UGC पर *गुस्सा जायज है*
आज कल्याणजी मिलते ही धारा प्रवाह बोलने लगे।
मौजूदा स्थिति पर कटाक्ष करते हुए,उन्होंने कहा,आज तो गुलशन को बाग़वान ही उजाड़ रहा है।बहुत ही आवेश में आकार वे *बाल कवि बैरागीजी* की कविता की चुनिंदा पंक्तियां सुनने लगे।
"*उन भंँवरों के पंख नोच लो, जिनने बाग उजाड़े हों*
*उस माली को माफी मत दो, जिसने गंध चुराई हो*
*जिसके होते हर क्यारी में नागफनी उग आई हो*
*माली को परखा जाता है, बेमौसम पतझारों में*"
मैने कल्याण जी से कहा,आवेश में मत आइए,क्रोध सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है।उन्होंने कहा अब शांत बैठने का समय नहीं हैं। इसका अहम कारण बयां होता है, शायर *अफ़ज़ल मिनहास* रचित इस शेर में है।
"*जिन पत्थरों को हमने अता की थीं धड़कने*
*उन को जबां मिली तो हमीं पे बरस पड़े*"
अपनी बात को जारी रखते हुए कल्याण जी ने कहा,
"काल" ने अमृत को गरल में बदल दिया है।"
वक्तव्य को अनवरत रखते हुए उनको शायर *दुष्यंत कुमार* का यह शेर याद आया।
"*मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ*
*मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं*"
तमाशबीन, कहने का उनका आशय लापरवाह होने से है।इस मुद्दे पर व्यंग्य करते हुए, कल्याण जी ने शायर *अकबर इलाहाबादी* का शेर सुनाया।
"*क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ*
*रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ*"
मैने उनसे कहा :-आपके दर्द को हम बख़ूबी जानते हैं।आपके वक्तव्य से सभी भली भांति परिचित हैं। शांत हो जाइए। वे और ज्यादा आवेश में आकर बोले:-
दिल में फफोले पड़ गये, सीने के दाग से।
इस घर को आग लग गई घर के चिराग से।।
मैंने कहा :- फिर भी वोट आप भाजपा को ही देंगे!
है न!
गहरा उसास भरते हुए वे वोले:-
"और कर ही क्या सकते हैं,जो विपक्षी दल हैं उन्होंने तो देश के साथ गद्दारी की कसम खा रखी है। विपक्ष का नेता कट्टर सनातन विरोधी है, उसे कोई भी सच्चा सनातनी हिंदू सत्ता में हरगिज़ नहीं आने देगा
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