बुधवार, 12 अगस्त 2026

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत!

 उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत!

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया !
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति !
(कठोपनिषद)
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