मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

अनाड़ी नेतृत्व और मित्रविहीन भारत !

 भाजपा जब जब विपक्ष में होती है तब उसके नेता बहादुरी,बुद्धिमत्ता और अक्लमन्दी की खूब बातें करते हैं । लेकिन सत्ता में आते ही वे लोग बौरा जाते हैं। अभी २०१७  के दरम्यान मोदी जी और धोबाल की कूटनीति का परिणाम यह है कि भारतीय विदेशनीति चारों खाने चित पड़ी है !आतंकवाद और नक्सलवाद का खतरा रंचमात्र कम नहीं हुआ !पाकिस्तान न केवल लगातार सीमाओं पर सीज फायर का उललंघन करत रहता है अपितु अपने पालतू मजहबी आतंकी ग्रुपों को भारत में भेजकर भारत के  सैन्य ठिकाने बर्बाद कर रहा है। पाकिस्तान ने जाधव जैसे लोगों को जबरन फांसी चढ़ा देने के बहाने भारत को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर रखा है। उधर चीन ने पीओके में सारी दुनिया को नेवता देकर भारत को 'पंगत' से दूर रखने में सफलता पाई है। अमेरिका से दोस्ती गांठने के फेर में मोदी सरकार ने भारत का सर्वस्व दाव पर लगाया ,किन्तु ट्रम्प महाशय के सत्ता में आने से अमेरिका में भारतीय युवाओं पर छटनी की तलवार लटक रही है। मोदी सरकार ने अमरीका को इस वादे पर भारत में सौ फीसदी एफडीआई दिया था कि एनएसजी [न्यूक्लियर सेफ्टी ग्रुप ]की सदस्यता भारत को मिल जायेगी !किन्तु नतीजा ठनठन गोपाल ! अब हर असफलता के लिए चीन के वीटो का बहाना किया जा रहा है ! यदि यही असल वजह है तो यह सिलसिला तो नेहरु से लेकर अटलबिहारी वाजपेई तक सभी दौर में जारी रहा है ! फिर किस बात पर यह दावा किया गया कि ''७० साल में कुछ नहीं हुआ अब अहम आये हैं तो सब ठीक कर देंगे ?''
इतिहास गवाह है जब-जब गैर कांग्रेसी विपक्ष को या भाजपा को देश की सत्ता मिली है ,तब-तब गैर भाजपाई दलों का और खास तौर से भारत देश का ही बंटाढार हुआ है। यही वजह रही कि अलोकतांत्रिक इमरजेंसी के कष्ट उठाकर ,कांग्रेसी कुराज का भृष्टाचार भुलाकर और अपना मन मारकर भारत की जनता ने पुनः पुनः कांग्रेस रुपी कोंदबाड़े को सत्ता के लिए चुना है। एतद द्वारा यह सिद्ध किया जा सकता  है कि राहुल गाँधी को और कांग्रेसियों को बस थोड़ा सा सब्र करना होगा। उन्हें अपनी विश्वसनीयता कायम रखनी होगी ,बाकी का काम देश की जनता खुद ही कर देगी ! नोटबंदी ,कालाधन और भृष्टाचार के बारे में कटु अनुभव से जनता समझदार होती जा रही है। पूंजीपति घरानों का रागदरबारी छोड़कर शेष राष्ट्रवादी -जनवादी मीडिया भी देश की जनता के साथ खंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष के लिए तैयार हो रहा है !अब सिर्फ राजनैतिक विपक्ष को अपना दायित्व और अपनी भूमिका को समझना है।


ताजा खबर है कि रूस और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक संधि हुई है। रूस ने पाकिस्तान और चीन के बीच बन रहे हाइवे  को अपनी सहमति दे दी है। पाकिस्तान ने चीन को पीओके ,बलूचिस्तान और ग्वादर बंदरगाह भेंट में दे दिया है। बदले में चीन ने पाकिस्तान को विश्व मंच पर आतंकवादी आरोपों से रक्षा का बचन दिया है।जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है,तबसे भारत के चारों ओर दुरभिसंधियों का चक्रव्यूह सफल होता जा रहा है। भारत की विदेश मंत्री बीमार हैं ,पीएम को नोटबंदी की असफलता ने बंधक बना लिया है। अमेरिका ने पहले ही भारत की  मोदी सरकार से १००% एफडीआई के बदले 'एनएसजी ' में मेम्बरशिप का वादा किया था ,उसका नतीजा भी जीरो ही है। इधर मोदीजी की  असफल विदेश नीति ने रूस को भी पाकिस्तान का मित्र बना दिया है।

नेपाल को भूकम्प और बाढ़ में सहायता दी मधेशियों का पक्ष लिया  किन्तु अब नेपाल के मधेशी भी भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं। जब से भारत ने पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की है तभी से सीमाओं पर भारतीय जवान दनादन शहीद हो रहे हैं। डॉ मनमोहनसिंह के दौर में एकबार जब दो भारतीय जवानों के सर काटे गए थे ,तब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदीजी ने कहा था ''हम होते तो घुसकर मारते !''अब वे अंदर घुसकर कितने मार रहे हैं ये तो पता नहीं ,क्योंकि पाकिस्तानी फ़ौज  खुद नहीं लड़ती वह भारत [कश्मीर]से ही किराये के फिदायीन बनाकर मरने -मारने के लिए सीमाओं पर भेजती रहती है।

सोवियत संघ के पराभव और पूँजीवादी प्रतिक्रांति से आल्हादित भारतीय साम्प्रदायिक दुमछल्लों ने बार-बार यह ऐलान किया है कि कम्युनिज्म खत्म हो गया है ,समाजवाद का अब कोई भविष्य नहीं ! जो नेता ऐंसा समझते रहे कि अमेरिकाके अलावा उनका कोई माई बाप नहीं ! सत्ता में आकर उन्ही  कृतघ्न नेताओं ने भारत को फिलहाल मित्रविहीन बना दिया है। ये मंदबुद्धि लोग नहीं जानते कि सिर्फ अपने आपको 'देशभक्त' और 'हिंदुत्ववादी' कहने मात्र से देश सुरक्षित नहीं हो जाता ! क्या मोदी सरकार को  जानकारी नहीं कि सोवियत संघ ने  १९७१ के बांग्ला  मुक्ति संग्राम में भारत का भरपूर साथ दिया था ?  तब सोवियत संघ ने महज एक महीने में ही पांच बार भारत के पक्ष में 'वीटो' लगाया था। और यही वजह रही कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर गए थे ! सोवियत संघ पहला देश था जिसने 'बांग्लादेश' को मान्यता दी थी। सभ्यताओं के इतिहास में भारत की यह पहली शानदार विजय थ

श्रीराम तिवारी !

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

रूस फिर 'सोवियत संघ'जैसा ताकतवर हो गया है।

बीसवीं शताब्दी में टक्कर बराबर की थी।अमेरिका ने अंतरिक्ष में कुत्ता भेजा तो  'सोवियत संघ' ने अंतरिक्ष में इंसान ही भेज दिया। प्रतिस्पर्धा में अमेरिका ने चन्द्रमा पर  अपने बन्दे उतार दिए। रूस ने भी फौरन डबल भेज दिए। अमेरिका ने यदि किसी रोज सुबह परमाणु परीक्षण किया तो दोपहर तक 'सोवियत संघ' के साईवेरिया में भी धरती हिलने लगती।अमेरिका ने पाकिस्तान के पास अरब सागर में अपनी फ़ौजी अभ्यास किया तो 'सोवियत संघ' [अब रूस] ने भारत ,दक्षिण अफ्रीका और दुनिया के तमाम पूर्ववर्ती गुलाम राष्ट्रों को अपना समर्थन दे दिया। यदि अमेरिका ने 'नाटो' बनाया तो सोवियत संघ ने 'वार्सा सन्धि'करके लेफ्टिट्स और गरीब देशों को अपने खेमें में शामिल कर लिया।लेकिन बीसवीं सदीके चौथे चरण में अमेरिका ने भूमंडलीकरण,बाजारबाद और उदारवाद का हौआ खड़ा करके 'सोवियत संघ' की साम्यवादी व्यवस्थाको ध्वस्त कर दिया ।सोवियत संघके कई टुकड़े हो गए , बड़ा हिसा 'रूस' बनकर रह गया। किन्तु  इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में रूस फिर से अमेरिका पर हावी है। विगत शताब्दी के शीत युद्ध और उसके बाद 'सोवियत संघ' के  पराभव को सभी जानते हैं ,किन्तु यह कल्पना किसी ने नहीं की थी कि लुट-पिट कर भी रूस फिर से संसार का महाबली बन जाएगा। कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता कि एक दिन ऐंसा आएगा जब अमेरिका के राष्ट्र्पति चुनावों में हारजीत के लिए रूसको जिम्मेदार ठहराया जाएगा !

डोनाल्ड ट्रम्पकी जीत और हिलेरी क्लिंटन की हारसे अमेरिका सदमें में है। चुनाव प्रक्रिया पर अंगुली उठ रहीहै। ट्रम्प के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। ट्रम्प महोदय ने जिसे विदेश मंत्री बनाया है वह रूस के राष्ट्रपति पुतिन का व्यवसायिक रणनीतिक साझीदार है। लगता है कि रूस फिरसे 'सोवियत संघ'जैसा ताकतवर हो गया है।रूस ने यदि आर्थिक असमानता वाली व्यवस्था को बढ़ावा न दिया होता और उसने 'वारसा सन्धि' को भंग न किया होता तो वह 'सोवियतसंघ' से भी बेहतर होता।    

 निवृतमान अमेरिकी प्रेजिडेंट बराक हुसेन ओबामा ने रूस पर आरोप लगाया है कि उनकी डैमोक्रेटिक प्रत्याशी श्रीमती हिलेरी क्लिन्टन की हार के लिए 'रूस' जिम्मेदार है। मिस्टर ओबामा ने सीआईए को जांचके आदेश देकर अपने पदमुक्त होने[जनवरी-२०१६] से पहले रिपोर्ट प्रस्तुत किये जाने की उम्मीद की है। अमेरिका में इस बार के राष्ट्रपति चुनाव मजाक बनकर रह गएहैं। अमेरिका और उसके पिछलग्गुओं को बड़ा गुमानथा कि सच्चा लोकतंत्र तो केवल अमेरिका में ही है। अमेरिका को विश्व शक्ति होने का,मानव अधिकार की पैरवी का,पैंटागन की शक्ति का और नाटो के नापाक गठजोड़ का बड़ा अभिमान था । किन्तु हिलेरी की हार और ट्रम्प की जीत ने अमेरिका को दुनिया के सामने लगभग वेपर्दा कर दिया है। कम्युनिस्ट विरोधियों और रूस विरोधियों को यह जानकर दुःख होगा कि अमेरिका ने ही इस सबके पीछे रूस का हाथ बताया है। याने अमेरिकाके सापेक्ष रूस फिरसे ताकतवर हो चुका है !

बीसवीं शताब्दी में शीत युद्ध के दौरान और सत्तर के दशक तक रूस और अमेरिका लगभग बराबर की टक्कर के दो शक्तिशाली विपरीत ध्रुव राष्ट्र हुआ करते थे। किन्तु अमेरिकन साम्राज्यवादी विकृत पूँजीवाद और उसकी बदनाम संस्था  सीआईए ने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में ,पोलित ब्यूरो में और क्रेमलिन में भी अपने एजेंट घुसेड़ दिए दिए। सोवियत नेताओं की जड़ता और कम्युनिस्ट पार्टी की गफलत से गोर्बाचेव-येल्तसिन जैसे अमेरिकी एजेंट सत्ता में आ गए। उन्होंने अमेरिका के इशारे पर सोवियत संघ के दर्जनों टुकड़े आकर डाले ! रूस ,यूक्रेन,लाटिविया ,उज्वेगिस्तान,तुर्कमेनिस्तान,कजाकिस्तान ,आर्मेनिया ,जार्जिया और न जाने कौन-कौन से राष्ट्र पैदा कर 'सोवियत संघ'को जमींदोज कर दिया गया ?

रूस-अमेरिकी रिश्तों के इतिहास का पहिया पूरा राउंड ले चुका है। जिस रूस को दुनिया में आधुनिक तकनीकी में पिछड़ा और फिसड्डी बताया गयाथा,उसी रूसके युवा हैकर्स पर आरोप है कि उन्होंने हारते हुए ट्रम्पको जिता दिया और जीत रही हिलेरी क्लिंटन को हरवा दिया ! यह आरोप खुद हिलेरी क्लिंटन और प्रेजिडेंटओबामा ने ही लगाया है.बाकायदा सरकारी जांच चल रही है। विजयी डोनाल्ड ट्रम्प ने इस जाँच की घोषणा को बकवास बताया है। अमेरिका की जनता भी बुरी तरह दो हिस्सों में बट चुकी है ,यह हालत देखकर उन लोगों की गलतफहमी दूर हो जाना चाहिए जो सोवियतसंघ को और सोवियत समाजवादी व्यवस्था को ,अमेरिका से कमजोर और तकनीकी रूप से पिछड़ा  मान बैठे थे ! जिन्हें जानकारी न हो वे नोट कर लें कि सोवियत संघ विघटनके उपरान्त रूसी संघ में सिर्फ इतना फर्क आया है कि एक मजबूत 'सोवियत संघ' की जगह अब वहां एक दर्जन देशों का फेडरेशन है !सबके अपने-अपने अलग झंडे हैं और 'समाजवादी सोवियत व्यवस्था'कमोवेश सभी देशों में अभीभी यथावत है।

सोवियत संघ के पराभव और पूँजीवादी प्रतिक्रांति से आल्हादित भारतीय साम्प्रदायिक दुमछल्लों ने बार-बार ऐलान किया है कि कम्युनिज्म खत्म हो गया है ,समाजवाद का कोई भविष्य नहीं ,अमेरिका के अलावा उनका कोई माई बाप नहीं ! ये कृतघ्न लोग अपने आपको देशभक्त कहते हैं जबकि इन मूर्खों को यह नहीं मालूम की सोवियतसंघ ने ही १९७१ के बांग्ला मुक्ति संग्राममें भारतका भरपूर साथ दियाथा। सोवियत संघने एक महीने में पांच बार भारत के पक्ष में 'वीटो' लगाया था। और जिससे पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए थे ! इतिहास में भारत की यह पहली विजय थी ! श्रीराम तिवारी !

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

ये तो सरकार के मुँह पर तमाचा है।

 शख़्सियत  हो  तो  ऐंसी ,'देशभक्त' राज  ठाकरे जैसी।

 आये दिन करता रहता है लोकतंत्र की 'ऐंसी की तैसी'।।

 कारण जौहर हों या  फ़िल्मी 'बादशाह'  शाहरुख़  खान।

 'दवंगों' को हफ्ता' दे रहे हैं अच्छे दिनों में भी ये नादान।।

  राज ठाकरे जैसे लोगो को लोकतंत्र कभी नहीं सुहाता है।

  इसीलिये आये दिन सरेआम सरकार का मजाक उड़ाता है।।

  उसने कानून, संविधान, सरकार के मुँह पर जड़ा तमाचा है।

  विश्वका सबसे बड़ा लोकतंत्र शायद अब बन चुका तमाशा है।

 

सोमवार, 12 दिसंबर 2016


श्री राजनाथसिंह ने ट्वीट किया  ''यदि पाकिस्तान अपनी  हरकतों [साम्प्रदायिक कट्टरवाद]से बाज नहीं आया तो उसके दस टुकड़े हो जायँगे ''! उनके इस ट्वीट के जबाब में राहुल गाँधी ने ट्वीट किया ''राजनाथ जी आप और आपके बॉस भी पाकिस्तान की इस हरकत से कुछ सीखें ''! मुझे दोनों ट्वीट अपनी-अपनी जगह सही लग रहे हैं।   किन्तु सत्तादल वालों को यदि राहुल के ट्वीट में कुछ खोट नजर आ रहा है तो इसका मतलब साफ़ है कि राहुल का तीर सही निशाने पर लगा है। बड़ी विचित्र बिडम्बना है कि कांग्रेस के लोग अपने उपाध्यक्ष  के साफ़ सुथरे ट्वीट के समर्थन में अपना मुँह खोलने से बच रहे हैं ! वास्तविकता यह है कि राहुल ने सौ फीसदी सच कहा है !यदि और जाहिर है कि ''सच कहना यदि बगावत है तो निसन्देह राहुल गाँधी बागी है ''!इतिहास गवाह है कि ऐंसे बागी ही हरदौर के असली नायक हुआ करते हैं।

रविवार, 11 दिसंबर 2016

विमुद्रीकरण बनाम नोटबंदी से पूर्व ,मध्यम वर्ग के लोग आम तौर पर एटीएम कार्ड /डेविड कार्ड को अपने पर्स में रखकर कहीं भी चल देते थे। अपनी जेब में 'नकदी' केवल जरूरत के अनुसार  ही रखते थे। लेकिन ८-९ नवम्बर-२०१६ के बाद लगभग पूरा देश एक  विशेष 'सिंड्रोम' या फोबियासे पीड़ित हो रहा है।जिनके घर में पैसे रखे हैं ,वे  भी लाइन में खड़े हैं। जो उम्रदराज लोग कल तक अपने आपको युवा ही समझते थे वे हर जगह अपना सीनियर सिटीजन वाला 'विशेषधिकार' दिखा रहे हैं। सत्ता समर्थकों का ये आलम है कि मुँह पर तो मोदी-मोदी रटते रहते हैं ,किन्तु  मन में छल-कपट रखते हैं ,और घर में कालाधन  छिपाकर रखते हैं। अपने पापों को छिपाने के लिए वे 'विपक्ष' को पाप का घड़ा बताते हैं और सत्ताधारी पार्टी तो उनकी जुबान पर दूध की धुली है ही !

किसी भी पार्टी की सरकार हो ,उसकी गलत नीतियों या कार्यक्रमों की असफलता पर विपक्ष द्वारा आलोचना सहज और स्वाभाविक है। आम आदमी यदि सरकार से नाराज है तो वह भी आलोचना तो करेगा ही ,इसमें कोई बड़ी बात नहीं ! किन्तु जो लोग सरकार की नीति और कार्यक्रम की बदौलत तकलीफ उठा रहे हैं और फिर भी सरकार के समर्थन में डटे हैं ,वे धन्य हैं !इनमें सभी चारण -भाट नहीं होते ,कुछ बाकई बड़े दिल वाले याने जिगर वाले होते हैं। ये चापलूस लोग सनातन से अनीति और मूर्खता के पक्षधर होते हैं और कर्ण की तरह कतार में खड़े रहकर भी अपने असफल नेतत्व याने दुर्योधन'की जय-जयकार करते रहते हैं।  

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

मोदीजी -आक्रांत जनता की आवाज सुनों !

 भारत में विमुद्रीकरण से जनता भले ही परेशान हो रही है ,किन्तु यह भी सच है कि पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था पर भी इसका खास असर पड़ा है। पाकिस्तान में छिपे आईएसआई प्रेरित आतंकी ,तमाम तश्कर ,स्मगलर और हवाला कारोबारी ,न केवल कश्मीरी अलगाववादियों के मार्फ़त बल्कि मुबई,कोलकाता ,यूएई ,दुबई, नेपाल, और बांग्लादेश के रास्ते भी भारत में छिपे अपने गुर्गों के मार्फ़त यहाँ नकली मुद्रा खपाते रहे हैं। भारत में विमुद्रीकरण के कारण पाकिस्तान में दाऊद जैसे आपराधियों का भट्टा बैठ गया। कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हुई ,छात्र-छात्राओं ने परीक्षाएं दीं ,कश्मीर की वादियों में कुछ अमन के फूल खिलने की उम्मीद जगी ,किन्तु महज एक महीने में ही सब उल्टा-पुलटा हो गया। भारत सरकार की आत्ममुग्धता और कश्मीर में पुलिस प्रशासन की लापरवाही से अब कश्मीर फिर सुलग उठा है।  भारत की देशभक्त जनता लाइन में खडी -खड़ी अच्छे दिनों का इन्तजार कर रही है और उधर कश्मीर में आतंकियों के पास आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के हस्ताक्षरित नए और असली कड़क नोट पहुँच चुके हैं।उम्मीद है कि मोदी सरकार को  इसकी खबर अवश्य होगी !

विगत सप्ताह में अनाम आतंकियों द्वारा  कश्मीरी बैंकों से लाखों 'नए नोट' लूट लिए गए हैं ! मोदीभक्त रेवड़ और सरकार समर्थक मीडिया एवम सत्ताधारी नेता इस विषय पर मौन क्यों हैं ?  जग जाहिर है कि श्रीनगर सहित कई इलाकों में लगातार  पूर्ववत पत्थरबाजी जारीहै। चूँकि भाजपा और पीडीपी सरकारने आतंकियों से डरकर दर्जनों पुलिस स्टेशन पहले ही बन्द कर दिए थे। इसलिए विमुद्रीकरण के उपरान्त जब कश्मीर के बैंकों में कुछ नए नोट  भेजे गए तो वह रुपया आमजनता को मिल पाए इससे पहले ही आतंकियों ने लूट लिया। हालाँकि नोटबंदी के बाद एक महीना  तक पत्थरबाजी -ऊधमबाजी बन्द रही ,किन्तु ज्यों ही आतंकियों को बैंकों में नए नोट आने की खबर लगी त्यों ही उन्होंने अधिकांस नयी करेन्सी लूट ली। अब केंद्र की मोदी सरकार और कश्मीर की राज्य सरकार जब तक कोई एक्सन ले तब तक आतंकी कोई बड़ी घटना को अंजाम देदें तो कोई अचरज नहीं !

इसी तरह छ.ग. झारखण्ड ,एमपी और बिहार के नक्सलवादियों ने भी नए नोट आसानी से हासिल कर लिए हैं ! जबकि आम आदमी  शांतिपूर्वक ५० दिनों बाद 'अच्छे दिनों' का  इन्तजार कर रहा है। यदि प्रभात पटनायक, अमर्त्यसेन और अन्य दिग्गज अर्थशात्री इस विमुद्रीकरण की खामियों को रेखांकित कर रहे हैं तो उनकी बात सुनने के बजाय  मोदीजी और उनके मंत्री विपक्ष पर अनावश्यक हल्ला बोले जा रहे हैं। सुचारू ढंग से संसद नहीं चल पानेका ठीकरा विपक्ष के सर फोड़ा जा रहा है। सरकार और उसके अंध समर्थक लाख उम्मीद बांधते रहें या 'कैशलेश' सिस्टम का शगूफा छोड़ते रहें किन्तु फिलहाल तो नोटबंदी या विमुद्रीकरण का नतीजा नितांत ठनठन गोपाल ही है !

कश्मीरी पत्थरबाजों , पाकपरस्त आतंकियों और नक्सलियों के पास बैंक लूट के अलावा चोरी छुपे 'ब्लेकमेलिंग' से  धन की आबक जारी है। भारतीय मीडिया इस ओर नजर क्यों नहीं डालता ?क्या भारत का पूँजीवादी मीडिया बाकायदा 'काम' पर लग गया है ? बेकार कश्मीरी युवा वर्ग और आईएसआई के खूँखार पाकिस्तानी 'लोंढे' धनके प्रलोभन में फिर से आग मूतने लगे हैं । जिन्होंने पीएम की 'नोटबंदी' योजना से कालेधन पर नियंत्रण की आशा की थी ,जिन्होंने मोदीजी को सफलता की शुभकामनाएं दींथीं,जिन्होंने कालेधन के खिलाफ मोदीजीकी रण हुंकार पर उन्हें शाबाशी दी थी ,वे सभी नरनारी अब विमुद्रीकरण से निराश हैं। मैंने भी पहले-पहले कुछ ज्यादा ही उम्मीद की थी ,किन्तु अब पूर्णतः नाउम्मीद  हूँ ! क्योंकि कालाधन तो सरकार के खाते में धेला नहीं आया,बल्कि १३ लाख करोड़ पुराने नोट जो बैंकों में जमा हुए हैं और जिनकी गारंटी आरबीआई के पास सुरक्षित है ,वे सभी रूपये आज की तारिख  में झक सफ़ेद हैं ! इसकी एक पाई भी कालाधन में शुमार नहीं की जा सकती ।

 कहावत है कि 'चौबे जी छब्बे बनने चले थे लेकिन दुब्बे बनकर रह गए '' ! जब देश और दुनिया के तमाम उद्भट अर्थशात्री माथा धुन रहेहैं तब कोई 'अड़िया' या कोई 'रोहतगी'  इस नोटबंदी की फटीचिन्दी में पैबन्द लगा रहा है। नोटबंदी योजना से भारत के लाखों युवा वेरोजगार हो गए हैं ,करोड़ों युवाओं की नौकरी खतरे में है ,किसानों की महादुर्दशा के बारे में कामरेड सीताराम येचुरी राज्यसभा में पहले ही सब कुछ बता चुके हैं.गोकि एनडीए सरकार की यह दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक भी  राजनैतिक ड्रामा ही सावित हुई है।  बनासकांठा [गुजरात] की आम सभा में मोदीजी फरमा गए कि '' चूँकि मुझे संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है ,इसलिए देशमें आम सभाओं  के माध्यम से जनता के बीच बोल रहा हूँ ! '' राहुल गाँधी भी यही कह रहे हैं की उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जाता इसलिए वे मीडिया के मार्फ़त देश को संबोधित कर रहे हैं। अब देश की आवाम को तय करना है कि कौन किसे बोलने से रोक रहा है ?

यदि 'टाइम्स' पत्रिका ने पर्सन ऑफ़ द ईयर  मोदीजी को बना दिया होता तो उसका क्या घट जाता ! वेचारे मोदी भगत बड़ी उम्मीद लगाए बैठे थे! टाइम्स ने ट्रम्प को नम्बर वन बताकर भारत के साथ अन्याय किया है। टाइम्स यदि भारत में प्रकाशित होता तो  NDTV की तरह उसपर भी 'देशद्रोह' का आरोप लगना तय था। प्रतिबन्ध भी लग सकता था। खैर जो हो अभी तो मोदी सरकार को नोटबंदी ने और धराशायी होती अर्थव्यवस्था ने परेशांन कर रखा है। ऐंसे में टाइम्स ने बहुत बुरा किया है। अन्यथा उसका ही कुछ  सहारा हो जाता। 'दुविधा में दोउ गए, माया मिली न राम ! इधर देश के मेहनतकश लोग लाइन में लगे-लगे मर रहे हैं उधर कश्मीरी आतंकवाद ज्यों का त्यों लहलहाने  लगा है। अब तो एकमात्र रास्ता शेष है कि संसद में विपक्ष की बात सुनों ! मोदी जी आक्रांत जनता की आवाज सुनों !संसद की सलाह से ही देश चलाओ। लोकतंत्र में यकीन कीजिये !संसद छोड़कर देश भर की आम सभाओं में अपनी व्यक्तिगत शेखी बघारना बन्द कीजिये !न्यायपालिका और आरबीआई को स्वतन्त्र रूप से काम करने दीजिये ! आकाश कुसम तोड़ लानेका दावा मत कीजिये! व्यक्तिगत हेकड़ी दिखाना छोड़िये और गंभीरता  पूर्वक राष्ट्र का नेतत्व कीजिये !  श्रीराम तिवारी !








  भारत के राष्ट्रीय टीवी चेनल्स और अखवार अधिकांशतः ममता,माया ,मुलायम और मोदी  को ही फोकस करते रहते हैं ! यदि किसी आम आदमी से पूँछो कि 'माणिक सरकार' या 'पिनराई विजयन 'कहाँ के मुख्यमंत्री हैं तो वह बगलें झांकने लगता है ! खैर ये दोनों तो मार्क्सवादी मुख्यमंत्री हैं , इसलिए पूँजीवादी प्रेस और मीडिया की उपेक्षा स्वाभाविक है .किन्तु 'नोटबंदी' या अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर इनका पक्ष तो अवश्य सुना जाना चाहिए !कहीं ऐंसा तो नहीं किपूँजीवादी मीडिया सिर्फ उसी शख्स की बात को तबज्जो देता है जो 'महाबदनाम' होता है ?

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

अंधश्रद्धा / अंधआलोचना दोनों की लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए ।

 ''संतुष्टः सततं  योगी जितात्मा धृढ़ निश्चयः ''  [भगवद्गीता ]

अर्थ :- धृढ़ निश्चयी ,आत्मजित और सदा अपने आप में सन्तुष्ट रहने वाला मनुष्य योगी कहलाता है।

भगवद गीता के उक्त सिद्धांत के सापेक्ष आधुनिक प्रगतिशील अद्द्तन सिद्धांत कुछ इस प्रकार है  :-

  ''असन्तुष्ट: सततं रोगी पत्रकार, सत्ता पक्ष बनाम विपक्षी नेता और कवि : '' 

आधुनिक सदा नाखुश रहनेवाला,छिद्रान्वेषी,दूसरों के सद्गुणों की अनदेखी करने वाला और दूसरों की सदा निंदा करनेवाला व्यक्ति ही सफल  नेता बन सकता है। यदि हो जाता है। ऐंसा व्यक्ति  पत्रकार ,नेता अथवा साहित्यकार या कवि हो सकता है ।

कोई लेखक,कवि ,पत्रकार अथवा विचारक जब 'विचार केंद्रित' पक्ष प्रस्तुत करने के बजाय केवल 'व्यक्ति केंद्रित' लफ्फाजी का हौआ खड़ा करता है,तब उसके द्वारा दिशाहीन आलोचना का क्रूर कृत्य यथार्थ की पत्तल पर रायता ढोलने लगता है ! समष्टिहित  विचार की जगह उस 'व्यक्ति केंद्रित' वाचालता में रमण करनेवाला कोई भी शख्स केवल  मानसिक रोगी ही हो सकता है। जिस तरह व्यक्तिनिष्ठा अथवा अंधश्रद्धा निंदनीय और अधम है उसी तरह किसी व्यक्ति की अंध आलोचना या सतत निंदाकी भी कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। समाज का प्रगतिशील वर्ग या रेसशनालिस्ट तबका धर्म-मजहब की जिन वर्जनाओं को अवैज्ञानिक मानता है यदि वह उन्हें डस्टबिन में फेंक भी दे ,तब भी वह उस लोकमत और भाववादी चिंतनधारा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता ,जिसे सूफी सन्तोंने  'अवैदिक' दार्शनिकों ने स्वयं परवान चढ़ाया है । गौतम,महावीर,नानक और स्वयम योग गुरु पतंजलि ने प्राणी -मात्र की ' निंदा' को आत्मघाती माना है। उन महापुरुषों के समक्ष नत मस्तक होना ही होगा ,जिन्होंने अपने काव्य में निंदा अथवा आलोचना की जगह तितिक्षा अर्थात सहनशीलता और करुणा का  महिमामंडन किया है ।
 
 किसी धर्म -मजहब के स्वघोषित अंध समर्थक ,प्रचारक अथवा मतावलम्बी द्वारा किसी व्यक्ति,विचार या राष्ट्रकी इकतरफा निंदा-आलोचना न केवल 'अधर्म' या  पापकर्म है बल्कि अनैतिक भी है। क्योंकि हरेक धर्म-मजहब के मूल सिद्धांतका आधारही 'क्षमा' है। तदनुसार परनिंदा या आलोचना ईश्वरीय विधान के खिलाफ है। लेकिन किसी  मार्क्सवादी - समाजवादी नास्तिक चिंतक द्वारा जब किसी शोषणकर्ता व्यक्ति,समाज या राष्ट्रकी निर्मम आलोचना की जाती है तब वह क्रांतिकारी कर्तव्य कहलाता है। वेशक भृष्ट शासकों और लम्पट राजनीतिज्ञों की आलोचना या निंदा जायज है किन्तु उस आलोचना में तार्किकता और  वैज्ञानिकता होना अत्यंत आवश्यक है।

आधुनिक डिजिटल एवम फेसबुक जैसे तमाम  सूचना संपर्क माध्यमों पर एकतरफा आलोचना का बोलबाला है। किसीको किसीकी कोई अच्छाई नजर नहीं आ रही है।हालाँकि इस मंजर के लिए भाववादी साम्प्रदायिक तत्वों ने अपने माथे पर हलधर के सींग उगा रखे हैं। किन्तु जो लोग प्रगतिशील हैं ,धर्मनिरपेक्ष हैं ,वे भी केवल सत्ता पक्ष के एक नेता विशेष की ही सतत आलोचना किये जा रहे हैं निसंदेह यह क्रान्तिकारी चरित्र का प्रमाण नहीं है ! अपनी ओर से कोई  विज्ञान सम्मत वैचारिक रीति-नीति पेश करने के बजाय ,समाज और राष्ट्रके समक्ष मौजूद चुनौतियों के लिए  प्रगतिशील विकल्प प्रस्तुत करने के बजाय ,जो लोग किसी खास 'व्यक्ति' या संगठनको  खलनायक सिद्ध  करने में जुटे हैं, वे सिर्फ आलोचक कहे जा सकते हैं क्रांतिकारी कदापि नहीं हैं !

सत्तापक्ष के और नेता विशेष के अंधसमर्थक अज्ञानी हैं। ये कूपमण्डूक ,अधकचरे लोग - लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता और संविधान से ऊपर अपने किसी नेता विशेष या 'व्यक्तिविशेष' को सर्वोसर्वा मानकर उसके पीछे भेड़चाल से चलते रहते  हैं।  ये 'राष्ट्रवाद'का दम्भ भरने वाले , व्यक्ति पूजा का जाप करने वाले लोग  सामंती दौर के गए-गुजरे अवशेष मात्र हैं ! जो लोग आजादी के 70 साल बाद भी मानसिक रूप से गुलाम हैं ,वे कभो -जेपी-जेपी,कभी अण्णा -अण्णा ,कभी मोदी-मोदी चिल्लाते रहते हैं।

किसी भी धर्म -मजहब के स्वघोषित प्रचारक अथवा धर्मभीरु मतावलम्बी के लिए 'परनिंदा' वर्जित है और धर्म सिद्धांतानुसार वह किसी दूसरे के धर्म-पन्थ -मजहब की या अनीश्वरवादी विचार की निंदा -आलोचना नहीं कर सकता ! क्योंकि यदि वह ऐंसा करता है तो कदाचरण का दोषी माना जाएगा। और वह साधु पथ से पथभृष्ट हो जाएगा। अर्थात आस्तिक विधान से पदच्युत हो जाएगा ! चूँकि अधिकांस धर्म-मजहब के अनुसार 'परनिंदा'अधर्म है !और लोक-परलोक वालों के ये यह अपवित्र कर्म उसके परिणाम में दुखदायी माना गया है। तार्किक आलोचना बनाम भाववादी निंदा के विमर्श पर न्यायिक नजरिये से विश्लेषण जरुरी है ,

सोमवार, 5 दिसंबर 2016


अभी तो अगहन के दस दिन शेष हैं और ''पूस'' के पाँव पालने में ही नजर आने लगे हैं ! अमीरों को ठंड मुबारक ! लेकिन गरीब ,मजलूम,अनिकेतजन और असहाय बीमार बुजुर्ग सावधान रहें ,क्योंकि ''ठंड देवी' उनपर रहम नहीं करने वाली ! वे भगवान् के भरोसे  न रहें क्योंकि भगवान् -ईश्वर -गॉड -अल्लाह हमेशा शक्तिशाली का ही पक्षधर  होता है। निर्धन इंसान या कोई अन्य देहधारी जीव और ठंड के बीच होने वाली जंग में ईश्वर केवल जानलेवा ठण्ड का ही साथ देगा ! गोस्वामी तुलसीदास जी  इशारा कर गए हैं -समरथ  को नहीं दोष गुसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं।। पश्चिम का दर्शन भी यही कहता है -''ईश्वर उन्ही की मदद करता है जो खुद की मदद करते हैं ''!


सुषमा स्वराज ,सोनिया गाँधी और जयललिता  बीमार हैं! माया,ममता को 'नोटबंदी'ने घायल कर रखा है !नजमा -हेपतुल्लाह ,आनंदीबेन और दलबदलू रीता बहुगुणा को आशाओं की प्रतीक्षा सूचीमें डाल दिया गया है !जब देश की लोकतान्त्रिक राजनीति में 'नारियों'की ये हालात है तो समग्र नारी मात्र की किया स्थिति होगी ?तमाम प्रतिबध्द नारीवादी लेखक-लेखिकाएं इस मंजर पर कोई तजबीज पेश करेंगे  या किसी रुदाली का इन्तजार ?

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

क्या मोदी जी 'संघ' का एजेंडा छोड़ चुके हैं?

भारतीय जनतंत्रात्मक राजनीति के सर्वाधिक असरदार ' फेक्टर' कौन-कौनसे हैं ? इस सवाल का जबाब यदि ईमानदारी और विवेक से दिया जाए,तो भारत की अधिकांस मौजूदा चुनौतियाँ आसानी से निपटाईं जा सकतीं हैं। वैसे भारत की जनतंत्रात्मक राजनीति का सबसे प्रमुख असरदार 'फेक्टर' तो आम चुनाव ही है। किन्तु चुनाव को   प्रभावित करने वाले 'फेक्टर' परोक्ष रूप से देश की राजनीति और समग्र सिस्टम पर अपना व्यापक असर रखते हैं।जातीयता,साम्प्रदायिकता ,सामाजिक-भेदभाव,अशिक्षा,अद्दतन व्यवसाय,सरमायेदारी ,उपजाऊ जमीनों पर कुछ खास घरानों का एकाधिकार एवम जल-जंगल जमीन पर उनका आधिपत्य ये भारतीय राजनीति के प्रदूषक तत्व हैं। पूँजीवादी -अर्धसामंती निरंकुश सत्ता के साथ धर्म-मजहब की गलबहिंयाँ और समानान्तर मुद्रा याने अवैध धन याने कालाधन तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलने वाले खतरनाक फेक्टर हैं। यदि पीएम मोदी लोकतंत्र के इन खतरनाक कारकों पर ईमानदारी से हमला करते हैं,तो उन्हें 'संघ' की विचारधारा को तिलांजलि देनी होगी। क्योंकि 'संघ' के एजेंडे में लोकतंत्र ,धर्मनिरेपेक्षता और समाजवाद के लिए कोई सम्मान ही नहीं है। कम से कम 'बंच आफ थाट्स' में तो लोकतंत्र,समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक शब्द त्याज्य ही हैं।

जबसे नरेंद्र मोदीजी के नेतत्व में एनडीए सरकार सत्ता में आई है,तभी से वे अपने पूर्व घोषित 'संघी'' एजेंडे से पृथक जनता के बीच एक नया एजेंडा लेकर आगे बढ़ रह हैं।यह एजेंडा -स्टार्टअप इण्डिया,डिजिटल इण्डिया , स्वच्छ भारत ,समृद्ध भारत और अंतर्राष्टीय मंच पर सशक्त भारत बनाने का पुरजोर दावा करता है। हरेक चुनाव में, हरेक क्षेत्र विशेष की जनता के लिए ,वहाँ की स्थानीय समस्याओं पर मोदीजी कांग्रेसीसरकारों के कुराज का व्यंगात्मक लहजे में ध्यानाकर्षण करते रहते हैं। लेकिन उनकी जुबान पर 'संघ' का अजेंडा  नहीं है। अब कोई शक नहीं रह गया कि मोदी समर्थक या संघ समर्थक भले ही अपने सड़े -गले पुराने एजेंडे से चिपके रहें ,किंन्तु  मोदीजी 'संघ' का एजेंडा बाकई छोड़ चुके हैं। बिहार चुनावों में मोदी जी नहीं हारे थे बल्कि 'संघ' हारा था। यदि ईमानदारी से उस चुनाव का विश्लेषण किया जाए तो बिहार में लोकतंत्र हारा था, जातिवाद और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की जीत हुई थी।यदि संघवालों ने मोदीजी की राह में बिहार की तरह ही  यूपी में भी काँटे बिछाए तो आगरा,मथुरा ,मुरादाबाद जैसी कितनी ही परिवर्तन रैलियां सफल हो जाएँ किन्तु  जातिवाद और साम्प्रदायिक गठजोड़ को हराना नामुमकिन है। मोदी जी भी न भूलें कि पूरा भारत बनारस नहीं है।


यह सभी को याद होगा कि मोदी जी ने जब बिहार चुनावों में विजय की ओर बढ़ रहे थे तभी मंझधार में श्री मोहन राव जी भागवत ने 'संघ' का एजेंडा पेश क्र दिया था। जबकि मोदी जी संघ के उलट स्टेण्ड ले रहे थे । में कहीं भी साम्प्रदायिता नहीं है ,कहीं भी जातीयता नहीं है ,कहीं भी कूपमण्डूकता नहीं है,किन्तु उनकी कथनी में लोकतंत्रात्मता और वास्तविकता का अभाव है।


 यह सर्विदित है कि विगत पखवाड़े  गोवा में मोदीजी भाषण देते -देते रो दिए थे। उन्होंने लगभग रोते-रोते ही देश की आवाम से कहा था ''जिन्होंने ७० साल केवल कालाधन कमाया  है ,वे मेरे खिलाफ चिल्ला रहे हैं ,जिन्होंने देश को ७० साल लाइन में लगाए रखा वे अब नोटबंदी के लिए लाइन में लगने पर इतराज उठा रहे हैं। आप मुझे सिर्फ ५० दिन का वक्त दीजिये मैं देशको भृष्टाचार मुक्त करूँगा, अच्छे-दिनों की सौगात दूंगा !'' मोदीजी से यह सवाल किया जाना चाहिए कि आपने भावुक शब्दों की खूब झड़ी लगाई , किन्तु उन दिवंगतों की रंचमात्र चर्चा नहीं की जो लाइन  में लगे-लगे मर गए या अस्पताल में 'नोटों' के अभाव में भगवान् को अथवा अल्लाह को प्यारे हो गए !

यूपी के मथुरा,आगरा और मुरादाबाद में भाजपा की 'परिवर्तन रैली' में मोदीजी का मजमा रंग ला रहा है। उनके अगम्भीर और नुक्कड़ किस्म के भाषणों पर उपश्थित जनसमूह को गदगद होते देख लगता है की यूपी में 'मोदी लहर' है। ठीक इसी  तरह की 'मोदी लहर ' बिहार विधान सभा चुनावों में भी थी,किन्तु ठिठोलीबाज  नेताओं को   बिहार की जनता ने 'ठेंगा' दिखा दिया। मोदी जी यूपी के चुनावों में भी देश की समस्याओं पर बात न करके केवल 'कैशलेश' स्कीम या मोबाइल तकनीक से पेमेंट के तरीके बता रहे हैं। देश की समस्या केवल भुगतान संकट तक सीमित नहीं है। महँगाई,बेरोजगारी ,शिक्षा और स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र की लूट ,बड़े जमींदारों की सामन्ती लूट और बैंक से पैसा खा गए धनवानों पर मोदी जी चुप क्यों हैं ? केवल कालाधन राग आलापने से यूपी में जीतना सम्भव नहीं। मोदीजी को मालूम हो कि मायावती,मुलायम,ममता,जयललिता, लालू ,ओवेसी ,चन्द्रशेखरराव ये लोकतंत्र - वादी नेता नहीं हैं, बल्कि ये जातिवादी -साम्प्रदायिक गैंगस्टरों' के नाम हैं।

मोदी जी को मालूम हो कि आपके अभिन्न मित्र और प्रथम पंक्ति के धनाड्य स्वामी बाबा रामदेव ने अभी-अभी कोलकता में 'ममता मंत्रजाप' किया है। रामदेव उवाच - ''जब एक चाय बेचने वाला भारत का प्रधान मंत्री बन सकता है तो ममता बेनर्जी क्यों नहीं ?'' और कालेधन के सवाल पर उनकी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह है ''ममता जी सिम्पल साड़ी और चप्पलें पहनतीं हैं ,उनके पास कालाधन कहाँ ?अब ममता प्रधानमंत्री बने या न बने बंगाल में स्वामी रामदेव के 'पतंजलि साम्राज्य'' का व्यापारिक विस्तार निर्बाधरूप से अवश्यम्भावी है !

स्वामी रामदेव अब तक केवल  मोदीजी की ईमानदारी पर ही बलिहारी थे। किन्तु रामदेव अब वे ममता बेनर्जी की सादगी पर 'फ़िदा' हो रहे हैं। सवाल उठता है कि  मोदी जी के वित्तपोषक अम्बानी-अडानी,शाह बगैरह तो फिर भी देश को टैक्स देते हैं ,किन्तु ममता के कालेधन वाले समर्थक-स्मगलर  तो टेक्स देने के बजाय देश की सेना को गालियां दे रहे हैं ! 'संघी भाई' और  स्वाभिमान भारत वाले  इस 'देशद्रोह' पर मौन क्यों हैं ?