मानव जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान राजनीति का है। दूसरा नंबर आर्थिक ,सामाजिक ,तीसरा नंबर साहित्यिक, सांस्कृतिक और चौथा तथा अंतिम स्थान धर्म और अध्यात्म का है। हम देखते हैं कि राजनैतिक विमर्श को लेकर सोशलमीडिया पटा पडा़ है। जबकि प्रगतिशील और विज्ञानवाद के प्रभाव में धर्म अध्यात्म पर चर्चा करना हेयदृष्टि से देखा जाता है। इसलिए मैने तय किया है कि श्रद्धालजनों के ज्ञानवर्धन हेतु प्रत्येक 10 पोस्ट में से एक पोस्ट धर्म अध्यात्म पर प्रस्तुत होगी।
"यदि आपके भीतर ईश्वर होने का सहज भाव है ...तो आप सकल ब्रह्मांड के स्वामित्व को हर समय धारण किए रहते हो...ऐसी अवस्था में आप के पास पुण्य या पाप करने की कोई वज़ह ही नहीं बचती..आप बस वही करते हैं जो सृष्टि के परिचालन को जरूरी है...बहुत से उदाहरण हैं जहां खुद को ईश्वर या उसका प्रतिनिधि कहने या घोषित करने वाले पुण्य के साथ-साथ पाप कर्म में भी लिप्त हुए...उसका एक ही कारण है कि वे अपने ईश्वरत्व को इंसानी धारणाओं..इच्छाओं और स्मृतियों से परे नहीं ले जा सके...उन्होंने अनुयायियों की भीड़..भव्य आश्रमों...अपार संसाधनों और अपने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क को ही अपने ईश्वर होने का आधार बना लिया...इस आधार को धराशायी होना ही था क्योंकि मात्र धरती के सूक्ष्म संसाधनों को अपनी सिद्धि मानकर आप अनंत ब्रह्मांड के स्वामित्व का अनुभव और बोध कैसे कर सकते हैं...
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