थाई  बैरभाव हो ,जिनके शब्दों में अपने ही हमवतन लोगों के लिए घृणा हो और 'असहमत' बुद्धिजीवियों के लिए गालियाँ हों ,जिनके निहित स्वार्थ में किसी खास राजनैतिक दल या नेता विशेष  के प्रति अंधभक्ति का दिखावा हो ,ऐंसा व्यक्ति भारतीय संविधान और लोकतंत्र का सम्मान कैसे कर सकता है ?भले ही वह आपने आपको 'बड़ा'  'राष्ट्रवादी' घोषित करदे किन्तु देशभक्त वह कदापि नहीं हो सकता।

इसी तरह मजहबी आस्था और धार्मिक विश्वाश भी 'राष्ट्रवाद' की तरह मूल रूप से एक अमूर्तन अवधारणा ही है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए उसका धर्म-मजहब इसलिए दुनिया में श्रेष्ठ है क्योंकि वह उस खास धर्म-मजहब वाले परिवार या समाजमें जन्मा है अथवा उसे देश -काल -परिस्थितियों ने धर्मान्तरित होनेको बाध्य किया है। उदाहरण के लिए मैं स्वयम जन्मना 'ब्राह्मण कुल' से हूँ,इसलिए मेरे पास हिन्दू धर्म और ब्राह्मण जातिपर गर्व करनेका आधार हो सकता है। लेकिन इसी हिन्दू धर्म के 'पुनर्जन्म'  सिद्धांतानुसार  कदाचित मैं यदि जैन,सिख,ईसाई,यहूदी अथवा मुसलमान परिवार में जन्म लेता हूँ  तो स्वाभाविकहै कि उस स्थितिमें मुझे वे धर्म-मजहब ही प्रिय होंगे ,जिनमें मेरा जन्म हुआ होगा ! गीता के अमृत सन्देश का सार भी यही है कि  प्राणिमात्र के जीवन -मृत्यु का चक्र देश-काल की सीमाओं से मुक्त और कर्म स्पर्हा से आबद्ध होकर अनवरत चलता रहता है। भारत,पाकिस्तान,चीन या कोई और देशमें जन्मना तो मनुष्य की मानवीय आकांक्षाओं से बहुत परेहैं। राष्ट्रोंका पार्थक्य तो पृथक सभ्यताओं का  प्रतीक मात्र हैं। इसीलिये तमाम हिन्दू दर्शनशास्त्रों ने और प्राच्य वाङ्ग्मय ने भी 'सबै भूमि गोपाल की '' का उद्घोष किया है।  'वसुधैव कुटुम्बकम' इस दर्शन का शाश्वत नारा है। मानव सभ्यता के राजनैतिक विकास की प्रक्रिया में सभी राष्ट्रों का सीमांकन एक 'सहनीय' आवश्यक बुराई मात्र है।अर्थात राष्ट्रवाद का गुणानुवाद एक नैतिक बाध्यता है।  

 जिस किसी व्यक्ति की सामाजिक ,जातीय  धार्मिक और राष्ट्रीय चेतना  सिख गुरुओं की बाणी ''मानुष की जात सबै एकहु पहिचानवै ''के स्तर की है ,जिस किसी ने उपनिषद मन्त्रदृष्टा ऋषियों के ''एकम सद विप्रा बहुधा वदन्ति' को हृदयगम्य किया है , जिसने बुद्ध महावीरके अमरसन्देश  'सम्यक दर्शन' के स्तर को छूआ है, और जिस बन्दे ने दकियानूसी घटिया अंधराष्ट्रवाद से ऊपर उठकर 'सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद'' के उच्चतर सोपानको पायाहै ऐसा व्यक्ति ही सच्चा राष्ट्रवादी हो सकता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने देश का सर्वश्रेष्ठ नागरिक होगा ,बल्कि मानव मात्र का  सच्चा बंधु भी वही होगा। मानवीय मूल्यों का सच्चा संवाहक भी वही हो सकता है। श्रीराम तिवारी ! 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

बहुसांस्कृतिक भारतीय लोकतंत्र को अंधराष्ट्रवाद की जरूरत नहीं !


 गुलाम भारत में और उससे भी पूर्व के सामंतकालीन पुरातनपंथी  भारत में  हजारों स्वतन्त्र राजा-महाराजा हुआ करते थे। उनकी अपनी-अपनी  पृथक  सेनाएं हुआ करतीं थीं और अपनी-अपनी पृथक मुद्राएं भी हुआ करतीं थीं. पृथक रीति-रिवाज और शासन पद्धतियाँ हुआ करती थीं। ये  निरंकुश राजे-राजवाड़े  अपने ऐशो आराम के लिए राज्य विस्तार के निमित्त आपस में लगातार युद्ध करते रहते थे। इस सामंती  दौर में देशभक्ति' शब्द का जन्म ही नहीं हुआ था। तब राजा को साक्षात्  'विष्णु'; का अवतार माना जाता था ,इसीलिये उस कालखण्ड के इतिहास में  'राजभक्ति' 'राजधर्म' और राजयोग जैसे शब्दों की पर्याप्त भरमार अवश्य रही  है । किन्तु वैसी उद्दाम देशभक्ति [Nationality] का उल्लेख कहीं नहीं मिलता, जैसी की 'संघ परिवार' चाहता है । स्वाधीनता संग्राम के जिन मूल्यों ने भारतीय गंगा जमनी  तहजीव को जन्म दिया। जिसके परिणास्वरूप वर्तमान बहुभाषा,बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक भारतीय लोकतंत्र अस्तित्व में आया उस अनेकता में एकता वाले विराट भारतीय लोकतंत्र को  'अंधराष्ट्रवाद' की जरूरत नहीं है !

बड़े आश्चर्य की बात है कि वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने  हजारों साल पहले इस जम्बूद्वीप बनाम  भरतखण्ड अर्थात भारतवर्ष बनाम आर्यावर्त में  'अन्तराष्टीयतावाद' का सिद्धांत प्रस्तुत किया था। उपनिषद का यह कथन दृष्टव्य है:-

 सर्वे भवन्तु सुखिनः ,सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुखभाग्वेत।

 या


 अयम निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम ,उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम।


 चन्द्रगुप्त मोर्य के कार्यकाल में  इस भूभाग पर जब यूनानी और पर्सियन आक्रमण हुए तब पहली बार आचार्य चाणक्य द्वारा  'राष्ट्र' और 'राष्ट्रभक्ति' शब्द का प्रयोग किया गया । दरसल 'राष्ट्रभक्ति' शब्द  का जन्म 'राष्ट्रराज्य' की स्थापना के निमित्त ही हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप के लिए  'देशभक्ति' मूल रूप से एक पाश्चात्य धारणा है।

जार्ज वर्नाड शा ने कहा है ''देशभक्ति मूल रूप से एक  कबीलाई अवधारणा ही है कि कोई राष्ट्र इसलिए इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि 'आप' वहाँ  पैदा हुए हैं !'' यूरोपीयन इकोनॉमिक कम्युनिटीज 'या यूरो के रचनाकारों ने 'नेशन'को विराट करने की जो परिल्पना प्रस्तुत की है ,वह भारतीय उपनिषद सिद्धान्त 'वसुधैव कुटुम्बकम'से प्रेरित है। किन्तु बड़े दुःख की बात है कि इस सिद्धांतके वैध उत्तराधिकारी -भारतीय  उपमहाद्वीप के दो राष्ट्रों के दिग्भर्मित लोग ,भारत और पाकिस्तान के वासिंदे  इन दिनों अपनी 'वसुधैव कुटुम्बकम 'वाली साख को ताक पर रखकर  नेशनलिज्म'का पाश्चात्य पहाड़ा  सीख रहे हैं और वे अन्तराष्टीयतावाद ,विश्व बंधुत्व जैसे शब्दों को सुनना ही नहीं चाहते। श्रीराम तिवारी !

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

जिन्हें आप्रेशन सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत चाहिए वे नोट करें !

 भारत का दक्षिणपंथी दकियानूसी 'भांड परिवार' सनातन से ढपोरशंख बजाने के लिए कुख्यात है। जब तक यह स्वयंभू  'नकली देशभक्त ' परिवार किसी काल्पनिक चीजको रूप और आकारमें साकार नहीं कर लेता तब तक वह 'उदर शूल की पीड़ा से बैचेन रहता है। साम्प्रदायिक तत्वों की यही पीड़ा 'फास्जिम' की जननी है। उन्हें लगता है कि वे साक्षात् शेषनाग के अवतार हैं ,वे ही भारत राष्ट्र के तारणहार हैं ,और यदि इस देश की  यह साम्प्रदायिक खरपतवार वे अपने सिर पर धारण नहीं करते तो, यह महान भारत राष्ट्र सदा के लिए रसातल में धस जाता।

भारत के दुर्भाग्य से ये 'महानरपुंगव' इन दिनों देशकी 'सत्ता' में सर्वशक्तिमान होकर विराजमान हैं। चूँकि सिर्फ पठानकोट,उधमपुर,उरी इत्यादि 'भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के अंदर भी पाकिस्तानी दहशतगर्दों का कहर  सर्वत्र व्याप्त रहा है। हालाँकि देशकी आवामने  इसके बावजूद भी अपना  धैर्य नहीं खोया। लेकिन जब अति हो गयी तब -विपक्ष ने ,मीडिया ने और जनता ने इस सत्ताधारी वर्ग से कुछ सवाल अवश्य किये। ''श्रीमान आप जब विपक्ष में थे तब 'छप्पन इंच का सीना था और  पाकिस्तानको अंदर घुसकर मारने वाली डींगे हाँकते रहे और अब आप सत्ता में हैं तो चुप क्यों हैं ? '' बहरहाल मोदी सरकार ने  उसके बाद जो कुछ किया वह सबके सामने है। भारतीय फ़ौज ने पीओके में 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक' को बड़ी सूझ बूझ से अंजाम दिया है। कुछ सफलता तो अवश्य मिली है। वेशक सेना और सरकार के पास इसके सबूत भी हैं,रणनीतिक और सामरिक कारणों से उन्हें जाहिर किया जाना उचित भी नहीं है। देश की जनता एवम सरकार को अभी बहुत सब्र से काम लेना चाहिए। भारतीय सैन्य ताकत को और पुख्ता किया जाना चाहिए। सुरक्षा की खामियों पर ध्यानदिया जाना चाहिए,अमनके विकल्पों पर भी निगाह होनी चाहिए। वेशक युद्धोंउन्माद जगाना बेहद अमानवीय कृत्य है किन्तु जहरीले नागका सिर कुचलना भी कोई गलत बात नहीं है। देशकी सीमाओं पर सैन्य गतिविधियोंको लेकर हो रही वयानबाजी पर  अंकुश लगना चाहिए!

हर एक भारतीय को  धैर्य के साथ सोचना चाहिए कि भारतीय डीजीएमओ और कमांडोज द्वारा पीओके में सम्पन्न आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पाकिस्तान में दो बातें क्यों हो रहीं हैं? पाकिस्तानी सत्ता पक्ष कह रहा हैकि  उनके यहाँ भारत ने कोइ सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की।जबकि पाकिस्तानके ही इमरान खान जैसे विपक्षी नेता खुद कह रहे हैं कि दोनों 'शरीफों'ने उनकी इज्जत मिटटी में मिला दी। पाकिस्तान में छिपे बैठे भगोड़े आतंकी कह रहे हैं कि वे भारतसे बदला लेंगे , केजरीवाल जैसे नेताओं को या बाकीके तमाम 'मोदी विरोधियों 'को और क्या सबूत चाहिए ?यूएनओ कहता है कि 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक 'को उसने नहीं देखा ! यूएनओ तो वही कहेगा जो कि उसके आका अमेरिका ने देखा होगा ! चूँकि अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुसकर मारा था और भारत ने देखकर भी नहीं देखा ,इसलिए अब भारतीय फ़ौज जो कुछ भी करेगी वो देखकर भी अमेरिका नहीं देखेगा। इसलिए यूएनओ को भी कुछ नहीं देखना है। भारतमें जो लोग आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांग रहे हैं वे नादान हैं, देशकी आवामको उनके बहकावे में नहीं आना चाहिए। जो लोग अंधराष्ट्रवाद से पीड़ित हैं और अल्पसंख्यकों को ,धर्मनिर्पेक्षतावादियों को 'देशद्रोह' से नवाज रहे हैं उन कुंठित लोगोंसे भी प्रधानमंत्री को सतर्क रहना होगा। क्योंकि भारत अतीत में जब -जब गुलाम हुआ है उसे इन्हीं सत्तालोलुप -भाट -चारण' वर्ग के लोगों ने डुबाया है। सत्तासीन नेताओं को अपना चापलूसी मोह त्यागकर ,निंदा -स्तुति से परे देश की अवाम और विश्व विरादरी के साथ अपने दूरगामी निहतार्थ  साधने चाहिए। शीर्ष नेतत्व का हृदय विशाल भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के अनुकूल और भारतीय लोकतंत्र के अनुकूल होना चाहिये। 

कांग्रेसियों पर या गैर भाजपाई दलों पर  अतीत में भी कई बार 'कायरता' के आरोप लगे हैं। मोदी जी जब विपक्ष में थे तब उन्होंने जो कुछ किया वो वैसा ही है जैसे कि अभी पाकिस्तान में पूर्व क्रिकेटर इमरान खान कर रहा है। उसने नवाज शरीफ को 'कायर कहा है। जबकि मोदी जी ने डॉ मनमोहनसिंह को कायर कहा था। यह बात सिर्फ बोली बानी की है। वरना आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में  एवम अटॉमिक पॉवर वाले जगत में अब  न तो कोई स्थाई सूरमा है और न कोई स्थाई कायर है। अब तो जो कुछ है वह मीडिया  में निर्थक -अनर्गल प्रलाप है।

जिन्हें आप्रेशन सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत  चाहिए वे नोट करें कि २७ सितम्बर-२०१६ के अल सुबह आतंकवाद से पीड़ित भारत की फ़ौज के स्पेशल दस्ते ने पीओके 'में आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक 'द्वारा कुछ आतंकी केम्प नष्ट किये हैं।  कुछ आतंकी भी मारे हैं। एक पाकिस्तानी फौजी  भी माँरा गया और एक जिन्दा पकड़ा गया। जिसे बड़ा में उचित जांच पड़ताल के बाद तत्काल छोड़ दिया गया। इसके अलावा अंतराष्टीय मंच पर स्वयम प्रधानमंत्री मोदीजी ने और उनके मंत्रमण्डलीय साथियों ने दुनिया के लगभग १०० देशों के राजदूतों को तत्सम्बन्धी सूचना भी तत्काल दी। अपने भारतीय विपक्ष -सोनिया गाँधी सीताराम येचुरी दलों को दी।  यदि फ़ौज की सर्जिकल स्ट्राइक पर सोनिया जी या सीताराम येचुरी सवाल नहीं कर रहे हैं ,तो देश में बाकी विपक्ष को और अन्य 'सवालकर्ताओं' को कुछ तो यकीन रखना ही होगा। उन्हें यह मानना ही होगा कि मोदी सरकार को पाकिस्तान के खिलाफ अपने  प्रयासोंमें कुछ सफलता अवश्य मिलीहै। विश्व विरादरी से पाकिस्तानको 'अस्पर्श्य बनाने में भी मोदीजी कुछ हद कामयाब रहे हैं।

वेशक आलोचक कह सकते हैं कि यह आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक तो ७० साल से लगातार चल रही है। कभी भारत और कभी पाकिस्तान यह कार्यवाही करते  ही रहते हैं। इसमें नया क्या है ?कोई बड़ा तीर नहीं मारा है! पाकिस्तान का अभी तक केवल  एक फौजी  ही मार पाए हैं ! दाऊद ,हाफिज सईद,और जैश वाले ततः कष्मीरी दुःखक्तारें वाले आतंकी अभी भी कश्मीर को लहूलुहान किये जा रहे हैं। कश्मीर में पुलिस और सरकार नाकाम हो गए है। मोदी जी और उनके बगलगीर महबूबा सरकार सब फ़ैल हैं। जमात-उद दावा का अभी तक बाल भी बाँका नहीं कर पाए हैं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि 'यूपी चुनाव में राजनैतिक लाभ के लिए यह सब प्रोपेगेंडा किया जा रहा है। राष्ट्रीय शर्म से उबरने के लिए भारत की जनता को यह आपरेशन सर्जिकल नामक झुनझुना पकड़ा दिया गया है। सरकार के भड़ेत लोग मीडिया पर ,जनता पर ,यूएनओ पर ,चीन पर और देश की आवाम पर अपनी खीज निकाल रहे हैं। ये तमाम आरोप सही  भी हों तो भी हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि भारत की फ़ौज पर जनता को भरोसा है। यदि  किसी व्यक्ति को ,किसी नेता को या किसी कौम को मोदी सरकार पर भरोसा नहीं तो  वो स्पष्ट कहें  यह उसका अधिकार है किन्तु अपनी फ़ौज को राजनीती मेनन घसीटे। क्योंकि जनता फ़ौज के साथ है!

कुछ लोग सही सवाल उठा रहे हैं ,कि यदि एनडीए वाले विपक्ष में होते और किंचित मनमोहन सिंह या कोई और नेता प्रधानमंत्री  होता तो भारतीय फ़ौज द्वारा 'पीओके' में सम्पन्न तथाकथित 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक 'को ये मोदी के मतवाले फ्लाप ही बताते। सर्जिकल स्ट्राइक के पहले ही ये लोग सम्भवतः पठानकोट,उरी या उधमपुर सैन्य परिसर के हमलों को लेकर -राममलीला मैदान पर , जंतर -मन्तर पर ,धरना देने लग आजाते। वे तो पूरे देश में ,बाबाओं-बाबियों ,स्वामियों-साध्वियों ,अन्नाओं ,रामदेवों और सैकड़ों श्री-श्री के नेतत्व में वेचारे डॉ मनमोहनसिंह को या जो भी 'वेचारा' प्रधान मंत्री होता ,उसे हरि -हरी चूड़ियाँ भेंट कर रहे होते ! जैसे कि इस समय पाकिस्तान में लफ़ंगा इमरान खान कर रहा है। जैसा कि उधर हाफिज  सईद ,मसूद और दाऊद इत्यादि किये जा रहे हैं। किन्तु किसी को यह नहीं भूलना चहिये कि पाकिस्तान हो या भारत अमन के परिंदे तो दोनों मुल्कों में हैं दोनों ओर के उन्मुक्त नीलगगन मेंविचरण करते हैं। और अमन की उम्मीद कभी खाली नहीं जाती । सेनाएं अपना फर्ज निभाती हैं तो अमनपसन्द जनता को भी अपना फर्ज नहीं भूलना चाहिए।

जो लोग अभी सत्तामें हैं  और  इस आपरेशन सर्जिकल की छुद्र कार्यवाही को 'धजी का साँप' बता रहे हैं।वे सत्ता समर्थक चाटुकार लोग  यदि इस मामूली कार्यवाही की अतिरञ्जित वयानबाजी केलिए जिम्मेदारहैं ,तो सत्ताविरोधी और सनकी लोग  भी बिना आगा-पीछा सोचे ही  अपनी  भारतीय फ़ौजसे उसकी काबिलियत का सबूत मांग रहेहैं जो कि वेहद निंदनीय और शर्मनाक कृत्य है।  श्रीराम तिवारी !

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

तानाशाह स्वयम्भू नहीं होते ,मूर्ख समाज द्वारा पैदा होते हैं !

परिवार में ,कुटुंब -कबीले में ,समाज में या मुल्क में  किसी व्यक्ति विशेष के शौर्य ,अवदान और उदात्त चरित्र के कारण उस व्यक्ति को 'अवतार' अधिनायक या  'हीरो'मानने की परम्परा दुनिया में पुरातनकाल से रही है। लेकिन भारत में अजीब स्थिति है। यहाँ तो बिना किये धरे ही ,बिना त्याग बलिदान वाले लोग, अपनी चालकी ,धूर्तता और बदमाशी से 'हीरो' या अधिनायक बनते देखे गए हैं। वास्तविक हीरो ,बलिदानी या नायक इतिहास के हासिये से भी गायब कर दिए जाते हैं। जैसे कि मध्यप्रदेश के व्यापम सिस्टम के चलते हजारों वास्तविक 'नायक' वेरोजगार हैं या मनरेगा की मजदूरी कर रहे हैं। जबकि नकली अभ्यर्थी और बदमाश- मुन्नाभाई लोग अफसर- बाबू बनकर सत्ता से ऐसे चिपक गए कि देखकर गोह भी लाज जाए।

यही स्थिति पूँजीवादी -दक्षिणपंथी राजनीति की है। यही स्थिति जातीय -सामाजिकआन्दोलनों की और धार्मिक आयोजनों  की भी है। यही स्थिति स्वाधीनता सेनानियों की है। यही स्थिति मीसा बंदियों की है।हर क्षेत्र में चालाक और काइयाँ किस्म के लोग लाइन तोड़कर जबरन घुस जाते हैं। यही 'दवंग'लोग विद्या विनय सम्पन्न बेहतरीन युवा शक्ति को कुंद करदेते हैं। कुछ तो उन्हें धकियाकर किनारे लगा देतेहैं, खुद ही व्यवस्था के 'महावत' बन जातेहैं।  बड़ेखेद की बात है कि समाज के कुछ उत्साही लोग इन बदमाशों को ही हीरो मान लेते हैं। कुछ तो कालांतर में अवतार भी मान लिए  जाते हैं। इन नकली 'हीरोज' के कारण ,नकली अवतारों के कारण ही अतीतके झगडे कभी पीछा नहीं छोड़ते। जिन अवतारों ,पीर पैगम्बरों के कारण तमाम आधुनिक पीढ़ियाँ आपस में लड़ती -झगड़ती रहें उन पर सवाल उठाना भी गुनाह माना जाता है। भारत-पाकिस्तान के बीच जो अनवरत वैमनस्य चल रहा है, और तमाम देशों में  जो सामाजिक ,जातीय संघर्ष जारी है ,भारतमें आरक्षण वादियों और अनारक्षणवादियों के बीच जो हो रहा है ,वह सब इसी अतीत की काली छाया का परिणाम है। अचेत और साधारणजन भी इस स्थिति के लिए पर्याप्त जिम्मेदार हैं , वे इन नकली नायकों' की जय-जय कार करने में व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा व्यय करते रहते हैं। बेईमान-बदमाश -नायकों के पीछे जय-जयकार करने वाले लोग उन  बगल बच्चों की तरह होते हैं जो हाथी के पीछे -पीछे ताली बजाकर अपना मनोरंजन कर लेते हैं। इतिहास साक्षी ही कि जनता की गफलत के कारण ही अक्सर चालाक लोग लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच जाते हैं। तानाशाह यहीं से पनपता है और अधिनायकवाद यहीं से जन्म लेता है।  


भारत की वर्तमान छल-छदम और सामाजिक विद्वेष की राजनीति से बदतर ,दुनिया में अन्य कोई राजनैतिक व्यवस्था नहीं है। वैसे तो इस पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था का  विस्तार विश्वव्यापी है किन्तु जिस तरह भारत के   गरीब मतदाताओं के वोट पाने के लिए नेता -नेत्रियाँ  अनैतिक पाखण्ड करते हैं ,जिस तरह अपनी वंशानुगत योग्यता को जब-तब आम सभाओं में पेश करते रहते हैं। यह विशेष राजनैतिक योग्यता दुनिया में शायद ही कहीं अन्यत्र मिलेगी ! यहाँ चाय बेचने से लेकर ,भैंसें चराने वाले तक ,रंगदारी बसूलने से लेकर खुँखार डकैतों की गैंग में शामिल होने वाले तक विधान सभाओं में और लोक सभा में पहुँचते रहे हैं। यहाँ पैदायशी दलित-पिछड़े होने से लेकर धर्म-मजहब का ठेकेदार होने तक और जात -खाप से लेकर अपराध जगत का बाप होने तक की तमाम नैसर्गिक योग्यता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।आजादी के तुरन्त बाद मुबई से लेकर दुबई तक और झुमरी तलैया से लेकर दिल्ली तक राजनीति में अपराधियों का बहुत वर्चस्व रहा है। सिर्फ लाल डेंगा जैसे अलगाववादी ही नहीं बल्कि रतन खत्री ,हाजी मस्तान,दाऊद,छोटा शकील ,बड़ा राजन ,अलां घोड़ेवाला ,फलां दारूवाला और ढिकां सट्टा वाला जैसे 'देशद्रोही' ही भारत की राजनीति संचालित करते आ रहे हैं। धरती पकड़ अपराधियों- दवंगों के आगे अधिकांस सज्जन नेता,ईमानदार पुलिस अफसर और कानून के रखवाले भी अपराध जगत की गटरगंगा में डुबकी लगाते रहे हैं। फिल्म वाले - निर्माता,निर्देशक ,फायनेंसर ,हीरो, हीरोइन और वितरक तो इस अपराध जगत में टूल्स की तरह इस्तेमाल होते रहे हैं। वैसे तो राजनीति की पूरी की पूरी हांडी ही काली है किन्तु यूपी, बिहार, महाराष्ट्र ,आंध्र,कर्नाटक ,पंजाब के अधिकांस राजनेता इस अपराध जगत में  ज्यादा कुख्यात रहे हैं।  तानशाह पैदा नहीं होते अपितु जनता द्वारा पैदा किये जाते हैं।

 भारत में   'बहुजन समाज' के वोट हड़पने के लिए ,दलित-पिछड़ेपन के जातीय विमर्श को बड़ी चालाकी और धूतता से हमेशा जिन्दा रखा जाता है। कुछ नेता-नेत्रियाँ न तोआर्थिक नीति जनते हैं, न विकासवाद जानते हैं ,न उन्हें 'राष्ट्रवाद' से कोई मतलब है  वे तो केवल सत्ता सुख के लिए  अपनी जातीय वैशाखी पर अहोभाव से खड़े हैं। उनके   तथाकथित नॉन ट्रान्सफरेबिल वोटर्स भी बड़े खब्ती, कूढ़मगज और भेड़िया धसान होते  हैं। उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद,एकता -अखण्डता और देश के सर्वांगणींण वैज्ञानिक विकास से कोई लेना देना नहीं। उन्हें सिर्फ अपने नेता -नेत्री की चिंता है जो उन्हें 'आरक्षण' की वैशाखी पकड़ाए रखने का वादा करता/करती है !

कुछ दलितवादी नेताने बहुजन समाजको वर्ग चेतना [Educate,Agitate,Orgenize] से लेस करने के,उन्हें जात -एससी/एसटी के रूप में पर्मेनेंट वोटों का भंडार बना डाला है। उन्होंने शोषित-दलित उत्थानके बहाने जातीयता की राजनीति को अपनी निजी जागीर बना डाला है। जातीयतावादी नेताओं द्वारा जाती को राजनीति का केंद्र बना लेने से  भारतीय समाज में विध्वंशक जातीय संघर्ष की नौबत आ गयी है । सत्ता के भूंखे जातिवादी-मजहबपरस्त नेताओं ने दमनकारी जातीयताके खिलाफ संघर्ष छेड़ने के बजाय उसे सत्ता प्राप्ति का राजनैतिक अवलम्बन बना लिया गया है। इन हालात में भारत जैसे देश में किसी सकारात्मक क्रांति की या किसी कल्याणकारी पुरुत्थान की कोई समभावना नहीं है।

अतएव कभी कभी तो लगता है कि वर्तमान जातीय-मजहबी नेताओं के चोंचलों से तो  'यूटोपियाई पूँजीवाद'ही बेहतर है !कमसेकम पूँजीवदी -विज्ञानवादी व्यवस्था में 'दान-पूण्य'धर्म-कर्म का आदर्श आचरण तो जीवित है। खबर है कि भारत के प्रख्यात हीरा व्यापारी सावजी ढोलकिया ७ हजार करोड़ की सम्पत्ति के मालिक हैं। उन्होंने गत वर्ष अपने कर्मचारियों को दीवाली पर तोहफे में फ्लेट और कारें दीं थीं।  जबकि इन्ही ढोलकिया जी ने अपने एकलौते बेटे को खुद के बलबूते पर अपनी हैसियत निर्माण के लिए घर से खाली हाथ निकाल दिया था। उन्होंने अपने बेटे को पाथेय के रूप में केवल  स्वावलंबी होने का मन्त्र दिया था। उनका बेटा  अभी भी कोचीन की किसी कम्पनी में  ४ हजार रुपया मासिक की प्रायवेट नौकरी कर रहा  है। उसे यह नौकरी हासिल करने के लिए भी तकरीबन  ६० बार झूँठ बोलना पड़ा। और कई दिन तक एक टाइम अधपेट भोजन पर ही रहना पड़ा । क्योंकि पिता ने  घर से चलते वक्त उसे जो ७०० रूपये दिए थे,उन्हें खर्च करने की मनाही थी। वे रूपये  उसके पास अभी भी सुरक्षित हैं और पिताजी ने यही आदेश दिया था की यह पैसा खर्च मत करना ! खुद कमाओ और खर्च करो !   'स्वावलंबी बनो '! यदि सावजी ढोलकिया जैसे पूँजीपति इस देश के नेता बन जाएँ और प्रधानमंत्री बना दिए जाएँ
तो भारत के गरीब किसान-मजदूर और सर्वहारा को भी शायद इससे कोई इतराज नहीं होगा। यदि ढोलकिया जैसे  राष्ट्रीय  पूँजीपति वर्ग के हाथों में देश की सत्ता देदी जाए तो शायद यह देश ज्यादा सुरक्षित होगा ,ज्यादा गतिशील और विकासमान हो सकता है !  

श्रीराम तिवारी

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

इसीमें भारत की जनता का कल्याण है।


सारा संसार जानता है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर जितना तनाव है उतना अन्यत्र कहीं नहीं। नार्थ कोरिया - उत्तर कोरिया ,इजरायल -फिलिस्तीन या  सीरिया और इराक की सीमाओं पर भी इतनी भयावहता नहीं है। विगत लंबे समय से पाकिस्तानआर्मी और उसके पालतू आतंकियों ने न जाने कितने भारतीयों को चुन-चुन कर मारा है। भारत ने तो प्रतिक्रियास्वरूप बमुश्किल छटाक भर 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक' नामक कार्यवाही ही की है। किन्तु  यूएनओ और पाकिस्तानी सेना इसे कोई खास नहीं मानते। लेकिन कुछ तो हुआ है। यदि इस कार्यवाही में कोई दम नहीं है , तो इमरान खान की नेतागिरी क्यों चल निकली। सीमाओं के दोनों ओर लाखों लोगोंका पलायन क्यों जारी है ? पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार और उनके रक्षामंत्री -जुबान पर एटम बम लिए क्यों मचल रहे हैं ?

 जो लोग  'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक 'को बढ़ा -चढाकर पेश कर रहे हैं वे  सरासर मूर्ख और आत्मघाती हैं। किन्तु जो लोग इस कार्यवाही को केवल प्रचार मान रहे हैं या इसे मोदी जी की वैयक्तिक छवि निर्माण से जोड़ रहे हैं, वे कोई देशभक्तिपूर्ण कार्य नहीं कर रहे हैं। थोड़ी सी तसल्ली ही सही ,भारतीय फ़ौज की इस  सफलता को सम्मान दिया जाना चाहिए। इसीमें भारत की जनता का कल्याण है। खास तौर पर तब ,जबकि दुश्मन की रग-रग में बेईमानी हो भरी हो ! श्रीराम तिवारी !


 आज का दिन है दो अक्टूबर ,आज का दिन है बड़ा महान।

 आज के दिन दो फूल खिले थे ,महक उठा था हिंदुस्तान।।


   महात्मा गांधी - लालबहादुर शास्त्री  के जन्म दिन पर हम सभी भारतवासी उनके आदर्शों को पुनः याद करें !

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

''ख़ुशी ढूंढ़ो ख़ुशी मिलेगी -गम में डूब जाओ गम मिलेगा !''

जो लोग निरन्तर सिर्फ कड़वा,तीखा और खट्टा खाने के शौकीन हैं उन्हें सूचनाओं की थोड़ी सी सकारात्मक मिठास भी गृहण करते रहना चाहिए। भारत -पाकिस्तान  रिश्तों की कडुवाहट और रोजमर्रा की वैयक्तिक, सामाजिक ,राजनैतिक ,आर्थिक और राष्ट्रीय समस्याओं की खटास से पीड़ित लोगों को यह जरूर जानना चाहिए कि 'आज मेरे लिए बेहतर क्या है ? यदि किसी की जिंदगी में सकारात्मक कुछ भी नहीं तो वह कोई अच्छी पुस्तक ही पढ़ डाले। यही उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त है। कहावत है ''ख़ुशी ढूंढ़ो ख़ुशी मिलेगी -गम में डूब जाओ गम मिलेगा !'' जैसे कि बकौल राहुल गाँधी -'मोदी जी ने पहली बार कुछ अच्छा काम किया ''! धन्यवाद -बधाई !

भारतीय जाबांज कमांडोज ने 'पीओके'में आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर भारत का मान रखा -धन्यवाद ! उसी  रोज  भारत की अंडर १८ हॉकी टीम ने पाकिस्तानी टीम को भी हराया था -धन्यवाद ! और कल फाइनल में भारतीय टीम ने बंगला देश को हराकर एशिया चेम्पियन शिप जीत ली -धन्यवाद ,,,बधाई ! कहने का तातपर्य यह कि सरकार ,पक्ष-विपक्ष ,नेता ,फ़ौज और खिलाडी सभी अपने हिस्से की  सही भूमिका अदा कर रहे हैं। तो बाकी जनता -जनार्दन की भूमिका भी कुछ तो सकारात्मक होनी चहिये ! हम  यह भी देखें कि देश के लिए बेहतर क्या कर सकते हैं ? श्रीराम तिवारी !

कुटम्ब कलह की सनातन परम्परा ही भारतीय गुलामी का मूल कारण है।

भारत सहित  दुनिया के तमाम धर्मांध समाजों और राष्ट्रों को अतीत के परंपरावादी पुरातनपंथी 'कुल कलह' ने  काफी प्रभावित किया है। किन्तु भारत को हमेशा उद्विग्न  ही कियाहै। चीन के हान वंश से लेकर सऊदी कुरेश कबीले तक और ब्रिटिश 'किंगडम' से लेकर इराक के सद्दाम हुसेन परिवार तक तमाम विश्व सभ्यताओं में कुटम्ब कलह के कारण सत्ता परिवर्तन हुए हैं। इसके वावजूद 'राष्ट्रवाद' या राष्ट्रीय चेतना वहाँ सर्वोपरि मानी जाती रही है। किन्तु भारतीय इतिहास में  'कुलीनता ' की नकारात्मक विशेषताएँ रहीं हैं। वेशक इस पुरातन कबीलाई संयुक्त -कुटूम्ब व्यवस्था से कुछ 'समाज' ताकतवर और आक्रामक भी रहे हैं ,वे आज भी हो सकते हैं और इन समाजों को आर्थिक-सामाजिक फायदे भी खूब हुए हैं। किन्तु बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि भारत में अतीतकी यह बर्बर कबीलाई परम्परा -अस्पर्शयता और शोषण का कारण बन गयी। इसलिए यह वंशानुगत कौटुम्बिक व्यवस्था विश्व में अन्यत्र भले ही सार्थक रही हो ,किन्तु भारत में तो यह  'राष्टवाद' के खिलाफ और दलित -शोषित वर्ग के लिए अत्यन्त कष्टदायी साबित हुई है। वैसे तो सभ्यताओं का तमाम  वैश्विक इतिहास ही निर्मम -अमानवीय दुश्वारियों से  भरा पड़ा है,किन्तु भारत में श्रुति ,स्मृति, मिथ , पुराण और सत्यापित इतिहास  में शोषण -उत्पीड़न के अनगिनत प्रमाण देखकर  बेहद पीड़ा होती है। हिन्दू पुराण - महाकव्य सृजन के केंद्र में यह पारंपरिक 'कुटुंब-कलह' और भ्रातृ -द्रोह  हमेशा विमर्श के केंद्र में रहा है।

भारतीय महाद्वीप और दक्षिणपूर्व एशिया में सर्वाधिक लोकप्रिय और सर्वपूज्य 'देव परिवारों 'में 'शिव परिवार' सबसे अधिक पूज्य माना गया है। वैदिक देवता 'रूद्र' की चर्चा भले ही सीमित रही हो ,किन्तु  शैव और सनातन धर्मावलम्बियों ने वैदिक देवता 'रूद्र' के पौरणिक रूप  'शिव परिवार ' को  द्वादस ज्योतिर्लिंग के नाम से चारों दिशाओं में स्थापित कर भारतीय 'राष्ट्रवाद' का सीमांकन बहुत पहले ही कर दिया था। सभी शैव मंदिरों,मठों और ज्योतिर्लिंगों में शंकर-शम्भू के साथ-साथ उनका पूरा कुटम्ब -परिवार  हाजिर है । किन्तु बंगाल ,गुजरात- असम में उनकी अर्धांगनी पार्वतीजी [दुर्गाजी ]विशेष सत्ता के साथ पूज्य हैं। महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश में गणेश जी की विशेष 'जागीरदारी' है। कर्णाटक में कार्तिकेय मुरुगन स्वामी पूज्य हैं। केरल ,तमिलनाडु में सनातन से शिव परिवार की  दादागिरी चली आ रही है। इसके अलावा इस देव  परिवार के अन्य गण वीरभद्र,नंदी और कालभैरव इत्यादि का भी हर जगह बोलवाला है। भारत से बाहर भी नेपाल,तिब्बत, कंबोडिया ,मलेशिया ,मारीशस ,इंडोनेशिया ,फिजी, सूरीनाम में भी 'शिव परिवार' का दबदबा है।

विभाजन से पूर्व सिंध ,पश्चिमी पंजाब , सीमा प्रान्त ,पूर्वी बंगाल [ढाका ]में भी 'शिव परिवार' का ही बोलवाला था। किन्तु आजादीके बाद पाकिस्तान ,बांग्लादेश बन जानेसे शिव -परिवार वहाँ से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया। यह विचित्र  बिडम्बना है कि भारत में बाबरी मस्जिद नामक  एक पुराना जर्जर ढाँचा गिराए जाने मात्र से  गोधरा में दर्जनों कारसेवकों को जिन्दा जल दिया गया। और मुबई सहित सारे भारत में आग लगाने की जुर्रत की गई। जबकि बांग्लादेश - पाकिस्तान में हजारों शिव मंदिर, देवी मंदिर ,विष्णु मंदिर ,जैन-बौद्ध और सिख धार्मिकस्थल   ध्वस्त कर दिए गए। लेकिन फिर भी मेरे जैसे धर्मनिर्पेक्षतावादियों ने भारत में अल्पसंख्यकों का ही बचाव किया। क्योंकि भारतीय गंगा-जमुनी तहजीव के लिए यह जरुरी है। मुझे मालूम है कि  मेरी तरह की धर्मनिरपेक्ष  सोच - वाले हर मजहब और धर्म के समाजों में मौजूद हैं। किन्तु जब वे पाकिस्तान और बँगला देश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर नहीं बोलते तो मुझे बहुत पीड़ा होती है। जब धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील लोग कश्मीरी पंडितों की बदहाली के बजाय केवल 'कश्मीरियत'की चिंता करते हैं तो उनका पाखण्ड छिप नहीं पाता। यही वजह है कि इस दौर में अधिकांस हिन्दू जन-मानस 'संघम शरणम गच्छामि'हो चला है।

चूँकि प्रस्तुत आलेख की विषयवस्तु न तो 'शिव अपरिवार' की महिमा का बखान करना है और न ही हिन्दू-मुस्लिम धर्मान्धता पर कागज रंगने का ही इरादा है। लेकिन 'अखण्ड भारत' की सनातन परम्परा के नकारात्मक अवयवों और पौराणिक रूपकों की शल्यक्रिया  बहुत जरुरी है, जिनके कारण 'भारत राष्ट्र' सदियों तक घोर अराजकता से गुजरा या सदियों तक गुलाम रहा। मैं  यह समझ पाने में असमर्थ हूँ कि पुराणों में वर्णित शिव -पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय  और गणेश के संघर्ष का औचित्य क्या था ?यदि कार्तिकेय और गणेश में अनबन न दिखाई जाती तो शायद आगे की पीढ़ियाँ भी अपने बंधू -बांधवों का रक्त रंजित इतिहास नहीं लिखती। भाई-भाई में वैमनस्य पैदा कर पुराणकार क्या शिक्षा देना चाहते थे ?

रामायण काल में गृह कलह के कारण ही राम को वन-वन भटकना पड़ा। कौरव-पांडव कुल के पारवारिक संघर्ष की गाथा का निचोड़ ही महाभारत है. तो  द्वारकावासी यादव कुल के आत्मघाती सत्यानाश  का संपूर्ण वृतांत ही श्रीमद भागवत  है। इस्लाम के इतिहास में शिया सुन्नी के झगड़ों  की चर्चा के अलावा  कुरैशों ,उमय्याओं बहावियों और यजीदियों के पारिवारिक संघर्ष  में   खिलाफत की तमाम  करुण कथा  ही दर्ज हैं । इन तथ्यों को भूलकर जो लोग अतीतके सच्चे-झूंठे - काल्पनिक मिथ इतिहास की अंध श्रद्धा में डूबकर  यदि वर्तमान को दूषित करते हैं तो वे महामूर्ख हैं। जिसे वे धर्म-मजहब की स्वर्णिम परम्परा मानते हैं या उसकी दुहाई देकर -जेहाद या धर्मांतरण करते हैं, उसके वैज्ञानिक इतिहास को यदि वे समझ जाएंगे तो बजाय श्रद्धा के वे उसके आलोचक बन जाएंगे।   

जो लोग 'अपने वालों ' के हाथों सताये हुए होते हैं,वे व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाते। उनकी प्रतिभा को वंश - 'कुलशीलता' की घुन लग जाती है। प्रत्येक नयी पीढी को उनके वंशानुगत - पारिवारिक ,सामाजिक बड़प्पन के अधोगामी संकल्प तो हमेशा सिखाये जाते रहे  हैं, व्यक्तित्व निर्माण और किंचित चरित्र निर्माण भी किया गया। किन्तु 'बड़े कुलों' में चाणक्य ,समर्थ रामदास या जीजाबाई की तरह 'राष्ट्रवाद' बहुत कम सिखाया गया। इसीलिये इतिहास में राजा-महाराजा और चक्रवर्ती सम्राट तो बहुत हुए किन्तु  चन्द्रगुप्त मौर्य और वीर शिवाजी  कम ही हुए हैं। स्वाधीन भारत में भी शायद ही कोई माँ-बाप अपनी सन्तान को 'राष्ट्रवाद' पढ़ाने में दिलचस्पी रखता हो ! राज्य प्रणीत  तिरंगा यात्राएं ,राष्ट्रवादी पुराने फ़िल्मी गाने और एक आध 'राष्ट्रवादी संगठन ' के पथ संचलन के भरोसे भारत का  राष्ट्रवाद रुग्णावस्था में आ चुका  है। प्रगतिशील बुद्धिजीवी लेखक साहित्यकार इसका संज्ञान नहीं ले रहे यह चिन्तनीय है। इसीलिये वे यह भी नहीं मानेंगे कि कुटुंब विरोध की सनातन परम्परा ही भारतीय गुलामी का मूल कारण रहा है।

अलावा बाकी पूरे मुल्क के परिवार या समाज में केवल धर्मान्धता और अतीत का कूड़ा कचरा ही परोसा जा रहा है।  यह याद ही नहीं रहता कि कुरुक्षेत्र के मैदान में मारने वाले और मारने वाले एक ही परिवार के थे। दुष्ट कंस द्वारा अपनी बहिन देवकीको और बहनोई वसुदेवको जेल में डालकर सताना और बाद में कंस का अपने भानजे कृष्ण- बलराम  के हाथों मारा  जाना पारिवारिक कुल कलंक कथा के अलावा कुछ नहीं है। अपने 'मामाश्री'का 'भव्य' बध किया था।

अक्सर यह देखा गया है कि अतीत की सामंतकालीन संयुक्त -परिवार परम्परा पर जिन्हें बड़ा नाज हुआ करता है ,वे खुद ही अपने संयुक्त कुटुंब के  किसी व्यक्ति द्वारा सताये हुए होते हैं। ऐंसा नहीं है की सिर्फ पौराणिक एथिनिक काव्यों में ही  कुल -कलह के उदाहरण मौजूद हैं ,बल्कि ज्ञात इतिहास में भी अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। जड़ भरत -   बाहुबली द्वंद कथा ,चण्ड अशोक द्वारा अपने भाइयों का मारा जाना ,राणा कुम्भा द्वारा अपने ही भाइयों का मारा जाना, अलाउद्दीन - खिलजी द्वारा अपने 'काका' जलाउद्दीन खिलजी को धोखे से मारना,और कुंवर उदयसिंह ,अपने सगे काका के हाथों मारे जाते यदि स्वामिभक्त 'पन्ना धाय 'अपने बेटे की कुर्बानी नहीं देती।
'मुगलकालीन   परम्परा' और 'मराठा एम्पायर ' की परम्परा में एक अजीब समानता है कि दोनों  ही 'महाकुलों' में भाई-भाई ,बाप-बेटा ,चाचा -भतीजा एक दूसरे को निपटाने में ही जुटे रहे। सलीम ने अपने बाप अकबर को जहर दिया ,शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब ने बंदीगृह में डाल दिया । और भी इसी तरह के सैकड़ों-हजारों कुल - कलंकित अफ़साने इतिहास में भरे पड़े हैं। श्रीराम तिवारी








इतिहास साक्षी है भारत ने हमेशा बचाव में ही हथियार उठाये हैं।

भारत सहित दुनिया के तमाम धर्मांध समाजों और राष्ट्रों को ,उनके अतीत के परंपरावादी पुरातनपंथी कूड़ मगज दिमागों के 'कुल कलह' ने  काफी प्रभावित कियाहै। इस कुल-कलह के कारण ही 'अतीत का यह अखण्ड भारत हमेशा आंतरिक संघर्ष से उद्विग्न रहाहै। सदियों की गुलामीका एक प्रमुख कारण  यह भी रहा है। हमें हमेशा यह याद रखना होगा कि जो साम्राज्यवादी मुल्क सुबह भारतको 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक' की शाबाशी देते हैं, वे शाम होते-होते पाकिस्तान की भी पीठ ठोकने लग जातेहैं। ७० साल पहले उन्होंने जिस धरतीका विभाजन किया था ,उसको पुनः अमन का नखलिस्तान बनते वे कैसे देख सकतेहैं ? भारतके खिलाफ पाकिस्तानको खड़ा करके वे ७० साल से लगातार कोशिश में हैं कि दक्षिण एसिया की यह हरीभरी धरती लाल लहू से सनी रहे ,ताकि सावित हो सके कि यह धरती सनातन से गुलामी के लिए ही अभिशप्त है। इसीलिये  साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका ,ब्रिटेन और अन्य राष्ट्र इस धरतीपर निरन्तर कृपा दॄष्टि रखते हैं। पहले तो वे आतंकवाद को शह देंनेवाले देश पाकिस्तान को भरपूर हथियार देतेहैं ,फिर भारतके खिलाफ जब आतंकी कार्यवाही होती है तो झूंठी सदाशयता दिखलाते हैं। पाकिस्तान जैसे आतंकी देशको भारत जैसे महान धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के अपोजिट खड़ा करने वाले बड़े -बड़े लुटेरे साम्राज्यवादी मुल्क  द्विअर्थी भाषा बोलकर भारत-पाकिस्तान की आवाम को भरमा रहे हैं।

चीन के हान वंश से लेकर सऊदी कुरेश कबीले तक और ब्रिटिश 'किंगडम' से लेकर इराक के सद्दाम परिवार तक, तमाम विश्व सभ्यताओं में कुटम्ब कलह के कारण ही सत्ता परिवर्तन हुए हैं। इस सब के वावजूद 'राष्ट्रवाद' या राष्ट्रीय चेतना वहाँ सर्वोपरि मानी जाती रहीहै। किन्तु अविभाजित भारतीय इतिहास में  सनातन कुटम्ब विरोध की नकारात्मक विशेषताएँ 'एथनिक राष्ट्रवाद' पर भी हावी रहीं हैं। वेशक इस पुरातन कबीलाई संयुक्त कुटूम्ब समाज व्यवस्था से कुछ 'समाज' ताकतवर और आक्रामक भी रहे हैं ,वे आज भी हो सकते हैं। भारत ,पाकिस्तान, बाँग्ला- देश कश्मीर ,नेपाल या अन्यत्र कहीं भी हो सकते हैं। जिन्हें अपने पड़ोसियों  का लहू देखे बिना चैन नहीं मिलता,  किसी की जान लिए बिना रोटी गले से नहीं उतरती। भारतीय उपमहाद्वीप की इस धरती की यही तासीर हिंसा बनाम अहिंसा,आलस्य ,प्रमाद ,मक्कारी और अंततोगत्वा गुलामी की ओर ले जाती है। मानवीय मूल्यों -उदात्त चरित्रों और धर्म-मजहब की बकवास यहाँ बहुत होती है ,किन्तु इन आदर्शों-मूल्यों  को तिलांजलि देकर, वैज्ञानिक विकास की गाड़ी बीच रास्ते रोककर इस भारतीय उप-महाद्वीप के लोग राह चलते ,उज्जड्ड कबीलाइयों की तरह एक-दूसरे पर झपट पड़ते हैं। कुरुक्षेत्र के 'महाभारत'से लेकर आधुनिक भारत-पाकिस्तान संघर्ष में यह तथ्य एक गृहयुद्ध की मानिंद  दृष्टव्य है। अतीत में बाह्य हमलवार कौन-कौन थे यह तो डीएनए टेस्ट से ही तय होगा किन्तु यह नग्न सत्य सामने है कि जो अहिंसावादी थे वे हमलावर कभी नहीं रहे। और जो हमलावर थे वे अहिंसावादी कभी नहीं रहे। लगातार हिंसक कार्यवाहियों के लिए 'हिंसक 'प्रवृत्ति के लोग  जिम्मेदार हैं।इतिहास साक्षी है कि भारत ने  हमेशा बचाव में ही हथियार उठाये  हैं।

हिंसक हमलावर आक्रांता समाजों को भारत में आने के बाद बेहद आर्थिक-सामाजिक फायदे भी खूब हुए हैं।  किन्तु बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि भारत में अतीत की यह बर्बर कबीलाई परम्परा -अहिंसक समाज में गरीबी अस्पर्शयता और शोषण का कारण बन गयी। इसलिए यह वंशानुगत कौटुम्बिक व्यवस्था विश्व में अन्यत्र भले ही सार्थक रही हो ,किन्तु भारत में तो यह  'राष्टवाद' के खिलाफ और दलित -शोषित वर्ग के लिए अत्यन्त कष्टदायी साबित हुईहै। वैसेतो तमाम सभ्यताओं का वैश्विक इतिहास ही निर्मम -अमानवीय दुश्वारियों से भरा पड़ा है, किन्त भारत में श्रुति ,स्मृति, मिथ , पुराण और सत्यापित इतिहास  में शोषण -उत्पीड़न के अनगिनत प्रमाण देखकर ही दासता का सहज बोध हो जाता है। इस्लामिक और सनातन भारतीय परम्परा में बड़ी विचित्र समानता है ,उधर  खिलाफत की आपसी पारिवारिक जंग और इधर हिन्दूपुराण ,महाकव्य सृजन के केंद्र में पारंपरिक 'कुटुंब-कलह' और भ्रातृ -द्रोह ही  हमेशा विमर्श के केंद्र में रहे हैं । जड़ भरत -बाहुबली युद्ध ,रावण-कुबेर युद्ध ,बाली-सुग्रीव युध्द ,कौरव -पांडव युद्ध ,द्वारका में यादवी युद्ध ,चण्ड अशोक और उसके मौर्य कुलीन भाइयों का रक्तरंजित संघर्ष  ,सल्तनतकाल से लेकर मुगलकाल तक हर दौर में 'भ्रातृद्रोह' के प्रमाण इस धरती पर बिखर पडे हैं।

भारतीय महाद्वीप और दक्षिणपूर्व एशिया में सर्वाधिक लोकप्रिय और सर्वपूज्य 'देव परिवारों 'में 'शिव परिवार' सबसे अधिक पूज्य माना गया है। वैदिक देवता 'रूद्र' की चर्चा भले ही सीमित रही हो ,किन्तु  शैव और सनातन धर्मावलम्बियों ने वैदिक देवता 'रूद्र' के पौरणिक रूप  'शिव परिवार ' को  द्वादस ज्योतिर्लिंग के नाम से चारों दिशाओं में स्थापित कर भारतीय 'राष्ट्रवाद' का सीमांकन बहुत पहले ही कर दिया था। सभी शैव मंदिरों,मठों और ज्योतिर्लिंगों में शंकर-शम्भू के साथ-साथ उनका पूरा कुटम्ब -परिवार  हाजिर है । किन्तु बंगाल ,गुजरात- असम में उनकी अर्धांगनी पार्वतीजी [दुर्गाजी ]विशेष सत्ता के साथ पूज्य हैं। महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश में गणेश जी की विशेष 'जागीरदारी' है। कर्णाटक में कार्तिकेय मुरुगन स्वामी पूज्य हैं। केरल ,तमिलनाडु में सनातन से शिव परिवार की  दादागिरी चली आ रही है। इसके अलावा इस देव  परिवार के अन्य गण वीरभद्र,नंदी और कालभैरव इत्यादि का भी हर जगह बोलवाला है। भारत से बाहर भी नेपाल,तिब्बत, कंबोडिया ,मलेशिया ,मारीशस ,इंडोनेशिया ,फिजी, सूरीनाम में भी 'शिव परिवार' का दबदबा है।

विभाजन से पूर्व सिंध ,पश्चिमी पंजाब , सीमा प्रान्त ,पूर्वी बंगाल [ढाका ]में भी 'शिव परिवार' का ही बोलवाला था। किन्तु आजादीके बाद पाकिस्तान ,बांग्लादेश बन जानेसे शिव -परिवार वहाँ से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया। यह विचित्र  बिडम्बना है कि भारत में बाबरी मस्जिद नामक  एक पुराना जर्जर ढाँचा गिराए जाने मात्र से  गोधरा में दर्जनों कारसेवकों को जिन्दा जल दिया गया। और मुबई सहित सारे भारत में आग लगाने की जुर्रत की गई। जबकि बांग्लादेश - पाकिस्तान में हजारों शिव मंदिर, देवी मंदिर ,विष्णु मंदिर ,जैन-बौद्ध और सिख धार्मिकस्थल   ध्वस्त कर दिए गए। लेकिन फिर भी मेरे जैसे धर्मनिर्पेक्षतावादियों ने भारत में अल्पसंख्यकों का ही बचाव किया। क्योंकि भारतीय गंगा-जमुनी तहजीव के लिए यह जरुरी है। मुझे मालूम है कि  मेरी तरह की धर्मनिरपेक्ष  सोच - वाले हर मजहब और धर्म के समाजों में मौजूद हैं। किन्तु जब वे पाकिस्तान और बँगला देश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर नहीं बोलते तो मुझे बहुत पीड़ा होती है। जब धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील लोग कश्मीरी पंडितों की बदहाली के बजाय केवल 'कश्मीरियत'की चिंता करते हैं तो उनका पाखण्ड छिप नहीं पाता। यही वजह है कि इस दौर में अधिकांस हिन्दू जन-मानस 'संघम शरणम गच्छामि'हो चला है।

चूँकि प्रस्तुत आलेख की विषयवस्तु न तो 'शिव अपरिवार' की महिमा का बखान करना है और न ही हिन्दू-मुस्लिम धर्मान्धता पर कागज रंगने का ही इरादा है। लेकिन 'अखण्ड भारत' की सनातन परम्परा के नकारात्मक अवयवों और पौराणिक रूपकों की शल्यक्रिया  बहुत जरुरी है, जिनके कारण 'भारत राष्ट्र' सदियों तक घोर अराजकता से गुजरा या सदियों तक गुलाम रहा। मैं  यह समझ पाने में असमर्थ हूँ कि पुराणों में वर्णित शिव -पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय  और गणेश के संघर्ष का औचित्य क्या था ?यदि कार्तिकेय और गणेश में अनबन न दिखाई जाती तो शायद आगे की पीढ़ियाँ भी अपने बंधू -बांधवों का रक्त रंजित इतिहास नहीं लिखती। भाई-भाई में वैमनस्य पैदा कर पुराणकार क्या शिक्षा देना चाहते थे ?

रामायण काल में गृह कलह के कारण ही राम को वन-वन भटकना पड़ा। कौरव-पांडव कुल के पारवारिक संघर्ष की गाथा का निचोड़ ही महाभारत है. तो  द्वारकावासी यादव कुल के आत्मघाती सत्यानाश  का संपूर्ण वृतांत ही श्रीमद भागवत  है। इस्लाम के इतिहास में शिया सुन्नी झगड़ों की चर्चा के अलावा  कुरैशों ,उमय्याओं , बहावियों और यजीदियों के पारिवारिक संघर्ष  में   खिलाफत की तमाम  करुण कथा भी  दर्ज हैं । इन तथ्यों को भूलकर जो लोग अतीतके सच्चे-झूंठे - काल्पनिक मिथ इतिहास की अंध श्रद्धा में डूबकर  यदि वर्तमान को दूषित करते हैं तो वे महामूर्ख हैं। जिसे वे धर्म-मजहब की स्वर्णिम परम्परा मानते हैं , उसकी दुहाई देकर -जेहाद या आतंकवाद की बात करते हैं वही लोग  आजके दौर में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के लिए जिम्मेदार हैं। जो लोग इस कुल कलह की कूट रचनाको  समझ जाएंगे वे घृणा से मुक्त होकर मानवीय शृद्धा अहिंसा के उपासक और 'जंग'के आलोचक बन जाएंगे।   

जो लोग 'अपने वालों ' के हाथों सताये हुए होते हैं,वे व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाते। उनकी प्रतिभा को वंश - 'कुलशीलता' की घुन लग जाती है। प्रत्येक नयी पीढी को उनके वंशानुगत - पारिवारिक ,सामाजिक बड़प्पन के अधोगामी संकल्प तो हमेशा सिखाये जाते रहे  हैं, व्यक्तित्व निर्माण और किंचित चरित्र निर्माण भी किया गया। किन्तु 'बड़े कुलों' में चाणक्य ,समर्थ रामदास या जीजाबाई की तरह 'राष्ट्रवाद' बहुत कम सिखाया गया। इसीलिये इतिहास में राजा-महाराजा और चक्रवर्ती सम्राट तो बहुत हुए किन्तु  चन्द्रगुप्त मौर्य और वीर शिवाजी  कम ही हुए हैं। स्वाधीन भारत में भी शायद ही कोई माँ-बाप अपनी सन्तान को 'राष्ट्रवाद' पढ़ाने में दिलचस्पी रखता हो ! राज्य प्रणीत  तिरंगा यात्राएं ,राष्ट्रवादी पुराने फ़िल्मी गाने और एक आध 'राष्ट्रवादी संगठन ' के पथ संचलन के भरोसे भारत का  राष्ट्रवाद रुग्णावस्था में आ चुका  है। प्रगतिशील बुद्धिजीवी लेखक साहित्यकार इसका संज्ञान नहीं ले रहे यह चिन्तनीय है। इसीलिये वे यह भी नहीं मानेंगे कि कुटुंब विरोध की सनातन परम्परा ही भारतीय गुलामी का मूल  
पूरे मुल्क के परिवार या समाज में केवल धर्मान्धता और अतीत का कूड़ा कचरा ही परोसा जा रहा है।  यह याद ही नहीं रहता कि कुरुक्षेत्र के मैदान में मारने वाले और मारने वाले एक ही परिवार के थे। दुष्ट कंस द्वारा अपनी बहिन देवकीको और बहनोई वसुदेवको जेल में डालकर सताना और बाद में कंस का अपने भानजे कृष्ण- बलराम  के हाथों मारा  जाना पारिवारिक कुल कलंक कथा के अलावा कुछ नहीं है। अपने 'मामाश्री'का 'भव्य' बध किया था।
अक्सर यह देखा गया है कि अतीत की सामंतकालीन संयुक्त -परिवार परम्परा पर जिन्हें बड़ा नाज हुआ करता है ,वे खुद ही अपने संयुक्त कुटुंब के  किसी व्यक्ति द्वारा सताये हुए होते हैं। ऐंसा नहीं है की सिर्फ पौराणिक एथिनिक काव्यों में ही  कुल -कलह के उदाहरण मौजूद हैं ,बल्कि ज्ञात इतिहास में भी अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। जड़ भरत -   बाहुबली द्वंद कथा ,चण्ड अशोक द्वारा अपने भाइयों का मारा जाना ,राणा कुम्भा द्वारा अपने ही भाइयों का मारा जाना, अलाउद्दीन - खिलजी द्वारा अपने 'काका' जलाउद्दीन खिलजी को धोखे से मारना, कुंवर उदयसिंह भी अपने सगे काका के हाथों मारे जाते यदि 'पन्नाधाय 'अपने बेटेकी कुर्बानी नहीं देती।मध्ययुग की
'मुगलकालीन  परम्परा' और 'मराठा एम्पायर ' की परम्परा में  अजीब समानता रही है कि दोनों  ही 'महाकुलों' में भाई-भाई ,बाप-बेटा ,चाचा -भतीजा एक दूसरे को निपटाने में ही जुटे रहे। सलीम ने अपने बाप अकबर को जहर दिया ,शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब ने बंदीगृह में डाल दिया । पेशवा राघोबा ने नारायणराव और अन्य लोगों को मौत के घाट उतारा।

अपनों द्वारा बार-बार 'ठगे'जाने के वावजूद  संयुक्त परिवार की उपादेयता पर मुझे बड़ा अभिमान है ,पांच हजार साल से जिस कौम में ,जिस कुल में भगवद्गीता के बहाने  'महाभारत' पढ़ाया जाता रहा हो , उस कुल के तमाम कुलदीपक पार्थ या पार्थसारथी भले ही न बन सके हों ,किन्तु 'कौरव-कुलांगार' बनने में कहीं कोई चूक नहीं हुई। धीरोदात्त चरित्र के सत्यव्रतधारी आदर्श नायक भले ही हम न बन सके हों ,किन्तु खलनायक बनने में कभी कोई अड़चन नहीं आयी। इसलिए आज कल के युद्धोन्मादी दौर में भारत-पाकिस्तान की हवा में प्यार-मोहब्बत की बात करने वाले  ,करुणा ,अहिंसा की बात करने वाले  देशद्रोही' कहलाते हैं। श्रीराम तिवारी !