मंगलवार, 11 अगस्त 2015

जो लोग लोकतंत्र को बाहुबल और धनबल से अपनी कांख में दबाये हुए हैं वे देशभक्त कैसे हो सकते हैं ?


प्रशंग एक :-

अभी हाल ही में सीआरपीएफ के जवान से जुड़ा एक सनसनी खेज मामला उजागर हुआ है। विगत साढ़े तीन साल से जिसके परिजन - जिस जवान को मृत मानकर बैठे थे ,वह हिमाचल प्रदेश के किसी लक्झरी होटल में अपनी 'गर्लफ्रेंड' बनाम प्रेमिका बनाम रखैल के साथ रंगरेलियाँ मनाते हुए रँगे  हाथों पकड़ा गया।यह स्मरणीय है कि उस जवान की 'मृत्यु' उपरान्त भारत सरकार उस परिवार को सत्रह लाख रूपये मुआवजा राशि दे चुकी है। इसके अलावा उसकी पत्नी को बारह हजार रूपये प्रति माह पेंशन भी दी जा रही है। पुलिस महा निरीक्षक जयपुर श्री डीसी जैन के मुताबिक 'दशरथ जाट ' नामक वह सिपाही झुनझुनू के दोरादास का रहने वाला है। वह १९९८ में सीआरपीएफ में सिपाही के पद पर भर्ती हुआ था। इसकी भी पूरी सम्भावना है कि  इस तरह के चलते-पुर्जे गद्दार ने आरक्षण या रिश्वत की गटरगंगा में डुबकी जरूर लगाई होगी। यह शख्स २०१२ में जब बिहार की यूनिट में तैनात था तब उसने एक माह का 'सवैतनिक' अवकाश लिए था। अवकाश की अवधि पूरी होने के बाद वह अपनी यूनिट में वापसी का कहकर घर से गया था। किन्तु वह न तो ड्यूटी पर पहुंचा और न ही घर वापिस लौटा। क्या  भारतीय सुरक्षा तंत्र  और  प्रशासनिक मशीनरी  का यही असली डीएनए है ? क्या ऐंसे ही दोगले लोगों के भरोसे और उनके द्वारा संचालित 'वर्णशंकर' व्यवस्था के बलबूते हम चीन-पाकिस्तान को उनकी निर्मम आक्रामकता का माकूल जबाब दें सकेंगे  ?

प्रसंग  दो :-

 विगत कुछ दिनों पहले उधमपुर में पकडे गए एकमात्र जीवित पाकिस्तानी  आतंकी'नावेद' को ज़िंदा पकड़ने वाले -'जीजा -साले' न तो फौजी हैं ,न ही  आरक्षण प्राप्त कोई वेतन भोगी  सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हैं ,न ही कोई मठ्टर रिश्वतखोर अधिकारी हैं ,न ही कोई  धंधेबाज नेता हैं। वे तो  मामूली मेहनतकश नागरिक  हैं  जो आये दिन पाकिस्तान प्रेरित आतंक के साये में जीते-मरते हैं। वास्तव में वतन के असली रखवाले  और सच्चे  वतन परस्त ये ही हैं। विक्रमजीत और राकेश शर्मा यदि उस आतंकी नावेद को जीवित  नहीं पकड़ते तो  इस आतंकी  घटना की तस्वीर कुछ और  होतीं। एक तो यह कि जिन वेगुनाहों को उस दुष्ट  आतंकी ने एके -४७ की नोक पर बंधक बनाया था ,वे सब मारे जाते। दूसरा परिणाम यह होता कि  बाद में एक दर्जन भारतीय सीमा सुरक्षा बल  के जवानों की शहादत  के बाद भारतीय सुरक्षा बलों  के हाथ जो लाशें आतीं  उनमें एक लाश आतंकी नावेद की भी होती। तीसरा परिणाम यह होता कि  भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ कोई  ज़िंदा सबूत नहीं होता ! इससे सिद्ध होता है कि आतंकी नावेद के जिन्दा पकडे जाने  में  जिन  'देशभक्तों' की भूमिका शानदार रही  है। वे 'राष्ट्रीय गौरव ' के असली हकदार हैं।   खबर है कि  राज्य सरकार ने इन जाँबाज 'जीजा -साले' को आरक्षक बलों  में भर्ती की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी है। उन्हें वीरोचित  राष्ट्रीय समान से भी नवाजा जाएगा। देश की युवा पीढ़ी कोअपने कॅरियर की फ़िक्र के साथ-साथ  इन्ही प्रेरणास्पद आदर्शों से सीखना चाहिए !

           उपरोक प्रसंग भारत के वर्तमान दौर की व्यवस्था व जन-मानसिकता का सांकेतिक प्रतिनिधित्व करते हैं।  मेहनत ,ईमानदारी से आजीविका चलाने वालों को सद्गति मिलती है ,ये तो प्रमाणित करना पडेगा ,किन्तु यह पक्की बात है कि  ऐंसे व्यक्ति ही समाज के लिए ,देश के लिए अनुकरणीय होते हैं। जो बिना किसी आरक्षण रुपी  वैशाखी या रिश्वत  के  देश के गद्दारों से लोहा ले सकते हैं ,वे विक्रमजीत और राकेश शर्मा ही  देश और कौम के असल नायक  कहे जा सकते हैं। इस साहस और वतनपरस्ती की भारत को बहुत सख्त जरुरत  है। भारत  के मेहनतकश जन  तो देशभक्त हैं किन्तु राजनीति में अपनी ताकत बढ़ाने और वोट बटोरने के लिए कोई जाति वाद का ,कोई मजहब का ,कोई आरक्षण का  और कोई अल्पसंख्यकवाद  का चूल्हा सुलगाये हुए है।  इससे देश के मेहनतकशों-किसानों और बेरोजगार युवाओं की एकता तार- तार हो आरही है।  इसी कमजोरी का फायदा आतंकवादी और अलगाववादी उठा  रहे हैं।  सर्वहारा वर्ग और ईमानदार पेटी -बुर्जुवा वर्ग की आपसी खींच तान का फायदा  कार्पोरेट लाबी और पूँजीवादी  -साम्प्रदायिक पार्टियों को मिल रहा है।  जो लोग लोकतंत्र को बाहुबल और धनबल से अपनी कांख में दबाये हुए हैं वे देशभक्त कैसे हो सकते हैं ?

किसी एक  आतंकी  के जीवित पकडे जाने पर भाजपा नेता-प्रवक्ता फिर वही  म्यांमार वाली  शर्मनाक घटना की पुनरावृत्ति कर रहे हैं। ये लोग हर दुर्घटना या आतंकी हमले के बाद स्वयं की पीठ ठोकने लग जाते हैं। उन्हें यह याद रखना  चाहिए कि  पाकिस्तान प्रशिक्षित  आतंकी  जान बूझकर ऐंसी जानकारियाँ  देते हैं ताकि ,बाद में भारत  और उलझ जाये एवं  सरकार की दुनिया भर में हँसी  उड़े। यही तो पाकिस्तान  की  षड्यंत्रकारी कूटनीति है कि  उसे आतंकी के बारे में सचाई मालूम है ,किन्तु उसकी संबध्दता से इंकार कर रहा है। जबकि  नावेद के वयान को आधार  बनाकर भारत सरकार अपना कूटनीतिक स्टेण्ड ले रही है। जब भारत ने कहा कि नावेद और दूसरे मारे गए   आतंकी पाकिस्तान के हैं , तो पाकिस्तान ने फौरन इंकार कर दिया। चूँकि पाकिस्तान की कभी भी वाशिंगटन -व्हाइट हाउस में पेशी भी हो सकती है.तो वह सबूतों की बात करेगा।  भले ही आतंकी पाकिस्तान का ही है  किन्तु उस ने जो कहा उसे ही सच मानकर भारतीय एजेंसियां भयानक भूल कर रहीं हैं। भारतीय  संप्रभुता पर हमला करने वाला -आतंकी बेखौफ मुस्कराते हुए फटाफट जो बयान दे रहा है वह सफेद झूंठ भी हो सकता है।  सच क्या है यह या तो पाकिस्तान ही  जानता है।  भारत के नेता  लोग अपने  दो सभ्रांत  जाबांज़  नागरिकों की पुण्याई पर भरत नाट्यम न करें ।  किसी तरह की गर्वोकिति करने से  पहले भारतीय जवानों की शहादत  भी स्मरण रखनी चाहिए।


           श्रीराम तिवारी 

सोमवार, 10 अगस्त 2015

ये दुनिया बिना किसी खूनी क्रान्ति के भी 'सुंदर' बनायी जा सकती है !

  भाववादी दुनिया का कोई भी मजहब -धर्म -पंथ यह दावा नहीं कर सकता कि  उसके अनुयाई वेवकूफ नहीं हैं !  वेशक दुनिया  के प्रत्येक  धर्म-मजहब में तमाम नेकनामियों  मौजूद हैं। इन धर्म-मजहबों में मानवीय मूल्यों के सुंदर सृजनशील उपदेश भी  भरे पड़े हैं। किन्तु अधिकांस मजहबी लोगों की समस्या है कि  इन मजहबों-धर्मों के दिशा निर्देशों का अनुकरण करने के बजाय उनके संस्थापकों के रूप और आकार पर ही फ़िदा होते रहते हैं। और  इसीलिये जब मानवता ,इंसानियत ,स्वतंत्रता ,समानता  की  कोई क्रांतिकारी आवाज उठती है ,जब सामूहिक  हकों की बात की जाती है , जब एक  शोषण मुक्त समाज की माँग उठती है ,तो ये सभी धर्म-मजहबों पर काबिज  ठेकेदार अपना असली रंग दिखाने लगते हैं।प्रत्येक भाववादी सोच में मौजूद अंधश्रद्धा जब वैज्ञानिक तर्कों के सामने विवेकहीन हो जाती है तो वह  हिंसक रूप धारण कर लेती है।

   वेशक लूट- ठगी-अन्याय व उत्पीड़न के तरीके -देशकाल परिस्थतियों के कारण बिभिन्न देशों और कौमों में  भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । लेकिन  निहित स्वार्थ साधने के  लक्ष्य सभी के एक समान और  आडम्बरपूर्ण  होते  हैं। ईसाई ,यहूदी और हिन्दू वर्चस्ववादी यदि बनियागिरी से , धार्मिक पाखंडवाद से कमजोरों -मेहनतकशों  और किसानों  का खून चूसते हैं। इसी तरह अंधश्रद्धावान उग्र  मुसलमान  और नास्तिक उग्र वामपंथी भी  हिंसा का रास्ता ही  चुनते हैं। उग्र वामपंथ तो  कभी भी अपनी  ही मौत  मर सकता है।  बशर्ते समाज के उपेक्षित-शोषित  पीड़ित वर्ग को उनके हक और उत्पादन के औजार लौटा  दिए जाएँ ! इसी तरह 'जेहाद' के नाम पर निर्दोषों का खून बहाने वालों को यदि इस्लाम सहित दुनिया के तमाम मजहबों का वास्तविक  उद्देश्य-दर्शन -ज्ञान हो जाए तो वे भी मान सकते हैं कि - ये दुनिया  बिना किसी खूनी क्रान्ति के भी 'सुंदर' बनायी जा सकती है  !

  प्रायः देखा गया है कि धर्मांध हिन्दुओं को अपने शास्त्रीय धर्म सूत्रों में कोई दिलचस्पी नहीं है। ये तमाम किस्म के आस्तिक  और अंधश्रद्धालु लोग  सत्य ,अहिंसा ,अस्तेय ,ब्रह्मचर्य ,अपरिग्रह ,शौच ,संतोष ,स्वाध्याय ,योग,  ईश्वर प्रणिधान  इत्यादि के विमर्श  की बातें तो बहुत करते  हैं। किन्तु अन्याय -अत्याचार करने वाले 'असुरों' - बाहुबलियों और शोषण करने वाले शासक वर्ग सामने किसी भी  किस्म  का जायज  संघर्ष करने के बजाय खुद भी  उनके शिकार हो जाया करते हैं। अथवा व्यवस्थाजन्य मानवकृत आपदाओं का ठीकरा अपने 'आराध्य' ईश्वर ,अल्लाह या परमात्मा  के सिर  पर फोड़  देते हैं। आम तौर पर  अमीर-गरीब ,शरीफ - बदमाश सभी किस्म के धर्मांध  हिन्दुओं को अपने पाखंडी  धर्मोपदेशक 'बाबाओं' और साध्वियों  पर बड़ी  अटूट अंध श्रद्धा  हुआ करती  है। इसीलिये साम्प्रदायिक और जातीय आधार पर वोट जुगाड़ने वाले दलों  को ये अंधश्रद्धा के नशे में डूबी  नस्ल केवल 'चुनाव जिताऊ मशीन'  मात्र ही है  ! पूँजीवादी -साम्प्रदायिक  नेतागण  बाबाओं के पाखंड और व्यभिचार पर चुप्पी साधे  रहते हैं।  कुछ इसी तरह की  साम्प्रदायिकता -अल्पसंख्यक वर्ग की राजनीति   करने वाले नेताओं में भी पाई जाती है।

 शीत युद्ध समाप्ति के बाद की दुनिया में  प्रायः देखा गया है कि वैश्विक ताकतों द्वारा  व्यवस्थाओं के  संघर्ष को 'सभ्यताओं के संघर्ष' में तब्दील किया जाता रहा है। इस्लामिक राष्ट्रों के  पेट्रोलियम पर कब्जा करने की साम्राज्य्वादी जद्दोजहद ने धीरे-धीरे मजहबी जेहाद का यह  वर्तमान हिंसक  रूप धारण कर लिया ।  इक्कीसवीं शताब्दी की  कोई  भी आतंकी हिंसात्मक  घटना  ऐंसी नहीं  है  जो जिहाद प्रेरित न हो !  भारत में विगत वीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अवश्य खालिस्तानी  उग्रवाद ने सर उठाया था ,जिसे दुरुस्त करने में  भारत ने अनेक   कुर्बानियाँ दीं हैं।लेकिन वैश्विक कुख्याति में अब  एक विशेष समुदाय या कौम के ही  गुमराह  मरजीवड़ों का ही  बोलवाला  है। सीरिया,इराक,ईरान,अफगानिस्तान,यमन,सूडान,मिश्र ,पाकिस्तान   में केवल एक ही सम्प्रदाय के आतंकियों  की तूती  बोल रही है। वहाँ  इस आतंकवाद को शुद्ध रूप में केवल और केवल इस्लामिक या कथित 'जेहादी' आतंकवाद के रूप में ही देखा -सुना जाता है। यूरोप ,अमेरिका ,इंग्लैंड ,फ़्रांस और  भारत  की अधिकांस  शांति प्रिय जनता अब इसे वैश्विक आतंकवाद के रूप में देखती  है ।

 दुनिया के जो लोग  इस जेहाद से पीड़ित हैं ,वे ईसाई  ,कुर्दीश ,यहूदी , यज़ीदि और शिया भी  एक सम्प्रदाय या कौम के रूप में इस  बर्बर चुनौती को उसकी प्रत्याक्रमण कारी शैली में  जबाब देने में असफल रहे। चूँकि  यूएस और उसके पिछलगुओं ने पूर्व सोवियत संघ को नष्ट करने के लिए कभी इस अपवित्र हिंसक  जाहिल नस्ल को खाद -पानी दिया था। इसलिए वे  केवल दिखावे के लिए इन हिंसक तत्वों का मौखिक विरोध करते रहे। बाद में जब  अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ तो उसके  प्रतिउत्तर में पाकिस्तान में छिपे ओसामा और अल-कायदा वालों से अमेरिका वालों ने खुन्नस निकाली।वैसे भी यूरोप ,अमेरिका और सुदूर वर्ती राष्ट्रों को आईएसआईएस से उतना खतरा नहीं है। किन्तु  भारत में इस जेहादी  आतंकवाद के  फलने-फूलने के लिए पर्याप्त उर्वरा भूमि उपलब्ध   है।

      दक्षिण एशिया  में आईएस से भी पहले से ,बल्कि सदियों से ही  हिन्दू विरोधी जेहाद जैसा  हथकंडा निरंतर जारी है। हिन्दुस्तान का बटवारा होने के बाद पाकिस्तान ने इसे और भड़काया। चूँकि भारत की धर्मनिरपेक्षता -वादी  नीति  में  इन  'जेहादी' चरमपंथियों  के  हिंसक हमलों के प्रतिवाद या निस्तारण के लिए कोई मान्य ठोस सिद्धांत नहीं है। इजरायल अमेरिका ही नहीं बल्कि तमाम गैर इस्लामिक मुल्कों में  इस जेहाद से लड़ने के लिए जनता नहीं बल्कि सरकारें काम करती  रही हैं।इंडोनेशिया के बाद दुनिया की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी भारत  में निवास करती है । भारत के लिए यह फक्र की बात होती यदि आईएस ,अलकायदा और पाकिस्तान परस्त आतंकी भारत को बुरी नजर से नहीं देखते। भारत  की कोई भी सरकार हो -चाहे वो कांग्रेस की हो ,तीसरे मोर्चे की हो या 'संघ परिवार' के वर्चस्व की - हिंदुत्व वादी सरकार  ही क्यों न हो  उसे मालूम है कि  वह इजरायल या यूएस -की तरह का उन्मूलन सिद्धांत लागू नहीं कर सकती ।क्योंकि भारत का धर्मनिरपेक्ष संविधान इसकी इजाजत नहीं देता !

                  भारत के अधिकांस हिन्दू  मुस्लिम ,सिख ,ईसाई ,बौध्द  इत्यादि  अधिकांस जनगण  स्वभावतः   धर्मनिरपेक्षतावादी ही  हैं। अधिकांस गंगा-जमुनी तहजीव के पक्षधर हैं। किन्तु जब  कश्मीर में आईएस या पाकिस्तान के झंडे फहराये जाएँ या कोई  पाकिस्तान प्रेरित आतंकी ज़िंदा पकड़ा जाता है ! औरजब  वह 'नावेद' की तरह   केवल चुन-चुनकर हिन्दुओं को निशाना बनाने  की बात करता है। जब वह कहता है कि  'हिन्दुओं को मारने में मुझे मजा आता है ' इतिहास साक्षी है कि तब बाजी  धर्मनिर्पेक्षतावादियों के हाथों से फिसलकर स्वतः ही साम्पर्दयिकतावादियों के हाथों में पहुँच जाती है। तब  वामपंथी बुद्धिजीवियों  और धर्मनिर्पेक्षतावादियों की या लोकतंत्रवादियों की बात का  बहुसंख्यक आवाम  पर कोई असर नहीं होता। तब बहुसंख्यक वर्ग के आक्रोश को भुनाते हुए फासिज्म परवान चढ़ने लगता है। तब  अल्पसंख्यक आतंकियों को नेस्तनाबूद करने के बजाय राज्य सत्ता पर काबिज नेता  और सरकार निर्दोषों पर अत्याचार का 'अधिकार पत्र' प्राप्त कर लेती है।

   यद्द्यपि  भारत में किसी भी हिंसक साम्प्रदायिक कौम को किसी अन्य अहिंसक साम्प्रदायिक  कौम से कोई  चुनौती नहीं है। यहाँ पाकिस्तान  या आईएसआईएस  प्रेरित हिंसक  साम्प्रदायिकता  के पक्ष में सब कुछ मौजूद है। न  केवल  तमाम धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील लोग ही 'अल्पसंख्यकवाद' के धोखे में  ही आतंकियों के समर्थक बने हुए हैं। बल्कि 'अहिंसक' बहुसंख्यक वर्ग और उसके बीच के साम्प्रदायिक तत्व भी हमेशा कुछ ऐंसा उल्टा सीधा करते रहते हैं कि उनके द्वारा पाली-पोषित यह पूंजीवादी व्यवस्था व  उसकी तमाम मशीनरी भी इन हिंसावादी साम्प्रदायिक तत्वों के चरण चाँपने लगती है। भारत के मुठ्ठी भर अधकचरे अनाड़ी और  साम्प्रदायिक संगठनों ने सत्ता के चूल्हे पर हिंदुत्व रुपी काठ की हांडी दो-दो बार चढ़ा ली ,किन्तु अयोध्या में दस बाई दस वर्ग फुट का एक 'रामलला मंदिर' भी  वे नहीं बनवा सके। क्या यही हैसियत है भारत में बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की ? क्या  इसी के लिए वे भारत में विगत सौ साल के इतिहास में केवल  बदनाम ही किये जाते रहे  है ? कभी किसी  गोडसे ने गांधी को मारा , कभी किसी गुंडे  ने मक्का मस्जिद के आसपास दो-चार फटाके फोड़ दिए ,कभी किसी संघी ने अपने ही प्रचारक  संजय जोशी को  मार दिया ,कभी  किसी जडमति  ने समझौता एक्प्रेस पर कुछ  फुस्सी बम फोड़ दिए। इसके अलावा हिन्दुत्वादी कतारों में अपनी  कमजोरी  छिपाने के लिए  बार-बार के आम चुनावों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने और ढपोरशंख  बजाने से आईएस और पाकिस्तान परस्तों को उनका आतंकी जेहाद जस्टीफाइ लगने  लगता है। वैसे भी जबसे 'मोदी सरकार' सत्ता में आई है तबसे न  केवल  पाकिस्तान से  न केवल चीन से  बल्कि  दुनिया  के कोने -कोने से  भारत विरोधी  मंसूबे सुनाई दे रहे हैं।

कुछ स्वयंभू राष्ट्रवादियों और प्रगतिशील बुद्धिजीविओं ने दो बातों पर बहुत बड़ा भरम पाल रखा है। पहला -यह कि  भारत एक उभरता हुआ आर्थिक तरक्की वाला परमाण्विक शक्तिशाली  राष्ट्र है। जो अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है।  इन लोगों को बहुत बड़ी गलतफहमी है कि उनकी सैन्य  क्षमता और युद्धक सामग्री  दुश्मनों से बेहतर है। वे यह भूल जाते हैं कि  पाकिस्तान  के शासकों को खुद कुछ भी नहीं करना है।  उन्हें केवल जेहादी इस्लामिक आतंकवाद को ज़िंदा रखना है। बाकी सब काम ये आतंकवादी ही करंगे।  ये आतंकवादी भारत में आकर केवल पाकिस्तान  का झंडा ही नहीं फहराएंगे बल्कि नकली मुद्रा भी लायंगे। ये हवाला के काम भी आएंगे। वे गांजा चरस  और हशीश भी लाएंगे। वे  ऐ ,के  -४७  और आरडीएक्स भी लायँगे। पाकिस्तान और आईएस को कुछ नहीं  करना है। जो कुछ करना है इस्लाम के नाम पर  पाकिस्तान और भारत के  गुमराह युवाओं  को ही करना है।

भारतीय प्रबुद्ध समाज ने दूसरा भरम  ये पाल रखा  है कि  भारत की  विराट आबादी ,उसकी सहिष्णुता ,अहिंसा और  उसकी  धर्मनिरपेक्षतावादी नीति  में बड़ी ताकत है ।  उन्हें  अपने मानवीय मूल्यों पर बड़ा नाज है। किन्तु  अपना ही यह पौराणिक सिद्धांत याद नहीं कि किसी  'विशाल  घासाहारी हाथी को वश  में करने के लिए छोटा सा 'अंकुश' ही काफी है। 'दुनिया के ५६ इस्लामिक देशों की सेनाएं , अलकायदा ,आईएस और पाकिस्तान  में  छिपे  बैठे दाऊद ,हाफिज सईद  इजरायल  से क्यों नहीं लड़ लेते ? क्यों इजरायल  का नाम सुनते ही सऊदी अरब और जॉर्डन  का शाह भी  अमेरिका की गोद में  अपना मुँह  छिपाने को बाध्य हो जाते  हैं। इस आतंकवाद से लड़ने के लिए  भारत  को वास्तविक धर्मनिरपेक्षतावाद की दरकार है। सभी किस्म के साम्प्रदायिक तत्वों का राजनीति में प्रवेश वर्जित किया जाना  चाहिए। इस्लामिक जेहाद का जबाब हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता कदापि नहीं हो सकती। बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक सरकार और उसकी सेनाएं ही उसका बेहतर जबाब हो सकते हैं।

  वर्तमान में सत्तारूढ़ नेता साम्प्रदायिकता में रचे -बसे  हैं। उधर  भारतीय सुरक्षा तंत्र बेहद कमजोर है। यदि हम ताकतवर होते  तो अक्सर ही ऐंसा क्यों होता है कि  एक -दो आतंकवादी को पकड़ने के लिए या मारने के लिए दर्जनों भारतीय जवानों को शहादत नहीं  देनी पड़ती  है  ! अभी -अभी उधमपुर में पकडे गए एकमात्र जीवित आतंकवादी नावेद के प्रकरण से  ही सिद्ध होता है कि हमारी यह धारणा  गलत है कि भारतीय  सुरक्षा तंत्र मजबूत है।  वैसे भी जीवित आतंकी को  भारतीय फौजों या बीएसएफ ने नहीं पकड़ा ! इसके बरक्स आतंकियों ने तो बीएसएफ के जवानों को ही मार डाला है । कई भारतीय जवान घायल भी हुए। किन्तु वे जीवित किसी भी आतंकी को नहीं पकड़ पाये। वेशक भारतीय जवांन दुनिया में सबसे बेहतरीन हैं किन्तु साँप  यदि आस्तीन में ही छुपे हों  तो  पुनः गंभीरता से  सोचना पडेगा। हालाँकि  भारतीय सेनाओं को बँगला देश के समय जो गौरव प्राप्त हुआ था उसकी पुण्याई अब समाप्ति पर है। शायद इसीलिये कभी केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर परिकर को शिकायत रहती  है कि  'हम बहुत दिनों से लड़े ही नहीं' ,कभी  केद्रीय मंत्री गिरिराज किशोर  को ये शिकायत हुआ करती है कि  'हिन्दू सहिष्णु होने से बुजदिल और कायर होते हैं '। यह देखने के बाद कि  जिन दो भारतीय  नागरिकों  ने जीवित आतंकी  नावेद को पकड़ा  है -वे असली हिन्दू  हैं।  वे विक्रमजीत शर्मा और राकेश शर्मा  जो की आपस में  जीजा -साले भी हैं। सहिष्णु होने के बाद जब वे आतंक से लड़ सकते हैं तो  सम्पूर्ण भारतीय युवा इस आतंकवाद से क्यों नहीं लड़ सकते ?  हालाँकि इस घटना का श्रेय सरकार और नेता लेते दिख रहे हैं जो कि एक किस्म  का  कदाचार और राजनीतिक व्यभिचार ही है ।

 जम्मू कश्मीर में 'पुहुन  कश्मीर ' ने वर्षों अपने-आप को बचाने का  उपक्रम किया।  उन्ही की बदौलत नेहरू  -पटेल ने कश्मीर को 'भारत संघ' में   मिलाया। उन्ही की बदौलत कभी बाप बेटे ने , कभी बाप-बेटी ने कश्मीर  पर राज किया।  उन्ही की बदौलत 'नमो' को भी कालर ऊँची करने का मौका मिला। किन्तु  कश्मीरी  पंडित  या हिन्दू अपने  ही देश में अपने ही घर  में वापिस लौटने में अभी भी  डर  रहा  है। जबकि दुनिया की कोई भी कौम या राष्ट्र यह दावा नहीं कर सकता कि  उसे  कश्मीरी पंडितों या हिन्दुओं  से कोई खतरा है। इस दुखद स्थति के लिए केवल जेहादी ही नहीं बल्कि भारत में गंदी राजनीति  करने वाले भी जिम्मेदार हैं। सत्ता के लिए कुछ लोगों ने रथ यात्रा निकाली। मंडल-कमंडल के नारे लगाए। मंदिर-मस्जिद विवाद खड़ा किया। गोधरा की हिंसा का हिंसक  जबाब पूरे गुजरात के निर्दोष मुसलमानों पर कहर ढाकर  दिया। समस्त हिन्दू कौम को दुनिया भर में  'हिंसक'  व साम्प्रदायिक निरुपित  किया । भले ही इन दुर्घटनाओं से 'संघ परिवार' को और भाजपा को राजनैतिक लाभ हुआ है। किन्तु भारत और दुनिया के हिन्दुओं का इस 'गुजरात स्वाभिमान'  वाले अहंकार से  बहुत नुक्सान हुआ है।

   श्रीराम तिवारी



 

रविवार, 9 अगस्त 2015

पाखंडी नेताओं की गैंग में, शामिल हो जाता है आदमी।।



 मिलता  है जब सत्ता -पॉवर,  तो बहक जाता है आदमी।

 अक्सर ज्यादा बोलने पर भी  , उलझ जाता है आदमी।।


 जिसके  बोलबचन निकृष्टतम , शब्दाडंबर हों भदेस गँवारू  ,

 चुनावी सभा  में भीड़ देख  ,ठिलवई पै उत्तर आता  है आदमी।


    औरों की मेहनत पर मौज  करे  , कृतज्ञता का स्वांग भरे ।

   ऊँचे पद  पर प्रतिष्ठित ये , कितना गिर जाता  है आदमी।।


   चमचों  की तमन्ना है कि कोई ,गॉडफादर  उन्हें दुलारे ।

    पाखंडी  नेताओं  की गैंग में, शामिल हो जाता है आदमी।।




  श्रीराम तिवारी






 

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

 विगत कुछ दिनों पहले ही भारत -म्यांमार  सीमा पर  जब भारतीय  सुरक्षा  बलों  ने बड़ी मशक्कत और कुर्बानी देकर आतंकी  ठिकानों को ध्वस्त  करने की कोशिश  की थी तब कुछ सत्तारूढ़ पार्टी के बड़बोले नेताओं- मंत्रियों ने जल्दबाजी में अपनी  ही पीठ थपथपाना  क्या शुरू  कर दिया था । कुछ सरकार समर्थक  उत्साहीलालों ने तो म्यांमार के बहाने पाकिस्तान  को भी  चिढ़ाना शुरू कर दिया था। जब  म्यांमार के  फौजी शासकों और नेताओं  को भारतीय सत्तारूढ़ नेताओं की  चालाकियाँ  और यशेषणा का ज्ञान हुआ तो उन्होंने घोर नाराजी व्यक्त कर उस कामयाबी का भांडा  ही फोड़ दिया था। म्यांमार ने पूरी दुनिया को सूचित किया  कि  भारतीय सुरक्षा बलों  ने हमारी सीमा में कदम ही नहीं रखा। है  भारत सरकार ने आनन-फानन तब  इज्जत की खातिर अजीत धोबाल को रंगून  भेजा। धोबाल को म्यांमार वालों ने  बुरी तरह झाड़  दिया। किया धरा भाजपा के  बयान वीरों ने और वेचारे  ढोबाल  को उनके गंभीर अपराध  पर डाँट पडी । तब उस 'राष्ट्रीय शर्मिंदगी'  को धीरे से दबा दिया गया। मीडिया  को  भी 'मना'  लिया गया। नेताओं की कूटनीतिक अज्ञानता और अफसरों की  गफलत  का  परिणाम ये हुआ कि  एक मात्र तठस्थ पड़ोसी  राष्ट्र म्यांमार भी अब भारत से मुँह  फुलाये हुए है। जबकि पाकिस्तान,श्रीलंका,  नेपाल ,बांग्लादेश  ये सब  तो पहले से ही भारत से जले-भुने बैठे हैं। इन सभी के मन साफ़ नहीं हैं। ये सभी  सिर्फ भारत से खींचना चाहते हैं। जबकि चीन भारत को आगे बढ़ता नहीं देख सकता। पाकिस्तान का एकमात्र एजेंडा है भारत की बर्बादी। इन हालात में  भारत की जनता  के समक्ष एकमात्र वही रास्ता है जो उधमपुर में विक्रमजीत और राकेश शर्मा ने  दिखाया  है। सरकार और उसके तंत्र पर भरोसा करते -करते अर्ध शताब्दी से जयादा वक्त गुजर गया। अब पानी सर से ऊपर  पहुँच चूका है। सभी की सोच में बदलाव जरुरी है।  कोई भी  पार्टी या दल परफेक्ट नहीं है।  सभी  की कुछ न कुछ कमजोरियाँ  हैं। जो बेहतर विचारधारा का दम  भरते हैं वे  भी बौद्धिक अहमन्यता के शिकार हैं ,जबकि जनमत उनके पास गुजारे लायक भी नहीं है।  

इसी तरह उधमपुर में पकडे गए एकमात्र जीवित  आतंकी को ज़िंदा पकड़ने वाले -'जीजा -साले'न तो फौजी हैं ,न ही वेतन भोगी मठ्टर कश्मीरी आरक्षक हैं। वे तो वास्तव में वतन के असली रखवाले हैं। विक्रमजीत और राकेश शर्मा यदि उस आतंकी नावेद को जीवित न पकड़ते तो दो बातें होतीं। एक तो यह कि जिन वेगुनाहों को उस दुष्ट  आतंकी ने एके -४७ की नोक पर बंधक बनाया था ,वे सब मारे जाते। दूसरा परिणाम यह होता कि  बाद में एक दर्जन भारतीय सीमा सुरक्षा बल  के जवानों की शहादत  के बाद भारतीय सुरक्षा बलों  के हाथ जो लाशें आतीं  उनमें एक लाश आतंकी नावेद की भी होती। इससे सिद्ध होता है कि आतंकी नावेद के जिन्दा पकडे जाने में असली  'देशभक्तों' की भूमिका ज्यादा है। भाजपा की नेत्री  मीनाक्षी लेखी और अन्य नेता -प्रवक्ता फिर वही  म्यांमार वाली घटना की पुनरावृत्ति करने जा रहे हैं। यह याद रखना होगा कि  पाकिस्तान प्रशिक्षित  आतंकी  जान बूझकर ऐंसी जानकारियाँ  देते हैं ताकि बाद में  भारत सरकार की दुनिया भर में हँसी  उड़े। यही तो पाकिस्तान  की कूटनीति है कि  उसे आतंकी के बारे में सचाई तो मालूम है,इसीलिये जब नावेद के वयान को आंध्रा बनाकर भारत सरकार ने अपना स्टेटमेंट दिया कि  आतंकी पाकिस्तान के फैसलावाद का है तो पाकिस्तान ने फौरन इंकार कर दिया। चूँकि पाकिस्तान की  कल को वाशिंगटन -व्हाइट हाउस में पेशी भी हो सकती है ,इसलिए वो अपने इस वयान को कायम रखने के लिए मजबूर होगा। यदि वह वयान बदलता है तो उसकी चोरी पकड़ी जाएगी। कहने का तातपर्य यही है कि  भले ही आतंकी पाकिस्तान का ही है  किन्तु उस ने जो कहा उसे ही सच मानकर भारतीय एजेंसियां भयानक भूल कर रहीं हैं।भारत की संप्रभुता पर हमला करने वाला
आतंकी बेखौफ मुस्कराते हुए फटाफट जो बयान दे रहा है वह सफेद झूंठ है।  सच क्या है यह या तो पाकिस्तान जनता है या वह आतंकी। भारत के नेता कुछ नहीं जानते। केवल दो सभ्रांत नागरिकों की पुण्याई पर भरत नाट्यम कर रहे हैं। इन्हे यह गर्वोकिति करने से  पहले भारतीय जवानों की शहादत सदैव स्मरण रखनी चाहिए।

 साम्प्रदायिकता तो सामंतवाद की नाजायज औलाद है ,जिसे पूंजीवाद और आतंकवाद ने परवान चढ़ाया है। सत्ता के दरबारी शातिर शकुनियों ने हर किस्म की बाजीगरी से इस साम्पदायिकता के शैतान को हमेशा ही मेहनतकश सर्वहारा वर्ग के खिलाफ इस्तेमाल किया है।  

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

? यदि प्रधानमंत्री को लगता है कि विपक्ष के आरोप गलत हैं तो देश की संसद में 'मन की बात' कहें न !

जिन  राष्ट्र शुभचिंतकों को - देश की संसद में हो रहे कुकरहाव  की बड़ी चिंता है। जिन  देशभक्तों को सांसदों पर होने वाले  खर्च की बड़ी फ़िक्र है। उन प्रबुद्धजनों  की चिंता  बाजिब हो सकती  है। लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिये कि उस्तरा चाहे तरबूज पर गिरे या तरबूज उस्तरे पर -जो कुछ होना है ,तरबूज का ही होना है।उन्हें यह भी  याद रखना होगा कि  संसद चलने का मतलब यह  नहीं कि केवल  अडानी-अम्बानी  और देशी-विदेशी पूँजी -पतियों -सरमायेदारों  के समर्थन में ही मोदी सरकार संसद में विधेयक पारित करती रहे। जब किसानों मजूरों  के खिलाफ या  सार्वजनिक उपक्रमों के खिलाफ संसद में  रणनीति  बन रही हो तब अत्यल्प  विपक्ष को क्या करना चाहिए ?  यदि  सुषमाजी,शिवराज जी ,स्मृति जी ,वसुंधराजी जी और न जाने कौन-कौन जी  पर लगे आरोपों पर देश के प्रधान मंत्री  ही  संसद में मौन रहेंगे तो विपक्ष को क्या करना  चाहिए ?  क्या विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष के  भृष्टाचार को देश के सामने  उजागर  करना अनैतिक है ?  क्या  ललित मोदियों के टुकड़ों पर  चुनाव जीतने वालों की मंशानुसार  ही संसद चलनी  चाहिए? क्या विपक्ष को शुद्ध शांत भाव से यह सब चुपचाप टुकुर-टुकुर देखते रहना चाहिए ?

वास्तव में संसद में जो भी गतिरोध नजर आ रहा है , जो भी कुछ चल रहा है उसके लिए और कोई नहीं सिर्फ प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार हैं !  विपक्ष की भूमिका का  इससे बेहतर और क्या निर्वहन हो सकता  है ?आखिरकार कांग्रेस को भी तो मालूम हो कि  विपक्ष की रुसवाई कैसी होती है ? उधर सत्ता पक्ष के रूप में मोदी सरकार को भी मालूम हो गया होगा कि  'आँधियों 'के बेर बटोर लेने से घर की रसोई नहीं चलती ' । चाहे संसद में  सत्ता पक्ष  के छुद्र  अहंकारी मदमस्त नेताओं की कर्कश  चीख -पुकार हो ,  चाहे संसद से  कांग्रेस के सांसदों का निलंबन हो ,चाहे स्पीकर का निहायत ही  पक्षपातपूर्ण  रवैया हो , ये सब तो संसदीय  लोकतंत्र की आवश्यक बुराइयाँ हैं। इनसे  देश का नुक्सान भले ही कितना ही  होता रहे , किन्तु वर्तमान 'बनाना गणतंत्र'में  इस प्रकार के उग्र विमर्श से बचा  ही नहीं जा सकता । जब पूंजीवाद और साम्प्रदायिकता का गठजोड़ सत्ता के बहुमत  में हो तो संसद में वही होगा जो हो रहा है !

संसद नहीं चलने से  सरकार समर्थक और  भृष्टाचार में लिप्त सत्ता के दलालों को कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि  चारण -भाट संतति को तो इसमें  बड़ा मजा आ रहा है। सत्तापक्ष और सरकार की मुस्कराहट मीडिया में छिप नहीं पा रही है।  वेशक संसद में विपक्ष की आक्रामकता उन  पिछलग्गुओं को  कतई बर्दास्त नहीं होगी  , जिन्हे अपने संसदीय प्रचंड बहुमत का बड़ा गुमान होगा ! सत्ता के  बगलगीर -दक्षिणपंथी कूढ़मगज मूढ़  पत्रकारों - बुद्धिजीवियों  और स्वयंभू देश भक्तों को भी इस बात की बड़ी हैरानी है कि इतने प्रचंड बहुमत के वावजूद केंद्र  की सरकार हर मोर्चे परअसफल और  असहाय क्यों है ? हरएक विधेयक संसद में पास होने के बजाय अध्यादेशों की शक्ल में लागु किये जाने को अभिशप्त क्यों  है ? इन  ज्वलंत  सवालों  के जबाब  देश की जनता अपने प्रधानमंत्री  के मुँह  से  सुनना  चाहती हैं !यदि जनता के इन सवालों को कांग्रेस ,वामपंथ और अन्य दल संसद में उठा रहे हैं ,यदि वे  इन सवालों को लेकर  संसद के बाहर धरना -प्रदर्शन कर रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं ?

 जनता के  इन सवालों पर ,भृष्टाचार के सवालों पर,  किसानों की आत्म हत्या  के सवाल पर ,श्रम  कानूनों के शिथलीकरण के सवाल पर ,सुषमा स्वराज और ललित मोदी के सवाल पर ,वसुंधरा राजे और ललित मोदी के सवाल  पर , पंकजा  मुण्डे और स्मृति ईरानी के संदेहास्पद आचरण पर , शिवराज और उनके मित्र  'यमराज'  यानी व्यापम  के नृसंशतापूर्ण नर संहार के सवाल पर - सत्ता का सबसे बाचाल 'शुक'  जब स्थाई मौन धारण   करेगा तो जनक्रोश का गुब्बारा  भारतीय संसद में नहीं तो क्या 'व्हाइट हाउस '  में फूटेगा ?  सुहाने-  लुभावने सपनों के जो बादल  लोक सभा चुनाव में खूब गरजा किये थे ,वे अब  संसद  के इस मानसून सत्र में बरस क्यों नहीं गए  ? संसद के  इस  मानसून सत्र  को  यदि कोई निष्फल बता रहां है तो वह मूर्ख है । वास्तव में भारतीय संसद के इतिहास में  ऐसे अनेक उदाहरण और प्रमाण हैं ,जबकि विपक्ष के रूप में भाजपा ,जनसंघ ,सपा, जपा   और अन्य विपक्षी दलों ने संसद को सैकड़ों बार बुरी तरह बाधित किया है। कांग्रेस का वर्तमान विपक्षी व्यवहार तो उसके सामने पासंग के बराबर भी नहीं है।

                   प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी यदि उपरोक्त सवालों का जबाब  सत्र के पहले ही दिन संसद के समक्ष  प्रस्तुत कर देते  तो शायद ही देश की इतनी फजीहत होती !दागी मंत्रियों ,मुख्यमंत्रियों की हकीकत जानते हुए वे 'संघ' और पार्टी संगठन की सदाशयता को राष्ट्र से ऊपर  आंकते रहे। यदि वे सच्चे राष्ट्रवादी,स्वाभिमानी और ५६ इन्चीय सीने वाले हैं तो मुँह  में दही क्यों जमाये बैठे रहे ? वैसे तो उन्हें  बोलने का बड़ा शौक है। मोदी जी बड़े प्रत्युतपन्नमति  अर्थात हाजिर जबाब भी ही हैं।फिर वे संसद  के दोनों सदनों  में स्वयं चुप्पी लगाकर कहाँ खोये रहे ?  वेचारे अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद ,बेंकैया नायडू और मुख़्तार अंसारी को ही क्यों नाहक खर्च किये जाते  रहे हैं ?  कहीं 'नमो ' का आत्मविश्वाश डोलने तो नहीं लगा  है ? यदि प्रधानमंत्री  को लगता है कि  विपक्ष के आरोप  गलत  हैं तो देश की संसद में 'मन की बात' कहें न !

 शायद अपनी किसी कमजोर नब्ज के चलते ही मोदी जी  और उनकी सरकार ने  पहले 'लोक सभा टीवी 'से विपक्ष  को गायब किया और बाद में  पूरे विपक्ष को ही संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया है ! इतिहास में पहली बार  ऐंसा हुआ है कि  पहले तो विपक्ष को मान्यता ही नहीं दी गयी और अब उसकी बची खुची आवाज को भी बड़ी  तिकड़म और ढीठता से नेस्तनाबूद किए जा रहा है ! स्पीकर की पक्षपातपूर्ण हेराफेरी किसी से छिपी नहीं है।  भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए यह अपशकुन है।  हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि  देश चौतरफा मुसीबतों से घिरा है। 'सबका साथ -सबका विकास ' इस तरह कैसे सम्भव है ? मात्र ३० % वोट हासिल कर संसद में २८० सीट तो जीती जा सकती हैं किन्तु देश को बचाने के लिए ,विकाश व् सुशासन के लिए उन लोगों  की आवाज को अनसुना करना उचित नहीं - जो  मोदी जी की तरह 'चुनाव प्रबंधन' या मीडिया मैनेजमेंट की बदौलत संसद में बहुमत की विजय  हासिल  नहीं कर पाये। आपस  में बिखरे हुए होने से  आज भारत  का  विपक्ष  ५० % वोट पाकर भी  संसद में गुजारे लायक  भूमिका में भी नहीं है  !

वेशक लोकतंत्र के प्रमुख स्तम्भ के रूप में संसद की महत्ता सर्वोच्च है। संसद में पक्ष -विपक्ष की बाचालिक भिड़ंत  या नीतियों-कार्यक्रमों में वैचारिक टकराव कोई बेजा हरकत या महापाप नहीं है। यह तो स्पीकर की काबलियत और  सदन के नेता  की काबिलयत पर  निर्भर है कि वह सत्ता पक्ष के गुरुतम् भार का वहन  करे।   देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि  कबीर के इस मन्त्र - "अंतर हाथ सहार दे बाहर मारे चोट' का प्रयोग करे ! संसद में वयान  देकर विपक्ष के आक्रोश को डाइल्यूट करे। थोड़ी से संसदीय सदाशयता और लोकतान्त्रिक तौर  तरीकों से यदि संसद को चलाया जाए तो बाकई  देश के कुछ तो अच्छे दिन आ ही सकते हैं। जनता  की  वास्तविक खुशहाली  और  देश की राष्ट्रीय सुरक्षा तो तभी  सम्भव यही  जब  देश की शोषित -पीड़ित जनता और मजदूर-किसान  एक महान समग्रगामी  साम्यवादी जन क्रान्ति  का आह्वान  करें । तब तक इस  संसदीय लोकतंत्र को बचाये रखना  बहुत जरुरी है।  जोकि वर्तमान दौर में असुरक्षित है।


इन दिनों संसद की कार्यवाही ठप्प है। कांग्रेस और अन्य सभी विपक्षी सड़कों पर अपना रोष जाहिर कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि कौन है इस स्थति के लिए जिम्मेदार है ?  यह  एक  औसत बुद्धि का आदमी और ओरत भी जानते हैं कि  संसद नहीं चलने से किसका फायदा है ? यदि संसद ठप्प है तो विपक्ष की गैर मौजूदगी में  सत्ता पक्ष संसद में मनमानी करके  किसान विरोधी ,मजदूर विरोधी और कार्पोरेट  परस्त  तमाम विधेयक पारित कर सकता है ।  सत्ता पक्ष के दागी  मंत्रियों के गुनाहों पर परदा दाल सकता है। हालाँकि  जब कांग्रेस [यूपीए] सत्ता में थी तब भी संसद के हाल यही थे। किन्तु तब लोक सभा स्पीकर चाहे सोमनाथ चटर्जी  रहे हों या मीरा कुमार  रही हों ,किन्तु वे सत्ता पक्ष के  हाथों  की इस तरह  कठपुतली कभी नहीं बने। सोमनाथ चटर्जी ने तो एक बार  नीतिगत सवाल पर अपनी 'मातृ संस्था -सीपीएम की भी बात नहीं मानी थी। उन्होंने तठस्थ सभापति का आदर्श पेश किया। इसी तरह सोनिया  गांधी की  परम कृपा पात्र होते हुए भी सुश्री मीरा कुमार ने  भी  यूपीए -दो  के दोरान कई मर्तबा  भाजपा  सांसदों की दुशासन लीला का  सामना किया था। किन्तु उन्होंने भी कभी इस तरह थोक में सांसदों का निलंबन  नहीं किया। लेकिन  लगता है कि वर्तमान लोक सभा अध्यक्ष  आदरणीय ताई जी  - सुमित्रा महाजन  को स्वयं निर्णय लेने का कोई अधिकार नहींरहा  है।  वरना उनके जैसी न्यायप्रिय -शालीन  और  डेमोक्रटिक फंक्शनिंग के प्रति कर्तव्यनिष्ठ  सीनियर सांसद का -लोक सभा स्पीकर  पद पर होते हुए भी  इतनी  अंधेरगर्दी का होते रहना  हैरानी की बात है ! कोई भी स्वाभिमानी देशभक्त इस तरह का अलोकतांत्रिक वर्ताव नहीं कर सकता। यदि  भृष्ट सत्तापक्ष द्वारा ताई के कंधों पर बन्दूक रखकर चलाई जा रही है तो भी उन्हें इससे बढ़िया सुअवसर और क्या हो सकता है कि  वे  इस निरंकुश्ताबाद   बेनकाब करते हुए भारतीय लोकतंत्र की मर्यादा का मान रखें।  ताई चाहें तो सोमनाथ चटर्जी  का अनुशरण कर  देवी अहिल्या बाई होल्कर की धवल कीर्ति को  बुलंदियों तक पहूंचा सकतीं हैं। ताई का संसद में  विपक्ष के साथ  बेहतर  व्यवहार वास्तव में भारतीय  जनता की आवाज के प्रति आदरभाव ही  सिद्ध होगा।   देवी अहिल्या बाई के प्रति उनकी इससे बेहतर और क्या श्रद्धांजलि हो सकती है ?

 वेशक  लोक सभा  की कार्यवाही सेंसर की जा रही  है । विपक्ष को जानबूझकर दिखाया ही नहीं जाता।सरकार की यह हरकत उसकी कमजोरी को ही पुष्ट करती है। यदि हंगामेबाज सांसदों को लाइव दिखाया जाता तो इससे सरकार का क्या बिगड़ता ? इससे तो विपक्ष की ही किरकिरी होती [यदि वे हंगामे में संलग्न होते !],आम जनता को मालूम तो पड़ता कि  असल गुनहगार कौन है ? ऐसा आभाषित होता है कि मोदी जी ने अपने खुद के गुजरात मॉडल  को ही संसद में भी एप्लाई  करके दिखा दिया है।  सत्ता पक्ष के इस अलोकतांत्रक आचरण  से न केवल  संसद  की गरिमा का चीर हरण हो रहा है , बल्कि संवादहीनता और असहिष्णुता के दम्भ में नव नाजीवाद और नव  फासीवाद का  बीजांकुरण  भी  रहा है।

                                        यह सर्वविदित है कि  विगत एक वर्ष  के कार्यकाल में  संसद का काम काज एक दिन भी ठीक-ठाक नहीं चल पाया है । संसद का वर्तमान मानसून  सत्र  भी  शोर और हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। संसद में सत्ता पक्ष का आचरण आदतन 'विपक्ष जैसा और 'बची-खुची' कांग्रेस का आचरण भी आदतन  'सत्तापक्ष' जैसा  ही प्रदर्शित हो रहा है। सत्रावसान नजदीक है और देश के सब्र का इम्तहान भी छीजता  जा रहा है। इस स्थति के लिए सत्ता पक्ष द्वारा बड़ी चालाकी से ,विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।  जबकि संसद ठप्प होने  या संसदीय कार्यवाही आंशिक रूप से बाधित होने  से विपक्ष को धइले  भर का लाभ नहीं है। बल्कि इसमें सरकार को ही फायदा  है। इसीलिए   हर किस्म के  संसदीय  व्यतिक्रम के लिए सत्तापक्ष या उसके मंत्री ही पूर्णतः  जिम्मेदार  हैं ।  वेशक इस  बात का लोहा तो मानना  ही पडेगा कि वर्तमान 'मोदी- सरकार'हर किस्म के ढ़पोरशंखी वितंडावाद में  सिद्धहस्त साबित हुई है। अधिकांस प्रिंट,दृश्य,श्रव्य,औरसंगठन का  'कनबतियां' - प्रचार -प्रसार 'साधने' में मोदी सरकार बार-बार सफल हो रही  है। उन्होंने  बाकई छत्तीश इंच के सीने को छप्पन  का  सिद्ध कर   दिखाया है। लेकिन यह वीरता पाकिस्तान और चीन से निपटने में नहीं बल्कि अपने हमवतन साथियों -विपक्षी नेताओं को निपटाने के काम आ रही है।  मोदी जी और 'संघ' का  मीडिया मैनेजमेंट तो  दुनिया में  बेजोड़ है ! सरकारी ,गैर सरकारी और कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया संस्थान  भी  समवेत स्वर में 'सत्तापक्ष का स्वस्तिवाचन किये जा रहा है.। वह 'मोदी सरकार' को संसदीय प्रजातंत्र का प्रहरी और विपक्ष को संघातक सिद्ध करने में जुटा है। जो खलनायक हैं वे नायक बताये जा रहे हैं। विपक्षियों को भी जनता ने ही  चुनकर संसद में भेजा  है। किंतु  दुर्भाग्य से वे अल्पमत में हैं । अब मीडिया इन निरीह और बचे-खुचे सांसदों पर टूट प;पड़ा है।  क्या यह न्याय और  देशभक्ति है ? अधिकांस टुच्चे अखवार और टीवी चेनल्स 'संसदीय' कार्यवाही बाधित होने को देश का बंटाढार  सिद्ध करने में जुटे हैं। वे शायद नहीं जानते कि  संसदीय कारवाही बाधित होना भी लोकतंत्र का ही एक अहम हिस्सा है। बीमार लोकतंत्र  व पथभृष्ट सरकार के लिए तो यह संसदीय 'महाभारत' एक कडुवी ओषधि जैसा  ही  है ! देश की जनता को देश हित में इसे जबरियां ही  सही ,किन्तु पीना ही पड़ेगी ।

  चूँकि वर्तमान मोदी सरकार'  ने विगत  १५ महीने  में "खाया -पीया चार आना और ग्लास फोड़ा बारह आना '' ही चरितार्थ किया है।  इस सरकार को अभी तक यही मालूम नहीं कि किसान आत्म हत्या क्यों कर रहे हैं ? सरकार के मंत्री का कहना है कि  आजकल किसान  प्यार  मोहब्बत में असफल होने या पारिवारिक कलह से पीड़ित  होकर आत्महत्या कर रहे हैं। उस मंत्री को  सूदखोर दवंगों का  आतंक नहीं दिखा। उसे पिछले साल का सूखा ,फिर अकाल वृष्टि और अब बाढ़ -ये सब नहीं दीखते। सरकार के पीएमओ या वित्त मंत्री को नहीं मालूम  कि  कालाधन कहाँ हैं ?  प्रधानमंत्री द्वारा किये गए  वादे  के अनुसार स्विट्जरर्लैंड वाला कालाधन प्रति  व्यक्ति -पंद्रह  लाख ,रूपये  खाते में कब जमा होगा  ? यह भी कोई बताने को तैयार नहीं ! हाफिज सईद,दाऊद  , और  अन्य वांछित भगोड़े आतंकी कहाँ हैं ?  आतंकियों ,देशद्रोहियों को पकड़ने के बजाय सत्ताधरी 'रामदल' के नेता मंत्री 'हिन्दुओं को डरपोंक ' बता रहे  हैं। क्या मोदी जी हिन्दू नहीं हैं ? क्या वे भी  डरपोंक ही हैं ? क्या मंत्री के इस तरह के घटया वयान की जानकारी सरकार को नहीं! इस सरकार के सत्ता में आते ही कश्मीर क्यों जल उठा ? अमरनाथ  यात्राओं पर आतंकी हमले अब  क्यों हो चले हैं ?

  इन तमाम सवालों की जद  में खड़े  मोदी जी ,सत्ता पक्ष और उनकी सरकार  के पक्ष में शिद्द्त से खड़ी 'स्पीकर महोदया - इतिहास आप को भी माफ़ नहीं  करेगा।  यह याद रखें कि संसद  संचालन  की महानता से आप अभी बहुत दूर हैं।

                               श्रीराम तिवारी

 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

कबीर विमर्श का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विहंगावलोकन - श्रीराम तिवारी



  भारतीय 'संत काव्य धारा' में कबीर  का बहुमान सर्वत्र सर्वकालिक है। सचेत जन -मानस की नजर  में और खास तौर से हिन्दी साहित्य मर्मज्ञों की नजर में तो  'संत कबीर '  किसी पीर,पैगम्बर,अवतार या किसी आदर्श  चक्रवर्ती सम्राट से कमतर नहीं है। मेरी नजर में भी 'संत कबीर' के कृतित्व व रचना धर्मिता का बड़ा मान है।  वैसे भी  अपने  समकालीनों के बरक्स तो कबीर  कदाचित प्रगतिशील ही साबित हुए हैं । किन्तु कबीर के समग्र साहित्यिक अवदान में - जनता के सरोकारों ,राजनैतिक,सामाजिक व आर्थिक सवालों पर उन की चुप्पी ने उन्हें विश्व स्तरीय सम्मान से वंचित किया है । कबीर विषयक मेरी इस  अवधारणा से मेरा युवा एवं अध्धयनशील  पुत्र वाकिफ है।
              इसलिए जब  बेटे डॉ प्रवीण तिवारी ने मुझे एक अप्रत्याशित सलाह दी कि पिता श्री आप संत ' कबीर' पर भी कुछ लिखें। तो मैंने कहा - बेटा ये  कबीरदास जी तो इतने बहुश्रुत ,बहुपठित व  बहुचर्चित रहे हैं की उन पर अब नए सिरे से कुछ  भी कहना - सुनना -लिखना केवल अपनी जग हँसाई  कराने जैसा ही होगा। इसके अलावा आज के इस अल्ट्रा-डिजिटलाइज युग में यह एक अनुत्पादक और आलोच्य  कर्म  ही सिद्ध  होगा ! वैसे भी जब संत  कबीर के कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में अच्छे -अच्छे नामी -गिरामी लिख्खाड़ लिख गए हैं, तो अब मैं क्या खाक उन पर  कुछ नया लिख सकूंगा ?  किन्तु बेटा शायद पहले से ही इस तरह के चलताऊ और  टरकाऊ जुमलों  के लिए तैयार था। इसलिए उसने ततकाल  कहा -आप कुछ इस तरह से लिखिए कि उस नजरिये से  किसी और ने अभी तक लिखा ही ना हो ! उसके इस अमोघ अश्त्र की कोई काट ढूंढने के बजाय मैंने कबीर विमर्श की  शल्यक्रिया का मन बना लिया। इसी बहाने  बेटे का सुझाव  मानकर  तदनुसार भूले  बिसरे  वास्तविक कबीर को खोजकर ,समाज में विराजे परम्परागत कबीर की जगह प्रतिष्ठित करने का कार्य  भी  प्रारम्भ कर दिया । कुछ दिनों की मेहनत  मशक्क़त के बाद - कबीर के व्यक्तित्व,कृतित्व पर मेरा यह नितांत नूतन 'कबीर विमर्श का विंहगावलोकन'  प्रस्तुत है !

 मैंने शुरुआत से ही अपनी चेतना के किसी अज्ञात कोने में सुरक्षित बैठे आध्यात्मिक संत 'कबीर' की  महिमा का  चारण  बखान करने के बजाय मानवता के हितेषी  और यथार्थ के धरातल  पर खड़े उस कबीर को खोजना शुरू किया जो मानव जाति की उच्चतर मान्यताओं और मूल्यों के अनुरूप हो ! खुद कबीर की ख्याति के अनुरूप हो ! इस बाबत  पुनः सम्पूर्ण कबीर वांग्मय का गहन  अध्यन किया । इसके लिए न केवल कबीर बल्कि अन्य भक्तिकालीन हिंदी कवियों का भी वैज्ञानिक और यथार्थ के नजरिये से सांगोपांग अध्यन एवं अनुशीलन किया।  कबीरपंथियों , अनुभवी बुजुर्ग विद्वानों एवं अध्येताओं का भी सानिध्य प्राप्तकिया । न केवल  भारतीय हिंदी  'संत कवियों' ,सूफी संतों  और दार्शनिकों के ही - बल्कि कबीर कालीन यूनानी ,यूरोपियन,चीनी अरेबियन कवि   एवम  दार्शनिकों के विचारों  के साथ भी कबीर का तुलनात्मक अध्यन किया  । इसी दौरान कबीर के कुछ कूढ़  -मगज , जड़मति  प्रशंसकों - भक्तों से भी बहस मुसाहिबा  करना पड़ा । इस  'कबीर -समुद्र मंथन ' से प्राप्त जानकारियों का कलेवर अर्थात पुलिंदा  किसी एक मामूली आलेख में  कदापि समाहित कर पाना असम्भव है । इसलिए मैंने आलेख की विषयवस्तु के  मानकीकरण के निमित्त  जरुरी सामग्री को ही इसमें शामिल किया है।   साथ ही विषय वस्तु  के प्रमाणीकरण हेतु केवल  कबीर की वाणी  को ही साक्षी  माना है। आलेख को सीमित करने के निमित्त इस  विमर्श के बहुत सारे तथ्यों और उपलब्ध प्रमाणों को मजबूरी में इस आलेख से हटाना  पड़ा  है।

                               मेरी  इस मशक्क़त ने मुझे  न केवल कबीर वाङ्गमय  बल्कि अधिकांस भाववादी हिंदी  'संत-काव्य' में भी डुबकियाँ लगानी पड़ीं ।  इस दौरान  कुछ पुरातन और सामन्तकालीन  हिंदी कवियों के श्रेष्ठ   मानवीय  और क्रांतिकारी चेहरे को जानने-पहचानने का भी  मौका मिला। साइंस का विद्यार्थी होने के नाते न केवल वैज्ञानिक दॄष्टि से अपितु सामाजिक क्रांतिकारी रूप में भी कबीर को खोजने की कोशिस की गयी। इसी दौरान मैंने यह  पाया कि इस सूचना एवं सम्पर्क क्रान्ति के उत्तर आधुनिक युग में वैसे तो संत  कबीर सहित कई सच्चे 'संत' और योगी अभी भी अपनी आध्यत्मिक  प्रासंगिकता बरकरार रखे हुए हैं। किन्तु  उनकी कदर कुछ नहीं है। बल्कि कुछ  बदमास ठग बाबाओं ने जरूर अंधश्रद्धा और पाखंड का  बाजार खड़ा कर लिया है। इन आसाराम जैसे धूर्तों ने  शिष्यों की जगह गुंडों,लुच्चों -लुच्चियों और लफंगों को अपना शागिर्द बना रखा है।वहीँ   दूसरी ओर शिक्षित और तकनीकी दक्षताप्राप्त आधुनिक 'डिजिटलाइज' नई पीढ़ी को कबीर  जैसे संत या किसी अन्य 'संत कवि' से कोई खास  लगाव अथवा रूचि ही  नहीं है। ये वर्तमान पीढ़ी घण्टों व्हाट्सऐप या फेसबुक पर चिपकी रहेगी ,पोर्न साइटस पर कीमती  वक्त  जाया करती रहेगी। किन्तु कबीर,सूर तुलसी केशवदास ,बिहारी रसखान ,मीरा या रहीम  की रचना धर्मिता  का विमर्श तो दूर की बात,वे इन संत - कवियों के नाम सुंनकर ही नाक भौं सिकोड़ने लगते  हैं।कालिदास ,वेद व्यास , शंकराचार्य , भास्कराचार्य,महीधराचार्य या रामानुजाचार्य  जैसे  उद्भट संस्कृत साहित्य के  रचनाकारों को समझने -बूझने की क्षमता इनमे कैसे संभव है ?

यह कटु सत्य है कि हिंदी साहित्य के 'संत -कवियों'  और साहित्यिक  पुरोधाओं की दुर्गति पर आंसू बहाने की फुर्सत इस तकनीकी दक्षताप्राप्त पीढ़ी को कदापि नहीं है। गूगल सर्च या अन्य साहित्यिक साइट्स  की खोज खबर लेकर सूचनाएँ प्राप्त करने में और  लायब्रेरी में जाकर हिंदी संत कवियों -लेखकों के साहित्यिक अवदान का  अध्यन  एवं उस पर चर्चा करने में  बहुत फर्क है।  यह फर्क समझना भी इन आधुनिक युवाओं को गवारा नहीं। यही वजह है कि  भारतीय  सनातन हिन्दू समाज संतों,गुरुओं,अवतारों और वीरों-शहीदों  की फोटो तो घर में अब भी लगाता है। अगरबत्ती और धूपदान भी  कभी - कभार जलाता  है ।  किन्तु  इन साहित्यकारों ,संत कवियों के सृजन और उनके  सामाजिक ,राजनीतिक , साहित्यिक एवं  क्रांतिकारी योगदान पर कोई चर्चा नहीं करना  चाहता। इसीलिये आज की  वैज्ञानिक पीढ़ी भी  अपने  सामन्तकालीन और पौराणिक पूर्वजों द्वारा रचे  गए  'मिथ' को ही मरी हुयी बंदरिया की तरह गले से चिपकाए भटक रही है।वह झूंठ ,मिथ ,पाखंड से निर्मित   भावात्मक गटर साहित्य को  ही इतिहास समझ रही है। संत कबीर का यथार्थ चरित्र, वास्तविक व्यक्तित्व एवं मौलिक कृतित्व भी इसी तरह की अन्द्धश्रद्धात्मक  भाववादी चमत्कारिक चारण वंदना में खो गया है।

                       हालाँकि भारतीय  प्रचंड संस्कृत वांग्मय उसकी वैज्ञानिकता और परिष्कृत व्याकरण के समक्ष  'अपढ़' निरक्षर कबीर तो क्या सन्सार के समस्त कवि,दार्शनिक व विचारक भी बौने ही हैं।विश्व की सम्पूर्ण  'गैर संस्कृत'  विरादरी का साहित्य  भी वैदिक सम्पदा के समक्ष बौना ही है। चूँकि कबीर यह सब नहीं जानते थे इसलिए  उन्हें  संस्कृत साहित्य  'काला  अक्षर भैंस बराबर' लगता था। महाकवि  बाणभट्ट , महान वैज्ञानिक और संस्कृत विद्वान - नीतिकार भर्तृहरि व  भवभूति  तथा कवि कुल गुरु कालिदास के नाम भी कबीर ने नहीं सुने होंगे।  यदि सुने होते तो उनका एक आध बार कहीं  तो उल्लेख होता। भले ही कबीर  ने स्वामी रामानंद का शिष्यत्व स्वीकार किया हो ,उनके प्रति  कृतग्यता ज्ञापित की हो किन्तु वे व्यवहार व  सोच में रामानंद से बहुत दूर थे। जबकि 'हठयोगी -नाथपंथी ' उनके ज्यादा करीब थे। सूफियों का भी उन पर पर्याप्त असर था। चूँकि यह संस्कृत का विशद  ज्ञानमय कोष  क्लिष्टतम होने से आम आदमी की पहुँच से  बाहर था ,इसलिए  बेचारे आधे हिन्दू -आधे मुसलमान  मजहब वाले कबीर की क्या हैसियत कि वह उपनिषद के उच्चतम सत्य को छू सके?  इसलिए  उन्होंने  संस्कृत ग्रंथों और उसके अध्येताओं से अपनी खुन्नस निकालते हुए अनायास ही जड़ दिया :-

           'पोथी पढ़ि -पढ़ि  जग मुआ ,पंडित भया न कोय !' अर्थात पांडित्य का ठेका तो कबीर ने ले रखा था !
अपनी इस वैमनस्यता पूर्ण निंदक प्रवृत्ति को जस्टीफाइड करने के लिए कबीर ने  एक  अनूठा सिद्धांत भी गढ़ लिया :-

'निंदक नियरे राखिये ,आँगन कुटी छुवाय !'

कबीर ने यदि पाली प्राकृत बौद्ध जैन वांग्मय का रंचमात्र भी अध्यन  किया होता ,'अनेकान्तवाद' दर्शन या  स्याद्वाद का नाम भी सूना होता तो वे परनिंदा रस में  इतने निमग्न नहीं होते। तब वे अपनी स्थापनाओं में
 कोरे उपदेश जड़ने के , ततकालीन निर्मम  हत्यारे ,लुटेरे शासकों की आलोचना  भी  करते। तब वे  जनता का मार्ग दर्शन करने के बजाय केवल अपने पूर्वजों को गरियाते रहने वाले को 'संत'  नहीं होते ! वेशक कबीर जन  - कवि तो  थे। किन्तु वे  'भाषा भनित  भदेस 'से ज्यादा कुछ नहीं थे। तुलसी,रहीम और बिहारी के बराबर भी नहीं।  आज भी जो लोग संस्कृत साहित्य से वंचित हैं वे  भी कबीर की ही  कूप मंडूक हैं। वे  भी कबीर या उन लोगों  की तरह सोचते हैं  जिन्हे वैज्ञानिक भौतिकवाद के लिए अंग्रेजी,फ्रेंच ,इटालियन  या फारसी का मुँह ताकना पड़ा होगा। जब कबीर  जैसे संत कवि इस उत्कृष्ट परिष्कृत  वैज्ञानिक संस्कृत साहित्य को  हेय  समझते हैं। तो उनकी समझ पर तरस आता है।   भारतीय पुरातन संस्कृत वांग्मय को नहीं जानने वाले  भी कबीर की तरह  बीसवीं शताब्दी के  चिंतक -कवि और इस इक्कीसवीं शताब्दी के उत्तर आधुनिकतावादी  भी -अपनी अज्ञानता  को प्रगतिशीलता बताते  रहते हैं। इन दिनों जिंदगी के उत्तरार्ध में न केवल अपढ़ आस्तिक  किस्म के वुजुर्ग बल्कि  कुछ एनआरआई -अंग्रेजीदां - खास तौर से  मध्यमवर्गीय  पिछड़ी जातियों के वयोबृद्ध,अकादमिक स्टेक - होल्डर्स और रिसर्च स्कालर  भी  इन  हिंदी भाषी संत कवियों के प्रति ही  श्रद्धावनत देखे  जा सकते हैं ।संस्कृत साहित्य उन्हें भी काटने को दौड़ता है। कुछ स्वयंभू जनवादियों-प्रगतिशीलों को उसमें 'दक्षिणपंथ' की बू आती रहती है। केवल कबीर की मजहबी आलोचनाओं  वाले  संदर्भ में वे चकरघिन्नी हो रहें  हैं।संस्कृत साहित्य में मोजूद क्रांतिकारी तत्वों तक पहुँच पाना  जिनके वश  की बात नहीं वे अपनी वैचारिक प्रगतिशीलता के लिए केवल अंग्रेजी ,उर्दू और  क्षेत्रीय भाषाओं पर निर्भर हैं। कबीर की तरह उन्हें भी संस्कृत साहित्य' के अंगूर खट्टे हैं।

                बचपन में कभी गांव वालों की भजन मण्डली के मुँह  से कबीर के भजन या साखियाँ  सुनी होंगीं।  वे आज भी याद हैं। अनायास ही याद हो जाने वाली यह कबीर वाणी तब अंतराक्षरी के बहुत  काम आया करती थीं। हिंदी भाषा ज्ञान प्रबोधन में न केवल  कबीर  बल्कि तुलसी ,मीरा सूरदास  , रहीम   , रसखान  , पद्माकर  , भूषण जगनिक  इत्यादि के लोक साहित्य का भी  विशेष  महत्व  रहा है । राजनैतिक -सामाजिक विचार -सिद्धांत के रूप में ये सभी संत कवि और खुद कबीर साहब  भी चाणक्य या वाल्मीकि के घुटनों तक भी नहीं आते।महर्षि -  वाल्मीकि ,अष्टावक्र ,वेदव्यास ,भृगु या वशिष्ठ  जैसे संस्कृत साहित्य रचयिता तो अपने -अपने दौर के क्रूर शासकों की बारह बजा कर, साहित्य सृजन कर गए।तुलसी ,रहीम ,भूषण और बिहारी ने भी ऐयास सामंतों-सुल्तानों  को उधेड़ा है।  किन्तु कबीर ने  क्या  किया ? वे  तो आजीवन  केवल अपने गुरु रामानंद  की महिमा का ही बखान करते रहे !उन्हें इल्तुतमिश,या तुगलकशाह के अत्याचारों पर कुछ भी  कहना गवारा नहीं हुआ।  केवल  गुरु की खुशामद करो :-

                गुरु गोविन्द दोनों खड़े ,काके लागूं पायँ।

                बलिहारी गुरु आपकी ,गोविंद दियो मिलाय।।

               गुरु बड़े गोविन्द ते ,मन में देख विचार।

               हरी सुमरे सो  है , गुरु सुमरे सो पार।।

              सब धरती कागज  करूँ ,लेखनि  सब  वन राय।

   वैसे भी इस गुरु भक्ति में कोई बुराई नहीं। यह गुरुभक्ति  तो दुनिया में  सभी  विचारधाराओं और मजहबों में समान रूप से को पसंद की गयी  है। संस्कृत वांग्मय में तो 'गुरु; ब्रह्मा ,गुरु : विष्णु :' का ही बोलवाला है  वैष्णव हिन्दुओं के तो सोलह संस्कार ही गुरु  भक्ति से लबालब हैं । लेकिन फर्क ये हैं कि संस्कृत वांग्मय या दर्शन जहाँ गुरु वंदना करता है वहीँ उसमें यह उदारता भी है कि -


   "एकम सद विप्रा बहुधा  वदन्ति "


अर्थात जो वैष्णव या सनातन सिद्धांतों को माने उसकी जय हो ! उसके गुरु की जय  हो ! और जो इन्हे  कोसता  फिरे या गाली दे  या  संस्कृत वांग्मय को बकवाश कहे ,उसकी  भी जय हो  ! क्योंकि उसका 'सत' भी किसी और के सत  से कमतर नहीं है। कबीर की गुरु भक्ति  किसी नए -नए मुसलमान जैसी है जो घनी-घनी नमाज पढ़कर सावित करता है कि  वह  सच्चा मुसलमान  है ! जबकि असल मुसलमान को केवल अपने अल्लाह या खुदा से वास्ता रहता है ,उसे रोजा - नमाज के सांसारिक दिखावे की चाहत नहीं बल्कि अपने ईमान की फ़िक्र रहती है।

अपने वैष्णवी गुरु रामानंद को भगवान से बड़ा बताकर कबीर जिंदगी भर अपने गुरु के वैष्णवी -सनातन  मतवाद का  ही खंडन करते रहे। जिस गुरु के लिए खुद कबीर ने ही लिखा है :-

             सात समुद्र की मसि करूँ ,गुरु गुन  लिखा न जाय। 


 संत कबीर मानवमात्र  का  शोषण करने वालों की आलोचना या निंदा से तो दूर हैं.  लेकिन उन्हें किसी तरह की राजनीति,आर्थिक नीति ,लोकरीति या आदर्शवाद का  कोई इल्म नहीं था।  उन्हें बाणभट्ट ,अश्वघोष या नागार्जुन  तो क्या  भर्तृहरि भी सुनने में नहीं आये होंगे।   भर्तृहरि के अकेले वैराग्य शतक में इतना  कुछ है जो कबीर  ने साखी -सबद -रमैनी  में पिरोया है। भर्तृहरि का श्रंगार  शतक और नीतिशतक तो कबीर क्या जानते होंगे ? चूँकि संस्कृत भाषा ज्ञान और उसके व्याकरण में तो कबीर खुद ही वेचारे पूरे बछिया के ताऊ थे , जरा उन्ही के शब्दों पर गौर फरमाएं :-

''मसि कागद छुओ नहीं ,कलम गहो नहीं हाथ ''

फिर किस हैसियत से उन्होंने तमाम वेद,पुराण और संस्कृत साहित्य की खिल्ली उड़ाई है ? वेशक  इस आलेख का लेखक भी संस्कृत व्याकरण या संस्कृत वांगमय का धुरंधर विद्वान नहीं है। किन्तु यथासम्भव उपलब्ध अनुवादों और टीकाओं से - राधाकृष्णन,जे कृष्ण मूर्ती  व् महर्षि अरविन्द के हिंदी अनुवादों के अध्यन -पठन से  भारतीय ज्ञानकोष  और संस्कृत वांग्मय की गहराई का कुछ तो अनुभव किए ही जा सकता है। जिसके  समक्ष न केबल कबीर बल्कि सन्सार के अधिकांस भाववादी लेखक कवि  सभी बौने नजर  आते हैं ! फिर सवाल यही उठता है कि  कबीर जैसे लोग बार-बार इस सनातन साहित्य को ही निशाना क्यों बनाते रहे ?
                   
वेशक कबीर की अनगढ़ उलटवाँसियां भी हिंदी  भाषा ज्ञान में हमें निष्णांत बनातीं हैं । इस किस्म की भाषायी समझ और व्यवहारिक ज्ञान के लिए हिंदी क्षेत्र के अधिकांस संत कवियों की वाणी की तरह ही संत कबीर  के अवदान को  भी सार्थक माना जा सकता  है। शायद  इसीलिये  भारतीय 'संत काव्य धारा' में कबीर  का बहुमान सर्वत्र सर्वकालिक है। सचेत जन -मानस की नजर  में और खास तौर  से हिन्दी साहित्य मर्मज्ञों की नजर में  भी  'संत कबीर '  का स्थान किसी चक्रवर्ती सम्राट से भी ऊँचा है। मेरी नजर में  'संत कबीर' का कृतित्व व रचना धर्मिता उनके समकालीनों के बरक्स कदाचित प्रगतिशील ही  रहा है। किन्तु कबीर के समग्र अवदान में उनके  राजनैतिक,सामाजिक व आर्थिक सवालों पर  विमर्श की  अज्ञानता या चुप्पी निहायत ही अखरने वाली  प्रतीत होती है। कबीर यदि केवल ईश्वर भक्ति तक सीमित रहते तो भी कोई आपत्ति नहीं थी किन्तु वे तो 'बड़े' बनने चले थे और समाज को पाखंड से उबारने ,धर्मों को सुधारने चले थे तब सवाल उठता  है कि  वे खुद ही एक ठौ नया मजहबी पंथ या ठिया क्यों बना गए ? जो  हिन्दू-मुस्लिम मजहबों की सिर्फ बुराईयाँ ही गिनाया करता है।

वैसे तो मुख्यधारा के तमाम भारतीय चिंतकों ,दार्शनिकों व  बौद्धिकों ,भाववादी -आस्तिक संतों-कवियों ने ईश्वरीय शक्ति को महिमामंडित  करने के फेर में एक निर्मम असत्य का जमकर इस्तेमाल  किया है। वे इस  'मानव जीवन' को तथा  इस संसार को ,माया,प्रपंच ,स्वप्न  बताते रहे हैं। जबकि इसी मनुष्य जीवन को पाकर उन्होंने  वह सब लिखा जो आलोच्य है। बार-बार अनेक बार सदियों से ईश्वर भक्तों ने वही झूंठ दुहराया।  जो अब सत्य ही मान लिया गया है।  दुर्भाग्य से संत कबीर ने भी इस संसार को माया ,प्रपंच और निर्मोही दुखद स्वप्न मात्र मान लिया।  वे ओरों से कुछ हटकर अपनी सोच के आधार पर उसी 'मनुवादी' -सनातनवादी परम्परा को  ही पोषित करते रहे। हालाँकि  उनकी सोच में गुरु ब्रह्म से बड़ा हो गया। इसी प्रकार सबको हेय  बताकर -गरयाकर  कबीर साहब खुद ही  हासिये पर चले गये।

जबकि उनके ही समकालीन यूनानी दार्शनिक तब  लिख रहे थे की  "शासक को दार्शनिक होना चाहिए  अथवा दार्शनिक को ही शासक  बनाया जाना चाहिए "। जब फ़्रांस और यूरोप में गैरीबाल्डी ,सेक्सपियर ,रूसो ,वाल्तेयर  मानवता समानता ,प्रजातंत्र और आजादी जैसे शब्दों को आकार  दे रहे थे ,तब  गुलाम और खंड-खंड  बिखरे हुए भारत के तमाम दार्शनिक और कवि कवियत्रियाँ  इकतारा लेकर अपनी भक्ति रचनाएं गाते हुए गली-गली भीख मांग रहे थे।  कोई  'हरे रामा ,हरे कृष्ण ,रामा -रामा हरे -हरे '  गाते हुए सड़कों पर नाच रहा था। कोई गाये जा रही थी-'मेरो तो गिरधर गोपाल ,दूसरो न कोई '! इन हालात में यदि कोई उम्मीद की किरण  थे तो वे कबीर ही थे। किन्तु  उन्होंने  भी निराश ही किया है। हालाँकि  एक  काम  कबीर ने बेहतर किया कि  जो कुछ देखा -सुना  -जाना  उसे लोक भाषा अर्थात तत्कालीन 'हिंदवी'  खड़ी बोली में अभिव्यक्त कर दिया। जहाँ तक विषय वस्तु  अथवा कंटेंट का प्रश्न है तो कबीर ने कुछ भी नया नहीं कहा।

 माया ,जीव ,ब्रह्म ,गुरु ,पांच तत्व,तीन गुण ,योग ,ध्यान ,नाड़ी तंत्र ,अष्टकमल और  राम इत्यादि  जितने भी शब्दों से कबीर ने  अपने  रचना  संसार -पद ,सबद ,साखियों ,भजनों और उलटवाँसियों  का जो भी सृजन किया है ,उनमें नया  कुछ नहीं है। जो कुछ  भी  कबीर ने कहा है ,वह भारतीय सनातन वांग्मय का लोकभाषयीकरण मात्र है। इसमें नया तब होता जब कबीर ततकालीन हमलावरों ,निरंकुश शासकों  की धज्जियां उड़ाते। मानवीय मूल्यों का संधान करते। जैसा कि ईसा मसीह ने किया ! इमाम हुसेन ने किया ! गैलीलियो ने किया ! गैरी बाल्दी या नीत्से  ने किया। अलबरूनी,सुकरात अरस्तु को उद्धृत करने  की जरुरत  नहीं ,बल्कि कबीर  के  पूर्ववर्ती  तमाम भारतीय मनीषी -  चाणक्य ,भर्तृहरि ,कालिदास ,भोज  और पातंजलि जैसे हजारों हैं प्रमाण हैं जो  ईश्वरवादी होते हुए भी इस संसार को  सुंदर बनाने  लायक लिखते  रहे हैं। जब  भारत  की दुर्दशा पर ,गरीबों की दुर्दशा पर कबीर  ने एक  भी   शब्द नहीं लिखा  तो उनका रचना संसार अद्व्तीय किस मायने में हुआ ?

              टीवी पर  इन दिनों एक विज्ञापन दिखाया जाता है।  कि  ''टेड़ा है पर मेरा है'',इसी तरह ये  धर्मभीरु -  पुरातन पंथी  परंपरावादि- अंधश्रद्धालु भी निपट अवैज्ञानिकता से ओतप्रोत  होते  हुए भी अपने ही हैं । इस दौर में  अधिकांस वरिष्ठजनों  को अपने जीवन की सांध्य वेला में भगवद गीता ,रामायण जैसे धर्मग्रंथों में ही श्रद्धा संचरित हो रही है। उन्हें भाववादी संत कवि -सूर,तुलसी ,मीरा तथा कबीर जैसे भक्त कवि व  धर्मोपदेशक  अभी भी तारणहार लगते हैं।इनमें से  किसी को भी अपनी निजी  जीवन से ,परिवार से ,समाज से , देश से और दुनिया से ढेरों शिकायतें हो सकती हैं। कोई भी इस  मौजूदा दौर की  अध:पतित व्यवस्था से खिन्न हो सकता है। किन्तु ये सभी अपनी इस नाराजी को प्रकट नहीं करेंगे। किसी किस्म के जन -आंदोलन से दूर ही रहेंगे। ये आधुनिक बुजुर्ग  कबीर की इस सीख के हवनकुंड   में स्वाहा  करते पाय जाएंगे   :-

                कबिरा  नौबत अपनी ,दिन दस लेउ बजाय।

               ये पुर  पाटन ये गली ,बहुरि न देखब आय।।

                             या

                  ''आये हैं सो जायेंगे , राजा रैंक फ़कीर।

                   एक सिंहासन  चढ़ि चले ,एक बंधे जंजीर।।"


         इस तरह की कपोल कल्पित ,अवैज्ञानिक  सैद्धांतकी से  न केवल भारतीय -हिन्दू धर्मावलम्बियों को ,न केवल कबीर जैसे संतों के अनुयायियों को ,बल्कि दुनिया के तमाम मजहबी लोगों को बहुत शकुन व क्षणिक  शांति  मिलती है। तमाम  निठ्ठल्ले , दकियानूसी  एवं अकर्मण्य परजीवी भी अपने शेष  जीवन  की नैया को इसी  तरह की  भाववादी -कोरी काल्पनिक आनंद सागर की लहरों के हवाले करते हुए मिल जायंगे।अधिकांस अबोध भाववादी ,आस्तिक जन  तथाकथित सद्गति,शांति,मुक्ति व  परमधाम या वैकुण्ठधाम की अंतिम  यात्रा के प्रबंधन में जुटे हुए देखे गए । कहने -सुनने के लिए तो कबीरमत अनुयायी  बड़े 'साफगोई' वाले होंगे, किन्तु कुछ  कबीरपंथियों को , उनके अंधश्रद्धालुओं को  और  समर्थकों को  धन दौलत जमा करने की  अंधश्रद्धा के महागर्त में  गोते  लगाते हुए देखा गया । जिस तरह  बलातकारी  कथावाचक आसाराम व  उसका पुत्र  नारायण साईं धर्म का बाजारीकरण और कलंकीकरण  करने के लिए कुख्यात हो रहे हैं भक्तों को राह दिखाते-दिखाते खुद जेल में सड  रहे हैं  ,उसी तरह हरियाणा,पंजाब ,मथुरा ,बनारस इत्यादि जगहों पर  'जयगुरुदेव' की तर्ज पर  कबीर  के आधुनिक शिष्यों के भी कई 'डेरे' नेकनामियों से बजबजा रहे हैं। कबीर भले ही कहते रहें :-

              "साधु संगत  परिहरे ,करे विषय को संग।

               कूप खनी  जल  बावरे ,त्याग दिया जल गॅंग।।


 जब  व्यक्ति ,समाज या वस्तु  के गुण -अवगुण चरित्र -चित्रण में  कबीर ही उलझे  रहेंगे तो बेचारे कबीर पंथी या कबीर प्रशसंक कैसे उबरेंगे ?और यदि बोल-बचन में वैज्ञानिक सैंद्धांतकी का अभाव  है तो कबीर के यह कहने का  क्या तातपर्य है कि ? ;-

                   "हस्ती चढ़िए ज्ञान की ,  सहज दुलीचा डार।

                    श्वान रूप सन्सार है ,भूँकन  दे  झकमार। ।"

                     वेशक  भाववादी संत कवियों के पठन-पाठन और श्रवण से एक क्षणिक  काल्पनिक आनंद की अनुभूति तो अवश्य  हुआ करती  है। लेकिन इन  भाववादी -पारलौकिक आस्था में निमग्न  गुरु-घण्टालों की कोरी पर-उपदेश  वाली  'ज्ञानबाँटु'छद्म  प्रवृत्ति  केवल  शोषण करने वाले शासकवर्ग का एक आध्यात्मिक हथकंडा ही सिद्ध होती रही है। चूँकि  भौतिकतावादी -विज्ञानवादी नजरिया  सम्पूर्ण मानवतावादी  हुआ करता है। इसीलिये कोई भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कबीर जैसे छिद्रान्वेषियों और आत्मनिंदकों की तरह यह कदापि पसंद नहीं करेगा कि  केवल अपने 'कल्याण'की सोच रखने में ही कल्याण है। कबीर  या अन्य संत कवि वेशक अपने दौर के 'कुशल चितेरे' रहे होंगे। किन्तु इस तरह के  दर्शन  और विचार से  न तो व्यक्ति का ,न समाज  का और न  देश का  कल्याण संभव है और न ही किसी  तरह की कोई जनक्रांति संभव है। क्या यह दुखद बिडंबना नहीं है कि जिस देश में गीता ,रामायण ,कुरआन ,बाइबिल ,गुरुग्रंथ साहिब और जेनदअवेस्ता जैसे  परम पवित्र ग्रन्थ विद्यमान होने के वावजूद -राम,कृष्ण ,गौतम ,महावीर ,नानक ,हजरत  निजामुद्दीन ,कबीर जैसे 'अवतारी 'महात्माओं का आशीर्वाद और पुनीत ज्ञान  प्राप्त होने के वावजूद - स्वाधीनता - आजादी  के मायने तो  भारत को  'विलायती संविधान' या विलायती  भौतिकवादी शिक्षण-प्रशिक्षण से ही ज्ञात हुए हैं। पूरी की पूरी भारतीय ज्ञान परम्परा ,धार्मिक साहित्य  ,भक्ति काव्य , अवतारवाद और आध्यात्मिक साहित्य तो   गुलामी और शर्मिंदगी का पोषक  ही रहा है। कबीर भी  इस राष्ट्रीय विमर्श में कोरे ही रहे। जबकि वे अपने आपको  पाखंडी पंडितों से बेहतर मानते थे।

            "पोथी  पढ़ि -पढ़ि जग मुआ ,पंडित  हुआ न कोय।"

कबीर के   ढाई आखर [ढाई अक्षर] से  देश ,समाज ,या शोषण -उत्पीड़न में क्या बदलाव आया ? केवल व्याज- अलंकार में अपनी आत्म प्रसंशा करने  या उस दौर के समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के बखान करने से कोई संत -कबीर तो बन सकता है किन्तु  वाल्तेयर,गैरी वाल्डे ,प्लेटो,अरस्तु ,चाणक्य ,अष्टावक्र या रूसो नहीं बन सकता  !

               केवल साहित्यिक विमर्श के नजरिये से या विशुद्ध भाववादी  नजरिये से  कबीर को समझने के बहाने  मुझे जो अनुभव हुआ वह यह है कि  कबीरवाणी तब भी न केवल कबीर के  लिए,न  केवल तमाम मध्ययुगीन  'संत समाज'  के लिए बल्कि उनके अंधश्रद्धालुओं की सेहत के लिए ही  अनुकूल नहीं रही है। लेकिन  जिनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक और  यथार्थवादी  है, जो हिंदी साहित्य ही नहीं बल्कि वैश्विक साहित्य के भी  अध्येता होंगे ,जिन्हे 'भारत राष्ट्र ' के निर्माण का इतिहास मालूम होगा ,उन्हें कबीर जैसे निर्गुणी - प्रेमाश्रयी  ज्ञानाश्रयी  -मध्ययुगीन  भक्त कवियों  से  घोर निराशा ही मिलेगी।  कबीर पर  प्रगतिशीलता का ठप्पा सिर्फ इसलिए नहीं लगा देना  चाहिए कि  उन्होंने  हिन्दू-मुस्लिम सभी के  पाखंड - अंध आस्थाओं पर समान रूप से चोट की थी  ।  कबीर की नजर में यदि हिन्दू -मुस्लिम का भेद उनके समकालीन दौर के शोषक-शासक के द्वैत में ही देखा जाए, तो उनके समय का हिन्दू व अन्य गैर मुस्लिम समाज  भी आर्थिक,राजनैतिक और धार्मिक  गुलामी की निर्मम गिरफ्त में था। तब हिन्दुओं याने - काफिरों  की  स्थिति  दयनीय  हुआ  करती थी। तब  देशज  कौमें  मारी-मारी फिर रहीं थीं। चिस्तियों,शेखों,ओलियाओं व सूफियों  की  पौबारह थी। वे  दिल्ली सुलतान भी जय-जैकार किया करते थे। तब  मजहबी इस्लामिक धर्मगुरुओं का बिकट बोलवाला था।

    यदि किसी सुलतान से कोई 'फ़कीर '  नाराज हो गया तो वह षड्यंत्रों से सुलतान को भी मरवाने की क्षमता रखता था। तभी तो शेख सलीम चिस्ती ने वो कर दिखाया जो उन्होंने जलालुद्दीन ख़िलजी से कहा था :- हनोज दिल्ली दूरस्थ ' वेचारा सुलतान वाकई जीवित दिल्ली नहीं पहुँच पाया। धोखेबाज  भतीजे अलाउद्दीन और उसके धूर्त साथियों ने  इसे सूफी संतों  का चमत्कार बताकर अपने मजहब का जमकर प्रचार -प्रसार किया गया। पिछड़े -दलित उपेक्षित हिन्दुओं याने   [ 'काफिरों' ]को साम-दाम-दंड -भेद आजमाकर  मुसलमान बनाया गया। इन्ही हालातों का शिकार मालिक काफूर था। इसी वजह से  तत्कालीन अन्त्यज,द्विजेतर और शिल्पी समाज भी धर्मांतरण के लिए मजबूर हुआ। ततकालीन  सवर्ण  हिन्दू समाज और खास  तौर  से विधवाओं की हालात और बुरी  थी ।  मजदूर ,शिल्पकार ,रनगरेज ,बुनकर ,दुनिया ,तेली -तम्बोली -जुलाहे इत्यादि पिछड़े और कमजोर वर्ग के लोगों को  जब सूफियों के फंदे में नहीं आये ,जब वे इस्लाम के दीनी लालच में नहीं  आये तो  उन्हें जबरन 'अहिन्दू' बना दिया गया। इस प्रकार का यह सनातन से शोषित-पीड़ित  'त्रिशंकु' समाज न तो हिन्दू ही  रह सका  और न  ही ठीक से मुसलमान ही बन सका ।  जो हिन्दू मुसलमानों के साथ उठ-बैठ गए तो हिंदुत्व चला गया। उधर शेख सैयद मुगल पठान  को  भी आसमानी हुक्म नहीं आया कि  इन पिछड़े -दलित-दमित धर्मान्तरित 'नव मुसलमानों ' से रोटी -बेटी का व्यवहार करें !

              चूँकि  कबीर के पालनहार  अभिभावक -नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी नीमा  भी उस दौर की इसी मजहबी बिडंबना के शिकार हुए  थे।  इनके पूर्वज  भी पिछड़े -दलित  हिन्दू  हुआ करते थे । उस दौर में तुर्की , उजवेग और अरब के मुसलमान  सरदारों में ततकालीन 'खलीफा' के प्रति वरीयता की होड़ मची  हुई थी।  इसके लिए यह वेरोमीटर था कि  जितना  अधिक  काफिरों को धर्मान्तरित कराये या उन्हें मारे वो उतना ही बड़ा  'खलीफा' समर्थक माँना जाता था।  प्रकारानतर  से हिदुस्तान का दिल्ली सुलतान भी खलीफा ही नियुक्त करता था। वह  भारत का अत्यंत शर्मनाक और जहालत का दौर था।  वह हिन्दू मूर्ती भंजन और  बलात धर्म परिवर्तन का निर्मम दौर था। इसी दौर की पैदायश संत  कबीर थे। कबीर ने यह सब  देखा -भोगा -जाना होगा । इस दुरावस्था के प्रति कबीर ने कुछ नहीं कहा। यदि वे इस उत्पीड़न और व्यभिचारी राज्य सत्ता के प्रति  विद्रोह  करते तो  चाणक्य  बन सकते थे।  उस  दौर  में  इस्लाम के सभी  देशी-विदेशी  अनुयाइयों को हर किस्म  की सदाशयता और राज्याश्रय प्राप्त था। उन्हें किसी भी तरह का कोई जजिया कर  नहीं देना होता था। लकिन कबीर ने  तत्तकालीन  बर्बर इस्लामिक शासकों  के खिलाफ एक 'साखी' तो क्या एक शब्द भी  नहीं कहा। यह तथ्यगत है कि  गुलाम भारत में  न तो  कबीर , बल्कि अन्य  तमाम समकालीन या अर्वाचीन -  बाबा ,गुरु , योगी,संत ,पंडित ,पुजारी , भक्त-कवि या धर्मोपदेशक निरे निर्माल्य ही  साबित हुए हैं ।

  मानव सभ्यता के  जिस   दौर में  यूरोप के संत ,कवि 'स्वाधीनता' और समानता के गीत गए रच रहे, सच्चाई और न्याय के लिए सुकरात  जहर पी रहे  थे , विज्ञान की सच्चाई के लिए गैलीलियो तब गुलाम भारत के  ये संत महात्मा या तो  शोषित -पीड़ित  वर्ग को गुमराह करते रहे थे या फिर किसी किस्म के क्रांतिकारी बदलाव  के खिलाफ  रहे  हैं। यह भाववादी सोच का ही नतीजा है कि कबीर जैसे जन कवि और 'निर्भीक' संत ने  भी तत्कालीन  निरंकुश शासकों  के अत्याचारों की अनदेखी की है। जबकि दूसरी ओर कबीर के ही दौर में  इस्लामिक धर्मगुरुओं -सूफी संतों के दरवार में सुलतान भी  नंगे  पैरों जाकर घटने टेकते थे।

                               वेशक रेनेशाकालीन  यूरोपीय समाजसुधारक ,क्रूर सामंती शासकों की प्रभुता के  संहारक  -जन-गण उद्धारक  कवि -साहित्य कार  अवश्य ही स्तुत्य रहे  हैं। किन्तु मुझे पक्का यकीन है कि  न केवल कबीर बल्कि मध्ययुगीन अन्य तमाम  भारतीय  साधु-संत -महात्मा -भक्त कवि उस  दौर के सामंती  शासकों के अत्याचारों की अनदेखी करते रहे। दास प्रथा  और  अमानवीय शोषण को 'निजकृत -कर्म -भोग सब भ्राता ' बताते रहे।  वे सांसारिक मायामोह छोड़कर भीख मांगते रहे और  ईश्वर भक्ति  की महिमा बखानते रहे। कबीर  की नीतिपरक उपदेशात्मक काव्य रचना के केंद्र में तो केवल ब्रह्म,गुरु और 'मुक्ति' शांति तथा  'निर्वाण का ही बोलवाला  है । ऐंसे स्वान्तः सुखाय वाले आस्तिक  व अंधश्रद्धालु भक्त कवि  इस उत्तरआधुनिक और आजाद भारत में  कन्फ्यूज्ड  क्यों नहीं माने जा सकते ?  आज के इस वैश्वीकरण -उदारीकरण और बाजारीकरण के दौर में जिस  तरह साम्प्रदायिक और मजहबी धर्मगुरु  कन्फ्यूज्ड हैं। किंचित उसी तरह कबीर जैसे लोग भी अंध गुरु भक्ति   के आफसेसिव -कम्पलसेसिव -डिसऑडर से भी पीड़ित रहे  हैं। इस तरह के  कृतित्व या व्यक्तित्व से देश ,समाज या मानवता का कोई भी हित  नहीं सधने वाला। बल्कि जहाँ-जहाँ इनका डेरा है ,वहाँ -वहाँ  पाखंड  , छल-मृगमरीचिका और अकर्मण्यता का  शैतानी परम्परा व्याप्त  है।  चूँकि कबीर का रचना सन्सार बहुत ज्यादा मिलावटी और विरोधा भाषी है  इसलिए कबीर की प्रामाणिक समालोचना के लिए मैंने किसी और साहित्यकार या इतिहासकार को प्रमाण न मानकर खुद कबीर  के  ही कुछ चुनिंदा  'शब्दबंध' प्रस्तुत किये हैं। वैसे भी पूरी की पूरी हाँडी  टटोलने की जरूरत  भी नहीं रही। कुछ चुनिंदा चावल के दाने ही पर्याप्त हैं पूरी हाँडी  को परखने के लिए ।

कबीर ने अपने आपको बहुत महिमावान बताया है। जबकि  उन्होंने किसी गंजेड़ी-भंगेड़ी की तरह बाकी सभी की  घोर निंदा की है।  जब  वे कहते हैं  :- "सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी ,ओढ़ कें  मेली  कीन्ही चदरिया ''दास कबीर जतन से ओढ़ी , ज्यों की त्यों धर  दीनी चदरिया"  तो मेरी नजर में बहुत बौने नजर आते हैं !  सावधानी से या  जतन से अपना ' भव् '  संवारना या निष्पाप रहना  क्या सिर्फ कबीर को ही आता है ?  इसके बरक्स गोस्वामी  तुलसीदास का यह दोहा पढ़िए :-


    जड़ चेतन गुणदोषमय ,विश्व कीन्ह करतार।

    संत हंस गुन  गहहिं सब ,परिहरि  वारि विकार।।


गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि  "विधाता ने सम्पूर्ण सृष्टि को अच्छाई  और बुराई के योग से मिलकर रचा है।  जिस प्रकार एक हंस  पानी मिले हुए दूध में से  केवल दूधरूपी अच्छाई  ग्रहण करता  है और पानी रुपी विकार को छोड़ देता है ,उसी प्रकार संत [बेहतरीन इंसान] को  चाहिए कि  इस बुराइओं और अच्छाइयों की मिलावट भरे संसार में से केवल अच्छाइयों का ही सेवन  करे।

कितनी उदारता और वैज्ञानिकता है तुलसी की इस सोच में ? लेकिन कबीर क्या कहते हैं ?

'संतो देखो जग बौराना '   अर्थात कबीर की नजर में  तो पूरा संसार ही बौराया हुआ है। अकेले कबीर ही हैं जो
-अपनी चादर  सफ़ेद रखकर स्वर्ग सिधारे। हथकरघे पर कपड़ा बुनने की जगह  कबीर ने ईसा मसीह को भेड़ें चराते हुए या क्रॉस पर चढ़ते हुए नहीं सुना होगा। वर्ना  वे कहते हाँ  एक और था जिसने अपनी चादर मैली नहीं होने दी ! उन्होंने जौहरवती ललनाओं के बारे में नहीं सूना होगा ,जिन्होंने उन्ही के दौर में अलाउद्दीन ख़िलजी जैसे कामुक सुलतान की अय्यासी का साधन बनने के बजाय आग में कूंदकर अपनी चादर मैली नहीं होने दी।
कबीर ने अपने दौर के या अपने से पहले के किसी भी साहित्यकार या बहकत कवि को श्रेय नहीं दिया। जबकि  उनके पास जो भी अटपट -अनगढ़  ज्ञान था वो सब का सब 'नाथ पंथी ' साधु-संतो और काशी के ततकालीन बौद्धिक समाज का ही  अवदान था। जिसके लिए कबीर ने अपने गुरु को 'गोविन्द' से भी बड़ा बताया है वही ज्ञान कबीर के  'अपह्रत' गुरु स्वामी रामानंद को उसी तत्कालीन  'विप्र समाज' व अर्वाचीन 'संत साहित्य' से ही  प्राप्य  हुआ था ,जिसे कबीर आजीवन गरियाते रहे।

झीनी -झीनी  बीनी चदरिया …  आठ कमल दस चरखा … पांच  तत्व .......  गुन  तीन .......   चदरिया !

यह सब भारत के हिन्दू हजारों साल से मानते आ रहे हैं।  अष्टाबक्र ने जनक के दरबार में यही सब कहा ! नाचिकेताोपाख्यान  में भी ब्रह्म ज्ञान नाम से यही सब भरा पड़ा है ! वेद व्यास ने या उनके बेटे शुकदेव ने कृष्ण के मुँह  से यही सब कहलवाकर उन्हें 'माखनचोर' या रणछोड़दास से 'महायोगी श्रीकृष्ण' बना दिया।  यही ज्ञान  कबीर कालीन सूफी संतों में भी  समाया हुआ था। इसी ज्ञान व  दरशन को उन्नत वैज्ञानिक- प्रगतिशील बनाकर यूरोप  के दार्शनिकों और कवियों -साहित्यकारों ने  'रेनेशा' का आह्वान किया ।  कबीर तो केवल  अपनी चादर को ही पवित्र बताते रहे ,जबकि उपनिषद और वेद चीख-चीखकर कह रहे  हैं;-

अयं  निज : परोवेति ,गणना लघु चेतसाम्।

उदार  चरितानं तू,  वसुधैव   कुटुंबकम।

 ये मेरी  साफ़ सुथरी चादर है  ,ये उसकी मैली चादर है ,ये देवता है वो राक्षस है ,ये अपना है ,वो पराया है ,इस मानसिकता को वैदिक वांग्मय ने तुच्छ कहा है। चूँकि कबीर ने वेदों को पढ़ना तो दूर देखा भी नहीं था इसलिए वे अपनी तुनुक में ये कह बैठे ;-संतो देखो जग बौराना !


                    यह बहुत सुवोध और सुगम सिद्धांत है कि  'जो खुद कन्फ्यूज्ड  या भर्मित  है  -वह ओरों को क्या राह दिखा सकता है ? कबीर ने किसी को कोई नयी राह  या युक्ति नहीं सुझाई है । दरसल तत्तकालीन  समाज के मूल्यों,कुरीतियों,उलटवांशियों,मुहावरों और 'श्रुत' संवाद के माध्यम से प्राप्त  धर्मसूत्रों  के 'ओघड़' ज्ञान को ज्यों-का त्यों कबीर ने अपने-ताने-बाने के साथ ताल- मेल -मिलाकर उनका अपना  रचना संसार प्रस्तुत किया  है। इसमें कोई शक नहीं कि कबीर  खुद ही अंत तक 'उरझे 'रहे।दरसल   कबीर खुद कह गए हैं कि  वे शुरू से अंत तक 'उरझे' ही रहे। उरझे रहे याने उलझे रहे। उरझा याने जो मानसिक रूप से उलझा हुआ हो !  आज की भाषा में कहने तो - जिसका कांसेप्ट क्लियर  न हो ! ऐंसे थे 'संत कबीर !' उन्ही के शब्दों में-उन्ही की तथाकथित पावन वाणी पर गौर करें :-

              कहत सुनत सब दिन गए ,उरझि न सुरझा मन्न।

              कहें  कबीर  चेता  नहीं ,  अजहुँ  पहला   दिन्न।।


 अर्थात अपने अंतिम प्रयाण तक भी कबीर 'उरझे' ही रहे। तातपर्य स्पष्ट है कि जो  खुद ही  उलझा हो वो ओरों को क्या ख़ाक सुलझाएगा ? दूसरों को  क्या राह दिखायेगा ? कबीर ने चूँकि उर्दू या फारसी का अध्यन नहीं किया था, इसलिए वे इस्लाम के सिद्धांतों और उसके तमाम लिखित मजहबी साहित्य के गूढ़ार्थ से वंचित रहे, इसलिए बहुत  ही कम या सीमित मात्रा में उन्होंने इस्लामिक कल्चर या सिद्धांतों की दबी जुबान से आलोचना की है। शायद ही कबीर ने कहीं भी कुरआन की किसी एक भी आयत का 'उल्था' या उदाहरण प्रस्तुत किया हो ! जबकि दूसरी ओर  कबीर के दोहे -साखियाँ  और भजनों में गीता,रामायण और 'नाथ साहित्य' के पूरे -पूरे भावों को यथावत पेश किया गया है। वेशक कबीर ने  उनका केवल  'लोक भाषानुकरण अवश्य किया है।   



  वेशक इन भक्त कवियों की कृतियों -रचनाओं में  -गुरु महिमा ,ईश्वर भक्ति , साधु चरित्र -परउपदेश तो कूट-कूट कर भरे हैं। हालाँकि  कबीर  जैसे निर्भीक और समदृष्टि वाले संत कवियों ने  ततकालीन सामंती समाज में व्याप्त कुरीतियों और नीतिगत अवमूल्य्न की  खूब धुनाई की है, किन्तु उनकी तमाम  कृतियों और  उपलब्ध साहित्य में मध्ययुगीन यूरोपियन कवियों या  पश्चिम के विचारकों-लेखकों  की तरह मानवता , स्वाधीनता  ,समानता ,बंधुता का घोर अभाव है। कबीर निश्चय ही  तत्तकालीन भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय -जनकवि हो सकते थे वशर्ते वे  बर्बर विदेशी आक्रमणकारियों -खिल्जियों ,तुगलकों या सुलतानों के आकमणों  का प्रतिवाद करते। इसके  विपरीत कबीर ने राज्य सत्ता  प्रतिष्ठान को मुक्ति के मार्ग का बाधक तो बताया है किन्तु उसके साथ ही आम जनता को उन्होंने  केवल  'दास -प्रवृत्ति'  का ही उपदेश  दिया  है  ।

कबीर कहते हैं :-

                         यह मन ताको  दीजिये , साँचा  सेवक  होय।

                          सिर  ऊपर  आरा सहे , तउ  न दूजा होय।।

ठीक इसी  तरह गोस्वामी तुलसीदास भी मनुष्य मात्र को केवल 'दास' ही बना  डालना चाहते थे :-

'      सेवक वो जो करे सेवकाई '

 ततकालीन दलित-शोषित -पीड़ित समाज को  अन्यायी शासकों से  संघर्ष करने के बजाय  ईश्वर की शरण में जाना  ही अंतिम विकल्प बताया है।  कालांतर में इस तरह के साहित्य सृजन ने या 'भक्तिकाव्य'  से भारतीय स्वाधीनता संग्राम में शायद ही कोई  मदद मिली हो ! वेशक शिवाजी  के गुरु 'समर्थ रामदास' और उनसे भी एक   हजार वर्ष पूर्व के आदि शंकराचार्य ने ना केवल  उनके अपने दौर में धार्मिक ,सांस्कृतिक क्रान्ति की धारा  को  दिशा दी बल्कि उनके ही कुछ मूल्य बाद में  भारतीय समाज को सामंती और विदेशी दासता से मुक्ति के लिए प्रेरित भी  किया । किन्तु जब  विदेशी आक्रान्ताओं के सबसे भयानक हमले भारत पर हो रहे थे,जब देशी  - विदेशी सामंतों और लुटेरों ने भारत की  निरीह जनता को  बुर्री तरह रौंदा ,जब पद्मनियाँ जौहर में जल रही थीं तब कबीर को हर  नारी

 "माया महा ठगनी हम जानी,केशव के कमला है सोहे ,शिव के भवन भवानी ,राजा के घर रानी "

जब  खंडित -दण्डित और कूपमण्डित भारत  की आवाम को विदेशियों से लड़ना चाहिए था ,तब कबीर केवल गहन गुफा में आनंदित हो रहे थे.वे अपने सिद्धांतो को  बाकी सभी के विचारों और सिद्धांतों को गरिया  रहे थे।


 "साधो गहन गुफा में अजिर झरे "  "गुरु मेरो बिजूका ,आखर दोई रखवारे '' 'राम' भरोसे जे रहे पर्वत पै  हरयाय '

 जब राजपाट ,धन दौलत ,देश -समाज सब माया ही है तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता कबीर को कि अलाउद्दीन ख़िलजी कितने निहत्ते  लोगों को मार रहा है। कितने काफ़िर मारे जा रहे थे कबीर ने कहीं क्यों नहीं लिखा। एक दोहा या साखी  तो ऐंसी  होती जो 'मैग्नाकार्टा' के मूल्यों से मेल खाती।

जहाँ तक कबीर के रचना संसार की महत्ता का विमर्श है तो -साखी  ,शबद ,रमैनी  के रचना कौशल में कबीर का इंतना योगदान तो  अवश्य है कि उन्होंने तमाम उस गूढ़ ज्ञान को ,जो केवल संस्कृत के  विद्वानों-पंडित या शाश्त्री  -पुरोहित   वर्ग तक ही सीमिते था ,उसे  'संत समाज' के सत्संग और गुरु शिष्य परम्परा के अवदान से कबीर ने लोकभाषा में अपने रचना कौशल से घर-घर मे  पहुंचा दिया।  चूँकि हिन्दू सनातन परम्परा

                  मुझे  मेरे दिवंगत पिता से जो  एक अद्भुत हुनर  उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ  इस प्रकार के विमर्श में पर्याप्त मदद मिली।  वह हुनर यह है की जब मेरा दाखिला  भी स्कूल में  नहीं हुआ था,उससे पहले ही मुझे न  केवल  कबीर  बल्कि सूरदास ,मीरा बाई ,तुलसीदास और रहीम 'डाबर जनम घुट्टी' की तरह पिला दिए गये थे। शहरों से दूर अपने पैतृक 'वनग्राम' में पिताजी रोज सुबह भोर का तारा उदित होने से पूर्व  ही तानपुरे का संधान करने लग जाते थे। वे अपने मधुर कंठ से  शास्त्रीय संगीत की स्वर लहरियों से वातावरण को काव्यमय बना देते थे। कबीर  पर उनकी विशेष श्रद्धा थी। कबीर के  भजन और  कुछ  साखियाँ  वे रोज  दुहराया करते थे। वे निरगुन भजन ,साखियाँ   मुझे भी स्कूल जाने की उम्र से पहले ही याद हो गयीं थीं।  ये विरासत सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि ढोर चराने वाले निरक्षर वरेदी -चरवाहे से लेकर बैलगाड़ियों पर जंगल से लकड़ियाँ  ढोने  वाले और अधिकांस गाँव वाले भी इस विधा में  मालामाल थे। इसके अलावा  लोकगीतों की तरह ही जब -तब मुहावरों की शक्ल में कबीर की उलट वाँसियां भी पिताजी की  बाणी से सुनने का भदेस आनंद ही कुछ जुदा था। बचपन मैं भी कबीर के  भजन या साखियों को मुखाग्र पेश करने में अपने पिता की  तरह माहिर हो चला था।वैसे भी उस दौर के गाँव में न बिजली थी ,न रेल ,न  फिल्म ,न क्रिकेट जैसे खेल । उस समय के गाँव में तो  किसी सभ्य व्यक्ति के लिए  कबीर , तुलसी ,रहीम  सूरदास जैसे संतों का ही सहारा था। वेशक कभी-कभार  ढोला -मारूं ,आल्हा व  विभिन्न   उत्सवों पर लोक गीत -सैरे भी  गाये  जाते थे।  हालाँकि  गाई  जाने वाली हर 'लोकरचना' तब उतनी सहज सुबोध  नहीं थी।  किन्तु फिर भी यह  तमाम सामग्री  उस अन्त्राक्षरी के काम तो आ ही जाया करती थी,जिसमें कि उस समय  मुझे महारत हासिल थी। कबीर विमर्श से यह बालसुलभ लगाव - मुझे हिंदी काव्यधारा की ओर सदैव आकर्षित करता रहा है। हिंदी साहित्य में जनवाद -धर्मनिपेक्षता  के मूल्यों और भारतीय संस्कृति की गंगा - जमुनी तहजीव की ओर ले जाने में  भी कबीर बाणी  की विशेष भूमिका रही है।

अब यह सर्वमान्य है कि  कबीर ईस्वीं संन -१३९८ को बनारस में जन्मे थे। उनकी मृत्यु १५१८ ईस्वीं को मगहर में  हुई थी। इस प्रकार कबीर सन्सार के उन  चंद अनोखे लोगों में से हैं  जिन्होंने तीन-तीन शताब्दियों के वसंत  देखे होंगे। जनश्रुति है कि  वे किसी विधवा ब्राह्मणी  के पुत्र थे। लोकलाज भय से उन्हें जन्मते ही एक सरोवर के किनारे रोता हुआ छोड़ दिया गया। कालांतर में अपने जन्म की इस बिडम्ब्नापूर्ण  दारुण व्यथा को कबीर ने खुद ही निम्नांकित मार्मिक शब्दों  में व्यक्त किया है -:

   कबीरा जब हम जन्मिए ,जग हँसिया हम रोय।

   ऐसी  करनी  कर चले ,आप  हँसे  जग  रोय।।


भावार्थ ;- कबीर कहते हैं जब मेरा जन्म हुआ तो अवैध -नाजायज मानकर सभी ने मेरी  पैदायश पर खूब  हँसी  उड़ाई। अब मैं  साखी -सबद -रमैनी सहित अपना सम्पूर्ण  कृतित्व  और समाज कल्याणकारी व्यक्तित्व उस  बुलंदी पर छोड़ कर- हँसते हुए जा रहा हूँ, जहाँ  मेरे जाने  [मरणोपरांत] के बाद  दुनिया मेरे लिए आँसू  बहाएगी।
     
                       कबीर के 'दर्शन' और चिंतन को समझने के लिए कबीर कालीन देश ,समाज व राज्य व्यवस्था का विहंगावलोकन भी  जरुरी है। कबीर के जन्म -मृत्यु के सौ सालाना समयांतराल में जो कुछ घटित हुआ और जो कुछ भी अतीत की मानव श्रृंखला से उन्हें प्राप्त हुआ वह कबीर  ने इनपुट के रूप में आत्मसात किया। कबीर ने जो कहा  जो बुना -गढ़ा और जो उन्होंने अभिव्यक्त किया वो उनका 'आउट पुट ' कहा जा सकता है।

 सम्पूर्ण  कबीर वांग्मय के सांगोपांग अध्यन  का सार यह है कि  वे प्रचलित  सभी  ततकालीन मजहबों/धर्मों के पाखंड से परे किसी आदर्शवादी 'परम सत्य के उपासक थे। उनके 'राम' भी ओरों से सर्वथा भिन्न थे। नास्तिक और विज्ञानवादी भी मानते हैं कि  कबीर के सिद्धांत और चिंतन में लोक-परलोक ,ईश्वर ,गुरु तथा साधु -संत की महिमा बखान के वावजूद  एक परम सत्य यह भी था कि कबीर ने जल में रहकर मगर को चिढाया।


                        श्रीराम तिवारी 

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

दम्भ -पाखंड की जद में क्यों आ गए हम ?



  निकले  थे  घर से जिसकी  बारात  लेकर ,  उसी के जनाजे में  क्यों आ गए हम ?

  चढ़े  थे  शिखर पर  जो  विश्वास् लेकर ,   निराशा  की खाई में क्यों आ गिरे हम ?


  गाज  जो गिराते हैं नाजुक  दरख्तों पै , उन्ही  की  पनाहों  में   क्यों   आ गए हम ?

   फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , उस संगदिल  महफ़िल  में क्यों आ गए हम ?


    खींचते है  चीर गंगा जमुनी तहजीव का , ऐंसे कौरवों के शासन में क्यों आ गए हम ?

    लगती  रहती  जिधर  दावँ  पर पांचाली ,शकुनियों के जुआ घर में क्यों आ गए हम  ?


     कर सकते नहीं कद्र अपने ही बुजुर्गों की , दम्भ -पाखंड की जद में  क्यों आ  गए  हम ?

     जो  है बर्बर अमानवीय भयानक अँधेरी ,   उस  विषधर की वामी में क्यों आ गए हम ?


                                                      श्रीराम तिवारी


  
 

व्यापम के दोहे ;-श्रीराम तिवारी



 [१]  मामागिरी  के फेर में ,पस्त  हुए सरकार।

   मध्यप्रदेश का कर चले ,जमकर बंटाढार।।


[२]  झूँठ-कपट छल -छंद के ,चूके तीर कमान।

       व्यापम गच्चा दे गया ,चूक गए चौहान।।


[३]   सत्ता मद का सदा ही ,होता सूरज अस्त।

      पाप की हाँडी  फोड़ने ,नियति रही अभ्यस्त।।


[४]     भृष्टाचार के ताप की , रंग लाएगी आँच।

         अभी तो ये शुरुआत है ,सीबीआई जाँच।।


[५]  कर-कर वादे खोखले ,नेता  ठोकें  पीठ।

     भारत के  इतिहास में ,हुए न ऐंसे  ढीठ।।


                    श्रीराम तिवारी


     

       

यदि अच्छे दिन देश के आये ,फिर क्यों मना रहा है मातम ?


           

            

  व्यापम -श्यापम  बोल रहा है , सिस्टम कितना हुआ नराधम ?

  रिश्वतखोरी -  सीनाजोरी ,  मंत्री  अफसर  लूटम- पाटम  !!


    दम्भ  जिन्हे था देशभक्ति  का , वे  निकले  नैतिकता घातम्।

    चाल -चरित्र -चेहरे  पर उनके   ,व्हिसिलब्लोवर मारी लातम।।

 
    
       गटर गंग  के मगरमच्छ कुछ   ,  दिखा रहे आँसू सन्तापम् ।

      किये-धरे की लाज शरम ना  , अधम स्वार्थी विकट  पिशाचम।।


       अच्छे दिन यदि  देश के आये ,फिर क्यों  मना  रहा है मातम ?

        कितनी  जाने  लील  गया है  , फर्जीबाड़ा   व्यापक   व्यापम ? ?


       फँसे  हजारों- मरे  पचासों, जिम्मेदार है कौन  नराधम ?

       रिश्वत  लेने   देने  वाले  ,  नर हत्यारे   जन गण घातम।।


      कुटिल  कलंकी  व्यभिचारिणी ,  पूँजीवादी माया व्यापम।

      लिए -दिए बिन काम चले न ,फोकट काम बिगाड़ू हाकिम  ।।


     मुन्ना  भाई बने डाक्टर , यमदूतों की फौज चमाचम ।
   
    आरक्षण ने बाट  लगाई   ,प्रतिभा क्षमता सत्यनाशम्।।


        श्रीराम तिवारी