रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ऋतु बसंत "नईदुनिया" में (दि. ०७.०२.२०११)

ऋतु बसंत "नईदुनिया" में (दि. ०७.०२.२०११)

कोओं के कोसने से ढोर नहीं मरते ...चोर चोर चिल्लाने से चोरी नहीं रुकती.....

        विश्व व्यापी आर्थिक संकट के आंशिक असर और देशज कुव्यवस्थाओं ने आधुनिकतम सूचना एवं संचार माध्यमों के राष्मिरथों पर सवार होकर सारी दुनिया को बैचेन कर रखा है .बढ़ती हुई महंगाई , वेरोजगारी , भृष्टाचार ,असमानता और शोषण -दमन -उत्पीडन  के संत्रासों ने दुनिया भर की वैज्ञानिक खोजों ,भौतिक उपलब्धियों और तमाम राजनैतिक व्य्वाश्थाओं पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं .मौजूदा समस्याओं को अतीत में भी उनके तत्कालीन स्वरूपों में यथावत देखा जा सकता है . इनसे निज़ात पाने की सकारात्मक कोशिशें भी होती रहीं हैं .इसके लिए कई बार नेत्रत्व परिवर्तन भी किये गए हैं ;अब भी उसी की पुनावृत्ति का शोर कतिपय दूध के धुले  लोग मचा रहे हैं ;बाबा रामदेव जैसे गैर राजनैतिक लोग जरा ज्यादा ही जल्दबाजी में हैं .वे तो भारत में इजिप्ट जैसी स्थिति की कामना कर रहे हैं ;उनका राष्ट्रवाद न केवल उटोपिया भर है अपितु कोरी शाब्दिक लफ्फाजी के दम पर देश में गृह युद्ध छिड़ जाने की भविश्यबानी भी ये गैर जिम्मेदार लोग बेखटके कर रहे हैं .
         जब -जब केवल नेत्रत्व परिवर्तन की वैयक्तिक अथवा जन-आकांक्षी कोशिशें हुईं तब तब केवल खाया पिया आठ आना और गिलास फोड़ा बारह आना ही सावित हुआ है ,कई मर्तवा इस तरह के बदलाव की मूर्खता पूर्ण कोशिश में अनेक सभ्यताएं मर मिट गईं और राष्टों को गुलाम होना पड़ा .भारत में पहले पृथ्वीराज चौहान को हटाने के फेर में तत्कालीन विरोधी सामंतों ने जब जैचंद का साथ दिया तो नतीजा विश्व विदित है .इसी तरह जब इब्राहीम लोदी को हटाने के लिए विरोधी बाबर के पास उज्बेगिस्तान तक गए तो मुग़ल आये और सेकड़ों सालों तक भारत के साथ सिर्फ अन्याय ही किया .वे अपने पूर्व वर्ती हिन्दू सामंतों से भी ज्यादा क्रूर सावित हुए .मुगलों को हटाने के फेर में मीर कासिम ने जिन अंग्रेजों की मदद की वे किस रूप में मुग़ल शाशकों से बेहतर थे ? मुग़ल कम से कम लूट का माल देश से बाहर तो नहीं ले गए .अंग्रेज तो पूरा देश १९० साल तक लूट लूट कर इंग्लेंड ले जाते रहे .उसी का नतीजा है की आज भी दो तिहाई भारत भुखमरी के लिए अभिशप्त है .आजादी के बाद भी आम तौर पर जनता का अनुभव यही रहा कि जब जब नेत्रत्व परिवर्तन हुआ तो महंगाई ,बेरोजगारी .असमानता और भ्रष्टाचार ने दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की ही है .कुछ अपवादों को छोड़ दें जो कि सैद्धांतिक और वैचारिक विकल्प के साथ सत्ता में कभी कभार कुछ वक्त के लिए आ पाए थे और देश कि जनता को उसके कल्याणकारी दायित्व से परिचित कराया. . इनके आलावा जनता ने यही कहा कि क्या नागनाथ ? क्या सांपनाथ?
           आजकल योग गुरु बाबा रामदेव जी जरा ज्यादा ही नेत्रत्व  परिवर्तन पर जोर दे रहे हैं . इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन सवालों को वे उठा रहे हैं वे प्रासंगिक हैं किन्तु इन्ही सवालों को विगत कई वर्षों से लेफ्ट ने भी उठाया है . उनसे भी ज्यादा उग्र तरीके से नक्सलवादियों ने उठा रखा है .इसी तरह देश कि न्याय पालिका और मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा भी इन सनातन समस्याओं -भृष्टाचार , देश -विदेश में कालाधन ,महंगाई .असमानता को लेकर लगातार अपनी ओर से यथा संभव देश हितैषी दृष्टीकोन से संनिद्ध रहा है .इसी तरह सर्व श्री पी साईंनाथ  ,प्रवीर पुर्स्काय्स्थ ,आन्ना हजारे स्वामी अग्निवेश ,सुब्रमन्यम स्वामी तथा प्रसिद्द वकील प्रशांत  भूषन से लेकर धुर दक्षिण पंथी आचरण वाले संगठनो तक ने इस विषय पर आलोचनाओं को हवा दी है ;किन्तु भृष्ट पतनशील व्यवस्था का बाल बांका नहीं हुआ . उलटे मर्ज़ बढ़ता ही गया  ज्यों -ज्यों दवा कि ...मेरा मंतव्य यह कतई नहीं की ज्वलंत सवालों को उठाया ही न जाये या व्यवस्था को सकारात्मक दिशा में न ले जाया जाये .मेरा मानना है की विना वैकल्पिक नीतियों और कार्यक्रमों के विना किसी बेहतर राजनेतिक संगठन के किसी एक अकेले व्यक्ति के आह्वान पर या दुनिया के किसी अन्य देश के घटना क्रम से प्रेरित होकर भारत में कुछ भी परिवरतन -क्रांति ,प्रतिक्रान्ति नहीं होने वाली केवल भ्रान्ति होने का अंदेशा भर है .क्रांति से मेरा अभिप्राय सकारात्मक क्रन्तिकारी परिवर्तन से है ,प्रतिक्रान्ति से मेरा मतलब अधोगामी परिवर्तनों से है और भ्रांती का अर्थ वही है जो इजिप्ट में तथा सम्पूर्ण अरब जगत में होने का अंदेसा है भ्रान्ति याने आपस में लड़ो और देशी विदेशी शाशकों को सर पर बिठाओ ,गुलामी का इंतजाम करो . पूंजीवाद का हुक्का पानी भरो .भारत में ये भ्रान्ति अब कभी भी सफल नहीं होने वाली .वैसे ही जैसे की अमेरिका प्रणीत आर्थिक मंदी की दाल भारत में तो  नहीं गल सकी ;भले ही आधी दुनिया का वंताधार कर  दिया हो .भारत के पास ऐसा अद्भुत कुकर है कि उसमें भाप जमा नहीं हो पाती ;उसमें सेफ्टी वाल्व का प्रावधान है जिससे जनाक्रोश रुपी भाप रिसती रहती है .
       बेशक भारत में बेहद काली कमाई का नंबर दो का पैसा है ,विदेशी बैंकों में बीसियों लाख करोड़ जमा हैं ,जान लेवा महंगाई है ,शोषण -दमन  है फिर भी आधा अधूरा ही सही दुनिया में सबसे बेहतर लोकतंत्र होने से जनता का गुस्सा कुकर फोड़ नहीं हो पाता.यहाँ नियमित चुनाव होते हैं ,सरकारें बदलती हैं .आपातकाल की काली अवधि को छोड़कर शेष वर्षों में आदर्शोन्मुखी लोकतान्त्रिक शाशन प्रशासन देने का उसके चारों स्तंभों ने भरपूर प्रयास किया है .हमने ऐसी व्यवस्था और संविधान वनाया है की आइन्दा इस देश में तानाशाही को कोई स्थान नहीं .यहाँ मिस्र की तरह कोई फौजी निजाम नहीं कि लोग अपना सब कुछ छोड़ कर किसी बाबा के बहकावे में रायसीना हिल को घेरने पहुँच जाएँ .भारत में दुनिया कि सर्व श्रेष्ठ न्य्याय पालिका है ,शानदार मीडिया है ,शानदार नागरिक आजादी है
ये सब ट्युनिसिया ,मिस्र ,सौदी अरब ,पाकिस्तान और जोर्डन में नहीं हैं तो वगावत होगी ही .हमारे यहाँ अन्न -धन तथा प्राकृतिक संपदा का विशाल भण्डार है ,कमी सिर्फ आर्थिक सामाजिक समानता कि है सो यदि कोई वंदा चाहता है कि देश में मुनाफाखोरी ,मिलावट और रिस्वर्खोरी वंद हो तो वो राष्ट्रीय पार्टियों में से किसी को भी इस शर्त पर ज्वाइन कर सकता है कि भाई मेरे पवित्र उद्देश्य में यदि तुम सहभागी हो तो में तुम्हें आगामी लोकसभा या विधान सभा के चुनाव में जितवाने में सहयोग करूँगा ,लेकिन यदि वो कहे कि भारत कि स्थिति मिस्र जैसी  है ,प्रधानमंत्री का नार्को टेस्ट कराओ तो में कहूँगा कि बाबाजी आप अपना मानसिक टेस्ट कराओ .हमारा प्रधानमंत्री कुछ भी हो हुस्नी मुबारक के जैसा तानाशाह और चोट्टा नहीं है और यदि होता तो बाबाजी आप इतने पैसे वाले या इतने बडबोले भी नहीं हो पाते .यदि भारत में सरकार के खिलाफ किसी वर्ग या समूह कि नाराजगी होती है तो यहाँ के लोग अपना गुस्सा रेल कि पटरियों पर  रोड पर बसें जलाकर ,आत्म ह्त्या करके समाप्त कर देते हैं.धरना प्रदर्शन
करने में हम सबसे आगे हैं ,हम इजिप्ट कि तरह तीस साल तो क्या तीस महीने नहीं रुक सकते .इस तरह हम भारतीय अपनी आक्रोश रुपी भाप को विभिन्न सेफ्टी वाल्वों से विसर्जित करते रहते हैं .यह सही है कि भारतीय लोकतंत्र के प्राण पूंजीपतियों -भूस्वामियों की तिजोरियों में कैद हैं अथ बाबा वैरागियों से निवेदन है कि भारत में मिस्र जैसे हिंसक तांडव कि कामना के बजाय अपने पूँजीपति चेले चपाटों को दुर्वासाई रूप दिखाएँ और यदि भारतीयता से भारत से जरा भी लगाव हो तो 'अहिंसा 'को कभी विस्मृत न होने दें .वैसे भी हर विचार का एक समय होता है ;और जब समय आ जाता है तो कोई भी विचार या क्रांति किसी व्यक्ति विशेष का इंतज़ार नहीं करती .अरब देशों में संभवत उस बदलाव रुपी विचार का वक्त आ पहुंचा है .इसीलिये वहां उसे कोई नहीं रोक सकता ;

          कांग्रेस ,भाजपा ,माकपा ,भाकपा के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति या राजनैतिक दल के पास कोई वैकल्पिक आर्थिक -वैदेशिक या सत्ता सञ्चालन के कार्यक्रम अथवा नीतियां नहीं हैं .ये ४-५ राष्ट्रीय दल ही देश कि और देश कि जनता कि वास्तविक नब्ज पर हाथ रखे हुए हैं  इन्ही के धुर्वीकरण से कभी एन डी ए तो कभी यु पी ए को सत्ता में जिम्मेदारी मिलती है .इन्ही कि बदौलत देश में किसी भी' भ्रान्ति 'की गुंजाईश नहीं है ये जिम्मेदार राजनीतिग्य अछ्ही तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह करें इसकी जिम्मेदारी जनता कि है अब जमाना जनता का है -यथा जनता ...तथा नेता अथवा सरकार ......
           श्रीराम तिवारी
        

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट का विकल्प सत्ता परिवर्तन नहीं -अपितु नीति परिवर्तन ही सही विकल्प है

    विगत दिनों महाराष्ट्र के मनमाड  कस्बे में एक एस डी एम् को कुछ गुंडों ने जिन्दा जला डाला और खबर है कि इस कुकृत्य में शामिल खलनायक  भी उसी आग में झुलस कर बाद में अस्पताल में तड़प- तड़प  कर मर गया. यह वाकया सर्वविदित है की पेट्रोल में घासलेट की मिलावट करने वाले असमाजिक तत्वों ने यह दुष्कर्म क्यों किया ? प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत भी  सार्वभौम  है कि किसी निर्दोष  का कुछ जलाओगे तो या तो खुद भी जलोगे या झुलस जाओगे या कम से कम आंच तो आयेगी ही. सोवियत  समाजवादी व्यवस्था को आग लगाने वाले यह सिद्धांत  भूल गए और उस शानदार समाजवादी व्यवस्था को आग लगा दी. जिसकी  अकाल मौत से उत्पन्न आर्थिक संकट रुपी भूत ने यों तो पूरी दुनिया को ही अपनी उष्म लपटों के आगोश में ले लिया था, किन्तु खास तौर से उसको आग लगाने वाले अमेरिका और यूरोप शनै: शनै: आर्थिक असंतोष की लपटों से घिरते चले गए. बाद में उसकी आंच उन सभी देशों और वित्तीय संस्थानों ने ज्यादा महसूस की जो इन आग लगाने वालों के ज्यादा  नजदीक थे ..
                                            अमेरिका में २००७ से इस आंच में तीव्रता का अनुभव किया जाने लगा था. आर्थिक मंदी के चलते वेरोजगारी की दर ६% से बढ़कर १३%हो गई थी  .यही हाल उसके बगल गीरों -इंग्लॅण्ड और फ्रांस का  होने लगा था .  और इस भयावह  वित्तीय विक्षोभ ने कितना  विकराल रूप धारण  कर लिया  है, इसकी खबर सभी को है .फ्रांस की मेहनतकश जनता ने वहां की सरकार द्वारा पेंसन में छेड़छाड़ ,रिटायरमेन्ट की उम्र में बृद्धि ,बढती हुई मंहगाई ,और कारखाना बंदी के खिलाफ जबर्दस्त लामबंदी आरम्भ कर दी है .मेहनतकशों के समर्थन में विश्वविद्यालय के छात्रों और युवाओं ने संघर्ष छेड़ रखा है. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की कुर्सी खतरे में है .
             इंग्लॅण्ड में डेविड केमरून सरकार ने जनकल्याण के खर्चों में ८१ अरब पौंड की कटौती घोषित कर अपनी अंदरूनी  दुर्व्यवस्था   को ही जाहिर किया है .देश के सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की जरुरत जब दुनिया के उस मुल्क को भी होने लगे जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, तो इस आर्थिक उदारीकरण बनाम वैश्वीकरण बनाम उद्दाम पूंजीवादी करण के वास्तविक निहतार्थ क्या हैं ? खबर है कि इंग्लॅण्ड कि सरकार ने ५० हजार कर्मचारियों {पब्लिक सेक्टर में ] की छटनी करने का प्रस्ताव किया है ,इस तरह के थेगडे वाले उपचार   आग में घी का काम कर रहे हैं इंग्लॅण्ड के मजदूरों में असंतोष उफान पर है .
        जर्मनी ,ग्रीक .पुर्तगाल ,स्पेन, इटली, इत्यादि में बेरोजगारी ७ से १४ फीसदी हो चुकी है आर्थिक संकट के पूंजीवादी उपचार निष्फल हो रहे हैं .एशिया में जापान की अंदरूनी आर्थिक स्थिति को काबू में रखने के लिए अमेरिकी नव्य आर्थिक सुधारों से इतर आर्थिक संकट का बोझ निर्यात किये जाने की तजबीज हो रही है . विशाल कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था .मजबूत सार्वजनिक उपक्रम और मजदूरों के संगठित संघर्षों से भारत में इस आर्थिक मंदी का असर ज्यादा नहीं बढ़ने दिया. जो भी असर हुआ है उसका बोझ बड़ी चालाकी से देश की आवाम पर डालकर एलीट क्लास और शासक वर्ग खुश हैं. वे पूंजीवादी धडों में बटे होने पर भी अमेरिकी सरमायेदारी का समवेत समर्थन और पूंजीवादी निजाम को लोकतान्त्रिक  खोल पहनाये रखने में हम-सोच, हम-प्याला, हम-निवाला हैं .जनता का आक्रोश इनके खिलाफ न फुट पाए सो ये समाज को साम्प्रदायिकता और क्षेत्रवाद में बांटकर 'फुट डालो राज करो ' से अभिप्रेरित हैं .आगामी दिनों में देश की जनता के संघर्ष तेज होने के आसार हैं .
         चीन ने जहाँ देश के अंदर साम्यवादी नीतियों को परिमार्जित किया है वहीं वैश्विक क्षितिज पर पूंजीवाद को उसी की भाषा में जबाब देकर न केवल चीन को आर्थिक महाशक्ति बनाया अपितु अमेरिका समेत तमाम पूंजीवादी राष्ट्रों को चुनौती दी है ,उसके राष्ट्रीय हित अक्षुण हैं . सोवियत व्यवस्था से मुख मोड़ लेने के वावजूद उसके दीर्घकालीन असर से वर्तमान रसिया और उसके फेडरल राष्ट्रों की वित्तीय स्थिति बहरहाल तो काबू में है, किन्तु जब कुएं में भांग पडी हो तो क्या मछली और क्या मगर ? वैश्विक पूंजीवादी नव्य आर्थिक नीतियों की असफलता इसके अंदर के ही द्वंद्व  में अन्तर्निहित हैं .न्यूयार्क का सेवेंथ एवेन्यू -जहाँ पर एक मल्टीस्टोरी पर कभी 'लेमन ब्रदर्स 'के नाम की स्क्रीन चमका  करती थी आज उस पर 'बर्कले केपिटल 'का बोर्ड चमक रहा है वालस्ट्रीट के कारोबारियों को अब लेमन ब्रदर्स का नाम तक पसंद नहीं .विगत तीन वर्षों में अमेरिका और यूरोप में लेमन ब्रदर्स जैसी हजारों कंपनियां धराशायी हो चुकी हैं.
       पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी के चलते लगभग १० करोड़ लोग सीधे -सीधे अपने जीवकोपार्जन से हाथ धो बैठे हैं और विभिन्न राष्ट्रों को  जन कल्याणकारी  मदों में कतारव्योंत करनी पड़ी सो अलग . विश्व पूंजीवादी आर्थिक संकट का यह पहला अनुभव नहीं है.१८७३ में सबसे  पहले आर्थिक मंदी का कहर भुगता था .सामंतवाद के गर्भ से उत्पन्न होते ही यह अपने आंतरिक द्वन्द का शिकार हो चला था. उसके पश्चात् १९२८ में    आई आर्थिकमंदी ने तो पूरे सात वर्ष तक दुनिया भर   को रुलाया मानो साढ़े  साती की सगी अम्मा हो. कल-कारखानों में अतिउत्पादन एवं बाजार में मांग-आपूर्ति में असंतुलन होने की वजह से यह दीर्घकालीन आर्थिक संकट जारी रहा था. वस्तुत सम्पूर्ण पूंजीवादी अर्थ-तंत्र असंतुलन एवं मुनाफे पर आधारित होने से वर्गीय समाजों में बेजा अंतर का निर्माणकर्ता है जिसमें पूँजी का भारी-भरकम गुरुत्व अधिकांश अतिशेष पूँजी और साथ ही श्रम को भी अपने में लील लेता है .इस प्रकार गरीब और अमीर के बीच का फासला तो बढ़ता ही है वर्ग संघर्ष का दावाग्नि भी सुलगने लगती है ,यही दावाग्नि आज ट्युनिसिया -तुर्की -जोर्डन -मिस्र और तमाम यूरेशिया में फ़ैल चुकी है .
      आर्थिक-संकट के कारणों को जनता के अवैज्ञानिक हिस्सों में सत्ता-परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है ,जबकि यह मामला पूरी तरह से आर्थिक और राजनैतिक नीतियों के अमल का है .इस सन्दर्भ में G -२० देशों के सतत सम्मेलनों में पूंजीवादी उपचारों को ही दुहराया जाता रहा है ;जबकि इन्ही सम्मेलनों में भारत ,चीन और अन्य पूर्व  और वर्तमान समाजवादी राष्ट्रों के आर्थिक उत्कर्ष की स्वीकारोक्ति भी विभिन्न मंचों पर ध्वनित हुई है .
         अमेरिका अब स्वयम ही आगे होकर आर्थिक संरक्षण का पैरोकार बनता जा रहा है लेकिन केवल 'buy only  american 'के नारे के साथ. दरअसल  दुनिया की आर्थिक समस्याओं का निदान पूंजीवाद के पास न तो था और न है ,जबकि वैश्विक समाजवादी व्यवस्था को ध्वस्त करने के बाद पूंजीवाद का एकल-साम्राज्य सारे संसार को अपने आगोश में ले चुका था .वैश्विक समाजवाद की राह में एक अवरोध तब आया था जब फ़्रांसिसी क्रांती को कुचला गया था .उसके बाद दुनिया  ने और तेजी से समाजवाद की और कदम बढ़ाये तो लेनिन -स्टालिन के नेत्रत्व में सोवियत क्रांती सम्पन्न हुई .सोवियत क्रांती के पराभव उपरान्त दुनिया की जन-बैचेनी को सही दिशा और गति देने का काम आज के नौजवानों का है की वे मौजूदा आर्थिक संकट को सिर्फ मांग या पूर्ती अथवा सत्ता परिवर्तन के नजरिये से न देखते हुए दूरगामी -राजनैतिक ,सामाजिक  ,सांस्कृतिक और आर्थिक सरोकारों को वैज्ञानिक समाजवादी अहिंसक परिवर्तनों के सापेक्ष देखें. आज की तरूणाई को जानना होगा की परिवर्ती समाजवाद की प्रति-क्रन्तियाँ राजनैतिक और आर्थिक कारणों के कुचक्र का परिणाम थीं .पूंजीवाद का वर्तमान आर्थिक संकट एक ध्रुवीय  विश्व-व्यवस्था का परिणाम भी है इसमें कई इराक .अफगानिस्तान और मिस्र स्वाहा हुए हैं .जो बच गए वे कहीं न कहीं समाजवाद की  फटी-टूटी वैचारिक छतरी की छाँव का सहारा लेकर ही शेष रहे हैं वर्ना विश्व व्यापी आर्थिक संकट-रुपी अजगर  ने उन्हें भी निगल लिया होता ....
        श्रीराम तिवारी
  
                                                     

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मिस्र (ईजिप्ट) का वर्तमान आंतरिक हिंसक संघर्ष किसी के काम का नहीं .

     मिस्र में जो चल रहा है वो कुछ भी नामित हो किन्तु इसे क्रांति का नाम देना उचित नहीं होगा.विगत १० दिनों की राजनैतिक गतिविधियों का निचोड़ ये है की मिस्र का वर्तमान जानान्दोलन  नितांत दिशाहीन और गृहयुद्ध पोषक है .इतने दिन  मुबारक विरोधी सड़कों पर चिल्ल पों मचाते रहे किन्तु हुस्नी मुबारक ने संयम  से काम लिया ;किन्तु जब देश से बाहर की अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने अपने मोहरे मिस्र की सरजमीं  पर उतारने शुरू किये तो मुबारक समर्थक आवाम का धैर्य चुकने लगा और कल २ फरवरी को वे भारी तादाद में हुस्नी मुबारक के समर्थन में न केवल काहिरा बल्कि पूरे देश में सड़कों पर उतर आये , न केवल सड़कों पर उतर आये अपितु सेना के बैरीकेट्स तोड़कर तहरीर स्कायर पर जमा हो गए और नारा लगाया -लॉन्ग लीव हुस्नी मुबारक .स्थिरता सम्बन्धी हुस्नी मुबारक के कमिटमेंट पर वे यकीनी तौर पर आश्वस्त हैं अब इस विप्लवी माहौल  को गृहयुद्ध नहीं तो क्या क्रांति कहेंगे ?
             हुस्नी मुबारक की जगह शायद मोहम्मद अलबरदेई आ जाएँ ,या शायद कोई फौजी बन्दा सत्ता पर काबिज हो जाये किन्तु मिस्र की जनता की वास्तविक तकलीफें -महंगाई ,वेरोजगारी और उत्पीडन -कम होने की कोई गारंटी नहीं है ,ये विश्वव्यापी आर्थिक संकट का दौर है किसी एक व्यक्ति की जगह दूसरे को राष्ट्राध्यक्ष भर बना देने से व्यस्थाएं  नहीं बदला करतीं .व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रन्तिकारी आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक है .इस तरह के दिशाहीन विचारहीन ,व्यक्तिपरक आन्दोलन अपनी ऊष्मा बरकार रखने में ही असफल होते रहे हैं ,क्योंकि इस आन्दोलन के पास वैज्ञानिक तरीके से समाज ,राजनीत या आर्थिक दुरावस्था से निपटने का कौशल नहीं होता .
          हुस्नी मुबारक ही एकमात्र अरेवियन हैं जिन पर इजरायल को यकीन है और इसीलिये वे अमेरिका के भी विश्वाशपात्र है .अलबरदेई होंगे तो वे भी उसी घात के हैं .जहाँ तक फौजों का सवाल है तो यह जगजाहिर है की इस भूतल पर जितने भी फौजी शासक  हैं या विगत ५० सालों में हुए हैं- वे सभी अमेरिकी धुन पर नाचने बाले कालबेलिए भर रहे हैं फिर मिस्र की जनता का यह वर्तमान विप्लवी उपसंहार  कहाँ समाप्त होगा ?
     वैसे भी हुस्नी मुबारक की उम्र ढल चुकी है वे ३० साल से सत्ता पर काबिज हैं ;किन्तु मिश्र की जनता जिस लोकतंत्र की मांग कर रही है वो तो एलेक्ट्रोरल की राह ही आ पायेगा .हुस्नी कह भी रहे हैं की आगामी आम चुनाव में मैं खड़ा नहीं होऊंगा और मौजूदा संविधान के तहत सत्ता परिवर्तन का आवाम को मार्ग भी प्रशस्तकर्ता हूँ ;किन्तु लोग हैं कि मुबारक को गद्दी छोड़ने का आह्वान कर रहे हैं .यह लगातार १० दिन तक चलने से तंग आकार अभी तक जो चुप थे और हुस्नी से खुश थे वे भी मैदान में आ गए और इस तरह एक प्रतिष्ठित राष्ट्र फिर से दो रहे पर खड़ा है .मिश्र कि जनता एक  दुखांत अध्याय कि ओर अग्रसर है .
     मिस्र के अंदरूनी संघर्ष से पूर्व फ़्रांस ,ट्यूनीसिया ,तुर्की तथा दुनिया के अनेक भू-भागों में वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट की धमक महसूस की गई और अब तो भारत भी इस की चपेट में आने वाला है .भारत सरकार ने पेट्रोल डीजल के दाम विगत वर्ष में २-३ बार बढ़ाये हैं अब ओपेक ने जब १०० डालर प्रति वेरल कच्चा तेल कर दिया तो महंगाई का आलम  नाकाबिल-ए बर्दास्त हो जायेगा .तब भारत की जनता भी सडको पर उमड़ पड़ेगी और फिर एक अदद कोई दूसरा दल या व्यक्ति सत्तासीन हो जायेगा और मंहगाई -बेरोजगारी -कुव्यवस्था -भृष्टाचार  ज्यों के त्यों बरकरार रहेंगे क्योंकि पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था में मुनाफा केंद्र में होता है और इंसानियत ,भूंख ,न्याय सभी हासिये पर होते हैं .बिना वैज्ञानिक तौर तरीके से व्यवस्था परिवर्तन एक प्रपंच मात्र है जो शक्तिशाली प्रभु वर्ग के हित संवर्धन की कुंजी है .इसमें नाहक ही आम जनता और खासतौर से निर्धनजन स्वाहा  होते रहते हैं .मिस्र या इजिप्ट में यही सब हो रहा है .वहाँ एक सकारात्मक क्रांती की अभी कोई संभावना नहीं .
       श्रीराम तिवारी
                        

सोमवार, 31 जनवरी 2011

अंध-आस्था से लेस सांप्रदायिकता ही कट्टरवाद की जननी है.....

         ईश्वर का नाम लेने में न तो कोई बुराई है और न ही किसी का अनिष्ट होने कि कोई संभावना है.मानव सभ्यता के विभिन्न दौर में प्राकृतिक आपदाओं और वैयक्तिक कष्टों से निज़ात पाने या संघर्ष क्षमता हासिल करने कि चेष्टा में प्रबुद्ध मानवों ने वैज्ञानिक आविष्कारों कि तरह ही मानसिक ,चारित्रिक ,सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक उन्नोंयन में महारत हासिल कि है .यह कार्य हर युग में , हर देश में ,हर द्वीप में और हर कबीले या मानव समूह में अनवरत चलता रहा है .कोई देश विशेष,समाज विशेष,जाति विशेष या सम्प्रदाय विशेष जब ओरों कि बनिस्पत अपनी रेखा को - दर्शन या मजहब के मद्देनजर बढ़ा दिखाने के फेर में असत्याचरण करते हुए ,प्रभुत्व का इस्तमाल करते हुए आक्रामक हो जाये तो समझो कि वो धरम या मजहब छुई -मुई भर है ,उसका कोई सत्यान्वेषण संभव नहीं,उसके मानने वालों का कोई नैतिक या चारित्रिक उत्थान संभव नहीं ,ऐसी कौम को मानवीयता के इतिहास में सदैव संदेह का सामना करना पड़ता है ,कई अग्नि परीक्षाएं भी उसके स्खलन को रोक नहीं पातीं .
         भारत दुनिया का एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्रात्मक -धर्मनिरपेक्ष -गणतंत्र है ;जहाँ सभी धर्मों ,सभी जातियों ,और सभी विचारधाराओं को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है ,हालाँकि भारतीय संविधान कि प्रस्तावना में ही उसके नीति निर्देशक सिद्धांतों कि महानता स्पष्ट उद्घोषित होती है 'हम भारत के जन गण यह संकल्पित करते हैं कि हम सर्व प्रभुत्व सम्पन्न ,लोकतंत्रात्मक ,धर्मनिरपेक्ष ,समाजवादी गणतंत्र कि स्थापना हेतु बचन बध्ध होंगे ......."हालाँकि तीसरा संकल्प याने समाजवाद अभी भी दूर कि कौड़ी है ,अभी तो पहले दो सिद्धांत याने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता ही डांवाडोल होते नजर आ रहे हैं इसके लिए  सिर्फ सत्ता ही जिम्मेदार हो ऐसी बात नहीं ,जनता के वे हिस्से जिनके हितों का ताना -बाना भृष्ट आचरण से जुड़ गया वे भी इस इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं. बहुसंख्यक सम्प्रदायवादी जितने जिम्मेदार हैं ;अल्पसंख्यक सम्प्रदायवादी -कट्टरपंथी भी उतने ही जिम्मेदार हैं .विदेशीशत्रु  जितने जिम्मेदार हैं आंतरिक तथाकथित अंध राष्ट्रीयतावादी भी उतन्रे  ही जिम्मेदार हैं .
          देश कि बहुसंख्यक साम्प्रदायिक राजनीत में यदि ढपोरशंखियों को सर माथे लिए जायेगा और विकाश कि -धर्म निरपेक्षता कि .समाजवाद कि बात करने वालों को हासिये पर धकेला जायेगा तो संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों कि बखत ही क्या रहेगी?अल्पसंख्यक समूह कि उदारवादी कतारों को हासिये पर धकेला जायेगा तो कट्टरपंथ हावी होगा ही फिर उससे से  जूझने के लिए उदारचेता समदृष्टि उभय हितेषी कौन बचेगा ?
       पहले अयोध्या काण्ड  फिर गोधरा काण्ड उसके उपरान्त गुजरात कांड ,मुंबई काण्ड ,मालेगांव .अजमेर .हैदरावाद और समझौता एक्सप्रेस से लेकर अब स्वामी असीमानंद कि अपराध स्वीकारोक्ति के निहतार्थ हैं कि अल्पसंख्यकों को उदारवादी ट्रेक पर चल पड़ना चाहिए किन्तु हतभाग्य ऐसा हो नहीं पा रहा है .कतिपय उच्च शिक्षित उदारमना  हिन्दू खुलकर अल्पसंख्यकों का पक्ष पोषण करते रहते हैं ,वाम जनतांत्रिक कतारों में सदैव अल्पसंख्यकों के हितों की पेरवी के लिए शिद्दत से काम होता रहा है कांग्रेस ,समाजवादी पार्टी ,बहुजन समाज पार्टी ही नहीं बल्कि भाजपा भी सिकंदर वख्त से मुख्तार अंसारी तक यह जताने के लिए जी जान से जुटी रही की वह अल्पसंख्यक विरोधी नहीं .आर एस एस ने भी बाज मर्तवा जाहिर किया की हिंदुत्व का मतलब ये नहीं वो नहीं -मतलब देश में छोटे भाई की तरह रहो तुम भी खुश हम भी खुश .हालाँकि सत्ता के लिए जब ये गंगा जमुनी मार्ग जमीन पर नहीं बन सका तो रथारूढ़ होकर ,हाथ में त्रिशूल लेकर हिन्दू जनता के सामने राम लला के नाम पर छाती कूटकर जल्द बाज़ी में 'दोउ गंवाँ बैठे ...माया ...मिली  न राम ....इसी तरह अल्पसंख्यकों की उदारवादी कतारों को परे हटाते हुए  इस्लामिक कट्टरपंथी भी  बिना आगा पीछा सोचे भारत राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक स्वरूप को विच्छेदित करने में लगे हैं.
      दारुल -उलूम -देवबंद के कुलाधिपति या वाईस चांसलर मौलाना गुलाम मोहम्मद वास्तन्वतीके जबरिया इस्तीफे से साफ़ है कि भारत में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें विवेक और सद्भाव कि आवाजों को मुखर नहीं होने देना चाहतीं . इसमें किसी को भी शक नहीं कि गुजरात के २००२ में हुए दुखांत दंगों में मुस्लिम समुदाय के निर्दोष लोगों को जान माल का भारी नुक्सान हुआ था किन्तु क्या निर्दोष हिन्दुओं  को भी इसी तरह कि बीभत्स तस्वीर का सामना नहीं करना पड़ा था ?साम्प्रदायिक दंगों कि आग में अधिकांश मजदूर और वेरोजगार ही क्यों मारे गए ?क्या यह सर्वहारा वर्ग को साम्प्रदायिक आधार पर विखंडित करने कि पूंजीवादी -साम्राज्यवादी कुचाल नहीं ?किंतुं इन नर संहारों में सबसे ज्यादा छति धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत कि हुई इसके वावजूद यदि मौलाना वास्तान्वती इस गंगा जमुनी एकता को पुख्ता करने के लिए मुसलमानों से गुजारिश करते हैं कि अतीत की कालिमा को भूलो आगे बढ़ो तो इसमें ऐसा क्या गजब हो गया कि उन्हें त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया गया . मौलाना वास्तान्वती सिर्फ इस्लामी आलिम ही नहीं वे एम् वी ए भी हैं और गुजरात खास तौर से सूरत उनकी कर्म भूमि भी रही है वे गुजरात या शेष भारत में मुस्लिमों के साथ तथाकथित भेद भाव की अवधारणा से परे प्रोग्रेसिव विचा रों  के हामी हैं .उनकी यह समझ भी है कि क्षेत्रीय और भाषाई कारणों से देश के मुसलमान सार्वदेशिक तौर पर एक सी सोच नहीं रखते .अर्थात यह जरुरी नहीं कि  यु पी या बिहार का मुस्लिम  चीजों को जिस नज़र से देखता है गुजरात का मुस्लिम भी वही नजरिया धारण करे.हो सकता है कि गुजराती मुसलमानों के जख्म अभी भी न भरे हों किन्तु मानव जीवन यात्रा में जो सकारात्मकता जरुरी है वो जनाब वास्तान्व्ती ने व्यक्त कि थी .अब दारुल उलूम की मजलिसे शूरा ने उन्हें मनाने का फैसला तो किया किन्तु कट्टरपंथी छात्र समूह की हरकतों से एक महान विद्वान् एक सर्वश्रेष्ठ उलेमा इस्तीफ़ा वापिस लेने को तैयार नहीं .उनके पदारूढ़ होने से देवबंद में शिक्षा के नए द्ववार खुलने ,देश में इस्लामी तालीम को रोजगार मूलक बनाने और रोशन ख़याल हमवतनो की आवाज बुलंद होने के सपने साकार करने की उम्मीदें बनी थीं कट्टरपंथियों की हरकतों से ये अधुनातन कपाट बंद होते से लग रहे हैं  .आज जबकि दुनिया भर में इस्लामी कट्टरवाद और इस्लामिक उदारवाद के बीच जंग छिड़ी है तब देश और दुनिया के उदारवादी आवाम की एकजुटता सहिष्णुता और उदारवाद की पक्षधरता जरुरी है .उसके पूर्व भारत में बहुसंख्यक कट्टरवाद पर तगड़ी लगाम जरुरी है और वास्तन्वती जैसे इस्लामिक शिक्षा शाश्त्रियों को भरपूर सहयोग तथा समर्थन जरुरी है .यह एक के बस का काम नहीं सभी की थोड़ी थोड़ी आहुति जरुरी है .....
    श्रीराम तिवारी

रविवार, 30 जनवरी 2011

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का अंतिम दिवस...

            "आज नई दिल्ली में शाम के पांच बजकर सत्रह मिनिट पर , राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या हो गई " उनका हत्यारा एक हिन्दू है ' वह एक ब्राम्हण  है ' उसका नाम नाथूराम गोडसे है ' स्थान बिरला हॉउस ..........ये आल इंडिया रेडिओ है ........{पार्श्व में शोक धुन }......
           उस वैश्विक शोक काल में तत्कालीन सूचना और संचार माध्यमों ने जिस नेकनीयती और मानवीयता के साथ सच्चे राष्ट्रवाद का परिचय दिया वह भारत के परिवर्ती-सूचना और संचार माध्यमों  का दिक्दर्शन करने  का प्रश्थान बिंदु है. यदि गाँधी जी का हत्यारा कोई अंग्रेज या मुस्लिम होता तो भारतीय उपमहादीप की धरती रक्तरंजित हो चुकी होती. तमाम आशंकाओं के बरक्स आल इण्डिया  रेडिओ और अखवारों की तात्कालिक  भूमिका के परिणाम स्वरूप देश एक और महाविभीशिका  से बच गया .........
               लेरी कार्लिस और डोमनिक लेपियर द्वारा १९७५मे  लिखी पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट'  में भारतीय स्वाधीनता संग्राम  की आद्योपांत कहानी का वर्णन है ...इसमें गांधी जी की हत्या का विषद और प्रमाणिक वर्णन भी है .....
   मोहनदास करमचंद गाँधी के जीवन का अंतिम दिन -की दिन चर्या में सूर्योदय से पहले लगभग ०३.३० बजे उनका जागना और ईश्वर आराधना .दोपहर के आराम के बाद वे १०-१२ प्रतीक्षारत आगंतुको से मिले ,बातचीत की .अंतिम मुलाकाती के साथ चर्चा उनके लिए घोर मानसिक वेदना दायक रही .वे अंतिम मुलाकाती थे सरदार वल्लव भाई पटेल . उन दिनों पंडित जी और पटेल के बीच नीतिगत मतभेद चरम पर थे . पटेल तो संभवत: नेहरु  मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के मूड में थे ; लेकिन गांधीजी उन्हें समझा रहे थे कि यह देश हित में नहीं होगा .
          गांधीजी ने समझाया कि नवोदित स्वाधीन भारत के लिए यह उचित होगा कि तमाम मसलों पर हम तीनो -याने गांधीजी .नेहरूजी और पटेल सर्वसम्मत राय बनाए जाने कि अनवरत कोशिश करेंगे .आपसी मतभेदों में वैयक्तिक अहम् को परे रखते हुए देश को विश्व मानचित्र पर पहचान दिलाएंगे .पटेल से बातचीत करते समय गांधीजी कि निगाह अपने चरखे और सूत पर ही टिकी थी .जब बातचीत में तल्खी आने लगी तो मनु और आभा जो श्रोता द्वय थीं ,वे नर्वस होने लगीं ,लगभग ग़मगीन वातावरण में उन दोनों ने गांधीजी को इस गंभीर वार्ता से न चाहते हुए भी टोकते हुए याद दिलाया कि प्रार्थना का समय याने पांच बजकर दस मिनिट हो चुके हैं .
       पटेल से बातचीत स्थगित  करते हुए गांधीजी बोले 'अभी मुझे जाने दो. ईश्वर कि प्रार्थना-सभा में जाने का वक्त हो चला है ' आभा और मनु के कन्धों पर हाथ रखकर गाँधी जी अपने जीवन कि अंतिम पद यात्रा पर चल पड़े ,जो बिरला हॉउस  के उनके कमरे से प्रारंभ हुई और उसी बिरला हॉउस  के बगीचे में समाप्त होने को थी .....
    अपनी मण्डली सहित गांधीजी उस प्रार्थना सभा में पहुंचे जो लॉन  के मध्य थी और जहाँ .नियमित श्रद्धालुओं कि भीड़ उनका इंतज़ार कर रही थी और उन्हीं  के बीच हत्यारे भी खड़े थे .गांधीजी ने सभी उपस्थित जनों के अभिवादानार्थ  नमस्कार कि मुद्रा में हाथ जोड़े ..... करकरे कि आँखें नाथूराम गोडसे पर टिकी थीं ...जिसने जेब से पिस्तौल निकालकर दोनों हथेलियों के दरम्यान छिपा लिया .....जब गांधीजी ३-४ कदम फासले पर रह गए तो नाथूराम दो कदम आगे आकर बीच रास्ते में  खड़ा हो गया ...उसने नमस्कार कि मुद्रा में हाथ जोड़े ,वह धीमें -धीमें अपनी कमर मोड़कर झुका और बोला "नमस्ते गाँधी 'देखने वालों ने समझा कि कोई भल-मानुष है जो गांधीजी के चरणों में नमन करना चाहता है ...मनु ने कहा भाई बापू को देर हो रही है प्रार्थना में ..जरा रास्ता दो ...उसी क्षण नाथूराम ने अपने बाएं हाथ से मनु को धक्का दिया ...उसके दायें हाथ में पिस्तौल चमक उठी .उसने तीन बार घोडा दवाया ...प्रार्थना  स्थल पर तीन धमाके सुने गए ...महात्मा जी कि मृत देह को बिरला भवन के अंदर ले जाया गया,  आनन् -फानन लार्ड  माउन्ट बेटन, सरदार पटेल, पंडित नेहरु और अन्य हस्तियाँ उस शोक संतृप्त माहोल के बीच पहुंचे ...जहां श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए अंतिम ब्रिटिश प्रतिनिधि ने ये उदगार व्यक्त किये .....'महात्मा गाँधी को ...इतिहास में वो सम्मान मिले जो बुद्ध ,ईसा को प्राप्त हुआ ....
    श्रीराम तिवारी

शनिवार, 29 जनवरी 2011

भाजपाई अश्वमेध का घोड़ा- कर्नाटक में क़ैद...

   माननीय राज्यपाल {कर्णाटक}हंसराज भारद्वाज देश के उन बचे-खुचे कांग्रेसियों में से हैं जो न केवल विधि विशेषग्य अपितु केंद्र राज्य संबंधों के प्रखर अध्येता भी रहे हैं ; उन्होंने जब कर्णाटक के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री येदुरप्पा के खिलाफ आपराधिक मुकद्दमें की अनुमति दी तो कर्णाटक में गुंडों ने आसमान सर पर उठा लिया.
      उम्मीद की जा सकती थी कि- जिस तरह विगत ६-७ साल पहले मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल भाई महावीर जी ने जब ठीक इसी तरह का निर्णय तब तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ  दिया तो मध्यप्रदेश में पत्ता भी नहीं खड़का . कोई सड़क पर नहीं आया ,किसी ने बस या रेल नहीं रोकी और न किसी ने उन्हें जलाया, कर्णाटक में भी यदि भाजपा कानून-सम्मत  प्रजातान्त्रिक तौर तरीके से पेश आती तो भारतीय लोकतंत्र को दक्षिण भारत में एक राष्ट्रीय पार्टी के होने से और ज्यादा बल मिलता किन्तु यह उसका नौसीखियापन ही माना जायेगा कि जैसे-तैसे आजादी के ६४ साल बाद दक्षिण के ४-५  राज्यों में से एक प्रमुख राज्य कर्णाटक में अवसर तो मिला किन्तु अपने भृष्ट और दबंगी  आचरण ने सब कुछ तार-तार करके रख दिया है .येदुरप्पा सरकार ने पहले तो अपनी ही पार्टी भाजपा के आलाकमान को कई बार लज्जित किया और अब राज्यपाल के सम्मानित पद समेत कर्णाटक की आम जनता को एड्डियों-रेड्डीयों के पैरों तले कुचलने को को आतुर हो रही है .
        किसी भी सरकार का पहला कर्तव्य  यह होता है कि- जान-माल की हिफाजत करना; क़ानून पर अमल करना, किन्तु जिस तीव्रता से कर्नाटक सरकार ने केंद्र और राज्यपाल पर आक्रामक तेवर दिखाए, देश भर में दुष्प्रचार किया  और भाजपा कार्यकर्ताओं ने कर्णाटक में  बसें जलाकार ,रेलें रोककर दुकाने लूटकर कोहराम मचाया वह शासन  नहीं -अराजकता है .आप सत्ता में हैं और देश के खिलाफ काम करेंगे ,जनता को परेशान करेंगे और भू-माफियाओं की चाकरी करेंगे तो यह अपराध की कोटि में आता है और देश को मौजूदा दौर के अनेकानेक संकटों में इजाफा करेंगे तो आपको सत्ता से हटाना भी जनता को आता है .
        जब स्वयम येदुरप्पा जी अपने सगे सम्बन्धियों को दी गई जमीने वापिस लौटाने और भू-माफिया से किनारा करने का वादा कर चुके थे तो पूरे कर्णाटक में सिर्फ इस वजह से की राज्यपाल ने मुकद्दमें की अनुमति क्यों दी ?
 पूरे राज्य में अव्यवस्था फैलाना कौनसी राष्ट्रभक्ति है ? पहले भी लालूप्रसाद यादव , ए आर अंतुले ,जयललिता ,और अन्य के खिलाफ भी ऐसे ही मामले पेश हुए हैं फिर इस रेड्डी आतंक से चारित्रिक स्खलन क्यों? यदि हंसराज भारद्वाज ने अनुमति देकर कोई अनीति की है तो यह किसने कहा की आप मौखिक  और संवैधानिक विरोध नहीं करें ? आप यदि देशभक्ति से सराबोर  हैं तो क़ानून के अस्त्र  में यकीन क्यों नहीं करते ? मानव-अधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को सजा होने पर जब इन पंक्तियों के लेखक समेत अनेक प्रजतान्त्र-वादियों   ने अपना आक्रोश वेब मीडिया और अन्य माध्यमों से देश और दुनिया के समक्ष रखा तो देश की दक्षिण पंथी कतारों को यह नितांत अहिंसक और बौद्धिक प्रतिवाद भी नाकाबिले बर्दाश्त  था. अब आपके सामने एक साफ़ सुथरी अवस्था में क़ानून सम्मत रास्ता है तो आप उसी राह में स्वयम रोड़े अटका रहे हैं ,बसें जला रहे हैं ,अंट-शंट बयानवाजी कर रहे हैं.
               हाल ही में कर्नाटक के स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा ; कर्णाटक भाजपा अब पूरी तरह से एड्डी -रेड्डी के हाथों में जा चुकी है .अब भाजपाई अश्वमेध का घोडा आंध्र ,तमिलनाडु ,या केरल की ओर बढ़ने के बजाय खनन+भू-माफियों  की नांद का गन्दा पानी पीकर मरणासन्न हो चला है .भाजपा की सरकार ने चंद-स्वार्थियों की खातिर जनता के प्रति तमाम जिम्मेदारियों को जमींदोज कर दिया है.गडकरी जी, आडवानी जी ,सुषमा जी  और अनंत जी सब पर येदुरप्पा अकेले ही भारी हैं ;येदुरप्पा पर रेड्डी बंधू भारी हैं ...इन बंधुओं की महिमा न्यारी है .वे धन बल से भाजपा हाईकमान को अपने कब्जे में ले चुके हैं .
         भाजपा का शीर्षस्थ नेतृत्व और संघ-परिवार सोचतें हैं कि वे जोड़ रहे  हैं हकीकत ये है कि सब मिलकर   अंदर से  फाड़  रहे हैं .भाजपा चाहती तो  है की अमर-अकबर-अन्थोनी  सबका प्यार उसे मिले पर सत्ता में आने पर उसकी कारगुजारी अवाम के खिलाफ हुआ करती है .उसके नेतृत्व  में नासमझी और कच्चापन साफ़ झलकता है
    भाजपा का पूरा चाल -चेहरा -और चरित्र बदल चुका है ,विचारों कि जगह गुंडा-गिरदी ने ले ली है .नेता और कार्यकर्त्ता विवेकहीन ही नहीं अपितु बातचीत कि बजाय हाथा-पाई पर उतारू होने लगे हैं ..उसका आचरण और रुझान लोकतंत्र .के खिलाफ और फासीवाद कि ओर धीरे -धीरे बढ़ रहा है ..देश कि जनता को आने वाले दिनों में भी महंगाई बढाने वाली भ्रष्ट कांग्रेस के हाथों लुटते रहने की नियति सी वन चुकी है .विपक्ष सभी जगह खंड-खंड हो रहा है .भाजपा बंगलौर से आगे बढ़ने के बजाय भू-माफियाओं, खनन-माफियाओं  की देहरी पर सूर्यास्त का इन्तजार कर रही है ....
          श्रीराम तिवारी
           

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

एक कांदा दो रोटी -कविता........

         फूल  अनगिन  खिलें वो चमन चाहिए,
         शोर काफी हुआ कुछ अमन चाहिए .
         प्यार करुना की क्यारीं बना वाग्वाँ,
          बम बारूद के थर नहीं चाहिए ..
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         सब्ज पत्तीं  भी हों लाली फूलों पै हो ,
        ज़र्रा -ज़र्रा  शहादत असर चाहिए .
         खंतियाँ खोद जिनकी जवानी खटी,
        एक कांदा -दो रोटी उन्हें चाहिए ..
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        मस्त सत्ता के मद चूर हो बेखबर ,
        चीर हरता -दुशाशन नहीं चाहिए .
        बैरी अंदर घुसे बैरी बाहर खड़े ,
        जिनको सोता हुआ न वतन चाहिए ...
             श्रीराम तिवारी