रविवार, 20 मार्च 2022

जाग मछन्दर गोरख आया


जब तक यूपी के चुनाव परिणाम नहीं आये, तब तक मैंने तहेदिल से चाहा था कि भले ही बदनाम कांग्रेस यूपी की सत्ता में आ जाए , भले ही भाजपा ही पुन: क्यों न सत्ता में आ जाए,किंतु जातिवादी सपा और बसपा का पटिया उलाल होना चाहिये! और तमन्ना पूरी हो गई ! जबतक जातिवादी नकली समाज वादी मैदान में रहेंगे, तब तक सर्वहारा वर्ग कन्फ्यूज होता रहेगा, लेकिन कट्टर पूँजीवाद और सर्वहारा वर्ग के बीच सीधे संघर्ष की संभावना जागेगी! ऐतिहासिक भौतिकवादी द्वंदात्मक सिद्धांत का यही निष्कर्ष है!
यदि मजदूर किसान चाहेंगे कि पूँजीवादी कुनबा कामयाब न हो, तो उन्हें चाहिये कि अपने बच्चों को किसी जातिवादी गुट या जाति आधारित राजनैतिक पार्टी से दूर रखें! और जनता के लिये संघर्ष करने वाले राष्ट्रीय दलों का साथ दें ! हालाँकि अभी तो यूपी में सब कुछ उलटा -पुल्टा हो गया है! शोषित पीड़ित वर्ग आपस में बुरी तरह बटा हुआ है! इसलिये एक भी वामपंथी विधायक यूपी विधान सभा के अंदर नही पहुंचा ! किसी ने ठीक ही कहा है 'हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता'
यूपी की जनता ने भरपल्ले से दो तिहाई बहुमत के साथ भाजपा को जिता दिया।ऐंसा लगा जैसे दिल के अरमाँ आंसुओं में बह गए ! पुरानी भदेस कहावत याद आ गयी -'कौओं के कोसने से ढोर नहीं मरते' ! अब यदि मोदी जी और भाजपा नेता किसी काले चोर को मुख्यमंत्री बनायें या किसी योगी को मुख्यमंत्री बनायें,बहुमत का सम्मान करें या मजाक उड़ाएं यह उनका आंतरिक मामला है। हमें तो गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपाई स्मरण रखना है की ''कोउ होय नृप हमें का हानी ,चेरी छोड़ होहिं का रानी ''!
मैं यूपी का मतदाता नहीं हूँ ,भाजपा समर्थक नहीं हूँ ,फिर भी यूपी की जनता के जनादेश का आदर करता हूँ !लेकिन भारतीय लोकतंत्र की हत्या होते नहीं देख सकता। पौने तीन सौ में से क्या एक भी भरोसेमंद भाजपाई विधायक नहीं है जो एक विवादास्पद योगी पर भरोसा किये जाने को मजबूर हैं? वह व्यक्ति 'योग्य' कैसे हो सकता है जिसे मजहबी उन्माद फैलाने के सिवाय कुछ आता ही नही! यू पी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला प्रदेश है,वहाँ की आम जनता को कम से कम इस व्यक्तिवादी अंधेरगर्दी पर अपना आक्रोश अवश्य व्यक्त करना चाहिये ! मोदीजी उनके सिपहसालार यूपी के नवनिर्वाचित 272 विधायकों में से किसी एक को भी मुख्यमंत्री लायक नही समझते तो यह यूपी की जनता के जनमत का अपमान है ! यदि जनता का कोई अपराध नहीं तो समस्त चुने गए विधायकों की अनदेखी क्यों ?
यदि विधायकों को उनकी काबिलियत न देखकर जातिगत आधार पर मंत्रिमंडल में समायोजित करके यूपी का मंत्रिमंडल बनता है, तो बसपा सपा और भाजपा में क्या फर्क रह जाएगा?
यूपी की जनता को और नव निर्वाचित विधायकों को भी गंभीरता से सोचना होगा कि मुख्यमंत्री के चुनाव में और सरकार के गठन में कहीं कोई चूक तो नहीं हुई ? कहीं लोकतंत्र का मजाक तो नहीं उड़ाया जा रहा है ?क्योंकि असली गोरखपंथी योगी सन्यास धारण कर घर-घर 'भवति भिक्षाम देहि'की अलख जगाता है !वह अपने आराध्य - महादेव शिवकी भांति 'अलख निरंजन' में नित्य लींन रहता है! वह सत्ताके लिए लोकतंत्र की उपासना नहीं करता!वह हिन्दू, मुस्लिम ,दलित, ब्राह्मण ,ठाकुर से भी परे होता है !क्या श्री आदित्यनाथ वाकई ऐसे ही सिद्ध योगी हैं ? यदि हाँ तो फिर उन्हें गोस्वामी तुलसीदास जी का यह आप्त वाक्य क्यों याद नहीं रहा कि- 'संतन्ह को का सीकरी सों का काम '?
मोदी जी ने स्वेच्छा से यदि आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाया है तब और अधिक चिंता की बात है क्योंकि यूपी विजय का श्रेय इन योगी जी को कदापि नहीं है। बल्कि मोदीजी अमित शाह के प्रयत्नों और सपा-बसपा के कुकर्मों के कारण यह विजय सम्भव हुई है। और यही कारण है कि जीते हुए विधायकों में से ही कोई एक नेता चुना जाना चाहिए था। लेकिन मोदीजी यदिकिसी मजबूरी में योगीको पुन: यूपीका सीएम बना रहे हैं,तो यह हिंदू समाज को जातियों में बाँटने और सिर फुटौवल को बयाँ करने के लिए काफी है!इससे यह सावित होता है कि यूपी में जीते हुए नेताओं पर मोदी जी का नियंत्रण नहीं है। जब अपनी पार्टी पर ही उनका नियंत्रण नहीं है, तो यूपी की जनता का उद्धार वे कैसे कर सकेंगे ?
यूपी चुनाव में सपा,वसपा तथा कांग्रेस की हार के बहाने पिछड़ावाद,दलितवाद और अल्पसन्ख्यकवाद के चुनावी सिद्धांत की बुरी तरह धुनाई हुई है। ऊपर से तुर्रा यह कि जले पर नमक छिड़कते हुए कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया है। लेकिन इस दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद से लड़ने का माद्दा केवल उसी में हो सकता है जो धर्मनिरपेक्षतावादी हो ,जो लोकतंत्रवादी हो ! असदुददीन ओवेसी या अखिलेश की औकात नहीं कि वे अपनी साम्प्रदायिक जातिवादी जुबान से योगी आदित्यनाथ या नरेद्र मोदी का सामना कर सकें ! क्योंकि नमक से नमक नहीं खाया जाता !
ईसा मसीह का बचन भी स्मरण रखें कि पापी को पत्थर वही मारे जिसके हाँथ पाप से अछूते हों !अखिलेश और आजमख़ाँ के खानदान को आइंदा अब अपनी भैंसों पर ध्यान देना चाहिए! क्योंकि यूपी पुलिस अब दूसरे काम पर लगाने वाली है। बुलडोजर कब कहाँ कहर बरपाता है,किसको पता?
असदुद्दीन ओवेसी को भी वोट कटवाकर भाजपा की मदद करने के बजा़य उन भटके हुए भारतीय युवाओं की फ़िक्र करनी चाहिए जो सीरिया-ईराक में आईएसआईएस की चपेट में आकर बर्बाद हो रहे हैं ! हिन्दु कौम से लड़ने की तो वे बात ही ना करें ! क्योंकि हिंदू तो सनातन से धर्मनिर्पेक्ष है! वैसे भी भारत की ७० % जनता धर्मनिरपेक्ष ही है! जिसमें हिन्दू,मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी शामिल हैं ! इस धर्मनिरपेक्ष जनता ने वक्त आने पर हर दौर में अपनी शानदार भूमिका अदा की है।
अभी यूपी चुनाव की बात कुछ जुदा है! वहां 40 सालसे जातिवाद और अल्पसंख्यकवाद का गठजोड़ हावी रहा!यूपी की प्रशासनिक मशीनरी में जातिवाद और पक्षपात की सड़ांध आ गई थी! इसलिए यूपी के प्रबुद्ध वोटर ने मजबूरी में योगी सरकार को पुन: एक अवसर और दे दिया!
लेकिन ध्यान रहे कि 'रहिमन हांडी काठ की चढ़े न दूजी बार !' वक्त आने पर भारत की जनता शहीद भगतसिंह के वोल्शेविक सिद्धांतों को जरूर अपनाएगी !
यूपी की राजनीति में आगामी दिनों में कुछ भी सामान्य नही रहने वाला !क्योंकी जो 4 0 साल से जीम रहे थे वे अब खाली बैठे हैं! चूंकि खाली दिमाग शैतान का घर होता है ,इसलिये बड़ी द्वंदात्मक स्थिति निर्मित होने वाली है !भाजपाको पुन: बहुमत मिलने और योगी आदित्यनाथ के सी एम बनने से धर्म -अध्यात्म की पूँछ परख बढ़ने की सम्भावना भले हो,किन्तु साम्प्रदायिक वैमनस्य नही बढ़ना चाहिये!
यह स्मरण रहे कि नाथपंथ आप्तवाक्य है-
" जाग मछन्दर गोरख आया " आइन्दा नया मंत्र यह हो सकता है -"
"जाग माफिया बुल्डोजर आया " !
श्रीराम तिवारी !

कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के मुद्दे...

 कश्मीर से लेकर गुजरात तक किसी भी सामूहिक हत्याकांड में न्याय में देरी उतनी ही अच्छी है, जितनी न्याय से इनकार। जानिए कि कैसे 4 लाख कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास (Rehabitation) के मुद्दे को घसीटा और विलंबित किया जाता है।विस्थापित भारतीयों की सम्मान सहित घर वापसी होनी ही चाहिए! ऐसी अनेक दबी फाईलो पर 8 साल से सो रही है मोदी सरकार !

👣👀🙏
Kashmiri opposition against giving townships to rehabilitate Kashmiri Pandits

ज़िन्दगी" बदलने के लिए लड़ना पड़ता है

 ज़िन्दगी" बदलने के लिए लड़ना पड़ता है!

और आसान करने के लिए समझना पड़ता है!
*वक़्त आपका है,चाहो तो सोना बना लो और*
*चाहो तो सोने में गुज़ार दो..*
*अगर कुछ अलग करना है तो भीड़ से हटकर चलो!*
*भीड़ साहस तो देती है पर पहचान छीन लेती है!*
*मंज़िल ना मिले तब तक हिम्मत मत हारो और ना ही ठहरो..*
*क्योंकि*
*पहाड़ से निकलने वाली नदियों ने आज०त तक रास्ते में किसी से नहीं पूछा कि...*
*"समन्दर कितना दूर है.*

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

हिजाब पहनने का दुराग्रह क्या?

 संविधान प्रदत्त अधिकारों में सभी कौमों की छात्राओं को समान अधिकार का एक अर्थ यह भी है कि वे सब तयशुदा गणवेश में स्कूल जाएं ! यदि गणवेश नही पहनेंगी तो स्कूल या शिक्षा संस्थान में नही ,बल्कि किसी मदरसे में जाकर पढ़ें! इंजीनियर डॉक्टर,प्रोफ्सर,कलैक्टर,वैज्ञानिक,पायलट

बनना है तो हिजाब या खिजाब का दुराग्रह बकवास है! स्कूली गणवेश पहनो ,मन लगाकर पढ़ो,अवसरों का लाभ उठाओ! स्कूल कालेज में राजनीति करने या ऊधम मचाने का विशेषाधिकार किसी को नही,!
वैसे भी समाज के हर नर नारी को हक है कि वो अपने मन माफिक कपड़े पहने,किंतु स्कूल,NCC,पुलिस,वकील डॉक्टर सबका अपना अपना वैश्विक गणवेश है! जब सारी दुनिया की मुस्लिम महिलाएं हिजाब को पीछे छोड़ चुकीं हैं,तब भारत में मुस्लिम लड़कियों को भड़काकर बाहरी ताकतें इस देश में उपद्रव मचा रही हैं!
वैसे भी भारत में कौन क्या पहिन रहा है,कोई रोक टोक नही है और न होना चाहिये! जिसको जो पहिनना है खूब पहनो, लेकिन जब स्कूल जाओ, लेडी डॉक्टर बनो, नर्सिंग स्टाफ बनो,प्रोफेसर बनो,इंजीनियर बनो,पायलट ऐयर होस्टेस बनो,तब हिजाब पहनने का दुराग्रह कोई करे, तो बड़ी मुश्किल होगी!

"द कश्मीर फाइल्स"

इन दिनों *द कश्मीर फॉइल्स * फिल्म की बड़ी चर्चा है! मैने तो फिल्म देखी नही और न ही देखने की हिम्मत है! क्योंकि प्रस्तुत फिल्म में जिन अमानवीय वीभत्स घटनाओं का चित्रण बताया जा रहा है,हम बुजुर्ग लोग उन सभी बर्बरताओं के स्वयं साक्षी हैं!
विगत एक हजार साल में बाह्य हमलावरों द्वारा करोड़ों कश्मीरी हिंदू बौद्ध मार डाले गए! जो जिंदा बच गये,उनका क्रूर धर्मांतरण किया जाता रहा है! बर्बर हिंस्र हमलावरों से आतंकित लाखों कश्मीरी (पंडित) बौद्ध भाई बहिन मारे गए! आजादी के बाद जो कश्मीर घाटी में केंद्र सरकार की ओर से कार्यरत थे, वे भी आतंकियों द्वारा किये गये अत्याचार से भागकर जम्मू में शरण लेने पर मजबूर हुए !
जो सक्षम थे, वे मुंबई,दिल्ली,शिमला और अन्य शहरों में संघर्ष करते हुए जैसे तैसे जीवन यापन करते रहे! जो कमजोर थे,वे अभागे नर नारी न तो अपनी इज्जत आबरू बचा सके ,न धन संपत्ति घर द्वार बचा सके ! और न अपनी जिंदगी बचा सके!
1980 के बाद से ही तमाम कश्मीरी पंडित या हिंदू कश्मीर में लुटते चले गये,बर्बाद कर दिये गये,लाखों मार दिये गये! यह अधम नर हत्याकांड किसी फिल्म में नही फिल्माया जा सकता,,*द कश्मीर फाइल्स* में यह सब दिखाया जाना संभव नही!
आजादी के बाद 1947 से 1980 तक भी कश्मीर में कभी शांति के कपोत उड़ते नही देखे गये! जो तस्वीर आज है,वो तब भी थी! इसके बावजूद बेगुनाह हिंदुओं के कत्लेआम पर जो लोग चुप रहे,आतंकियो के डर से,इन दिनों हिजाब जैसी नारी विरोधी अनावश्यक चीज पर छाती पीट रहे हैं! वो ही असल दोगले हैं,देशद्रोही हैं !
कश्मीर हो कैराना हो या बंगाल हर किस्म की दरिंदगी पर फिल्म बननी चाहिये!उस मुसलसल हैवानियत पर यदि कोई फिल्म बनती है,तो उस पर उसी को इतराज हो सकता है,जो हरामजादा उन मासूम बच्चियों युवतियों की सिसकियों,अहिंसक हिंदूओं पर हुए बर्बर अत्याचार का समर्थन करता है!यदि किसी कमीने को इन निर्शंस हत्याओं में कोई बुराई नही दिखती, तो उसे बारंबार धिक्कार है! धिक्कार है!
स्वयभू विद्वान वुद्धिजीवियों को चाहिये कि फिल्म *द कश्मीर फॉइल* का विरोध कतई न करें ! कम से कम देश में संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नीति निर्देशक सिद्धांतों का पालन करते हुए, मुंशी प्रेमचंद को याद करें:- बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे?
नोट:- मैने फिल्म कश्मीर फाईल्स नही देखी किंतु मित्र Sharad Ajmera जी नेअवश्य आब्जर्व किया है कि फिल्म के डाइरेक्टर ने फिल्म में ये बात छुपाई है कि जब कश्मीरी पंडितों का पलायन हो रहा था, तब केंद्र में बीजेपी समर्थित विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी! और तब कश्मीर में बरसों तक राष्ट्रपति शासन रहा था।

आज होलिका पूजन के बाद घर लौट रहा था तभी एक मित्र का फोन आया बोला:" भाईश्री जय भोलेनाथ.. आप आजकल "द कश्मीर फाइल्स" के जिस तरह प्रचार में लगे हुए हो, क्या आप इस्लाम को वाकई इतना बुरा मानते हो। इस्लाम तो एक धर्म है और आप कहते हो, कि कोई भी धर्म कभी बुरा नहीं होता..???" मैंने कहा:" बिल्कुल सही कहा आपने, कि कोई भी धर्म कभी बुरा नहीं होता पर उसे जबरन औरों पे थोपना या उन्हें मजबूर करना जरुर बुरा है। अब रही इस्लाम की तो, माई डीयर.. उसके कुछ मतावलंबियों द्वारा जैसा आजकल किया जा रहा है उसके लिए मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा, कि..👇😎


15 Commentsआज होलिका पूजन के बाद घर लौट रहा था तभी एक मित्र का फोन आया बोला:" भाईश्री जय भोलेनाथ.. आप आजकल "द कश्मीर फाइल्स" के जिस तरह प्रचार में लगे हुए हो, क्या आप इस्लाम को वाकई इतना बुरा मानते हो। इस्लाम तो एक धर्म है और आप कहते हो, कि कोई भी धर्म कभी बुरा नहीं होता..???" मैंने कहा:" बिल्कुल सही कहा आपने, कि कोई भी धर्म कभी बुरा नहीं होता पर उसे जबरन औरों पे थोपना या उन्हें मजबूर करना जरुर बुरा है। अब रही इस्लाम की तो, माई यर.. उसके कुछ मतावलंबियों द्वारा जैसा आजकल किया जा रहा है उसके लिए मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा, कि..

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"ढाई घण्टे में अपने बच्चो को इस्लाम सिखाने का सबसे सरल उपाय है, #द_कश्मीर_फाइल्स.." इस पर वो बोला:" यानी आप हिंदुओं को भड़काना चाहते हो, एक समुदाय के खिलाफ.." इस पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा:" देख भाई.. म्हारै विचार बँधे थे हाथ नहीं, उन्हें तो दफा 302 नहीं रोक पाई पर हमें धारा 370 रोक गई। बिल्कुल वैसे जैसे 1100- 11000 या जितने भी हिंदू मरे उनमें से वो किसी 1 नै बी ना मार पाए, हम साला संदूक तो उठा लेते हैं भागण कै ताँई पर कदै हथियार नीं ठातै अपने या अपनों के बचाव के लिए। बस.. याए असल मुसीबत है अर जिब तलक हम इसनै नहीं बदलेंगे, तब तक ईसी फाइल्स बणती रहवैंगी। प्रशासन हो या सरकार उड़ै ए झुकै जड़ै एका हो...समझा..." इतना सुनते ही उसनै अंटशंट बकते झकते हुए फोन काट दिया...
अब यदि आपने सारा वृत्तांत पढ़ लिया हो, तो कृपया बताएँ कि मैंने इसमें क्या और कितना गलत कहा...

यदि 'विजयपथ' इतना आसान है तो....

 प्रश्न:- यदि 'विजयपथ' इतना आसान है तो नरेद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते ?

उत्तर :- संघ परिवार और भाजपा की पुरजोर चेष्टा है कि एन-केन प्रकारेण केंद्र की सत्ता हासिल की जाए। कैसे भी जतन कर नरेद्र मोदी को प्रधान मंत्री बनाया जाए। और फिर *संघ का अजेंडा लागू किया जाए*!
यूपीए की गफलतों,नाकामियों और उससे जनता की नाराजी को वोटों की शक्ल में बदलकर जन -समर्थन अपनी ओर करने के विभिन्न क़दमों के बरक्स सेलिब्रटीज को ,कलाकारों को ,फ़िल्मी हस्तियों को, पत्रकारों को और रिटायर्ड अफसरों को तो भाजपा टिकट दे ही रही है,साथ ही दल बदलुओं -भ्रस्ट नेताओं को ,धनकुबेरों को और महाभ्रष्ट बाहुबलिओं को भी संसद में बिठाने का अवसर प्रदान कर रही है।
हालांकि ममता ,जय ललिता और 'आप' के तेवर भी कुछ ऐंसे ही हैं किन्तु इनकी कोई खास औकात नहीं है कि बिना भाजपा या बिना कांग्रेस के समर्थन के ये दुमछल्ले दल केंद्र की सत्ता का कोई कोना भी छू सकें।इन चिंदी चोरों को बजाजी का शौक भले ही चर्राया हो किन्तु ये सभी अगंभीर किस्म की राजनीति के खुरचन मात्र हैं ! इसीलिये मीडिया भी इन्हें कुछ खास तवज्जो नहीं दे रहा है ।
मीडिया के केंद्र में फिलहाल तो केवल मोदी सिरमौर हैं। विभिन्न सर्वे और सूचनाएँ बता रहीं हैं कि आगामी लोक सभा चुनाव के उपरान्त गठित होने जा रही १६ वीं लोक सभा में एनडीए का कुनबा बढ़ता जा रहा है। ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि आगामी केंद्र सरकार के गठन हेतु न केबल एनडीए को वांछित बहुमत हासिल होने जा रहा है बल्कि अकेले भाजपा ही 'सिंगल लार्जेस्ट पार्टी ' के रूप में २०० सीटों का आंकड़ा पार करने जा रही है। देश के प्रमुख शहरों के परम्परागत सटोरिये तो नरेद्र मोदी को १०० % भारत का भावी प्रधानमंत्री मान चुके हैं।हो सकता है आसन्न भविष्य में राजनैतिक सीनेरियो इससे कुछ अलग हो ! सम्भव है कि इतिहास इन सभी पूर्वानुमानों को २००४ की तरह ही गलत साबित कर दे! किन्तु अब गुंजाइश कम ही है। काश ऐंसा हो जाए कि एनडीए-यूपीए दोनों ही सत्ता से बाहर हो जाएँ ! काश यह सम्भव हो कि एंडीऐ की सरकार ही न बन पाये !यदि बन भी जाए तो कम से कम यही सम्भव हो कि 'नमो' पीएम न बन सकें! भले ही अटलनुमा कोई और चेहरा सामने आ जाए ! वास्तव में मोदी अब व्यक्ति नहीं रह गए हैं। वे उन तमाम विचारधाराओं के प्रतीक बन चुके हैं जो देश के मजदूरों - गरीबों ,किसानों और अल्पसंख्यकों के हितों से ऊपर,देश की गंगा जमुनी तहजीब से ऊपर ,देश के सार्वजनिक उपक्रमों से ऊपर,कार्पोरेट लाबी को , भृष्ट पूंजीपतियों को , सत्ता के दलालों को और देश की सम्पदा को लूटने वालों को वरीयता प्रदान करती है।
चूँकि गठबंधन की राजनीति का दौर है कुछ भी अप्रत्याशित सम्भव है। भले ही 'नमो ' देश के प्रधानमंत्री न बन पाएं, किन्तु यूपी में और खास तौर से काशी-बनारस में धर्मनिरपेक्ष दलों की वर्तमान दुर्दशा याने आपसी फूट बता रही है कि यदि मोदी 'वनारस' से लोक सभा का चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जीत १००% पक्की है। मोदी की यह जीत गुजरात से बाहर पहली होगी और यह बेशक कट्टर पूँजीवाद की जीत होगी ! मोदी की वनारस से जीत याने 'कट्टर साम्प्रदायिकता ' की जीत होगी ! मोदी की बनारस से जीत याने नाजीवाद की आग को हवा देना जैसा है। मोदी की वनारस से जीत याने भारत में 'फासिज्म' का उदय ! वनारस की, यूपी की और भारत की धर्मनिरपेक्ष - जनतांत्रिक ताकतें यदि एकजुट होकर मोदी को वनारस में जीतने से नहीं रोक सकतीं तो उनको प्रधानमंत्री बनने से भी नहीं रोक सकेंगीं ! मोदी यदि वनारस से संसद में जाते हैं तो इसके लिए न केवल यूपीए बनाम कांग्रेस जिम्मेदार होगी ,न केवल माफिया डॉन मुख्तार अंसारी जैसे तथाकथित मसलमानों के स्वयंभू ठेकेदार जिम्मेदार होंगे ,न केवल केजरीवाल जैसे ढपोरशंखी अराजक नेता जिम्मेदार होंगे ,न केवल मुरली मनोहर जोशी-लालकृष्ण आडवाणी-लालजी टण्डन और सुषमा स्वराज जैसे रणछोड़दास जिम्मेदार होंगे ,न केवल ममता -माँयावती-जयललिता जैसी अहंकारी नेत्रियां जिम्मेदार होंगी ,न केवल मुलायम,नीतीश नवीन और पासवान जैसे जातीयतावादी और फिरका परस्त - मौका परस्त जिम्मेदार होंगे - बल्कि वे राजनैतिक शक्तियां भी मोदी की जीत के लिए जिम्मेदार होंगी जिन्होंने तटस्थता का रुख अपनाया हुआ है। जिन्होंने अतीत में लगातार अल्पसंख्यकों का,दलितों का और पिछड़ों का भरपूर राजनैतिक दोहन किया है वे नेता और दल भी मोदी रुपी प्रचंड आंधी के आह्वान के लिए जिम्मेदार माने जायेंगे। अभी तक जो यूपीए और इन क्षेत्रीय दलों ने किया है वो सब मोदी की जीत का इंतजाम मात्र है।
अब यदि भाजपा या संघ परिवार भी 'हिन्दुत्व 'और विकाश के मुद्दे पर यही करता है और मोदी को वनारस से जिता ले जाता है तो इसमें क्या शक है ? यदि अल्पसंख्यक समाज के ध्रुवीकरण की ही प्रतिक्रिया स्वरुप बहुसंख्यक समाज भी ध्रुवीकृत होकर 'नमो' को जीत दिलाता है तो मोदी की इस जीत के लिए न सिर्फ मुस्लिम कट्टरपंथी तमाम नेता बल्कि वे भी जिम्मेदार होंगे जो नहीं जानते कि नरेंद्र मोदी फ़ासिज्म के घोड़े पर सवार होकर पूँजीवाद का अश्वमेध करने क्यों जा रहे हैं ? जो यह नहीं जानते कि मोदी और संघ परिवार साम्प्रदायिकता का नरमेध करने के लिए इतने उतावले क्यों हो रहे हैं ? जो लोग यह सब नहीं जानते और फिर भी आज 'नमो' का जाप कर रहे हैं तो इसे सामूहिक हाराकिरी के अलावा क्या कहा जा सकता है ? न केवल बनारस के रास्ते, बल्कि मध्यप्रदेश ,गुजरात ,राजस्थान ,दिल्ली और छ्ग से मोदी के राज्यारोहण की सम्भावनाएँ अत्यधिक बलबती होती जा रही हैं। इसकी वजह क्या है ?
दुनिया का सबसे बड़ा और भारत का सबसे कट्टर साम्प्रदायिक ,अतुल्य ताक़तवर एवं तथाकथित गैरराजनैतिक संगठन "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'जिसका सृजनहार हो , छद्म विकाशका नारा जिसका अलमबरदार हो, कट्टर हिंदुत्व् वाद जिसका सरपरस्त हो ,देश-विदेश के अधिकांश सरमायेदार - पूँजीपति जिसके मुरीद हों ,जो कांग्रेस समेत तमाम गैरभाजपाई पार्टियों की असफलताओं और कमजोरियों को तो अतिश्योक्तिपूर्ण ढंग से निरंतर बखान करता रहता हो किन्तु देश में हुए अब तक हुए अनेक बेहतरीन कामों के बारे में मौन रहता हो,जो देशव्यापी मैराथान -विराट आम सभाओं में न केवल बार-बार गुजरात विकाश का झूँठ परोसता रहा हो बल्कि आकर्षक योजनाओं के लालीपाप को प्रस्तुत करते रहने में भी अव्वल रहा हो ,जो ततसम्बन्धी परिवर्तन के लिए वैकल्पिक नीतियों पर चुप्पी लगाए रखता हो,जिसे मीडिया को साधने का हुनर आता हो ,जो कारण थापर जैसे पत्रकारों के जहरीले सवालों को शंकर की तरह पीने में माहिर हो ,जो परिवार की झंझटों से दूर हो ,जो अपने ही वरिष्ठों का निसंकोच लतमर्दन करने में निपुण हो , जो सामाजिक -जातीय -क्षेत्रीय आकांक्षाओं के दोहन में निष्णात हो ,जो न केवल गुजरात बल्कि भारत के तमाम 'सत्ता के दलालों 'का आकर्षण केंद्र बन चुका हो ,वो वनारस से देश का सांसद क्यों नहीं बन सकता ? यदि सांसद बन सकता है तो देश का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता ?
वर्गीय स्वार्थों में बटे धर्मनिरपेक्ष दलों की आपसी खींचतान के कारण, सामाजिक - जातीय -साम्प्रदायिक विषमता के कारण, निर्धन -निर्बल किसान -मजदूर और दीगर सर्वहारा वर्ग में अपनी वर्गीय चेतना का अभाव और संघर्षों की शक्ति को संसदीय ताकत में बदल पाने का माद्दा या हुनर नहीं होने के कारण, उनके हरावल दस्तों के असंगठित होने के कारण ,कांग्रेस- यूपीए की विनाशकारी नीतियों का धर्मनिरपेक्ष -जनतांत्रिक विकल्प अभी तो भ्रूण अवश्था में भी नहीं है। एनडीए का या भाजपा का या मोदी का आर्थिक दर्शन यूपीए का ही आर्थिक दर्शन है। यूपीए -एनडीए के डॉ मनमोहनसिंह के विनाशकारी आर्थिक विकल्प से चिपके रहने के कारण देश की अधिसंख्य आवाम का जीवन दूभर हो चूका है। देश की आवाम को भृष्टाचार और कुशाशन से तब तक निजात नहीं मिल सकती जब तक इन नीतियों को नहीं बदला जाता। चूँकि मोदी का दर्शन वाही है जो यूपीए का है ,कांग्रेस का है या डॉ मनमोहनसिंह का है। जब कांग्रेस के पराभव का पूरा इंतजाम डॉ मनमोहनसिंह कर चले हैं तो 'नमो' का 'विजयपथ ' इतना आसान क्यों नहीं होगा ? मोदी भारत के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते ?
श्रीराम

 अस्ति भाति प्रियं नाम रूप असपंचकम्!

अद्य त्रय ब्रह्म रूपं, जगतरूपं ततो द्वयम्!!"
अर्थ :-जिसका अस्तित्व सदा से है,जो कायनात में सबसे सुंदर है और जो हमारे मन को सबसे प्रिय लगता है-निराकार ब्रह्म का वही सच्चिदानंद स्वरूप है ! और उसको जो नाम रूप मनुष्य ने दिया है,वही जगत रूप है,वही माया है!
साभार :-वेदांत डिमडम

अगर तुम्हारे पास वक़्त है तो....

 अगर तुम्हारे पास गपशप का वक़्त है

तो किताबें पढ़ो!
अगर तुम्हारे पास पढ़ने का वक़्त है तो,
पहाड़ों, रेगिस्तानों और समुद्रों में घूमो !
अगर तुम्हारे पास घूमने का वक़्त है
तो गीत गाओ और नाचो !
अगर तुम्हारे पास नाचने का वक़्त है तो
शांत बैठो,
मेरे ख़ुश और भाग्यवान बेवक़ूफ़।

बुधवार, 16 मार्च 2022

मानव जीवन का पूर्ण फलसफा,

 निर्बलों की हित चिंतक बुध्दि,

न्याय को पक्षधर बनाती है।
समत्व का विचार हौसला देता है,
शहीदों को सुर्खुरू बनाती है।।
मानव जीवन का पूर्ण फलसफा,
केवल धर्म-मजहब ही नहीं है,
साहित्य,संगीत,कला और राष्ट्र बिना,
जिंदगी मनुष्य की पशुवत हो जाती है।
मानवीय मूल्य पुष्पवत् सुवासित हों,
तो खुशियों की बहार खुद चली आती है।
:श्रीराम तिवारी