आपका ईश्वर होना एक परम वैज्ञानिक घटना है... विज्ञान की अभिकल्पना, प्रयोग, परीक्षण और निष्कर्ष इंसान के दिमाग में ही उत्पन्न होते हैं...पदार्थ,प्रयोगशाला और उपकरण केवल बाहरी साधन हैं जो दिमागी प्रक्रिया में सहयोग करते हैं... आप अपने दिमाग का जितना ब्रह्मांडीय विस्तार करेंगे... आप की वैज्ञानिकता उसी अनुपात में फैलती जायेगी... एक समय ऐसा आता है कि आपकी वैज्ञानिक अभिकल्पनाओं को पुष्ट करने वाले साधन भी सीमित हो जाते हैं क्योंकि इतनी विशाल प्रयोगशाला को बनाना भौतिक रूप से संभव नहीं होता... ऐसे समय में सम्पूर्ण सृष्टि आपकी प्रयोगशाला बन जाती है...
अब जरूरत होती है सिर्फ सार्वभौमिक नजरिए को बनाये रखने की... आप एक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक या किसी अन्य पहचान से जुड़े रहकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी कल्पना में नहीं समेट सकते... एक इंसान के रूप में आपका दिमाग यदि ब्रह्माण्ड से जुड़ी कल्पनाएं करता है तो उन कल्पनाओं के फलीभूत होने की संभावना शून्य है...इसके लिए जरुरी है कि आप अपने दिमाग को ईश्वरीय दिमाग में बदलें... तभी वो सूक्ष्म से लेकर विराट जगत की समस्त चेतनाओं और स्पंदनों को अनुभव कर पाता है... जब तक आप इंसान के रूप में विज्ञान का प्रयोग करेंगे... तब तक आपका विज्ञान बहुत सीमित और इंसानी स्वार्थ से प्रेरित रहेगा... ऐसी हालत में वो आपके सामने प्रतिक्षण नए नए दुश्मन पैदा करता रहेगा...
जब आप ईश्वर होते हैं तो आपका दिमाग सम्पूर्ण सृष्टि के साहचर्य ,संतुलन और समावेशन को ध्यान में रखकर कल्पना, विचार और प्रयोग -परीक्षण करता है...पदार्थ और ऊर्जा के हर कण की एक सहज चेतना है... भले ही वो अचल, अदृश्य या निष्क्रिय क्यों न हो... इंसान के रूप में विज्ञानी उस सहज चेतना के बारे में ही पता करने की कोशिश करते हैं... सबसे उन्नत और सुसज्जित प्रयोगशाला में एक पदार्थ के सूक्ष्म कण की सहज चेतना का आभास मात्र करने में बीसियों साल लग जाते हैं... फिर भी सहज चेतना की बजाय उस कण की प्रवृत्ति या कुछ गुणधर्म का ही पता चल पाता है ...इन्हीं गुणधर्मों के आधार पर इंसान कुछ नयी सुविधा पूर्ण तकनीक ईजाद कर लेते हैं... इंसानी विज्ञान की गति अगर इसी तरह जारी रही तो हजारों साल में मात्र चार छह सूक्ष्म कणों की सहज चेतना को अनुभव करने तक पहुंचा जा सकता है... हो सकता है इतने लंबे समय तक इंसान अपने जीवन की डोर को न खींच पायें...
दूसरा तरीका ध्यान का है... लेकिन ये ध्यान इंसान के रूप में नहीं ईश्वर के रूप में करना होगा... क्योंकि इंसानी पहचान के किसी भी दायरे में बंधकर आप कणों के साथ सहज संवाद नहीं कर सकते... इंसान के हित को ध्यान में रखकर किया जाने वाला ध्यान सिर्फ थोड़ा मानसिक और शारीरिक सुख दे सकता है... जीवन की समग्रता और मृत्यु की सूक्ष्मता को समझने के लिए आपको शून्य से शुरुआत करनी होगी... आपको अपने पहले स्पंदन तक जाना होगा ...जब आप दिमाग निर्मित होने से पहले जीवन की रुपरेखा बनाने में तल्लीन थे... आपके जेनेटिक कोड में जीवन के सारे साधन और सूत्र छिपे हैं... याद रखिए कि दिमाग के निर्माण से पहले आप एक सहज चेतना ही थे... सहज चेतना ही सहज चेतना को अनुभूत कर सकती है...अगर बहुत सारे वैज्ञानिक एक विशाल प्रयोगशाला में भारी संसाधन खर्च करके एक सूक्ष्म कण के बारे में 20 साल के बाद एक आधी अधूरी जानकारी हासिल करके इंसान की वैज्ञानिक प्रतिभा पर गर्व करते हैं... तो आप अपनी खुद की सहज चेतना तक पहुंचने में 4-6 साल का समय खर्च नहीं कर सकते...आपको विश्वास और धैर्य के साथ ये स्वीकार करना होगा कि ईश्वर के रूप में बिताए गये आपके चार छह साल विज्ञान को 100 गुना गति देंगे... आपके जीवन के लिए जरुरी सभी पदार्थ, सूक्ष्म जीव, हार्मोन, एंजाइम, अम्ल ,क्षार और ऊर्जा आपके शरीर में पहले से मौजूद है... आपको केवल एक समग्र चेतना के रूप में इसे लगातार रूपांतरित करना है... अगर आप इंसान के रूप में ध्यान के द्वारा ऐसा करेंगे तो आपको कुछ लाभ होंगे, कुछ नुकसान भी ...लेकिन अगर आप ईश्वर के रूप में ऐसा करते हैं तो आपका हित सृष्टि के हित में समायोजित हो जाएगा... आपका शरीर जब जब आपकी इंसानी धारणाओं और पहचान से मुक्त होकर एक सहज जीव के रूप में काम करता है ,तब वो जानता है कि वो ब्रह्माण्ड से क्या ले रहा है ,क्या दे रहा है... इंसान के रूप में आप यही काम स्वार्थ वश और चयनित तरीके से करते हैं... ईश्वर के रूप में आप यही कार्य सहज और साहचर्य भाव के साथ करते हैं... इसलिए ईश्वर होना कोई धार्मिक या आध्यात्मिक साधना या अनुष्ठान नहीं बल्कि विज्ञान की सार्वभौमिक माँग है... ध्यान को शरीर और मन के उपचार का साधन बनाने तक सीमित मत कीजिए... इसे ईश्वर की भूमिका निभाने का मजबूत जरिया बनाइये...
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