शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

घूसखोर पंडत

यह जग जाहिर है कि भारत दुनियाका  सबसे बड़ा लोकतंत्र है।जितनी राजनैतिक पार्टियां भारत में हैं,जितनी राजनैतिक विचारधाराएं भारत में हैं,जितने वोटर भारत में हैं और जितना धन भारतीय चुनावों में किया जाता है,उतना दुनियां के किसी अन्य राष्ट्र में नहीं। लेकिन  भारतीय राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की ये विशेषताएं संभवतः उतनी मह्त्वपूर्ण नहीं जितनी की 'जातीयता'! दरसल  भारतीय  राजनीति का  सारतत्व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था नहीं,अपितु  दुर्भाग्य से यहां चुनावों में प्रयुक्त होता जातीयतावाद ही सर्वाधिक  असरकारक है। 

आजादी से पहले ही ब्रिटिश सरकार के मैकाले जैसे इंटेलेक्चुअल्स  सलाहकारों ने गुलाम भारत में जातीयता के विभाजनकारी बीज बो दिये  थे। आजादी के दस पंद्रह साल पहले ही अंग्रेजों ने हिन्दू- मुस्लिम सवर्ण-अवर्ण और एस सी/एसटी के भेद आधारित सामाजिक सुधारों के बहाने गुलाम भारत में सामाजिक एवं जातीय  अलगाव के बीज वो दिये  थे। इस विभाजनकारी नीति को अप्लाय करने का एकमात्र उद्देष्यथा -भारत में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन को कुचलना। जाहिर है की संविधान सभा के अधिकांश सदस्य इंग्लैण्ड में पढ़ें लिखे बैरिस्टर ही थे,इन तमाम भारतीय बुद्धिजीवियों पर जातीयता का पुरजोर असर होना स्वाभाविक था ।संविधान सभा के अध्यक्ष  बाबू राजेंद्रप्रसाद, सदसयगण - राजऋषि पुरषोत्तमदास टंडन,पंडित मदनमोहन मालवीय,पंडित गोविन्दवल्ल्भ पंत,के एम मुंशी ,  और सीनियर ड्राफटि श्री वी एन राव साहब के विरोध के बावजूद, संविधान सभा के अधिकांश सदस्य अंग्रेजों के प्रभाव के पक्षधर रहे.भारतीय संविधान सभा के प्रमुख संपादक डॉ बी आर आंबेडकर ने अंग्रजों के लिखे संविधान में कुछ मामूली फेरबदल करके जातीय  आधारित संविधान सम्पादित कर,भारत में जातीय लोकतंत्र की नीव रखी।

आजादी के बाद ७० बरस तक भारत में जातीय आधारित चुनाव होते रहे और उसी जातीय आधार पर रेवड़ियां बटतीं रहीं। आजादी के बाद जिन आरक्षित जातीय समूहों ने सत्ता पर कब्जा किया वे गुणात्मक रूप से सम्पन्न होते चले गए। धनवान उच्च वर्ग ने वक्त की नजाकत को समझ और देश के आरक्षित समूहों से सैटिंग करली। 

चंद  अभिजात्य वर्ग की सम्पन्नता को संविधन निर्माताओं ने  सम्पूर्ण सवर्ण समाज की सम्पन्नता  समझकर गरीब,बेरोजगार भूमिहीन  सवर्णों पर असहनीय अत्याचार किये। हालाँकि यह कटु सत्य है की जातीय आरक्षण के बावजूद, अधिकांश दलित/आदिवासी /,पिछड़े  अभी भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह बात जुदा है की आरक्षित वर्ग के कुछ घराने पीढ़ी दर  पीढ़ी आरक्षण का आनंद लेरहे हैं।   क्रमशः। .........  

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