गुरुवार, 10 मार्च 2011

यू. पी. की जनता नये सामंती शिकंजे में-.. यौर ओनर की नज़रें इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी...

हम भारतवासी सदियों की गुलामी से तो आजाद हो गए किन्तु गुलामों जैसी मानसिकता से छुटकारा पाने के लिए ६४ वर्ष पर्याप्त नहीं हैं. जिन से उम्मीद बनी थी कि ये दमित-शोषित-पीड़ित समाज का उत्थान करेंगे वे 'माया' के वशीभूत होकर अनीति,अलोक्तान्त्रिकता और अमानवीयता के अलमबरदार बन चुके हैं. बागड़ ही खेत चर रही हो तो क्या कीजियेगा? कविवर मुकुटबिहारी 'सरोज' कि चार पंक्तियाँ प्रासंगिक हैं ;-


ये दर्द नासूरी है / इलाज जरुरी है /चीरफाड़ जरुरी है /

लोग कहेंगे कि ये तो हिंसा है /पर क्या करें मजबूरी है /

उत्तरप्रदेश में लोकतंत्र और मानवीय मूल्य खतरे में हैं. मायावती जैसी पद-लोलुप, नलोलुप और दंभ-लोलुप महिला को यू पी कि सत्ता में बिठाने के लिए कांग्रेस ,भाजपा, सपा और बसपा तो जिम्मेदार हैं ही , यू पी कि जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है. कांग्रेस इसलिए जिम्मेदार है कि आजादी के बाद उसे पूरे ४५ साल मिले थे यू पी पर राज करने के लिए ,किन्तु उसने वर्गीय समाज को समतामूलक और आर्थिक रूप से सशक्त करने के बजाय सिर्फ सत्ता कि सीढ़ी ही समझा, अतएव आफत कि मारी जनता ने जातीयतावादी ,साम्प्रदायिक ताकतों को क्रमशः आजमाया.

जब दलितों और पिछड़ों को लगा कि वे कांग्रेस के हाथों छले जा रहे हैं , तो उन्होंने लोहियावादियों को, आंबेडकरवादियों को भी सत्ता में मौका दिया ,पहले मुलायम और फिर भाजपा ,फिर मुलायम जब इन सबने निराश किया तो अब फिर माया .इस तरह यू पी ने "सब कारे आजमा लिए"अतेव आज यू पी में तारीफ के लिए सिर्फ दो चीजें बची हैं एक-पोलिस का आतंक और दूसरी -महिलाओं पर अत्याचार. सर्वाधिक अत्याचारों के लिए मायावती का नाम इतिहास में दर्ज किया जायेगा. एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के सबसे अमीर और भृष्ट मुख्यमंत्री का नाम है- मायावती और सबसे ईमानदार और कम पैसे वाला मुख्यमंत्री है -बुद्धदेव भट्टाचार्य.

विगत ९ मार्च -२०११ को उत्तरप्रदेश सरकार के खिलाफ सपा के आन्दोलन पर पुलिस अत्याचार देखकर जिसके रोंगटे खड़े न हों वो ही मायावती को सहन कर सकता है. लोकतान्त्रिक और अहिंसक आन्दोलन को जलियांवाला बाग़ कि तर्ज पर घेर कर क्रूरतापूर्वक पुलिसिया बूटों से लोगों को कुचला गया, उन्हें घसीटा गया और इस हरकत में आला-अफसर बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे -मानो मायावती के कृपा-कटाक्ष के लिए ही ये सब वीभत्स दमनात्मक कार्यवाही कि गई हो.



जिस प्रदेश के आई ए एस इतने गिरे हुए हों कि भ्रष्टतम नेताओं या नेत्रियों के जूते साफ़ करना अपनी शान समझते हों , जिस प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी बसपा के बाहुबली नेता बलात्कार और हत्याओं के कीर्तिमान बना चुके हों ,जिस प्रदेश कि मुख्यमंत्री करोड़ों कि माला पहनकर देश और प्रदेश कि नंगी-भूखी गरीब जनता को कीड़े-मकोड़े समझकर पुलिस के बूटों तले मसले जाने योग्य समझती हो उस प्रदेश पर अब माननीय उच्चतम न्यायालय कि कृपादृष्टि ही अपेक्षित है . क्योंकि केंद्र कि मजबूर सरकार के सामने सौ अफ़साने हैं. निस्संदेह मायावती ने न केवल भृष्टाचार के नए कीर्तिमान गढ़े हैं,बल्कि शोषण-दमन और आतंक की वे पर्याय बन चुकी हैं. इसके लिए यू पी कि जनता भी जिम्मेदार है किन्तु यू पी की जनता यदि देश का इतिहास बदल सकती है तो अपने प्रदेश कि भी किस्मत बदलने का वह जरुर अवसर देख रही है. तब तक भारत कि न्यायिक सक्रियता का एक नमूना यू पी के मदमस्त नेताओं और नौकरशाहों को जरुर दिखाया जाना चाहिए. कवन सौ काज कठिन जगमाहीं ....माननीय 'यौर ओनर' की नजरे इनायत हो तो बड़ी कृपा होगी............ श्रीराम तिवारी

राष्ट्रीयतावादी कांग्रेस ने क्षेत्रीयतावादी द्रुमुक के सामने झुकने से इनकार कर क्या ग़लत किया?

       गठबंधन की राजनीति से देश और प्रजातंत्र को क्या फायदा हुआ या आगे होगा यह कहना मुश्किल है.यह स्पष्ट है कि
  कि  क्षेत्रीयतावादी ,जातीयतावादी, व्यक्तिवादी ,इलिमवाला,फिलिमवाला और संप्रदायवाला खूब फलाफुला.  
यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि जिस मतान्ध विचारधारा ने राजीव गाँधी का क़त्ल किया उसके परिवर्ती संवाहक  स्वयम श्री करूणानिधि रहे हैं.   उनकी द्रविण मुनेत्र कड़गम भी   प्रभाकरण  और  लिट्टे  को   पयपान कराती रही है.  ऐसी अलगाववादी ,हिन्दी विरोधी और महाभ्रष्ट  क्षेत्रीय पार्टी को लतिया कर सोनिया गाँधी ने जो किया उससे न केवल  कांग्रेस अपितु देश का भी कुछ भला होगा ऐसी आशा की जानी चाहिए.
                               करूणानिधि या द्रुमुक ने तमिलनाडु को तो वर्षों पीछे धकेला ही है किन्तु अपने मंत्रियों के मार्फ़त अपने विशाल कुनबे  का न केवल भरणपोषण अपितु इस परिवार की भावी पीढ़ियों
 के ऐशो-आराम का भी इंतजाम कर दिया है.दयानिधि मारन,टी आर बालू , ऐ.राजा  ,कनिमौझी ही नहीं बल्कि पूरा द्रुमुक परिवार  ही भृष्टाचार की वैतरणी में फुदक रहा है. जयंती नटराजन और कांग्रेस के शुभचिंतकों ने कांग्रेस हाई कमान को सलाह दी कि द्रुमुक हमारे साथ रहे या न रहे ,हमें अब कोई फर्क नहीं पड़ता.उनका निष्कर्ष है कि आगामी विधान सभा चुनावों में द्रुमुक का पराभव निश्चित है अतएव जयललिता को और तमिल जनता को  ठोस सन्देश भेजा जाये कि न केवल वर्तमान दौर के भृष्टाचार के लिए बल्कि तमिलनाडु कि जनता कि मौजूदा परेशानियों -महंगाई ,बेकारी, भृष्टाचार और भाई-भतीजावाद के लिए जो जिम्मेदार हैं ,उस द्रुमुक से  हम {कांग्रेस} नाता तोड़  रहे हैं. उसकी पारिवारिक ध्रुष्ट्ताओं का खामयाजा कांग्रेस क्यों भुगते?
        इससे से पूर्व की जयललिता के पिद्दे-घोड़े आगे बढ़ पाते करूणानिधि ने अंतिम प्रयास  हेतु अपने विश्वस्तों  को सोनिया दरबार  में भेज दिया. करूणानिधि को भारत की जनता से कोई लेना देना नहीं, तमिल जनता और  तमिलनाडु तो उनके परिवार का साम्राज्य  हैं. कांग्रेस से नाता टूटा तो अभी तो सिर्फ ए राजा ही जेल में हैं ,आइन्दा दयानिधि मारन,कावेरी मारन, कनिमौझी,ए बालू तो बो बालू पता नहीं कौन -कौन तिहाड़ प्रवास पर होंगे.सो घबराहट में कांग्रेस के उन दिग्गजों को जो की इस गठबंधन के शिल्पकार हुआ करते थे उन्हें स्मरण किया और उनके ही सुझाव पर यह पुनर मूषको भव का नाटक खेला गया.सोनिया जी ने द्रुमुक दूतों की कैसी लू उतारी और कांग्रेस को भले ही सत्ता से जाना पड़े तो मंजूर ,किन्तु एक परिवार विशेष के लिए कांग्रेस को कुर्वान नहीं किया जा सकता,६० या ६३ सीटें तो प्रतीक मात्र थीं वास्तविकता यही है की कांग्रेस की इस दौर में बीसों घी में हैं. देश का हर जिम्मेदार दल भाजपा या वाम कोई भी देश में तुरंत लोक सभा के चुनावों के लिए तैयार नहीं. प्रकारांतर से ये सभी विपक्षी दल किसी तरह के नकारात्मक ध्रुवीकरण के पक्ष में तो बिलकुल नहीं ,द्रुमुक या उन तत्वों से तो अभी सभी अपना दामन बचाना चाहेंगे.
          सोनिया जी ने द्रुमुक के संकट से कांग्रेस को तात्कालिक  राहत  पहुंचाई यह अन्य राष्ट्रीय दलों के लिए एक सबक है कि क्षेत्रीयतावाद ,भाषावाद या साम्प्रदायिकतावाद के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण को शिद्दत से जनता के बीच ले जाकर  महंगाई ,भृष्टाचार ,बेरोजगारी तथा अन्य प्रासंगिक  विषयों पर आगामी विधानसभा के चुनाव फेस करना चाहिए ,यही  लोकतंत्र और देश के प्रति राष्ट्रीयतावादी उत्तरदायित्व होगा...........श्रीराम तिवारी
       

मंगलवार, 8 मार्च 2011

प्रधान मंत्री की एक ओर अग्नि परीक्षा -मोदी कमेटी पर अमल कैसे हो?

     चौतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यु पी ऐ सरकार को कहीं ठौर नहीं है. निरंतर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और विपक्षी हंगामों के चलते जांच-पड़ताल और ठोस  नतीजों की अपेक्षा सुनिश्चित करने में जुटी सरकार और कांग्रेस के दिग्गज सिपहसालार एक नई चुनौती से रूबरू होने जा रहे हैं.
       महंगाई पर काबू पाने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गठित महंगाई- रोधी कमेटी ने द्रढ़ता के साथ निर्णय लिया है कि 'वायदा बाजार'  कारोबार तुरंत बंद किया जाना चाहिए यह एक एतिहासिक और महत्वपूर्ण  दूरगामी प्रगतिशील फैसला है, नाकेवल सत्तापक्ष  अपितु विपक्ष का प्रमुख दल भाजपा भी इस फैसले से यु  निश्चित ही द्विविधा में होगा .जहां तक वाम पंथ का सवाल है इसे तो मानो बिन मांगेमुराद मिली  ;क्योंकि विगत यु पी ऐ प्रथम के दौर से ही वाम ने  वायदा बाजार को महंगाई का एक बड़ा कारक सावित कर इसे समाप्त करने कि रट लगा राखी थी . तब प्रधानमंत्री जी ने कोई ध्यान नहीं दिया था .किन्तु विगत वित्तीय सत्र २००९-२०१० में   महंगाई से मची त्राहि -त्राहि को जब संयुक विपक्ष ने मुद्दा बनाया तो   प्रधान मंत्री जी ने गत अप्रैल-२०१० में महंगाई पर रोक लगाने बाबत महंगाई-रोधी कमेटी गठित की. महाराष्ट्र , तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सदस्य के रूप में शामिल किये गए और गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को अध्यक्ष बनाया गया. विगत वर्षों में भी जब संसद और उसके बाहर सड़कों पर विभिन्न राजनैतिक दलों ने आवाज उठाई तो कोई भी इसी तरह की कमेटी बिठाकर मामले की आंच को धीमा किया गया, योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने भी पहले तो वायदा कारोवार के विरोध में रिपोर्ट वनाई किन्तु दिग्गज खाद्द्यान्न माफिया के प्रभाव ने रिपोर्ट को वायदा बाजार का समर्थन करते हुए दिखाने पर मजबूर कर दियाथा. नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने महंगाई जैसे मुद्दे पर सुझाव देने में भले ही ११ महीने लगाए हों किन्तु वायदा बाजार का स्पष्ट विरोध करके अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूर्ण की है. देखना यह है कि अब इस रिपोर्ट को लागू करने में सरकार कितना समय लेती है . वैसे केंद्र सरकार को शायद न तो महंगाई की चिंता है और न घोटालों की.
                      देश को वैश्वीकरण की राह पर ले जाने वाले हमारे प्रधान मंत्री जी हर जगह विवश और ढीले नजर आ रहे हैं. उनका दर्शन था की कोई और विकल्प नहीं है सिवाय एल पी जी के. यदि विकल्प नहीं थे तो अब मोदी कमेटी के सुझाव पर तो  अमल  करो. 
   देश में भरी बेरोजगारी बढी है, परिणामस्वरूप चोरियां ,ह्त्या लूट ,डकेती और बलात्कार आम बात हो चुकी है. लोग न घर में सुरक्षित हैं और न बाज़ार में.
      अधिकांश   विपक्ष और मुख्यमंत्री इस वायदा बाज़ार को बंद करने के पक्ष में हैं. वायदा कारोबार का मुद्दा सीधेतौर से महंगाई से जुड़ा है . कृषि जिसों में अरबों रूपये के वायदा सौदे हो रहे हैं. इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बड़े-बड़े औद्योगिक  घराने भी कूद  पड़े हैं . किसान वर्ग को इससे से रत्तीभर फायदा नहीं है. भृष्ट व्यपारियों ,बड़े अफसरों और सत्ता में बैठे मंत्रियों की इस सबमें हिस्सेदारी है.
   आज देश घोटालेबाजों ,सट्टेबाजों के चंगुल में सिसक रहा है. आम जनता त्राहि-त्राहि कर रही है. कहा जाता है कि महंगाई तो सर्वव्यापी और सर्वकालिक है. क्या बाकई यह सच है? नहीं..नहीं...नहीं...
       विश्व कि महंगाई और भारत कि महंगाई में कोई समानता नहीं. विश्व के कई देशों में खाद्यान्न  कि भारी कमी है,  जबकि भारत में गेहूं-चावल के भण्डार भरे हैं और रखने को गोदाम नहीं, सो खुले में रखा -रखा सड़ रहा है. यदि दयालु न्यायधीश कहते हैं कि गरीबों में बाँट दो तो सरकार मुहं फेर लेती है.क्यों? शक्कर के भण्डार भरे पड़े हैं. कमी थी तो रुई और यार्न को निर्यात प्रोत्साहन क्यों? गरीब दाल-रोटी मांगता है आप उसे मोबाइल और इन्टरनेट का झुनझुना पकड़ा रहे हैं. भारत में महंगाई का मूल कारण मुनाफाखोरी और सरकार की जन-विरोधी नीतियाँ हैं मोदी कमेटी ने यदि वायदा बाजार को बंद करने की सिफारिश  की है तो केंद्र सरकार उस पर अमल क्यों नहीं कर रही? यदि सरकार इस रिपोर्ट को मानने से इनकार करती है तो देश  के साथ और खास तौर से देश की निम्न वित्तभोगी जनताके साथ नाइंसाफी तो  होगी ही , साथ ही भाजपा के उदारपंथियों पर उग्र  दक्षिणपंथ के नायक नरेंद्र मोदी की बढ़त में भी कोई नहीं रोक सकेगा.
                             श्रीराम तिवारी

सोमवार, 7 मार्च 2011

भारत रूपी गेंहूँ को भृष्टाचार का घुन आजकल में नहीं लगा.....

संसद के विगत शीतकालीन सत्र में टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर एन डी ऐ और वामपंथ ने २० दिन  तक संसद के बाहर सत्यागृह और प्रदर्शन करते हुए वर्तमान यु पी ऐ द्वितीय सरकार को संयुक्त संसदीय समिति बनाने पर मजबूर किया.यद्यपि सारे आरोप सही हैं किन्तु क्या इस भृष्टाचार का इतिहास सिर्फ एक दो सालों का है या की ये सिलसिला वर्षों से चला आ रहा था चूँकि अब ये सब असहनीय हो चला है सो न्यायिक सक्रियता के हुंकारे में विपक्ष ने भी लगे हाथ अपना दायित्व पूरा कर दिखाया .
एक विचित्र संयोग है कि जहां एक ओर  कतिपय स्वनाम धन्य ईमानदार{?}सफ़ेद पोश
लोग लगातार भृष्टाचार पर अपना  ध्यान केन्द्रित किये हुए हैं, और भारत को दुनिया में भ्रष्टतम देश सावित करने में जुटे हुए हैं. वहीं दूसरी ओर विश्व स्तरीय  'ग्लोवल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच' के प्रवक्ता रिचर्ड हंटर ने कहा है कि "भारत में भृष्टाचार औरों कि बनिस्पत कम है" अमेरिका .ब्रिटेन और अरब राष्ट्रों में तो इन्तहा हो चुकी है. फिर भी सदियों तक गुलाम रही,  शोषण की अनवरत शिकार जनता मानती है कि   भारत में इतना भृष्टाचार है कि गिने-चुने सरकारी विभागों को छोड़कर कहीं भी बिना कुछ दिए लिए कोई काम नहीं होता, यदि आपका राजनैतिक रुतवा है या आप "धाक" रखते हैं तो विना दिए लिए घर बैठे भी आपका उल्लू  सीधा हो सकता है, ये रीति सनातन से चली आ रही थी किन्तु जब से मनमोहनी  नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का आगाज हुआ है तबसे प्रतिस्पर्धा में निर्वल वर्ग बेहद तेजी से  पिछड़ रहा है, सवल को तेजी से  ताकत के इंजेक्सन देकर उतरोत्तर सफलता के शिखर पर पहुँचाया जा रहा है. कुछ  ताकतवर लोग जो इस भ्रष्ट व्यवस्था में अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुजार चुके हैं, शायद ऊबने  लगे हैं या अब अपनी वैयक्तिक ख्याति और चरम यश- लोलुपता के आवेग में सरकार पर लाल-पीले हो रहे हैं. जबकि दूरगामी  राष्ट्रीय हितों से सरोकार रखने वाले  कोई वैकल्पिक उपाय उनके पास नहीं हैं. वे अर्थशाश्त्र, राजनीति, अधुनातान साइंस और टेक्नालोजी के बारे में ककहरा भी नहीं जानते लेकिन वे किसी खास अनुत्पादक पेशे से ताल्लुक रखने के कारन आधुनिक परजीवी वर्ग में अपनी पेठ बना चुके ये ढपोरशंखी चाहते हिं कि देश में, हर घर में भगतसिंह पैदा हो किन्तु उनके अपने घर में नहीं. देश की ८०% मेहनतकश जनता को-जो रोज कमाती और बड़ी मुस्किल से उदरपूर्ती के साधन जुटा पाती है, इन तथाकथित स्वनामधन्य "ईमानदारों" 
 से कोई लेना -देना नहीं. किसी को यकीन न हो तो दिल्ली-मुंबई ,कलकत्ता मद्रास में भवन निर्माण में लगे या सड़कें बनाने में जुटे किसी मजदूर से पूंछे की किरण बेदी या स्वामी अग्निवेश कौन हैं?अन्ना हजारे या अरुंधती कौन हैं? खेतों में पसीना बहाते किसी खेतिहर मजदूर से पूंछो या झाबुआ ,अबूझमांड के आदिवासी से पूंछो  कि लोम-विलोम वाले बाबाजी का नाम क्या है? प्राणायाम क्या   होता है? भृष्टाचार क्या है ?लब्बो लुआब ये है कि वर्तमान दौर के इन सफ़ेदपाशों ने यदि  गजानन माधव मुक्तिबोध,दुष्यंतकुमार,गणेशशंकर विद्ध्यार्थी या हरिशंकर परसाई ,शरद जोशी जैसें साहित्यकारों को ही  ठीक से पढ़ा होता तो भृष्टाचार और राजनीति पर इस तरह कि तोतली बातें  नहीं करते.इन सस्ती लोकप्रियता के सम्बाह्कों में से कोई भी दूध का धुला नहीं है  चाहे वो कितना भी ईमानदार  क्यों न बनता हो दावे से नहीं कह सकता कि वह वर्तमान दौर के जिम्मेदार  राजनीतिज्ञों{कांग्रेसी ,भाजपाई ,वामपंथी} का बेहतर विकल्प बन सकता है.सत्ता में जो हैं उनकी जबाबदेही जनता और जनता कि सबसे बड़ी पंचायत अर्थात संसद के प्रति है,सत्ताधारी लोग यदि गलत करते हैं तो जनता अपने मताधिकार कि ताकत से सत्ताचुत कर सकती है.आज जो विपक्ष में हैं वे अपने उत्तरदायित्व का भरसक निर्वहन कर ही रहें हैं कल को सत्ता में भी आ सकते हैं. न्यायपालिका कि सक्रियता जग जाहिर है.यदि सत्ता पक्ष ने कुछ ऐसा वैसा किया है तो भारत कोई ट्युनिसिया नहीं ,मनमोहन सिंह कोई  गद्द्फी नहीं ,भारत कि जनता कोई भेड़िया धसान नहीं.कुछ भी जनता के नियंत्रण से बाहर नहीं.
                                        किरण कर्णिक ने प्रधानमंत्री जी को   तथाकथित एस -बैंड स्पेक्ट्रम स्केम के बारे में पत्र लिखा है.तदनुसार अव्वल तो इसरो ने किसी को कोई स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं दूसरी बात जो रेखांकित कि गई वो ये कि इसरो के पास स्पेक्ट्रम नहीं बल्कि "आर्विट स्लाट्स" हैं.यह विद्दयुत चुम्बकीय तरंग क्षेत्र {स्पेक्ट्रम}न होकर एक किस्म का अंतर राष्ट्रीय अनुबंध का भारतीय  अन्तरुक्षीय पारगमन क्षेत्र है .देवोस  कम्पनी को इसे ऐसे ही दे देने का सवाल ही नहीं था.इन 'आर्विट स्लाट्स' को खरीदने जब कोई नहीं आया तो देवोस से एम् ओ यु बाबत चर्चा  शुरूं ही  हुई थी कि 'दूध के जलों ने छांछ फूंकना'शुरू करदिया.अधकचरे ज्ञान वाले मीडिया और विकृत मस्तिष्क के उपरोक्त सयानो ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा भृष्टाचार निरुपित करते हुए    केंद्र सरकार पर हल्ला बोल दिया.अब जांच जारी है.जांच में क्या निकलेगा?जब कुछ हुआ ही नहीं तो नतीजा सिफ़र ही होगा.
          निसंदेह आज के निजीकरण -उदारीकरण -भूमंडलीकरण के दौर ने दुनिया को एक गाँव जैसा बना दिया है,जिस तरह गाँव का बदमासऔर दवंग  किसान अपने खेत की मेंड़ पर खड़े होकर अपने बेलों को दूसरे के खेत में चराता है;उसी तरह बाजारीकरण के दौर ने शक्तिशाली मुल्कों कोयह अवसर प्रदान किया है कि वे  निर्वल राष्ट्रों में अपनी घटिया कालातीत तकनीकी खपायें .अपने अनियंत्रित उत्पादनों को तथाकथित अविकसित या विकाशशील देशों में एन -केन-प्रकारेण जबरन खपायें.  इन सब खुरापातों के लिए ये पूंजीवादी मुल्क आपस में एका करके  विशेष फंड  में कुछ रकम भी  खर्च करते हैं,यही आवारा पूँजी वास्तव में तमाम आधुनिक बड़े -बड़े काण्डों की जननी है . 
         इस नव्य उदारवाद कि आवारा पूँजी से भारत जैसे देशों में  सरकारें बनती हैं .सांसद खरीदे ,बेचे जाते हैं,गठबंधन होते हैं,उन्हें चलाने कि मजबूरियाँ होतीं हैं ,राजा होते हैं ,रादियायें होतीं हैं.कभी एन डी ऐ सत्ता में होता,कभी यु पी ऐ सत्ता में होता,कभी चारा घोटाला होता ,कभी बोफोर्स घोटाला होता ,कभी टू -जी स्पेक्ट्रम घोटाला होता ,कभी कामनवेल्थ कांड होता और कभी तेलगी ,कभी हसन अली घोड़े वाला -हवाला कांड होता .ये एक सतत प्रक्रिया है जो एन डी ऐ ,यूपी ऐ के ही नहीं बल्कि तब थी जब आदरणीय मनमोहनसिंह जी वित्त मंत्री हुआ करते थे .ये भृष्टाचार कि गटर गंगा तब भी बहा करती थी जब इंदिरा -मोरारजी या नेहरु थे.ये नासूर तब भी था जब अंग्रेज थे और तब भी था जब मुग़ल थे.फर्क सिर्फ इतना है किलक्ष्मी  पहले बहुत कम लोगों को पतित कर  पाती थी .अब इस बाजार बाद ने अधिक से अधिक लोगों को भृष्ट बना दिया है . यक्ष प्रश्न ये है कि या तो हम सब ईमानदार हो जाएँ या जो अभी तक इस गटर में नहाने से वंचित हैं उन्हें भी मौका दिया जाए.चूँकि ये दोनों ही असम्भव विकल्प हैं  अतएव जो कम बेईमान हो उसे सत्ता में और राजनीति में स्वीकार्य बनाया जाये.                                   श्रीराम तिवारी
      

शनिवार, 5 मार्च 2011

मेरी नज़र में ऐसे थे- दाऊ अर्जुनसिंग...

  1.  यदि   भारतीय राजनीति के विगत ६ दशकों की  राजनीतिक हस्तियों को  उनके- व्यक्तित्व,कृतित्व,विचारधारा,  ,शैक्षणिक योग्यता, लोकप्रियता  एवं सामाजिक सरोकारों के नार्म्स पर आधारित- सिलसिलेवार श्रेष्ठता क्रम में  सूचीबद्ध किया जाये,तो मेरी सूची इस प्रकार होगी ..
 {१}मोहनदास करमचंद गाँधी  {२}पंडित जवाहरलाल नेहरु  {३}बाबा साहिब वी आर आंबेडकर
   {४}मौलाना आज़ाद      {५}लाल बहादुर शाश्त्री    {६}सर्व पल्ली राधाक्र्ष्णन
    {७}सरदार पटेल       {८}ई एम् एस नम्बूदिरिपाद    {९}इंदिरा गाँधी
     {१०}जयप्रकाश नारायण   {११]ज्योति वसु   {१२}माधव सदाशिव गोलवलकर
      {१३}वी टी रणदिवे    {१४]श्रीपाद अमृत डाँगे  {१५}हरकिसन सिंह सुरजीत
       [१६}शंकरदयाल शर्मा   {१७}अटलबिहारी वाजपई {१८}राजीव गाँधी
        {१९]लालकृष्ण आडवानी  {२०}सोनिया गाँधी   {२१}अर्जुन सिंह ....
मेनें  यह   यह वरीयता सूची १०० तक ही बनाई  है. हममें से हरेक अपनी मेधा शक्ति के आधार पर कुछ इसी तरह की सूची बनाकर देखे तो स्वर्गीय अर्जुन सिंह  के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व  को अपने मानकों पर मूल्यांकित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि  व्यक्त कर सकता है .  मैनें {२१}वें क्रम पर  श्री अर्जुन सिंह जी को स्थापित किया है.    वो अब हमारे बीच नहीं है,कल४ मार्च -२०११ को   एम्स-नई दिल्ली में उनका निधन हो गया है.  हालाँकि उक्त सूची में भी अब तीन ही मौजूद हैं -अटलजी ,अडवाणी जी और सोनिया गाँधी .शेष सभी अब इस दुनिया में नहीं हैं.
                    किसी भी महान व्यक्तित्व के धीरोदात्त  चरित्र चित्रण के लिए किसी साहित्यिक विशेष योग्यता की जरुरत भले न हो किन्तु मानवीय सम्वेदनाओं की अजश्र धारा और व्यक्ति विशेष के सन्दर्भ में सटीक जानकारियों के साथ -साथ उसके समकालिक घटनाक्रम की वास्तविक छवि निरूपण की क्षमता तो होना ही चाहिए.इस हेतु मैं श्री अर्जुन सिंह जी के बारे में कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन सुधी पाठकों पर छोड़ता हूँ .
  घटना एक -आज से लगभग २८ वर्ष पूर्व का वाकया है.मैं बज्रंग्नगर -इंदौर में किराये के मकान में रहता था.मकान मालिक ने आधा हिस्सा खाली रख छोड़ा था . एक दिन सुबह उठा तो देखा की पड़ोस वाले हिस्से में काफी चहल- पहल है, उत्सुकता वश किसी से पूंछा की कौन है ? हमें बताया गया की १२ अधेढ़ उम्र के लोग रीवा-सीधी आँचल से आर आई ट्रेनिंग के लिए इंदौर आये हैं. वे बघेली में ही बात करते थे. बात बात में दाऊ साब के बारे में फुसफुसाते रहते थे तब मैं नहीं जनता था कि ये दाऊ कौन हैं ? उनको  परिवार साथ लाना संभव नहीं था अतएव वे सभी इस डेड़ कमरे के मकान में ठस गए .उनका ट्रेनिंग सेण्टर यहीं अनूप टाकिज के पास था.वे सभी उम्र में मुझसे काफी बड़े थे किन्तु रोज सुबह सुबह उठकर'पायं लगी' कहते और पैर छूते थे,वे सभी अपने आपको अर्जुनसिंह जी का रिश्तेदार बताते थे . मेरे कई मित्र और सपरिजन वेरोजगार थे अतः इन नवागंतुक पड़ोसियों से जानकारी ली कि  राजस्व विभाग में भरती कि प्रक्रिया क्या है?  इन लोगों ने हमें  बताया कि सब दाऊ साब कि कृपा है और जब मैंने आग्रह किया कि दाऊ साब से कहकर दो -चार गरीबों का भला और करवा दो ,तो  दूसरे ही दिनउन सबने  मकान ही  छोड़ दिया.मैंने काफी खोज खबर ली तो पता चला की ये सभी पटवारी थे जिन्हें एक सरलीकृत प्रशाशनिक प्रक्रिया से रेवेनुए इंस्पेक्टर बना दिया गया,ये सभी भर्तियाँ संदेहास्पद थीं .उसी समय पटवारी वर्ग  तथा मध्य प्रदेश के अन्य कई विभागों में हजारों की तादाद में नियुक्तियां हुईं किन्तु ये सौभाग्य  सिर्फ उन्ही को प्राप्त हुआ   जिनके पास रिश्वत देने का इंतजाम था.उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह थे .
 घटना दो -जब१९९५-९६ में  प्रदेश के प्रख्यात आदिवासी नेता शिव भानु सिंह सोलंकी  को मुख्यमंत्री प्रस्तावित  किया जा रहा था,अधिकांस विधायक उनके साथ थे  .श्री अर्जुनसिंह जी का भी  वरदहस्त उनके साथ था तो उनके रिश्तेदार दिग्विजय सिंह ही मुख्य मंत्रीपद  पर आसीन कैसे हो गए? 
  घटना तीन-राजीव गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के कर्णाटक अधिवेशन में और कांग्रेस के इतिहास में शायद पहली बार और अंतिम बार ऐंसा हुआ की २० सदस्यीय  कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव गुप्त मतदान से हुए.सबसे ज्यादा वोट अर्जुनसिंह को मिले वे कांग्रेस के नंबर वन हो चुके थे ,फिर ऐंसा क्या हुआ की नरसिम्हाराव ने सभी चुने गए कार्य समिति सदस्यों से त्याग पत्र ले लिया और बाद में पराजित लोगों को कार्य समिति में लपक लिया .अर्जुन सिंह शानदार विजय के बाद भी २० वें नंबर पर नामजद कैंसे हो गए ?
          
    घटना चार -देश भर से अर्जुन सिंह को समर्थन मिल रहा था ,लेकिन वे बार बार सोनिया गाँधी को आगे आने -बागडोर संभालने ,नेत्रत्व करने की विनती करते रहे और सोनियाजी  ने उनकी एक नहीं सुनी .नरसिम्हाराव ने तो उन्हें लगभग अप्रसांगिक कर दिया और फिर दाऊ ने तिवारी कांग्रेस बनाकर देश की कौनसी सेवा की .आज न तो वो कांग्रेस है और न वे तिवारी {नारायण दत्त} इस लायक हैं की दाऊ को श्रधा सुमन अर्पित कर सकें .
                                            इन घटनाओं के अलावा और भी ढेरों हैं जो दाऊ अर्जुन सिंह के व्यक्तित्व पर रौशनी डालती हैं .अर्जुनसिंह के कई रूप थे वे कुँअर अर्जुन सिंह के रूप में भारत के सामंत वर्ग को सुहाते थे.वे सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए कभी कभार कल्याणकारी नीतियों पर सकारात्मक वक्तब्य रखकर वामपंथ को बहलाते थे. वे वामपंथी वुद्धिजीवियों के आश्रयदाता ,राजीव गाँधी साक्षरता मिशन के प्रणेता और भारत ज्ञान -विज्ञान -समिति जैसी अनेकों एन जी ओ के सृजनहार थे .
   श्री अर्जुनसिंह जी ने डी पी मिश्र  और पंडित जवाहरलाल नेहरु कि मिश्रित नीतियों को अपना अलग पैटर्न दिया. मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक उन पर भरोसा करते थे,क्योंकि दाऊ अक्सर दक्षिण पंथी हिंदुत्व वाद पर आक्रमण करते रहते थे ,मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी उन तत्वों का विरोध किया हो जो minorities के नाम पर समाज में और देश में ग़दर मचाते रहे.अजीत जोगी जैसे ब्यूरोक्रेट और टेक्नोक्रेट अर्जुन सिंह का सहारा पाकर सत्ता में पहुंचे फिर उन्होंने वक्त पर अर्जुन सिंह का साथ क्यों नहीं दिया ?
     देश कि जनता  ने अर्जुन सिंह को खूब प्यार दिया . वे प्रधानमंत्री वनने कि स्थिति में भी एक दो बार आ चुके थे किन्तु उनका राजनीतिक पराभव इस ढंग से हुआ  कि वे  सीधी और चुरहट तक सीमित रह गए . जीवन के अंतिम आम चुनाव में अपनी वेटी को भी हारता देखा . जिन्दगी भर नेहरु परिवार को देश से ऊपर माना .दाऊ का अंत क्या   द्वारका के पतन जैसा नहीं है .
          दुर्वासा के श्राप से द्वारका के यादव जब आपस में लड़ मरे तो कृष्ण ने अपनी अंतिम यात्रा के समय अर्जुन को हस्तिनापुर से बुलवा भेजा .अर्जुन के साथ बचे खुचे यादवों ,औरतों ,बच्चों को हस्तिनापुर भेज दिया.रास्ते में झाबुआ के भीलों ने उन सबको लूट लिया .अर्जुन ने गांडीव कि धोंस दी तो भील बालकों ने अर्जुन का गांडीव भी छीन लिया ...अर्जुन को मार पीट कर जिन्दा छोड़ दिया बाकि सभी धन दौलत लूट ली .



     लोक प्रसिद्द है .
    पुरुष बली न होत है ,समय होत बलवान .
     भिल्लन लूटीं गोपिका ,वही अर्जुन वही बाण ...
      
  दाऊ  अर्जुन सिंह को -जन -काव्य भारती की ओर से श्रद्धा सुमन समर्पित ....                                                                           
              श्रीराम तिवारी  

कूड़ेदान से अन्न बीनते , स्वर्णिम देश के बॉल गोपाला {कविता}

     एक हैं कोई शख्स जबरदस्त , शाहिद उस्मान  बलवा .
     चोरी -चोरी   सीना -जोरी ,  स्पेक्ट्रम ले गया ठलवा..
      कभी एक अंटी न थी जेब में , अब खा रहा है  हलवा .  
     पूँजी के लुटेरों ने दिखाया , भृष्टाचार का जलवा ..

         ==========+=========+=========== 
      आजकल मीडिया में कुख्यात है ,
      हसन अली खां घोड़ेवाला.
       अरे ये तो राजा का भी बाप निकला ,
      अरबों का करे घोटाला ..
       सत्ता जिसकी करे चाकरी ,
      काले धन का करे हवाला .
      यदि न्यायपालिका सजग न होती ,
      तो कोई नहीं था टोकनेवाला ..
      हतभागी ये  मंत्री  संतरी ,
      चोर -उचक्के  जीजा -साला .
       मुल्क के मालिक हुए भिखारी ,
       जान लेय सो जाननहारा..
       खाद बीज के दाम चौगुने,
        फसल पै पड़ता सूखा पाला. 
         कूड़ेदान से  अन्न बीनते   ,
         स्वर्णिम देश के बाल-गोपाला..
       
           श्रीराम तिवारी
        

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

यूपीए द्वितीय ओर वामपंथ दोनो की अग्नि परीक्षा होने वाली है .

     पाँच राज्यों -पश्चिम बंगाल,तमिलनाडु,केरल,असम और पुद्दुचेरी के विधान सभा चुनाव कार्यक्रम घोषित हो चुके हैं . देश की राजधानी दिल्ली में और सम्बंधित राज्यों में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गईं हैं.घोषित चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक -तमिलनाडु ,केरल और पुद्दुचेरी में एक ही चरण में १३ अप्रैल को जबकि  असम में दो चरणों में ४ और ११ अप्रैल को मतदान होगा . सबसे लम्बी चुनावी प्रक्रिया पश्चिम बंगाल   में निर्धारित की गई है , जहां १८ अप्रैल से १० मई तक ६ चरणों में मतदान कराया जायेगा . इन पाँच राज्यों 
       के चुनावों को स्थानीय मुद्द्ये तो प्रभावित करेंगे ही,साथ ही महँगाई , भृष्टाचार और आर्थिक नीतियों का असर भी पडेगा.  ये विधानसभा चुनाव सम्बन्धित राज्यों के कामकाज की समीक्षा रेखांकित करेंगे,साथ ही केद्र की सत्तारूढ़ संयुक प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कामकाज पर भी  लघु जनमत संग्रह के रूप में देखे जायेंगे ,केंद्र में आसीन संप्रग सरकार का नेत्रत्व का रही कांग्रेस इन चुनाव वाले राज्यों में से सिर्फ दो में -असम और पुदुचेरी में ही सत्ता में है. तमिलनाडु में उनके 'अलाइंस पार्टनर'द्रुमुक की सरकार है. कांग्रेस का अधिकतम जोर यही हो सकता है कि यथास्थिति बरकरार रहे.आसार भी ऐसे ही बनते जा रहे हैं.उक्त पाँच राज्यों में देश कि तथाकथित मुख्य विपक्षी पार्टी का कोई वजूद नहीं है अतेव कांग्रेस को  भाजपा  कि ओर से संसद में भले ही  चुनौती  मिल रही हो किन्तु इन राज्यों में कोई चनौती नहीं है.
   पश्चिम बंगाल में पिछले करीब ३५ साल से माकपा के  नेत्रत्व में वाम मोर्चा काबिज है,उसे कामरेड ज्योति वसु का शानदार नेत्रत्व मिला था . उनके बाद का नेत्रत्व भी कमोवेश सुलझा हुआ और सेद्धान्तिक क्रांतीकारी आदर्शों का तरफदार है किन्तु भूमि सुधार कानून लागू करने,मजदूरों -किसानो को संगठित संघर्ष से अपने अधिकारों कि रक्षा का पाठ पढ़ाने,वेरोज्गरी भत्ता देने,राज्यमें धर्म निरपेक्ष मूल्यों कि हिफाजत करने के वाबजूद आज का नौजवान बंगाली आर्थिक सुधारों के पूंजीवादी पैटर्न का हामी हो चला है.उसे किसीप्रजातांत्रिक  क्रांति या समाजवाद में कोई दिलचस्पी नहीं,वह या तो  हिंसक -बीभत्स  नग्न छवियों का शिकार हो चला है,या उग्रवाम कि ओर मुड़ चला है.  अतः उसे प्रतिकार कि भाषा का सिंड्रोम हो गया है ,इन तत्वों ने बंगाल में माओवाद,ममता ,तृणमूल और गैरवामपंथी दकियानूसी जमातों का 'महाजोत' बना रखा है ,कहने को तो कभी कांग्रेस और कभी तपन सिकदर भी इनके साथ हो जाते हैं किन्तु ये उनका एक सूत्रीय संधिपत्र है कि वाम को हटाओ .बाकि एनी सवालों ,नीतियों पर इन में जूतम पैजार होती रही है ,अतः कोई आश्चर्य नहीं कि घोर एंटी इनकम्बेंसी फेक्टर के वावजूद वाम फिर से{आठवीं बार}  पश्चिम बंगाल कि सत्ता का जनादेश प्राप्त करने में कामयाब हो जाये.
                                        केरल में तो आजादी के बाद से ही दो ध्रुवीय  व्यवस्था कायम है .प्रतेक पाँच साल बाद सत्ता परिवर्तन में कभी कांग्रेस  के नेत्रत्व में यु डी ऍफ़ और कभी माकपा के नेत्रत्व में लेफ्ट .अभी लेफ्ट याने वाम मोर्चे कि पारी है देश और दुनिया के राजनीतिक विश्लेषक , पत्रकार ,स्तम्भ लेखक और वुद्धिजीवी मानकर चल रहे होंगे कि अबकी बारी यु डी ऍफ़ याने कांग्रेस के नेत्रत्व में केरल कि सरकार बनेगी.विगत एक साल से यु पी ऐ द्वितीय कि सरकार कि जिस तरह से भद पिट रही है ,एक के बाद एक स्केम का भन्दा फोड़ हो रहा है ,कभी शशी थरूर ,कभी पी जे थामस और कभी टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला ,ये सब घोटाले न जाने देश को कहाँ ले जाते यदि न्यायपालिका कि भृष्टाचार के खिलाफ ईमानदार कोशिशें न होतीं !इन सब भयानक भूलों चूकों को केरल कि जनता भी जरूर देख सुन रही होगी.केरल कि शतप्रतिशत साक्षरता और साम्प्रदायिक सहिष्णुता के परिणाम स्वरूप कोई आश्चर्य नहीं कि केरल में भी वामपंथ पुनः सत्ता में आजाये.
          तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम् करूणानिधि अब जनता और राज्य पर बोझ बन चुके हैं , उनके परिवार का हर वंदा और वंदी बुरी तरह बदनाम हो चुके हैं ,ऐ राजा,कनिमोझी ,अझागिरी ,दयानिधि मारन,स्टालिन और उस कुनवे का हर शख्स आपादमस्तक पाप पंक में डूब चूका है सो द्रुमुक तो डूवेगी ही, अपने साथ कांग्रेस को भी खचोर डालेगी, कांग्रेस का नेत्रत्व अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह करने में असफल रहा सो खमियाजा तो भुगतना ही होगा .जयललिता को पुनः सत्तासीन होने कि तैयारी करनी चाहिए .
        जहां तक भाजपा कि बात है , इन चुनावों में उसके सरोकार कहीं भी उपस्थिति दर्ज करने में असमर्थ हैं.कुल मिलाकार इन चुनावों के नतीजे केंद्र कि संप्रग सरकार , कांग्रेस , वामपंथ , के भविष्य  की दिशा तो तय करेंगे ही, साथ ही इन प्रान्तों की जनता का वर्तमान भृष्ट व्यवस्था से सरोकार रखने वालों के प्रति क्या सोच है ?यह भी जाहिर होगा .....श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 3 मार्च 2011

दरवेश का चोला पहनने से डाकू- संत नहीं हो जाते...

 लगता है कि  आदरणीय मुकेश धीरूभाई अम्बानी को बोधत्व प्राप्त हो गया है. देश के सबसे बड़े रईस और रिलायंस इंडस्ट्रीज के सर्वेसर्वा श्री मुकेश अम्बानी ने गत मंगलवार {१ मार्च-२०११}को नई दिल्ली में  फिक्की {फेडेरशन ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज} के ८३ वें अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए जो आप्त वाक्य कहे वे उन्हें भारतीय इतिहास में अमरत्व प्रदान करने के लिए काफी हैं. उपस्थित तमाम दिग्गज  पूंजीपतियों को सम्बोधित करते हुए मुकेश भाई ने कहा कि 'अब वक्त आ गया है कि हम पूंजीपति लोग - सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन को अपने एजेंडे में शामिल करें' उन्होंने व्यवसाय, काराबोर  और कार्पोरेट सेक्टर को जन-सरोकारों से जोड़ने कि बात कहकर न केवल उद्द्योग जगत बल्कि देश और दुनिया के वामपंथी विचारकों को भी  आश्चर्य चकित कर दिया  है.
      मुकेश अम्बानी ने अमीर भारत और गरीब भारत के बीच की बढ़ती जाती खाई की ओर उपस्थित उद्योगपतियों का ध्यानाकर्षण करते हुए आह्वान किया कि वे इन दोनों -शाइनिंग इंडिया और निर्धन भारत को जोड़ने के लिए काम करें . उन्होंने कहा- 'कारोबार का एकमात्र उद्देश्य मुनाफा ही नहीं होना चाहिए' मुकेश भाई ने कहा -सिर्फ कार्पोरेट सामाजिक जबाबदेही{सी एस आर} कि जगह अब सतत सामाजिक सरोकार {continuous  socail business }के माडल को अपनाया जाना चाहिए. सामाजिक जबाबदेही के साथ वित्तीय जबाबदेही भी जरुरी है. किसी कारोबार का एकमात्र  उद्देश्य मुनाफा कमाना ही नहीं होना चाहिए. जब तक लाखों लोगों के जीवन को बदलने वाले व्यापक उद्देश्य के साथ कारोबार
नहीं किया जायेगा- कोई भी कारोबार सतत नहीं चल पायेगा.
      उन्होंने देश के दो पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहा -एक तरफ तो उद्द्योग जगत को भारी लाभ हो रहा है और दूसरी ओर ऐसे  करोड़ों लोग हैं जो मूल भूत सुविधाओं -स्वच्छता ,पीने का पानी ,स्वास्थ सेवाओं से महरूम हैं.
      मुकेश भाई ने कहा" कि देश कि प्रति-व्यक्ति आय १००० डालर से कम है, जो कि चीन के एक तिहाई से भी कम है. उन्होंने भारतीय मध्यम वर्ग को विराट संभावनाओं का कारक बताते हुए  कहा कि यदि एक अरब से ज्यादा विपन्न  लोग असंतुष्ट हैं, तो बाकि के संपन्न लोग खुशहाल कैसे  रह सकते हैं? भारत कि विकास  गाथा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक देश के करोड़ों लोगों को प्रगति में भागीदार नहीं बनाया जाता."
        जहां तक मुकेश अम्बानी का इंडिया और भारत के बीच खाई पाटने कि सद- इच्छा का सवाल है  तो उसका हमें सम्मान करना चाहिए. किन्तु एक अज्ञात भय भी है कि उस कुत्सित विचार का क्या होगा? जो सुनील मित्तल भारती ने इसी फोरम में ,वर्ष -२००८ में व्यक्त किया  था . तब माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंग जी के समक्ष उनके इस आग्रह पर कि उद्योग जगत को देश के गरीबों का भी ध्यान रखना चाहिए  ,निजी क्षेत्र में उच्च पदों पर ज्यादा  आकर्षक वेतन देने से सरकारी क्षेत्र पर दवाव पड़ता है, आप सी ई ओ लोगों को भारी भरकम वेतन नहीं लेना चाहिए ,वगेरह -वगेरह .सुनील मित्तल भारती ने तब तपाक से उत्तर दिया "कि  हम  यहाँ व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाने आये हैं जन सरोकारों या जनता कि परेशानियों से हमें कोई लेना-देना नहीं" सुनील मित्तल भारती  के इस कटु वक्तव्य  से तब मुझे बहुत बुरा लगा था तत्काल एक आलेख भी उनके अमर्यादित व्यवसायिक सरोकारों पर मैनें  लिखा था -जिसका तात्पर्य यह  था कि भारतीय लोकतंत्र पर पूंजीपतियों का कब्जा कराने में सिद्धहस्त  श्री मनमोहन सिंग जी को एक नव-धनाड्य पूंजीपति के आगे इस तरह असम्मानित होना स्वीकार नहीं करना चाहिए .लोकतंत्र के लिए यह उचित सन्देश नहीं है.लगता है कि सुनील मित्तल भारती ने माल्थस ,एडम स्मिथ और कीन्स  को पढ़े बिना ही कार्पोरेट जगत में कुछ उसी तरह से अवसरों को भुना लिया जैसे कि युद्धकाल में वेइमान बनिया  कमाता है.
              आज      श्री मुकेश अम्बानी और श्री सुनील मित्तल भारती दोनों ही भारत के दिग्गज पूंजीपति हैं. दोनों ने खूब धन कमाया. दोनों का राजनीती और समाज पर अपनी-अपनी हैसियत का प्रभाव है ,किन्तु दोनों के विचारों में दो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर क्या दर्शाता है? मित्तल का दर्शन है "मुनाफा और केवल मुनाफा" उसका परिणाम होगा शोषित आवाम का विद्रोह या जन-क्रांति .
 मुकेश अम्बानी ने जो जन-कल्याणकारी कार्पोरेट कल्चर कि पैरवी की है वो नयी नहीं है .विगत कुछ महीनों पहले अमेरिकी पूंजीपति बिल गेट्स ने ,वारेन बफेट  ने अपनी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा जन सरोकारों में लगाने का ऐलान किया था .उनका कहना था कि जो जहां से लिया वो वहां वापिस तो नहीं किया जा सकता किन्तु उसका आंशिक तो लौटाया ही जा सकता है. भारत के अजीम प्रेमजी भी इस विषय में पहल कर  चुके हैं .इससे पहले भारत के स्थापित पूंजीपतियों  -बिडला ,टाटा और अन्य पूंजीपतियों ने भी "दान" और 'लोक- कल्याण ' कि परम्परा में सदियों से  अपनी भागीदारी जारी रखी थी. 
          जिस देश में इतने दूरदर्शी और घाघ पूंजीपति होंगे वहां जनता का जनाक्रोश समय-समय पर दान -दक्षिणा के नाम पर  निसृत होते रहने से किसी तरह कि बगावत या क्रांति कि संभावना नहीं रहेगी .  .भारत और अमेरिका में इसी वजह से क्रांति कि संभावनाएं वैसी नहीं वन पा  रही हैं जैसी कि सोवियत संघ ,चीन ,क्यूबा ,वियेतनाम या कोरिया में बनी थीं .आज अरब   राष्ट्रों में क्रांति के नाम पर जो बबाल मच  रहा है उसका कारण भी वही व्यवस्था जनित आक्रोश है .चूँकि वहां के  पूंजीपति और शासक  वर्ग सुनील मित्तल भारती कि तरह  जनता के सरोकारों को अपने व्यापारिक  और प्रबंधकीय  सरोकारों से अपडेट नहीं कर पाए अतः वे जनता के हाथों पिट रहे हैं ,देश कि सत्ता  और लूटी गई सम्पदा का अधिकार भी उनसे छीना जा रहा है. भारत में जब तक मुकेश अम्बानी जैसे लोग अथाह पैसा कमाते हुए गरीब जनता का मुंह बंद करने के लिए  तथाकथित  जनकल्याणकारी सरोकारों कि पैरवी करते रहेंगे  तब तक जनाक्रोश सघन नहीं हो पायेगा , जब तक जनाक्रोश सघन नहीं होगा तब तक आर्थिक-सामाजिक और राजनैतिक  क्रांति कि संभावनाएं भी क्षीण रहेंगी . अस्तु! मुकेश अम्बानी के वक्तब्य को एक घाघ पूंजीपति की वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में भारत कि निर्धन जनता को निरंतर कष्ट उठाते रहने , शांति बनाये  रखने ,क्रांति से दूर रहने,  इंडिया बनाम भारत में मेल -मिलाप बनाये रखने ,  और पूंजीपतियों को राज्य सत्ता का  कृपा- भाजन बनाये रखने  में देखा जाना चाहिए.
                                       श्रीराम तिवारी

बुधवार, 2 मार्च 2011

भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियाँ और समाधान...

 विगत दिनों विकीलीक्स के धारावाहिक खुलासों में दुनिया भर के व्यक्तियों,समूहों ,राजनैतिक -सामाजिक संगठनों और राष्ट्रों के बारे में जो बातें प्रकाश में आयीं थीं-उनमें भारत और भारतीय लोकतंत्रात्मक सिस्टम के बारे में ,भारत -पकिस्तान , भारत- अमेरिका तथा भारत और चीन के अन्योंन -आश्रित  द्विपक्षीय सम्बन्धों के बारे में,- तस्वीर इतनी भयावह थी कि भारत का सचेतन नागरिक या एक उदार -राष्ट्रवादी भी चिंतित हुए बिना  नहीं रह सकता.
    पाकिस्तान ने एक तरफ तो भारत से बातचीत के माध्यम से व्यापार -सीमा विवाद -कैदियों का आदान प्रदान,साहित्यिक -सांस्कृतिक ,प्रतिनिधि मंडलों कि आवक जावक में सकारात्मक रूचि दिखाई ;दूसरी ओर प्रतेक अन्तरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ कूटनीतिक चालें चलकर ,अपने यहाँ आतंकवाद -उग्रवाद पर अंकुश लगाने के बहाने अमेरिका और अरब देशों से अरबों रूपये कि इमदाद प्राप्त की.उसी के बलबूते पर भारत में नकली करेंसी और आतंकवादी भेजने का सिलसिला बदस्तूर जारी है. चीन और अमेरिका के आपसी रिश्ते कैसे भी हों किन्तु भारत को ताकतवर होते कोई भी नहीं देखना चाहता ,एटमी करार और सुरक्षा परिषद् की स्थाई सीट के बारे में तो श्रीमती  हिलेरी क्लिंटन ने गजब कर दिया -उन्होंने तो  पकिस्तान की ही सरजमीं पर भारत का मजाक बनाया कि ये भारतीय मूर्ख नेता क्या खाक देश को वीटो पवार दिलाएँगे ?ये सभी तथ्य बिकिलीक्स की बेब साईट पर उपलब्ध हैं . बशर्ते दुश्मनों ने कोई छेड़ -छाड़ न की हो ..
     हमें विकिलीक्स के इन  खुलासों से कोई आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हमें अपने देश की जनता और राजनैतिक  पार्टियों की असलियत मालूम है. जब अपना ही माल खोटा हो तो परखने वाले पर नाराजगी कैसी? देश की दो बड़ी पार्टियां -कांग्रेस और भाजपा कटखने कौओं की तरह झगड्तीं रहतीं हैं.नौकरशाही मक्कार और भ्रष्ट हो चुकी है ,पूंजीपति मस्त हैं , आम जनता त्रस्त है ,न्यायपालिका और देश भक्त सुधीजन पस्त हैं.
     विगत दिनों भारत से बाहर के विदेशी मीडिया ने भारत की जो तस्वीर पेश की है -उसमें शर्मिंदगी के अलावा कुछ भी नहीं है. मेरे देश के फटे हाल भीख मांगते लोग ,मेरे देश के शंड- मुशंड-मक्कार बाबा लोगों की लोम विलोम में डूबी  अय्याशी  ,विदेशी बैंकों में अकूत काला धन ,एक दूसरे पर घटिया आरोप लगाते सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ ,स्वनामधन्य शोहरत के भूंखे झक्की स्वयम्भू सामजिक कार्यकर्ता, बंधनमुक्त बेकार  तरुणाई,बेलगाम महंगाई ,और टू-जी स्पेक्ट्रम -कामनवेल्थ स्केम को न्यू- यार्क टाइम्स ,गार्जियन और द डान जैसे अखवारों ने खूब चटखारे ले-लेकर छापा और जिसे  इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने डकार ले- लेकर  परोसा है . 
    आज जबकि भारत बेहद गर्दिश और मुश्किल के दौर से गुजर रहा है -नक्सलवादी +माओवादी +अलगाववादी +क्षेत्रीयतावादी +रिश्वतखोर +मुनाफाखोर +जमाखोर +मिलावट करने वाले +परजीवी +चन्दाचोर+भू माफिया +दलाल +सुरा-सुन्दरी =देश का केंसर ,अन्दर से इस मादरे वतन को खा रहे है, उधर सीमाओं पर सभी  पड़ोसी राष्ट्र  हमारे ऊपर न केवल हँस रहे अपितु उस मौके की फ़िराक में हैं कि कैसे और कब भारत को चूना लगाना है.
      हमारे राजनीतिज्ञ दूजे परआरोप  जड़ने और नीचा दिखने के फेर में   वो सब भी बोल जाते हैं जो हमारे अमित्रों-शत्रु  राष्ट्रों  के काम आ जाता है .भले ही स्वराष्ट्र के काम कुछ भी न आये. सियासतदान कितने खुदगरज हैं कि अपने असरदार झूंठे -सच्चे आरोपों कि जद  में मातृभूमि को दुनिया के बाजार में रुसवा करते हुए भी निर्लज्ज बने रहते हैं .बेशक सत्ता में काबिज होने कि वजह से कांग्रेस कि जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बनती  कि पार्टी और सरकार दोनों मोर्चों पर निगाह रखे कि कुछ ऐंसा न किया जाये या कहा जाये जिससे से देश कि दुनिया में भद पिटे.श्रीमती सोनिया गाँधी से सभी कांग्रेसियों को मर्यादित आचरण , शुचिता और त्याग का सबक सीखना चाहिए  . मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा को भी जल्बाजी  में ऐंसा करना या कहना -सुनना नहीं चाहिए जो देश को शर्मिंदगी का सबब बना दे. भाजपा को अपनी ताकत तिरंगा यात्राओं जैसी संवेदनशील शोशेबाजी में खर्च न करते हुए दूरदर्शिता और परिपक्व राजनीती के मार्फ़त राष्ट्र-गौरव के नए कीर्तीमान स्थापित करने चाहिए.
          कांग्रेस कि मानसिकता में विपक्ष कि मिट्टी पलीद करना जैसा ही सिद्धांत  क्यों है.?एक दूसरे को नापाक साबित करके देश कि जनता को उस रास्ते क्यों ले जाया जाये जो लोकतंत्र से छिटककर राजनीतिक उथल -पुथल कि अँधेरी सुरंग में जाकर ख़त्म होता है यदि ३० साल कि जवान  भाजपा के आचरण में शासन-प्रशासन कि गंभीरता का पुट नजर नहीं आता तो सवा सौ साल पुराणी कांग्रेस में भी विपक्ष में रहने का शऊरऔर सब्र नजर नहीं आता .
      आई वी एन -७के ताज़ा सर्वे के अनुसार देश कि जनता कांग्रेस को सबसे भृष्ट ,भाजपा को कम भृष्ट और वामपंथ को सबसे कम भृष्ट मानती है .अर्थात हम्माम में सभी नंगे हैं .कोई कम कोई ज्यादा और शायद ये फर्क भी तभी तक है जब तक कि आजमाने का मौका न दे दिया जाये.ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इत्यादि अन्य अन्तरराष्टीय संस्थाओं ने भी भारतीय लोकतंत्र को राजनैतिक दलों के भृष्टतम आचरण से क्षत -विक्षत निरुपित किया है 
यह कड़वा और डराने वाला सच नहीं है ,इससे से भी अधिक भयावह ये है कि संघर्ष कि चेतना को जनता का समर्थन राइ के बराबर ही है जबकि भृष्टाचार के सुनामी देश को छीज रहे हैं . 
           
                        श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 1 मार्च 2011

बजट-२०११/१२ विसंगतियों का पिटारा है.....

 वर्तमान बजट पर देश के अर्थशास्त्रियों  के सिरमौर कहे जाने वाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री  जब वित्तमंत्री जी को शाबासी  देते हैं तो मेरे जैसे अज्ञानी की  अनचाहे ही बजट के बारे में उत्सुकता होना स्वाभाविक ही है ,जब उत्सुकता है तो विषयांतरगत आद्द्योपंत बजट पर माथा-पच्ची भी जरुरी हो जाती है. यह मानवीय स्वभाव की ही विशेषता नहीं बल्कि मानवेतर प्राणियों में भी प्राय:  देखा गया है कि वे अपना हित अनहित पहचानते हैं .गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत सटीक कहा है -
        'हित अनहित पशु पक्षिंह  जाना ...."
अब यदि किसी देश की जनता अपने द्वारा चुनी गई सरकार से जो अपेक्षाएं रखती है और वे पूरी होतीं हैं तो यह जनता और राजनीतिज्ञों  की जागरूकता का परिणाम है और यदि जनता को लगता है कि उसके जनादेश का सम्मान नहीं हो रहा और उसे मूर्ख बनाया जा रहा है कुछ करना चाहिए यथा संयुक-संघर्ष जैसा कुछ तो भी यह जनता की सामूहिक हितेषी -
सजगता का ही परिणाम होगा .किन्तु जब जनता को लगातार मूर्ख बनाया जाता रहे; नेतृत्व  निरापद नकारात्मक नीतियों पर चलता रहे और प्रचार माध्यमों की ताकत से  सब कुछ सहनीय बना दिया जाय तो यह जनता और नेतृत्व  दोनों की सेहत के लिए ठीक नहीं है .यु पी ऐ सरकार का यह बजट भी अपने पूर्ववर्ती बजटों की प्रति-छाया  मात्र है .जिस तरह से विगत १० वर्षों में{यु पी ऐ प्रथम के कामं न  मिनिमम प्रोग्राम को छोड़कर}  आर्थिक सुधारों के बहाने जन-कल्याण की  हितकारक मदों से पूर्ववर्ती विभिन्न सरकारों  ने पल्ला झाडा और राजकोषीय घाटे की पूर्ती के लिए देश की निम्न मध्यमवर्गीय जनता पर इसका बोझ लादा; वह देश की जी डी पी को कितना आगे ले गया यह तो  कोई महा-मूढमती भी बता देगा. कम से कम हजारों किसानो की आत्महत्या और देश के चमकदार साढ़ेचार दर्ज़न 'मिलियेनर्स'की उपलब्धी तो इस आर्थिक नीति का ही परिणाम है .जिसमें ऐसें बजट बनाये जाते हैं जिन पर मानवीय-मूल्यों की वरक   का कवर तो  चढ़ा हो किन्तु उस आर्थिक नियामक पिटारे के अन्दर विसंगतियों की चासनी में लूट और भृष्टाचार का लालीपाप ही अंतिम निष्कर्ष के रूप में हर बार शेष रह जाता है .
          महान क्लासिक व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल ने अपने ख्यातनाम उपन्यास 'राग दरवारी' में ठीक ही लिखा है कि' "इस देश कि अर्थव्यवस्था उस उस पुराने  ट्रक इंजन कि तरह है जिसका एक्सीलिरेटर टॉप गियर में बार-बार डालने पर भी वह थर्ड में खुद-ब-खुद जाकर दम  तोड़ने लगता है " इस पूंजीवादी व्यवस्था का यह स्थाई-भाव है कि यह "सुपर मुनाफों "कि ओर भागती है.  जिसे हमारे विद्वान वित्तमंत्री जी :आर्थिक विकास  की दर' कहते हैं वो और कुछ नहीं सिर्फ देशी-विदेशी निवेशकों को लाल-कालीन बिछाकर "पुटियाने" का व्यावसायिक तरीका मात्र है .
      कहा जा रहा है की वर्तमान बजट बेहद संतुलित और आर्थिक विकास  दर के उच्च अंतर-राष्ट्रीय मानकों के करीब ले जाने की कूबत रखता है, इन्फ्रास्त्रक्चार और निर्माण के क्षेत्र में ,केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में यत्र - तत्र जनता की हिस्सेदारी को निजी मिल्कियतों में बदलने का जोर भी इस बजट में है ,जो देश को उस तरफ ले जायेगा जहां पर मुसीबतों  के पहाड़ टूटा करते हैं , हालाँकि  आंगनवाडी सहायिकाओं या मनरेगा-मजदूरों की मजदूरी में बढ़ोत्तरी के लिए कुछ  सकारात्मक  सुझाव माननीय वित्त मंत्री जी ने रखे हैं इसके लिए  मैं व्यक्तिश:  प्रणव दादा को नमन करता हूँ, उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ .किन्तु ५ करोड़ भूमिहीन खेतिहर मजदूरों ,सूखा -पाला-पीड़ित किसानों ,शिक्षित बेरोजगारों की विपन्न अवस्था के लिए आजाद देश में और कितनी पीढ़ियों तक मरना-मिटना होगा?
         किसानो के लिए प्रस्तावित कर्ज की राशी चार लाख ७५ हजार करोड़ भले ही निर्धरित की गई हो किन्तु ये पैसा वास्तविक अभ्यर्थियों तक पहुँचाने का विश्वसनीय  नेटवर्क कहाँ हैं .? पटवारी -रेवेन्यु इंस्पेक्टर से लेकर राज्यों के मंत्रियों तक और ग्राम-पंचायत के सचिव से लेकर बैंक के मेनेजर तक अधिकांश महा-भृष्टाचार की वैतरणी में गोते लगा रहे हैं .थोक मूल्यों और खुदरा मूल्यों पर सिर्फ चिंता प्रकट करने से सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश राहत की उम्मीद कैसे कर सकता है . बेरोज़गारी -भत्ता या रोजगार गारंटी की बात करना ,उनकी मांग उठाना क्या  सिर्फ मार्क्सवादियों के हिस्से रह गया है .जब तक  विदेशों में जमा कालाधन वापिस नहीं लाया जाता, जब तक ,देश के अन्दर भू -माफिया पर अंकुश नहीं लगाया जाता ,जब तक भूमि-सुधार कानून बनाकर उसे सख्ती से अमल  में नहीं लाया जाता और आर्थिक विकास  के लिए वैकल्पिक नीतियों का संधारण नहीं किया जाता ,जब तक भृष्टाचार ख़त्म करने की कोई ठोस कार्य योजना नहीं बनाई जाती तब तक ऐसे लोक लुभावन बजटों से-राजाओं ,रादियाओं ,अम्बानियों ,टाटाओं ,कल्मादियों  रेड्दियों के साथ-साथ सोने की ईंटों के तलबगार भ्रष्ट अधिकारीयों  के वारे-न्यारे होते रहेंगे .  ऐसे बजटों से नक्सलवाद से नहीं लड़ा जा सकता .जब तक देश में ७७%लोगों की आमदनी मात्र २० रूपये रोज की रहेगी ,जब तक भारत में नंगा भूँखा इंसान रहेगा तब तक देश में तूफ़ान की संभावना बनी रहेगी . 
                       श्रीराम तिवारी