शनिवार, 16 अगस्त 2014

नहीं चलेगा लालकिले से भाषण -लालीपाप मंगलम्।

     आजादी के दिन  का  इंतज़ार मंगलम्।

     पर उपदेश कुशल बहुतेरे हैं  हजार  मंगलम्।।

      कोरे भाषण से  न  होगा   बेड़ापार मंगलम्।

      ऐंसे ही उपदेश सुनेगी जनता पांच साल मंगलम्।। 

    'प्रधान सेवक' जी  का भाषण धुआंधार मंगलम् ! 

 
        बढ़ रहे  भूँख -महँगाई - व्यभिचार मंगलम्।

        उफान पर है  कालाधन -कालाबाजार मंगलम्।।

        बेकारी   का नहीं रहा  पारावार  मंगलम्।

        पहले से  भी ज्यादा हो  रहे -अनाचार मंगलम्।।

       'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् ! 

      

        पूँजीवाद हुआ और ज्यादा  खूंखार  मंगलम्।

        हो रहे  घोटाले व्यापम  -भृष्टाचार मंगलम्।।

       सिस्टम में  नई -नई  जोंकें  हजार मंगलम्।

       खाद्दयान में घुसा रहा  सट्टा- बाजार मंगलम् ।

       'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् !



       ऍफ़ डी आई की छूट है  अपार  मंगलम् ।

      सत्ता  के दलालों  का आधार मंगलम्।।

      अमीरों  ने मचाई   लूटमार मंगलम्।

      आर्थिक नीति  है बदकार  मंगलम्।।

     'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् !



        सिस्टम में कैसे हो  सुधार मंगलम्।

       जगह -जगह  छेद हैं  अपार  मंगलम्।।

       आयात का बढ़ रहा  उधार मंगलम्।

      घरेलू उत्पादन  हुआ बंटाढार मंगलम्।।

       'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् !



         सुधार के कुछ तो दिखाओ  आसार मंगलम्।

        अच्छे दिन जल्दी  लायें - आभार  मंगलम्।।

        अभी तो है जनता आपसे निराश  मंगलम्।

       कहाँ का  सुशासन और विकाश मंगलम्।।

       'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् !



        बक्त माँगता कुर्बानी तो  देंगे बलिदान मंगलम्।

       तेज  होगी  फिर से  जनता के संघर्ष की धार मंगलम्।।

        विनाशकारी नीतियों के खिलाफ होगा   सिंहनाद मंगलम्।

        नहीं चलेगा लालकिले से  भाषण -लालीपाप  मंगलम्।

         'प्रधान सेवक'  जी का भाषण धुआंधार मंगलम् !


                    श्रीराम तिवारी     

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

स्वाधीनता संग्राम के शहीदों को नमन !शब्दांजलि !


 
    शहीदों के सपनों का ,इस मुल्क से  मिलन  हो गया।

    ऊषा की  लालिमा लिए , प्रभात का नमन हो गया।।

    क्षण - क्षण  गौरव  के   ,दिव्यता  से  हम  को मिले  ।

    हरी-भरी  हो गई  धरा,  राष्ट्र सारा मगन हो गया।।

    मुक्ति संग्राम   का लहू  ,आज फिरसे  जवां  हो गया।

   शहीदों के सपनों  का ,इस मुल्क से  मिलन  हो गया।


     संघर्ष  द्वन्द ग्रन्थ के सभी  ,सर्ग इस  देश ने पढ़े।

      देश का विधान बन गया  ,  लोकतंत्र बन  गया।।

     पड़ोस की  कुचालों से ,घायल  भी कम न हुआ  ।

     आतंकी फितरत  का , मर्ज वेशरम  हो गया।।

  शहीदों के सपनों  का ,इस मुल्क से  मिलन  हो गया।

    

      धांधली- चुनावों की , अब अभिशाप हो गई ।

      जाति -पाँति -मजहब का ,चलन  आम हो गया।

       खम्बे  लोकतंत्र के  ,चारों  ही रुग्ण  हो चुके  ,

        वित्तीय  गुलामी से  , राष्ट्र नीलाम हो गया।।

   शहीदों के सपनों  का ,इस मुल्क से  मिलन  हो गया।



        शोषण के व्योम में हम  ,प्रश्न बनके घूमने लगे  ,

        क्रान्ति  अधूरी रही, संघर्ष  कुछ मंद   हो  गया।।

       मँहगाई  की सुरसा  से  मुल्क परेशान  हो  रहा ।

       भृष्टाचार -रिश्वत का ,व्यभिचार आम हो गया।।

   शहीदों के सपनों  का ,इस मुल्क से  मिलन  हो गया।

                                                       ;-श्रीराम तिवारी-:
  

  




   


  

  

 

   


  


   

  

  

   

रविवार, 10 अगस्त 2014

सच्चाई और न्याय के रास्ते पर भीड़ नहीं होती !



       सच और ईमानदारी के रास्ते  पर चलने  के अनेक फायदे हैं। बार-बार झूंठ नहीं बोलना पड़ता। सदैव सशंकित नहीं रहना पड़ता। सत्पथ पर अग्रसर मानव को -किसी व्यक्ति,संगठन,धर्म- मजहब और ईश्वर जैसी  परा  शक्ति की दासता का  भय   नहीं रहता।  देवता  तो क्या  शैतान   की भी  हैसियत नहीं कि  ऐंसे नरपुंगव  - सत्यानुरागी का बाल -बाँका  कर सके ।  इस रास्ते पर चलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इस रास्ते पर ज्यादा भीड़ भी नहीं होती। जो असत्य आचरण  में लिप्त हैं ,उन्हें यह पथ बेहद डरावना और कंटकाकीर्ण नजर आता है ,किन्तु न्याय -समानता -मानवता और सच्चाई  से लेस क्रांतिकारियों को यह पथ  अति सुगम ,मनोरम  और   खुशनुमा हरी-भरी वादियों से गुजरते हुए  'स्वर्गारोहण'जैसा है। जिसे यकीन न हो आजमा कर देख ले !
  
                                   श्रीराम तिवारी

 

शनिवार, 9 अगस्त 2014

किसी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था या गीता जैसे धर्मग्रंथों पर अनावश्यक टिप्पणी करने से कोई प्रगतिशील नहीं हो जाता।


  भारत में इन दिनों  सोशल मीडिया ही नहीं बल्कि डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी चारों तरफ से खास तौर  से  प्रोग्रसिव पक्ष की ओर  से - कुछ  गैर जरुरी -अनुत्पादक या फ़ालतू  मुद्दों पर काफी कुछ कहा- सुना  जा रहा है। एक  तरफ जबकि शासक वर्ग की ओर  से कार्पोरेट जगत  को लूट की खुली छूट दी जा रही है, मानसून की अस्थिरता और भृष्टचारी निजाम की बदौलत -आसन्न खाद्द्यान्न संकट ,जीवकोपार्जन की मारामारी  की संभावनाएं बढ़ती जा रहीं हैं। धरती के  अनाप-शनाप दोहन उसका  तटदनुरूप पर्यावरण असंतुलन ,जनसंख्या विस्फोट और भूमंडलीकरण  इत्यादि के भयावह दुष्परिणामों की और से आँख मींचकर  कुछ तथाकथित वुद्धिजीवी  आजकल  फ़ोकटिये  विमर्श में   उलझ रहे हैं।   उन्हें किसी संगठित जनांदोलन की चर्चा के बजाय यह  चिंता है कि  किस  शंकराचार्य  ने क्या कहा ?  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी को  नेपाल  के पशुपतिनाथ मंदिर में  जाना चाहिए था या नहीं ? उन्हें भगवा वस्त्र  पहनना चाहिए था या नहीं  ?  वे  अयोध्या  स्थित - टाट में विराजे 'राम लला ' को थेंक्स कहने  क्यों नहीं गए  ? उन्हें किस  मंदिर में जाना चाहिए ,किसमे  नहीं जाना चाहिए ?  इस तरह के  निम्नस्तरीय  विमर्श के अलावा  किस जज ने गीता की तारीफ  की ,किसने उसे विद्द्यालय के पाठ्क्रम में शामिल करने की वकालत की   इन गैरजरूरी मुद्दों पर कुछ  स्वयंभू क्रांतिकारियों  या  दिग्गज प्रगतिशीलों ने इतनी उतावली  दिखाई मानों भारत में भी अभी फ़ौरन से पेश्तर कोई 'महान  सांस्कृतिक क्रांति'  ही असफल होने ही जा रही हो ! कुछ तथाकथित  'धर्मनिरपेक्षों' ने तो  इन  वैयक्तिक किन्तु  संवेदनशील मामलों में बहुत घटिया टिप्पणी  तक   कर डालीं। अपने आपको  प्रगतिशील या जनवादी  कहने वाले ऐसे अधकचरे शख्स जिनके पैरोकार हों उन्हें दुश्मनों की  क्या जरुरत ?
    वेशक   धर्म -मजहब के पाखंडी -आडंबरों और उसके  दकियानूसी   चेहरे से न केवल मार्क्सवाद  को बल्कि लोकतांत्रिकता ,धर्मनिरपेक्षता और मानवतावाद को भी परहेज है।  दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्मनिरपेक्ष देश होते हुए भी  भारत एक धर्मप्राण राष्ट्र है। यहाँ  न केवल हिन्दू धर्म अर्थात सनातन धर्म मौजूद है बल्कि  उसकी अनेक शाखाओं  की जड़ें  भी मजबूत हैं।  इसी तरह तथाकथित - आयातित -ईसाईयत ,इस्लामिक , पारसीक तथा अनीश्वरवादी नास्तिकता याने  अज्ञेयवाद को  भी यहां शताब्दियों से  भरपूर सम्मान मिलता  रहा है। ईश्वर में आस्था  का पौराणिक तात्पर्य -मानव  जीवन की सम्पूर्णता  में निहित था। संसार से मुक्ति  , दुखों  -  कष्टों से मुक्ति का लक्ष्य  उसकी  उत्कर्षता में निहित  है।  तदुनसार धर्म-मजहब में उसके पावन ग्रंथों में भी  "बहुजन हिताय -बहुजन सुखाय  " जैसी धारणा की   सफलता की गारंटी  के  गुण सूत्र  किसी फ्रांसीसी क्रांति  या वोल्शेविक क्रांति के आदर्शों से कमतर नहीं हैं।
          दरसल  सारा झगड़ा शोषक शासक वर्ग  द्वारा  आध्यात्मिक दर्शन -धर्म-मजहब के दुरूपयोग से शुरू   हुआ  है।  धर्म-दर्शन -मजहब -पूजा पाठ और कर्मकांड का  जितना  दुरूपयोग   भारत में  किया जाता रहा  है उसकी मिसाल दुनिया में अन्यत्र कहीं भी देखने -सुनने में नहीं आती। अब तो  भारत  के  आम चुनाव और   संसदीय प्रजातंत्र में  यह सत्ता प्राप्ति का अमोघ अश्त्र ही बन चूका है। यही वजह है कि कुछ प्रगतिशील   विद्वान भारतीय इस विमर्श से सशंकित होकर, धार्मिक ग्रंथों या उनके सिद्धांतों पर ही  आक्रामक हो जाया करते  हैं। चूँकि वे जानते हैं कि  आत्मा,परमात्मा या ब्रह्म-जीव-माया के परस्पर सम्बन्ध और धर्मान्धता में डूबे हुए भारत को विदेशी यायावर आतताइयों  के सामने बार-बार घुटने टेकने पड़े हैं। जो लोग भारतीय गुलामी का इतिहास  जानते-समझते हैं ,जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम  में शहीद हुए बलिदानियों का इतिहास पढ़ा है वे शायद  आजाद भारत को आइन्दा धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता की अंधी सुरंग में धकेले जाने के खिलाफ हैं।  इसीलिये अपनी  राष्ट्रीय चिंताओं के बरक्स   वर्तमान दौर  में  कुछ  प्रगतिशील और देशभक्त चिंतकों को  राज्यसत्ता में विराजे नेताओं का  राजनैतिक  रूप से  धर्म सापेक्ष होते जाना मंजूर यहीं  है। मध्य एशिया और मध्यपूर्व में उन्हें जो  खतरे की घंटी सुनाई दे रही  है, वही भारतीय प्रायद्वीप को भी आप्लावित करने को काफी है।   न केवल  एथनिक बहुसंख्यकवाद  के संदर्भ में अपितु आक्रामक अल्पसंख्यकवाद और फासिज्म विषयक  उनकी यह आशंका निर्मूल  भी  नहीं  है।  प्रगतिशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लोग  अच्छी तरह से जानते हैं कि  धर्म -मजहब -आस्तिकता इत्यादि शोषण -उत्पीड़न के साधन  नहीं बनाये जा रहे हैं । उनपर  पाखंड तथा वितंडावाद का मुलम्मा  चढ़ाया जा रहा है ।  वे  यह भी  जानते हैं कि  गीता,कुरान जैसे  कुछ धर्म ग्रंथों के निर्देश  मानवता के लिए अमोघ  अश्त्र भी सावित  हो सकते  हैं। कुछ पुरातन  दार्शनिक सिद्धांत  इंसानियत के लिए  अभी भी  अभय वरदान   साबित हो सकते हैं। धर्म-मजहब -दर्शन तथा    ततसम्बन्धी -  पवित्र   ग्रन्थ  - गीता  -कुरान -बाइबिल ,गुरु ग्रन्थ साहिब तथा  जेंदा -अवेस्ता जैसे पवित्र ग्रन्थ -मानवीय मूल्यों  के संवाहक  भी हो सकते  हैं। किन्तु यह  भी सही है कि कोई भी  वास्तविक  प्रगतिशील और वामपंथी  चिंतक अच्छी तरह से  जानता है कि  किसी भी  धार्मिक ग्रन्थ की अवैज्ञानिक  आलोचना  करने से  न तो  कभी कोई  क्रांति  संभव हुई  है और न ही कोई क्रांतिकारी बन  पाया है।  उसे मालूम  है कि  यह वक्त किन्ही धर्म ग्रंथों की आलोचना का नहीं  बल्कि शासक वर्गों के द्वारा की जा रही  राष्ट्रीय सम्पदा की लूट के खिलाफ आवाज बुलंद किये जाने का  है। इतिहास साक्षी है कि  धर्म ग्रंथों को पढ़कर ही देश और  दुनिया में क्रांतिकारी  -  महानायकों का आविर्भाव  हुआ  है।  भारत के तिलक, गांधी  , श्रीपाद अमृत डांगे  , नम्बूदरीपाद  , अरविन्द  ,  राधाकृष्णनन , लाजपतराय,अबुल कलाम ,डॉ बाबा साहिब भीमराव आंबेडकर तथा  दक्षिण अफ्रीका के आर्च विशप   डेसमंड  टूटू जैसे अनेक राजनेता या विचारक - क्रांतिकारी बाद में  बने। 'धर्मयोद्धा' पहले बने। 'धर्म -मजहब एक अफीम है ' मार्क्स के इस शाश्वत सूत्र  का तात्पर्य  पूँजीवादी  साम्प्रदायिक तत्व अच्छी तरह जानते हैं।  वे इसका दोतरफा दुरूपयोग कर रहे हैं। एक तरफ  वे  इसे साम्यवाद को धर्म विरोधी सावित करके बदनाम करने  में कर रहे हैं  . दूसरी तरफ ये पाखंडी  साम्प्रदायिक तत्व -पूँजीवादी -सामंती  शासक वर्ग - और बाजार की शक्तियों के मार्फ़त मेहनतकश आवाम को धर्म-मजहब की अफीम  चटा  रहे हैं । यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में  सर्वहारा की लड़ाई लड़ने वालीं धर्मनिरपेक्ष  वामपंथी पार्टियों   को ठुकराकर ,  'मजहबी उन्माद में डूबकर'  कुछ अलसंख्यक लोग तृणमूल को  जिता देते हैं। इसी तरह   हिंदुत्व और हिन्दुराष्ट्रवाद  की अफीम  घोंटकर -उन्मादी बहुसंख्यक  वर्ग को पिलाई गई ताकि   भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी  निरंतर सत्ता में  बनी  रहे।   मार्क्स के उद्धरणों  से वामपंथ ने कितना सीखा ये तो  नहीं मालूम किन्तु  मेहनतकशों को लूटने वाले जरूर मार्क्सवाद के कायल हैं। इसीलिये वे मार्क्सवाद का  नहीं मार्क्सवादियों का विरोध करते हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिल रही है। दूसरी ओर वामपंथ के  कुछ  अनुयाई  -शिक्षक  , समर्थक , विचारक   और नेता न केवल  वैचारिक संकीर्णतावाद के शिकार हो रहे  हैं , बल्कि धर्म-मजहब रुपी सर्प की पूंछ पर  आघात करके आत्महंता  भी हो रहे  हैं ।  कुछ इतने कूप मंडूक हैं कि अपने कमजोर कन्धों पर सिद्धांतों की सलीब  ढोने  के लिए आजीवन अभिशप्त हैं ।
             सैद्धांतिक रूप से  रूप या आकार में आस्तिकता और नास्तिकता में कोई भेद नहीं।  ये  दोनों ही एक जैसे लगते हैं  किन्तु   प्रयोग  में वे विपरीत ध्रुव  हैं। पूँजीवादी  समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में जब जैसी जरुरत पड़ी  इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका  अदा की है।अनीश्वरवाद तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा ही  है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से  विद्द्मान है । वेशक  'मानव' ने अन्य प्राणियों  के सापेक्ष  वैचारिक और उद्द्यमशीलता  के  क्रांतिकारी झंडे गाड़े हैं. आज का वैज्ञानिक युग  इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की 'तपस्या'का  परिणाम है ।  कार्ल मार्क्स ने ही सबसे पहले  इसे सम्मान से नवाजा था।  उनकी इस  वैज्ञानिक  और क्रान्तिकारी विचारधारा ने  ही संसार को अनेकों वैज्ञानिक दिए हैं। मनुष्य  को प्रकृति पर विजय पाने का जज्वा दिया है। मध्ययुग की अर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सामंती  संसार  में रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले ,पूँजीवाद  को खाद-बीज देने वाले तथा पोप -खलीफा -मठाधीश जैसे ईश्वरीय ठेकेदारों  की प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाले-केवल  साहित्यकार-कवि,लेखक या नाटककार  ही नहीं थे बल्कि जिन्होंने प्रकृति का अध्यन कर उसके नियमों का अनुशंधान कर  प्राणिमात्र से संबंध उजागर किया, वे महान अनीश्वरवादी  वैज्ञानिक भी   सरसरी  तौर पर आस्तिकता और अनीश्वरवाद  के अर्धनारीश्वर जैसे  ही तो थे।  मानव समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका अदा की है । अनीश्वरवाद तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से सदैव प्रकृति प्रदत्त है । वेशक  'मानव' ने अन्य प्राणियों  के सापेक्ष  वैचारिक और उद्द्यमशीलता  के  क्रांतिकारी झंडे गाड़े हैं. आज का वैज्ञानिक युग इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की खुरापात का परिणाम है ।   इस वैज्ञानिक विचारधारा ने संसार को अनेकों वैज्ञानिक दिए हैं। मनुष्य  को प्रकृति परविजय पाने का जज्वा दिया है। मध्ययुग कीअर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सभ्य संसार में रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले तथा पोप -खलीफा -मठाधीश जैसे ईश्वरीय ठेकेदारों को , तत्कालीन निरकुंश शासकों को 'मानवीय मूल्यों' का आइना दिखाने वाले  वे कोई कोरे नास्तिक ही नहीं थे। बल्कि  इनमे से  अधिकांस नास्तिक या बुद्धिवादी  भी थे। केवल वाल्तेयर ,रूसो, गैरी बाल्डी  या मार्क्स -एंगेल्स जैसे अनीश्वरवादी ही नहीं बल्कि थॉमस अल्वा एडिसन,जार्ज स्टीवेन्सन ,रदरफोर्ड,फ्लेमिंग,  न्यूटन ,आर्कमिडीज ,पैथागोरस  इत्यादि  से लेकर  कपिल , कणाद , ,अश्वघोष, ,भवभूति,चरक चार्वाक, करहपा तथा नागार्जुन   जैसे नास्तिक वैज्ञानिकों ने महासागरों का घनत्व - धरती का वजन -लम्बाई-चौड़ाई  तक नापी है । शून्य की खोज करना वाले ,धरती  को  गोलाकर बताने वाले  , सूरज को  स्थिर और धरती को गतिमान बताने वाले आर्यभट्ट जैसे भारतीय मनीषी भी  प्रारम्भ में   अनीश्वरवादी  ही हुआ करते थे। आज का अधिकांस उन्नत भौतिक संसार इन्ही तथाकथित 'नास्तिकों' की महानतम देंन  है। वेशक  इस अनीश्वरवादी विचारधारा के  कारण ही  मनुष्य मात्र में  अहोभाव  और उसकी महानता का  प्रशश्ति गान  होता रहा है। मनुष्य या मनुष्य की 'विवेक शक्ति'  और उसके गौरव को ही इस संसार में सर्वश्रेष्ठ मानने  वालों का इसमें सदैव सम्मान होता रहा है।
       जहां तक 'आस्तिकता' का प्रश्न है तो वेशक  यह मानव मात्र की एक महान क्रांतिकारी वैज्ञानिक 'रचना' कही जा सकती है। इस आस्तिकता के 'दर्शन' के आविष्कार को  मष्तिष्क ने  सतत -एकल  या संगठित रूप से प्रकृति पर विजय पाने   के आदिम संघर्ष में,असहाय ,निरुपाय और  असमर्थता की स्थति में ,व्यक्तिशः या  सामूहिक  रूप से जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए ईश्वरत्व का संधान  किया होगा।  मनुष्य ने संकटापन्न स्थति में 'ईश्वर' तत्व का  अनुसंधान किया होगा। कब -कहाँ और कैसे किया  ये तो अभी तक अबूझ ही है ? किन्तु कालांतर में  पाखंडी शासकों  ने इसे   'आध्यात्मिक दर्शन '  का बाना पहनाया। बाद में  उसे शोषण का साधन बना डाला। सामंतों और शक्तिशाली पर्भु वर्ग ने , उनके चाटुकारों ने ,चारणों -भाटों ने  इसे धार्मिक उन्माद और अंधश्रद्धा में बदल डाला।  इसीलिये विज्ञानिक  चेतना ने  सदैव ही  इस  ईश्वरीय  -  आस्तिकता  को -धर्म -मजहब और आध्यत्मिक दर्शन को , क्रांतिकारी खोज मानते  हुए भी  संदेह और पाखंड का जन्मदाता   माना है।
           शायद  इन्ही  वजहों से  तथा  यूरोप स्थित  तत्कालीन पोप और अरब  स्थित  खलीफाओं  की प्रभुसत्ता से  आक्रान्त जनता की आवाज बनकर - कार्ल  मार्क्स को  भी कहना पड़ा कि  'धर्म  - मजहब  एक अफीम है "! हालाँकि  भारतीय दर्शन  या गीता के संदर्भ  में किसी  भी मार्क्सवादी  विचारक ने कोई विरोध नहीं किया।  केवल गांधी जी ही नहीं बल्कि तिलक ,विवेकानंद , स्वर्गीय रामविलास शर्मा ,निराला ,ईएमएस  और डांगे ने तो गीता और  अन्य  भारतीय  दार्शनिक ग्रंथों  के मूल्यों और सिद्धांतों  को 'साम्यवाद' का पोषक ही सिद्ध किया है।  आजकल के वामपंथियों से निवेदन है कि  साम्प्रदायिकता का विरोध तो करें किन्तु किसी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था या  गीता जैसे धर्मग्रंथों पर अनावश्यक टिप्पणी करने से कोई प्रगतिशील नहीं हो जाता।

       श्रीराम तिवारी 

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

इन दिनों कांग्रेस -भाजपा जैसी और भाजपा -कांग्रेस जैसी हो रही है !



   वैसे तो   भाजपा की  दोगली आर्थिक नीति  को परिभाषित  करना कोई मुश्किल काम नहीं है।  यह सुविदित है कि  यूपीए-१ और यूपीए-२ के दरम्यान जब भाजपा विपक्ष में थी  तो उसने तत्कालीन मनमोहन सरकार  को तथा संसद को परेशान  करते हुए  न तो कोई सार्थक भूमिका अदा की और न ही कोई   प्रत्यक्ष मदद की थी   ।  किन्तु वह  अपने वित्तपोषक आकाओं के  हित  में  तथा अमेरिकी दवाव में  निरंतर मजदूर -किसान के विरोध में लिए जाते रहे  हर फैसले में  परोक्षतः भागीदार रही है। यूपीए सरकारों का  को कोई भी काम -संसद और उसके  बाहर आसान नहीं रहा।  यूपीए -२  द्वारा जब २००८ में बीमा विधेयक लाया गया तब , जब वन-टू- थ्री - एटमी  करार लाया गया तब और  विगत लोक सभा के  सत्र समापन के दरम्यान   लोकपाल  बिल  लाया गया तब -इन  सभी मौकों पर भाजपा के सांसदों ने संसद में जो उत्पात मचाया -संसदीय इतिहास में तो  उसकी कोई  सानी  नहीं है।  उसके सापेक्ष आज  के विपक्ष  - कांग्रस  -लेफ्ट और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का  संयुक्त प्रतिरोध १९ भी नहीं है। शहीद भगतसिंह और उनके महान क्रांतीकारी  साथियों  ने जिस ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट तथा अन्य श्रम  विरोधी कानूनों  के खिलाफ  तत्कालीन अंग्रेज सरकार के खिलाफ और  गुलाम भारत की जनता को जगाने के लिए असेम्ब्ली में बम फेंके थे। वर्तमान मोदी सरकार उन्ही कानूनो को धड़ाधड़ पारित कर रही है। केंद्र सरकार के इन नकारात्मक मंसूबों के खिलाफ वामपंथ तथा अन्य गैर कांग्रेस -गैर भाजपाई  विपक्ष का  संघर्ष  तो शिद्द्त से जारी है। किन्तु  कांग्रेस और उसका शीर्ष नेतत्व  किसी भी मोर्चे पर गंभीर नहीं है
                              लगता है कि  कांग्रेस ने भाजपा की  ही भूमिका दुहराना शुरू कर दिया है। अतीत में जब  भाजपा  विपक्ष में रही  और उसने जिस तरह लगातार संसद की कार्यवाहियों को बाधित किया  है  वही अब कांग्रेस  दुहराने का रोल कर रही है  ,स्पीकर को अपमानित करना   ,टेबिलें उखाड़ना   ,माइक तोड़ना  , मीडिया के समक्ष नोटों की गड्डियां उछालना  और संसद में पेश किये गए बिल इत्यादि के  कागज फाड़कर मंत्रियों के मुँह  पर फेंकना  , ये  कीर्तिमान तो अभी तक   खंडित नहीं हुए हैं। लेकिन यदि कांग्रेस  सांसदों ने या राहुल गांधी ने   मजबूरन भाजपा का ही अनुशरण  किया और थोड़ा सा  आक्रामक रुख अपनाया है  तो   जेटली जी को मिर्ची नहीं लगनी चाहिए।सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को विपक्ष की आवाज नहीं  दवाना  चाहिए। स्पीकर की मनमानी का आरोप लगने की नौबत नहीं आनी  चाहिए।
              हालाँकि    देश के बहुमत जन की कांग्रेस और भाजपा में कोई आष्था नहीं है , लेकिन दाँव -पेंच और मतों के ध्रुवीकरण से ये दो बड़े  दल  ही  देश  की सत्ता पर बारी-बारी से काबिज हो रहे हैं। यदि १६ वीं लोक सभा के सकल मतों  के प्रतिशत पर दृष्टिपात किया जाए  तो स्पष्ट हो जाएगा कि भाजपा के ३० %और कांग्रेस या यूपीए के १८ % मिलकर भी  बहुमत  में नहीं हैं। शेष विपक्ष के  ५२ %  मत प्रतिशत बहुमत में होते हुए भीउसकी भूमिका  सरकार और संसद में नाकाफी   है। कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया , देश का पूँजीपति  और सामंत वर्ग ही नहीं बल्कि विदेशी  आवारा पूँजी  का सभ्रांत लोक भी यह  मानकर भाजपा के साथ हो लिया था कि  कि   वह उनके लिए  कांग्रेस से बेहतर 'हितसंवर्धक' है। संघ परिवार और उसकी आनुषंगिक राजनैतिक शाखा के रूप में  भाजपा   का  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और उद्दाम पूँजीवाद अब कांग्रेस के 'सर्व-धर्म-समभाव'और ढुलमुल पूंजीवाद पर भारी  पड़ रहा  है।  वैचारिक धरातल पर सोनिया गांधी या राहुल गांधी भले ही कंगाल हों किन्तु  स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों  का असर कांग्रेस की जड़ों में अभी भी बाकी है।  कांग्रेस  को यदि फिर से उठ खड़ा होना है तो उसके नेतत्व को  चाहिए कि  अपने किये धरे के  लिए  और अपनी अधोगामी-विनाशकारी नीतियों के लिए देश की जनता  से  माफ़ी मांगे। कांग्रेस को और उसके नेतत्व को समझना होगा कि  मंहगाई  , कुशासन  ,  साम्प्रदायिक -उन्माद ,भृष्टाचार और फासिज्म से लड़ने के लिए  देश और दुनिया में केवल वामपंथ ही  सही  मायनों में ईमानदारी  से  संघर्ष करता रहा है । इस लड़ाई में कांग्रेस को  वामपंथ का साथ  देना चाहिए।
                  राहुल गांधी को संसद में वो व्यवहार नहीं करना चाहिए जो उन्होंने विगत ६ अगस्त को संसद में किया। उनकी  नारेवाजी  में वनावटीपन  झलकता है  "यहाँ  एक व्यक्ति की ही सुनी जाती है ""स्पीकर सुमित्रा महाजन पक्षपाती हैं " "वी वान्ट जस्टिस " ये सब नारे सही भी हों तो  भी इनका  उपयोग कर संसद  की  कार्यवाही  बाधित करना उचित नहीं है। अन्यथा आवाम की नजर में  भाजपा और कांग्रेस में क्या फर्क रह जाएगा ?वैसे भी कांग्रेस और भाजपा को एक  ही पायदान पर खड़ा किया जाता रहा है।  किन्तु भाजपा के सर्वसत्तावाद और  आक्रामक पूँजीवाद के सापेक्ष  कांग्रेस का उदारवादी -जनवादी और लोकतांत्रिक चेहरा  ही ज्यादा स्वीकार्य किया जाता  रहा  है।  कांग्रेस में  राहुल गांधी हों या और कोई नेता हों   उन्हें कांग्रेस के वेसिक सिद्धांतों  की और विनाशकारी  मनमोहनी अर्थशाश्त्र  की खामियों की ठीक से  जानकारी होनी चाहिए। बहुत सोच समझकर  संयम  के साथ संसद में अपनी  भूमिका अदा करने से जनता  जिम्मेदार वर्तमान विपक्ष  को  आइन्दा पुनः सत्ता सौंप सकती है। क्योंकि  देशी-विदेशी पूँजीपतियों  के अलावा -मोदी सरकार से कोई भी खुश नहीं है। देश में चारों ओर  हा-हा-कार मचा है।  धर्मान्धता ,साम्प्रदायिक दंगे ,कुशासन ,हत्याएँ ,महँगाई , बेकारी ,निजीकरण ,ठेकाकरण ,और माफिया राज का दौर जारी है। कांग्रेस को या उसके नेतत्व  को  हताशा या निराशा में ज्यादा उत्तेजित होने की जरुरत नहीं है। उन्हें अपनी पार्टी से वंशवाद और चमचावाद को   खत्म करने की ओर कदम बढ़ाने चाहिए। कांग्रेस को  थोड़ा सा सब्र और थोड़ा सा नीतिगत  आत्मालोचन जरुरी है। बाकी का काम तो  भाजपा और एनडीए सरकार से नाराज जनता खुद  ही आसान  कर देगी। दरसल  इन दिनों  कांग्रेस -भाजपा  जैसी और भाजपा -कांग्रेस  जैसी हो रही  है ! यह देश के हित  में नहीं है।

                        श्रीराम तिवारी 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

  " संघर्ष से ही इंसान बनता है "
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आधुनिक साइंस और टेक्नॉलॉजी ने  ,सूचना एवं  संचार क्रांति  ने तथा अधुनातन मेडिकल साइंस ने, न केवल मौजूदा विश्व की आवादी को अपितु वर्तमान मानव की सकल - औसत -दीर्घजीविता को  भी  अपने अतीत के किसी भी  पूर्ववर्ती कालखण्ड  के सापेक्ष बेहतरीन बनाया है। प्रत्येक  दौर के श्रेष्ठतम मानवों ने अपने अप्रतिम - त्याग,तपस्या,बलिदान और  संघर्ष से सार्वभौमिक हितों के बरक्स -भावी पीढ़ियों को न केवल सर्व -साधन- सम्पन्न  बनाया  अपितु  'सितारों से आगे' जाने का  मार्ग भी  प्रशस्त  किया  है। सहज मानवीय जिजीविषा ,प्रकृति से तादात्म्य और अदम्य  साहस की अनवरत यात्रा से मानव मात्र ने पाया कि  'संघर्ष ही जीवन है 'उसी से आधुनिक दुनिया का निर्माण  हुआ है। आदिकाल से अब तक की तमाम मानवीय उपलब्धियों के मूल में इस 'संघर्ष' का ही बोलबाला रहा है उसी से  यह सब संभव हुआ है।
      मानव की इस  संघर्ष शील बौद्धिक चेतना ने  ही उसकी  आवश्यकताओं  को साधा है । मानवीय संघर्ष  ने सभ्यताओं  के विकाश  के हर  दौर में अपनी भावी पीढ़ी को  न केवल सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंचाया  बल्कि  'सितारों से आगे जहां और भी हैं 'को जानने -समझने की क्षमता भी  विकसित की  है। इसमें कोई शक नहीं है  कि मानवीय  चेतना ,अविरल संघर्ष और श्रम शक्ति ने  ही  प्रकृति पर इंसान को  बेहतरीन बढ़त  हासिल कराई है। प्रत्येक संघर्षशील और क्षमतावान व्यक्ति ने , श्रेष्ठतम मानवों के  समूह ने ,सभ्य  समाजों ने और  भारत जैसे जीवंत राष्ट्रों   ने  न केवल अपनी  असीम संभावनाओं  को तराशा  है बल्कि  शेष विश्व को  भी अपने ज्ञान और संघर्ष  की समष्टिगत चेतना से आप्लावित किया है।  जिन व्यक्तियों ने ,समाजों ने और राष्ट्रों ने अपने पवित्र  'साध्य  ' के निमित्त 'साधनों' की शुचिता का और  संघर्ष के स्वरूप की विशालता का  ध्यान रखा  है ,वे सभ्य संसार  के लिए आज भी वंदनीय हैं । उनके संघर्षों के  अवदान आज भी पथप्रदर्शक हैं और आइन्दा भी प्ररेणा देते रहेंगे।    
             जिन्होंने भी  उच्चतम मानवीय मूल्यों  की स्थापना का स्वमेव निर्धारण किया  वे  क्रांतिकारी  महामानव आज  भी  इतिहास के  पन्नों पर -स्वर्णाक्षरों में  शिखर पर देदीप्यमान हो रहे हैं।वेशक  व्यवस्थाओं के विद्रूपण ,राजसत्तात्मक विचलन ,निहित स्वार्थ  तथा  धनबल-बाहुबल-जनबल  के दुरूपयोग से कुछ खास चुनिंदा नर-नारी  बिना संघर्ष किये ही या किसी शॉर्टकट के मार्फ़त -तदर्थत : अपने हिस्से से ज्यादा  का,अपनी वैयक्तिक योग्यता से अधिक का , आसमान  ,हवा,पानी और सूरज  हड़प लिया करते हैं  ।  यही असली शोषक वर्ग है । ये न केवल मानवता  के दुश्मन हैं ; बल्कि प्रकृति बनाम ईश्वरीय आदेशों के भी  शत्रु हैं।जो साहसी और बलिदानी मनुष्य  इनसे संघर्ष करते हैं वही सच्चे  क्रांतिकारी कहलाते हैं। 
              बहुधा  ऐंसा भी पाया जा सकता है कि  अनथक संघर्ष ,त्याग और बलिदान के वावजूद किसी व्यक्ति विशेष को उसकी  मेहनत तथा योग्यता का बाजिब या अपेक्षित  परिणाम नहीं मिल पाता । यदि वह मनुष्य   परिस्थितियों से समझौता कर दासत्व भाव  स्वीकार कर लेता है तो वह आत्महंता और कायर है। लेकिन  यदि  उसने संघर्षों के रास्ते पर चलने का प्रण  लिया तो तत्काल भले ही उसे कोई सुख या उपलब्धि न मिल सके किन्तु  अंततोगत्वा  उसके  संघर्ष की  कीर्ति पताका  फहराने  के लिए सारा आसमान  मौजूद रहेगा । बिना संघर्ष  वाला  'शार्ट कट ' तो फिर भी घातक जहर ही है। जो  किसी  को भी सार्थक जीवन नहीं दे सकता।  बाज मर्तवा तो  जेल की दीवारें उन्हें अपने आगोश में पनाह देने को बाध्य  हुआ करती  हैं।   जिन्होंने  'मेहनत  की रोटी' के संघर्ष का  सबक नहीं सीखा ,जिन्होंने दासता से मुक्ति के संघर्ष का अनुशीलन नहीं किया  या  जिन्होंने जीवन के कठिन संघर्ष से  सदैव पलायन किया या  जिन्होंने  सिर्फ अपना स्वार्थ साधा  वे न केवल  जहालत-गुलामी  के हकदार रहे बल्कि उनकी कायराना जिंदगी भी  शोषित-वंचित की मानिंद  वियावान  में दम  तोड़ते  रहने को अभिशप्त  रही  है ।न केवल  सफल इंसान के लिए  ,न केवल सफल परिवार के लिए बल्कि सम्पूर्ण कौम और राष्ट्र के लिए भी  जीवन का  एक मात्र मूल मन्त्र  'संघर्ष' ही है। स्वामी विवेकानंद,महात्मा गांधी , डॉ साहिब  भीमराव् आंबेडकर ,कार्ल मार्क्स  ,लेनिन , भगतसिंह ,हो चिन्ह मिन्ह जैसे अनेकों संघर्ष शील महा मानवों ने न केवल वैयक्तिक सफलता के लिए'चरैवेति-चरैवेति ' का संधान किया बल्कि ' उत्तिष्ठत प्राप्य वरान्निवोधत 'का नारा  भी बुलंद किया।  संघर्ष के नायकों ने ही  'बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय '  और राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के लिए सामूहिक संघर्ष  का सिद्धांत  भी पेश किया था । मध्ययुगीन बर्बर गुलामी के बंधनॉ से  तथा  साम्राज्यवाद  के चंगुल से विभिन्न गुलाम  राष्ट्रों की  मुक्ति का और कालजयी प्रजातांत्रिक  क्रांतियों का सूत्रपात भी इन्ही बेहतरीन संघर्षों और  श्रेष्ठतम मानवीय विचारधारा के अनुशीलन का परिणाम है।
                वैसे तो इस धरती पर  संघर्ष की  नकारात्मक  तस्वीर भी मौजूद है। इस आधुनिक और वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में शक्तशाली  व्यक्तियों ने ,सबल समाजों ने तथा   सबल राष्ट्रों ने  छल-बल के संघर्ष से निर्बल  व्यक्तियों , निर्धन -असंगठित  समाजों और  पिछड़े  ऋणग्रस्त  राष्ट्रों  को  प्रतिस्पर्धा के 'नॉन  यूनिफॉर्म  लेवॅल  प्लेइंग फील्ड'में  जबरन धकेल दिया है ।  'सभ्यताओं के संघर्ष' के बहाने तमाम  वंचित मानवों  ,समाजों और राष्ट्रों  के समक्ष 'धर्म-मजहब की अफीम'  परोसी  जा रही है। राष्ट्रीय और प्राकृतिक  संसाधनों की लूट के लिए और अपने स्वार्थों की पूर्ती के लिए  दुनिया भर के तमाम  'मौत के सौदागर ' हथियारों के निर्माता और पेट्रोलियम'पर काबिज शक्तियाँ  आधुनिक युवाओं को  नकारात्मक संघर्ष  के  लिए लामबंद किये जा रहे हैं। जो संघर्ष मानव से मानव के शोषण से मुक्ति के लिए किया जाना चाहिए था, जो  संघर्ष जल-जंगल-जमीन और अवसरों की समानता के  लिए किया जाना चाहिए था ,जो संघर्ष प्रकृति के नैसर्गिक संसाधनों के  न्याय  संगत  वटवारे के लिए किया जाना चाहिए था वो संघर्ष  -  वैश्वीकरण-बाजारीकरण -आधुनिकीकरण की चपेट में आकर इतिहास के किसी अँधेरे  कोने में घायल  सा पड़ा है । आज  'हैव्स एंड हैव्स नाट'   के लिए संघर्ष की कोई चर्चा नहीं होती। जबकि इसका  दायरा  न केवल  बिकराल हुआ है बल्कि उसका चेहरा और भी  ज्यादा  आदमखोर और खूखार  ही हुआ है।
     यह नव्य  उदारवाद कहता है  'वही जियेगा जो शक्तिशाली है , वही जीतेगा जो ताकतवर है ' 'कर लो दुनिया मुठ्ठी में' ''छू लो आसमान को ''  इत्यादि अनुत्पादक और  सफेदपोश - प्रबंधकीय नारों के कोलाहल में कमजोर वर्गों के  आधुनिक युवाओं  की वास्तविक संघर्ष क्षमता  को सस्ते में खरीदा जा रहा है। उनके  निजी और पारिवारिक भविष्य को  अनिश्चितता की  अँधेरी सुरंग में धकेला जा रहा है। सभ्रांत लोक के  भारतीय युवाओं   की ऊर्जा अर्थात  वास्तविक प्रतिभा अमेरिका ,इंग्लैंड और विदेशों में खपने को उद्द्यत रहा करती है।जबकि   दूसरी ओर नकारात्मकता के संघर्ष में राजनैतिक भृष्टाचार उत्प्रेरक का काम कर रहा है।  उदाहरण के लिए  मध्यप्रदेश में ही  विगत १० सालों में हजारों योग्य,परिश्रमी और संघर्षशील युवाओं को उनके हिस्से का हक नहीं मिल पाया है , जिन्हें कोई आरक्षण नहीं ,जिनका  कोई 'पौआ' नहीं उन बेहतरीन  योग्य और मेघावी   युवाओं  की  संघर्ष क्षमता  को निजी क्षेत्र में १२-१२ घंटे खपकर सस्ते में समेटा जा रहा है। अयोग्य,मुन्ना भाई ,रिश्वत देने की क्षमता वाले - अयोग्य और  बदमाश  किस्म के लोग आरक्षण की वैशाखी या सत्ता का प्रसाद पाकर अपना उल्लू सीधा करने में सफल हो जाया करते हैं।  भृष्टाचार के ' गर्दभ ' पर सवार निक्म्मे लोग जब डॉ,इंजीनियर,पुलिस, प्रोफ़ेसर,प्रशासक,प्रोफेसनल्स  ,खिलाडी या नेता होंगे तो देश और समाज की बदहाली  पर आंसू बहाने का नाटक क्यों ?व्यवस्था के  उतार या 'मूल्यों की गिरावट' पर इतना कुकरहाव  क्यों? भृष्ट  अफसर ,मंत्री ,नेताओं के निठल्ले-अकर्मण्य रिस्तेदार  ही जब पूरे सिस्टम पर काबिज हो चुके  हों तो ईमानदार,योग्य और चरित्रवान युवाओं के समक्ष संगठित 'संघर्ष' के अलावा कोई रास्ता नहीं। मध्यप्रदेश में 'व्यापम' भृष्टाचार की अनुगूंज  या यूपीए सरकार के जमाने में भृष्ट जज की न्युक्ति का खुलासा तो  देश की  भृष्टतम व्यवस्था की  हाँडी  के एक-दो  चावल मात्र  हैं।  कैरियर  निर्माण के व्यक्तिगत   संघर्ष में  -  सामाजिकऔर राष्ट्रीय सरोकार  पूर्णतः तिरोहित होते ही जा रहे हैं ,साथ ही मौजूदा  नई  दुनिया का उत्तर आधुनिक  ग्लोबल  युवा -अपने पूर्वजों से भी ज्यादा असंरक्षित ,धर्मभीरु , लम्पट और दिशाहीन  होता जा रहा है। धूर्त शासक वर्ग द्वारा उसे प्रतिस्पर्धा की अँधेरी सुरंग में धकेला जा रहा है। उसे  भौतिक और निजी सम्पन्नता की  मरुभूमि में नख्लिस्तान   बनाकर  दिखाने और कार्पोरेट जगत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने  का पाठ  पढ़ाया  जा  रहा है। उसके हाथ पैर बांधकर गहरे कुँए  में  फेंककर तैरने और सबसे पहले आत्मउत्सर्ग के लिए हकाला जा रहा है। शातिर स्वार्थी प्रभू  वर्ग  का कहना है ' की बहाव के विपरीत  तैरकर जो पहले बाहर आएगा  उसे 'सफलता ' की सुंदरी वरमाला पहनायेगी। व्यक्तिगतआकाँक्षा ,महत्वाकांक्षा  की मृगमरीचिका के मकड़  जाल में फंसे हुए युवाओं को   यह समझने का अवसर ही नहीं दिया जा  रहा कि  नैसर्गिक -प्राकृतिक संसाधन , जीवकोपार्जन के  संसाधन ,शैक्षणिक-प्रशिक्षिणक सुविधाएँ,प्रोन्नति के अवसर , जीवन यापन की  मानवीय शैली और अभिरुचियाँ उनसे कोसों दूर होतीं चलीं जा रहीं हैं। उसे नहीं मालूम की उनके लिए नैगमिक और  राज्य सत्तात्मक संरक्षण का अनुपात किस हालात में है।  उत्तर भारत में और  खास तौर  से हरियाणा -पंजाब में स्त्री -पुरुष के लेंगिक अनुपात के क्षरण की ही   तरह आधुनिक  युवा पीढ़ी  के लिए  भी राज्य  सत्ता के संरक्षण का   अनुपात अर्थात  संवैधानिक  अधिकारों -अवसरों  का  अनुपात दयनीय है। जिस तरह  इंदौर सराफा बाजार की गन्दी नालियों  से कुछ निर्धन और  वेरोजगार युवा-नर -नारी बाल्टियों में कीचड भरभर कर अपने झोपड़ों में ले जाते हैं, ताकि उसमें तथाकथित 'संघर्ष' करते हुए गोल्ड' का कोई टुकड़ा या कण उन्हें  मिल जाए। इसी तरह की हालात जिजीविषा के लिए  संघर्षरत आधुनिक सम्मान आक्षांक्षी युवा पीढ़ी की है, जो अपराध जगत को पसंद नहीं करते ,जिन्हे शार्ट कट  पसंद नहीं वे ही निरीह  और मेघावी युवा  प्रतिस्पर्धा की   भट्टी में झोंके जा रहे  हैं। ये युवा न केवल भारत  में  बल्कि  दुनिया के उन  तमाम राष्ट्रों में भी संघर्ष कर रहे हैं , जहाँ  उनके किशोर  हाथों में बन्दुक पकड़ाई जा रही है।  उनके खून के प्यासे सिर्फ मजहबी उन्मादी ही नहीं हैं , बल्कि वे भी हैं जो  बाजारीकरण -वैष्वीकरण तथा निगमीकरण के तलबगार हैं.उन्हें यह जानने की फुर्सत ही नहीं कि  इस तरह के संघर्ष से इंसान नहीं हैवान पैदा हुआ करते हैं।

        श्रीराम तिवारी

ईश्वर में आस्था बनाम  जीवन में सफलता की गारंटी:-

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    सरसरी  तौर पर आस्तिकता और अनीश्वरवाद दोनों ही एक जैसे लगते हैं  किन्तु  वास्तव में वे विपरीत ध्रुव  ही हैं। सभ्य मानव समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका अदा की है।अनीश्वरवाद तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से सदैव प्रकृति प्रदत्त है । वेशक  'मानव' ने अन्य प्राणियों  के सापेक्ष  वैचारिक और उद्द्यमशीलता  के  क्रांतिकारी झंडे गाड़े हैं. आज का वैज्ञानिक युग इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की खुरापात का परिणाम है ।   इस वैज्ञानिक विचारधारा ने संसार को अनेकों वैज्ञानिक दिए हैं। मनुष्य  को प्रकृति पर विजय पाने का जज्वा दिया है। मध्ययुग कीअर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सभ्य संसार में रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले तथा पोप -खलीफा -मठाधीश जैसे ईश्वरीय ठेकेदारों  की प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाले-केवल  साहित्यकार-कवि,लेखक या नाटककार  ही नहीं थे बल्कि जिन्होंने प्रकृति का अध्यन कर उसके नियमों का अनुशंधान कर  प्राणिमात्र से संबंध उजागर किया वे महान अनीश्वरवादी  वैज्ञा    सरसरी  तौर पर आस्तिकता और अनीश्वरवाद दोनों ही एक जैसे लगते हैं  किन्तु  वास्तव में वे विपरीत ध्रुव  ही हैं। सभ्य मानव समाज की ऐतिहासिक  विकाश यात्रा में इन  दोनों ही  'वैचारिक -गुणों'ने सार रूप में  इंसान  को उसकी  दैहिक-दैविक और भौतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कराने में  समान  रूप  से महती भूमिका अदा की है।अनीश्वरवाद तो मानव मात्र की रग़ों  में उसके आदिम युग से ही विद्द्य्मान  रहा है। यह गुण न केवल मनुष्य बल्कि सभी अन्य  चैतन्यशील  प्राणियों में भी आनुवंशिक रूप से सदैव प्रकृति प्रदत्त है । वेशक  'मानव' ने अन्य प्राणियों  के सापेक्ष  वैचारिक और उद्द्यमशीलता  के  क्रांतिकारी झंडे गाड़े हैं. आज का वैज्ञानिक युग इसी 'नास्तिक' विचारधारा  के महानतम वैज्ञानिकों की खुरापात का परिणाम है ।   इस वैज्ञानिक विचारधारा ने संसार को अनेकों वैज्ञानिक दिए हैं। मनुष्य  को प्रकृति परविजय पाने का जज्वा दिया है। मध्ययुग कीअर्ध गुलाम  दुनिया  में और यूरोप  समेत  सारे सभ्य संसार में रैनेसाँ  को  उभारने वाले ,सामंतवाद पर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले तथा पोप -खलीफा -मठाधीश जैसे ईश्वरीय ठेकेदारों  निक भी तत्कालीन निरकुंश शासकों को 'मानवीय मूल्यों' का आइना दिखा रहे थे। इनमे अधिकांस नास्तिक या बुद्धिवादी थे। केवल वाल्तेयर ,रूसो, गैरी बाल्डी  या मार्क्स -एंगेल्स जैसे अनीश्वरवादी ही नहीं बल्कि थॉमस अल्वा एडिसन,जार्ज स्टीवेन्सन ,रदरफोर्ड,फ्लेमिंग,  न्यूटन ,आर्कमिडीज ,पैथागोरस  इत्यादि नास्तिकों ने यूरोप -अमेरिका को विज्ञान के उजास से आलोकित किया तो भारतीय उपमहादीप में भी  कपिल , कणाद , ,अश्वघोष, ,भवभूति,चरक चार्वाक करहपा  जैसे नास्तिक वैज्ञानिकों ने महासागरों का घनत्व - धरती का वजन -लम्बाई-चौड़ाई  नाप  डाली थी । शून्य की खोज करना वाला ,धरती  को  गोलाकर बताने वाला  , सूरज को  स्थिर और धरती को गतिमान बताने वाले आर्यभट्ट अनीश्वरवादी हुआ करते थे। आज का अधिकांस उन्नत भौतिक संसार इन्ही तथाकथित 'नास्तिकों' की महानतम देंन  है।  इस विचारधारा में मनुष्य का अहोभाव उसकी महानता का  प्रशश्ति गान  होता रहा है। मनुष्य या मनुष्य की 'विवेक शक्ति' को ही इस संसार में सर्वश्रेष्ठ मानने  वालों का इसमें सदैव सम्मान होता रहा है।
   जहां तक 'आस्तिकता' का प्रश्न है तो वेशक  यह मानव मात्र की एक महान क्रांतिकारी वैज्ञानिक 'रचना' ही जा सकती है। इस आस्तिकता के 'दर्शन' के आविष्कार को  मष्तिष्क ने  सतत -एकल  या संगठित रूप से प्रकृति पर विजय पाने में असमर्थता की स्थति में ,व्यक्तिशः या  सामूहिक  रूप से जीवन की चुनौतियों का सामना करने में आई संकटापन्न स्थति में 'ईश्वर' तत्व का  अनुसंधान किया होगा। कब ,कहाँ और कैसे किया  ये तो अभी तक अबूझ ही है र  क्रांतिकारी खोज  

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार को कांग्रेस के हश्र से सबक सीखना चाहिए।

 कांग्रेस की  जन-विरोधी नीतियों और उस के तत्कालीन नेतत्व के  कुशासन ,महंगाई ,भृष्टाचार तथा शीर्ष  नेतत्व की जड़ता से आजिज आकर ही  मध्यप्रदेश के मतदाताओं ने भाजपा  को तथा उस की शिवराज सरकार को दुबारा सत्ता के सिंहासन पर  बिठाया है  ।  हालांकि इससे पूर्व २००३ में भी  'संघ परिवार' के तथाकथित राष्ट्रवादी -चाल -चेहरा और चरित्र के नाम पर , कुछ 'राम लला' मंदिर  के नाम पर ,कुछ हिंदुत्व  के नाम पर  , कुछ तत्कालीन स्टार प्रचारक सुश्री  उमा  भारती  की  'ताण्डवी ' वक्तृता शैली  के नाम पर , कुछ तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह जी  की हठधर्मिता और उनको   'मिस्टर बंटाढार '  निरूपित किये जाने के नाम पर - संघ परिवार और  भाजपा को मध्यप्रदेश  की सत्ता का सुख -सहज ही  प्राप्त  हो गया  था।चूँकि मध्यप्रदेश में तीसरे  मोर्चे की हालात दयनीय  है ,इसलिए विगत २०१३  के  विधान सभा चुनाव में और मई -२०१४ के  लोक सभा चुनाव में मध्यप्रदेश की जनता ने  यूपीए -२ के खिलाफ अपने आक्रोश को व्यक्त करते हुए भाजपा को  ही  तरजीह दी है  । लेकिन अब इस प्रदेश की  जनता अपने आप को ठगा  हुआ महसूस कर रही है।
                      वैसे भी  मध्यप्रदेश की जनता को  चौतरफा संकट ने घेर रखा  है। पहले केंद्र में यूपीए  की मनमोहन सरकार ने इसलिए कोई तवज्जो नहीं दी कि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार थी। कांग्रेस की सोच थी कि  जब शिवराज  जैसे  घोषणावीर सत्ता सुख भोग रहे  हैं तो  वे उसका खामियाजा भी  भुगते।उनकी  वेजा  घोषणाओं की पूर्ती कांग्रेस  या यूपीए क्यों करे ? अब  चूँकि संघ  के  प्रसाद पर्यन्त  भाजपा और मोदी जी  को  राष्ट्रीय  स्तर  पर  महाविजय प्राप्त हुई है,  केंद्र में  भी  भाजपा की  ही  सरकार है,  तो भी मध्यप्रदेश के  साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।  यह जग जाहिर  है कि  शिवराजसिंह चौहान ने कभी भी  श्री नरेंद्र मोदी का दिल से साथ नहीं दिया। वे कभी आडवाणी के खड़ाऊँ  उठाऊ बने   रहे , कभी खुद भी भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना  संजोते  रहे।   हालाँकि  यह कोई गुनाह नहीं है किन्तु जब इसी वजह से वर्तमान केंद्र सरकार याने   एनडीए या   यों कहें  कि 'नमो सरकार' की ओर  से मध्यप्रदेश को न तो रेल बजट में और न ही आम बजट में कोई खास तवज्जो दी गई हो तो फिर शिवराज  की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है।  सभी को विदित है कि  शिवराज द्वारा की गई किसी  भी आर्थिक मांग पर मोदी सरकार ने   कोई ठोस आश्वाशन  नहीं दिया  है ।उलटे  मोदी सरकार  की ओर  से मध्यप्रदेश के  किसानों की  सब्सिडी -बोनस छीने जाने की खबर  है ।  प्रादेशिक  इंफ्रास्ट्रक्चर  की किसी भी मद के लिए निवेश की किसी  प्रकार के सहयोग की सूचना नहीं   है ।

     इधर मानसून ने  भी इस बार देश  के अन्य हिस्सों की तरह  ही मध्यप्रदेश के किसानों को  भी अधमरा कर दिया है। आधी से ज्यादा बोनी या तो पिछड़ गई है या  बोनी हुई ही नहीं है।  जबकि दूसरी ओरशासन-प्रशासन में  विराजे -  भृष्ट  बाबू-अफसर - ठेकेदार -खनन माफिया,नेता  और  उनके रिस्तेदार  इस बीमारू राज्य को  बुरी तरह से लूटने -खसोटने में जुटे हैं। इस दौर के सत्तासीन तत्व  पूर्ववर्ती  कांग्रेस  की और यूपीए  की सरकारों से भी ज्यादा बुरी तरह लूट रहे हैं।
                            यह सही है कि  प्रदेश की जनता - जिसने भारी बहुमत से  भाजपा को या 'संघ परिवार' को वोट दिया  है ,वो  सदैव इस  महाभृष्ट प्रदेश सरकार का असहनीय  बोझ -ढोते रहने को  कतई  अभिशप्त  नहीं  है।  यह भरम कोई मूरख ही पाल सकता है कि  वर्तमान  'व्यवस्था' याने  मौजूदा 'सिस्टम' याने इसी भृष्ट   'प्रशासन तंत्र' के रहते  ही सत्ता परिवर्तन कर देने  मात्र से - न्याय ,शुचिता , सुशासन  तथा विकाश  की गंगा बहाना  सम्भव है !  पूर्ववर्ती सत्ताच्युत कांग्रेसी सरकार तथा  वर्तमान सत्तारूढ़  भाजपा   नेताओं का  अनैतिक  आचरण  बिलकुल एक जैसा है। भाई  भतीजावाद ,माफियावाद,दुष्प्रचार  तथा चुनावी कथनी-करनी  में दोनों एक समान हैं। जब कभी भी शिवराजसिंह  या उनकी सरकार पर अंगुली उठती है तो वे अपने पूर्ववर्तियों के काले  कारनामों की जांच की धौंस देने लगते हैं।  माना कि कोई भी  पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री भी  दूध का धुला नहीं रहा । यदि  मान भी लें कि मौजूदा  शिवराज सरकार  ने   अपने रिश्तेदारों को -सालों  को , भांजियों को ,'संघियों ' को  वास्तव में  उपकृत किया  है, तो भी कोई बेजा बात नहीं। क्योंकि  स्वर्गीय अर्जुनसिंह जी  के कार्यकाल में  तो न केवल विंध्य क्षेत्र अपितु पूरे मध्यप्रदेश ,छग और पूरे  भारत के  अन्य राज्यों  से  भी  कांग्रेस के  हजारों लाखों  अनुयाईओं  को वर्षों तक  इसी तर्ज पर उपकृत किया जाता रहा है । उनके  कार्यकाल में 'भोपाल गैस काण्ड   हुआ और हजारों मारे गए। लाखों  अपंग  हो गए। किन्तु लाखों ऐंसे भी होंगे  जिनका गैसकांड में रत्ती भर नुक्सान नहीं हुआ किन्तु इस काण्ड की ही  बदौलत  वे मालामाल होते चले गए। कांग्रेस के ही कार्यकाल  के दौरान 'एंडरसन'  को भगाने की बात लोग भूले नहीं हैं। इसी तरह ' दिग्गी राजा '  जी ने भी अनेक पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों का उद्धार किया होगा। भले ही वे  आजकल शिवराज  की मुश्कें बाँधने में व्यस्त हैं। किन्तु उनके द्वारा उपकृतों की सूची भी छोटी नहीं हैं। इसी तरह  शुक्ल  बंधू ,सेठी जी ,पटवाजी,सकलेचा जी ,जोगी जी ,जितने भी महानुभाव मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने सभी ने जी भरकर  जनता की 'सेवा'  के बहाने  मेवा भी पाया ही  होगा। लेकिन  शिवराज जी को याद रखना चाहिए कि  कांग्रेस को उसके किये-धरे का फल मिल चूका है।  जनता ने उसे  भरपूर सजा दी है। उसके किये का दंड  इतना भयावह  मिला है कि  आज कांग्रेस इस लायक भी नहीं रही कि वह  संसद में विपक्ष की हैसियत पा सके।  याने   [१०% सीटे ]  भी  हासिल कर सके।  मध्यप्रदेश  की शिवराज सरकार को  कांग्रेस के  इस हश्र  से सबक सीखना चाहिए।
             वास्तव में  तो  भाजपा ने महँगाई ,भृष्टाचार,सुशासन और विकाश के नारों के साथ ही कांग्रेस मुक्त भारत के नाम पर , देश-प्रदेश में  प्रचंड बहुमत  हासिल  किया  है.ये बात  जुदा  है कि  वो  किसी भी मोर्चे पर कुछ भी कर दिखाने  में असफल रही  है। सत्ता  पाने  के बाद  भाजपाई  भी उस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं कि  "प्रभुता पाय काहि  मद नाहीं। " इन दिनों  मध्यप्रदेश में  'कांग्रेस वनाम भाजपा  ' याने   'नागनाथ वनाम साँपनाथ 'वाला जुमला ही  सही सावित होता जा रहा  है ! जनता की नजरों में  यदि कांग्रेस  चोर सिद्ध हुई  थी तो अब  भाजपा 'डाकू' सिद्ध हो रही है। इस दौर में एक फर्क जरूर नजर आ रहा है की कांग्रेसी शासन में आलोचकों या विरोधियों को अपनी बात रखने की पूरी  आजादी थी. किन्तु भाजपा शासन में फासिस्टवाद का  बीभत्स  चेहरा  भी धीरे -धीरे सामने आने लगा है।
                          इन दिनों भाजपा  नेतत्व की असहिष्णुता  और अलोकतांत्रिकता का नंगा नाच मध्यप्रदेश में  देखने को आसानी से मिल सकता है।शिवराज  जी के बग़लगीरों पर लगे आरोपों को वे तर्क से नहीं 'चोरी और सीनाजोरी 'से या  वेशर्मी से नकार  रहे हैं। वे अपनी  शक्ल सूरत में बदलाव के बजाय आइना फोड़ने पर आमादा हैं।  जिस कार्पोरेट और सोशल  मीडिया ने सर आँखों पर  बिठाकर विजय दिलवाई उसे अब  आँखें दिखाएँ जा रहीं हैं।शिव सेना  के "सामना' की तर्ज पर मध्यप्रदेश   के 'शिवगण' भी 'आग उगलु'  अखवार निकालने की जुगत  भिड़ा रहे हैं।  है। वर्तमान सत्तापक्ष तो आलोचना का एक लफ्ज  भी  सुनने  को तैयार नहीं हैं।
                                         शिवराज सरकार की एक वानगी  देखें   ग्वालियर के एक सामाजिक कार्यकर्ता और ' व्यापम' घोटाले में मुख्यमंत्री श्री  शिवराजसिंह चौहान की भांजी सहित सात अन्य 'भांजे-भांजियों'  के प्रकरण में किये गए भृष्टाचार को उजागर करने वाले आशीष चतुर्वेदी को जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं।  सम्पूर्ण भारत में व्याप्त भयानक भृष्टाचार ,रिश्वत खोरी और  नेताओं के परिवारवाद  की लूटखोरी के सापेक्ष   मध्यप्रदेश में भाई-भतीजावाद  ,माफियावाद, भृष्टाचार ,हत्याएं,लूट,और रिश्वतखोरी  जरा  कुछ ज्यादा ही  है।  शासन-प्रशासन में जोंक की तरह चिपके  कुछ  भृष्ट  अफसरों ने,माफियाओं ने और सत्तारूढ़ दल के कुछ हितग्राहियों ने  अकूत धन अर्जित किया है। शिवराजसिंह सरकार के   कार्यकाल  में जितने घोटाले हुए  हैं  या हो रहे हैं ,उनके सामने कांग्रेसियों के घोटाले तो  बहुत  बौने  और छुद्र  लगते हैं।
       आरटीआई आशीष चतुर्वेदी  पर तीन जानलेवा हमले हो चुके हैं। जब उन्होंने इसकी शिकायत पुलिस में की तो उनसे सुरक्षा  के एवज में ५०००० रूपये मांगे गए। परेशान होकर चतुर्वेदी जी न्यायालय  का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं। वे  खुद को  काफी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसी तरह व्यापम घोटाले के 'विसिल ब्लोवर' इंदौर के  डॉ आनंद राय को भी  धमकियां मिल रहीं हैं। पुलिस और प्रशासन सुरक्षा देने  से आनाकानी कर  रहा है । भोपाल  ,इंदौर  , ग्वालियर तथा अन्य शहरों में  भी  इसी तरह  सामाजिक  कार्यकर्ता और आरटीआई कार्यकर्ता असुरक्षा की जद  में  हैं। जबकि   महाभृष्ट व्यापम परीक्षा नियंत्रक-पंकज त्रिवेदी  ,  सहयोगी भृष्टाचारी नितिन महिंद्रा , खनन और व्यापम माफिया -सुधीर शर्मा , पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा  , ओ एस  डी  शुक्ल तथा अन्य अनेक नामचीन्ह  'सत्ता के दलाल' जेलों में भी मदमस्त हैं। इंवेस्टिगेसन के नाम पर एसटीएफ ने गिरफ्तारी का ड्रामा  तो किया  पर ये नापाक ताकतवर लोग जेलों में भी महफूज हैं। मजामौज कर रहे हैं। ये  कोई मामूली चोट्टे नहीं  हैं बल्कि ये  तो वर्तमान  चुनाव प्रणाली में  सत्तारूढ़ पार्टी को धन आपूर्ति के इंतजाम   अली हैं। ये तो इस व्यवस्था में चंद दलालों के नाम भर हैं। इस खेल में बड़े-बड़े ओहदेदार  और भी शामिल हो सकते  हैं किन्तु एसआईटी की जांच  के बहाने मामला रफा दफा किये जाने के प्रयास जारी हैं। यही वजह है  कि  न  केवल विपक्षी  पार्टियाँ  बल्कि  सुश्री उमा भारती सहित  कुछ अन्य भाजपाई भी सीबीआई जांच की मांग करने लगे हैं। लगता है  इस बहाने कुछ खास लोग भी अब   शिवराज को 'खो' करने की फिराक में हैं। किन्तु इससे 'व्यापम भृष्टाचार' या पीएससी घोटाले से पीड़ित युवाओं  को न्याय कैसे मिलेगा ? वास्तव में जिस तरह यूपीए के काले कारनामों को उजागर करने में  उसे सत्ता से वेदखल करवाने  में  जन-आंदोलनों के अलावा -अदालत की भी सार्थक  भूमिका रही है , उसी भाँति  अब  मध्यप्रदेश सहित देश के अभी राज्यों में  चल रहे भृष्टाचार और घोटालों पर भी अदालत की न्यायिक सक्रियता अपेक्षित है। जनता को भी  सुनिश्चित करना होगा कि  ईमान की रोटी  चाहिए  तो अनवरत संघर्ष करके अपना हक हासिल  करें न कि सत्ता के दलालों को रिश्वत देकर ,वोट देकर या सम्मान खोकर  अपनी आत्मा को बेचने का दुष्कर्म करते रहें।
                     चूँकि आज   न केवल मीडिया के सवालों  से , न केवल जनता  के  विरोधी तेवर  से  न  केवल  विपक्षी कांग्रेस पार्टी के  अप्रत्याशित  हमलों से   बल्कि खुद उन्ही की पार्टी -भाजपा के मोदी समर्थक धड़े की बक्र दॄष्टि से शिवराज सिंह चौहान सरकार न केवल  संदेह के घेरे में है बल्कि  डगमगा  भी रही है। यह सरकार न  केवल जनता की नजरों से गिर रही है बल्कि 'संघ परिवार' के बुजुर्गों -चिंतकों ,बौद्धिकों और  'प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नजरों में  भी उसका कोई विशेष सम्मान नहीं रह गया है। विगत दिनों मोहन खेड़ा तीर्थ में संपन्न 'संघ' के विशेष सम्मेलन में सीएम - शिवराज सिंह को इस बाबत  'काफी फटकार  भी लग चुकी  है।  उनके  निजाम में ,उनके  मुख्यमंत्रित्व में व्यापम और अन्य घोटालों की  जो आंच 'सघ' तक पहुंची  है , लगता है कि उससे संघ  भी  आहत  है।  अब यदि 'नमों ' को लम्बी पारी खेलना है तो  वे भी इस दकियानूसी पतनशील सिस्टम में थेगड़े लगाने के बजाय  उसके आमूल-चूल बदलाव की बात करें। राजकोष में इजाफे के लिए , विकाश -खर्चों की   पूर्ती के लिए ,वांछित धन को हासिल किये जाने बाबत  मनमोहनसिंग की  बदनाम आर्थिक नीति को कट्टरता से लागू करने  के बजाय, 'नमो 'को खुद  अपनी ही  पार्टी के बदनाम  चेहरों से निजात पाने का सिलसिला जारी रखना  चाहिए ।उन्होंने  जिस काले धन को स्वटजरलैंड से वापिसी का जनता से  चुनावी वादा किया था   वो तो कभी भी संभव नहीं  है। किन्तु उससे ज्यादा पैसा उन्हें  मध्यप्रदेश के भू माफियाओं से  , भृस्ट -बेईमान अफसरों से , सट्टा बाजार के खिलाडियों से ,दो नंबरी - व्यापारियों  से और करप्ट नेताओं  से  भी  मिल सकता है । यदि नरेंद्र मोदी यह कर पाते हैं  तो  इनके लिए  इससे बड़ा लोकप्रिय  और देशभक्तिपूर्ण  कार्य  और क्या  हो सकता है ?

                      श्रीराम तिवारी
                    
                                           
                                                  

सोमवार, 21 जुलाई 2014

हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो !!





     माँ की तस्वीर हो ,माथे कश्मीर हो ,

    धोए  चरणों को सागर का पानी हो।

    पुरवा गाती रहे ,पछुआ गुनगुन करे ,

    मानसून की सदा  मेहरवानी   हो।।

  सावन सूना न हो ,भादों रीता न हो ,

 नाचे वन-वन में मोर- मीठी वाणी हो।

 यमुना कल-कल करे ,गंगा निर्मल बहे ,

 कभी रीते  ना   रेवा  का पानी हो।।

 बाएं अरुणांचल ,दायें कच्छ का रण ,

 ह्रदय गोदावरी- कृष्णा  -कावेरी हो।।

उपवन खिलते रहें ,वन महकते रहें ,

खेतों -खलिहानों में हरियाली हो।

लूटखोरी  न हो ,बेकारी  न  हो ,

भृष्ट सिस्टम की   बाकी निशानी न हो।।

डरें  पापों के भोग ,पलें  मेहनतकश लोग,

मिटे शोषण की अंतिम निशानी हो।

फलें फूलें दिग्दिगंत ,गाता आये वसंत,

हर सवेरा नया और  संध्या ,सुहानी हो।।

    
        :- श्रीराम तिवारी -:


[ मेरे प्रथम  काव्य संग्रह -अनामिका से उद्धृत -समसामयिक पावस गीत ]


 

बुधवार, 16 जुलाई 2014

क्योंकि स्वाभिमान के साथ आपको भी जिन्दा रहना है।




    जब आप बीमार हों ,तो डाक्टर को दिखाइए ,

   क्योंकि डाक्टर को सपरिवार  जिन्दा रहना है।

  डाकटर दवा लिख दे तो मेडिकल स्टोर  जाइए ,

  क्योंकि दवा बिक्रेता को भी  जिन्दा रहना है।।

  दवाएं खरीदकर आप नाली में फेंक दीजिये ,

  क्योंकि  आप को भी  कुछ दिन और  जिन्दा रहना है।


  यदि आप हैरान -परेशान  और मुशीबतजदा  हैं तो ,

 पीरों- पैगंबरों ,संतों -महंतों - मजहबी ठिकानों को  -

 यथाशक्ति दक्षिणा दीजिये - प्रदक्षिणा  भी कीजिये  ,

क्योंकि धर्म-मजहब के ठेकेदारों को जिन्दा रहना है।


  यदि आप वेरोजगार हैं और रोजी -रोटी चाहिए   ,

 यदि आप ईमानदार-मेहनतकश इंसान हैं ,

 यदि आपका ईमान जिन्दा है -आप देशभक्त हैं ,

यदि आपको अवसर  से महरूम किया गया  है ,

यदि आप व्यापम  की बदकारी या मुन्नागिरी से दूर हैं ,

यदि आप बाबू-अफसर-मंत्री को -

रिश्वत देने में असमर्थ  हैं ,

यदि आप साम्प्रदायिकता और कदाचार को-

 राजनैतिक भृष्टाचार को -राष्ट्र का कैंसर समझते हैं ,

तो अपनी संगठित आवाज बुलंद कीजिये -

क्योंकि स्वाभिमान के  साथ आपको भी  जिन्दा रहना है।


  श्रीराम तिवारी 





 

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

प्यास सबकी बुझा दे ,घटा ऐंसी आ जाना !



      मुरझाया चमन कैसा  ,सावन के महीने में।

     आसमा भयावह है  ,कसक प्यासे पपीहे में।।


   आदत पुरानी है ,उसे  चोट     खाने    की।

   जब -जब  जागा  नसीब  ,आई  बेला रुलाने की ।।


  रीते - रीते  मेघों  को , बहुत  देखा -सुना -जाना।

  प्यास सबकी  बुझा दे ,घटा ऐंसी  आ  जाना।।


  दिल का  जख़्म भर दे ,दवा ऐंसी दे जाना।

  ग़मों के हिमालय  को ,काली घटा ले जाना ।। 

  धूं -धूं जलती धरा ,मेघदूत    आ        जाना।

सावन -भादों बरसने  दो , तब तुम चले जाना।।


                श्रीराम तिवारी