रविवार, 7 अप्रैल 2013

Bharteey loktantr men Jateeytawad ka ghun....!

    दुनिया के समाज शाश्त्रियों  के लिए मध्ययुगीन -गैर इस्लामिक , गैर ईसाइयत  और    तथाकथित विशुद्ध   भारतीय उत्तर वैदिक कालीन  पृष्ठभूमि   वाले  भारत  के  सामाजिक -ताने-बाने को  ऐतिहासिक  और द्वंदात्मक  - वैज्ञानिक   क्रमिक विकाश के   समग्र रूप  में समझ  पाना अत्यंत  कठिन और जटिल  रहा है.   भारत के 'सनातन' हिन्दू  समाज - जिसे आजकल हिंदुत्व से भी इंगित किया जाता है -   की  इन आंतरिक  जटिलताओं और उसके 'जातीय 'विमर्श   के लिए  आधनिक वैज्ञानिक समझ-बूझ के  विचारक और चिन्तक भी  अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर तत्सम्बन्धी  सत्यान्वेषण  कर पाने में असमर्थ रहे हैं।     हिन्दू सम्प्रदाय  में वैज्ञानिक तथ्यात्मिकता की जगह अंध आस्था  की अँधेरी सुरंगों  को हमेशा  प्राथमिकता दी जाती रही है . विगत दिनों नागपुर में  इन्कम  टैक्स ट्रिब्यूनल ने अपने एक अद्वतीय और  ऐतिहासिक  फैसले से उस जातीय और साम्प्रदायिक विमर्श  को  हवा दे दी जो भारत के  'नव-नाजीवादियों' को न केवल एतिहासिक रूप से प्रासंगिक बनाता है अपितु  मानवीय विकाश के  'जनवादी मूल्यों' को  हासिये पर धकेलकर ;सामंती दौर के घोर  त्राशक  अवशेषों को पुनर्जीवित करने का उपक्रम  भी करता प्रतीत होता है.  हालांकि ट्रिब्यूनल ने मंदिरों-  और  तत्सम्बन्धी ट्रस्टों की सम्पत्ति विषयक  आयकर में छूट के मद्देनज़र जो विचार व्यक्त किये वे काबिले गौर हैं . उनके अपने निहतार्थ भी मौजूद हैं. 'हिंदुत्व' को  परिभाषित  करने  की सामर्थ रखने वाले ये भारतीय ब्यूरोक्रेट बाकई  तारीफ और इनाम के हकदार हैं .  किन्तु वे भूल जाते हैं की हिंदुत्व के अश्वमेघ का घोडा भारत के जातीयता रुपी 'साठ  हजार' सगर पुत्रों' ने बाँध रखा है .  जब -जब मंदिर की ,हिंदुत्व की ,हिदुस्तान की चर्चा होगी तब-तब 'जाति -विमर्श'  भी जन-विमर्श के केंद्र में होगा .
                        इस जातीयता रुपी विषबेली  के फलने -फूलने में    विदेशी  आक्रमणों की  लम्बी श्रंखला , देशी गृह युद्धों और  प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य   कई   कारकों  को  जिम्मेदार माना जा सकता है . इनमें  से   पांच  प्रमुख प्रतिगामी    तत्व  इस प्रकार   हैं -:
  [१] सामंत युग या मध्ययुग में जनता के उस वर्ग का इतिहास न लिखा जाना; जो इतिहास के निर्माण का प्रमुख घटक हुआ करता है, अर्थात श्रमिक-कारीगर, या मजदूर-किसान के बारे में  कवियों,साहित्यकारों और भाष्यकारों की  भारतीय परिद्रश्य में  कोई उल्लेखनीय रचना उपलब्ध नहीं, जो तत्कालीन  वास्तविक सामाजिक संरचना   के रूप में ऐंसे  किसी   'जन-साहित्य' को उजागर करती हो, जो तत्कालीन शोषण की व्यथा को  प्रमाणिकता के  साथ  वर्तमान पीढ़ी के  समक्ष प्रस्तुत कर सकने में सक्षम हो .
[२]राजाओं,महाराजों-रानियों,महारानियो   और बादशाहों के बारे में   बहुत सारा- अर्ध सत्य -   असत्य और कपोल-कल्पित  साहित्य रचा गया कि  उसमे  सच को  खोजने  के लिए ' भूसे के ढेर में सुई खोज ने ' जैसा हाल  हो  गया .  राजाओं को ईश्वरीय अवतार तक घोषित कर दिया गया .  मेहनत  कश - मजदूर किसान को न केवल लूटा गया अपितु उस वर्ग की  परेशानियों -कष्टों को दैवीय विधान और कार्य-कारण  के सिद्धांत पर  आधारित  इनके कर्मफल का परिणाम  घोषित कर शोषण की  सनातन  परम्परा  को  स्थिर   बनाए   रखा गया और साहित्य-कला-संगीत  को केवल 'ब्राह्मण-वैश्य- क्षत्रीय '  के लिए सुरक्षित रखा गया .  शेष  ८ ० % जनता-जनार्दन को चातुर्वर्ण्य व्यवस्था अंतर्गत 'शूद्र' नाम से सदियों तक पद-दलित किया गया .         
 [३]आम जनता को न केवल  तथाकथित  ' ईश्वरीय ज्ञान' - वेद -पुराण -उपनिषद और  सम्पूर्ण संस्कृत वांग्मय से दूर रखा  गया , बल्कि   सामाजिक न्याय, स्त्री विमर्श,आर्थिक असमानता को 'वेद -विहीन' घोषित  किया जाता रहा .   वैज्ञानिक अनुसंधान को 'गुप्त' ' '  वर्जित'  घोषित करते हुए तब तक एकाधिकार में  रखा  गया  जब तक कि  विदेशी  आक्रान्ताओं ने उसे ' शैतान की करामात' घोषित कर, उसे  नष्ट कर देने का आह्वान   नहीं कर दिया ,  या सार्वजनिक करने को बाध्य नहीं कर दिया गया  या जड़-मूल से नाश कर  देने की  घृणित कोशिशों को अंजाम नहीं दे दिया गया .                     
  [४].पाश्चात्य वैज्ञानिक और भौतिक  प्रगति के परिणाम स्वरूप दुनिया में सामाजिक बदलाव जितनी तेजी से हुआ उसका दशमांश भी भारत में परिलक्षित नहीं हुआ . जबकि पाश्चात्य  रेनेशा  के ही दौर में  भारत  के  विभिन्न   क्षेत्रों में  भी पुनर्जागरण   की लहरें उठने  लगीं  थीं। लोकतंत्र  ,समाजवाद  और  सामाजिक  समानता के  मूल्यों को भारत में  स्थापित   कराने के लिए हालांकि 'तत्कालीन सभ्रांत लोक' के ही महानुभावों ने अनथक प्रयत्न किये थे, कुर्वानियाँ  भी दीं थीं .  किन्तु भारतीय  यथास्थितिवादियों   ने  न केवल  उस  प्रगतिशील   लौ को बुझाने की भरपूर कोशिश  की अपितु राजा  राम मोहन राय जैसे  'समाज सुधारकों '  तो  सिर्फ इसलिए सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पढ़ा कि  उन्होंने 'विदेश यात्रा क्यों की'?
[५] विज्ञान , तकनीकी और सूचना सम्पर्क क्रान्ति  के आधुनिक युग में  भारत  की  पुरातन  जातीय व्यवस्था  अप्रसांगिक हो   जाने   के बाद भी धार्मिक कट्टरता और सामंती मानसिकता   के  कारण  विभिन्न   समाज  अपने -अपने   जन्म गत  जातीय संस्कारों की  अप्रसांगिक मरू-मारीचिका में भटक रहे  हैं  . कुछ जातीय, साम्प्रदायिकतावादी   भाषाई  और क्षेत्रीयतावादी तो न केवल   भारत की' अखंडता' को  ही चुनौती दे रहे  हैं बल्कि 'धरती पुत्र' के कांसेप्ट को अमली जामा पहनाने की निरंतर कोशिश भी कर रहे हैं .
                                                              वर्तमान चुनावी प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में अधिकांस  राजनैतिक  दल  [वामपंथ को छोड़कर]   जातीयता  ,साम्प्रदायिकता  ,भाषा,क्षेत्रीयता  की बिषेली  खरपतवार  को सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में इस्तेमाल कर ने  को बेताब हैं  ,वे जाने-अनजाने राजनैतिक पथ पर राष्ट्र सेवा करने के बजाय  निहित स्वार्थ वश महा अंधकूप में कूंद पड़ते हैं .इस  दौर में जबकि किसी भी  राष्ट्रीय दल को पूर्ण बहुमत  नहीं मिल पा रहा  है ,ये क्षेत्रीय-साम्प्रदायिक और जातीयतावादी ताकतें देश के सत्ता प्रतिष्ठान से 'ब्लैक मेलिंग' जैसा व्यवहार करती प्रतीत हो रही हैं . जगह-जगह विभिन्न समाजो,जातियों,सम्प्रदायों और खापों के सम्मलेन हो ने लगे हैं .  पूंजीवादी ,सम्प्रदायवादी ,क्षेत्रीयतावादी और  जातीयतावादी  दलों के नेताओं को आगामी आम चुनाव में जीतने के  लिए बहुमत चहिये.  जिस जाति ,सम्प्रदाय या भाषा -क्षेत्र से जिसका वजूद है वो उसी  के विकाश का नारा देकर  महाकवि रहीम का ये दोहा सुनाता फिर रहा है :-

   रूठे स्वजन मनाइये, जो रूठें सौ बार ..!
रहिमन पुनि-पुनि  पोईये , टूटे  मुक्ता  हार ...!!
  
   किसी को अब अयोध्या में श्रीराम  लला  के मंदिर  की , किसी को किसानों की आपदा और तत्सम्बन्धी आत्म हत्याओं की, किसी को कश्मीर की,किसी को भृष्टाचार से मुक्ति की,किसी को राष्ट्र के कर्ज उतारने की और किसी को युवा भारत के निर्माण की चिंता सता रही है . चूँकि इन मुद्दों पर चुनावी जीत के लिए रहीम  कवि  कह गए हैं :-

       रहिमन हांडी काठ की ,चढ़े न दूजी बार ..!

    विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ये बिडम्बना है कि  'जातिवाद ' के बिना किसी भी देशभक्त और ईमानदार प्रत्याशी का चुनाव जीत पाना अब न केवल कठिन अपितु असम्भव सा होता जा रहा है . जो लोग क्षेत्रीयता को हवा देकर अपनी राजनैतिक ताकत बनाए रखने  बनाम  सत्ता की दलाली करते  रहने में तीसमारखाँ  बने फिरते हैं वे विदेशी   घुश्पेठियों  ,आतंकवादियों और दुराचारियों के  निरंतर भारत विरोधी कारनामों पर केवल अरण्यरोदन करते रहते हैं .केवल सरकार को या विदेशी ताकतों को कोसने के लिए ख्यात इन  जातीय्तावादियों और क्षेत्रीय्तावादियों को नहीं मालूम  कि  वे  न केवल देश के साथ बल्कि खुद अपने साथ और अपनी   भावी पीढ़ियों के साथ ,
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        भावी पीढी के विश्वाश्घात कर रहे हैं .   दुर्भाग्य से  तथाकथित  तीसरे मोर्चे के हिस्से में आने वाला वर्ग इन्ही 'गैर जिम्मेदार ' निहित  स्वार्थियों से भरा पड़ा है .

        आगामी आम चुनाव में यदि किसी कारण से तीसरा मोर्चा सत्ता में आता है तो देश के  फिर से सोना गिरवी रखकर देश  चलाने की नौबत आ सकती है .देश के   दस-बीस साल  पीछे चले जाने से इनकार नहीं  किया जा सकता . देश की  जनता  को सिर्फ तीन राजनीतिक  केन्द्रों से ही  देशभक्ति -जनहित की उम्मीद करनी चाहिए  [१]कांग्रेस नीति गठबंधन [यू पी ऐ ][२]भाजपा नीति गठबंधन [एन डी! ए ] [३]माकपा नीति गठबंधन [वाम मोर्चा]...! इसके अलावा  जितने  भी राजनीतिक ,सामाजिक,आर्थिक और भीड़ जुगाडू  अपवित्र शक्ति  केंद्र हैं वे नितांत गैर-जिम्मेदार और ढपोरशंखी मात्र हैं उनमें वे मुख्यमंत्री भी शामिल हैं जो क्षेत्रीयता के रथ पर सवार होकर नीतिविहीन-कार्यक्रम विहीन  होकर केवल क्षेत्रीयता ,साम्प्रदायिकता या भाषा के नाम पर सत्ता सुख भोग रहे हैं .। नितीश कितने ही बड़े समाजवादी ,लोहिया वादी या  जेपी भक्त हों किन्तु वे भारत राष्ट्र की नैया पार लगाने में  किस अर्थशाश्त्र का प्रयोग करेगे? ये न वे जानते हैं और न कभी जानने  की  कोशिश  ही की है . क्या वे  चन्द्रशेखर का ,गुजराल का या देवेगौडा का अर्थशास्त्र लागु करेंगे जो केवल देश को शर्मिदगी ही दे सकता है  ?  या मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र मानेंगे  ?   जैसा की भाजपा और एन डी ए  ने  सावित कर दिखाया की वे मनमोहन सिंह जी के अर्थशास्त्र को  ही लागू कर सकते हैं क्योंकि उनका अपना कोई अर्थ शास्त्र है ही नहीं . यशवंत सिन्हा ,अरुण शौरी से  ज्यादा अमेरिका परस्त तो डॉ मनमोहन सिंह जी भी नहीं हैं .याने बात साफ़ है की भाजपा नीति गठबंधन सत्ता में आया तो चाहे वे आडवाणी हों,मोदी हों,सुषमा स्वराज हों या राजनाथसिंह  प्रधानमंत्री हों उनके पास डॉ मनमोहन सिंह जी की अर्थशास्त्रीय फोटो कापी मौजूद है .नो प्रोब्लेम…!  देश का जो होगा  अच्छा या बुरा -देखा  भाला  ही होगा .
                                                   किन्तु  मुलायम सिंह किस अर्थशास्त्र के दम पर लाल  किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करेंगे ? ममता,मायावती,जय ललिता ने आज तक  अपने श्री मुख से ये नहीं बताया  की वे अपने राज्य या  क्षेत्र  से  ऊपर  उठकर  'भारत  राष्ट्र' या  वैश्विक  चुनौतियां  के  बरक्स  कौनसा  अर्थ शास्त्र और तद्निरूप नीतियाँ -कार्यक्रम लागू करंगे ?  क्या  केवल  मुस्लिम +यादव +पिछड़ा  =मंडल  बनाम मायावती बहिन के दलित वोट बैंक +सोशल इन्जिनिय्रिंरिंग + ब्राह्मण = जातीयता का उभार  से नए भारत राष्ट्र का निर्माण हो सकेगा ? क्या केवल तमिल तेलगु तेलांगना या  मराठावाद  या  साम्प्रदायिकतावाद  से दुनिया की श्रेष्ठ अर्थ व्यवस्थाओं का मुकाबला किया जा सकता है ? क्या ये क्षेत्रीय क्षत्रप जानते हैं कि वे  जिस  जातीवाद ,सम्प्रदायवाद से वोट  कबाड़ कर कुछ सांसद जिताकर संसद में अपनी गुजारे लायक हैसियत तो पा  सकते हैं किन्तु वे मात्र इतनी  सी नकारात्मक योग्यता के दम पर  चीन के प्रधान मंत्री "सी जिनपिंग" के सामने,अमेरिकी राष्ट्रपति 'ओबामा 'के सामने या रूस के राष्ट्रपति' पुतिन 'के सामने  उतनी तेजस्विता से खड़े नहीं हो सकते जिस आत्मविश्वाश से  डॉ मनमोहनसिंह ने ब्रिक्स सम्मलेन में या अन्य अवसरों  पर अपनी  प्रचंड  योग्यता   प्रदर्शित कर न केवल चीन बल्कि दुनिया के कई   राष्ट्र प्रमुखों  को  तेज विहीन किया   है .
                                                                                                                                                                                    भारत के कुछ नौजवान फेस बुक पर और विभिन्न मीडिया माध्यम डॉ मनमोहन सिंह के कम बोलने  पर कार्टून बनांते हैं , कुछ शिक्षित युवा वर्ग - उन्हें केवल उसी चश्में से देखता है जो विरोधी दलों ने या मीडिया ने लोगो को पहनाया है  ऐसा करते वक्त ये युवा वर्ग भूल जाता है कि  उसके राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकार   अब आधुनिकतम सूचना तकनीकी ,डिजिटल नेटवर्क,और इंटरनेट के  क्रन्तिकारी युग  से संचालित और  परिभाषित   हो रहे  हैं . अब राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक   समझ  का  मूल्यांकन  वैश्विक  मूल्यों  पर  आधारित  होगा  न की  बाबा रामदेव,केजरीवाल अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार लोगों  के  ढपोरशंखी दुष्प्रचार में शामिल होकर  आम  आदमी द्वारा जाने-अनजाने अपने देश के ही खिलाफ उलटा सीधा बकते रहने से   भारत  में कोई क्रांति  नहीं होने वाली,अरुधती या उमर  अब्दुल्लाह या  भारत का मीडिया ही जब अफजल गुरु की फांसी  का विरोध करे तो देश के प्रधानमंत्री ही  नहीं  पूरे देश को ही  दुनिया में शर्मसार होना  पड़ता  है . कुछ  अप्रिय घटनाओं [गेंग रेप] इत्यादि      से,   और पडोसी राष्ट्रों की  नितांत दुष्टता पूर्ण हरकतों से    भारत को दुनिया में किन-किन  शर्मनाक मंजिलों से  गुजरना  पड़  रहा है  ? ये बातें उन लोगों को पहले समझ लेनी  चाहिए जो भावी चुनाव  उपरान्त देश की बागडोर सम्भालने जा रहे हैं  कांग्रेस का अर्थात यूपी ए  का  कुशाशन और उसका पूंजीवादी ,महंगाई  बढाने  वाला  अर्थशाश्त्र सबको मालूम है . फिर भी आज विदेशी मुद्रा भण्डार अपने चरम पर है .देश में अमन है,शांति है,सकल राष्ट्रीय आय और जीडी पी भी कमोवेश सुधार पर है, देश में गरीबी बढ़ी है,पूंजीपतियों के मुनाफे बढे हैं,भृष्टाचार हुआ है और उस पर नियंत्रण अभी भी नहीं है .गठबंधन के दौर में कोई और गठबंधन भी यदि केंद्र की सत्ता में  होता तो शायद इससे बेहतर तस्वीर देश की न होती . भाजपा नीति एन डी  ए   के पास डॉ मनमोहनसिंह से बेहतर वैकल्पिक आर्थिक नीति या कार्यक्रम  नहीं है वे स्वयम अमेरिका परस्त और उदारीकरण -वैश्वीकरण-निजीकरण के सबसे बड़े आलम वरदार है. १ ९ ९ ९ से २ ० ० ४ तक के फील गुड और इंडिया शाइनिंग वाले दौर में देश की अधिकांस संपदा   सर्माय्र्दारों को लगभग मुफ्त में बाँटने वाले भाजपाई अब कौनसा नया अर्थशास्त्र लेकर श्री नरेन्द्र  मोदी को पढ़ाने वाले हैं और कौनसा अर्थशास्त्र मोदी जी ने देश के लिए तै कर रखा है ? कहीं वही तो नहीं जो टाटाओं -अम्बानियों,बजाजों और मित्तलों  तथा अमेरिका -यूरोप -इंग्लैंड को  भा  रहा है .
                             अतीत में भी इन्ही ताकतों ने    भारत  के  सांस्कृतिक ,आर्थिक और  प्राकृतिक  वैभव  की  प्रचुरता  के  वावजूद   उसे जमींदोज किया है .  भारत के   आंतरिक बिखराव और   एकजुटता  की प्रक्रिया  के अभाव  में  एक साथ और विपरीत दिशा में परिगमन  के  परिणाम स्वरूप  उत्तर-पश्चिम  और मध्यपूर्व से यायावर-हिंसक लुटेरों और बर्बर-असभ्य कबीलों ने  न केवल बुरी तरह लूटा बल्कि -युगों के सुदीर्घ अनुभव जन्य- आयुर्वेद जैसी  वैज्ञानिक  उपलब्धि को   ,ग्राम्य - आधारित मज़बूत अर्थ-व्यवस्था  को   और परिष्कृत मानवीय मूल्यों-अहिंसा,समता,क्षमा शीलता  को  ध्वस्त  करने   में कोई कोर  कसर  नहीं छोड़ी . वैज्ञानिक  नज़र से इस  विषय   को   अनुसंधान  और   अन्वीक्षित  करने    के   इच्छुक शोधार्थियों को   न केवल भारतीय पुरातन उपलब्ध साहित्य अपितु हलावर जातियों  का    भी   साहित्य   अवश्य पढ़ना चाहिए।  आशा की जाती है की अतीत के 'अंधकारमय' पक्ष के रूप में  इस सनातन चुनौती   से नई  पीढी को  निजात दिलाने में 'मार्क्सवाद-लेनिनवाद  और  सर्वहारा  अंतर्राष्ट्रीयतावाद  ' अवश्य मददगार सावित हो सकता है  वशर्ते कि  प्रत्येक दौर की  नई  पीढी  भारतीय  स्वाधीनता संग्राम समेत तमाम वैश्विक क्रांतियों के  वेहतरीन   मूल्यों को ह्रुदय्गम्य   करती रहे.
        जातीय -विमर्श  हेतु समाज   शाश्त्रियों  को अतीत के काल्पनिक ,मिथकीय  व्यामोह से मुक्त होकर  न  केवल अतीत के  भारतीय  सामाजिक उत्थान-पतन अपितु   आज के झंझावातों और भविष्य के निर्माण  को भी मद्देनज़र रखना   चाहिए .  किन्तु  इन दिनों लगता  है  कि उस सामंत युगीन  काल्पनिक  और  मिथकीय   व्यामोह  को  भी  बाजारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में  एक आकर्षक 'उत्पाद'  के रूप में 'ओल्ड इज  गोल्ड' के बहाने पुनर्स्थापित किया जा रहा है .  जिसके भयावह परिणाम सामाजिक विषमता के गर्भ में   विकसित हो रहे हैं ,जो देश को गृह युद्ध की  दावानल में झोंकने के निमित्त बन सकते हैं .
                                                               आज कल भारत में कहीं ' राजपूत या क्षत्रीय -समाज' कहीं  'अग्रवाल समाज'कहीं 'जैन समाज'कहीं 'यादव-अहीर  समाज'कहीं 'जाट-विश्नोई   समाज'  और कहीं दलित- पिछड़े समाज के बैनर  यत्र-तत्र  टंगे दिखने लगे हैं . हालाँकि  बौद्धों,जैनों  और  लोकायतों के तो दो हजार साल से ज्यादा  पुराने  संगठनों  के  बनने -बिगड़ने -दोफाड़ होने और अपने ही सिद्धांतों को पद दलित किये जाने का  भी इतिहास है , सिखो का ५ सौ  साल  पुराना इतिहास है  जो उनके सामाजिक-धार्मिक  तौर  पर संगठित होने  और धर्म-राजनीती के घालमेल  के रूप में संवैधानेतर  सत्ता केंद्र स्थापित करने की नाकाम कोशिशों के रूप में भारतीय  इतिहास में दर्ज  हो  चुका  है .   विगत २ ० ० ४ से  देश के प्रधान मंत्री का पद एक सिख को   सिर्फ इसलिए दिया  जाता रहा है  कि  उस कौम के अलगाव वादियों     के  अहम्  और   तथाकथित उन्नीस सौ चौरासी के दंगों में आहात हुए सिखों को संतुष्ट किया जा सके . यह न केवल कांग्रेस  बल्कि देश  हित में उठाया कदम हो सकता  था वशर्ते  'अकाल तख़्त ' और संगठित सिख कौम का सरदार मनमोहनसिंह को समर्थन मिलता किन्तु एक समाज के रूप में एक पंथ के रूप में मनमोहनसिंह जी को रत्ती भर भी सहयोग 'शिरोमणि अकाली दल ' की ओर से कभी नहीं  मिला . इसी तरह से भारत में जितने भी जातीय -साम्प्रदायिक और क्षेत्रीतावादी संगठन हैं,या थे  सभी  ने  कमोवेश 'भारत राष्ट्र' को ब्लेक मेल करने अथवा अपना उल्लू  सीधा  करने को ही प्राथमिकता दी है।
                                     मंडल कमीशन और उसकी राजनीती के दूरगामी  परिणामों  का दंश देश अभी भी भोग रहा है  बाबा साहिब .डॉ भीमराव आंबेडकर  ने जिन्हें फर्श से अर्श पे बिठाया, मान्यवर कांसीराम जी ने जिन्हें राजनीती में   ककहरा सिखाया   वे   'बाबा साहिब' और कांसीराम जी की  की जय-जय कार तो करते  हैं  लेकिन  उनके  सिद्धांतों और सूत्रों को भूलकर अपने वंशानुगत स्वार्थों  के लिए  कुख्यात हो चुके हैं मायावती और उनके  रिश्तेदार ,नव धनाड्यों में शुमार हो चुके हैं जबकि देश की 9 0 % एस/सी /एस टी जनता आज भी गरीबी की रेखा के नीचे  घिसट  रही है .  वे इस व्यवस्था में जातीय आधारित संगठन  या राजनैतिक   पार्टी  बनाकर इससे ज्यादा कुछ हासिल कर भी नहीं सकते .सत्ता में आने के लिए भी उन्हें उन्ही  ब्राह्मणों को पटाने की सोसल  इंजीनियरिंग करनी पड़ती है  जिन्हें वे कभी -तिलक तराजू और तलवार ....इनको मारो… जूते  चार .... से स्मरण किया करते थे .   जाटों ,ठाकुरों,बनियों,ने अपने-अपने   संघ बना लिए हैं,अब सूना है की  ब्राह्मणों  को भी संगठित होने का 'इल्हाम' हुआ है सो हर जगह-जय परशुराम का उद्घोष सुनाई देने लगा है .

                        मेरी कालजयी  वैज्ञानिक और  वैश्विक  वैचारिक समझ; मुझे इस बात की इजाजत नहीं देती  कि  मैं किसी तरह के जातीय-भाषाई-साम्प्रदायिक सरोकारों वाले इस तरह  के   व्यक्ति  ,समाज,संगठन  के  उस विमर्श से रिश्ता रखूंया शिरकत करूँ -  जो सिर्फ अतीत की  झंडा वर्दारी  के आधार पर  अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की हास्यापद चेष्टा करता है और मानव-मानव में नस्ल ,जाति ,मज़हब,भाषा या कौम के  आधार पर पृथक्करण या     वर्चस्व को वैधता प्रदान कराने की चेष्टा करता है .  किसी भी ऐतिहासिक रचना ,  साहित्यिक धरोहर या लोक-परम्परावादी  काव्यांश  को विकृत रूप में पेश किये जाने से में  हस्तक्षेप के लिए बाध्य  हूँ . यह मेरा उत्तरदायित्व भी है की  प्रत्येक प्रतिगामी और गुमराह कदम    को न केवल बाधित करूँ अपितु अपना और 'प्रगतिशील' समाज का पक्ष प्रस्तुत करूँ . अभी तक देश और दुनिया में जिन - जिन सम्प्रदायों, पंथों  -जातियों और उपजातियों  को संगठित होते हुए देखा सुना है उनमे साम्प्रदायिक आधार पर  - बौद्ध,जैन  इस्लामिक   ,ईसाई  , यहूदी, आर्य -समाजी , सिख्य  और पारसी ही संगठित थे . फ्रांसीसी क्रांति,वोल्शैविक -महान अक्तूबर क्रांति और चायनीज क्रांति के बाद दुनिया ने साम्प्रदायिक चस्मा उतार फेंका और 'मानवीय मूल्यों ' से युक्त - स्वतंत्रता ,समानता, भाईचारे   को  आधुनिक वेहतरीन युग निर्माण और व्यक्ति निर्माण के उद्देश्य से आविष्कृत किया था . सारे संसार के  तथाकथित सम्प्रदाय और धर्म-मज़हब  जो अवैज्ञानिकता , की घुट्टी पीकर पोषित हुए थे , उनके केन्द्रीय विचारों में बेहतरीन मानवीय  मूल्यों की बुनावट के वावजूद वे सब के सब  अपने-अपने मठाधीशों द्वारा तत्कालीन शासक वर्ग के हितों की पूर्ती  और आम जनता पर निर्मम अत्याचारों  के लिए कुख्यात रहे हैं।मानव इतिहास ने जितने भी देवीय आश्था के केन्द्रों को जन्म दिया है  उनमे से कुछ ने अवश्य ही मानवता की बड़ी  सेवा की है, त्याग किया है,  कुर्वानियाँ दीं हैं, मनुष्य को उसकी आदिम पाषाण  युगीन अवस्था से उसके उतोपियाई काल्पनिक  दैवीय रूपांतरण  के प्रयाण पथ पर; इन चंद  अपवादों- शहादतों  और बलिदानों  ने निसंदेह बेहतरीन भूमिका अदा की है.  संभवतः इन्ही कारणों से आर्यों में  ब्राह्मणों को जातीय श्रेष्ठता का भान' हुआ होगा ,  कुछ इसी तरह  ईसाइयों में रोमन केथोलिक को , इस्लाम में कुरेश कबीले को  ,  बोद्धों में लिच्छवियों को  शंकराचार्यों में नाम्बूदिरियों  को परम्परागत सम्मान  मिला होगा . किन्तु  इन पंथ-मज़हब या सिद्धांत के स्थापकों के  बेहतरीन  बलिदानों का   उनके उत्तर  अनुवार्तियों को प्राप्त  सामाजिक -आर्थिक - राजनैतिक  विशेषाधिकार  सदियों तक  सारे संसार में  अपने अहंकार, ऐश्वर्य,तेजस और प्रभुत्व का प्रचंड तांडव कर  न केवल समाज और राष्ट्र का बल्कि स्वयम अपने ही बंधू-बांधवों सजातीय-स्व्धार्मियों का भी  बेड़ा  गर्क  करता रहा  है.  इस जातीय या कबीलाई  दुनिया के विभिन्न देशों में लगभग एक जैसी  भारतीय उपमहाद्वीप  में आर्यों  [  प्रारंभ में आर्यों में केवल तीन वर्ण ही थे,ब्राह्मण- क्षत्रीय,वैश्य बाद में  जब आर्यों ने भारत में 'वैदिक काल' की व्यवस्था कायम की तब पराजित स्थानीय मानव समूह को 'दास' गुलाम और अंत में 'मनु महाराज ने तो इन 'धरती पुत्रों ' को शूद्र ही घोषित कर दिया '] के स्थापित होने के हजारों साल बाद   विदेशी आक्रमणकारियों,विदेशी यायावरों,बंजारों और दुनिया के विभिन्न  क्षेत्रों से विस्थापित होकर आते रहे  'जन-समूहों ने आर्यों को  अधिक  समय तक "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम" का उद्घोष नहीं करने  दिया . भारत पर विदेशी आक्रमणों का  इतिहास जितना पुराना  और व्यापक है उतना विश्व में अन्यत्र दूसरा कोई उदाहरण नहीं है . इन में कुछ  अत्यंत बर्बर खूरेंजी  शकों, हूणों, च्न्गेजों , मंगोलों  ,अरबों ,तोर्मानो,यवनों,तुर्कों,अफगानों,पठानों,मुगलों, यूरोपियनों और खासकर अंग्रेज  संगठित सैन्य आक्रान्ताओं ने यहाँ के  तत्कालीन वेहतरीन सामाजिक -आर्थिक और प्रशासनिक ताने-वाने को ध्वस्त कर उनके अपने अनुरूप  सामाजिक,शैक्षणिक,आर्थिक,राजनैतिक और  व्यापारिक  मूल्य स्थापित किये जो उनके लिए वरदान थे और भारत के लिए अभी तक अभिशाप  हैं .
                                           
   श्रीराम तिवारी
 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

भाजपा पुनर्मूष्को भव: की ओर अग्रसर...

        
               भाजपा   की  नियति - " पुनर्मूषको भव "

वह पौराणिक कथा सभी को मालूम है की 'एक ऋषि गंगा स्नान कर रहे थे,तभी  बाज पक्षी एक   मूषिकी  याने चुहिया  को  अपने दांतों में दवाये  आकाश  में  उड़ते हुए  उन ऋषि महोदय के ऊपर से गुजरा और चुहिया उसके मुंह से छिटककर ऋषि महोदय की अँजली  में जा गिरी .ऋषि ने उसे कन्या  रूप देकर पुत्रीवत पालन किया ,किशोर  वय  में उस परम सुन्दरी के विवाह हेतु उन्होंने सारे संसार के देव-दनुज -नर-श्रेष्ठ वर उस कन्या के सामने उपस्थित किये ,सूर्य,चन्द्र,वायु वरुण तथा पर्वतों को अस्वीकार कर उस कन्या ने अंत में एक 'चूहे' को पसंद किया और ऋषि महोदय को मजबूरी में उस  स्व पालित  कन्या  रुपी मूषिका को 'पुनर्मूषको भव् '  का शुभाशीष [वास्तव में अभिशाप] देना पड़ा .
                दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र भारत में गैर कांग्रेसवाद याने कांग्रेस विहीन राजनीतिक पार्टियों की  और खास तौर  से पहले के जमाने में 'जनसंघ' की और अब भाजपा की  यह  ;पुनर्मूषको भव : ' नियति  भी  लगभग  इसी तरह   विगत ६ ५  सालों से निरंतर चल  रही है . देश की  जनता का जनादेश एक-आध बार अपवाद मान भी लें तो कांग्रेस को 4 0 % से ज्यादा वोट कभी नहीं मिला , फिर भी  वह एन -केन -प्रकारेण   अधिकांस  समय देश की सत्ता में रही है .और गैर कांग्रेस रुपी  विपक्ष को 5 0 % से  अधिक  जनादेश  सदैव मिलता रहा है किन्तु यह' सनातन अभिशप्त ' विपक्ष   सत्ता में [केंद्र में]  वमुश्किल दस साल भी नहीं रह  पाया . वर्तमान राजनैतिक परिद्रश्य  इंगित करता है कि  वर्तमान  विपक्ष  ने  २ ० १ ४  से आगे भी   विपक्ष  में ही  बैठने की ठान  रखी  है . भाजपा और वामपंथ को छोड़ बाकी सारे  गैर कांग्रेसी  दल बाहर से कांग्रस को 'पाप का घड़ा'  बताते हैं और चोरी छिपे  उसी कांग्रेस रुपी  घड़े का पानी पीने से भी बाज़ नहीं आते। ये क्या खाक तीसरा मोर्चा बनायेंगे ? वामपंथ के पास  बेहतरीन  आर्थिक-सामाजिक और राजनैतिक  वैज्ञानिक  विचारधारा  और राजनैतिक   विकल्प  की  सम्भावना  के  वावजूद  ,उसके  निरंतर  संघर्ष और जन-चेतना अभियान के वावजूद केंद्र की सत्ता में आने की उसकी अभी तो दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है हाँ ये जरुर हो सकता है की त्रिपुरा में जीतने के बाद वो कांग्रेस से केरल और तृणमूल से पश्चिम बंगाल की सत्ता वापिस ले ले किन्तु केंद्र में आने के लिए अभी 'दिल्ली बहु दूर है'
                                            वर्तमान में  गैर कांग्रेसवाद के प्रमुख राष्ट्रीय विकल्प तीन हैं, पहला- भाजपा नीति नेशनल डेमोक्रिटिक अलायन्स याने - एन डी ए ,   दूसरा-माकपा नीति वाम मोर्चा और तीसरा -नेशनल   कांफ्रेंस  ,सपा  ,बसपा  ,द्रुमुक   तृणमूल ,अकाली  ,शिवसेना  ,बीजद  और जद {एस] इत्यादि  तमाम   दलों  का तथाकथित तीसरा मोर्चा .  इसके अलावा देश के अन्दर  नक्सलवादियों -माओवादियों जैसे  हिंसक और  संसदीय प्रजातंत्र विरोधी याने चुनाव नहीं लड़ने और सत्ता 'बन्दूक की नोंक'से हासिल करने के  लिए प्रयासरत है . अरविन्द   केजरीवाल, अन्ना हजारे ,बाबा रामदेव जैसे अहिंसक किन्तु व्यक्तिवादी और  बिना विचारधारा  के ढपोरशंखी मात्र  हैं  -इनमे से कोई भी कांग्रेस  नीति यूपीए का विकल्प  बन पाने में फिल हाल सक्षम नहीं है . देश की जनता मंहगाई ,भृष्टाचार ,रिश्वतखोरी ,वेरोजगारी ,भुखमरी,ह्त्या बलात्कार
 को वर्तमान सरकार की नीतिगत विफलताओं के रूप में लेती है और सत्ता परिवर्तन चाहती है . आगामी आम चुनाव जब भी होंगे कांग्रेस को एक सौ पचास सीट से ज्यादा नहीं मिलेंगीं .किन्तु विपक्ष में ३ ५ ० सीटें मिलने के वावजूद सरकार 'कांग्रेस नीति यूपीए ' की फिर से बन जाए तो कोई अचरज नहीं।
                         कांग्रेस के इस पुन राज्यारोहण  के लिए कौन जिम्मेदार होगा ? इसकी भी मैं  घोषणा  कर सकता हूँ .सारा देश जानता है की कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने मैं अभी वर्तमान में केवल-और -केवल भाजपा नीति  एन डी ए  ही सक्षम हो सकता है   हालांकि एन डी ऐ  की आर्थिक  नीतियाँ वही हैं जो डॉ मनमोहनसिंह की हैं , ये लोग २ ० ० ४ में इन्हीं नीतियों  को 'फील गुड' और 'इंडिया  शाइनिंग ' के रूप में केश कर  चुके हैं . फिर भी देश की जनता बहरहाल तो कांग्रेस  से बेहद नाराज़ है और सत्ता परिवर्तन चाहती है .  किन्तु   भाजपा  शासित  राज्यों में भी स्थिति बेहद दयनीय और निराशाजनक है . भाजपा  के वर्तमान  'प्रबंधकों' ने  भाजपा की  नई  टीम   को जिस  -किसी भी बाध्यता से आगामी कार्यवधि के लिए   घोषित किया हो, लेकिन   ये टीम आगामी  चुनावों में और चुनाव के तत्काल बाद होने वाली सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया  में रंचमात्र सहयोगी होने के बजाय 'गठबंधन ' की राजनीती को  पलीता लगाने  के लिए  इतिहास में दर्ज होने जा रही है .
                                             राजनाथ सिंह जी की  ताज़ा टीम में नरेन्द्र मोदी,उमा भारती ,अमित शाह  और वरुण गाँधी  के  शामिल होने ,  यशवंत  सिन्हा,जसवंतसिंह ,शांताकुमार ,नजमा हेप तुल्लाह ,शिवराज सिंह,रमनसिंह   को संसदीय बोर्ड से बाहर रखे  जाने  ,आडवानी जी ,सुषमा स्वराज जी  के आग्रहों को दरकिनार करने , कट्टरतावादियों की गिरफ्त में आने   के निहतार्थ किसी से छिपे नहीं हैं . इस टीम का  लक्ष्य जिस ओर इंगित कर रहा है  वो भी किसी से छिपा नहीं है।  चुनाव के दरम्यान और ठीक चुनाव के बाद  जो  राजनीतिक विपक्ष  'धर्मनिरपेक्षता  और  लोकतंत्र  पर आधारित  होकर अपनी संसदीय क्षमता को एन डी ए  से जोड़कर  देश की जनता को  नई  सरकार देने जा रहा हो वो उस  जनता के सामने-  किसी खास आकर्षण ,चाहे वो धर्मनिरपेक्षता  ही क्यों न हो - किस मुंह से कहेगा की 'नरेन्द्र मोदी' प्रधान मंत्री   होगे ! या कि  दलित ,मुस्लिम,पिछड़ा और क्षेत्रीयता आधारित जनाधार  जिसे गैर  भाजपाई और गैर  कांग्रेसी  विपक्ष ने  निरंतर  भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ  निरंतर विष वमन  से पोषित किया हो  वह   अति मासूमियत'  से चुपचाप थोक में 'कट्टर हिंदुत्व' की  मांद  में पानी पीने खीचा चला आयेगा ? या   सीधी  -सादी  गाय की तरह भाजपा की 'थान ' पर खीचा चला आयेगा .
                            आज भाजपा फिरसे भगवाकरण की ओर चल पडी है . लगता है की विकाश और सबको साथ लेकर चलने की  युक्ति पर विगत दो आम चुनावों में लगातार कांग्रेस से मात खाने के बाद   भाजपा का  तथाकथित    धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक  उदारवाद से मोह भंग  हो चूका है .  उसे लगता है कि  नरेन्द्र मोदी के कट्टर हिन्दुत्ववादी नायकत्व और  विकाश पुरुष की वर्चुअल इमेज से देश के हाई टेक हिन्दू युवाओं का अपार समर्थन मिल जाएगा और सत्ता में साझेदारी के लिए  किसी 'धर्मनिरपेक्षतावादी ' की चिरोरी  नहीं  करनी पड़ेगी .इस टीम के माध्यम से राजनाथसिंह ने स्पष्ट सन्देश दे दिया है  कि  वे अटल बिहारी वाजपेई के माध्यम मार्ग से  च्युत होने के लए कटिबद्द  हैं .चरम पंथियों कट्टर हिदुत्व वादियों को  प्रश्रय  और नरम पंथियों  को हासिये पर धकेलकर भाजपा हाइकमान  ने एक भ्रम और पाल रखा है कि   आम चुनाव तक नरेन्द्र मोदी को 'हिंदुत्व'  का आइकान  बनाकर रखेंगे ताकि हिन्दुत्वादी वोट बैंक में माकूल इजाफा किया जा सके . भाजपा को तब यदि २ ० ० से ज्यादा सीटें आतीं हैं तो इस टीम और इसी कट्टरवाद को केन्द्रित कर नरेन्द्र मोदी  के नेत्रत्व में सरकार   बनाई जायेगी .
                                                     यदि भाजपा के सांसद संख्या बल में  १ ५ ० के नीचे रहते हैं तो मोदी जी गुजरात का ही गौरव गान करते   रहेंगे और  धर्मनिरपेक्ष गैर  कांग्रेसी विपक्षी 'अलायन्स पार्टनर'  की  मंसा   या  भावनाओं का आदर करते हुए तदनुरूप अपने बीच से कोई 'धर्मनिरपेक्ष' चेहरा  प्रस्तुत करेंगे। इस कट्टरता वादी  जुए के खेलने वाले इतने भोले कैसे हो सकते हैं   कि  तथाकथित तीसरा मोर्चा + वाम मोर्चा और  कांग्रेस  नीति यु पी ए  उनके  इस पेंतरे का जबाब नहीं देंगे . वे  तो वैसे ही इस भाजपाई कट्टरपंथी टीम  की  घोषणा को अभी से अपने लिए अनुकूल मानकर ,परम आन्नदित हो रहे होंगे .
                                                                                                                भाजपा और संघ ने  अपने ही पुराने अनुभवी और स्थापित  जिन 'उदारवादियों ' धर्मनिरपेक्षतावादियों  को चाहे वे येशवंत सिन्हा हों,जसवंत सिंह हों,  नजमा हेपतुल्लाह हों,शिवराज हों,रमनसिंह हों,शांताकुमार हों   या  सुष्माजी और आडवाणी जी हों   -इन सबको किनारे लगाकर ,उनका मान मर्दन कर जिस तरह से नरेन्द्र मोदी को अप्रत्याशित बढ़त दी   है वो भाजपा को  पुनः विपक्ष में बैठने अर्थात 'पुनर्मूषको '  भव  कराने  की ओर इंगित कर रही  है .

       श्रीराम तिवारी

                                                              
                            

  
 


 

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

अजमेर शरीफ के 'जनाब जेनुल आबेदीन ख़ान साहेब ' सम्मान के हकदार ..

        
               ज़नाब   जेनुल आबदीन  खान साहेब   पर भारत को  नाज़ है .....!




    विगत दिनों पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री 'राजा परवेज ' जब अजमेर शरीफ पधारे तो  उन्हें एक
अप्रत्याशित स्थिति का सामना करना  पड़ा ,  जब वे 'ख्वाजा मोइनुद्दीन  चिस्ती ' याने गरीब नवाज़ के दरवार में  जियारत के लिए पूरे राजकीय सम्मान के  साथ तसरीफ  लाये तो दो  तरफ़ा प्रतिक्रिया से  सारा मीडिया
लवरेज था .एक तरफ केंद्र और  राजस्थान की  राज्य सरकार पलक पांवड़े लेकर उनकी मिजाज पुरसी या यों कहे की ' कूटनीतिक ' अतिथि सत्कार के लिए कटिबद्द थी तो   दूसरी  ओर' अजमेर शरीफ ' के गद्दीनशीन जनाब जेनुल आबदीन खान साहेब ने  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तथा उनके साथ आये  भारी -भरकम   जाय् रीनी काफिले का स्वागत करने से इनकार कर दिया .उनका कहना था  कि  पाकिस्तानी फौज के संरक्षण में पाकिस्तानी 'हत्यारों' ने  धोखे से दो भारतीय  जवानों के सर काट कर सीमाओं  पर जो दुष्कृत्य किया है  वो  न केवल भारतीय फौज के  खिलाफ ,न केवल भारतीय गणतंत्र के खिलाफ , बल्कि  प्रत्यक्ष रूप से भारतीय-  जनता अर्थात -हिन्दू -सिख- जैन-बौद्ध-ईसाई-पारसियों और  मुसलमानों समेत तमाम मज़हबों-  जातियों सम्प्रदायों   की गंगा-जमुनी तहजीव और सम्पूर्ण  प्रभुत्व  सम्पन्न   भारतीय  जनता -जनार्दन के खिलाफ  पाकिस्तान की रक्त पिपासु फौज का  नापाक हमला  था . चूँकि राजा  परवेज प्रधान मंत्री थे अतेव वे भी इस शर्मनाक  कुक्र्त्य  के लिए उतने ही जिम्मेदार हैं .
                                                  पाकिस्तान के कठमुल्लाओं , रक्त पिपासु फौजियों  और  उसको  हथियारों  की   निरंतर सप्लाई करने  वाली लाबी -  भारत विरोधी  ताकतों ने  भारतीय सीमाओं पर ,भारत के अन्दर और भारत  के   बाहर  अन्तराष्ट्रीय स्तर  पर निरंतर अघोषित युद्ध छेड़ रखा है.  भारत  के  अधिकांस  लोग  पाकिस्तान  से  दोस्ती  चाहते हैं . पाकिस्तान  की मेहनतकश आवाम को भी भारत  से कोई बैरभाव नहीं है  ,पाकिस्तान  के   प्रगतिशील  वुद्धि जीवी और मानव अधिकारवादियों की भी यही कोशिश रहती है  कि  भारत-पाकिस्तान अपनी-द्वीपक्षीय समस्याओं और सीमा विवाद को आपसी समझ बूझ से सुलझा लें और सीमाओं पर अमन शान्ति बनी रहे.  पाकिस्तानी साहित्यकार,लेखक,शायर और कलाकार  भी भारत के साथ अमन का  रिश्ता  कायम  रखना चाहते हैं , किन्तु पाकिस्तान का  मीडिया  ,पाकिस्तान  के  कठमुल्ले  और  पाकिस्तान  की सत्ता पर परोक्ष रूप से काबिज मिलिट्री  और दिग्भ्रमित भारत विरोधी मानसिकता वाली राजनैतिक दुष्प्रवृत्ति  ने पाकिस्तान को दुनिया भर  में  भारत का सनातन शत्रु ,  आतंकवाद का  जनक  और  एटमी  खलनायक के रूप में  कुक्ख्यात कर रखा  है .   पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ जब भी  युद्ध छेड़ा या इस तरह की कोई हीन हरकत- जैसी की विगत दिनों  सीमाओं  पर की है, उसके द्वारा की गई तो भारत की फौज , भारत की जनता ने एकजुट  होकर उसे  करारा जबाब दिया है ,   इतिहास गवाह है कि  भारत के मुसलमानों  ने हर दफा अपनी   बहादुरी और- भारतीय - राष्ट्रनिष्ठा  के कीर्तिमान स्थापित कर   पाकिस्तान   को उसकी औकात दिलाई  और साथ ही  अपना घर  सुधारने  की नसीहत भी  दी है .
                                    जनाब जेनुल आबदीन खान साहेब ने 'अजमेर- शरीफ' से सारे संसार के मुसलमानों को सन्देश दिया है कि अव्वल तो   पाकिस्तानी हुक्मरानों  को गरीब नवाज  'ख्वाजा मोइनुद्दीन' चिस्ती के दरबार में आने  की  पात्रता  ही नहीं है . दूसरे  उनके  और पाकिस्तानी फौज के  गुनाह  नाकाबिले  बर्दास्त  और  माफ़ी  योग्य  नहीं हैं .   अजमेर शरीफ के प्रमुख जनाब जेनुल आबदीन खान साहेब को 'भारत रत्न' मिले या न मिले वे आज के इस  भयानक अलगाववादी  और  असहनशीलता के दौर में न केवल सम्मान के हक़ दार है अपितु  विश्व शांति के अलम वरदारों  में शुमार किये जाने योग्य  है . भारत के मुसलमानों को उन पर नाज़ है  और अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए देश भर से लोग उनसे मिलने की  तमन्ना रखते  हैं .इंदौर से सेकड़ों लोग आज अजमेर  शरीफ प्रस्थान कर चुके हैं .
                                                 जनाब जेनुल आबेदीन खान साहेब  ने  पाकिस्तान के प्रधान  मंत्री के लौटने के बाद जिस तरह अजमेर शरीफ और  उस इलाके  की  सड़कों को धुलवाया ,  वो  न केवल पाकिस्तानी  हुक्मरानों के लिए बल्कि उनके लिए भी  नसीहत का सबब  है जो भारतीय मुसलमानों को संदेह की नज़र से देखा करते है। उन्हें भी सोचने को मजबूर कर दिया जो 'स्वयम्भू' राष्ट्रवादी तो बनते हैं किन्तु घृणा की राजनीति  कर सत्ता पाने की नापाक  कोशिश में लगे रहते हैं .
                   इंदौर से आज शाम कुछ  लोग अजमेर शरीफ प्रस्थान कर चुके है जो कल अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन जनाब  जेनुल आबेदीन खान साहब का शुक्रिया करेंगे  ,उन्हें सम्मानित  भी करेंगे .इस जत्थे का नेत्रत्व कर रहे हैं जनाब आरिफ  रहीम ,नासिर  कुरैशी ....! इस जत्थे में शामिल  सभी साथियों को  क्रांतिकारी अभिवादन और जनाब जेनुल आबेदीन साहेब को नमन . ख्वाजा गरीब नवाज को सादर प्रणाम .
                        श्रीराम तिवारी 
                                          

 

सोमवार, 25 मार्च 2013

     गठबंधन की राजनीति  के दौर में राष्ट्रीय हितों पर  कुठाराघात .....!

 रात को एक एस एम् एस मिला-अवसरवादिता और गठबंधन की मनमानी वाली राजनीति  में  दम  तोड़ते  जनता के असली मुद्दे…!पर प्रकाश  डालिए ! में इस  एस एम् एस का- जो की भाषा और व्याकरण के परिप्रेक्ष्य   में  आंशिक रूप से अशुद्ध है,  इस तरह से वाक्य विन्यास करता हूँ ...!'अवसरवादिता और गठबंधन' ' दम  तोड़ते जनता के असली मुद्दे'मनमानी वाली राजनीती '....!बार-बार उसी वाक्य को दुहराने पर में इस वाक्य विन्यास को  पुनः  संछिप्तीकरण  करते हुए ,  उपरोक्त  शीर्षक के रूप में इन्द्राज करता हूँ .  याने-गठबंधन की राजनीति के दौर में राष्ट्रीय हितों पर  कुठाराघात ....!अर्थात गठबंधन की राजनीति  को राष्ट्रीय हितों के खिलाफ   मानने को बाध्य हो जाता हूँ .हालाँकि यह तय करने का अधिकार मुझे तो क्या इस देश की संसद को भी नहीं है  कि ' गठबंधन  की राजनीति  में केवल अवसरवादिता ही शेष  है और निहित स्वार्थी क्षेत्रीय पार्टनर्स का व्यवहार नितांत 'राष्ट्र विरोधी' और मनमाना है.  यह स्थापना सेधान्तिक रूप में स्वीकार करने का मतलब है - उस जनादेश की अवमानना  जो की देश की जनता ने विगत २ 0 0 9  में  आम चुनाव के माध्यम से दिया था .अर्थात यु पी ए  द्वतीय गठबंधन की सरकार को जनता का जनादेश मिला था .

         इससे पूर्व यु पी ए  प्रथम की स्थिति भी लगभग यही थी फर्क सिर्फ इतना था की तब सी पी एम् के ५ ० सांसदों  का बाहर से 'बिना' शर्त समर्थन था और तत्कालीन मनमोहन सरकार ने जब  बेहिचक अपनी आर्थिक उदारीकरण  की अमेरिका परस्त नीतियों को धडल्ले से लागू करना शुरू  किया  तो लोक सभा में सत्ता पक्ष की  स्थिति ठीक वैसी हो गई जैसी अभी डी  एम् के के समर्थन वापसी पर हुई है .  वाम के  प्रवल  विरोध  के वावजूद 1 ,2 ,3 , एटमी करार किया  गया तो वाम ने आँख दिखाई और समर्थन वापिस ले लिया .जब तक वाम का दवाव रहा तब तक -मनरेगा , सूचना का अधिकार ,और गरीबों को सब्सिडी इत्यादि   जन-कल्याणकारी कार्यक्रम और नीतियाँ जारी रहीं  ,ज्यों ही वाम ने बाहर से दिया अपना समर्थन वापिस लिया  तो न केवल मनमोहनसिंह   जी  बल्कि  एनडीए  के  अरुण  शौरी  और  अमेरिकी  राजदूत अपनी ख़ुशी को  छिपा नहीं सके .  तत्कालीन अल्पमत सरकार को बचाने के लिए दुनिया भर के चोर-लुटेरे एकजुट हो गए यही सपा -बसपा और ममता  तब भी तारणहार थे ,सरमायेदारों ने   सांसदों की खरीद फरोक्त कर जिस तरह सरकार बचाई वो सारा  संसार  जानता  है.  उसमे गुनाहगार सिर्फ वो ही नहीं थे जिन्हें क्षेत्रीय दल कहकर हिकारत से देखा जाता है बल्कि वो भी थे जो 'तथाकथित राष्ट्रवाद"  के  स्वघोषित  अलम्वर्दार हुआ करते हैं , कौन नहीं जानता की भाजपा के दर्जनों सांसद गैर हाज़िर रहे और दर्जनों को मीडिया पर नोट लहराते हुए देखा गया .  कायदे से 2 0 0 9  में उस यु पी ए  की भृष्ट तम  सरकार को सत्ता में पुनार्वापिसी का अधिकार नहीं था  किन्तु ईश्वर इस देश की  उस जनता को सद्बुद्धि दे[जिसमें से 9 0 % को  जस्टिस काटजू ने  मूर्ख कहा था]   जिसने  भाजपा नीति एनडीए की अटल सरकार से न जाने क्या खार खाई  कि   एक तरफ तो वाम पंथ का ही सूपड़ा साफ़ कर दिया और 'लाख शाइनिंग इंडिया' और करोड़ों' फील गुड 'के वावजूद 'पी एम् इन वैटिंग '  महान तम  राष्ट्रवादी हिन्दू शिरोमणि  आदरणीय लालकृष्ण  आडवाणी जी को  को घास नहीं डाली और शेयर बाज़ार के लाडले,अमेरिका के परम मित्र, वाम शत्रु  और देशी-विदेशी अमीरों के हीरो सरदार मनमोहनसिंह  के नेत्रत्व में  यु पी ए  द्वतीय के तथाकथित 'अवसरवादी गठजोड़ ' को सत्ता में पुन:  वापिसी  मिली  थी . इस घोर अलोकतांत्रिक   कुक्र्त्य  के मद्देनज़र तत्कालीन  मीडिया  रिपोर्ट्स  में सारे के सारे चेनल्स,अखवार,बेब साइट्स वगैरह वगैरह चीख -चीख कर चुनाव पूर्व घोषणा कर चुके थे कि  बस अब यु पी ए  के पापों का घड़ा भर चूका है और बस अब दस जनपथ,रायसीना हिल्स समेत  सम्पूर्ण सत्ता प्रतिष्ठान पर एनडीए गठबंधन काबिज होने जा रहा है . यही हाल अभी के श्री लंका प्रकरण के बहाने डी एम् के और शेष सभी पक्ष -विपक्ष के हैं। गाँव वसा नहीं सूअर -कुत्ते पहले से  कुकरहाव करने  पहुँचने लगे  .
                          जो-जो प्रहसन, ढपोरशंख टोटके और द्वीपक्षीय कुत्सित प्रचार इन   महा  गठबन्धनों  ने 2 0 0 9  में किये थे  वे इस आसन्न आगामी 2 0 1 4  की प्रस्तावित पटकथा में भी  लिखे जा चुके हैं ,  अभी उनके घोषणा  पत्र  बिलकुल विपरीत सिद्धांतों और नीतियों पर आधारित हैं,किन्तु आगामी आम चुनाव में संभावित त्रिशंकु संसद में 'वांछित बहुमत ' जुटाने के नाम पर सत्ता सुख    के लिए उनके पुनर्मिलन  से इनकार नहीं किया जा सकता .  भाजपा , कांग्रेस , वामपंथ  के अलावा शेष सभी दल लगभग जाति - धर्म , क्षेत्रीयतावाद  और  पुरोगामी आंचलिक मानसिकता  का प्रतिनिधित्व करते है ,वे अपने वोट बेंक के पोखर में आसन्न डूबकर '  भारत -राष्ट्र' का भुरता  बनाने से भी नहीं चूकते .  ये क्षेत्रीय क्षत्रप और उनके  पिछलग्गू  अर्ध शिक्षित कार्यकर्ता और  'जनतांत्रिक समझ' के लिहाज़ से अपरिपक्व उनके स्थाई वोट बेंक की  भीड़ -देश के   दूरगामी हितों  को पहचानने में असमर्थ हैं .  इस जनता जनार्दन को   यह भी याद  नहीं रहता की जिसका वो विरोध कर रहा है वो  हारकर भी सत्ता में आ सकता है और जिसे वो वोट दे कर  जिता  रहा है वो जीत कर भी  सत्ता में नहीं आने  वाला  और इसकी भी पूरी संभावना हो सकती है कि  वो सत्ता के गठ्बंध्नीय दौर में महज़ एक 'बिकाऊ माल' बन कर रह जाये.  तब कर लो 'राष्ट्रवाद ' का गुणगान . देश के जाबांज  बहादुर जवानों को शपथ दिलाने वाला , न्याय विदों को शपथ दिलाने वाला , स्वयम संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाला  'नायक' भी इन्ही बिकाऊ जिंसों के ढेर में से  प्रगट  हो सकता है .  देश भक्तों , ईमानदार मीडिया कर्मियों,ईमानदार राजनीतिज्ञों  की यह दुश्चिंता जायज़ है  कि  दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र केवल सीबी आई के सहारे या दुमछल्लों और नीतिविहीन कुकुरमुत्ता दलों के ब्लैक मेलिंग  के सहारे कब तक चल सकेगा ?
  वे इसका भी मीजान करते हैं कि  यदि 'पीपुल्स रिपब्लिक आफ चायना ' की तरह हमारे देश में यदि निष्कंटक सर्व प्रभुत्व सम्पन्न पूर्ण बहुमत प्राप्त  सत्ता केंद्र होता तो शायद जी डी पी या सकल राष्ट्रीय उत्पादन में ,आर्थिक ग्रोथ में हम चीन से आगे होते . हम पाकिस्तान ,बंगला देश श्रीलंका या इटली की धौंस धपट  में नहीं जी रहे होते .उनका अनुमान और मूल्यांकन सही भी हो सकता है किन्तु 'भारत' और चीन में लाखों समानताएं होने के बावजूद  ये कटु सत्य है की भारत में जितनी बोलियाँ ,जातियां धार्मिक विश्वाश और पंथ -मज़हब के फंदे हैं , जितनी जटिल क्षेत्रीय मानसिकताएं हैं उतनी चीन में नहीं हैं फिर वही एक सनातन गौरब भी की -
     हस्ती   मिटती  नहीं हमारी .... सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा .....!
 
हमे ऐतिहासिक विरासत में 'महान पडोसी' पाकिस्तान मिला है जबकि चीन को पड़ोस के रूप में भारत ! अब सोचो की  प्रवाह के विपरीत किसे तैरना  पड  रहा है ? हमें  एक हजार साल की गुलामी का दंश भोगना पड  रहा है जबकि  चीन को  पांच साल भी गुलाम नहीं रहना पडा . गुलामी से छुटकारा पाने में कुछ ऐतिहासिक विषाणु भारत के शरीर में प्रवेश कर गए जिसके कारण क्षेत्रीतावाद और साम्प्रदायिक अलगाव से भारत को  जूझना  पड़  रहा है . ये गठ्बंध्नीय दौर भी ऐतिहासिक  विकाश क्रम की अनवरत प्रक्रिया का अभिन्न अंग है   जिसको शिरोधार्य  कर भारत दुनिया में मानव अधिकार का , क्षेत्रीय आकन्क्षाओं  की   वकालत का  झंडावरदार है .  हमें यह कतई  नहीं भूलना चाहिए की ये भारतीय वांग्मय के शब्द है;-

             सर्वे भवन्तु सुखिनः ...सर्वे सन्तु निरामया ...
   केवल बहुसंख्यक या बहुमत ही शाशन करे ये भारतीय जन-मानस  और भारतीय संविधान दोनों को ही पसंद  नहीं . भारत के प्रतेक नागरिक  को  विना भेदभाव और क्षेत्र भाषा धर्म जाती से परे  अवसरों की समानता के पवित्र संवैधानिक आचरण में निरुपित किया गया है .अतः गठबंधन की राजनीती हो या एकल -द्वीपक्षीय राजनैतिक अवस्था हो देश की जनता अपने हितों की हिफाजत करना सीख चुकी है . जहाँ तक सपा- बसपा  द्रुमुक या अन्य क्षेत्रीय दलों की ब्लेक मेलिंग या सीबी आई की गिरफ्त का सवाल है तो    इसका      जबाब इस देश  के   बैबिध्यता पूर्ण - सामाजिक -आर्थिक- सांस्कृतिक-साम्प्रदायिक - भाषाई और क्षेत्रीयता  की मिलावट से बने भूसे के ढेर में  ढूँढना होगा। देश की जनता को कम से कम पांच साल में एक बार -सिर्फ एक बार अपनी  देशभक्ति  और विवेकशीलता का परिचय तो देना ही चाहिए और सारे के सारे कुकुरमुत्ता दलों का सूपड़ा साफ़ करते हुए सिर्फ - कांग्रेस , भाजपा या वामपंथ में से किसी एक जिम्मेदार राष्ट्रीय दल को  'गुजारे लायक' बहुमत  अवश्य देना चाहिए . जनता  द्वारा विपक्ष का चयन भी उतना ही  जिम्मेदारी और विवेकशीलता से होना चाहिए की पक्ष-विपक्ष के सारे अपराधी,हत्यारे,बलात्कारी,सत्ता के दलाल और पूंजीपतियों  के एजेंट  तो लोक सभा का चुनाव हारे किन्तु जो ईमानदार , न बिकने वाला ,नीतिवान , धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद  में आश्था वाला हो वो अवश्य लोक सभा में जीत कर पहुंचे .  इतना तो देश की आवाम से अपेक्षा की ही जा सकती है .बाबा रामदेव , अन्ना हजारे,केजरीवाल,काटजू,किरण वेदी ,और तमाम गैर  राजनैतिक  लोग  बजाय  सत्ता  और राजनीती को गली बकने के देश की आवाम [वोटर्स] को जागृत कर सकें तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए उनका अमूल्य योगदान होगा .
                                                        क्षेत्रीयता वाद तब तक बुरा नहीं जब तक वह  संप्रभु राष्ट्र की अखंडता को   नुक्सान नहीं पहुंचाता बल्कि स्थानीय  स्तर  पर क्षेत्रीय पार्टियां उनके स्थानिक सरोकारों को राष्ट्र के सकल सरोकारों से अपरूप कर सकती हैं . यह उनके   इमान दार नेत्रत्व से ही उम्मीद की जा सकती है . इस दौर में जो  अधिकांश क्षेत्रीय- भाषाई और मज़हबी  पार्टियां राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा के लिए कुख्यात हो चुकी हैं उन्हें नसीहत अवश्य दी जाए और अखिल भारतीय स्तर  के  दलों  को  ज्यादा  महत्व  दिया  जाए .    देश के बुद्धिजीवियों ,छात्रों,किसानो,नौजवानों, और सम्पूर्ण सर्वहारा वर्ग की यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि  उचित हस्तक्षेप करे .जरुरत हो तो खुल कर राजनीति  भी करे . राजनीती कोई अपावन  वस्तु  नहीं अपितु राष्ट्र के सञ्चालन की परम आवश्यकता है . गठबंधन राजनीती भी  इतनी अपवित्र नहीं की दुनिया के बदनाम फासिस्टों,तानाशाहों और धर्म आधारित कट्टरवादियों के सामने सीना तान के न चल सके . गठबंधन धर्म और तत्सम्बन्धी राजनीती  के भारतीय जनक कामरेड ज्योति वसु थे .  सबसे पहले उन्होंने ही 'कामन मिनिमाम प्रोग्राम ' का कांसेप्ट गठबंधन के दलों को एकजुट करने बाबत दिया था . बाद में लगभग सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने ज्योति वसु की नक़ल की . उन्होंने ही  उन्नीस सौ सडसठ में वाम मोर्चा  बना कर बंगाल की महा बदनाम सिद्धार्थ शंकर रे सरकार को उखाड़ फेंका था . बाद में इंदिरा कांग्रेस ने सत्तर के दशक में भाकपा को  , जनसंघ ने हिन्दू महा सभा को  ,जयप्रकाश ने समाजवादियों को  ,वी पी सिंह ने जन-मोर्चा को  , चन्द्र शेखर ने  जनता पार्टी को , गुजराल - देवेगौडा ने  संयुक्त मोर्चे को अटल बिहारी वाजपेई ने  एन डी ऐ  को इसी लाइन पर देश की सत्ता के काबिल बनाने का प्रयास किया और ये वर्तमान की यु पीए सरकार को  सोनिया गाँधी ने गठबंधन  से चलाकर  कोई गुनाह  तो नहीं किया .  जब खंडित जनादेश हो तो इसके अलावा विकल्प ही क्या रह जाता है .  यु पी ऐ प्रथम से ये यूपीए द्वतीय ज़रा ज्यादा ही बदनाम हो चली है .
                      जबकि यु पी ए  द्वतीय में सभी अलायन्स पार्टनर्स सत्ता में साझीदार हैं  या थे और अपने-अप ने क्षेत्रीय अजेंडे को लेकर  {जो की 'भारत राष्ट्र' के एजेंडे से मेल नहीं खाते }  निरतर आंतरिक सत्ता संघर्ष में व्यस्त   रहते हुए  इस वर्तमान सरकार के प्रमुख  घटक   दल -कांग्रेस को पूर्ण  रूपेण  'राज्य-सञ्चालन'  के  अधिकार  से  महरूम किये हुए हैं . सत्र साल बाद कोई कांग्रेसी रेल मंत्री बजट पेश कर पाया है यह गठबंधन राजनीति  की ही बलिहारी है . देश में केंद्र -राज्यों के और आपस में राज्यों के भी कई विवाद तब भी पेंडिंग थे जब केंद्र में किसी एक दल की ही  तूती  बोला करती थी और अब भी वे पुराने मुद्दे यथावत हैं जबकि केंद्र और राज्य दोनों   स्तरों  अपर आजकल गठबंधन सरकारें सत्तासीन  हैं .अर्थात देश के विकाश और अमन चेन के लिए' गठबंधन'  या एक्चाल्कानुवार्तित्व में से कोई भी  सिद्धांत अपावन नहीं हैं . वशर्ते शशक  वर्ग की कतारों  में ईमान दारी ,उत्कृष्ट  इच्छा शक्ति   हो , अधुनातन  विज्ञान  सम्मत  विजन हो  तो चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय  या गठबंधन  कोई भी इस लोक तंत्र में अवांछनीय या अप्रसांगिक नहीं है है . सभी विचारधाराओं का सभी मजहबों का,और सभी संस्कृतियों का सम्मान करना हम भारतीय को आता है . माओ जे दोंग ने कहा था ;-

  "  बिल्ली काली हो या सफ़ेद , यदि चूहे मारकर खा जाए तो काम की है वरना बेकार है…"
    श्रीराम तिवारी
                                                

रविवार, 24 मार्च 2013

हिन्दी क्षेत्र की चुनोतियाँ ओर उसके अददतन विमर्श



         



     डिजिटल नेटवर्क ,इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इन्टरनेट,ब्राड-बेंड ,सोशल-मीडिया,प्रिंट-श्रव्य-दृश्य तमाम
       तरह के परम्परागत और अधुनातन संप्रेष्य माध्यमों  के पुरजोर दोहन के वावजूद वैश्विक क्षितिज
       पर भारतीय जनता का बहुत बड़ा हिस्सा-जिसे  जन-साधारण या आम आदमी  भी कहते हैं ,अपने हिस्से के -जंगल-जमीन-और  आसमान से इस 2 1  वीं शताब्दी में भी  महरूम है. साहित्यिक परिद्रश्य में भी उसे हासिये पर धकेल दिया गया है.  बकौल डॉ रामविलाश शर्मा - 'हिंदी जाति'  के  दमन-शोषण-उत्पीडन  के कारक उसकी सामंत युगीन मानसिकता और नव्य -आर्थिक  उदारीकरण के बीजक में मौजूद हैं .....!
    
                                                   हो सकता है की  कुछ क्षेत्रीय भाषाओँ के उदयगान में आम आदमी और उसके  सामाजिक-राजनैतिक,आर्थिक और साहित्यिक सरोकार परवान चढ़े हों किन्तु हिंदी क्षेत्र या यों कहें की
 "हिंदी-भारत" में तो न केवल आम आदमी बल्कि तथाकथित 'खास' और  सभ्रांत लोक अर्थात ' भद्रलोकीय' जन-मानंस भी  अपने आपको  इस २ १  वीं  शताब्दी के दूसरे  दशक के  लागू होने तक -प्रतिबिंबित नहीं कर पाया है.
   इस सिलसिले में मैं अपना निजी अनुभव साझा करना  उचित समझता हूँ :-
                            
        एक राष्ट्रीय 'श्रम संगठन' को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के साथ मिलकर   पूरे राष्ट्र के कोने-कोने में
    बाकायदा अपनी वैचारिक शिद्दत के साथ स्थापित कराने में मेरा कुछ साहित्यिक किस्म के लोगों से भी  मिलना -जुलना होता रहा  है  .सांगठनिक सम्मेलनों -सेमिनारों अथवा अधिवेशनों  में अपनी विभागीय और पूर्व घोषित कार्यसूची के आलावा 'भाषा-साहित्य-संगीत और कला' के लिए भी  हमारे आयोजक  बहुत गंभीर और उत्साही तो होते ही थे, वे यह प्राणपन से यह सावित करने में भी  जुट जाते थे कि यदि मुंबई वालों ने इतना किया ,तो हम चेन्नई वाले उनसे कम नहीं ....और कोलकाता  वाले भी  उनसे कम नहीं ...और लुधियाना वाले उनसे ज्यादा साहित्यिक -सांस्कृतिक हैं  तो इंदौर वाले या लखनऊ वाले बेंगलुरु से कम नहीं। लुब्बो-लुआब ये की कोई किसी से कम  सुसंस्कृत नहीं दिखना चाहता था .इस दीर्घकालीन देशाटन के दौरान मैंने  अनुभव किया कि  हमारी तथाकथित "राष्ट्रभाषा-इन वेटिंग"  हिंदी सबसे निचले और दयनीय पायदान पर  सहमी हुई सी बैठी  हुई   है .उत्तरप्रदेश,बिहार,राजस्थान,मध्यप्रदेश,दिल्ली,हिमाचल,छ्ग़. उत्तराखंड,झारखंड में पूर्णतः और कमोवेश   लगभग पूरे भारतीय  उपमहादीप में  बोली-समझी जाने वाली 'राजभाषा' हिंदी एक क्रीत  दासी के मानिंद अपनों के ही द्वारा बहिष्कृत- तिरष्कृत  होकर ' हिंदी  जाति "  को  वैश्विक स्तर  पर श्रीहीन करती प्रतीत हो रही है . हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाषाई और साहित्यिक सृजन यथेष्ट है किन्तु जन-मानस  के सरोकारों वाला साहित्य बहुत कम है. कुछेक जनवादी-प्रगतिशील पत्र -पत्रिकाएँ  जो स्थापित वैचारिक केन्द्रों से  घाटा उठाकर निकलतीं  हैं  वे भले ही वैज्ञानिक कसौटी पर  खरी उतरती  हों   और देश की आवाम के हितों की चिंता करती हैं किन्तु उन्हें भी हिन्दी क्षेत्र की विराट आवादी तक  उनके ईमानदार प्रकाशकों  की आर्थिक मजबूरियों  या अनैतिक वित्त पोषण के अस्वीकार्य   के कारण ,सर्वत्र  पहुंचा पाना असंभव होने से इस क्षेत्र में आम आदमी की वैचारिक -सामाजिक-राजनैतिक-अंतर्राष्ट्रीय-साहित्यिक समझ का नितांत आभाव  बना हुआ है.
देश के  चंद मुठ्ठी भर संगठित क्षेत्र के कामगार अवश्य अपने-अपने जन-संगठनों के मासिक-त्रिमासिक पत्र -पत्रिकाओं को उनके प्रगतिशील और  संघर्ष कारी तेवर के साथ प्रकाशित करते हुए परम्परों के निर्वहन में साझीदार बने हुए हैं . दुर्भाग्य से देश की आवादी का  विराट अर्ध-निरक्षर- असंगठित   हिस्सा ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र"भारतीय-गणतन्त्र " के नीति-नियामक -नियंताओं का चयन करता है और आज़ादी के ६६  साल   बाद भी  अपनी बदहाली पर उन्हें ही रात-दिन कोसता रहता है जिन्हें की वो हर पांच साल में  खुद चुनता  रहता है.  इसी में वो लोग हैं जो गाँव में 2 2  रुपया और शहर में 3 2  रुपया रोज प् जाएँ तो गरीब नहीं कह्लाएंगे ? इनको सत्यजित रे  आजीवन फिल्माते रहे,इन पर तमाम मिशनरीज ऑफ़  चेरेटीज़  ने आंसू बहाए, इन पर कवियों ने गीत लिखे, इन पर शायरों ने शायरी की और इन पर 'स्लिम डॉग  मिलियेनर्स ' बनी  इन पर देश  की संसद में क़ानून बने  कुछ मनरेगा  और खाद्यान्न सुरक्षा क़ानून बनाने से राहत की उम्मीद भी बनी किन्तु 'महाभ्रष्ट व्यवस्था' ने आम आदमी को रहत दने के बजाय  महंगाई नामक नागपाश में बाँध दिया ओर उधर नव्य -उदारवादियों के झांसे में आकर साहित्य के ठेठ देशी  लंबरदारों ने आम आदमी को साहित्य के एरिना से  ही  बाहर कर दिया . इस मेहनतकश वर्ग को जाति .धर्म,खाप,और क्षेत्रीय राजनैतिक सांडों  का रातिब बना डाला .  इस प्रतिगामी दौर में भी देश के प्रगतिशील और वामपंथी  साहित्य सर्जकों ने   जन-सरोकारों के इस विमर्श  को जिन्दा रखा . हिंदी साहित्य के लिए प्रगतिशील विरादरी में हमेशा  सम्मान का भाव विराजित रहा है .
               इसका सबसे बेहतरीन प्रमाण  ये है की  जन- आकांक्षी  क्षेत्रीय भाषा साहित्य में केरल प्रथम पायदान पर है.  वहां घर-घर,गाँव-गाँव,गली-गली,न केवल  मलयालम अपितु अंग्रेजी-संस्कृत और दीगर देशी-विदेशी भाषाओँ का प्रगतिशील साहित्य  -मासिक-पाक्षिक-साप्ताहिक-दैनिक और "सर्वकालिक-जन-साहित्य'  उपलब्ध है. लगभग सभी साक्षर हैं और सभी की राजनैतिक -सामाजिक चेतना अखिल भारतीय पैमाने पर क्रमोन्नत है.  वहाँ हमेशा हिंदी सीखने -सिखाने और अखिल भारतीय सेवाओं में   अपने लिए स्थान प्राप्त करने की सदाशयता विद्द्य्मान रही है .
               निसंदेह ई .एम.एस. नम्बूदरीपाद से लेकर बी एस अचुतानंदन तक के  साठ  सालाना  प्रगतिशील  साहित्यिक अनुशीलन का ये प्रतिफल है और भले ही राजनैतिक हेर-फेर में सत्ता कभी वामपंथ के पास तो कभी कांग्रेस के पास हुआ करती है किन्तु साहित्य के जन-सरोकार हर हाल में विमर्श के केंद्र में ही हुआ करते हैं . लगभग यही स्थिति पश्चिम बंगाल की है जहां पर साहित्य -संगीत-कला को 'इंसानियत' के लिए दशकों पहले परिभाषित किया जा  चुका  है और जहां पर 'कला-कला  के लिए' कहने  वाला  अजायबघर का या सामंत युग का प्राणी समझा जाता है.  कामरेड ज्योति वसु,बुद्धदेव भट्टाचार्य और गुरुदास दासगुप्ता  इत्यादि ने  न केवल  राजनैतिक मोर्चे पर अपितु साहित्य और समाज की नव-संरचना को नै उचाइयां प्रदान की थी . वर्तमान में  भले ही प्रगतिशील वाम मोर्चे को एक 'ब्रेक' लगा हो किन्तु प्रगतिशील - धर्मनिरपेक्ष -वर्गविहीन  समाज की  अवधारण  से  लेस जनवादी मूल्यों, साहित्यिक सरोकारों में बँगला साहित्य अभी भी भारत में बेजोड़ है. त्रिपुरा में भी प्रोग्रेशिव साहित्य प्रचुर मात्रा में प्रकाशित हो रहा है और  वहां  के आम आदमी और आदिवासी के बीच का  फासला खत्म होने को है. असमानता और शोषण से विमुक्ति के साधन  का दूसरा नाम वहाँ 'साहित्य' ही है भले ही वो सिर्फ बांगला ही क्यों ना हो?
                             महाराष्ट्र,गुजरात,तमिलनाड, कर्नाटक,पंजाब  में भी अपनी-अपनी  क्षेत्रीय भाषाओँ के परचम लहरा रहे हैं,भले ही इन प्रान्तों में क्षेत्रीयतावादी और कट्टरतावादी  विचारधाराएँ  परवान चढ़ रहीं है किन्तु वे अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाओं  को राष्ट्रीय परिदृश्य में सामंजस्य बिठाकर कोई न कोई विवेकपूर्ण राह अवश्य निकाल  सकते हैं बशर्ते क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के मद्देनज़र महज़ वोट की राजनीती से साहित्यि को दूर  रखा जाए . बहरहाल यहाँ मेरा कथन यह है कि  इन क्षेत्रीय भाषा विमर्शों के सापेक्ष हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाषाई और साहित्यिक सरोकार न केवल दयनीय हैं अपितु वेहद शर्मनाक   और चिंतनीय भी हैं .  जिसे आप असली भारत -ठेठ भारत भी कह सकते है।  हिंदी भाषी पाठकों  की संख्या महज १ ० % है जबकि हिंदी  क्षेत्र की जन् संख्या ८ 0  करोड़ है . यही एक खतरनाक फेक्टर है जो ' हिंदी जाति ' को वैश्विक फलक पर सम्मान नहीं दिला पा रहा है . सिर्फ पाठकों की कमी का  सवाल नहीं तदनुरूप उत्क्रष्ट कोटि के   हिंदी -साहित्य सर्जन  की   कमी भी एक अहम् प्रश्न है .
                        अव्वल तो इस  हिंदी क्षेत्रों  की 7 0 % आबादी गाव् -देहात में -अति पिछड़े क्षेत्रों में वैसे ही उत्कृष्ट शिक्षा से और  अधुनातन वैश्विक मानको की पकड़  से कोसों दूर है,  दूसरी बात ये कि  महज अखवार भी किसी गाँव में पहुँच गया  तो कोई भी पढने वाला नहीं या किसी को अपनी खेती-किसानी,हल-बेल से फुर्सत नहीं या  कि  देश -दुनिया के  नक्से में अपनी स्थिति चिन्हित कर सके वो लियाकत नहीं।  डिजिटल नेटवर्किंग,इन्टरनेट या सोशल नेट्वोर्किंग के लिए 'दिल्ली इतनी दूर है' कि  पीने के पानी के लाले पड़े हैं तो बिजली महीने में एक -दो बार ही आती है . हिंदी क्षेत्र की इस आबादी को आप  केवल वही सर्वनाम दे सकते हैं जो जस्टिस काटजू ने कभी [नब्बे प्रतिशत मूर्ख] प्रयोग किया था .  शेष 3 0 % आबादी में से 1 0 % हिस्सा वो है जिसके सरोकार वर्तमान युगीन वैश्विक-उदारीकरण -भूमंडलीकरण और मुनाफाखोरी से है ,उसके सरोकारों से आम आम आदमी अर्थात मेहनतकश जनता के सरोकारों का टकराना स्वभाविक है.  इस वर्ग का साहित्यिक विमर्श और रुचियाँ 'कला-कला के लिए' से अभिप्रेरित हुआ करती है  अतेव इस सभ्रांत लोक का साहित्यिक स्वाद वाल स्ट्रीट  के जायके से मेल  खाता  है   ,इस वर्ग का शब्द कोष-शेयर बाज़ार,मंदी,रेपो-रेट ,वायदा बाज़ार, से शुरू होकर नितांत निजी  स्व्राथों के   र्शुभ -लाभ  की देहलीज पर समाप्त होता है. यह प्रभु वर्ग देश के हितों को  दाँव  पर लगा सकता है, चारा  ,2 -G  ,स्पेक्ट्रम,बोफोर्स,सुखोई,हेलीकाप्टर, सब कुछ खा  सकता है,  गरीबों की जमीने हड़प सकता है,घटिया पुल , घटिया  सड़कें और घटिया समाज के निर्माण में सहभागी हुआ करता है .  मनरेगा   का पैसा खा सकता है . सम्पूर्ण  भ्रष्ट व्यवस्था के संचालन में बेइमान ब्यूरोक्रेट्स नेता और दलालों की तिकड़ी का जून्टा यह वर्ग अपने लिए सारा का सारा आसमान और धरती सुरक्षित चाहता है .  इस वर्ग को ' भूस्वामी-सरमायेदारों का गठजोड़" भी कह सकते हैं . इस वर्ग का पतनशील अधोगामी  साहित्य 'सूरा-सुन्दरी-नव-वित्त पूंजी " के  विमर्श में   रचा  जाता है . मध्यप्रदेश में तो  एक मामूली पटवारी पर छापा पड़ने पर चार सौ करोड़ की सम्पत्ति निकलती है तो पता  लगता है  कि   वो कोई पत्रिका और वो भी हिंदी की कभी नहीं पड़ता वो सिर्फ  और सिर्फ रिश्वत के लिए पैदा हुआ है , पत्रिका खरीदने का तो सवाल ही नहीं . उसे अंग्रेजी नहीं आती  शायद हिंदी में कर्ता  और कर्म का फर्क भी वो नहीं जानता  किन्तु वह सिस्टम का प्रजा होकर इस राष्ट्र को घु न की तरह निगल रहा है . हर महकमें 9 5 % महाभ्रष्ट काबिज हैं . सबको मालूम है किन्तु जब कलम या तो मौन हो या बिक चुकी हो तो  इतिहास गवाह है न तो देश की सीमायें सुरक्षित रह सकेंगी और न मुंबई, हैदरावाद,गोधरा,कांड रुकेंगे . जब चीजें बेकाबू हो जाएँ कोई रह न सूझे तो वहाँ पर साहित्य अपनी क्रन्तिकारी भूमिका में अवतरित होकर राष्ट्र का उद्धार करता है .  इतिहास साक्षी है कि अपने-अपने दौर के युवाओं ने साहित्य के माध्यम से  इस तथ्य को जाना और देश समाज के लिए कुर्वानी दी . इस दौर के युवा क्या चाहते हैं वे ही तय करें .मार्ग दर्शन के लिए स्वामी विवेकानंद ,शहीद भगतसिंह  महात्मा गाँधी, कार्ल मार्क्स और लेनिन मौजूद हैं .
                 हिंदी क्षेत्र की शेष 2 0 % आबादी  जो की शहरी ओरे कस्वाई  युवाओं से संपृक्त है वो आधुनिकतम सूचना एवं संचार क्रांति का सम्बाहक तो है किन्तु उसे उस साहित्य का ककहरा भी नहीं मालूम जिससे फ्रांसीसी क्रांति  ,वोल्शैविक क्रांति,युरोपियन पुनर्जागरण,भारतीय स्वाधीनता -संग्राम , चायनीज क्रांति, और  विश्व सर्वहारा  का मेनिफेस्टो-"कम्मुनिस्ट घोषणा-पत्र "  तैयार  हुआ . जिस साहित्य को पढ़कर स्वामी विवेकानंद जी , खुदीराम बोस ,उधमसिंह,फेज़-अहमद फेज़, शहीद भगत सिंह विश्व वन्दनीय हुए , जिसे पढ़कर शहीद गणेश शंकर विद्द्यार्थी और लोकमान्य बाल गंगा धर तिलक  धन्य  हुए,  जिसे पढ़कर गाँधी जी,जयप्रकाश,जी नेहरु जी,डॉ राधा कृष्णन जी  तथा तमाम जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकार धन्य  हुए,  जिसे पढ़कर सारे संसार ने - भ्रातत्व-समानता-मुक्ति  का शंखनाद किया उस साहित्य से हिंदी क्षेत्र का  वर्तमान युवा वर्ग कोसों दूर है .  जबकि केरल, बंगाल त्रिपुरा, ही नहीं बल्कि देश के अंदरूनी भागों सुदूर छग और अंतरवर्ती उडीसा-झारखंड  में विश्वस्तरीय  साहित्य पढने वाले  हाजिर हैं ,हालांकि वे अपने इस ज्ञान  को गलत तरीके से परिभाषित कर भारत गणराज्य के खिलाफ  हथियार उठा लेते हैं , जो की भारतीय जमीनी सच्चाइयों से मेल नहीं खाता.  लेकिन यह कटु सत्य है कि  यह आधुनिकतम सुशिक्षित युवा वर्ग इलेक्ट्रोनिक मीडिया,डिजिटल नेटवर्क,जिएसेम ,इन्टरनेट  इत्यादि अधुनातन उन्नत सूचना एवं संचार प्रोउद्द्गिकि  का जानकार ओर  उपभोक्ता  होने के वावजूद  तब तलक  आधा अधुरा इंसान ही है  जब तक की वो अपने - सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक और राष्ट्रीय सरोकारों को को नहीं जान लेता और ये जानने के  लिए -प्रगतिशील- धर्मनिरपेक्ष और जनवादी साहित्य का अनुशीलन जरुरी है .युवा वर्ग को चाहिए कि  वे मुंशी प्रेमचंद को जाने, गजानंद माधव मुक्तिबोध को जाने,शहीद भगत सिंह को जाने,स्वामी विवेकनद को जाने ,दुष्यंत कुमार ,रामविलाश शर्मा ,राहुल साङ्क्र्त्यायन को जाने.  न केवल इन  चन्द प्रगतिशील  महापुरषों को बल्कि वे कबीर,नानक,तुलसी रहीम,रसखान ,निराला और निदा फाजली को भी जाने.  वे महात्मा भीमराव आंबेडकर को भी जाने, बी ती रणदिवे और ई एम् एस को भी जाने .   भारतीय वांग्मय में कहा है :-०
    
    "साहित्य संगीत कला विहीनः  मनुष्य साक्षात् पशु पुच्छ  विषाण  हीनः "
   
        जिन लोगों ने पहले वेद -उपनिषद-पुराण-बाइबिल-कुरआन पढ़ी है वे माल्थस-एडाम स्मिथ डार्विन , रूसो , बाल्तेयर ,तालस्ताय, मार्क्स लेनिन, गोर्की और स्टीफन हाकिंस को पढ़ें और जिन्होंने सिर्फ साइंस तकनोलाजी या आधुनिक ज्ञान-विज्ञान  या तकनीकी में महारत हासिल कर ली है वे उस  भारतीय वांग्मय का अनुशीलन करें जो भारतीयता की बुनियाद है।
                                                  
       हिंदी क्षेत्र के युवाओं को वेशक कतिपय एतिहासिक कारणों से न केवल आजीविका के लिए , न केवल जिजीविषा के लिए अपितु अपने श्रम के उचित मूल्य और मानव कृत  असमानता से जूझना पड़ता है.  उन्हें इस हीन ग्रुन्थी से उभरने में  केवल और केवल 'प्रगतिशील" साहित्य सृजन -अनुशीलन और तदनुरूप जन-संघर्षों में शिकत ही बढ़त  दिला  सकती है.  इस हेतु  हिंदी साहित्य -कविता,नाटक,निबन्ध,लघु-कथा,इतिव्र्त्तात्मक,आलेख,और रिपोर्ताज इत्यादि की महती उपलब्धता,तथा  साहित्यिक विमर्श के उद्देश्य  से  किये जाने वाले उपक्रम स्तुत्य है।
                                                
       स्थापित पत्र -पत्रिकाओं में से आज  अधिकांस वे ही जीवित हैं जिनके सरोकार साहित्य के माध्यम से जन-हित- कारी अर्थात देशभक्तिपूर्ण थे. हंस,कादम्बनी  , वीणा और देशाभिमानी जैसी पत्रिकाओं के कलेवर कितने ही बदरंग हों किन्तु उन्होंने  अपनी 'अंतर्वस्तु' को सहेज रखा था इसलिए वे आज भी न केवल जीवित हैं बल्कि प्रगतिशील साहित्य में शुमार है। हिंदी क्षेत्र के लिए खुश खबर है  कि  नितांत नूतन प्रयोग करते हुए  मीडिया  और ज्ञान-विज्ञान में दक्ष कुछ  भारतीय युवा  नए प्रकाशनों को लेकर गंभीर हैं .इनमे "समृद्ध जीवन परिवार " की  पत्रिका 'लाइव इंडिया'प्रमुख है जिसके सी एम् डी -श्री महेश मोतेवार जी है  और  प्रधान संपादक  डॉ  प्रवीण  तिवारी हैं . जो की  "लाइव इंडिया" न्यूज़ चेनल के एग्जीक्यूटिव    डायरेक्टर  भी है। पत्रिका का कार्य क्षेत्र पूरा भारत है, यह  -1 , मंदिर मार्ग  नै दिल्ली से निकल रही है  उसमें कुछ युवा भारतीय एन आर आई वैज्ञानिकों  के अलावा देश-विदेश के श्रेष्ठतम  विद्वान  जुड़ रहे हैं . इस पत्रिका ने आउट-लुक और इंडिया टुडे की  वानगी  से भी आगे का सफरनामा शुरू किया है . विगत दिनों दिल्ली में इसके विमोचन  के शुभ अवसर पर सभी राजनैतिक दलों के दिग्गज नेता, मीडिया पर्सोनालिटी और जस्टिस काटजू इत्यादि उपस्थित थे .
                                  एक और उल्लेखनीय पत्रिका "फालो अप "  भी इसी तरह के तेज तर्राट तेवर के साथ  इंदौर  से  प्रकाशित होने लगी है। इसके एडिटर इन चीफ श्री श्री वर्धन त्रिवेदी हैं जो की जाने-माने सनसनी स्टार हैं। इस पत्रिका के एग्जीक्यूटिव एडिटर  कुंवर पुष्पेन्द्रसिंह जी चौहान और असोसिएट  एडिटर अमित तिवारी  हैं . इन दोनों मासिक पत्रिकाओं ने न केवल साहित्य बल्कि समाज के हर क्षेत्र में हल चल पैदा करने का शानदार आगाज किया है .  आशा करता हूँ की जनता के सवालों को, देश के सम्मुख उपस्थित  चुनौतियों को और 'आम आदमी ' की अपेक्षाओं को देश और दुनिया के सामने पेश करने की क्षमता  इन नए प्रकाशनों में अवश्य प्रतिध्वनित होगी .  हिंदी  और  हिन्दुस्तान की सेवा में जुटे इन युवाओं को कोटिशः शुभाशीष ....!
                                                श्रीराम तिवारी ......
                                                 
                                       अध्यक्ष -जन-काव्य-  भारती ...इंदौर [म.प्र]
                    
                                        




                                               

       


                                                                              




    

   

मंगलवार, 19 मार्च 2013

kshetreeyta ki bheer....[kavita]

  

     अखिल भारतीय  फलक पर ,  क्षेत्रीय दलों की भीर .

     मात्र बिहार के नाम पर,नितीश हुए अधीर ..



   निशि -वासर  मोदी जपें, म्हारो देश गुजरात .

   तमिल अस्मिता के लिए,करूणानिधि कुख्यात ..


  कांग्रेस बसपा- सपा,   नूरा  कुश्ती -जान .

  एन  डी ऐ की   फूट  को ,  जाने सकल जहान  ..



   यु पी ऐ  प्रवक्ता, बहुमत रहे बताय .

   बी जे पी के भाग से  , छींका  टूट  न पाय ..



        श्रीराम तिवारी 

karunaanidhi kyon roye ?




      पहले द्रुमुक -मुरासोली -दयानिधि- कावेरी और बाद में,

          ए  राजा ने भृष्टाचार के बीज बोये .

     जब मौका मिला  तो  जय् ललिता की सामंतशाही-

      ऐयाशी  को लांघकर सत्ता शिखर पर जाकर सोये ..

     अब  श्रीलंकाई तमिलों  पर सिंहली अत्याचारों  के बहाने,

       कुनवे  को बचाने के अपने  सपने संजोये .

      अब  संयुक राष्ट्र मानव अधिकार द्वारा निंदा प्रस्ताव पर,

        मगरमच्छ के आंसू    करुणा  करके करूणानिधि रोये ..



                         श्रीराम तिवारी


    

मंगलवार, 12 मार्च 2013

हमारी पुज्य माता जी श्रीमती राजमती तिवारी का लगभग ९५ वर्ष की दीर्घ आयु में ११ मार्च २०१३ को निधन हो गया है वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गई है...  श्रीराम तिवारी एवं शोकाकुल परिवार.